मेरी भावना के अमर रचयिता पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार
“मेरी भावना” केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि करोड़ों जैन श्रद्धालुओं के जीवन का नैतिक संविधान है। इसके प्रत्येक छंद में आत्मशुद्धि, समता, करुणा, अहिंसा, राष्ट्रप्रेम और मानवता का संदेश समाहित है। किंतु इस अमर कृति के रचयिता पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार का जीवन स्वयं भी उतना ही प्रेरणादायक, संघर्षपूर्ण और आदर्शों से ओत-प्रोत था।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
पं. श्री जुगलकिशोर जी का जन्म मगसर शुक्ल एकादशी, विक्रम संवत् 1934 (21 दिसंबर 1877) को उत्तर प्रदेश के सरसावा में लाला नत्थूमल जी एवं माताश्री भोई देवी के घर हुआ। बाल्यकाल से ही वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सरसावा के प्राथमिक विद्यालय में हुई। मात्र पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने उर्दू और फ़ारसी का अध्ययन प्रारंभ कर दिया। उस समय उर्दू-फ़ारसी प्रशासन और शिक्षा की प्रमुख भाषा थी। केवल तेरह वर्ष की आयु में उन्होंने फ़ारसी साहित्य की अमूल्य कृतियाँ “गुलिस्ताँ” और “बोस्ताँ” कंठस्थ कर ली थीं। उनकी विलक्षण स्मरणशक्ति, अध्ययनशीलता और परिश्रम के कारण उन्हें प्रत्येक वर्ष छात्रवृत्ति प्राप्त होती थी।
धार्मिक संस्कार और स्वाभिमान
प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात वे सहारनपुर हाई स्कूल में अध्ययन हेतु छात्रावास में रहने लगे। छोटी आयु में भी वे नियमित रूप से पूजन, स्वाध्याय और धार्मिक अनुशासन का पालन करते थे। एक दिन एक छात्र उनके पूजास्थल में जूते पहनकर प्रवेश कर गया। यह उनके धार्मिक संस्कारों के प्रतिकूल था। उन्होंने उसका विरोध किया और विद्यालय प्रशासन से शिकायत भी की, किंतु जब उन्हें न्याय नहीं मिला तो उन्होंने विद्यालय ही छोड़ दिया। उन्होंने समझौता करने के स्थान पर अपने स्वाभिमान को चुना और अपने गाँव लौटकर स्वाध्याय के माध्यम से ज्ञानार्जन का मार्ग अपनाया। यह घटना उनके दृढ़ चरित्र और आत्मसम्मान का परिचायक है।
बाल्यावस्था से आध्यात्मिक साधक
पं. श्री जुगलकिशोर जी केवल मेधावी छात्र ही नहीं थे, बल्कि बचपन से ही आध्यात्मिक साधना में भी गहरी रुचि रखते थे। मात्र दस वर्ष की आयु से वे श्मशान में जाकर ध्यान-साधना किया करते थे। निर्भीकता, वैराग्य और आत्मचिंतन उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ थीं।
वकालत से साहित्य सेवा तक
सन् 1899 में 22 वर्ष की आयु में उन्होंने जैन धर्म के प्रचारक के रूप में कार्य प्रारंभ किया। किंतु समाज में व्याप्त संकीर्णता और उस समय की कार्यप्रणाली से उनका मन संतुष्ट नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने सन् 1902 में मुख्तार (वकालत) की परीक्षा उत्तीर्ण की और सहारनपुर में वकालत प्रारंभ की। सन् 1905 में वे देवबंद आ गए, जहाँ शीघ्र ही उनकी गणना प्रतिभाशाली वकीलों में होने लगी। प्रतिष्ठा और आय—दोनों निरंतर बढ़ते गए। जीवन के इसी दौर में उनकी दो पुत्रियाँ हुईं। पहली पुत्री सन्मति मात्र आठ वर्ष की आयु में ही संसार से विदा हो गई। दूसरी पुत्री विद्यावती केवल तीन माह की थी, जब सन् 1918 में उनकी पत्नी का निधन हो गया। इस गहन व्यक्तिगत आघात ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
ब्रह्मचर्य का संकल्प और साहित्य साधना
