नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
विच्छिन्नचरणाः पेतुद्विपाः प्रान्तमहामरु । निर्मूलपातितानीलविपुलाचललीलया ॥ १०२ ॥
जिनके पैर कट गये हैं ऐसे हाथी इस प्रकार पड़ गये थे मानो प्रलय कालकी महावायुसे जड़से उखड़ कर नीले रङ्गके बड़े-बड़े पहाड़ ही पड़ गये हों ।॥ १०२ ॥
“Elephants whose legs had been severed fell to the ground in such a manner, as if massive, blue-colored mountains had been uprooted from their very foundations by the catastrophic winds of Doomsday.”102
श्लोक ( Shlok ) 103
पातितानां परैः स्तूयमानसाहसकर्मणाम् । प्रसादवन्ति वक्त्राणि स्थलपद्मश्रियं दधुः ॥ १०३ ॥
शत्रु भी जिनके साहसपूर्ण कार्योंकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसे पड़े हुए योद्धाओंके प्रसन्नमुखकमल, स्थल कमल (गुलाब) की शोभा धारण कर रहे थे ॥ १०३ ॥
“The cheerful lotus-like faces of the fallen warriors—whose courageous deeds were being praised even by their enemies—bore the radiant beauty of land-lotuses (roses).” 103
श्लोक ( Shlok ) 104
भटैः परस्परात्राणि खण्डितानि स्वकौशलात् । तत्खण्डैस्तत्र पार्श्वस्था बहवो व्यसवोऽभवन् ॥ १०४ ॥
योद्धाओंने अपनी कुशलतासे परस्पर एक दूसरेके शस्त्र तोड़ डाले थे परन्तु उनके टुकड़ोंसे ही समीपमें खड़े हुए बहुतसे लोग मर गये थे॥ १०४ ॥
“Through their supreme skill, the warriors shattered one another’s weapons; yet, the flying fragments alone brought death to many who stood nearby.”104
श्लोक ( Shlok ) 105
न मत्सरेण न क्रोधान्न ख्यातेर्न फलेच्छया । भटाः केचिद्युध्यन्त न्यायोऽमिति केवलम् ॥ १०५ ॥
कितने ही योद्धा न ईष्र्यासे, न क्रोधसे, न यशसे, और न फल पानेकी इच्छा से युद्ध करते थे किन्तु ‘यह न्याय है’ ऐसा सोचकर युद्ध कर रहे थे ॥ १०५ ॥
“Many a warrior fought neither out of jealousy, nor anger, nor for fame, nor out of a desire for any reward; instead, they fought solely with the conviction that ‘This is justice.'”105
श्लोक ( Shlok ) 106 – 107
सर्वशस्त्रसमुद्भिन्नशरीरा वीरयोधनाः । परिच्युता गजस्कन्धाच्चलिकालिङ्गित्तांत्रयः ॥ १०६ ॥चिरं परिचितस्थानं परित्यक्तुमिवाक्षमाः । प्रलम्बन्ते स्म कर्णाग्रमवलम्ब्यानताननाः ॥ १०७ ॥
जिनका शरीर सर्व प्रकार के शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न हो गया है ऐसे कितने ही वीर योद्धा हाथियोंके स्कन्धसे नीचे गिर गये थे परन्तु कानोंके आभरणोंमें पैर फँस जानेसे लटक गये थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपना चिर-परिचित स्थान छोड़ना नहीं चाहते हों और इसीलिए कानोंके अग्रभागका सहारा ले नीचेकी ओर मुखकर लटक गये हों ।॥ १०६-१०७ ॥
“Many a brave warrior, whose body had been completely mutilated by all kinds of weapons, fell from the shoulders of their elephants. However, with their feet getting entangled in the elephants’ ear-ornaments, they remained suspended. They appeared as if they simply did not wish to abandon their long-familiar seat, and had thus held onto the tips of the ears for support, hanging upside down with their faces toward the earth.”106 – 107
श्लोक ( Shlok ) 108
केचिद्वामकरोपात्तचित्रदण्डस्वरक्षणाः । दक्षिणास्त्र भुजेनाघ्नन् भटाश्चटुलचारिणः ॥ १०८ ॥
बड़ी चपलतासे चलनेवाले कितने ही योद्धा अपने रक्षाकी लिए बायें हाथमें भाल लेकर शस्त्रोंवाली दाहिनी भुजासे शत्रुओंको मार रहे थे ।। १०८ ॥
“Moving with immense agility, many a warrior held a shield in their left hand for self-defense, while relentlessly striking down enemies with their weapon-bearing right arm.” 108
श्लोक ( Shlok ) 109
तत्र वाच्यो मनुष्याणां मृत्योरुत्कृष्टसञ्चयः । कदलीघातजातस्येत्युक्तिमत्तद्रणाङ्गणम् ॥ १०९ ॥
आगममें जो मनुष्योंका कदलीघात नामका अकालमरण बतलाया गया है उसकी अधिकसे अधिक संख्या यदि हुई थी तो उस युद्धमें ही हुई थी ऐसा उस युद्धके मैदानके विषयमें कहा जाता है ॥१०९॥
“It is said of that very battlefield that if the untimely death of humans—known in the sacred scriptures as Kadalighat—ever occurred in its maximum number, it was only in that fierce war.”109
श्लोक ( Shlok ) 110
एवं तुमुलयुद्धेन प्रवृत्ते सङ्गरे चिरम् । सेनयोरन्तकस्यापि सन्तृप्तिः समजायत ॥ ११० ॥
इस प्रकार दोनों सेनाओंमें चिरकाल तक तुमुल युद्ध होता रहा जिससे यमराज भी खूब सन्तुष्ट हो गया था ।। ११० ।।
“In this manner, a tumultuous war raged between the two armies for a very long time, completely satisfying even Yamaraja (the Lord of Death).”110
श्लोक ( Shlok ) 111
विलङ्घितं बलं विष्णोर्बलेन द्विषतां तथा । यथा क्षुद्र सरिद्वारि ‘महासिन्धुष्प्लवाम्बुना ॥ १११ ॥
तदनन्तर जिस प्रकार किसी छोटी नदीके जलको महानदीके प्रवाहका जल दबा देता है उसी प्रकार श्रीकृष्णकी सेनाको शत्रुकी सेनाने दबा दिया ।। १११ ॥
“Thereafter, just as the water of a great river overwhelms the water of a small river, even so the army of the enemy overwhelmed the army of Sri Krishna.”111
श्लोक 112 से 121
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