राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 392 to 401
श्लोक ( Shlok ) 392
गणी निजद्विजाभीषुप्रसरैः प्रीणयन् सभाम् । गिरा गम्भीरया व्यक्तमुक्तवानिति स क्रमात् ॥ ३९२ ॥
तब गणधर भगवान् अपने दाँतों की किरणोंके प्रसारसे सभाको संतुष्ट करते हुए गम्भीर-वाणी द्वारा इस प्रकार अनुक्रमसे स्पष्ट कहने लगे ।। ३९२ ।।
“Then, Lord Ganadhara, delighting the assembly with the radiant gleam of his smile, began to speak clearly and systematically in a profound, resonant voice as follows. ॥ 392 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 393
चतुर्थकालपर्यन्ते स्थिते संवत्सरत्रये । साष्टमासे सपक्षे स्यात्सिद्धः सिद्धार्थनन्दनः ॥ ३९३ ॥
उन्होंने कहा कि जब चतुर्थ कालके अन्तके तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी रह जावेंगे तब भगवान् महावीर स्वामी सिद्ध होंगे ॥ ३९३ ॥
“He said that when three years and eight and a half months remain before the conclusion of the fourth era (Chaturtha Kala), Lord Mahavir Swami will attain liberation (Siddha state). ॥ 393 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 394
दुष्षमायाः स्थितिर्वर्षसहस्त्राण्येकविंशतिः । शतवर्षायुषस्तस्मिन्त्नुकृष्टेन मता नराः ॥ ३९४ ॥
दुःषमा नामक पश्चम कालकी स्थिति इक्कीस हजार सागर वर्षकी है। उस कालमें मनुष्य उत्कृष्ट रूपसे सौ वर्षकी आयुके धारक होंगे ॥ ३९४ ॥
“The duration of the fifth era, known as Duhshama, is twenty-one thousand years. In that era, humans will possess a maximum lifespan of one hundred years. ॥ 394 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 395
सप्तारत्निप्रमाणाङ्गा रूक्षच्छाया विरूपकाः । त्रिकालाहारनिरताः सुरतासक्तमानसाः ॥ ३९५ ॥
उनका शरीर अधिकसे अधिक सात हाथ ऊँचा होगा, उनकी कान्ति रूक्ष हो जायगी, रूप भद्दा होगा, वे तीनों समय भोजनमें लीन रहेंगे और उनके मन काम-सेवनमें आसक्त रहेंगे ॥ ३९५ ॥
“Their bodies will be at most seven hands tall, their complexion will become coarse, and their appearance will be unappealing. They will remain completely engrossed in eating during all three periods of the day, and their minds will be intensely attached to sensual pleasures. ॥ 395 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 396
परेऽपि दोषाः प्रायेण तेषां स्युः कालदोषतः । यतोऽस्यां पापकर्माणो जनिष्यन्ते सहस्रशः ॥ ३९६ ॥
कालदोषके अनुसार उनमें प्रायः और भी अनेक दोष उत्पन्न होंगे क्योंकि पाप करनेवाले हजारों मनुष्य ही उस समय उत्पन्न होंगे ॥ ३९६ ॥
“Due to the degenerative influence of the era, many other defects will also generally arise in them, because during that time, thousands of humans born will be inherently prone to committing sins. ॥ 396 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 397 – 399
यथोक्तभूभुजाभावाज्जाते वर्णादिसङ्करे । दुष्षमायां सहस्राब्दव्यतीतौ धर्महानितः ॥ ३९७ ॥पुरे पाटलिपुत्राख्ये शिशुपालमहीपतेः । पापी तनूजः पृथिवीसुन्दर्यां दुर्जनादिमः ॥ ३९८ ॥चतुर्मुखाह्वयः कल्किराजो वेजितभूतलः । उत्पत्स्यते माघसंवत्सरयोगसमागमे ॥ ३९९ ॥
शास्त्रोक्त लक्षणवाले राजाओंका अभाव होनेसे लोग वर्णसंकर हो जायेंगे । उस दुःषमा कालके एक हजार वर्ष बीत जानेपर धर्मकी हानि होनेसे पाटलिपुत्र नामक नगर में राजा शिशुपालकी रानी पृथिवीसुन्दरीके चतुर्मुख नामका एक ऐसा पापी पुत्र होगा जो कि दुर्जनोंमें प्रथम संख्याका होगा, पृथिवीको कम्पायमान करेगा और कल्कि राजाके नामसे प्रसिद्ध होगा। यह कल्कि मघा नामके संवत्सर में होगा ॥ ३९७-३९९ ॥
श्लोक ( Shlok ) 400
समानां सप्ततिस्तस्य परमायुः प्रकीर्तितम् । चत्वारिंशत्समा राज्यस्थितिश्चाक्रमकारिणः ॥ ४०० ॥
आक्रमण करनेवाले डेस कल्किकी उत्कृष्ट आयु सत्तर वर्षकी होगी और उसका राज्यकाल चालीस वर्ष तक रहेगा ॥ ४०० ॥
“The maximum lifespan of that invading tyrant Kalki will be seventy years, and his reign will last for forty years. ॥ 400 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 401
षण्णवत्युक्तपाषण्डिवर्गस्याज्ञाविधायिनः । निजभृत्यत्वमापाद्य महीं कृत्स्नां स भोक्ष्यति ॥ ४०१ ॥
पाषण्डी साधुओंके जो छियानवे वर्ग हैं उन सबको वह आज्ञाकारी बनाकर अपना सेवक बना लेगा और इस तर समस्त पृथिवीका उपभोग करेगा ॥ ४०१ ।।
“Bringing all the ninety-six sects of heretical ascetics under his command, he will make them his servants, and in this manner, he will enjoy absolute lordship over the entire earth. ॥ 401 ॥”
श्लोक 402 से 412
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391
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