Hindi Translation of Uttar puran Parv 68
उत्तरपुराण पर्व 68 सारांश
श्लोक 1–16 : रावण के पूर्वभव और सीता के जन्म का कारण
तदनन्तर जिसके शब्द और अर्थ सुनने योग्य हैं तथा वाणी सारपूर्ण है ऐसा पुरोहित, ‘महाराज आप यह कथा श्रवण करनेके योग्य हैं’ इस प्रकार महाराज दशरथको सम्बोधित कर अपने यशरूपी लक्ष्मीसे दशों दिशाओंके मुखको प्रकाशित करनेवाले रावणके भवान्तर कहने लगा ॥१-२।। उसने कहा कि धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व भरतक्षेत्रमें स्वर्गलोकके समान आभावाला एवं पृथिवीके गुणोंसे युक्त सारसमुच्चय नामका देश है ॥ ३ ॥ उसके नागपुर नगरमें नरदेव नामका राजा राज्य करता था। वह किसी एक दिन अनन्त नामक गणधरके पास गया, उन्हें वन्दना कर उसने उनसे धर्म-कथा सुनी और विरक्त होकर भोगदेव नामक बड़े पुत्रके लिए राज्य दे दिया तथा संयम्, धारण कर उत्कृष्ट तपञ्चरण किया। तपश्चरण करते समय उस मूर्खने कदाचित् चपलवेग नामक विद्याधरोंके राजाको देखकर शीघ्र ही निदान कर लिया। जब आयुका अन्त आया तब संन्यास धारण कर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ ।
अथानन्तर-इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें जो विजयार्ध नामका महान् पर्वत है उसकी दक्षिण श्रेणीमें मेघकूट नामका नगर है। उसमें राजा विनमिके वंशमें उत्पन्न हुआ सहस्रमीव नामका विद्याधर राज्य करता था। उसके भाईका पुत्र बहुत बलवान् था इसलिए उसने क्रोधित होकर सहस्त्रग्रीवको बाहर निकाल दिया था। वह सहस्त्रग्रीव वहाँ से निकल कर लङ्का नगरी गया और वहाँ तीस हजार वर्ष तक राज्य करता रहा ॥ ४-९ ॥ उसके पुत्रका नाम शतश्रीव था। सहस्त्रग्रीवके बाद उसने वहाँ पच्चीस हजार वर्ष तक राज्य किया था। उसका पुत्र पञ्चाशत्मीव था उसने भी शतमीवके बाद बीस हजार वर्ष तक पृथिवीका पालन किया था, तदनन्तर पञ्चाशद्द्मीवके पुलस्त्य नामका पुत्र हुआ उसने भी पिताके बाद पन्द्रह हजार वर्ष तक राज्य किया। उसकी स्त्रीका नाम मेघश्री था। उन दोनोंके वह देव रावण नामका पुत्र हुआ। चौदह हजार वर्षकी उसकी उत्कृष्ट आयु थी, पिताके बाद वह भी पृथिवीका पालन करने लगा। एक दिन लङ्काका ईश्वर रावण अपनी स्त्रीके साथ क्रीड़ा करनेके लिए किसी वनमें गया था। वहाँ विजयार्ध पर्वतके स्थालक नगरके राजा अमितवेगकी पुत्री मणि-मती विद्या सिद्ध करनेमें तत्पर थी उसे देखकर चञ्चल रावण काम और मोहके वश हो गया । उस कन्याको अपने आधीन करनेके लिए उस दुष्टने मणिमतीकी विद्या हरण कर ली। वह कन्या उस विद्याकी सिद्धिके लिए बारह वर्षसे उपवासका क्लेश उठाती अत्यन्त दुर्बल हो गई थी। विद्याकी सिद्धिमें विघ्न्न होता देख वह विद्याधरोंके राजा पर बहुत कुपित हुई। कुपित होकर उसने निदान किया कि मैं इस राजाकी पुत्री होकर इस दुर्बुद्धिका वध अवश्य करूँगी ।। १०-१६ ॥
श्लोक 17–30 : सीता का परित्याग, जनक द्वारा पालन और राम को मिथिला भेजने का निर्णय
ऐसा निदान कर वह आयुके अन्तमें मन्दोदरीके गर्भमें उत्पन्न हुई। जब उसका जन्म हुआ तब भूकम्प आदि बड़े-बड़े उत्पात हुए उन्हें देख निमित्तज्ञानियोंने कहा कि इस पुत्रीसे रावणका विनाश होगा । यद्यपि रावण निर्भय था तो भी निमित्तज्ञानियोंके वचन सुनकर अत्यन्त भयभीत हो गया। उसने उसी क्षण मारीच नामक मन्त्रीको आज्ञा दी कि इस पापिनी पुत्रीको जहाँ कहीं जाकर छोड़ दो । मारीच भी रावणकी आज्ञा पाकर मन्दोदरीके घर गया और कहने लगा कि हे देवि, मैं बहुत ही निर्दय हूं अतः महाराजने मुझे ऐसा काम सौंपा है यह कह उसने मन्दोद्रीके लिए रावणकी आज्ञा निवेदित की-सूचित की। मन्दोदरीने भी उत्तर दिया कि मैं महाराजकी आज्ञाका निवारण नहीं करती हूँ ।। १७-२० ॥ यह कह कर उसने एक सन्दूकची में बहुत-सा द्रव्य रखकर उस पुत्रीको रक्खा, और मारीचसे बार-बार यह शब्द कहे कि हे मारीच ! तेरा हृदय स्वभावसे ही स्नेह पूर्ण है अतः इस बालिकाको ऐसे स्थानमें छोड़ना जहाँ किसी प्रकारकी बाधा न हो। ऐसा कह उसने जिनसे अश्रु झर रहे हैं ऐसे दोनों नेत्र पोंछकर उसके लिए वह पुत्री सौंप दी। मारीचने ले जाकर वह सन्दूकची मिथिलानगरीके उद्यानके निकट किसी प्रकट स्थानमें जमीनके भीतर रख दी और स्वयं शोकसे विषाद करता हुआ वह लौट गया। उसी दिन कुछ लोग घर बनवानेके लिए जमीन देख रहे थे, वे हल चलाकर उसकी नोंकसे वहाँकी भूमि ठीक कर रहे थे। उसी समय वह सन्दूकची हलके अग्रभागमें आ लगी। वहाँ जो अधिकारी कार्य कर रहे थे उन्होंने इसे आश्चर्य समझ राजा जनकके लिए इसकी सूचना दी ।। २१-२५ ॥ राजा जनकने उस सन्दूकचीके भीतर रखी हुई सुन्दर कन्या देखी और पत्रसे उसके जन्मका सब समाचार तथा पूर्वापर सम्बन्ध ज्ञात किया । तदनन्तर उसका सीता नाम रखकर ‘यह तुम्हारी पुत्री होगी’ यह कहते हुए उन्होंने बड़े हर्षसे वह पुत्री वसुधा रानीकेलिए दे दी ।। २६-२७ ॥ रानी वसुधाने भूमिगृहके भीतर रहकर उस पुत्रीका पालन-पोषण किया है तथा उसके कलारूप गुणोंकी वृद्धि की है। यह कन्या इतनी गुप्त रखी गई है कि लङ्केश्वर रावणको इसका पता भी नहीं है। इसके सिवाय राजा जनक यज्ञ कर रहे हैं यह खबर भी रावणको नहीं है अतः वह इस उत्सवमें नहीं आवेगा। ऐसी स्थितिमें राजा जनक वह कन्या रामके लिए अवश्य देवेंगे । इसलिए राम और लक्ष्मण ये दोनों ही कुमार वहाँ अवश्य ही भेजे जानेके योग्य हैं। इस प्रकार निमित्तज्ञानी पुरोहितके कहनेसे राजा समस्त सेनाके साथ राम और लक्ष्मणको भेज दिया ॥ २८-३० ॥
श्लोक 31 से 42 : राम-सीता विवाह, अयोध्या आगमन और वसन्त ऋतु का वर्णन
अनुरागसे भरे हुए राजा जनकने उन दोनोंकी अगवानी की। ‘पूर्व जन्ममें संचित अपने अपरिमिति पुण्यके उद्यसे जो इन्हें रूप आदि गुणोंकी सम्पदा प्राप्त हुई है उससे ये सचमुच ही अनुपम हैं- उपमा रहित हैं’ इस प्रकार प्रशंसा करते हुए नगरके लोग जिन्हें देख रहे हैं ऐसे दोनों भाई साथ ही साथ नगरमें प्रवेश कर राजा जनकके द्वारा बतलाये हुए स्थान पर सुखके ठहर गये । कुछ दिनोंके बाद जब अनेक राजाओंका समूह आ गया तब उनके सन्निधानमें राजा जनकने अपने इष्ट यज्ञकी विधि पूरी की और बड़े वैभवके साथ रामचन्द्रके लिए सीता प्रदान की ॥३१-३४॥ रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक लक्ष्मीके समान सीताके साथ वहीं जनकपुरमें नये प्रेमसे उत्पन्न हुए सातिशय सुखका उपभोग किया ।। ३५ ॥ तदनन्तर राजा दशरथके पाससे आये हुए मन्त्रियोंके कहनेसे रामचन्द्रजीने राजा जनककी आज्ञा ले शुद्ध तिथिमें परिवारके लोग, सीता तथा लक्ष्मणके साथ बड़े हर्षसे अयोध्याकी ओर प्रस्थान किया और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। वहाँ पहुँचने पर दोनों छोटे भाई भरत और शत्रुघ्न्नने, बन्धुओं तथा परिवारके लोगोंने उनकी अगवानी की। जिस प्रकार इन्द्र बड़े वैभवके साथ अपनी नगरी अमरावतीमें प्रवेश करता है उसी प्रकार विजयी राम-चन्द्रजीने बड़े वैभवके साथ अयोध्यापुरी में प्रवेश किया ।। ३६-३८ ॥ वहाँ उन्होंने प्रसन्न चित्तके धारक माता-पिताके दर्शन यथायोग्य प्रेमसे किये । तदनन्तर जिनकी लक्ष्मी उत्तरोत्तर बढ़ रही है ऐसे रामचन्द्रजी सीता तथा छोटे भाइयोंके साथ सुखसे रहने लगे ॥ ३९ ॥
