आलोचना पाठ – छंद 10 & 11 : अर्थ एवं व्याख्या
छंद 10
फल पञ्च उदम्बर खाये, मधु मांस मद्य चित चाये
नहि अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुव्यसन दुखकारे ॥१०॥
शब्दार्थ
- फल पञ्च उदम्बर — पाँच उदुम्बर जाति के फल।
- मधु — शहद।
- मांस — जीव के शरीर से प्राप्त मांस।
- मद्य — नशीले पेय/शराब।
- चित चाये — मन लगाकर सेवन किया/इच्छापूर्वक ग्रहण किया।
- अष्ट मूलगुण — श्रावक के आठ मूलभूत त्याग/संयम।
- कुव्यसन — बुरी आदतें।
- दुखकारे — दुःख उत्पन्न करने वाले।
मैंने पाँच उदुम्बर फलों का सेवन किया तथा मधु, मांस और मद्य जैसी त्याज्य वस्तुओं में भी रुचि रखी। मैंने श्रावक के अष्ट मूलगुणों को धारण नहीं किया और दुःख उत्पन्न करने वाले अनेक कुव्यसनों का सेवन/आश्रय किया।
फल पंच उदंबर खाये, हमने जो है पाँच उदुंबर फलों का भी सेवन करा। पाँच उदुंबर फलों का त्याग और मधु, मांस, मद्य का त्याग। इनको करने—इनको सबको मिलाकर जो है यह आठ कहलाते हैं, यह अष्ट मूलगुण कहलाते हैं नहिं अष्ट मूलगुण धारे’, मैंने इन अष्ट मूलगुणों को धारण नहीं किया। ‘सेये कुव्यसन दुखकारे‘, और इन जो है कुव्यसनों को मैंने जो है सेवन करके और बहुत जो है दुःख-दुःखों का अनुभव करा। यानी कि यह सब यदि हम इन विषय-सेवन का सेवन करते हैं, तो हम क्या करते हैं? हमें दुःख ही मिलता है। क्योंकि हम अपनी आत्मा की शक्ति को तो मलिन करते हैं, जो अनंत सुख हमारी आत्मा का जो गुण है, मूल गुण है, उसको हम खत्म करते जाते हैं, उसको हम दबाते जाते हैं, तो इसके फलतः फलस्वरूप हमें क्या मिलता है? हमें दुःख का अनुभव करना पड़ता है।
अष्ट मूलगुण (८ मूलगुण) का विवेचन
जैन धर्म में एक गृहस्थ (श्रावक) के लिए धर्म मार्ग पर चलने हेतु प्राथमिक रूप से ८ मूलगुणों का धारण करना अनिवार्य बताया गया है:
- तीन मकार का त्याग: मद्य (शराब), माँस और मधु (शहद)।
- पांच उदुंबर फलों का त्याग: बड़, पीपल, पाकर, कठूमर और उमर (गूलर)।
1. पाँच उदुंबर फल एवं वर्तमान संदर्भ (अंजीर आदि)
- प्राचीन एवं वर्तमान स्थिति: प्राचीन काल में जब लोग जंगलों या यात्राओं में गमन करते थे, तब जाने-अनजाने इन उदुंबर फलों का सेवन कर लेते थे। यद्यपि आज के समय में सीधे रूप से ये फल कम देखने को मिलते हैं, परंतु इन्हीं की जाति में आने वाला अंजीर आज बहुतायत से प्रयोग होता है।
- त्रस जीवों की उत्पत्ति: उदुंबर श्रेणी के फलों (जैसे अंजीर) में सूक्ष्म एवं अनंत त्रस जीव (चलने-फिरने वाले जीव) पाए जाते हैं। इन्हें खोलने पर स्पष्ट रूप से असंख्य जीव-राशियाँ उड़ती या बाहर निकलती हुई देखी जा सकती हैं।
- त्याग का संकल्प: अतः जैन दर्शन के अनुसार उदुंबर श्रेणी के अंतर्गत आने वाले अंजीर आदि फलों का सेवन पूर्णतः त्याज्य है।
2. मधु (शहद) का त्याग
- हिंसा का भाव: शहद की प्राप्ति मधुमक्खियों के छत्ते को निचोड़कर और नष्ट करके होती है। छत्ते में मधुमक्खियों के मलमूत्र, अंडे और असंख्य त्रस जीवों की उपस्थिति रहती है।
