चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651 | श्लोक 652 से 663 | श्लोक 664 से 671
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 672 to 682
श्लोक ( Shlok ) 672 – 673
नन्दाव्यादिसमानीतमातृजायादिभिर्युतः । सम्प्राप्य परमैश्वर्यमूर्जितो निर्जितद्विषः ॥ ६७२ ॥ यथान्यायं प्रजाः सर्वाः पालयन्हेलयेप्सितान् । लीलयानुभवन् भोगान् स्वपुण्यफलितान् स्थितः ॥६७३॥
नन्दाढ्य आदि जाकर माता विजयाको तथा हेमाभा आदि अन्य स्त्रियों को ले आये। उन सबके साथ जीवन्धर कुमार परम ऐश्वर्यको प्राप्त हुए। उस समय वे अतिशय बलवान् थे और जिसके समस्त शत्रु नष्ट कर दिये गये हैं ऐसी समस्त प्रजाका नीतिपूर्वक पालन करते थे। अपने पुण्यके फलस्वरूप अनायास ही प्राप्त हुए इष्ट भोगोंका लीलापूर्वक उपभोग करते हुए सुखते रहते थे ॥ ६७२-६७३ ।।
Nandadhya and others went and brought back the mother, Queen Vijaya, as well as Hemabha and the other women. Along with all of them, Prince Jivandhara attained supreme majesty. At that time, he was exceedingly powerful and righteously ruled over all his subjects, whose enemies had been completely destroyed. He lived happily, effortlessly enjoying the desired pleasures that had come to him naturally as a result of his past merits. (672-673)
श्लोक ( Shlok ) 674 – 678
सुरादिमलयोद्याने कदाचिद्विहरन् विभुः । वरधर्मयतिं दृष्ट्वा सम्प्राप्य विहितानतिः ॥ ६७४ ॥ ततस्तत्त्वं विदित्वात्शव्रतोऽभूद्दर्शनेऽमलः । नन्दाव्याद्याश्च सम्यक्त्वव्रतशीलान्युपागमन् ॥ ६७५ ॥ एतैः सुखमसौ स्वाप्तैः साकं कालमजीगमत् । अथाशोकवनेऽन्येद्युर्युध्यमानं परस्परम् ॥ ६७६ ॥कपीनां यूथमालोक्य ज्वलत्क्रोधहुताशनम् । जातसंसारनिर्वेगस्तस्मिन्नेव वनान्तरे ॥ ६७७ ॥ प्रशस्तवक्कनामानं चारणं वीक्ष्य सादरम् । पूर्वश्रुतानुसारेण श्रुतात्मभवसन्ततिः ॥ ६७८ ॥
किसी एक समय महाराज जीवन्धर सुरमलय नामक उद्यानमें विहार कर रहे थे वहाँ पर उन्होंने वरधर्म नामक मुनिराजके दर्शन किये, उनके समीप जाकर नमस्कार किया, उनसे तत्त्वोंका स्वरूप जाना और व्रत लेकर सम्यग्दर्शनको निर्मल किया। नन्दाढ्य आदि भाइयोंने भी सम्यग्दर्शन व्रत और शील धारण किये। इस प्रकार जीवन्धर महाराज अपने इन आप्त जनोंके साथ सुखसे समय बिताने लगे। तदनन्तर वे किसी एक दिन अशोक वनमें गये वहाँ पर जिनकी क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो रही थी ऐसे दो बन्दरों के झुण्डों को परस्पर लड़ते हुए देख संसारसे विरक्त हो गये । उसी वनके मध्यमें एक प्रशस्तवङ्क नामके चारण मुनि विराजमान थे इसलिए जीवन्धर महाराजने बड़े आदरसे उनके दर्शन किये और पहले सुने अनुसार अपने पूर्वभवोंकी परम्परा सुनी ।। ६७४-६७८।।
Once upon a time, while King Jivandhara was sporting in the Suramalaya garden, he beheld the holy sage (Muniraj) named Varadharma. Approaching him, the king bowed down, learned the true nature of reality (Tattvas) from him, and purified his right belief (Samyagdarshana) by taking vows. Nandadhya and his other brothers also adopted right belief, vows, and moral conduct. In this manner, King Jivandhara began spending his time happily with these close, trustworthy relatives.
Thereafter, on a certain day, he went into the Ashoka grove. There, upon seeing two troops of monkeys fighting fiercely with each other, their fire of anger violently blazing, he became detached from the worldly cycle (Samsara). In the midst of that very grove, a Charana ascetic (a sage endowed with miraculous flight capabilities) named Prashastavanka was seated; therefore, King Jivandhara paid his respects to him with great reverence and listened to the lineage of his past births just as he had heard before. (674-678)
श्लोक ( Shlok ) 679 – 682
जिनपूजां विधायानु वर्धमानविशुद्धिकः । सुरादिमलयोद्यानायानं वीरजिनेशितुः ॥ ६७९ ॥ श्रुत्वा विभूतिमङ्गत्वा सम्पूज्य परमेश्वरम् । महादेवीतनूजाय दत्वा राज्यं यथाविधि ॥ ६८० ॥ वसुन्धरकुमाराय वीतमोहो महामनाः । मातुलादिमहीपालैर्नन्दाब्यमधुरादिभिः ॥ ६८१ ॥ सर्वसङ्गपरित्यागात्संयमं प्रत्यपद्यत । भुक्तभोगा हि निष्काङ्क्षा भवन्ति भुवनेश्वराः ॥ ६८२ ॥
तदनन्तर उन्होंने जिन-पूजाकर अपनी विशुद्धता बढ़ाई फिर उसी सुरमलय उद्यानमें श्री वीरनाथ जिनेन्द्रका आगमन सुना, सुनते ही बड़े वैभवके साथ वहाँ जाकर उन्होंने परमेश्वरकी पूजा की और गन्धर्वेदत्ता महादेवी के पुत्र वसुन्धर कुमारके लिये विधिपूर्वक राज्य दिया। जिनका मोह शान्त हो गया है और जिनका मन अतिशय विशाल है ऐसे उन जीवन्धर महाराजने अपने मामा आदि राजाओं और नन्दाढ्य मधुर आदि भाइयोंके साथ सर्व परिग्रहका त्याग कर संयम धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो राजा लोग भोग भोग चुकते हैं वे अन्तमें आकांक्षा रहित हो ही जाते हैं ।। ६७९-६८२ ।।
Thereafter, he increased his inner purity by performing Jinendra-worship, and then heard of the arrival of Lord Sri Viranatha Jinendra in that very Suramalaya garden. Upon hearing this, he went there with great grandeur, worshipped the Supreme Lord, and formally handed over the kingdom to Prince Vasundhara, the son of Chief Queen Gandharvadatta.
With his worldly attachments completely pacified and possessing a remarkably vast mind, King Jivandhara renounced all worldly possessions (parigraha) and embraced ascetic restraint (samyama) along with his maternal uncle, other kings, and his brothers including Nandadhya and Madhura. And this is only fitting, for kings who have fully experienced worldly pleasures naturally become free from all desires in the end. (679-682)
श्लोक 683 से 691
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651 | श्लोक 652 से 663 | श्लोक 664 से 671
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