उसी समय अपने द्वारा उनके उत्सवको बढ़ाता हुआ वसन्त ऋतु आ पहुँचा। कोयलों और भ्रमरोंके समूह जो मनोहर शब्द कर रहे थे वही मानो उसके नगाड़े थे, वह समस्त दिशाओंको सुशोभित कर रहा था। जो कामदेव, तपोधन-साधुओंके साथ सन्धि करता है और शिथिल व्रतों–शिथिलाचारियोंके साथ विग्रह रखता है उस कामदेवके साथ वह वसन्त ऋतु अपना खास सम्बन्ध रखता था। वह वसन्त कामी मनुष्योंका मान खण्डित करता था, विरही मनुष्योंको अत्यन्त दण्ड देता था, और संयुक्त मनुष्योंको परस्परमें सम्बद्ध करता था। इस प्रचण्ड शक्तिवाले वसन्त ऋतुने संसारमें प्रवेश किया ॥ ४०-४२ ॥
श्लोक 43 से 50 : वसन्त की शोभा और राम-लक्ष्मण के अन्य विवाह
वसन्त ऋतुके आते ही वनमें जो उत्तम वनस्पतियोंकी जातियाँ थीं उनमेंसे कितनी ही अङ्कुरित हो उठीं और कितनी ही अपने पल्लवों से सानुराग हो गईं, कितनी – ही वनस्पतियों पर कलियाँ आ गई थीं, और कितनी ही वनस्पतियाँ, जिनके प्राणवल्लभ अपनी अवधिके भीतर आ गये हैं ऐसी स्त्रियोंके समान फूलोंके समूहसे निरन्तर हँसने लगीं ॥ ४३-४४ ॥ उस समय चन्द्रमाका मण्डल बफेंके पटलसे उन्मुक्त होनेके कारण अत्यन्त स्पष्ट दिखाई देता था और सब दिशाओंमें शोभा बढ़ानेवाली अपनी चाँदनी फैला रहा था ।। ४५ ।। दक्षिण दिशाका वायु श्रेष्ठ सुगन्धिको लेकर फूलोंसे उत्पन्न हुई परागको बिखेरता हुआ सरोवरके जलके कणोंके साथ बह रहा था ।। ४६ ।। उसी समय अतिशय कुशल राजा दशरथने श्रीजिनेन्द्रदेवकी पूजापूर्वक अन्य सात सुन्दर कन्याओंके साथ रामचन्द्रका तथा पृथिवी देवी आदि सोलह राजकन्याओंके साथ लक्ष्मणका विवाह किया था ।। ४७-४८ ।। तदनन्तर राम और लक्ष्मण दोनों भाई समस्त ऋतुओंमें उन स्त्रियोंके साथ प्रेमपूर्वक सुख प्राप्त करने लगे और वे स्त्रियाँ उन दोनोंके साथ प्रेमपूर्वक सुखका उपभोग करने लर्गी सो ठीक ही है क्योंकि पुण्य बाह्य हेतुओंसे ही सुखका देनेवाला होता है ॥ ४९ ॥ इस प्रकार पुण्योदयसे श्रेष्ठ सुखका अनुभव करनेमें तत्पर रहनेवाले दोनों भाई किसी समय अवसर पाकर राजा दशरथसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ५० ॥
श्लोक 51 से 61 : दशरथ का उत्तर और राज्यनीति में शक्ति का विवेचन
कि काशीदेशमें वाराणसी (बनारस) नामका उत्तम नगर हमारे पूर्वजोंकी परम्पराले ही हमारे आधीन चल रहा है परन्तु वह इस समय स्वामि रहित हो रहा है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हम दोनों उप्ते बढ़ते हुए वैभवसे युक्त कर दें। उनका कहा सुनकर राजा दशरथने कहा कि भरत आदि तुम दोनोंका वियोग सहन करनेमें असमर्थ हैं। पूर्व-कालमें हमारे वंशज राजा इसी अयोध्या नगरी में रहकर ही चिरकाल तक पृथिवीका पालन करते रहे हैं। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा यद्यपि एक स्थानमें रहते हैं तो भी उनका तेज सर्वत्र व्याप्त हो जाता है उसी प्रकार आप दोनोंका तेज एक स्थानमें स्थित होने पर भी समस्त पृथिवी-मण्डल में व्याप्त हो रहा है इसलिए वहाँ जानेकी क्या आवश्यकता है ? मत जाओ ? यद्यपि महाराज दशरथने उन्हें बनारस जानेसे रोक दिया था तो भी वे पुनः इस प्रकार कहने लगे कि महाराजका हम दोनों पर जो महान् प्रेम है वही हम दोनोंके जानेमें बाधा कर रहा है ॥ ५१-५६ ।। जब तक शूरवीरताका होना सम्भव है और जब तक पुण्यकी स्थिति बाकी रहती है तब तक अभ्युदयके इच्छुक पुरुष उत्साहकी तत्परताको नहीं छोड़ते हैं ।। ५७ ।। जो राजपुत्र विरुद्ध-शत्रुओंको जीतना चाहते हैं उन्हें बुद्धि, शक्ति, उपाय, विजय, गुणोंका विकल्प और प्रजा अथवा मन्त्री आदि प्रकृतिके भेदोंको अच्छी तरह जानकर महान् उद्योग करना चाहिये । उनमेंसे बुद्धि दो प्रकारकी कही जाती है एक स्वभावसे उत्पन्न हुई और दूसरी विनयसे उत्पन्न हुई ॥ ५८-५९ ॥ शक्ति तीन प्रकारकी कही गई है एक मन्त्रशक्ति, दूसरी उत्साह-शक्ति और तीसरी प्रभुत्व-शक्ति । सहायक, साधनके उपाय, देश-विभाग, काल-विभाग और बाधक कारणोंका प्रतिकार इन पाँच अङ्गों के द्वारा मन्त्रका निर्णय करना आगममें मन्त्रशक्ति बतलाई गई है ।॥ ६० ॥ शक्तिके जाननेवाले शूर-वीरतासे उत्पन्न हुए उत्साद्धको उत्साह-शक्ति मानते हैं। राजाके पास कोश (खजाना) और दण्ड (सेना) की जो अधिकता होती है उसे प्रभुत्व-शक्ति कहते हैं ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 : चार उपाय, षाड्गुण्य नीति और राजकीय आचरण
नीतिशास्त्रके विद्वान् साम, दान, भेद और दण्ड इन्हें चार उपाय कहते हैं। इनके द्वारा राजा लोग अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं ॥ ६२ ॥ प्रिय तथा हितकारी वचन बोलना और शरीरसे आलिङ्गन आदि करना साम कहलाता है। हाथी, घोड़ा, देश तथा रत्न आदिका देना उपप्रदा – दान कहलाता है। उपजाप अर्थात् परस्पर फूट डालनेके द्वारा अपना कार्य स्वीकृत करना – सिद्ध करना भेद कहलाता है। शत्रुके घास आदि आवश्यक सामग्री की चोरी करा लेना, उनका वध करा देना, आग लगा देना, किसी वस्तुको छिपा देना अथवा सर्वथा नष्ट कर देना इत्यादि शत्रुओंका क्षय करनेवाले जितने कार्य हैं उन्हें पण्डित लोग दण्ड कहते हैं। इन्द्रियोंकी अपने-अपने योग्य विषयोंमें विरोध रहित प्रवृत्ति होना तथा कामादि शत्रुओंको भयभीत करना जयशाली मनुष्यकी जय कहलाती है ।। ६३-६५ ॥ सन्धि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय और द्वैधीभाव ये राजाके छह गुण कहे गये हैं। ये छहों गुण लक्ष्मीके स्नेही हैं। युद्ध करनेवाले दो राजाओंका पीछे किसी कारणसे जो मैत्रीभाव हो जाता है उसे सन्धि कहते हैं। यह सन्धि दो प्रकारकी है अवधि सहित – कुछ समयके लिए और अवधि रहित- सदाके लिए। शत्रु तथा उसे जीतनेवाला दूसरा राजा ये दोनों परस्परमें जो एक दूसरेका अपकार करते हैं उसे विमह कहते हैं॥ ६६-६८ ॥ इस समय मुझे कोई दूसरा और मैं किसी दूसरेको नष्ट करनेके लिए समथ नहीं हूं ऐसा विचार कर जो राजा चुप बैठ रहता है उसे आसन कहते हैं। यह आसन नामका गुण राजाओं-की वृद्धिका कारण है ।॥ ६९ ॥ अपनी वृद्धि और शत्रुकी हानि होने पर दोनोंका शत्रुके प्रति जो उद्यम है- शत्रु पर चढ़कर जाना है उसे यान कहते हैं। यह यान अपनी वृद्धि और शत्रुकी हानि रूप फलको देनेवाला है ॥ ७० ॥ जिसका कोई शरण नहीं है उसे अपनी शरणमें रखना संश्रय नामका गुण है और शत्रुओंमें सन्धि तथा विग्रह करा देना द्वैधीभाव नामका गुण है ॥ ७१ ॥
श्लोक 72–83 : राज्य के सात अंग, पुरुषार्थ का महत्व और राम का वाराणसी प्रस्थान