- दोष: शहद प्रत्यक्ष रूप से त्रस-जीवों से युक्त है। अतः इसका प्रयोग न केवल भोजन में, बल्कि किसी भी प्रकार की औषधि, कॉस्मेटिक्स (प्रसाधन) या सौंदर्य प्रसाधनों में भी पूर्णतः वर्जित है।
3. मद्य (अल्कोहल) का त्याग एवं आधुनिक संदर्भ
- प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सेवन: यद्यपि कोई भी विवेकशील व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से शराब या मद्यपान का सेवन नहीं करता, परंतु आधुनिक जीवनशैली में अप्रत्यक्ष रूप से इसका प्रयोग बढ़ रहा है।
- सैनिटाइज़र एवं औषधियाँ: अल्कोहल-युक्त सैनिटाइज़र, टॉनिक या औषधियों के अत्यधिक उपयोग से बचना चाहिए।
- स्वास्थ्य एवं अहिंसा की दृष्टि: अत्यधिक अल्कोहल-युक्त सैनिटाइज़र त्वचा के माध्यम से अवशोषित होकर आंतरिक अंगों (जैसे किडनी) एवं स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकता है।
विकल्प: हाथ धोने के लिए गर्म पानी या प्राकृतिक/अल्कोहल-रहित साधनों का प्रयोग करना अधिक श्रेयस्कर और अहिंसक मार्ग है।
छंद 11
दुइबीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये
कछु भेदाभेद न पायो, ज्यो त्यों करि उदर भरायो ॥११॥
अभी यह छंद जो है, उसकी थोड़ी विस्तार से हम चर्चा करेंगे। “दऊ बीस अभख जिन गाये” — दऊ बीस मतलब 22 प्रकार के जो अभक्ष्य बताए गए हैं, उसकी हम चर्चा करेंगे। दऊ बीस मतलब 22। तो 22 प्रकार के अभक्ष्य की चर्चा ‘नाटक समयसार’ के अंदर बनारसीदास जी ने बहुत सुंदर तरीके से छंद में लिखी हुई है। वह छंद हम पढ़ते हैं नाटक समयसार का ‘गुणस्थान अधिकार’ के अंतर्गत, जो 55 नंबर का छंद है।
ओरा घोरबरा निसिभोजन, बहुबीजा बंगन संधान ।
पीपर बर ऊमर कटूबर, पाकर जो फल होइ अजान ।।
कंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान । फल अति तच्छ तुसार चलित रस.
जिनमत ए बाईस अखान ।। ५५ ।।
शब्दार्थ :- घोरवरा = द्विदल’ । निसिभोजन = रात्रिमे आहार करना । सधान = अथाना, अचार मुरब्वा । आमिष = मांस । मधु = शहद । मदिरा = शराब । अति तुच्छ = बहुत छोटे । तुषार = बर्फ । चलित रस = जिनका स्वाद बिगड़ जाय । अखान = अभक्ष्य ।
अर्थ :- (१) ओला (२) द्विदल (३) रात्रिभोजन (४) बहुबीजा (५) बेगन (६) अथाना, मुरब्बा (७) पोपर फल (८) बड़फल (६) ऊमर फल (१०) कठूमर (११) पाकर फल (१२) अजान फल (१३) कंदमूल (१४) माटी (१५) विष (१६) मांस (१७) शहद (१८) मक्खन (१६) शराब (२०) अतिसूक्ष्म फल (२१) बर्फ (२२) चलित रस – ये बाईस अभक्ष्य जनमत में कहे हैं ।। ५५ ।।
1. ओरा
ओरा का अर्थ होता है बर्फ़। मतलब जो आसमान से गिरती है, स्नोफॉल कहते हैं। स्नोफॉल का मतलब… अभी तो कोई ऐसा खाता हो या ऐसा कुछ देखने में नहीं आता, लेकिन यहाँ पर ऐसा कहते हैं कि जो स्नोफॉल है, उसके ऊपर जब हम चलते हैं या फिर उसका सेवन करते हैं तो उसमें भी त्रस जीव होते हैं, तो उसका हमें सेवन भी नहीं करना चाहिए। तो ओरा—पहला शब्द हमने क्लियर किया।
