राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 |
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 73 to 81
श्लोक ( Shlok ) 73 – 77
वने वनेचरचण्डः कृत्वाधारं महाद्रुमम् । गण्डान्ताकृष्टकोदण्डः काण्डेनाखण्ड्य वारणम् ॥ ७३ ॥महीरुट्कोटरस्थेन सन्दष्टः फणिना स्वयम् । स चाहिष्य गजञ्चाशो गत्यन्तरमजी गमत् ॥ ७४ ॥अथ सर्वान् मृतान् दृष्ट्वा ‘तान्क्रोष्टेकोऽतिलुब्धकः । तावदेतानहं नाभि पौर्वीद्वयाग्रगम् ॥ ७५ ॥खादामीति कृतोद्योगस्तच्छेदमकरोद्विधीः । सद्यश्चापाग्रनिभिनगलः सोऽपि वृथा मृतः ॥ ७६॥ततोऽतिगृध्नुता त्याज्येत्यस्योक्तिविरतौ सुधीः । कुमारः स्मृतिमाधाय सूक्तं ‘प्रत्यभिधास्यति ॥ ७७ ॥
कि किसी वनमें एक चण्ड नामका भील रहता था। उसने एक बड़े वृक्षको आधार बनाकर अर्थात् उस पर बैठकर गाल तक धनुष खींचा और एक हाथीको मार गिराया। इतनेमें ही उस वृक्षकी कोटरसे निकल कर एक साँपने उसे काट खाया। काटते ही उस अज्ञानी भीलने उस साँपको भी मार डाला। इस तरह हाथी और साँप दोनोंको मारकर वह स्वयं मर गया। तदनन्तर उनसबको मरा देखकर एक अत्यन्त लोभी गीदड़ आया। वह सोचने लगा कि मैं पहले इन सबको नहीं खाकर धनुषकी डोरीके दोनों छोड़ पर लगी हुई ताँतको खाता हूँ। ऐसा विचार कर उस मूर्खने ताँतको काटा ही था कि उसी समय धनुषके अग्रभागसे उसका गला फट गया और वह व्यर्थ ही मर गया। इसलिए अधिक लोभ करना छोड़ देना चाहिये । इस प्रकार कहकर जब चोर चुप हो रहेगा तब बुद्धिमान् जम्बूकुमार विचार कर एक उत्तम बात कहेगा ।। ७३-७७ ॥
“In a certain forest, there lived a Bhil (tribal hunter) named Chanda. Taking support of a large tree—that is, by sitting upon it—he drew his bow all the way up to his cheek and brought down an elephant. Just then, a snake emerged from the hollow of that tree and bit him. As soon as it bit him, that ignorant Bhil killed the snake as well. In this manner, having killed both the elephant and the snake, he himself died. Subsequently, seeing them all dead, an extremely greedy jackal arrived. He began to think, ‘Instead of eating all of them first, I will eat the sinew fastened to both ends of the bowstring.’ Having thought so, the moment that fool bit the sinew, the tip of the bow instantly pierced his throat, and he died in vain. Therefore, one should abandon excessive greed. When the thief falls silent after speaking thus, the wise Jambukumar, after reflecting, will say something excellent.” || 73-77 ||
श्लोक ( Shlok ) 78 – 80
चतुर्मार्गसमायोग देशमध्ये महाद्युतिम् । रत्नराशि समभ्येत्य सुग्रहं पथिको विधीः ॥ ७८ ॥तदानादाय केनापि हेतुना गतवान्पुनः । समादित्सुस्तमागत्य किं तद्देशं लभेत सः ॥ ७९ ॥तथा दुष्आपमालोक्य गुणमाणिक्यसञ्चयम् । अस्वीकुर्वन् कथं पश्चात्प्रामुयाद्भववारिधौ ॥ ८० ॥
कि कोई मूर्ख पथिक कहीं जा रहा था उसे चौराहे पर महा देदीप्यमान रत्नोंकी राशि मिली, उस समय वह उसे चाहता तो अनायास ही ले सकता था परन्तु किसी कारणवश उसे बिना लिये ही चला गया। फिर कुछ समय बाद उसे लेनेकी इच्छा करता हुआ उस चौराहे पर आया सो क्या वह उस रत्नराशिको पा सकेगा ? अर्थात् नहीं पा सकेगा। इसी प्रकार जो मनुष्य संसार रूपी समुद्र में दुर्लभ गुण रूपी मणियोंके समूहको पाकर भी उसे स्वीकृत नहीं करता है सो क्या वह उसे पीछे भी कभी पा सकेगा ? अर्थात् नहीं पा सकेगा ।। ७८-८० ॥
“A certain foolish traveler was going somewhere and found a heap of intensely brilliant jewels at a crossroads. At that moment, if he had wished, he could have taken it effortlessly, but for some reason, he left without taking it. Some time later, desiring to possess it, he returned to that crossroads; so, will he be able to find that heap of jewels? That is to say, he will not. Similarly, a person who, despite obtaining a cluster of rare virtue-like gems in the ocean of this worldly existence, does not accept it—will he ever be able to find it again later? That is to say, he will not.” || 78-80 ||
श्लोक ( Shlok ) 81
तदुदीरितमेतस्य कृत्वा चित्ते परस्वहृत् । वदिष्यति तदाख्यानमन्यदन्यायसूचनम् ॥ ८१ ॥
जम्बूकुमारके द्वारा कही हुई बातको हृदयमें रखकर विद्युच्चोर अन्यायको सूचित करनेवाली एक दूसरी कथा कहेगा ॥ ८१ ॥
“Keeping the words spoken by Jambukumar in his heart, the thief Vidyucchora will tell another story indicating injustice.” || 81 ||
श्लोक 82 से 93
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