स्वामी, मन्त्री, देश, खजाना, दण्ड, गढ़ और मित्र ये राजाकी सात प्रकृतियाँ कहलाती हैं ।। ७२ ।। विद्वान् लोगोंने ऊपर कहे हुए ये सब पदार्थ, राज्य स्थिर रहनेके कारण माने हैं। यद्यपि ये सब कारण हैं तो भी साम आदि उपायोंके साथ शक्तिका प्रयोग करना प्रधान कारण है ।। ७३ ।। जिस प्रकार खोदनेसे पानी और प्ररस्परकी रगड़से अग्नि उत्पन्न होती है उसी प्रकार उद्योगसे, जो उत्तम फल अदृश्य है-दिखाई नहीं देता वह भी प्राप्त करनेके योग्य हो जाता है ।॥ ७४ ॥ जिस प्रकार फल और फूलोंसे रहित आमके वृक्षको पत्ती छोड़ देते हैं और विवेकी मनुष्य उपदिष्ट मिथ्या आगमको छोड़ देते हैं उसी प्रकार उत्साहहीन राजपुत्रको विशाल लक्ष्मी छोड़ देती है। यही नहीं, अपने योद्धा सामन्त और महामन्त्री आदि भी उसे छोड़ देते हैं ।॥ ७५-७६ ॥ इसी तरह पिता भी उद्यम रहित पुत्रको अयोग्य समझकर दुखी होता है। राम और लक्ष्मणकी ऐसी प्रार्थना सुनकर महाराज दशरथ उस समय बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि तुम दोनोंने जो कहा है वह अपने कुलके योग्य ही कहा है। इस प्रकार हर्ष प्रकट करते हुए उन्होंने भावी बलभद्र-रामचन्द्रके शिर पर स्वयं अपने हाथोंसे राज्यके योग्य विशाल मुकुट बाँधा और महाप्रतापी लक्ष्मणके लिए यौवराज-का आधिपत्य पट्ट प्रदान किया। तदनन्तर महान् वैभव सम्पादन करनेवाले सत्य आशीर्वादके द्वारा बढ़ाते हुए राजा दशरथने उन दोनों पुत्रोंको बनारस नगरके प्रति भेज दिया ।। ७७-८० ॥ दोनों भाइयोंने जाकर उस उत्कृष्ट नगरमें प्रवेश किया और वहाँ के रहनेवाले नगरवासियों तथा देशवासियों को दोनों भाई सदा दान मान आदिके द्वारा सन्तुष्ट करने लगे। वे सदा दुष्टोंका निग्रह और सज्जनों-का पालन करते थे, नीतिके जानकार थे तथा पूर्व मर्यादाका कभी उल्लंघन नहीं करते थे। उनका प्रजा पालन करना ही मुख्य कार्य था। वे कृतकृत्य हो चुके थे-सब कार्य कर चुके थे अथवा किसी भी कार्यको प्रारम्भ कर उसे पूरा कर ही छोड़ते थे। इस प्रकार शल्यरहित उत्तम सुख प्रदान करने-वाले श्रेष्ठ कल्याणोंसे उनका समय व्यतीत हो रहा था ।। ८१-८३ ।।
श्लोक 84–92 : रावण का वैभव और नारद का आगमन
इधर रावण, त्रिखण्ड भरतक्षेत्र-का मैं ही स्वामी हूँ इस प्रकार अपने आपको गर्वरूपी पर्वत पर विद्यमान सूर्यके समान समझने लगा । वह शत्रुओंको रुलाता था इसलिए उसका रावण नाम पड़ा था। अपने तेज और प्रतापके द्वारा उसने सूर्य मण्डलको तिरस्कृत कर दिया था। दण्ड लेनेके लिए पास आये हुए सामन्तोंके नम्रीभूत मुकुटोंके अग्रभागमें जो देदीप्यमान मणि लगे हुए थे उनके किरणरूपी जलके भीतर उस रावण के चरणकमल विकसित हो रहे थे। वह अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था, उस पर चमर दुराये जा रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ नीलमेघ ही हो । वह भौंह टेढ़ी कर लोगोंसे वार्तालाप कर रहा था जिससे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ता था। छोटे भाई, पुत्र, मूलवर्ग तथा बहुतसे योद्धा उसे घेरे हुए थे ॥ ८४-८८ ॥ ऐसे रावणके पास किसी एक दिन नारदजी आ पहुँचे। वे नारदजी अपनी पीली तथा ऊँची उठी हुई जटाओंके समूहूकी प्रुभासे आकाशको पीतवर्ण कर रहे थे, इन्द्रनीलमणिके बने हुए अक्षसूत्र-जयमालाको उन्होंने अपने हाथमें किसी बड़ी चूड़ीके आकार लपेट रक्खा था जिससे उनकी अङ्गुलियाँ बहुत ही सुशोभित हो रही थीं, तीर्थोदकसे भरा हुआ उनका पद्मराग निर्मित्त कमण्डलु बड़ा भला मालूम होता था और सुवर्ण-सूत्र निर्मित यज्ञोपवीतसे उनका शरीर पवित्र था। आकाशसे उतरते ही नारदजीने द्वारके समीप रावणको देखा। यह देख रावणने नारदसे कहा कि हे भद्र, बहुत दिन बाद दिखे हो, बैठिये, कहाँ से आ रहे हैं ? और आपका आगमन किसलिए हुआ है ? रावणके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर दुर्बुद्धि नारद यह कहने लगा ॥ ८९-९२ ॥
श्लोक 93–104 : नारद द्वारा सीता का वर्णन और रावण में कामासक्ति का उदय
अहङ्कारी तथा दुर्जय राजारूपी क्रुद्ध हस्तियोंको नष्ट करनेमें सिंहके समान हे दशानन ! जो मैं कह रहा हूं उसे तू चित्त स्थिर कर सुन ॥ ९३ ॥ हे राजन् ! आज मेरा बनारससे यहाँ आना हुआ है। उस नगरीका स्वामी इक्ष्वाकुवंशरूपी आकाशका सूर्य राजा दशरथका अतिशय प्रसिद्ध पुत्र राम है। वह कुल, रूप, वय, ज्ञान, शूरवीरता तथा सत्य आदि गुणोंसे महान् है और अपने पुण्योद्यसे इस समय अभ्युदय ऐश्वर्यके सन्मुख है। मिथिलाके राजा जनकने यज्ञ के बहाने उसे स्वयं बुलाकर साक्षात् लक्ष्मीके समान अपनी सीता नामकी पुत्री प्रदान की है। वह इतनी सुन्दरी है कि अपना नाम सुनने मात्रसे ही बड़े-बड़े अहङ्कारी कामियोंके चित्तको ग्रहण कर लेती है- वश कर लेती है, संसारकी सब स्त्रियोंके गुणोंको इकट्ठा करके उनकीसम्पुझसे ही मानो उसका शरीर बनाया गया है, वह नेत्रों के सामने आते ही सब जीवोंको काम सुख प्रदान करती है और सम्भोगसे होनेवाली तृप्तिके बाद तो मुक्तिरूपी स्त्रीको भी जीतनेमें समर्थ है। वह स्त्रीरूपी रत्न सर्वथा तुम्हारे योग्य था परन्तु मिथिलापतिने तीन खण्डकी अखण्ड सम्पदाको धारण करनेवाले तुम्हारा अनादर कर रामचन्द्र के लिए प्रदान किया है ॥ ९४-९९ ॥ भोगोपभोगमें निमग्न रहनेवाले तथा विपुल लक्ष्मीके धारक रामके पास रह कर मैं आया हूँ। मैं उसे सहन नहीं कर सका इसलिए आपके दर्शन करनेके लिए प्रेमवश यहाँ आया हूँ। नारदजीकी बात सुनकर विद्याधरोंके राजा रावणने ‘कामी मनुष्योंकी इच्छा ही देखती है नेत्र नहीं देखते हैं’ इस लोकोक्तिको सिद्ध करते हुए कहा। उस समय सीता सम्बन्धी वचन सुननेसे रावणका चित्त कामदेवके वाणोंकी वर्षासे जर्जर हो रहा था। रावणने कहा कि वह भाग्यशालिनी मेरे सिवाय अन्य भाग्यहीनके पास रहनेके योग्य नहीं है। महासागरको छोड़कर गङ्गाकी स्थिति क्या कहीं अन्यत्र भी होती है ? मैं अत्यन्त दुर्बल रामचन्द्रसे सीताको जबर्दस्ती छीन लाऊँगा और स्थायी कान्तिको धारण करनेवाली रत्नमालाके समान उसे अपने वक्षःस्थल पर धारण करूँगा ।। १००-१०४ ॥
श्लोक 105 से 123 रावण की कुटिल योजना और मारीच का परामर्श
इस प्रकार कामाग्निसे सन्तप्त हुए उस अनार्य-पापी रावणने अपनी सभामें कहा सो ठीक ही है क्योंकि दुर्जन मनुष्योंका ऐसा स्वभाव ही होता है ।॥१०५ ।। तदनन्तर पाप-बुद्धिका धारक नारद,रावण की प्रज्वलित क्रोधाग्निको और भी अधिक प्रज्व-लित करनेके लिए कहने लगा कि जिसका ऐश्वर्य निरन्तर बढ़ रहा है ऐसा राम तो महाराज पदके योग्य है और भाई लक्ष्मण युवराज पदपर नियुक्त है ।। १०६-१०७ ॥ जबसे ये दोनों भाई बनारसमें प्रविष्ट हुए हैं तबसे समस्त राजाओंने अपनी-अपनी पुत्रियाँ देकर इनका सम्मान बढ़ाया है और इनके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है ।॥ १०८ ॥ इसलिए लक्ष्मणसे जिसका प्रताप बढ़ रहा है ऐसे रामचन्द्रके साथ हमलोगोंको युद्ध करना ठीक नहीं है अतः युद्ध करनेका आग्रह छोड़ दीजिये ॥ १०९ ॥ नारदकी यह बात सुनकर रावण क्रोधित होता हुआ हँसा और कहने लगा कि हे मुने ! तुम हमारा प्रभाव शीघ्र ही सुनोगे। इतना कह कर उसने नारदको तो विदा किया और स्वयं मन्त्र-शालामें प्रवेश कर मनमें ऐसा विचार करने लगा कि यह कार्य किसी उपायसे ही सिद्ध करनेके योग्य है, बलपूर्वक सिद्ध करनेमें इसकी शोभा नहीं है। विद्वान् लोग उपायके द्वारा बड़ेसे बड़े पुरुषकी भी लक्ष्मी हरण कर लेते हैं। ऐसा विचार उसने मन्त्रीको बुलाकर कहा कि राजा दशरथके लड़के राम और लक्ष्मण बड़े अहङ्कारी हो गये हैं। वे हमारा पद जीतना चाहते हैं इसलिए शीघ्र ही उनका उच्छेद करना चाहिए । दुष्ट रामचन्द्रकी सीता नामकी स्त्री है। मैं उन दोनों भाइयोंको मारनेके लिए उस सीताका हरण करूँगा। तुम इसका उपाय सोचो। जब रावण यह कह चुका तब मारीच नामका मन्त्री विनयसे हाथ जोड़ता हुआ बोला ॥ ११०-११४ ॥ कि हे पूज्य स्वामिन् ! हितकारी कार्यमें प्रवृत्ति कराना और अहितकारी कार्यका निषेध करना मन्त्रीके यही दो कार्य हैं ।। ११५ ।। आपने जिस कार्यका निरूपण किया है वह अपथ्य है- अहितकारी है, अकीर्ति करनेवाला है, पापानुबन्धी है, दुःसाध्य है, अयोग्य है, सज्जनोंके द्वारा निन्दनीय है, परस्त्रीका अपहरण करना सब पापोंमें बड़ा पाप है, उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ ऐसा कौन पुरुष होगा जो कभी इस अकार्यका विचार करेगा ।। ११६-११७ ॥ फिर उनका उच्छेद करनेके लिए दूसरे उपाय भी विद्यमान हैं अतः आपका वंश नष्ट करनेके लिए धूमकेतुके समान इस कुकृत्यके करनेसे क्या लाभ है ? ॥ ११८ ॥ इस प्रकार मारीचने सार्थक वचन कहे परन्तु जिस प्रकार निकटकालमें मरनेवाला मनुष्य औषध ग्रहण नहीं करता उसी प्रकार निर्बुद्धि रावणने उसके वचन ग्रहण नहीं किये ॥ ११९ ॥ वह मारीचसे कहने लगा कि ‘हम तुम्हारी बात नहीं मानते’ यही तुमने क्यों नहीं कहा ? हे मन्त्रिन् ! इष्ट वस्तुका घात करने वाले इस विपरीत वचनसे क्या लाभ है ? ॥ १२० ॥ हे आर्य ? यदि आप सीता हरणका कोई उपाय जानते हैं तो मेरे लिए कहिये। इस प्रकार रावणके वचन सुन मारीच कहने लगा कि यदि आपका यही निश्चय है तो पहले दूतीके द्वारा इस बातका पता चला लीजिये कि उस सतीका आपमें अनुराग है या नहीं ? यदि उसका आपमें अनुराग है तो वह स्नेहपूर्ण किसी सुखकर उनायसे ही लाई जा सकती है और यदि आपमें विरक्त है तो फिर हे देव, हठ पूर्वक उसे ले आना चाहिए । मारीचके वचन सुनकर रावण उसकी प्रशंसा करता हुआ ‘ठीक-ठीक’ ऐसा कहने लगा ।।१२१-१२३ ।।
श्लोक 124 से 132 शूर्पणखा का प्रस्थान और राम-सीता का वन-विहार
उसी समय उस कायरने शूर्पणखाको बुलाकर कहा कि तू किसी उपायसे सीताको मुझमें अनुरक्त कर ॥ १२४ ॥ इस प्रकार उसने बड़े आदरसे कहा। शूर्पणखा भी इस कार्यकी प्रतिज्ञा कर उसी समय वेगसे आकाशमें चल पड़ी और बनारस जा पहुँची ।॥ १२५ ॥ उस समय वसन्त ऋतु थी अतः रामचन्द्रजी नन्दन वनसे भी अधिक सुन्दर चित्रकूट नामक वनमें रमण करनेके लिए सीताकेसाथ गये हुए थे ।। १२६ ।। वहाँ वे वनके बीचमें घूम-घूमकर नाना वनस्पतियोंको देख रहे थे। वहाँ एक लता थी जो फूलोंसे सहित होनेके कारण ऐसी जान पड़ती थी मानों हँस ही रही हो तथा पल्लवोंसे सहित होनेके कारण ऐसी मालूम होती थी मानो अनुरागसे सहित ही हो। वह पतली थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो कृश शरीरवाली कोई दूसरी स्त्री ही हो। वे उसे बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे। उस लताको देखते हुए रामचन्द्रजीके प्रति सीताने कुछ क्रोध युक्त होकर देखा। उसे देखते ही रामचन्द्रने कहा कि यह विना कारण ही कुपित हो रही है अतः इसे प्रसन्न करना चाहिए। वे कहने लगे कि हे चन्द्रमुखि ! देख, जिस प्रकार मैं तुम्हारे मुख पर आसक्त रहता हूं उसी प्रकार इधर यह भ्रमर इस लताके फूल पर कैसा आसक्त हो रहा है? उधर ये अशोक वृक्ष स्वयं सन्तुष्ट करनेके लिए नये-नये फूलोंके द्वारा मानो अपना अनुराग ही प्रकट कर रहे हैं ।॥१२७-१३०।। हे प्रिये ! मेरे नेत्ररूपी भ्रमरोंको सन्तुष्ट करनेके लिए तू इन फूलोंके द्वारा चित्र-विचित्र सेहरा बाँधकर अपने हाथसे मेरे इन केशोंको अलंकृत कर। मैं तेरे लिए भी इन पुष्पों और प्रवालोंसे भूषण बनाता हूं। इन फूलों और प्रवालोंसे तू सचमुच ही एक चलती-फिरती लताके समान सुशोभित होगी ।। १३१-१३२ ॥
श्लोक 133 से 141 राम द्वारा सीता का मान-भंग
इस प्रकार रामने यद्यपि कितने ही शब्द कहे तो भी सीता क्रोधवश चुप ही बैठी रही। यह देख मिष्ट तथा इष्ट वचन बोलनेवाले राम फिर भी इस प्रकार कहने लगे ।। १३३ ।। हे प्रिये ! तेरे नेत्र दर्पणमें तेरा मुख देखकर कृतकृत्य हो चुके हैं और तेरी नाक तेरे मुखकी सुगन्धिसे ही मानो अत्यन्त तृप्त हो गई है ।। १३४ ॥ तेरे सुनने तथा गाने योग्य उत्तम शब्द सुनकर कान रससे लबालब भर गये हैं। तेरे अधर-विम्बका स्वाद लेकर ही तेरी जिह्वा अन्य पदार्थोंके रसप्से निःस्पृह हो गई है ॥ १३५ ॥ तेरे हाथ तेरे कठिन स्तनोंका स्पर्श कर सन्तुष्ट हो गये हैं इसी प्रकार हे प्रिये ! तेरी समस्त इन्द्रियोंके सन्तुष्ट हो जानेसे तेरा मन भी खूब सन्तुष्ट हो गया है। इस तरह तू इस समय अपने आपमें तृप्त हो रही है इसलिए तेरी आकृति ठीक सिद्ध भगवान्के समान जान पड़ती है फिर भी हे प्रिये ! तुझे क्रोध करना क्या उचित है। इस प्रकार चतुर शब्दोंके द्वारा रामने सीताको समझाया । तदनन्तर प्रसन्न हुई सीताके साथ राजा रामचन्द्रने समस्त इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए अभूतपूर्व सुखका अनुभव किया। सो ठीक ही है क्योंकि कहीं-कहीं क्रोध भी सुखदायी हो जाता है ॥ १३६-१३८ ।। वहीं पर लक्ष्मण भी इसी तरह अपनी स्त्रियोंके साथ रमण करते थे । उस समय कामदेव बड़े हर्षसे उन सबके लिए इच्छानुसार सुख प्रदान करता था ॥१३९॥ इस प्रकार रामचन्द्र चिरकाल तक क्रीड़ा कर सीतासे कहने लगे कि हे प्रिये ! यह सूर्य अपनी किरणोंसे सबको जला रहा है सो ठीक ही है क्योंकि मस्तक पर स्थित हुआ उम प्रकृतिका धारक किसकी शान्तिके लिए होता है ? ॥ १४० ॥ लक्ष्मण के आक्रमण और पराक्रमसे पराजित हुए शत्रुके समान ये वृत्त अपनी छायाको अपने आपमें लीन कर रहे हैं ।॥ १४१ ॥
श्लोक 142 से 151 जल-विहार और शूर्पणखा का आकर्षण
शत्रु राजाओंके परिवारोंके समान इन बच्चों सहित हरिणोंको कहीं भी आश्रय नहीं मिल रहा है इसलिए ये सन्तप्त होकर इधर-उधर घूम रहे हैं ॥ १४२ ॥ इस प्रकार चित्त हरण करनेवाले शब्दोंसे सीताको प्रसन्न करते हुए रामचन्द्र, इन्द्राणीके साथ इन्द्रके समान, सीताके साथ वन-क्रीडा करने लगे ॥ १४३ ॥ रामचन्द्र सीताको कुछ खेद-खिन्न देख सरोवरके पास पहुँचे और सीताको यन्त्रसे छोड़ी हुई जलकी ठण्डी बूँदोंसे सींचने लगे ॥ १४४ ॥ उस समय कुछ-कुछ बन्द हुए चञ्चल नेत्ररूपी नीलकमलोंसे ‘उज्ज्वल सीताका मुख-कमल देखते हुए रामचन्द्रजी बहुत कुछ सन्तुष्ट हुए थे ॥ १४५ ॥ वे बुद्धिमान् राम-चन्द्रजी आलिङ्गन करनेमें उत्सुक तथा मन्द हास्य करती हुई सीताके समीप छाती तक पानी में घुस् -गये थे सो ठीक ही है क्योंकि चतुर मनुष्य इशारोंको अच्छी तरह समझते हैं ।। १४६ ।। वहाँ बहुतसे भ्रमर कमल छोड़कर एक साथ सीताके मुखकमल पर आ झपटे उनसे वह व्याकुल हो उठी। यह देख रामचन्द्रजी कुछ खिन्न हुए तो कुछ प्रसन्न भी हुए ॥ १४७ ॥ इस तरह जलमें चिर-काल तक क्रीड़ा कर और मनोरथ पूर्ण कर रामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके साथ वनके किसी रमणीय स्थानमें जा बैठे ।। १४८ ॥ उसी समय वहाँ शूर्पणखा आई और दोनों राजकुमारोंकी अनुपम शोभाको बड़े आश्चर्यके साथ देखती हुई उन पर अनुरक्त हो गई ॥ १४९ ॥ उस समय सीता बहुत-भारी फूलोंके भारसे झुके हुए किसी सुन्दर अशोक वृक्षके नीचे हरे मणिके शिला-तल पर बैठी हुई थी, आस-पास बैठी हुई सखियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं जिससे वह वन-लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, उसे देख शूर्पणखा कहने लगी कि इसमें रावणका प्रेम होना ठीक ही है ।।१५०-१५१॥
श्लोक 152 से 163 शूर्पणखा का छल और सीता की करुणा