2. गोरबरा (द्विदल)
फिर गोरबरा—गोरबरा का मतलब होता है द्विदल। अभी द्विदल जो है, तीन प्रकार के द्विदल कहे हैं:
- अन्न द्विदल
- काष्ठ द्विदल
- हरित द्विदल
ऐसे तीन प्रकार के द्विदल हैं।
द्विदल का मतलब यह है कि जो भी दूध, दही या छाछ—इसके साथ द्विदल युक्त जो पदार्थ है, उसका हमें सेवन नहीं करना चाहिए।
- अन्न द्विदल: इसमें जैसे मूंग की दाल हो गई, उड़द की दाल हो गई, जितने भी प्रकार के कठोल हैं (राजमा आदि, जिसके बीच में से फाड़ होती हो), जैसे चना, चने की दाल आदि। जो भी आइटम बनती हैं, उसका हमें दूध, दही और छाछ के साथ सेवन नहीं करना है।
- काष्ठ द्विदल: इसमें कुल्थी (कुलत्थ) मूँगफली, काजू, चिरौंजी, धनिया आदि आएंगे। उसका हमें दूध, दही और उससे बनने वाले प्रोडक्ट्स के साथ सेवन नहीं करना है
- हरित द्विदल: इसमें जितने भी प्रकार के बीज आते हैं (जैसे दूधी के बीज, ककड़ी के बीज, मिर्च के बीज, हरी मिर्च के बीज, खरबूजा, तुरई, भिंडी आदि)। उसके बीज का दूध के साथ सेवन नहीं करना है।
तो यहाँ तीन चीज़ें हैं: अन्न द्विदल, काष्ठ द्विदल और हरित द्विदल। इस सभी का हमें दूध, दही, छाछ या पनीर आदि के साथ सेवन नहीं करना है। क्योंकि इसमें क्या होता है कि जिससे हमने दूध निकाला है (गाय, भैंस आदि), जैसे ही हमारे मुँह में द्विदल जाता है, तो उस गाय की जाति के सम्मूर्च्छन जीव (पंचेन्द्रिय सम्मूर्च्छन जीव) हमारे मुख में पैदा हो जाते हैं। और ऐसा केवल जैन दर्शन ही नहीं, आयुर्वेद भी कहता है कि द्विदल का सेवन स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। तो उसका हमें सेवन नहीं करना है।
कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि दूध या दही को गरम करके उसका सेवन कर सकते हैं। लेकिन वह मान्यता केवल श्वेतांबर ग्रंथों में दी गई है। दिगंबर आम्नाय के अनुसार उसे गरम करके भी नहीं ले सकते।
3. निशि भोजन (रात्रि भोजन)
निशि भोजन का अर्थ होता है रात्रि भोजन। रात्रि भोजन तो जैन दर्शन के अलावा वैष्णव व हिंदू संप्रदाय—सभी के अंदर सर्वथा रूप से निषिद्ध बताया गया है। हिंदू धर्म में नरक के चार द्वार बताए गए हैं:
- आचार (अचार): 24 घंटे के बाद जो अभक्ष्य हो जाता है, उसका सेवन करने वाला नरक जाता है।
- पर-स्त्री सेवन: पर-स्त्री सेवन करने वाला नरक में जाता है।
- रात्रि भोजन: रात्रि भोजन करने वाला नरक में जाता है।
- कंदमूल: जो कंदमूल का सेवन करता है, वह नरक में जाता है।
जैन दर्शन में रात्रि भोजन सर्वथा निषिद्ध है। चार प्रकार के आहार कहे गए हैं:
- खाद्य: गेहूं, चावल, रोटी, सब्जी आदि।
- स्वाद्य: लौंग, इलायची, चटनी आदि।
- लेह्य: चाटने वाले पदार्थ जैसे दही, लस्सी आदि।
- पेय: दूध, पानी आदि पेय पदार्थ।