पत्नी के निधन के पश्चात उन्होंने पुनर्विवाह न करने का निश्चय किया। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य, शोध और धर्मसेवा के लिए समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे उनका मन वकालत से विरक्त होता गया। धन, प्रतिष्ठा और सांसारिक सफलता उनके लिए महत्वहीन हो गई। अंततः उन्होंने अपनी सफल वकालत का परित्याग कर स्वयं को पूर्णतः साहित्य साधना में समर्पित कर दिया।
समाज सुधार की क्रांतिकारी त्रिमूर्ति
उस समय पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार, पं. श्री सूरजभान जी वकील तथा श्री ज्योतिप्रसाद जी की त्रिमूर्ति जैन समाज में वैचारिक क्रांति का नेतृत्व कर रही थी। इन तीनों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वासों और धार्मिक विकृतियों के विरुद्ध निर्भीकतापूर्वक लेख लिखे। उनके लेख समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते थे। इनकी विचारधारा पर महात्मा गांधी का गहरा प्रभाव था, इसलिए समाज सुधार के साथ-साथ राष्ट्रसेवा भी उनके जीवन का अभिन्न उद्देश्य बन गई।
गांधीवादी जीवनशैली और राष्ट्रभक्ति
पं. श्री जुगलकिशोर जी सदैव खादी के वस्त्र धारण करते थे और गांधी टोपी पहनते थे। उनका विश्वास था कि धर्म और राष्ट्रभक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
उनकी रचनाओं में धार्मिक चेतना के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान और देशभक्ति का भी अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
अर्जुनलाल सेठी का प्रेरक प्रसंग
स्वतंत्रता सेनानी एवं जैन क्रांतिकारी अर्जुनलाल सेठी जब जेल में थे, तब उन्होंने संकल्प लिया कि जिनप्रतिमा के दर्शन किए बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। इस स्थिति में पं. श्री सूरजभान जी वकील तथा उनके सहयोगियों ने जेल प्रशासन को जैन परंपराओं और आस्था से परिचित कराया। उनके तर्कों से प्रभावित होकर जेल प्रशासन ने जेल में जिनप्रतिमा स्थापित करने की व्यवस्था की। प्रभु के दर्शन कर अर्जुनलाल सेठी जी ने अपना अनशन समाप्त किया।
यह प्रसंग धार्मिक आस्था और राष्ट्रभक्ति के अद्भुत समन्वय का प्रेरणादायी उदाहरण है। दुर्भाग्यवश बाद के वर्षों में समाज सुधार संबंधी उनके प्रगतिशील विचारों के कारण उन्हें अपने ही समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा। यह इतिहास का एक अत्यंत मार्मिक अध्याय है, जो समाज को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है।
‘मेरी भावना’ : एक अमर साहित्यिक धरोहर
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना “मेरी भावना” है। यह केवल जैन समाज की प्रार्थना नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक आदर्श जीवन-दर्शन है। इसके प्रत्येक छंद में आत्मसंयम, अहिंसा, सत्य, करुणा, मैत्री, समता, परोपकार, राष्ट्रप्रेम और विश्वबंधुत्व का संदेश निहित है। इसकी लाखों प्रतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं तथा इसका तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, गुजराती सहित अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस कृति की लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि महात्मा गांधी भी इससे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने अपने वर्धा आश्रम की दीवारों पर इसके अनेक छंद बड़े-बड़े अक्षरों में लिखवाए थे, ताकि आश्रमवासी प्रतिदिन उनका अध्ययन और मनन कर सकें।
साहित्य के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण
