नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 442 to 459
श्लोक ( Shlok ) 442
ततः पद्मावतीजन्मसम्बन्धं गणनायकः । गुणानामाकरोऽवादीदित्थं जनमनोहरम् ॥४४२॥
तदनन्तर-गुणोंकी खान, गणधर देव, लोगोंका मन हरण करने वाले पद्मावती के पूर्व भवों का सम्बन्ध इस प्रकार कहने लगे ॥ ४४२ ॥
Thereafter, Lord Ganadhara, who is a treasure trove of virtues, began to narrate the sequence of past lives of Padmavati, she who captivates the minds of all people, in the following manner. || 442 ||
श्लोक ( Shlok ) 443 – 459
अस्मिन्नेवोज्जयिन्याख्यनगरीनायको नृपः । विनयस्तस्य विक्रान्तिरिव देव्यपराजिता ॥४४३॥
विनयश्रीः सुता तस्या हस्तशीर्षपुरेशिनः । हरिषेणस्य देव्यासीद्दत्वा दानमसौ मुदा ॥४४४॥
समाधिगुप्तयोगीशे भूत्वा हैमवते चिरम् । भुक्त्वा भोगान्भवप्रान्ते जाता चन्द्रस्य रोहिणी ॥४४५॥
* पल्योपमायुष्कालान्ते विषये मगधाभिधे । वसतः शाल्मलिग्रामे पद्मदेवी सुताऽजनि ॥४४६॥
सती विजयदेवस्य देविलायां कदाचन । वरधर्मयतेः सन्निधाने सा व्रतमग्रहीत् ॥४४७॥
अविज्ञातफलाभक्षणं कृच्छ्रेऽपि दृढव्रता । वनेचरैः कदाचित्स ग्रामोऽवस्कन्दद्घातिभिः ॥४४८॥ विलोपितस्तदापश्नदेवी सिंहरथाद्भयात् । नीत्वा महाटवीं सर्वे जनाः श्रुत्परिपीडिताः ॥४४९॥ विषवल्लीफलान्याशु भक्षयित्वा मृति ययुः । व्रतभङ्गभयात्तानि सा विहायाहृतेविंना ॥ ४५० ॥ मृत्वा हैमवते भूत्वा जीवितान्ते ततश्च्युता । द्वीपे स्वयंप्रभे जाता देबी सद्यः स्वयंप्रभा ॥ ४५१ ॥ स्वयंप्रभाख्यदेवस्थ ततो निर्गत्य सा पुनः । द्वीपेऽस्मिन्भारते क्षेत्रे जयन्तपुरभूपतेः ॥ ४५२ ॥ श्रीधरस्य सुता भूत्वा श्रीमत्यां सुन्दराकृतिः । विमलश्रीरभूत्पनी भन्द्रिलाख्यपुरेशिनः ॥ ४५३ ॥ नृपस्य मेघनादस्य समीप्सितसुखप्रदा । राजा धर्ममुनेस्त्यक्त्वा राज्यं प्रव्रज्य शुद्धधीः ॥ ४५४ ॥ जातो व्रतधरस्तस्मिन्सहस्त्रारपतौ सति । अष्टादशसमुद्रायुर्भाजिभासुरदीधितौ ॥ ४५५ ॥ साऽपि पद्मावतीक्षान्ति सम्प्राप्यादाय संयमम् । आचाम्लवर्धनामानं समुपोष्यायुषावधौ ॥ ४५६ ॥ तत्रैव कल्पे देवीत्वं प्रतिपद्य निजायुषः । प्रान्तेऽरिष्टपुराधीशः श्रीमत्यां तनयाऽजनि ॥ ४५७ ॥ हिरण्यवर्मणः पद्मावतीत्येषा स्वयंवरे । सम्भाव्य सम्भृतस्नेहा भवन्तं रत्नमालया ॥ ४५८ ॥ ‘शीलावहा महादेवीपहुं प्रापदिति स्फुटम् । तास्तिस्रोपि स्वजन्मानि श्रुत्वा मुदमयुर्हरेः ॥ ४५९ ॥
इसी भरतक्षेत्रकी उज्जयिनी नगरी में राजा विजय राज्य करता था उसकी विक्रान्तिके समान अपराजिता नामकी रानी थी। उन दोनोंके विनयश्री नामकी पुत्री थी। वह हस्तशीर्षपुरके राजा हरिषेणको दी गई थी। विनयश्रीने एक बार समाधिगुप्त मुनिराजके लिए बड़े हर्षसे आहार-दान दिया था जिसके पुण्यसे वह हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुई । चिरकाल तक वहाँ के भोग भोगकर आयुके अन्तमें वह चन्द्रमाकी रोहिणी नामकी देवी हुई। जब एक पल्य प्रमाण वहांकी आयु समाप्त हुई तब मगध देशके शाल्मलिगाँवमें रहनेवाले विजयदेवकी देविला स्त्रीसे पद्मदेवी नामकी पतिव्रता पुत्री हुई। उसने किसी समय वरधर्म नामक मुनिराजके पास ‘मैं कष्टके समय भी अनजाना फल नहीं खाऊँगी’ ऐसा दृढ़-व्रत लिया। किसी एक समय आक्रमणकर घात करनेवाले भीलोंने उस गांवको लूट लिया। उस समय सब लोग, भीलों के राजा सिंहरथके डरसे पद्मदेवीको महाअटवीमें ले गये। वहाँ भूखसे पीड़ित होकर सब लोगोंने विषफल खा लिये जिससे वे शीघ्रही मर गये परन्तु व्रतभङ्गके डरसे पद्मदेवीने उन फलोंको छुआ भी नहीं इसलिए वह आहारके बिना ही मरकर हैमवत क्षेत्र नामक भोगभूमिमें उत्पन्न हुई। आयु पूर्ण होनेपर वहांसे चयकर स्वयंप्रभद्वीपमें स्वयंप्रभ नामक देवकी स्वयंप्रभा नामकी देवी हुई। वहांसे चयकर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी जयन्तपुर नगर में वहांके राजा श्रीधर और रानी श्रीमतीके सुन्दर शरीरवाली विमलश्री नामकी पुत्री हुई। वह भद्रिलपुरके स्वामी राजा मेघरथकी इच्छित सुख देनेवाली रानी हुई थी। किसी समय शुद्ध बुद्धिके धारक राजा मेघनादने राज्य छोड़कर धर्म नामक मुनिराजके समीप व्रत धारण कर लिया जिससे वह सहस्त्रार नामक स्वर्गमें अठारह सागरकी आयुवाला देदीप्यमान कान्तिका धारक इन्द्र हो गया। इधर रानी विमलश्रीने भी पद्मावती नामक आर्यिका के पास जाकर संयम धारण कर लिया और आचाम्लवर्ध नामका उपवास किया जिसके फलस्वरूप वह आयुके अन्तमें उसी सहस्त्रार स्वर्गमें देवी हुई और आयुके अन्त में वहाँसे च्युत होकर अरिष्टपुर नगरके स्वामी राजा हिरण्यवर्माकी रानी श्रीमतीके यह पद्मावती नामकी पुत्री है। इसने स्नेहसे युक्त हो स्वयंवर में रत्नमाला डालकर आपका सन्मान किया और तदनन्तर इस शीलवतीने महादेवीका पद प्राप्त किया। इस प्रकार गणधर भगवान्के मुखारविन्दसे अपने-अपने भव सुनकर श्रीकृष्णकी गौरी, गान्धारी और पद्मावती नामकी तीनों रानियाँ हर्षको प्राप्त हुई ।। ४४३-४५९ ।।