चौविहार का मतलब होता है—चारों प्रकार के आहार का त्याग। ऐसा नहीं कि सिर्फ़ अन्न का त्याग कर दिया और कहें कि रात्रि भोजन का त्याग है, और फिर मूँगफली खाते हो, दूध-पानी पीते हो। वह रात्रि भोजन का त्यागी नहीं कहलाएगा। चारों प्रकार के आहार का सर्वथा त्याग करना ही रात्रि भोजन का त्यागी कहलाएगा।
रात को बनाया हुआ भोजन दिन में खाना, वह भी रात्रि भोजन के अंतर्गत आता है। जिसको रात्रि भोजन का त्याग है, वह बाज़ार का खाना बिल्कुल नहीं खा सकता। क्योंकि बाज़ार में जो बनाते हैं, उनको दिन-रात का फ़र्क नहीं होता। जैसे शादियों में रात को 3-4 बजे से खाना बनाना शुरू कर देते हैं, तो वह भोजन भले ही दिन में खा रहे हों, लेकिन कहलाएगा रात्रि भोजन ही। बाज़ार के रेडीमेड पैकेट्स (खाखरा आदि) फैक्ट्रियों में दिन-रात बनते हैं, तो उसे कैसे ले सकते हैं? इसलिए रात्रि भोजन का त्यागी बाज़ार की बनी वस्तुएँ नहीं ले सकता।
4. बहुबीजा
जिसके अंदर बहुत बीज हों, जैसे बैंगन—उसका सेवन नहीं करते।
5. संधान (अचार)
अचार की मर्यादा 24 घंटे की कही गई है। 24 घंटे के बाद वह सड़ने लगता है। उसके बाद अचार का सेवन करना मदिरा जितना पाप उत्पन्न करता है। 24 घंटे के अंदर ही उसका उपयोग कर लेना चाहिए, उसके बाद उसमें त्रस जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
6. पंच उदुंबर फल व अनजान फल
पीपर, बर, उमर, कठूमर, पाकर—यह सब पंच उदुंबर फल हैं। और “पाकर जो फल होई अजान”—अर्थात् जो अनजान/अज्ञात फल हैं, जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है (विदेशों से आने वाले फल), उनका सेवन नहीं करना चाहिए। हमें सीमित फलों का ही सेवन करना चाहिए।
‘पुरुषार्थसिद्ध्युपाय’ ग्रंथ में आचार्य देव ने दो प्रकार की हिंसा कही है:
- अविरमण रूप हिंसा: इसका दोष ज़्यादा लगता है।
- परिणमन रूप हिंसा: यह जितने समय करते हैं, उसी समय लगती है।
जैसे कोई रात्रि भोजन का त्यागी नहीं है, वह दिन में बैठा है फिर भी उसे रात्रि भोजन का दोष लग रहा है, क्योंकि उसका रात्रि भोजन के प्रति राग भाव पड़ा हुआ है। जिस वस्तु का त्याग नहीं किया है, उस संबंधी राग भाव बना रहता है। इसलिए हमें अन्य वस्तुओं का त्याग कर देना चाहिए।
- कंदमूल: लहसुन, आलू, प्याज, गाजर, मूली, बीट, शकरकंद आदि जो ज़मीन के नीचे उगते हैं, उनका सेवन नहीं करना चाहिए।
- माटी: मिट्टी के बर्तन का एक बार उपयोग करने के बाद दोबारा उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि उसमें भोजन फँस जाता है। मिट्टी का सेवन भी अभक्ष्य है।
- विष: ज़हर।
- आमिश: मांस।
- मधु: शहद।
- मदिरा: शराब/दारू।
- अति तुच्छ फल: बहुत छोटे फल जिनसे कोई पोषण नहीं मिलता और जो परिपक्व नहीं हुए हैं, वे अनंतकाय (अनंत जीवों वाले) होते हैं।
- तुषार (बर्फ़) व चलित रस: जो भी वस्तु पानी से बनती है (रोटी, सब्जी आदि), उसकी मर्यादा 6 घंटे की होती है। उसके बाद उसमें जीवों की उत्पत्ति होने लगती है। तली हुई वस्तु की मर्यादा 24 घंटे की होती है।
छंद 12 व 13
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