चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 525 to 542
श्लोक ( Shlok ) 525
सोऽपि सन्निहितस्तत्र विद्यां विध्वस्य खेचरीम् । तं खेचरं कुमारस्य पुरस्तादकरोद्द्रुतम् ॥ ५२५ ॥
यक्ष शीघ्र ही आ गया और उसने उसकी सब खेचरी विद्या नष्ट कर शीघ्र ही उस विद्याधरको जीवन्धर कुमारके आगेलाकर खड़ा कर दिया ।। ५२५ ।।
The Yaksha arrived instantly, stripped the Vidyadhara of all his Khechari (sky-faring) powers, and promptly brought him before Prince Jivandhara. (525)
श्लोक ( Shlok ) 526 – 529
इदं सरस्त्वया केन रक्ष्यते हेतुनेति सः । परिपृष्टः कुमारेण खेचरः सम्यगब्रवीत् ॥ ५२६ ॥शृणु भद्र प्रवक्ष्यामि मत्कथां कृतचेतनः । अभवत्पुष्पदन्ताख्यमालाकारधनेशिनः ॥ ५२७ ॥ सुतो राजपुरे जातिभटाह्नः कुसुमश्रियः । तत्रैव धनदत्तस्य नन्दिन्यां तनयोऽभवत् ॥ ५२८ ॥ चन्द्राभो मे सखा तस्य कदाचिद्धर्ममभ्यधात् । भवानहञ्च धर्मेण तेन रक्ताशयस्तदा ॥५२९॥
तब जीवन्धर कुमारने उससे पूछा कि तू इस सरोवरकी रक्षा किस-लिए करता है ? इस प्रकार कुमारके पूछने पर वह विद्याधर अच्छी तरह कहने लगा कि हे भद्र ! मेरी कथाको चित्त लगाकर सुनिये, मैं कहता हूँ। पहले जन्ममें मैं राजपुर नगर में अत्यन्त धनी पुष्पदन्त मालाकारकी स्त्री कुसुमश्रीका जातिभट नामका पुत्र था। उसी नगर में धनदत्तकी स्त्री नन्दिनीसे उत्पन्न हुआ चन्द्राभ नामका पुत्र था। वह मेरा मित्र था, किसी एक समय आपने उस चन्द्राभके लिए धर्मका स्वरूप कहा था उसे सुनकर मेरे हृदयमें भी धर्मप्रेम उत्पन्न हो गया ।। ५२६-५२९ ।।
Then Prince Jivandhara asked him, “Why do you guard this lake?” Upon being questioned by the prince in this manner, the Vidyadhara began to narrate clearly, “O auspicious one! Listen intently to my story, I shall speak. In my previous birth, I was the son named Jatibhat, born to Kusumashri, the wife of the extremely wealthy Pushpadanta Malakar (the florist) in Rajpura city. In that very city, there was a son named Chandrabha, born to Nandini, the wife of Dhanadatta. He was my friend. At one point, you had explained the nature of righteousness (Dharma) to that Chandrabha; hearing it, a love for Dharma was aroused in my heart as well.” (526-529)
श्लोक ( Shlok ) 530 – 532
विधाय मद्यमांसादिनिवृत्तिं तत्फलान्मृतः । इह विद्याधरो भूत्वा सिद्धकूटजिनालये ॥ ५३० ॥ विलोक्य चारणद्वन्द्वं विनयेनोपसृत्य तत् । आवयोर्भवसम्बन्धमाकर्ण्य त्वां निरीक्षितुम् ॥ ५३१ ॥रक्षित्वैतत्सरोऽन्येषां प्रवेशाद्विद्यया स्थितः । वक्ष्ये त्वद्भवसम्बन्धं दिव्यावधिनिरूपितम् ॥ ५३२ ॥
और मैंने उसी समय मद्य-मांस आदिका त्याग कर दिया उसके फलसे मरकर मैं यह विद्याधर हुआ । किसी समय मैंने सिद्धकूट जिनालयमें दो चारण मुनियोंके दर्शन किये । मैं बड़ी विनयसे उनके पास पहुँचा और उनके समीप अपने तथा आपके पूर्वभवका सम्बन्ध सुनकर आपके दर्शन करनेके लिए ही अन्य लोगोंके प्रवेशसे इस सरोवरकी रक्षा करता हुआ यहाँ रहता हूँ। उन मुनिराजने अपने दिव्य अवधिज्ञानसे देखकर जो आपके पूर्वभवका सम्बन्ध बतलाया था उसे अब मैं कहता हूँ ।। ५३०-५३२ ॥
“And at that very moment, I renounced intoxicants, meat, and similar things. As a result of that merit, I was reborn as this Vidyadhara after my death. Sometime later, I visited the Siddhakhuta Jinālaya (Jain temple) and paid my respects to two Chārana Munis (ascetics with the power of flight). I approached them with great humility, and upon hearing from them about the connection between your past life and mine, I have been living here, guarding this lake against the entry of others, solely to catch a glimpse of you. I shall now narrate what those revered ascetics revealed through their divine Avadhijnāna (clairvoyance) regarding the connection of your past life.” (530-532)
श्लोक ( Shlok ) 533 – 537
धातकीखण्डप्राग्भागमेरुपूर्वविदेहगे । विषये पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी ॥ ५३३ ॥ पतिर्जयन्धरस्तस्य तनूजोऽभूञ्जयद्रथः । ‘जयवत्यास्त्वमन्येधुर्वनं नाम्ना मनोहरम् ॥ ५३४ ॥ विहतु प्रस्थितस्तस्य सरस्यां हंसशावकम् । विलोक्य चेटकैर्दक्षैस्तमानाय्य सकौतुकः ॥ ५३५ ॥स्थितस्तत्पोषणोद्योगे तन्मातापितरौ तदा । सशोकौ करुणाक्रन्दं नभस्यकुरुतां मुहुः ॥ ५३६ ॥चेटकस्ते तदाकर्ण्य कर्णान्ताकृष्टचापकः । शरेणापायत्चातं तस्याकार्य न पापिनाम् ॥ ५३७ ॥
धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरु सम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती नामका देश है। उसकी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा जयंधर राज्य करता था। उसकी जयवती रानीसे तू जयद्रथ नामका पुत्र हुआ था। किसी एक समय वह जयद्रथ क्रीड़ा करनेके लिए मनोहर नामके वनमें गया था वहाँ उसने सरोवरके किनारे एक हंसका बच्चा देखकर कौतुक वश चतुर सेवकोंके द्वारा उसे बुला लिया और उसके पालन करनेका उद्योग करने लगा। यह देख, उस बच्चेके माता-पिता शोक सहित होकर आकाशमें बार-बार करुण क्रन्दन करने लगे। उसका शब्द सुनकर तेरे एक सेवकने कान तक धनुष खींचा और एक बाणसे उस बच्चे के पिताको नीचे गिरा दिया सो ठीक ही है क्योंकि पापी मनुष्योंको नहीं करने योग्य कार्य क्या है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।॥ ५३३-५३७ ।।
“In the eastern Videha region, related to the Eastern Meru of the Dhatakikhanda continent, lies a country named Pushkalavati. King Jayandhara ruled over its city, Pundarikini. From his queen Jayavati, you were born as a son named Jayadratha. Once, that Jayadratha went to the Manohar forest for recreation. There, seeing a cygnet (baby swan) by the edge of a lake, he out of curiosity had his clever servants fetch it, and began making efforts to rear it. Seeing this, the baby swan’s parents grew sorrowful and began to cry out repeatedly and piteously in the sky. Hearing their cries, one of your servants drew his bow to his ear and brought the baby swan’s father down with an arrow. And this is but expected, for what act is forbidden to sinful men? That is to say, nothing at all.” (533-537)
श्लोक ( Shlok ) 538 – 542
तन्निरीक्ष्य भवन्माता कारुण्यार्दीकृताशया । किमेतदिति सम्पृच्छय प्रबुद्धा परिचारकात् ॥ ५३८ ॥कुपित्वा चेटकायैनं वृथा विद्धवते सती । निर्भर्त्य त्वाञ्च ते पुत्र न युक्तमिदमाश्विमम् ॥ ५३९ ॥मात्रा संयोजयेत्याह स्वञ्चाज्ञानादिदं मया । कृतं कर्मेति निन्दित्वा गर्हित्वात्मानमार्द्रधीः ॥ ५४० ॥तदादानदिनाद्धंसशावकं षोडशे दिने । चातकं घनक्काषीलो वा सजलाम्भोदमालया ॥ ५४१ ॥प्रसवं मधुमासो वा लतया चूतसञ्ज्ञया । पद्मिन्यार्कोदयो वालिं तं मात्रा समजीगमः ॥ ५४२ ॥
यह देख जयद्रथकी माताका हृदय दयासे आर्द्र हो गया और उसने पूछा कि यह क्या है ? सेवकसे सब हाल जानकर वह सती व्यर्थ ही पक्षी के पिताको मारनेवाले सेवक पर बहुत कुपित हुई तथा तुझे भी डाँटकर कहने लगी कि हे पुत्र ! तेरे लिए यह कार्य उचित नहीं है, तू शीघ्र ही इसे इस की मातासे मिला दे । इसके उत्तरमें तूने कहा कि यह कार्य मैंने अज्ञान वश किया है। इस प्रकार आर्द्र परिणाम होकर अपनेआपकी बहुत ही निन्दा की और जिस दिन उस बालकको पकड़वाया था उसके सोलहवें दिन, जिस प्रकार वर्षाकाल चातकको सजल मेघमालासे मिला देता है, वसन्त ऋतु फूलको आमकी लताके साथ मिला देता है और सूर्योदय भ्रमरको कमलिनीके साथ मिला देता है उसी प्रकार उसकी माताके साथ मिला दिया ।। ५३८-५४२ ॥
Seeing this, the heart of Jayadratha’s mother swelled with compassion, and she asked, “What is this?” Upon learning the entire account from the servant, that virtuous woman grew very angry at the servant who had needlessly killed the bird’s father, and she also scolded you, saying, “O son! This act is not proper for you; go and reunite this little one with its mother immediately.” In response, you said, “I did this out of ignorance.” Filled with such compassionate remorse, you severely condemned your own actions. Then, on the sixteenth day from the day you had the young bird captured, you reunited it with its mother—just as the rainy season unites the Chataka bird with water-laden clouds, the spring season unites the blossom with the mango vine, and the sunrise unites the bumblebee with the lotus flower. (538-542)
श्लोक 543 से 552
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524
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