पं. श्री जुगलकिशोर जी का साहित्य केवल धार्मिक उपदेश नहीं देता, बल्कि चरित्र निर्माण, समाज सुधार और राष्ट्र निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करता है। उनकी लेखनी व्यक्ति को आत्मकल्याण के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का भी बोध कराती है। यही कारण है कि “मेरी भावना” आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने रचनाकाल में थी।
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार केवल जैन साहित्य के महान रचनाकार ही नहीं थे, बल्कि वे एक प्रखर राष्ट्रभक्त, निर्भीक समाज-सुधारक, उत्कृष्ट पत्रकार और उच्चकोटि के संपादक भी थे। उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल धर्मोपदेश देना नहीं था, बल्कि राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना भी था।
साहित्य में राष्ट्रप्रेम की प्रखर अभिव्यक्ति
पं. श्री जुगलकिशोर जी की रचनाओं में देशभक्ति का स्वर अत्यंत मुखर दिखाई देता है। वे मानते थे कि धर्म का वास्तविक स्वरूप तभी सार्थक है, जब उसमें राष्ट्र के प्रति समर्पण भी समाहित हो।
उनकी अनेक रचनाओं में यह भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई है। वे लिखते हैं—
“हृदय से देशोन्नति-रत रहा करें।”
एक अन्य स्थान पर वे विलासिता में डूबे समाज को चेतावनी देते हैं—
“चक्कर में विलासप्रियता में फँस, मत भूलो अपना देश।”
धनाढ्य वर्ग को संबोधित करते हुए वे उद्योगों की स्थापना और राष्ट्रीय समृद्धि का संदेश देते हैं—
“कल-कारखाने खुलवाकर, मेटो सब भारत के क्लेश।”
स्वराज्य की कामना करते हुए वे लिखते हैं—
“करें देश उत्थान सभी मिल, फिर स्वराज्य मिलना क्या दूर।”
और युवाओं को प्रेरित करते हुए उनकी पुकार है—
“पैदा हों युगवीर देश में, फिर क्यों दशा रहे दुःखपूर।”
इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि उनके लिए देशभक्ति केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का व्यावहारिक कार्यक्रम थी।
गांधीजी के प्रति अगाध श्रद्धा
पं. श्री जुगलकिशोर जी महात्मा गांधी के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। वे केवल गांधीजी के सिद्धांतों की चर्चा ही नहीं करते थे, बल्कि उन्हें अपने जीवन में भी उतारते थे। जब महात्मा गांधी की पहली गिरफ्तारी हुई, तब उन्होंने एक अद्भुत संकल्प लिया—जब तक प्रतिदिन चरखा नहीं कातेंगे, तब तक भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। यह घटना उनके राष्ट्रप्रेम, अनुशासन और गांधीवादी जीवन-दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है।
आज के समाज के लिए उनका संदेश
पं. श्री जुगलकिशोर जी का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता आंदोलन के समय था। आज जब समाज में भौतिकता, प्रदर्शन, भ्रष्टाचार और आत्मप्रशंसा की प्रवृत्तियाँ बढ़ती जा रही हैं, तब उनकी रचनाएँ आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ चरित्र, ईमानदारी, परिश्रम और राष्ट्रभक्ति सर्वोच्च मूल्य हों। उनका मानना था कि नई पीढ़ी को केवल उनकी रचनाएँ पढ़नी ही नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें कंठस्थ कर जीवन में उतारना चाहिए।
साहित्य सेवा का स्वर्णिम अध्याय
यद्यपि पं. श्री जुगलकिशोर जी ने 1907 से ही साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी, किंतु वकालत का त्याग करने के बाद उनका संपूर्ण जीवन साहित्य-साधना को समर्पित हो गया।
वे संसार में रहते हुए भी कमल की भाँति निर्लिप्त रहे। उनका जीवन उस उक्ति को चरितार्थ करता था—