रूप-परावर्तन विद्यासे वह बुढ़िया बन गई उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो सीताका विलास देखनेसे उत्पन्न हुई लज्जाके कारण ही उसने अपना रूप परिवर्तित कर लिया हो ।। १५२ ॥ कवि लोग उसके रूपका ऐसा वर्णन करते थे, और कौतुक सहित ऐसा मानते थे कि विधाताने इसका रूप अपनी बुद्धिकी कुशलतासे नहीं बनाया है अपितु अनायास ही बन गया है। यदि ऐसा न होता तो वह इसके समान ही दूसरा रूप क्यों नहीं बनाता ? ॥ १५३ ॥ सीताको छोड़ अन्य रानियाँ यौवनसे उद्धत हो, वृद्धावस्थाके कारण अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण दिखनेवाली उस बुढ़ियाको देख हँसी करती हुईबोलीं कि बतला तो सही तू कौन है ? और कहाँ से आई है ? इसके उत्तर में बुढ़िया कहने लगी कि मैं इस बगीचाकी रक्षा करनेवालेकी माता हूँ और यहीं पर रहती हूँ ।। १५४-१५५ ।। तदनन्तर उनके चित्तकी परीक्षा करनेके लिए वह फिर कहने लगी कि हे माननीयो ! आप लोगोंके सिवाय जो अन्य स्त्रियाँ हैं वे अपुण्यभागिनी हैं, आप लोग ही पुण्यशालिनी हैं क्योंकि इन कुमारोंके साथ आप लोग भोग भोगनेमें सदा तत्पर रहती हैं। आप लोगोंने पूर्वभवमें कौन-सा पुण्य कर्म किया था, वह मुझसे कहिये। मैं भी उसे करूँगी, जिससे इस राजाकी रानी होकर इसे अन्य रानियोंसे विरक्त कर दूंगी। इस प्रकार उसके वचन सुन सब रानियाँ यह कहती हुई हँसने लगीं कि इसका शरीर ही बुढ़ापासे ग्रस्त हुआ है चित्त तो जवान है और कामते विह्वल है ।। १५६-१५९ ।। इसके उत्तरमें बुढ़िया बोली कि आप लोग कुल, उत्तम रूप तथा कला आदि गुणोंसे युक्त हैं अतः आपको हँसी करना उचित नहीं है। आप सबको एक समान प्रेम रूपी फलकी प्राप्ति हुई है इससे बढ़कर जन्मका दूसरा फल क्या हो सकता है ? आप लोग ही कहें। इस प्रकार कहती हुई बुढ़ियासे वे फिर कहने लगीं कि यदि तेरे जन्मका यही फल है तो हम तुझे अपने-अपने पतिके साथ विधिपूर्वक मिला देंगी । तू बिना किसी विचारके इनकी पट्टरानी हो जाना। इस प्रकार उन स्त्रियोंकी हँसी रूपी वाणोंका निशाना बनती हुई बुढ़ियाको देख सीता दयासे कहने लगी कि तू स्त्रीपना क्यों चाहती है ? जान पड़ता है तू अपना हित भी नहीं समझती ॥ १६०-१६३ ॥
श्लोक 164 से 174 सीता द्वारा स्त्रीजीवन की कठिनाइयों का विवेचन
स्त्रीपनेका अनुभव करती हुई ये सब रानियाँ इसलोकमें अनिष्ट फल प्राप्त कर रही हैं। हे दुर्बुद्धे ! यह स्त्रीपर्याय महापापका फल है। सुनो, यदि कन्याके लक्षण अच्छे नहीं हुए तो उसे कोई भी पुरुष ग्रहण नहीं करता इसलिए शोकसे उसे अपने घर ही रहना पड़ता है। इसके सिवाय कन्याको मरण पर्यन्त कुलकी रक्षा करनी पड़ती है ॥ १६४-१६५ ॥ यदि किसीके पुत्र नहीं हुआ तो जिस घरमें प्रविष्ट हुई और जिस घरमें उत्पन्न हुई- उन दोनों ही घरोंमें शोक छाया रहता है। यदि भाग्यहीन होनेसे कोई वन्ध्या हुई तो उसका गौरव नहीं रहता ॥ १६६ ॥ यदि कोई स्त्री दुर्भगा अथवा कुरूपा हुई तो पति उप्ते छोड़ देता है जिससे सदा तिरस्कार उठाना पड़ता है। रजोदोषसे वह अस्पृश्य हो जाती है- उसे कोई छूता भी नहीं है। यदि कलह आदिके कारण पति उसे छोड़ देता है तो वनमें उत्पन्न हुए वृक्षोंके समान उसे दुःखरूपी दावानलमें सदा जलना पड़ता है। औरकी बात जाने दो चक्रवर्तीकी पुत्रीको भीदूसरेके चरणोंकी सेवा करनी पड़ती है ॥ १६७-१६८ ॥ और सपत्नियोंमें यदि किसीकी उत्कृष्टता हुई तो सदा मानभङ्गका दुःख उठाना पड़ता है। स्वभाव, मुख, वचन, काय, और मनकी अपेक्षा उनमें सदा कुटिलता बनी रहती है ॥ १६९ ॥ गर्भधारण तथा प्रसूतिके समय उत्पन्न होनेवाले अनेक रोगादिकी पीड़ा भोगनी पड़ती है। यदि किसीके कन्याकी उत्पत्ति होती है तो शोक छा जाता है, किसीकी सन्तान मर जाती है तो उसका दुःख भोगना पड़ता है ॥ १७० ॥ विचार करने योग्य खास कार्योंमें उन्हें बाहर रखा जाता है, समस्त कार्योंमें उन्हें परतन्त्र रहना पड़ता है, दुर्भाग्यवश यदि कोई विधवा हो गई तो उसे महान् दुःखोंका पात्र होना पड़ता है। दानशील उपवास आदि परलोकका हित करनेवाले कार्योंके करनेमें उसकी कोई प्रधानता नहीं रहती। यदि स्त्रीके सन्तान नहीं हुई तो कुलका नाश हो जाता है और मुक्ति तो उसे होती ही नहीं है। इनके सिवाय और भी अनेक दोष हैं जो कि सब स्त्रियोंमें साधारण रूपप्ले पाये जाते हैं फिर क्यों तुझे इस निन्द्य स्त्रीपर्यायमें सुखकी इच्छा हो रही है। हे निर्लज्जे ! तू इस अवस्था में भी अपने भावी हितका विचार नहीं कर रही है इससे जान पड़ता है कि तेरी बुद्धि विपरीत हो गई है ॥ १७१-१७४ ॥
श्लोक 175 से 184 सतीत्व की महिमा और शूर्पणखा की असफलता
स्त्री पर्यायमें एक सतीपना ही प्रशंसनीय है और वह सतीपना यही है कि अपने पतिको चाहे वह कुरूप हो, बीमार हो, दरिद्र हो, दुष्ट स्वभाववाला हो, अथवा बुरा बर्ताव करनेवाला हो, छोड़कर ऐसे ही किसी दूसरेकी बात जाने दो, चक्रवर्ती भी यदि इच्छा करता हो तो उसे भी कोढ़ी अथवा चाण्डालके समान नहीं चाहना । यदि कोई ऐसा पुरुष जबर्दस्ती आक्रमण कर भोगकी इच्छा रखता है तो उसे कुलवती स्त्रियाँ दृष्टिविष सर्पके समान अपने सतीत्वके बलसे शीघ्र ही भस्म कर देती हैं ।। १७५-१७७ ।। इस प्रकार सीताके वचन सुनकर शूर्पणखा मनमें विचार करने लगी कि कदाचित् मन्दगिरि-सुमेरु पर्वत तो हिलाया जा सकता है पर इसका चित्त नहीं हिलाया जा सकता। ऐसा विचार कर वह बहुत ही व्याकुल हुई ।। १७८ ॥ और कहने लगी कि हे देवि ! आपके वचन सुननेसे मैं घरका कार्य भूल कर दुःखी हुई, अब जाती हूं ऐसा कहकर तथा उसके चरणोंको नमस्कार कर वह चली गई ॥१७९॥ कार्य पूरा न होनेसे वह रावणके पास खेद-खिन्न होकर पहुंची सो ठीक ही है क्योंकि जिन कार्योंका प्रारम्भ करना अशक्य है उन कार्योंका क्लेशके सिवाय और क्या फल हो सकता है ? ॥ १८० ॥ शूर्पणखाने पहले तो यथायोग्य विधिसे उस रावणके दर्शन किये और तदनन्तर निवेदन किया कि हे देव ! सीता शीलवती है, वह वज्रयष्टिके समान किसी अन्य स्त्रीके द्वारा भेदन नहीं की जा सकती ।। १८१ ॥ इस तरह अपना वृत्तान्त कह कर उसने यह कहा कि मैंने शीलवतीकी क्रोधाग्निके भयसे तुम्झरा अभिमत उसके सामने नहीं कहा ।। १८२ ॥ शूर्पणखाके वचन सुन रावणने वह सब झूठ समझा और अपनी चेष्टा तथा मुखाकृति आदिसे क्रोधाग्निको प्रकट करता हुआ वह कहने लगा कि हे मुग्धे ! ऐसा कौन विषवादी – गारुड़िक है जो सर्पका निःश्वास तथा फणाका विस्तार देख उसके भयसे उसे पकड़ना छोड़ देता है ।।१८३-१८४॥
श्लोक 185 से 193 रावण का हठ और मारीच के साथ प्रस्थान
