नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 363 to 372
श्लोक ( Shlok ) 363 – 365
ततश्चतुरशीत्युक्तसहस्त्राब्दायुपश्च्युतौ । विषये पुष्कलावत्यां पुरे विजयनामनि ॥ ३६३ ॥मधुषेणाख्यवैश्यस्य बन्धुमत्याश्च बन्धुरा । सुता बन्धुयशा नाम बभूवाभ्युदयोन्मुखी ॥ ३६४ ॥जिनदेवभुवा सख्या सहासौ जिनदत्तया । समुपोष्यादिमे कल्पे कुबेरस्याभवत्प्रिया ॥ ३६५ ॥
तदनन्तर वहाँकी चौरासी हजार वर्षकी आयु समाप्त होनेपर वह वहाँ से चयकर पुष्कलावती देशके विजयपुर नामक नगर में मधुषेण वैश्यकी बन्धुमती स्त्रीसे अतिशय सुन्दरी बन्धुयशा नामकी पुत्री हुई। उसका अभ्युदय दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था। वहींपर उसकी जिनदेवकी पुत्री जिनदत्ता नामकी एक सखी थी उसके साथ उसने उपवास किये, जिसके फलस्वरूप मरकर प्रथम स्वर्गमें कुबेरकी देवाङ्गना हुई ।। ३६३-३६५ ।।
“Thereafter, upon the expiration of her celestial lifespan of eighty-four thousand years, she descended from that realm and was reborn in the city of Bijayapur in the country of Pushkalavati. She was born as an exceedingly beautiful daughter named Bandhuyasha to Bandhumati, the wife of the merchant Madhushen. Her fortune and prosperity grew greater day by day.
In that same city, she had a friend named Jinadatta, who was the daughter of Jindev. Along with her friend, she observed sacred fasts, as a result of which she passed away and was reborn in the first heaven as a celestial nymph (devangana) of Kubera.”[ 363-365]
श्लोक ( Shlok ) 366 – 372
ततश्च्युत्वाऽभवत्पुण्डरीकिण्यां वज्रनामटत् । वैश्यस्य सुप्रभायाश्च सुमतिः सुतसत्तमा ॥ ३६६ ॥सा तत्र सुव्रताख्यायिकाहारार्पणपूर्वकम् । रत्नावलीमुपोष्याभूद् ब्रह्मलोकेऽप्सरोवरा ॥ ३६७ ॥चिरात्ततो विनिष्क्रम्य द्वीपेऽस्मिन् खेचराचले । उदक्छेण्यां पुरे जाम्बवाख्ये जाम्बवभूपतेः ॥ ३६८ ॥अभूस्त्वं जम्बुषेणायां सती जाम्बवती सुता । सूनुः पवनवेगस्य श्यामलायाश्च कामुकः ॥ ३६९ ॥भवत्याः स नमिर्नान्ना मैथुनोऽशिथिलेच्छया । ज्योतिर्वनेऽन्यदा स्थित्वा देया जाम्बवती न चेत् ॥ ३७०॥ आच्छिद्याहं ग्रहीष्यामीत्यवोचज्जाम्बवः क्रुधा । खादितुं प्रेषयामास विद्यां माक्षिकलक्षिताम् ॥ ३७१ ॥ तदा नमिकुमारस्य किन्नराख्यपुराधिपः । मातुलो यक्षनाली तामच्छेत्सीत्खेचरेश्वरः ॥ ३७२ ॥
वहाँ से चयकर पुण्डरीकिणी नगरी में वज्रनामक वैश्य और उसकी सुभद्रा स्त्रीके सुमति नामकी उत्तम पुत्री हुई । उसने वहाँ सुव्रता नामकी आर्यिकाके जिससे ब्रह्म स्वर्गमें श्रेष्ठ अप्सरा हुई। पर्वतकी उत्तर श्रेणीपर जाम्बव नामके लिए आहार दान देकर रत्नावली नामका उपवास किया, बहुत दिन बाद वहाँ से चयकर इसी जम्बूद्वीपके विजयार्ध नगर में राजा जाम्बव और रानी जम्बुषेणाके तू जाम्बवतीनामकी पुत्री हुई। उसी विजयार्ध पर्वतपर पवनवेग तथा श्यामलाका पुत्र नमि रहता था वह रिश्तेमें भाईका साला था और तुझे चाहता था। एक दिन वह ज्योतिर्वनमें बैठा था वहाँ तेरे प्रति तीव्र इच्छा होनेके कारण उसने कहा कि यदि जाम्बवती मुझे नहीं दी जावेगी तो मैं उसे छीनकर ले लूँगा। यह सुनकर तेरे पिता जाम्बवको बड़ा क्रोध आ गया। उसने उसे खानेके लिए माक्षिक-लक्षिता नामकी विद्या भेजी। उस समय वहाँ किन्नरपुरका राजा नमिकुमारका मामा यक्षमाली विद्याधर विद्यमान था उसने वह विद्या छेद डाली ॥ ३६६-३७२ ।।
“Descending from that celestial realm, she was reborn in the city of Pundarikini as Sumati, the noble daughter of the merchant Vajra and his wife Subhadra. There, after offering pure food (ahaar-daan) to a nun named Aryika Suvrata, she observed the Ratnavali fast. As a result, she was reborn in the Brahma heaven as an exalted celestial nymph (apsara).
After a very long time, she descended from there and was reborn on the northern ridge of the Vijayardha mountain, in the city of Jambav. There, you were born as the daughter named Jambavati to King Jambav and Queen Jambushena.
On that same Vijayardha mountain lived Nami, the son of Pawanveg and Shyamala. By relation, he was a cousin’s brother-in-law, and he deeply desired you. One day, while sitting in the Jyotirvan forest, driven by his intense longing for you, he declared, ‘If Jambavati is not given to me, I shall abduct her by force.’
Hearing this, your father, King Jambav, flew into a great rage. He unleashed a mystical spell (vidya) named Makshika-Lakshita to consume him. At that time, Nami Kumar’s maternal uncle, Yakshamali Vidyadhar, the king of Kinnarpur, was present there, and he neutralized and cut down that spell.”[ 366-372]
श्लोक 373 से 382
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362
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