“गेही पै गृह में रच्यों, ज्यों जल तें भिन्न कमल है।”
‘जैन गजट’ के यशस्वी संपादक
पं. श्री जुगलकिशोर जी ने प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘जैन गजट’ का संपादन संभाला। उनके संपादन काल में यह पत्र केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि देश के बुद्धिजीवियों में भी अत्यंत सम्मानित हो गया।
उनके निर्भीक लेखों ने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों और धार्मिक विकृतियों पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने लगभग 1918 तक निरंतर इस पत्र का संपादन किया और उसे वैचारिक क्रांति का माध्यम बना दिया।
‘जैन हितैषी’ को नई ऊँचाइयाँ
हिंदी जैन साहित्य के भीष्म पितामह माने जाने वाले पं. नाथूराम जी प्रेमी के आग्रह पर पं. श्री जुगलकिशोर जी ने 1919 में ‘जैन हितैषी’ का संपादन स्वीकार किया।
पं. नाथूराम प्रेमी और पं. श्री जुगलकिशोर जी का यह अद्भुत साहित्यिक सहयोग हिंदी जैन पत्रकारिता के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया।
उनके संपादन में जैन हितैषी इतना लोकप्रिय हुआ कि उसके प्रत्येक अंक की पाठकों में प्रतीक्षा रहती थी। आज भी शोधकर्ता उसके पुराने अंकों को महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज मानते हैं।
‘अनेकान्त’ : शोध और चिंतन की पत्रिका
सन् 1929 में पं. श्री जुगलकिशोर जी ने ‘अनेकान्त’ मासिक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन स्वयं प्रारंभ किया।
उनके नेतृत्व में यह पत्रिका जैन दर्शन, इतिहास, पुरातत्त्व और साहित्यिक अनुसंधान का राष्ट्रीय मंच बन गई। इसकी प्रत्येक “किरण” (अंक) गंभीर शोध, मौलिक चिंतन और प्रामाणिक सामग्री के लिए जानी जाती थी।
आज भी जैन साहित्य के शोधार्थी ‘अनेकान्त’ के पुराने अंकों को अत्यंत मूल्यवान संदर्भ सामग्री मानते हैं।
समाज ने पर्याप्त सम्मान नहीं दिया
इतनी महान सेवाओं के बावजूद पं. श्री जुगलकिशोर जी को अपने जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे वास्तव में अधिकारी थे। रूढ़िवादी सोच के कारण अनेक लोगों ने उनके समाज-सुधार के प्रयासों का विरोध किया। यद्यपि बाद के वर्षों में कुछ जागरूक युवाओं ने उनका सम्मान आयोजित किया, किंतु उनकी प्रतिभा और योगदान की तुलना में यह सम्मान अत्यंत अल्प था। उनके सम्मान पर प्रकाशित विशेषांक ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
संपादन कला के अप्रतिम आचार्य
पं. श्री जुगलकिशोर जी संपादन कला के असाधारण विशेषज्ञ थे। वे प्रत्येक शब्द को अत्यंत सोच-समझकर लिखते थे। उनकी भाषा में न अनावश्यक विस्तार होता था और न ही कोई शब्द व्यर्थ होता था। उनकी प्रस्तावनाएँ स्वयं स्वतंत्र शोध-ग्रंथों के समान मानी जाती हैं। प्रख्यात विद्वान डॉ. ए. एन. उपाध्ये ने भी उनकी प्रस्तावनाओं और शोधपरक दृष्टि की अत्यधिक प्रशंसा की थी। किसी जटिल ऐतिहासिक या दार्शनिक विषय पर अंतिम निर्णय लिखने से पूर्व वे पं. श्री जुगलकिशोर जी से विचार-विमर्श करना उचित समझते थे।
एक ऐतिहासिक वसीयत
पं. श्री जुगलकिशोर जी की वसीयत केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, साहित्य-प्रेम, धार्मिक आस्था और शोध-दृष्टि का जीवंत प्रमाण है। एक सफल विधिवेत्ता होने के कारण उसमें विधिक स्पष्टता तो है ही, साथ ही साहित्य और धर्म के प्रति उनका समर्पण भी अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुआ है। उनकी वसीयत आज भी ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और जैन साहित्य के शोधार्थियों के लिए एक मूल्यवान दस्तावेज है।
