चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 291 to 300
श्लोक ( Shlok ) 291 – 297
तां किंवदन्तीमाकर्ण्य कन्यां गोदावरीं सतीम् । पुत्रीं गोपेन्द्रगोपश्रीसम्भूतां गोविमोक्षणम् ॥ २९१ ॥विधास्यते ददामीति काष्ठाङ्गारिकभूभुजा । घोषणां कारितां श्रुत्वा कालाङ्गारिकसङ्गतः ॥ २९२ ॥जीवन्धरः सहायैः स्वैः परीतो व्याधसन्निधिम् । सम्प्राप्याकृष्टकोदण्डनिशातशरसन्ततिम् ॥ २९३ ॥सन्दधत्सन्ततिं मुञ्चंलघु शिक्षाविशेषतः । धनुर्वेदसमादिष्टं स्थानकं सर्वमाब्रजन् ॥ २९४ ॥बाणपातान्परेषाञ्च वञ्चयन्मंधु सञ्चरन् । विकृन्तन् शत्रुबाणौघं रुनन्नस्त्राणि भीरुषु ॥ २९५ ॥इति युध्वा चिरं व्याधान् जित्वा वा दुर्नयानयः । जयश्रिया समालीढः सर्वाशा यशसा भृशम् ॥२९६॥पूरयञ्छशिहंसांस कुन्दप्रसवहासिना । समागमत्पुरं चञ्चद्वैजयन्ती विराजितम् ॥ २९७ ॥
इस समाचारको सुनकर काष्ठाङ्गारिक राजाने घोषणा कराई कि मैं गायों छुड़ानेवालेके लिए गोपेन्द्रकी स्त्री गोपश्रीसे उत्पन्न गोदावरी नामकी उत्तम कन्या दूंगा। इस घोषणाको सुनकर जीवन्धर कुमार काष्ठाङ्गारिकके पुत्र कालाङ्गारिक तथा अपने अन्य मित्रोंसे युक्त होकर उस कालकूट भीलके पास पहुंचे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना धनुष चढ़ाया, उसपर तीक्ष्ण बाण रक्खे, वे अपनी विशिष्ट शिक्षाके कारण जल्दी-जल्दी बाण रखते और छोड़ते थे, धनुर्वेदमें बतलाये हुए सभी पैंतरा बदलते थे, दूसरोंकी बाण-वर्षाको बचाते हुए जल्दी-जल्दी घूमते थे, शत्रुओंके बाणों के समूहको काटते थे और कायर लोगोंपर अस्त्र छोड़नेसे रोकते थे, अर्थान् कायर लोगोंपर अस्त्रोंका प्रहार नहीं करते थे। इस तरह जिस प्रकार नय मिथ्या नयोंको जीत लेता हैं उसी प्रकार उन्होंने बहुत देर तक युद्ध कर भीलोंको जीत लिया । जयलक्ष्मीने उनका आलिङ्गन किया और वे चन्द्रमा, हंस, तूल तथा कुन्दके फूलके समान सुशोभित यश के द्वारा समस्त दिशाओंको व्याप्त करते हुए फहराती हुई पताकाओंसे सुशोभित नगर में प्रविष्ट हुए ॥ २९१-२९७ ।।
“Hearing this news, King Kashtangarika had a proclamation made: ‘To the one who rescues the cattle, I shall give the excellent maiden named Godavari, born of Gopashri, the wife of Gopendra.’ Hearing this proclamation, Prince Jivandhara, accompanied by Kalangarika (the son of Kashtangarika) and his other friends, reached the Bhil chief Kalakuta. Arriving there, they strung their bows and placed sharp arrows upon them. Owing to their exceptional training, they rapid-fired their arrows with great speed, changing all the maneuvers prescribed in the science of warfare (Dhanurveda). Moving swiftly while evading the arrow-showers of the enemy, they severed the clusters of opposing arrows and refrained from launching weapons at cowards—that is to say, they did not strike those who were faint-hearted.
In this manner, just as the true philosophical standpoint (Naya) conquers false doctrines (Mithya-nayas), they waged war for a long time and vanquished the Bhils. Embraced by the goddess of victory (Jayalakshmi), they entered the city—which was adorned with fluttering banners—filling all directions with their glorious fame that shone bright like the moon, a swan, cotton, and the Kunda flower. || 291-297 ||”
श्लोक ( Shlok ) 298
देहचूते कुमारस्य शौर्यादिप्रसवाचिते । जननेत्रालयः पेतुः कीर्तिगन्धावकर्षिताः ॥ २९८ ॥
उस समय शूरवीरता आदि गुण रूपी फूलोंसे सुशोभित कुमार के शरीर-रूपी आम के वृक्षपर कीर्ति रूपी गन्धसे खिंचे हुए मनुष्यों के नेत्ररूपी भौंरे पड़ रहे थे ।। २९८ ।।
“At that time, the bumblebees in the form of the eyes of men, drawn by the fragrance of his renown, were alighting upon the mango tree in the form of the Prince’s body, which was beautifully adorned with blossoms in the form of virtues such as valor. || 298 ||”
श्लोक ( Shlok ) 299 – 300
तदा कुमारसन्देशादेकवाक्येन विद्युताः । गोविमोक्षणमेतेन कृतं युध्वेति भूपतिम् ॥ २९९ ॥ विज्ञाप्यादापयन् कन्यां नन्दाख्याय पुरोदिताम् । गोदावरीं विवाहेन विचित्राः कार्यवृत्तयः ॥ ३०० ॥
तदनन्तर जीवन्धर कुमारने सब वैश्यपुत्रोंसे कहा कि तुम लोग एक स्वरसे अर्थात् किसी मतभेदके बिना ही राजा से कहो कि इस नन्दाढ्यने ही युद्ध कर गायोंको छुड़ाया है। इस प्रकार राजाके पास संदेश भेजकर पहले कही हुई गोदावरी नामकी कन्या विवाहपूर्वक नन्दाढ्यके लिए दिलवाई। सो ठीक ही है क्योंकि कार्योंकी प्रवृत्ति अनेक प्रकारकी होती है। अर्थात् कोई कार्यको बिना किये ही यश लेना चाहते हैं और कोई कार्य करके भी यश नहीं लेना चाहते ।। २९९-३०० ॥
“Thereafter, Prince Jivandhara said to all the sons of the merchants, ‘Speak to the king with one voice—that is, without any disagreement—and tell him that it was Nandadhya alone who fought the battle and rescued the cows.’ Having sent this message to the king in this manner, he had the previously mentioned maiden named Godavari given to Nandadhya in marriage. This is indeed fitting, for the inclinations of men towards actions are varied—that is to say, some desire to claim glory without doing any work, while others do not wish for fame even after accomplishing the deed. || 299-300 ||”
श्लोक 301 से 313
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290
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