उसकी बाह्य धीरताके वचन सुनकर ही तू उससे डर गई और यहाँ वापिस चली आई। स्त्रियोंकी चित्तवृत्ति हाथीके कानके समान चञ्चल होती है यह क्या तू नहीं जानती ? ॥ १८५ ॥ मैं नहीं जानता कि तूने इसका चित्त क्यों नहीं भेदन किया । तू उपायमें कुशल नहीं है किन्तु कुशल जैसी जान पड़ती है। ऐसा कह रावणने शूर्पणखाको खूब डॉट दिखाई ।। १८६ ।। इसके उत्तरमें शूर्पणखा कहने लगी कि यदि मैं भोगोपभोगकी वस्तुओंके द्वारा उसका मन अनुरक्त करती तो जो वस्तु वहाँ रामचन्द्रके पास हैं वे अन्यत्र स्वप्नमें भी नहीं मिलती हैं ।। १८७ ।। यदि शूर-वीरता आदिके द्वारा उसे अनुरक्त करती तो रामचन्द्रके समान शूर-वीर पुरुष कहीं नहीं है। यदि वीणा आदिके द्वारा उसे वश करना चाहती तो वह स्वयं समस्त कला और गुणोंमें विशारद है। भूमि पर खड़े हुए लोगोंके द्वारा अपनी हथेलीसे सूर्यमण्डलका पकड़ा जाना सरल है, एक बालकभी पाताल लोकसे शेषनागका हरण कर सकता है॥ १८८-१८९॥ और समुद्र सहित पृथिवी उठाई जा सकती है परन्तु शीलवती स्त्रीका चित्त कामसे भेदन नहीं किया जा सकता । शूर्पणखाके वचन सुनकर रावण पापकर्मके उद्यसे पुष्पक विमान पर सवार हो मन्त्रीके साथ आकाशमार्गसे चल पड़ा। पुष्पक विमान पर साँपकी नई काँचलीकी हँसी करनेवाली निर्मल पता-काएँ फहरा रही थीं उनसे वह लोगोंको ‘यह हंसोंकी पंक्ति है’ ऐसा सन्देह उत्पन्न कर रहा था । सुवर्णकी बनी छोटी-छोटी घण्टियोंके चञ्चल शब्दोंसे वह पुष्पक विमान दिशाओंको मुखरित कर रहा था और मेघोंके साथ ऐसा गाढ़ आलिङ्गन कर रहा था मानो बिछुड़े हुए बन्धुओंके साथ ही आलिङ्गन कर रहा हो । १९०-१९३ ॥
श्लोक 194 से 203 – मायामृग की योजना और राम का वनगमन
उस पुष्पक विमान पर जो ध्वजा-दण्ड लगा हुआ था उसके अग्रभागसे मेघ खण्डित हो जाते थे, उन खण्डित मेघोंसे पानीकी छोटी-छोटी बूँदे झड़ने लगती थीं, मन्द-मन्द वायु उन्हें उड़ा कर ले आती थी जिससे रावणका मार्गसम्बन्धी सब परिश्रम दूर होता जाता था ।। १९४ ।। सीतामें उत्सुक हो पुष्पक विमानमें बैठकर जाता हुआ रावण ऐसा दिखाई देता था मानो शरद् ऋतुके मेघोंके बीचमें स्थित नीलमेघ ही हो ॥ १९५ ॥ जब वह चित्रकूट नामक आनन्ददायी प्रधान वनमें प्रविष्ट हुआ तब ऐसा सन्तुष्ट हुआ मानो सीताके मनमें ही प्रवेश पा चुकाहो ।। १९६ ।। तदनन्तर रावणकी आज्ञासे मारीचने श्रेष्ठ मणियोंसे निर्मित हरिणके बच्चेका रूप बनाकर अपने आपको सीताके सामने प्रकट किया ॥ १९७ ॥ उस मनोहारी हरिणको देखकर सीता रामचन्द्रजीप्ते कहने लगी कि हे नाथ ! यह बहुत भारी कौतुक देखिये, यह अनेक वर्णोंवाला हरिण हमारे मनको अनुरञ्जित कर रहा है ।॥ १९८ ॥ इस प्रकार भाग्यके प्रतिकूल होने पर बुद्धि रहित रामचन्द्र सीताके वचन सुन उसका कुतूहल दूर करनेके लिए उस हरिणको लानेके इच्छासे चल पड़े ॥ १९९ ॥ वह हरिण कभी तो गरदन मोड़ कर पीछेकी ओर देखता था, कभी दूर तक लम्बी छलाङ्ग भरता था, कभी धीरे-धीरे चलता था, कभी दौड़ता था, और कभी निर्भय हो घासके अङ्कुर खाने लगता था ।। २०० ।। कभी अपने आपको इतने पास ले आता था कि हाथसे पकड़ लिया जावे और कभी उछल कर बहुत दूर चला जाता था। उसकी ऐसी चेष्टा देख रामचन्द्रजी कहने लगे कि यह कोई मायामय मृग है मुझे व्यर्थ ही खींच रहा है और कठिनाईसे पकड़नेके योग्य है। ऐसा कहने हुए रामचन्द्रजी उसके पीछे-पीछे चले गये परन्तु कुछ समय बाद ही वह उछल कर आकाशांगण में चला गया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका चित्त स्त्रीके वश है उन्हें करने योग्य कार्यका बिचार कहाँ होता है ? ।। २०१-२०२ ॥ जिस प्रकार घड़ेके भीतर रखा हुआ साँप दुखी होता है उसी प्रकार रामचन्द्रजी आकाशकी ओर देखते तथा अपनी हीनताका वर्णन करते हुए वहीं पर आश्चर्यसे चकित होकर ठहर गये ।। २०३ ।।
श्लोक 204 से 211 : रावण द्वारा मायापूर्वक सीता का हरण और लंका आगमन
अथानन्तर-रावण रामचन्द्रजीका रूप रखकर सीताके पास आया और कहने लगा कि मैंने उस हरिणको पकड़कर आगे भेज दिया है ।। २०४ ।। हे प्रिये ! अब सन्ध्याकाल हो चला है। देखो, यह पश्चिम दिशा सूर्य-बिम्बको धारण करती हुई ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सिन्दूरका तिलक ही लगाये हो ।॥ २०५ ॥ इसलिए हे सुन्दरि ! अब शीघ्र ही सुन्दर पालकीपर सवार होओ, सुख-पूर्वक रात्रि बितानेके लिए यह नगरीमें वापिस जानेका समय है ॥ २०६ ॥ रावणने ऐसा कहा तथा पुष्पक विमानको मायासे पालकीके आकार बना दिया। सीता भ्रान्तिवश उसपर आरूढ़ हो गई ।। २०७ ।। सीताको व्यामोह उत्पन्न करते हुए रावण अपने आपको ऐसा दिखाया मानो घोड़ेपर सवार पृथिवीपर रामचन्द्रजी ही चल रहे हों ।॥ २०८ ॥ इस प्रकार मायाचारमें निपुण पापी रावण उपाय द्वारा पतिव्रताओंमें अग्रगामिनी-श्रेष्ठ सीताको सर्पिणीके समान अपनी मृत्युके लिए ले गया ।॥ २०९ ॥ क्रम क्रमसे लङ्का पहुँचकर उसने सीताको एक बनके बीच उतारा और शीघ्र ही मायादूरकर उसके लानेका क्रम सूचित किया। जिस प्रकार कोई आचार्य अपनी शिष्य-परम्पराके लिए किसी गूढ़ अर्थको बहुत देर बाद प्रकट करता है उसी प्रकार उसने इन्द्रनील मणिके समान कान्ति वाला अपना शरीर बहुत देर बाद सीताको दिखलाया ।। २१०-२११ ।।
श्लोक 212 से 221 : सीता का अटल सतीत्व और रावण का अस्वीकार
उप्ते देखते ही राजपुत्री सीता, भयसे, लज्जासे, और रामचन्द्रके विरहसे उत्पन्न शोकसे तीव्र दुःखका प्रतिकार करनेवाली मूर्च्छाको प्राप्त हो गई ॥ २१२ ॥ शीलवती पतिव्रता स्त्रीके स्पर्शसे मेरी आकाशगामिनी विद्या शीघ्र ही नष्ट हो जावेगी इस भयसे उसने सीताका स्वयं स्पर्श नहीं किया ॥ २१३ ॥ किन्तु चतुर विद्याधरियोंको बुलाकर यह आदेश दिया कि तुमलोग शीतल जल तथा हवा आदिसे इसकी मूर्च्छा दूर करो ॥२१४॥ जब उन विद्याधरियोंके अनेक उपायों से सीताकी मूर्च्छा दूर हुई तब शङ्कासे व्याकुल-हृदय होती हुई वह उनसे पूछने लगी कि आप लोग कौन हैं ? और यह प्रदेश कौन है ? ।। २१५ ।। इसके उत्तर में विद्याधरियाँ कहने लगीं कि हम लोग विद्याधरियाँ हैं, यह मनोहर लङ्कापुरी है, और यह तीन खण्डके स्वामी राजा रावणका वन है। इस संसारमें आपके समान कोई दूसरी स्त्री पुण्यशालिनी नहीं है क्योंकि जिस प्रकार इन्द्राणीने इन्द्रको, सुभद्राने भरत चक्रवर्ती को और श्रीमतीने वजजक्को अपना पति बनाया था उसी प्रकार आप भी इस रावणको अपना पति बना रही हैं। आप सौभाग्यसे महालक्ष्मीके धारक रावणकी स्वामिनी होओ ।। २१६-२१८ ।। इस प्रकार विद्याधरियोंके कहनेपर सीता बहुत ही दुःखी हुई, उसका मन दीन हो गया। वह कहने लगी कि क्या इन्द्राणी आदि स्त्रियाँ अपना शील भङ्गकर इन्द्र आदि पतियोंको प्राप्त हुई थीं ? ॥ २१९ ॥ ऐसी कौनसी स्त्रियाँ हैं जो प्राणोंसे भी अधिक अपने गुणोंको लक्ष्मीके बदले बेच देती हों। रावण तीन खण्डका स्वामी हो, चाहे छह खण्डका स्वामी हो और चाहे समस्त लोकका स्वामी हो ।॥ २२० ॥ यदि वह मेरे आभूषण स्वरूप शीलका खण्डन करनेवाला है तो मुझे उससे क्या प्रयोजन है ? सज्जनोंको प्राण प्यारे नहीं, किन्तु गुण प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होते हैं ।॥ २२१ ॥
श्लोक 222 से 235 : सीता का व्रत, अशुभ उत्पात और रावण का अहंकार
मैं प्राण देकर अपने इन गुणरूपी प्राणोंकी रक्षा करूँगी जीवनकी नहीं। यह नश्वर शरीर भले ही नष्ट हो जावे परन्तु कुला-चलोंका अनुकरण करनेवाला मेरा शील कभी नष्ट नहीं हो सकता’। इस प्रकार प्रत्युत्तर देकर उत्तम शील व्रतको धारण करनेवाली सीताने मनसे विचार किया और यह नियम ले लिया कि जबतक रामचन्द्रजीकी कुशलताका समाचार नहीं सुन लूँगी तबतक न बोलूँगी और न भोजन ही करूँगी ।। २२२-२२४ ।। वैधव्यपना प्रकट न हो इस विचारसे जिसने अपने शरीरपर थोड़ेसे ही आभूषण रख छोड़े थे बाकी सब दूरकर दिये थे ऐसी सीता वहाँ संसारकी दशाका विचार करती हुई रहनेलगी ।। २२५ ।। उसी समय लङ्कामें उसे नष्ट करनेवाले यमराजके किकररीक समान भय उत्पन्न करन-वाले अनेक उत्पात सब ओर होने लगे ॥ २२६ ।। जिस प्रकार यज्ञशालामें बँधे हुए बकराके समीप हरी घास उत्पन्न हो उसी प्रकार रावणकी आयुधशालामें कालचक्रके समान चक्ररत्न प्रकट हुआ । विद्याधरोंका राजा रावण उसके उत्पन्न होनेका फल नहीं जानता था- उसे यह नहीं मालूम था कि इससे हमारा ही घात होगा अतः जिसके अरोंका समूह देदीप्यमान हो रहा है ऐसे उस महाचक्रने उसे बहुत भारी सन्तोष उत्पन्न किया ।। २२७-२२८ ।।