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार का व्यक्तित्व केवल एक साहित्यकार या समाज-सुधारक तक सीमित नहीं था। उन्होंने जैन साहित्य, शोध, पत्रकारिता और विद्वत्सेवा को संस्थागत रूप प्रदान करने का जो अद्भुत कार्य किया, उसका सर्वोत्तम उदाहरण है—वीर सेवा मंदिर।
यह संस्था केवल एक भवन नहीं थी, बल्कि जैन साहित्य, इतिहास, दर्शन और शोध का ऐसा केन्द्र थी, जिसने अनेक विद्वानों को जन्म दिया और जैन समाज को वैचारिक दिशा प्रदान की।
वीर सेवा मंदिर : विद्वानों का साहित्यिक आश्रम
सरसावा स्थित वीर सेवा मंदिर में अनेक विद्वान समय-समय पर अध्ययन, शोध और लेखन के लिए आते रहे। कोई कुछ माह रहा, तो कोई एक-दो वर्ष; किंतु स्थायी रूप से रहकर संस्था को अपना जीवन समर्पित करने वाले दो महान विद्वान विशेष रूप से स्मरणीय हैं—
- पं. कोठिया जी
- पं. परमानन्द जी शास्त्री
इन दोनों महामनीषियों ने वीर सेवा मंदिर तथा उसकी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अनेकान्त’ को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में अभूतपूर्व योगदान दिया।
पं. परमानन्द जी संस्था परिसर में ही निवास करते थे। उन्हें ग्रंथालय के प्रत्येक ग्रंथ का अद्भुत ज्ञान था। जब भी किसी शोधार्थी को किसी ग्रंथ की आवश्यकता होती, वे बिना विलम्ब के उसे उपलब्ध करा देते थे। उनकी विद्वत्ता, स्मरणशक्ति और संस्थान के प्रति निष्ठा अद्वितीय थी। पं. कोठिया जी न्यायशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद और संपादन किया। उनकी विद्वत्ता के कारण देशभर के जैन और जैनेतर विद्वान सरसावा आकर शोध कार्य करते थे।
इस प्रकार वीर सेवा मंदिर धीरे-धीरे एक “साहित्य तीर्थ” के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
वीर शासन जयंती और विद्वानों का संगम
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार द्वारा प्रारम्भ की गई वीर शासन जयंती केवल धार्मिक आयोजन नहीं थी, बल्कि विद्वानों, साहित्यकारों और समाजसेवियों का एक महान सम्मेलन होती थी। दिल्ली, सहारनपुर, पानीपत, कलकत्ता तथा देश के अन्य भागों से श्रेष्ठीवर्ग और विद्वान इसमें भाग लेने आते थे। ऐसे आयोजनों ने जैन समाज में वैचारिक जागृति और साहित्यिक चेतना का वातावरण निर्मित किया।
स्वामी कर्मानन्द और जैन शास्त्रार्थ की परम्परा
उस समय जैन समाज में शास्त्रार्थ की परम्परा अत्यंत सशक्त थी। दिगम्बर जैन शास्त्रार्थ संघ ने धर्म और समाज के प्रश्नों पर जागृति उत्पन्न की।
प्रसिद्ध विद्वान स्वामी कर्मानन्द प्रारम्भ में आर्य समाज से जुड़े थे और जैन धर्म के आलोचक माने जाते थे। किंतु गहन अध्ययन और शास्त्रार्थ के माध्यम से उन्होंने जैन दर्शन की विशेषताओं को समझा और अंततः जैन धर्म की ओर आकर्षित हुए।
यह घटना उस समय के जैन विद्वानों की बौद्धिक शक्ति और संवाद परंपरा का प्रमाण है।
पं. कोठिया जी और मुख्तार जी : मतभेद से आत्मीयता तक
महान संस्थाएँ केवल विचारों से नहीं, बल्कि स्वस्थ संवाद और परस्पर सम्मान से विकसित होती हैं। एक अवसर पर पं. कोठिया जी द्वारा किए गए एक ग्रंथ के अनुवाद और उसकी समर्पण-परंपरा को लेकर पं. श्री जुगलकिशोर जी और उनके बीच मतभेद उत्पन्न हो गया। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि पं. कोठिया जी ने अपना त्यागपत्र भी दे दिया।
किन्तु पं. श्री जुगलकिशोर जी गुणों के सच्चे पारखी थे। वे जानते थे कि पं. कोठिया जी जैसा न्यायशास्त्र का विद्वान दुर्लभ है। अंततः दोनों के बीच सौहार्द स्थापित हुआ और यह संबंध इतना प्रगाढ़ हो गया कि पं. श्री जुगलकिशोर जी ने उन्हें दत्तक पुत्र के समान स्नेह दिया तथा संस्था और संपत्ति का दायित्व भी उन्हें सौंपा।
