राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
पर्व 76 – श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 184 to 192
श्लोक ( Shlok ) 184
स सर्वरमणीयाख्यं पुरं तन्मार्गदर्शनात् । प्रास्थापयन्न कस्योपकुर्वन्ति विशदाशयाः ॥ १८४ ॥
यह सब कर चुकनेके बाद उत्तम वैद्यने उसे मार्ग दिखाकर सर्वरमणीय नामक नगरकी ओर रवाना कर दिया सो ठीक ही है क्यों कि जिनका अभिप्राय निर्मल है ऐसे पुरुष किसका उपकार नहीं करते ? ।। १८४ ॥
“After doing all this, the excellent physician showed him the way and sent him on towards a city named Sarvaramaniya. And this is only fitting, for what welfare will noble men of pure intentions not bring to others? || 184 ||”
श्लोक ( Shlok ) 185 – 190
पुनः स विषमासक्तमतिः पथिकदुर्मतिः । प्रकटीकृतदिग्भेदमोहः प्राक्तनकूपकम् ॥ १८५ ॥सम्प्राप्य पतितस्तस्मिस्तथा कांश्चन संसृतौ । मिथ्यात्वादिकपञ्चोग्रबाधिर्यादीन्युपागतान् ॥ १८६ ॥जन्मकूपे क्षुधादाहाद्यार्तान् संवीक्ष्य सन्मतिः । गुरुवैद्यो दयालुत्वाखुर्माख्योपायपण्डितः ॥ १८७ ॥निर्गमय्य ततो जैनभाषौषधनिषेवणान् । सम्यक्त्वनेत्रमुन्मील्य सम्यग्ज्ञानश्रुतिद्वयम् ॥ १८८ ॥समुद्घटय्य सङ्कशपादौ कृत्वा प्रसारितौ । व्यक्तां दयामयीं जिह्वां विधाय विधिपूर्वकम् ॥ १८९ ॥पञ्चप्रकारस्वाध्यायवचनान्यभिधाप्य तान् । सुधीरगमयन्मार्ग साधुः स्वर्गापवर्गयोः ॥ १९० ॥
इसके बाद वह दुर्बुद्धि पथिक फिरसे विषयोंमें आसक्त हो गया, फिरसे दिशा भ्रान्त हो गया और फिरसे उसी पुराने कुएँके पास जाकर उसमें गिर पड़ा। इसी प्रकार ये जीव भी संसार रूपी कुएँ में पड़कर मिध्यात्व आदि पाँच कारणोंसे वाधिर्य-बहिरापन आदि रोगोंको प्राप्त हो रहे हैं, तथा क्षुधा, दाह आदिसे पीडित हो रहे हैं। उन्हें देखकर उत्तम ज्ञानके धारक तथा धर्मका व्याख्यान करनेमें निपुण गुरु रूपी वैद्य दयालुताके कारण इन्हें इस संसार-रूपी कुएँसे बाहर निकालते हैं। तदनन्तर जैनधर्मरूपी औषधिके सेवनसे इनके सम्यग्दर्शन रूपी नेत्र खोलते हैं, सम्यग्ज्ञान रूपी दोनों कान ठीक करते हैं, सम्यक् चारित्ररूपी पैरोंको फैलाते हैं, दया रूपी जिह्वाको विधिपूर्वक प्रकट करते हैं, और पाँच प्रकारके स्वाध्याय रूपी वचन कहलाकर उन्हें स्वर्ग तथा मोक्षके मार्ग में भेजते हैं। वे गुरूरूपी वैद्य अत्यन्त बुद्धिमान और उत्तम प्रकृतिके होते हैं ॥ १८५-१९० ॥
“Thereafter, that foolish traveler once again became attached to sensual pleasures, lost his way, and returning to the same old well, fell right back into it.
In the exact same manner, these living beings, having fallen into the well of worldly existence (Samsara), are afflicted with diseases such as deafness due to the five causes like delusion (Mithyatva), and are tormented by hunger, burning agony, and other miseries. Seeing them, the preceptors—who act as compassionate physicians, possessing supreme knowledge and expertise in expounding righteousness (Dharma)—rescue them from this well of worldly existence out of sheer mercy.
Subsequently, through the administration of the medicine of Jain Dharma, they open the beings’ eyes of right perception (Samyag-Darshana), restore their ears of right knowledge (Samyag-Jnana), enable their feet of right conduct (Samyak-Charitra) to stride freely, systematically awaken their tongue of compassion, and by making them utter the words of fivefold scriptural study (Svadhyaya), guide them onto the path of heaven and liberation (Moksha). Those preceptors, serving as physicians, are exceedingly wise and endowed with an noble nature. || 185-190 ||”
श्लोक ( Shlok ) 191 – 192
निजपापोदयाद्दीर्घसंसारास्तत्र केचन । सुगन्धिबन्धुरोद्भिन्नचम्पकाभ्याशवर्तिनः ॥ १९१ ॥तत्सौरभावबोधावमुक्ताः षट्चरणा यथा । पार्श्वस्थाख्याः सहग्ज्ञानचारित्रोपान्तवर्तनात् ॥ १९२ ॥
उनमेंसे बहुतसे लोग पाप-कर्मके उदयसे दीर्घसंसारी होते हैं। जिस प्रकार सुगन्धि से भरे विकसित चम्पाके समीप रहतेहुए भी भ्रमर उसकी सुगन्धि से दूर रहते हैं हैं उसी प्रकार जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्रके समीपवर्ती होकर भी उनके रसास्वादनसे दूर रहते हैं वे पार्श्र्वस्थ कहलाते हैं ॥ १९१-१९२।।
“Among them, many living beings remain bound to endless cycles of worldly existence (Dirgha-Samsari) due to the ripening of their past sins (Pap-Karma). Just as large black bees (Bhramar), despite staying close to a fully blossomed Champa flower filled with fragrance, remain distant from its sweet scent, in the exact same manner, those who remain far from tasting the essence of right perception (Samyag-Darshana), right knowledge (Samyag-Jnana), and right conduct (Samyak-Charitra), despite being in close proximity to them, are called Parshvastha (lax or marginal ascetics). || 191-192 ||”
श्लोक 193 से 200
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
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