राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 303 to 317
श्लोक ( Shlok ) 303
ध्रुवं तन्नारदेनोक्तमकालमरणं ध्रुवम् । भावीति भावयन् सीतां तत्सभायामलक्षयन् ॥ ३०३ ॥
नारदने जो कहा था कि इसका अकालमरण होनेवाला है सो ठीक ही कहा था । इस प्रकार विचार करते हुए अणुमान ने रावणकी सभामें सीता नहीं देखी ॥ ३०३ ॥
“‘What Narada had said—that his untimely death is drawing near—was indeed completely true.’ Reflecting in this manner, Anuman did not find Sita in Ravana’s assembly hall. || 303 ||”
श्लोक ( Shlok ) 304 – 305
मन्दमन्दप्रभे भानौ दीने सति दिनात्यये । सहायसम्पदं प्रायो मन्वानः सम्पदावहाम् ॥ ३०४ ॥उदयास्तमयौ नित्यं देहिनामिति रावणम् । रविर्ययौ निरूप्येव समन्तादिति चिन्तयन् ॥ ३०५ ॥
धीरे-धीरे सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गई, दिन अस्त हो गया और सूर्य रावणके लिए यह सूचना देता हुआ ही मानो अस्ताचलकी ओर चला गया कि संसारमें जितने सहायक हैं वे सब प्रायः सम्पत्तिशा-लियोंकी ही सहायता करते हैं और संसारमें जितने प्राणी हैं उन सबका उदय और अस्त नियमसे होता है ॥ ३०४-३०५ ॥
“Gradually, the radiance of the sun grew faint, the day came to a close, and the sun departed toward the western horizon (Astachal), as if delivering a warning to Ravana that almost all helpers in this world assist only the wealthy, and that the rise and fall of every living being in this world is bound by an absolute law. || 304-305 ||”
श्लोक ( Shlok ) 306 – 309
दूतो रामस्य गत्वाऽन्तःपुरपश्चिमगोपुरम् । आरुह्य लोकमानोऽयं भ्रभरारावराजितम् ॥ ३०६ ॥ वनं सर्वर्तुकं नाम नन्दनं नन्दनोपमम् । फलप्रसवभारावनम्रकम्रमहीरुहैः ॥ ३०७ ॥ मन्दगन्धवह। दूतनानाप्रसवपांशुभिः । कृतकाद्रिसरोवापीलतालालितमण्डपैः ॥ ३०८ ॥ मदनोद्दीपनैर्दे शैरन्यैश्चातिमनोहरम् । दृष्ट्वा तत्र मनाक स्थित्वा सप्रमोदः सकौतुकः ।। ३०९ ।।
इस प्रकार सब ओरसे चिन्तवन करता हुआ वह रामचन्द्रका दूत अणुमान् अन्तःपुरके पश्चिम गोपुरपर चढ़कर नन्दन नामका वन देखने लगा। वह नन्दन वन भ्रमरोंके शब्दसे सुशोभित था, उसमें समस्त ऋतुओंकी शोभा बिखर रही थी, साथ ही नन्दन-बनके समान जान पड़ता था, फल और फूलोंके बोझसे झुके हुए सुन्दर सुन्दर वृक्षों, मन्दमन्द वायुसे उड़ती हुई नाना प्रकारके फूलोंकी परागों, कृत्रिम पर्वतों, सरोवरों, बावलियों, तथा लताओंसे सुशोभित मण्डपों और कामको उद्दीपित करनेवाले अन्य अनेक स्थानोंसे अन्यन्त मनोहर था। उसे देख वह अणुमान् कुछ देर तक हर्ष और कौतुकके साथ वहां खड़ा रहा ॥ ३०६-३०९ ॥
“Contemplating in this manner from all directions, Ramachandra’s messenger, Anuman, climbed upon the western gateway (gopuram) of the inner palace and began to observe a forest named Nandan. That Nandan forest was graced by the humming of bumblebees, displayed the splendor of all seasons simultaneously, and truly resembled the celestial Nandan-van (of the heavens). It was exceedingly enchanting with beautiful trees bending under the weight of fruits and flowers, the pollen of diverse blossoms drifting in the gentle breeze, artificial hills, lakes, stepwells, bowers adorned with creepers, and various other settings capable of exciting love. Beholding it, Anuman stood there for a while with great joy and wonder. || 306-309 ||”
श्लोक ( Shlok ) 310 – 317
तत्रैकस्मिन् समासन्नदेशे विद्याधरीजनैः । सामादिभिर्वशीकतु मिङ्गिताकारवेदिभिः ॥ ३१० ।।परीतां शिशिपाक्ष्माजमूले शोकाकुलीकृताम् । ध्यायन्तीं निभृतां मृत्वा शीर्खापि कुलरक्षणे ।। ३११ ॥सयनां शीलमालां वा समालोक्य धरात्मजाम् । इयं सा रावणानीता सीता ज्ञाताभिवणितैः ॥ ३१२ ॥अभिज्ञानैर्नृपेन्द्रेण मम पुण्योदयादिति । तद्दर्शनसमुत्पन्नरागो रावणपापिना ॥ ३१३ ॥कल्पवल्लीव दावेन तापितेयं सतीत्यलम् । शोकाभितप्तचित्तोऽपि नीतिमार्गविशारदः ॥ ३१४ ॥ प्रारब्धकार्यसंसिद्धायुद्यतस्य विवेकिनः । प्राहुर्नीतिविदः कोपं व्यसनं कार्यविघ्न्नकृत् ॥ ३१५ ॥ तस्मादस्थानकोपेन कृतमित्याहितक्षमः । निजागमन’ वार्ता तामवबोधयितु सतीम् ॥ ३१६ ॥ मनागवसरावेक्षी स्थितस्तावनिशाकरः । उदयक्ष्माभृदुद्भासिचूडामणिनिभो बभौ ॥ ३१७ ॥