यह प्रसंग उनके विशाल हृदय और गुणग्राहक स्वभाव का परिचायक है।
वीर सेवा मंदिर की स्थापना
सन् 1936 में पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार ने सरसावा स्थित अपने भवन में वीर सेवा मंदिर की स्थापना की। उन्होंने इसके संचालन के लिए अपनी स्वोपार्जित राशि में से 51,000 रुपये का विशाल दान दिया, जो उस समय अत्यंत बड़ी राशि थी। धीरे-धीरे यह संस्था जैन साहित्य, इतिहास, पुरातत्त्व और दर्शन के अध्ययन का राष्ट्रीय केन्द्र बन गई। यहाँ का ग्रंथालय और ‘अनेकान्त’ पत्रिका शोधार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र थे।
सरसावा से दिल्ली तक की यात्रा
समय के साथ अनेक शुभचिंतकों ने यह विचार रखा कि वीर सेवा मंदिर और ‘अनेकान्त’ जैसी प्रतिष्ठित संस्था को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक विकसित करने के लिए राजधानी दिल्ली में स्थापित किया जाए। फलस्वरूप 1950 के दशक में यह संस्था दिल्ली के 21, अंसारी रोड, दरियागंज में स्थानांतरित हुई।
16 जुलाई 1954 को इस भव्य भवन का उद्घाटन साहू शान्तिप्रसाद जी के करकमलों से सम्पन्न हुआ।
इस भवन के निर्माण में बा. छोटेलाल जी का विशेष योगदान रहा। वे संस्था, ‘अनेकान्त’ और पं. श्री जुगलकिशोर जी के प्रति अत्यंत समर्पित थे। स्वास्थ्य अनुकूल न होने पर भी वे निर्माण कार्य की निरंतर देखरेख करते रहे।
दरियागंज : साहित्य का केंद्र
उस समय दिल्ली का दरियागंज क्षेत्र हिंदी साहित्य और बौद्धिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहीं अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकार निवास करते थे, जिनमें प्रमुख थे—
- जैनेन्द्र कुमार
- यशपाल
- अन्य अनेक साहित्यकार और चिंतक
यह वातावरण वीर सेवा मंदिर के लिए भी अत्यंत अनुकूल सिद्ध हुआ और संस्था को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।
ग्रंथालय और पं. परमानन्द जी का योगदान
सरसावा से दिल्ली स्थानांतरण के समय विशाल ग्रंथालय को व्यवस्थित करने का अत्यंत श्रमसाध्य कार्य किया गया।
इस कार्य का प्रमुख श्रेय पं. परमानन्द जी शास्त्री को जाता है। उन्हें प्रत्येक ग्रंथ की स्थिति, विषय और उपयोगिता का अद्भुत ज्ञान था।
वीर सेवा मंदिर के इतिहास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे संस्था के प्रति पूर्ण समर्पित थे और पं. श्री जुगलकिशोर जी के विश्वासपात्र सहयोगियों में से एक थे।
एक प्रेरणादायी विरासत
वीर सेवा मंदिर केवल एक संस्था नहीं थी; वह जैन ज्ञान, शोध, संपादन, प्रकाशन और साहित्य सेवा की जीवंत परंपरा थी।
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार, पं. कोठिया जी, पं. परमानन्द जी शास्त्री, पं. नाथूराम प्रेमी और अन्य अनेक विद्वानों के अथक प्रयासों ने इसे एक ऐसे साहित्यिक तीर्थ के रूप में स्थापित किया, जिसकी गूँज आज भी जैन साहित्य के इतिहास में सुनाई देती है।
शोधकर्ताओं के प्रेरणास्रोत
दिल्ली में वीर सेवा मंदिर आने के बाद अनेक युवा शोधकर्ताओं का उनसे निकट संपर्क हुआ। जो भी जैन इतिहास, पुरातत्त्व, पांडुलिपियों अथवा प्राचीन साहित्य पर गंभीर कार्य करता, उसे पं. श्री मुख्तार जी का स्नेह, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन सहज ही प्राप्त होता।
