चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 413 to 423
श्लोक ( Shlok ) 413 – 414
जीवन्धरकुमारावलोकनाज्जातसम्मदाः । सफलोऽस्मन्नियोगोऽभूदिति तत्क्षणमेव ते ॥ ४१३ ॥न्यबोधयन् समस्तं तत्सम्प्राप्य स्वामिनं निजम् । सोऽपि सन्तुष्य नासत्यं मुनीनां जातुचिद्वचः ॥४१४॥
जीवन्धर कुमारके देखनेसे वे पुरुष बहुत ही हर्षित हुए और कहने लगे कि आज हमारा नियोग पूरा हुआ। उन लोगोंने उसी समय जाकर यह सब समाचार अपने स्वामीसे निवेदन किया। उसे सुनकर सेठ भी सन्तुष्ट होकर कहने लगा कि मुनियोंका वचन कभी असत्य नहीं होता ॥ ४१३-४१४ ॥
At the sight of Prince Jīvandhara, those men were filled with great joy and exclaimed:“Today, the purpose for which we were appointed has been fulfilled!”They immediately went and reported all these events to their master. On hearing the news, the merchant too was greatly pleased and said:“The words of the venerable sages can never prove false.”॥413–414॥
श्लोक ( Shlok ) 415 – 416
इति तस्मै सुतां योग्यां विधिना श्रीमतेऽदित । तथा प्राङ्मे मुदा राजपुरे निवसते नृपः ॥ ४१५ ॥सत्यन्धरोऽददादेतद्धनुरेतान् शरांश्च ते । योग्यांस्तत्त्वं गृहाणेति भूयस्तेनाभिभाषितः ॥ ४१६ ॥
इस प्रकार प्रसन्न होकर उसने श्रीमान् जीवन्धर कुमारके लिए विधि-पूर्वक अपनी योग्य कन्या समर्पित कर दी। तदनन्तर वही सेठ जीवन्धर कुमारसे कहने लगा कि जब मैं पहले राजपुर नगर में रहता था तब राजा सत्यन्धरने मुझे यह धनुष और ये बाण दिये थे, ये आपके ही योग्य हैं इसलिए इन्हें आपही ग्रहण करें – इस प्रकार कहकर वह धनुष और बाण भी दे दिये ॥ ४१५-४१६ ।।
Thus delighted, the merchant duly gave his worthy daughter in marriage to the illustrious Prince Jīvandhara, in accordance with the prescribed rites.Thereafter, the merchant said to Prince Jīvandhara:“When I formerly lived in the city of Rājapura, King Satyandhara entrusted me with this bow and these arrows. They are truly worthy of you alone; therefore, I request you to accept them.”Having spoken thus, he respectfully presented the bow and arrows to Prince Jīvandhara. ॥415–416॥
श्लोक ( Shlok ) 417 – 420
गृहीत्वा सुष्ठ सन्तुष्टस्तत्पुरं सुखमावसत् । एवं गच्छति कालेऽस्य कदाचिनिजविद्यया ॥ ४१७ ॥गन्धर्वदचा सम्प्राप्य जीवन्धरकुमारकम् । तं सुखासीनमालोक्य केनाप्यविदितं पुनः ॥ ४१८ ॥आयाद्राजपुरं प्रीतिः प्रीतानां हि प्रियोत्सवः । ततः कतिपयैरेव दिनैः प्रागिव तत्पुरात् ॥ ४१९ ॥चापबाणधरो गत्वा विषये सुजनाह्वये । हेमाभनगरं प्राप्तः कुमारः पुण्यसाधनः ॥ ४२० ॥
जीवन्धर कुमार धनुष और बाण लेकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए और उसी नगर में सुख से रहने लगे। इस तरह कुछ समय व्यतीत होनेपर किसी समभ गन्धर्वदत्ता अपनी विद्याके द्वारा जीवन्धर कुमारके पास गई और उन्हें सुखसे बैठा देख, किसीके जाने बिना ही फिरसे राजपुर वापिस आ गई सो ठीक ही है क्योंकि प्रियजनोंका उत्सव ही प्रेमी जनोंका प्रेम कहलाता है। तदनन्तर कितने ही दिन बाद पहलेके समान उस नगरसे भी वे पुण्यवान् जीवन्धर कुमार धनुष बाण लेकर चल पड़े और सुजन देशके हेमाभ नगरमें जा पहुँचे ।। ४१७-४२० ।।
Prince Jīvandhara was greatly delighted upon receiving the bow and arrows, and he continued to reside happily in that city.After some time had passed, Gandharvadattā, by the power of her supernatural knowledge, came to visit Prince Jīvandhara. Seeing him seated there in comfort and happiness, she returned secretly to Rājapura without anyone becoming aware of her departure. And rightly so—for the joy experienced at the well-being of one’s beloved is itself the true expression of love.Thereafter, after many days had elapsed, the virtuous Prince Jīvandhara once again departed from that city, as he had done before, taking his bow and arrows with him. Journeying onward, he arrived at Hemābha, a city in the country of Sujana. ॥417–420॥
श्लोक ( Shlok ) 421 – 423
तत्पतिर्दृढमित्राख्यो नलिना तस्य वल्लभा । हेमाभाख्या तयोः पुत्री तज्जन्मन्येव केनचित् ॥ ४२१ ॥कृतः किलैवमादेशो मनोहरवनान्तरे । खलूरिकायां धानुष्कव्यायामे येन चोदितः ॥ ४२२ ॥ लक्ष्याभ्यर्णान्निवृत्तः सन् शरः पश्चात्समेष्यति । वल्लभा तस्य बालेयं भवितेति सुलक्षणा ॥ ४२३॥
वहाँ के राजाका नाम दृढ़मित्र और रानीका नाम नलिना था। उन दोनोंके एक हेमाभा नामकी पुत्री थी। हेमाभाके जन्म समय ही किसी निमित्त-ज्ञानीने कहा था कि मनोहर नामके वनमें जो आयुधशाला है वहाँ धनुषधारियोंके व्यायामके समय जिसके द्वारा चलाया हुआ बाण लक्ष्य स्थानसे लौटकर पीछे वापिस आ जावेगा यह उत्तम लक्षणोंवाली कन्या उसीकी वल्लभा होगी ॥ ४२१-४२३ ॥
The king of that city was named Dṛḍhamitra, and his queen was named Nalinā. They had a daughter named Hemābhā.At the very time of Hemābhā’s birth, an expert in the interpretation of omens had foretold:“In the delightful forest named Manohara stands an armoury where archers practise their skill. During such an exercise, the man whose arrow, when shot, returns from the target to him shall become the beloved husband of this maiden, who is endowed with the most excellent and auspicious qualities.”॥421–423॥
श्लोक 424 से 440
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412
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