तदनन्तर मन्त्रियोंने उसे समझाया कि ‘रामचन्द्र होनहार बलभद्र हैं, और उनका छोटा भाई लक्ष्मण नारायण होनेवाला है। इस समय उन दोनोंका प्रताप बढ़ रहा हैं और दोनों ही महान् अभ्युदयके सन्मुख हैं। सीता शीलवती स्त्री है, यह जीते जी तुम्हारी नहीं होगी। शीलवान् पुरुषका -तिरस्कार इसी लोकमें फल दे देता है। इसके सिवाय नगरमें अशुभकी सूचना देनेवाले बहुत भारी उत्पात भी हो रहे हैं इसलिए दोनों लोकोंमें अहित करने एवं युगान्ततक अपयश बढ़ानेवाले इस कुकार्यको उसके पहले ही शीघ्र छोड़ दो जबतक कि यह बात सर्वत्र प्रसिद्धिको प्राप्त होती है’। इस प्रकार मन्त्रियोंने युक्तिसे भरे वचन रावणसे कहे। रावण प्रत्युत्तरमें कहने लगा कि ‘इस तरह आप लोग बिना कुछ सोचे-विचारे ही युक्ति-विरुद्ध वचन क्यों कहते हैं ? अरे, प्रत्यक्ष वस्तुमें विचार करनेकी क्या आवश्यकता है? देखो, सीताका अपहरण करनेसे ही मेरे चक्ररत्न प्रकट हुआ है, इसलिए अब तीन खण्डका आधिपत्य मेरे हाथमें ही आगया यह सोचना चाहिये। ऐसा कौन मूर्ख होगा जो घरपर आई हुई लक्ष्मीको पैरसे ठुकरावेगा’। इस प्रकार रावणका उत्तर सुनकर हितका उपदेश देनेवाले सब मन्त्री चुप हो गये ।। २२९-२३५ ।।
श्लोक 236 से 252 : राम का शोक और दशरथ का संदेश
इधर रामचन्द्रजी मणियोंसे बने मायामय मृगका पीछा करते-करते वनमें बहुत आगे चले गये वहाँ वे दिशाओंका विभाग भूल गये और सूर्य अस्ताचलपर चला गया। परिवारके लोगोंने उन्हें तथा सीताको बहुत ढूँढ़ा पर जब वे न दिखे तो बहुत ही खेद-खिन्न हुए। सो ठीक ही है क्योंकि शरीरका वियोग तो सहा जा सकता है परन्तु स्वामीका वियोग कौन सह सकता है ॥२३६-२३७ ।। सबेरा होनेपर मनुष्य-लोकके चक्षुस्वरूप सूर्यका उदय हुआ, अन्धकार मानो भयसे भाग गया, कमलोंके समूह फूल उठे, रात्रिके कारण परस्पर द्वेष रखनेवाले चकवा-चकवियोंके युगल हर्षसे मिलने लगे और जिस प्रकार अर्थ निर्दोष शब्दके साथ संयोगको प्राप्त होता है अथवासूर्य दिनके साथ आ मिलता है उसी प्रकार जानकीवल्लभ रामचन्द्रजी परिवारके लोगोंके साथ आ मिले। परिजनको देखकर राजा रामचन्द्रजीने बड़ी व्यग्रतासे पूछा कि हमारी प्रिया-सीता कहाँ है ? परिजनने उत्तर दिया कि हे देव ! हम लोगोंने न आपको देखा है और न देवीको देखा है । देवी तो छायाके समान आपके पास ही थी अतः आप ही जाने कि वह कहाँ गई ? इस प्रकार परिजनके वचनोंसे प्रवेश पाकर क्षण भरके लिए मनको मोहित करती हुई सीताकी सपत्नीके समान मूर्च्छाने रामचन्द्रको पकड़ लिया – उन्हें मूर्च्छा आ गई ।। २३९-२४२ ।। तदनन्तर-सीताकी सखीके समान शीतोपचारकी क्रियाने राजा रामचन्द्रको मूर्च्छासे जुदा किया और ‘सीता कहाँ है’ ? ऐसा कहते हुए वे प्रबुद्ध-सचेत हो गये ।। २४३ ॥ परिजनके समस्त लोगोंने सीताको प्रत्येक वृक्षके नीचे खोजा पर कहीं भी पता नहीं चला। हाँ, किसी वंशकी झाड़ी में उसके उत्तरीय वस्त्रका एक टुकड़ा फटकर लग रहा था परिजनके लोगोंने उसे लाकर रामचन्द्रजीको सौंप दिया। उसे देखकर वे. कहने लगे कि यह तो सीताका उत्तरीय वस्त्र है, यहाँ कैसे आया ? ॥ २४४-२४५. ।। थोड़ी ही देरमें राम-चन्द्रजी उसका सब रहस्य समझ गये । उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया और वे छोटे भाईके साथ चिन्ता करते हुए वहीं बैठ रहे ॥ २४६ ॥ उसी समय संभ्रमसे भरा एक दूत राजा दशरथके पाससे आकर उनके पास पहुँचा और मस्तक झुकाकर इस प्रकार कार्यका निवेदन करने लगा ॥ २४७ ॥ उसने कहा कि आज महाराज दशरथने स्वप्न देखा है कि राहु रोहिणीको हरकर दूसरे आकाशमें चला गया है और उसके विरहमें चन्द्रमा अकेला ही वनमें इधर-उधर भ्रमण कर रहा है। स्वप्न देखनेके बाद ही महाराजने पुरोहितसे पूछा कि ‘इस स्वप्नका क्या फल है’ ? पुरोहितने उत्तर दिया कि आज मायावी रावण सीताको हरकर ले गया है और स्वामी रामचन्द्र उसे खोजनेके लिए शोकसे आकुल हो वनमें स्वयं भ्रमण कर रहे हैं। दूतके मुखसे यह समाचार स्पष्टरूपसे शीघ्र ही उनके पास भेज देना चाहिये। इस प्रकार पुरोहितने महाराजसे कहा और महाराजकी आज्ञानुसार मैं यहाँ आया हूं। ऐसा कह दूतने जिसमें पत्र रखा हुआ था ऐसा पिटारा रामचन्द्रके सामने रख दिया । रामचन्द्रने उसे शिरसे लगाकर उठा लिया और खोलकर भीतर रखा हुआ पत्र इस प्रकार बाँचने लगे ।। २४८-२५२ ।।
श्लोक 253 से 262 : दशरथ का परामर्श और राम का क्रोध
उसमें लिखा था कि इधर लक्ष्मीसम्पन्न अयोध्या नगरसे लक्ष्मीवानोंके स्वामी महाराज दशरथ प्रेमसे फैलाई हुई अपनी दोनों भुजाओंके द्वारा अपने प्रिय पुत्रोंका आलि-ङ्गनकर तथा उनके शरीरकी कुशल-वार्ता पूछकर यह आज्ञा देते हैं कि यहाँ से दक्षिण दिशाकी ओर समुद्रके बीचमें स्थित छप्पन महाद्वीप विद्यमान हैं जो चक्रवर्तीके अनुगामी हैं अर्थात् उन सबमें चक्रवर्तीका शासन चलता है। नारायण भी अपने माहात्म्यसे उन द्वीपोंमेंसे आधे द्वीपोंकी रक्षा करते हैं ।॥ २५३-२५५ ॥ उन द्वीपोंमें एक लङ्का नामका द्वीप है, जो कि त्रिकूटाचलसे सुशोभित है। उसमें क्रम-क्रमसे राजा विनमिकी सन्तानके चार विद्याधर राजा, जो कि प्रजाकी रक्षा करनेमें सदा तत्पर रहते थे, जब व्यतीत हो चुके तब रावण नामका वह दुष्ट राजा हुआ है जो कि लोकका कण्टक माना जाता है और स्त्रियोंमें सदा लम्पट रहता है ।। २५६-२५७ ॥ तदनन्तर युद्धकी इच्छा रखने वाले नारदने किसी एक दिन रावणके सामने सीताके रूप लावण्य और कान्ति आदिका वर्णन किया । उसी समय रावणका मन कामदेवके अमोघ वाणोंसे खण्डित हो गया। उसकी बुद्धिकी धीरता जाती रही। न्यायमार्गसे दूर रहनेवाला वह मायावी जिस तरह किसी दूसरेको पता न चलै सके इस तरह-गुप्तरूपसे आकर सती सीताको किसी उपायसे अपनी नगरीमें ले गया है सो जबतक हम लोगोंके उद्योग करनेका समय आता है तबतक अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये इस प्रकार प्रिया-सीताके प्रति उसे समझानेके लिए कुमारको अपना कोई श्रेष्ठ दूत भेजना चाहिये’ । ऐसा महाराज दशरथने अपने पत्रमें लिखा था। पिताके पत्रका मतलब समझकर रामचन्द्रका शोक तो रुक गया परन्तु वे क्रोधसे उद्धत हो उठे। वे कहने लगे कि क्या रावण यमराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है ॥ २५८-२६२ ॥
श्लोक 263 से 276 : सहयोगियों का आगमन और सुग्रीव–हनुमान का परिचय