वे नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को केवल प्रेरित ही नहीं करते थे, बल्कि उन्हें अपनी नवीन प्रकाशित कृतियाँ स्वयं हस्ताक्षर करके भेंट स्वरूप प्रदान करते थे। उनके इस आत्मीय व्यवहार ने अनेक शोधार्थियों के जीवन की दिशा निर्धारित की। उनके द्वारा हस्ताक्षरित ग्रंथ आज भी अनेक विद्वानों के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
एक चलता-फिरता शोध संस्थान
पं. श्री जुगलकिशोर जी का जीवन पूर्णतः अध्ययन और शोध को समर्पित था। वे दिन के 16 से 18 घंटे तक निरंतर अध्ययन, लेखन, संपादन और पांडुलिपियों के तुलनात्मक परीक्षण में व्यस्त रहते थे।
उनकी कार्यमेज़ सदैव दुर्लभ ग्रंथों, हस्तलिखित पोथियों और शोध सामग्री से भरी रहती थी। उनका संपूर्ण जीवन एक तपस्वी साधक की भाँति बीता। यदि उनका कोई व्यसन था, तो वह केवल ग्रंथों का संग्रह और अध्ययन था।
सादगीपूर्ण जीवन
पं. श्री मुख्तार जी का जीवन अत्यंत अनुशासित और संयमपूर्ण था। वे निर्व्यसनी थे और उनकी जीवनचर्या किसी गृहस्थ मुनि के समान थी।
वृद्धावस्था तक उन्होंने आत्मनिर्भर जीवन जिया। उन्होंने अपना अधिकांश कार्य स्वयं ही किया। अंतिम दिनों तक वे नियमित रूप से मंदिर जाते, अध्ययन करते और साहित्यिक कार्यों में लगे रहते थे।
यह तथ्य अत्यंत दुःखद है कि जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण समाज और साहित्य की सेवा में बीता, उनके अंतिम वर्षों में संस्था पर्याप्त सहयोग और व्यक्तिगत सेवा की व्यवस्था नहीं कर सकी। फिर भी उन्होंने किसी प्रकार की शिकायत किए बिना अपने तपस्वी जीवन को अंत तक निभाया।
एटा में अंतिम प्रवास
जब वृद्धावस्था में स्वास्थ्य ने साथ देना कम कर दिया, तब वे अपने भतीजे श्रीचन्द जी के पास एटा चले गए। वहीं लगभग 90 वर्ष की आयु में इस महान साहित्य-साधक का देहावसान हुआ।
उन्होंने पीछे छोड़ी कोई भौतिक सम्पत्ति नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और साहित्य की ऐसी अमूल्य निधि छोड़ी, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
कृतित्व का आकलन : एक कठिन कार्य
पं. श्री जुगलकिशोर जी ने अपने साहित्य की कोई अधिकृत सूची (Bibliography) तैयार नहीं की। परिणामस्वरूप उनके समस्त साहित्य का पूर्ण आकलन आज भी कठिन माना जाता है। उन्होंने लेख, अनुवाद, संपादन, प्रस्तावनाएँ, शोध-ग्रंथ, अनुक्रमणिकाएँ, कोश और अनेक मौलिक कृतियाँ लिखीं, जिनका प्रभाव आज भी जैन अध्ययन के क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई देता है।
उनकी प्रमुख कृतियाँ
उनकी विद्वत्ता का परिचय उनकी बहुआयामी कृतियों से मिलता है। प्रमुख कृतियाँ एवं योगदान निम्न हैं—
- ‘मेरी भावना’ – उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय और अमर रचना, जिसका लाखों प्रतियों में प्रकाशन हुआ तथा अनेक भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ।
- ‘युगवीर निबंधावली’ – समाज-सुधार और राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत उनके क्रांतिकारी लेखों का महत्वपूर्ण संकलन।
- ‘पुरातन जैन वाक्य सूची’ – प्राकृत साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ, जिसमें 64 ग्रंथों एवं 48 टीकाओं से लगभग 25,000 पदों की अनुक्रमणिका प्रस्तुत की गई है।
- ‘लक्षणावली’ – शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी कोश-प्रकार का ग्रंथ।
- स्वामी समन्तभद्र पर शोध तथा उनकी कृतियों के प्रामाणिक अनुवाद और विस्तृत प्रस्तावनाएँ।
- ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ की ऐतिहासिक एवं दार्शनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्तावना।