वहीं किसी समीपवर्ती स्थानमें उसने सीताको देखा । उस सीताको साम आदि उपायोंके द्वारा वश करनेके लिए अभिप्रायानुकूल चेष्टाओंको जानने वाली अनेक विद्याधरियाँ घेरे हुई थीं। वह शिंशपा वृक्षके नीचे शोकसे व्याकुल हुई बैठी थी, चुप चाप ध्यान कर रही थी, मरकर अथवा जीर्ण शीर्ण होकर भी कुलकी रक्षा करनेमें प्रयत्नशील थी, तथा ऐसी जान पड़ती थी मानो शीलकी-पातिव्रत्य धर्मकी माला ही हो । ऐसी सीताको देख अणुमान्ने विचार किया कि यह वही सीता है जिसे रावण हरकर लाया है। उसने राजा रामचन्द्रजीके द्वारा बतलाये हुए चिह्नोंसे उसे पहिचान लिया और साथ ही यह विचार किया कि मेरे पुण्योदयसे ही मुझे आज इस सतीके दर्शन हुए हैं। दर्शन करनेसे उसे बड़ा अनुराग उत्पन्न हुआ । उसने समझा कि जिस प्रकार दावानलके द्वारा कल्पलता संतापित होती है उसी प्रकार पापी रावणके द्वारा यह सती सन्तापित की गई है। इस प्रकार उसका वित्त यद्यपि शोकसे सन्तप्त होगया तथापि वह नीतिमार्गमें विशारद होनेसे सोचने लगा कि जो विवेकी मनुष्य अपने प्रारम्भकिये हुए कर्मको सिद्ध करनेमें उद्यत रहता है उसे क्रोध करना एक प्रकारका व्यसन है और कार्यमें विघ्न्न करनेवाला है ऐसा नीतिज्ञ मनुष्य कहते हैं। इसलिए असमयमें क्रोध करना व्यर्थ है ऐसा विचारकर उसने क्षमा धारण की और उस पतिव्रताको अपने आनेका समाचार बतलानेके लिए अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ वह वहीं कुछ समयके लिए खड़ा हो गया। उसी समय चन्द्रमाका उदय हो गया और वह उद्याचल के शिखर पर चूडामणिके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३१०-३१७ ।।
“Right there, in a nearby spot, he beheld Sita. To bring her under control through conciliation (sama) and other diplomatic means, she was surrounded by numerous Vidyadhara women who were adept at reading intentions through gestures. She sat beneath a shimshapa (Ashoka) tree, overwhelmed with grief, meditating in silence. Even if it meant death or withering away completely, she was striving to protect the honor of her lineage, and appeared as if she were the personified garland of chastity and devotion to her husband.
Beholding Sita in this state, Anuman thought to himself, ‘This is indeed that same Sita whom Ravana has abducted and brought here.’ He recognized her by the signs described by King Ramachandra, and at the same time, reflected, ‘It is only due to the rise of my own merits (punya) that I have been blessed with the sight of this virtuous lady today.’ Beholding her inspired deep devotion within him. He perceived that just as a wish-fulfilling creeper (kalpalata) is scorched by a forest fire, so too has this virtuous woman been tormented by the sinful Ravana.
Although his heart was distressed with sorrow, being highly skilled in the path of statesmanship, he began to reason: ‘Wise men say that for a prudent person who is intent on accomplishing a task he has undertaken, giving in to anger is a form of vice and an obstacle to success. Therefore, to show anger at an inappropriate time is futile.’ Reflecting thus, he maintained his patience and stood there for some time, waiting for an opportunity to break the news of his arrival to that faithful wife. At that very moment, the moon rose, adorning the peak of the eastern mountain (Udayachal) like a crest-jewel. || 310-317 ||”
श्लोक 318 से 332
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