राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
पर्व 76 – श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 292 to 302
श्लोक ( Shlok ) 292 – 300
विन्यस्य मणिभाभासि मुकुटं चारुमस्तके । यथास्थानमशेषाणि विशिष्टाभरणान्यपि ॥ २९२ ॥विलासिनीकरोद्ध्यमानचामरशोभिनम् । अकरोत्तनिरीक्ष्याह प्रीतिङ्करकुमारकः ॥ २९३ ॥किमेतदिति सायोचदस्म्यस्याः स्वामिनी पुरः । दत्वा राज्यं मदीयं ते पट्टबन्धपुरस्सरम् ॥ २९४ ॥रत्नमालां गले कृत्वा त्वां प्रेम्णा समभीभवम् । इति तत्प्रोक्तमाकर्ण्य कुमारः प्रत्यभाषत ॥ २९५ ॥विना पित्रोरनुज्ञानान्नैव स्वीक्रियसे मया । कोऽपि प्रागेव सङ्कल्पो विहितोऽयमिति स्फुटम् ॥ २९६ ॥ यद्येवं तत्समायोगकालेऽभीष्टं भविष्यति । इति तद्वचनं कन्या प्रतिपद्य धनं महत् ॥ २९७ ॥ बध्वावतरणायामि रज्ज्वा तेन सह स्वयम् । यियासुरासीद्रज्जुं तां ‘प्रमोदात्सोऽप्यचालयत् ॥ २९८ ॥ सद्यस्तञ्चालनं दृष्ट्वा नागदत्तो बहिर्गतः । समाकृष्याग्रहीत्तञ्च ताञ्च द्रव्यञ्च तुष्टवान् ॥ २९९ ॥ पोतप्रस्थानकालेऽस्याः साराभरणसंहतिम् । विस्मृतां स कुमारस्तामानेतुं गतवान् पुनः ॥ ३००॥
मणियोंकी कान्तिसे देदीप्यमान मुकुट उसके सुन्दर मस्तक पर बाँधा; यथास्थान समस्त अच्छे-अच्छे आभूषण पहिनाये और विलासिनी स्त्रियोंके हाथोंसे ढोरे हुए चमरोंसे उसे सुशोभित किया। यह सब देख प्रीतिङ्कर कुमारने कहा कि यह क्या है? इसके उत्तरमें कन्याने कहा कि ‘मैं इस नगरकी स्वामिनी हूँ, अपना राज्यपट्ट बाँध कर अपने लिए देती हूँ और यह रत्नमाला आपके गलेमें डालकर प्रेमपूर्वक आपकी सहधर्मिणी हो रही हूँ। यह सुनकर कुमारने उत्तर दिया कि मैं माता-पिताकी आज्ञाके बिना तुम्हें स्वीकृत नहीं कर सकता क्योंकि मैंने पहलेसे ऐसा ही संकल्प कर रक्खा है। यदि तुम्हारा ऐसा आग्रह ही है तो माता-पितासे मिलनेके समय तेरा अभीष्ट सिद्ध हो जावेगा। कन्याने प्रीतिङ्करकी यह बात मान ली और बहुत-सा धन बाँधकर उस लम्बी रस्सीके द्वारा जहाजपर उतारनेके लिएकुमारके साथ किनारे पर आ गई। कुमारने भी बड़े हर्षसे बह रस्सी हिलाई । रस्सीका हिलना देखकर नागदत्त बाहर आया और उस कन्याको तथा उसके धनको जहाजमें खींचकर बहुत संतुष्ट हुआ । जब जहाज चलनेका समय आया तब कुमार उस कन्याके भूले हुए सारपूर्ण आभरणोंको लानेके लिए फिरसे नगर में गया ।। २९२-३०० ॥
She bound a crown, dazzling with the radiance of precious gems, upon his handsome brow; adorned him with all manner of exquisite ornaments in their proper places; and graced him with fly-whisks (chamaras) waved by the hands of elegant damsels. Beholding all this, Prince Pritinkar asked, “What is the meaning of this?”
In response, the maiden said, “I am the sovereign mistress of this city. I now bind my royal diadem upon you, surrendering my kingdom to you, and by placing this garland of jewels around your neck, I lovingly become your lawfully wedded wife.”
Hearing this, the prince replied, “I cannot accept you without the permission of my parents, for I have taken a vow to this effect beforehand. If you insist so earnestly, your desire shall be fulfilled at the time I reunite with my parents.” The maiden agreed to Pritinkar’s condition, packed an abundance of wealth, and accompanied the prince to the shore to be lowered onto the ship by that long rope.
The prince joyfully tugged at the rope as a signal. Seeing the rope shake, Nagadatta came forward and was immensely delighted to pull the maiden and her wealth up onto the ship. When the time arrived for the ship to set sail, the prince returned to the city once more to fetch the valuable ornaments that the maiden had left behind. [292-300]
श्लोक ( Shlok ) 301 – 302
नागदत्तस्तदा रज्जुमाकृष्य द्रश्यमेतया । सारं सम्प्राप्तमेतन्मे भोक्तुमामरणाद्भवेत् ॥ ३०१ ॥ कृतार्थोऽहं कुमारेण यद्वा तद्वानुभूयताम् । इति प्रास्थित साधं तैर्लब्धरन्ध्रो वणिग्जनैः ॥ ३०२॥
इधर उसके चले जानेपर नागदत्तने वह रस्सी खींच ली और ‘इस कन्याके साथ मुझे बहुत-सा अच्छा धन मिल गया है, वह मेरे मरने तक भोगनेके काम आवेगा, मैं तो कृतार्थ हो चुका, प्रीतिङ्करकुमार जैसा-तैसा रहे’ ऐसा विचार कर और छिद्र पाकर नागदत्त अन्य वैश्योंके साथ चला गया ।। ३०१-३०२ ॥
Meanwhile, after the prince had departed, Nagadatta pulled up the rope. He thought to himself, ‘Along with this maiden, I have acquired an immense amount of excellent wealth, which will suffice for my enjoyment until the end of my days. I have truly achieved my life’s purpose; let Prince Pritinkar fare as he may.’ Seizing this opportunity, Nagadatta set sail and departed along with the other merchants. [301-302]
श्लोक 303 से 311
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291
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