In the city of Ujjayini of this very Bharata Kshetra, King Vijaya used to rule. He had a queen named Aparajita, who was a match for his prowess. The two had a daughter named Vinayashri, who was given in marriage to King Harishena of Hastashirshapura. Once, Vinayashri joyfully offered food (Ahaar-daan) to the revered monk (Muniraj) Samadhigupta. By the merit of this deed, she was reborn in the Haimavata region. After enjoying the pleasures there for a long time, at the end of her lifespan, she became the goddess Rohini, associated with the Moon.
When her celestial lifespan of one Palya concluded, she was born as a devoted and virtuous daughter named Padmadevi to Devila, the wife of Vijayadeva, living in Shalmali village of the Magadha country. At one time, she took a firm vow under the revered monk (Muniraj) Varadharma, promising: “Even in times of severe distress, I will not consume any unknown fruit.” Later, predatory and violent Bhils (tribal bandits) raided and plundered that village. Out of fear of Singharatha, the king of the Bhils, everyone fled, taking Padmadevi with them into a vast forest (Maha-atavi). Afflicted by intense hunger there, the people ate poisonous fruits and died swiftly. However, fearing the violation of her vow, Padmadevi did not even touch those fruits. Consequently, passing away due to lack of food, she was reborn in the land of enjoyment (Bhogabhumi) named Haimavata.
Upon completing her lifespan, she departed from that realm and became a goddess named Svayamprabha, belonging to the deity named Svayamprabha in the Svayamprabha island (Svayamprabhadvipa). Departing from there, she was born in Jayantapura city within the Bharata Kshetra of this same Jambudvipa, as a beautiful daughter named Vimalashri to King Shridhara and Queen Shrimati. She later became the queen who bestowed desired pleasures upon King Megharatha, the ruler of Bhadrilapura.
At one time, King Meghanada (Megharatha), possessing pure intellect, renounced his kingdom and took vows under the revered monk (Muniraj) Dharma. As a result, he became a resplendent Indra in the Sahasrara heaven with a lifespan of eighteen Sagaras. On the other hand, Queen Vimalashri also approached the female ascetic (Aryika) Padmavati, embraced self-restraint (Sanyam), and observed a rigorous fast called Achamlavardha. Consequently, at the end of her lifespan, she was reborn as a goddess in that very same Sahasrara heaven.
At the end of her lifespan there, she departed from that realm and was born as this very daughter named Padmavati to Queen Shrimati and King Hiranyavarma, the ruler of Arishtapura city. Filled with affection, she honored you by placing the jeweled garland around your neck during her Swayamvara, and subsequently, this virtuous lady attained the position of the chief queen (Mahadevi).
In this manner, hearing about their respective past lives from the lotus-like mouth of Lord Ganadhara, all three queens of Shri Krishna—Gauri, Gandhari, and Padmavati—were filled with immense joy. || 443-459 ||
श्लोक 460 से 462
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
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