चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 652 to 663
श्लोक ( Shlok ) 652
साधु विद्धमनेनेति प्राशंसन् प्राश्निकास्तदा । कण्ठे मालां कुमारस्य सा समासञ्जयन्मुदा ॥ ६५२ ॥
उसी समय धनुष विद्याके जाननेवाले लोग उनकी प्रशंसा करने लगे कि इन्होंने अच्छा निशाना मारा और कन्या रत्नवतीने भी प्रसन्न होकर उनके गलेमें माला पहिनाई ।। ६५२ ।।
At that very moment, those well-versed in the science of archery began to praise him, saying, “He has struck an excellent mark!” and the maiden Ratnavati, filled with joy, placed the wedding garland around his neck. (652)
श्लोक ( Shlok ) 653
साधवस्तत्र योग्योऽयमनयोर्ननु सङ्गमः । शरत्समयहंसाल्योरिवेति प्रीतिमागताः ॥ ६५३ ॥
उस सभामें जो सज्जन पुरुष विद्यमान थे वे यह कहते हुए बहुत ही प्रसन्न हो रहे थे कि जिस प्रकार शरद् ऋतु और हंसावलीका समागम योग्य होता है उसी प्रकार इन दोनोंका समागम भी योग्य हुआ है । ६५३ ।।
The virtuous men present in that assembly were greatly delighted and remarked, “Just as the union of the autumn season with a flock of swans is perfectly fitting, so too is the union of these two completely ideal.” (653)
श्लोक ( Shlok ) 654
सर्वत्र विजयः पुण्यवतां को वात्र विस्मयः । इत्यौदासीन्यमापन्ना मध्यमाः कृतबुद्धयः ॥ ६५४ ॥
जो बुद्धिमान् मध्यम पुरुष थे वे यह सोचकर उदासीन हो रहे थे कि सब जगह पुण्यात्माओंकी विजय होती ही है इसमें आश्वर्यकी क्या बात है ॥ ६५४ ॥
“The wise men of moderate temperament remained indifferent, thinking, ‘The meritorious always triumph everywhere, so what is there to wonder at in this?'” (654)
श्लोक ( Shlok ) 655 – 657
काष्ठाङ्गारिकमुख्यास्ते नीचा प्राप्तपराभवाः । प्राक्तस्मात्चदनुस्मृत्य दुष्प्रकोपप्रचोदिताः ॥ ६५५ ॥पापास्तुमुलयुद्धेन कन्यामाहर्तुमुद्यताः । बुध्वा जीवन्धरस्तेषां वैषम्यं नयकोविदः ॥ ६५६ ॥सत्यन्धरमहाराजसामन्ताद्यन्तिकं तदा । प्राहिणोदिति सन्दिष्टान् दूतान् सोपायनान् बहून् ॥ ६५७ ॥
और जो काष्ठाङ्गारिक आदि नीच मनुष्य थे वे जीवन्धरसे पहले भी पराभव प्राप्त कर चुके थे अतः उस सब पराभवका स्मरण कर दुष्ट क्रोधसे प्रेरित हो रहे थे। वे पापी भयंकर युद्धके द्वारा कन्याको हरण करनेका उद्यम करने लगे । नीति-निपुण जीवन्धर कुमारने उनकी यह विषमता जान ली जिससे उन्होंने उसी समय भेंट लेकर तथा निम्नलिखित सन्देश देकर बहुतसे दूत सत्यन्धर महाराज के सामन्तोंके पास भेजे ।। ६५५-६५७ ॥
And those wicked, low-minded men like Kashtangarika, who had already suffered defeat at the hands of Jivandhara in the past, recalled all their past humiliations and were driven by evil wrath. Those sinners began making efforts to abduct the maiden by waging a terrible war. The highly tactful Prince Jivandhara, well-versed in statecraft, sensed their malicious intent, whereupon he immediately sent many messengers to the feudatories of King Satyandhara, carrying gifts along with the following message. (655-657)
श्लोक ( Shlok ) 658 – 663
अहं सत्यन्धराधीशाद्विजयायां सुतोऽभवम् । मत्पूर्वकृतदैवेन ताभ्यामुत्पत्त्यनन्तरम् ॥ ६५८ ॥वियुक्तोऽस्मि वणिग्वर्यशरणे समवधिंषि । काष्टाङ्गारिकपापोऽयं काष्ठाङ्गारादिविक्रमात् ॥ ६५९ ॥प्राणसन्धारणं कुर्वन्युष्मदुर्वीभृता कृतः । द्वितीयप्रकृतिनींचो लब्धरन्ध्रो दुराशयः ॥ ६६० ॥तमेवाहिरिवाहत्य स्वयं राज्ये व्यवस्थितः । उच्छेद्यो न ममैवाशु शत्रुत्वाद्भवतामपि ॥ ६६१ ॥रसातलं गतोऽप्यद्य मयावश्यं हनिष्यते । सत्यन्धरमहीशस्य सामन्तास्तस्य भाक्तिकाः ॥ ६६२ ॥यौधाः पुष्टा महामात्रास्तेनान्ये चानुजीविनः । कृतघ्न्नममुमुच्छेत्तुमर्हन्ति कृतवेदिनः ॥ ६६३.॥
‘मैं सत्यन्धर महाराजकी विजया रानीसे उत्पन्न हुआ पुत्र हूँ। अपने पूर्वकृत कर्मके उदय से में उत्पन्न होनेके बाद ही अपने माता-पितासे वियुक्त होकर गन्धोत्कट सेठके घरमें वृद्धिको प्राप्त हुआ हूँ। यह पापी काष्ठाङ्गारिक काष्ठाङ्गार (कोयला) बेचकर अपनी आजीविका करता था परन्तु आपके महाराजने इसे मन्त्री बना लिया था। यह राजसी प्रकृति अत्यन्त नीच पुरुष है। छिद्र पाकर इस दुराशयने साँपकी तरह उन्हें मार दिया और स्वयं उनके राज्य पर आरूढ़ हो गया। यह न केवल मेरे ही द्वारा नष्ट करनेके योग्य है परन्तु शत्रु होनेसे आप लोगोंके द्वारा भी नष्ट करनेके योग्य है। यदि आज यह रसातलमें भी चला जाय तो भी मेरे द्वारा अवश्य ही मारा जायगा । आप लोग सत्यन्धर महाराजके सामन्त हैं, उनके भक्त हैं, योद्धा हैं, उनके द्वारा पुष्ट हुए हैं, अतिशय उदार हैं और कृतज्ञ हैं इसलिए आप तथा अन्य अनुजीवी लोग इस कृतघ्न्नको अवश्य ही नष्ट करें’ ।। ६५८-६६३ ।।
“I am the son born of King Satyandhara’s Queen Vijaya. Due to the fruition of my past karmas, immediately after my birth, I was separated from my parents and brought up in the house of the merchant Gandhotkata. This wicked Kashtangarika used to earn his livelihood by selling charcoal (kashtangara), but your Maharaja elevated him to the position of a minister. He is an extremely low-minded man by nature, despite his royal status. Finding a weak moment, this evil-intentioned wretch killed the king like a treacherous snake and usurped his throne. He deserves to be destroyed not only by me, but being a common enemy, he deserves to be destroyed by you all as well. Even if he flees to the netherworld today, he will most certainly be slain by me. You are the feudatories of King Satyandhara, his loyal devotees, and warriors who have been nurtured by him; you are exceedingly noble and grateful. Therefore, you, along with the other dependents, must absolutely destroy this ungrateful traitor.” (658-663)
श्लोक 664 से 671
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651
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