- ‘संस्कृत प्रशस्ति संग्रह’ – जिसमें अनेक दुर्लभ प्रशस्तियों का संकलन और ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया।
- ‘युक्त्यनुशासन’, ‘समीचीन धर्मशास्त्र’, ‘अध्यात्म रहस्य’ तथा ‘तत्त्वानुशासन’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के प्रामाणिक हिंदी अनुवाद एवं शोधपरक प्रस्तावनाएँ।
- ‘युगवीर भारती’ – उनकी हिंदी रचनाओं का महत्वपूर्ण संकलन।
इन कृतियों से स्पष्ट होता है कि वे केवल अनुवादक नहीं थे, बल्कि प्रत्येक ग्रंथ के ऐतिहासिक, दार्शनिक और साहित्यिक संदर्भों का गहन विश्लेषण करने वाले मौलिक शोधकर्ता थे।
शोध-पद्धति : अद्वितीय और अनुकरणीय
पं. श्री जुगलकिशोर जी की कार्यशैली अत्यंत वैज्ञानिक थी। वे किसी भी ग्रंथ का प्रकाशन करने से पहले उसकी उपलब्ध विभिन्न हस्तलिखित प्रतियों को देश के अनेक शास्त्र-भंडारों से मँगवाते थे। तत्पश्चात उनका तुलनात्मक अध्ययन कर पाठभेद निर्धारित करते और प्रामाणिक पाठ का चयन करते। इसके बाद वे उस ग्रंथ में उल्लिखित आचार्यों, राजाओं, नगरों, ग्रामों, श्रावकों तथा ऐतिहासिक घटनाओं का स्वतंत्र अध्ययन कर विस्तृत शोधपूर्ण प्रस्तावना लिखते। उनकी यही पद्धति उन्हें अपने समय का अद्वितीय पाठालोचक (Textual Critic) और शोधकर्ता बनाती है।
पांडुलिपियों के प्रति अद्भुत समर्पण
पं. श्री जुगलकिशोर जी जहाँ भी प्रवचन के लिए जाते, वहाँ केवल धार्मिक कार्यक्रम ही नहीं करते थे; वे स्थानीय शास्त्र-भंडारों, मंदिरों और निजी संग्रहों में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों की भी खोज करते थे। इसी प्रयास से उन्होंने वीर सेवा मंदिर के लिए दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों का विशाल संग्रह तैयार किया, जो आज भी शोधकर्ताओं के लिए अमूल्य धरोहर है।
कानपुर का प्रेरक प्रसंग
उनके जीवन का एक अत्यंत प्रेरणादायी प्रसंग कानपुर का है। एक बार वे शास्त्र-प्रवचन के लिए कानपुर गए। वहाँ उन्होंने एक पंसारी को किसी प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ के पन्ने फाड़कर मसालों की पुड़िया बनाते देखा। उनकी पैनी दृष्टि ने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारण कागज़ नहीं, बल्कि जिनवाणी की दुर्लभ पांडुलिपि है। उन्होंने अत्यंत विनम्रता से पंसारी से कहा—
“भैया, यह जिनवाणी है। इसकी रक्षा होनी चाहिए। मैं तुम्हें पुड़िया बनाने के लिए पर्याप्त पुराने अखबार दे देता हूँ, कृपया यह बस्ता मुझे दे दीजिए।”
पंसारी ने सहर्ष वह पूरा बस्ता उन्हें सौंप दिया। बाद में जब उन्होंने उन पांडुलिपियों का अध्ययन किया, तो उनमें एक ऐसा दुर्लभ ग्रंथ मिला जिसकी वे वर्षों से खोज कर रहे थे।
उस क्षण का उनका आनंद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। उनके लिए वह किसी अमूल्य रत्न की प्राप्ति से कम नहीं था।
पं. श्री जुगलकिशोर जी मुख्तार का सम्पूर्ण जीवन एक संदेश देता है कि सच्चा शोध केवल पुस्तकों को पढ़ने से नहीं, बल्कि उन्हें खोजने, समझने, संरक्षित करने और समाज तक पहुँचाने से पूर्ण होता है।
उन्होंने अपने तप, त्याग और अथक परिश्रम से जैन साहित्य को जो अमूल्य निधि प्रदान की, वह आज भी शोधकर्ताओं, साहित्यकारों और इतिहासकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
यदि “मेरी भावना” ने उन्हें जन-जन का प्रिय बनाया, तो उनकी शोध-पद्धति, संपादन-कला और पांडुलिपियों के संरक्षण का कार्य उन्हें भारतीय जैन विद्या-जगत के अमर महापुरुषों की श्रेणी में स्थापित करता है।