सिंहके बच्चेके साथ विरोध करनेपर क्या खरगोशका जीवन बच सकता है ? सच है कि जिनकी मृत्यु निकट आ जाती है उनकी बुद्धि शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ।॥ २६३ ।। इस प्रकार रोष भरे शब्दों द्वारा रामचन्द्रने क्रोध प्रकट किया। तदनन्तर-लक्ष्मण, जनक, भरत और शत्रुघ्न्न यह समाचार सुनकर रामचन्द्रजीके पास आये और बड़ी विनय सहित उनसे मिलकर युक्तिपूर्ण शब्दों द्वारा उनका शोक दूर करनेके लिए सब एक साथ इस प्रकार कहने लगे ॥ २६४-२६५ ॥ उन्होंने कहा कि रावण चोरीसे परस्त्री हर कर ले गया है इससे उसीका तिरस्कार हुआ है। वह द्रोह करने वाला है, दुष्ट है और अधर्मकी प्रवृत्ति चलानेवाला है। उसने चूंकि बिना विचार किये ही यह अकार्य किया है अतः वह सीताके शापसे जलने योग्य है। महापाप करनेवालोंका पाप इसी लोकमें फल देता है ।॥ २६६-२६७ ॥ अब सीताको वापिस लानेका कोई उपाय सोचना चाहिए । इस प्रकार उन सबके द्वारा समझाये जानेपर रामचन्द्रजी सोयेसे उठे हुएके समान सावधान होगये ॥ २६८ ॥ उसी समय द्वारपालोंने दो विद्याधरोंके आनेका समाचार कहा। राजा रामचन्द्रने उन्हें भीतर बुलाया और उन्होंने योग्य विनयके साथ उनके दर्शन किये ॥ २६९ ॥ होनहार बलभद्र रामचन्द्र भी उनके संयोगसे हर्षित हुए और पूछने लगे कि आप दोनों कुमार यहाँ कहाँ से आये हैं ? और आप कौन हैं? इसके उत्तरमें सुग्रीव कहने लगा कि विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में एक किलकिल नामका नगर है। विद्याधरों में अतिशय प्रसिद्ध बलीन्द्र नामका विद्याधर उस नगरका स्वामी था। उसकी प्रियङ्गुसुन्दरी नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके हम बाली और सुग्रीव नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए । जब पिताका देहान्त हो गया तब बड़े भाई बालीको राज्य प्राप्त हुआ और मुझे क्रमप्राप्त युवराज पद मिला। इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होने पर मेरे बड़े भाई बालीके हृदयको लोभने धर दबाया इसलिए उसने मेरा स्थान छीनकर मुझे देशसे बाहर निकाल दिया । यह तो मेरा परिचय हुआ अब रहा यह साथी। सो यह भी दक्षिण श्रेणीके विद्युत्कान्त नगरके स्वामी प्रभञ्जन विद्याधरका अमिततेज नामका पुत्र है। यह तीनों प्रकारकी विद्याएँ जानता है, अञ्जना देवीमें उत्पन्न हुआ है, और अखण्ड पराक्रमका धारक है ।। २७०-२७६ ॥
श्लोक 277 से 291 : नारद की भविष्यवाणी और हनुमान का दूत बनना
किसी एक समय विद्याधर-कुमारोंके समूहमें परस्पर अपनी-अपनी विद्याओंके माहात्म्यकी परीक्षा देनेकी बात निश्चित हुई। उस समय इसने विजयार्ध पर्वतके शिखर पर दाहिना पैर रखकर बायें पैरसे सूर्यके विमानमें ठोकर लगाई । तदनन्तर उसी क्षण त्रसरेणुके प्रमाण अपना छोटा-सा शरीर बना लिया। यह देख, विद्याधरोंके चित्त आश्चर्यसे भर गये, उसी समय समस्त विद्याधरोंने बड़े हर्षसे इसका ‘अणुमान्’ यह नाम रक्खा । इसने विक्रियारूपी समुद्रका पान कर लिया है अर्थात् यह सब प्रकारकी विक्रिया करनेमें समर्थ है, यह मेरा प्राणोंसे भी अधिक प्यारा मित्र है ॥ २७७-२८० ॥ मैं किसी एक दिन इसके साथ सम्मेदशिखर पर्वतपर गया था वहाँ सिद्धकूट नामक तीर्थक्षेत्रमें अर्हन्त भगवान्की बहुत सी प्रतिमाओंकी भक्ति पूर्वक पूजा वन्दनाकर वहीं पर शुभ भावना करता हुआ बैठ गया। उसी समय वहाँपर विमानमें बैठे हुए नारदजी आ पहुँचे। वे जटाओंका मुकुट धारण कर रहे थे, मोतियोंका यज्ञोपवीत पहिने थे, गेरुवा वस्त्रोंसे सुशोभित थे, उनकी बगल में रत्नोंका कमण्डलु लटक रहा था, वे हाथमें छत्ता लिये हुए थे, नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे, और सदा रौद्रध्यानमें तत्पर रहते थे । उन्होंने आकाशसे उतरकर पहले तो जिन-मन्दिराँकी प्रदक्षिणा दी, फिर जिनेन्द्र भगवान्का स्तवन किया और तदनन्तर वे एकान्त स्थानमें बैठ गये। मैंने उनके पास जाकर पूछा कि हे मुने ! क्या कभी मुझे अपना पद भी प्राप्त हो सकेगा ? इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि राम और लक्ष्मणका बहुत ही शीघ्र आधे भरतका स्वामीपना प्रकट होनेवाला है ॥ २८१-२८६ ॥ यदि तू उनके दूतका कार्य कर देगा तो उन दोनोंके द्वारा तेरा मनोरथ सिद्ध हो जावेगा। उन्हें दूत भेजने का कार्य यों आ पड़ा है कि रामकी स्त्री वनमें विहार कर रही थी उसे रावण छल पूर्वक हरकर ले गया है। इसलिए आज राम और लक्ष्मण अपना कार्य सिद्ध करनेके लिए लङ्का भेजने योग्य किसी पुरुपकी खोज करते हुए बैठे हैं। इस प्रकार नारदके वचन सुनकर हे देव ! बड़े सन्तोषसे हम दोनों आपके पास आये हैं ।॥ २८७-२८९ ॥ दोनों विद्याधरोंके उक्त वचन सुनकर राम-लक्ष्मणने उनका उचित सत्कार किया । तदनन्तर प्रभञ्जनके पुत्र अणुमान् (हनुमान् ) ने प्रार्थना की कि यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं सीता देवीके स्थानकी खोज करूँ। हे राजन् ! देवीको विश्वास उत्पन्न करानेके लिए आप कोई चिह्न बतलाइये ।। २९०-२९१ ॥
श्लोक 292 से 302 : मुद्रिका प्राप्त कर हनुमान का लंका प्रवेश
इस प्रकार उसका कहा सुनकर रामचन्द्रजीको विश्वास हो गया कि विनमिके वंशरूपी आकाशके चन्द्रमास्वरूप इस विद्याधरके द्वारा हमारा अभिप्राय निःसन्देह सिद्ध हो जावेगा ।। २९२ ॥ ऐसा मान राजाने मेरी प्रिया रूप रङ्ग आदिमें ऐसी है यह स्पष्ट बताकर उसके लिए अपने नामसे चिह्नित मुद्रिका (अंगूठी) दे दी ॥ २९३ ॥ अणुमान् रामचन्द्रके चरण-कमलोंको नमस्कार कर आकाशके बीच जा उड़ा और समुद्र तथा त्रिकूटाचलको लांघकर लङ्का नगरमें जा पहुँचा। वह लङ्का नगर बारह योजन लम्बा और नौ योजन चौड़ा था, बत्तीस गोपुरोंसे सहित था, रत्नोंके कोटसे युक्त था, महामेरुके समान ऊँचा था, रावणके महलोंसे सुशोभित था, एवं जिनमें भ्रमर और पुंस्कोकिलाएँ मनोहर शब्द कर रही हैं तथा फूल और पत्ते सुशोभित हैं अतएव जो राग तथा हासके साथ गाते हुएसे जान पड़ते हैं ऐसे बाग-बगीचों से मनोहर था, ऐसे लङ्का नगर में जाकर सीताकी खोजमें तत्पर रहनेवाले अणुमान्ने भ्रमरका रूप रख लिया और क्रम-क्रमसे वह रावणके सभागृह, इन्द्रजित् आदि राजकुमारों तथा मन्दोदरी आदि रावणकी स्त्रियोंको बड़े आदरसे देखता हुआ वहाँ पहुँचा जहाँ रावण विद्यमान था ॥ २९४-२९९ ॥ तदनन्तर नमस्कार करते हुए समस्त विद्याधर राजाओंके मुकुटोंकी मालाओंसे जिसके चरण-कमल पूजित हैं, जो सिंहासनके मध्यमें बैठा है, सिंहके समान पराक्रमी है, इन्द्रके समान है, दुरते हुए चमरोंसे जो ऐसा जान पड़ता है मानो गङ्गाकी विशाल तरङ्गोंसे सुशोभित नीलाचल ही हो और जिसने समस्त शत्रुओंको रुला दिया है ऐसे रावणको देखकर अणुमान्ने सोचा कि इस पापीके यह ऐसा ही विचित्र कर्मका उदय है जिससे प्रेरित हो इसने धर्मका उल्लंघनकर परस्त्रीकी इच्छा की ॥ ३००-३०२ ॥
श्लोक 303 से 317 : अणुमान द्वारा सीता का दर्शन
नारदने जो कहा था कि इसका अकालमरण होनेवाला है सो ठीक ही कहा था । इस प्रकार विचार करते हुए अणुमान्ने रावणकी सभामें सीता नहीं देखी ॥ ३०३ ॥ धीरे-धीरे सूर्यकी प्रभा मन्द पड़ गई, दिन अस्त हो गया और सूर्य रावणके लिए यह सूचना देता हुआ ही मानो अस्ताचलकी ओर चला गया कि संसारमें जितने सहायक हैं वे सब प्रायः सम्पत्तिशा-लियोंकी ही सहायता करते हैं और संसारमें जितने प्राणी हैं उन सबका उदय और अस्त नियमसे होता है ॥ ३०४-३०५ ॥ इस प्रकार सब ओरसे चिन्तवन करता हुआ वह रामचन्द्रका दूत अणुमान् अन्तःपुरके पश्चिम गोपुरपर चढ़कर नन्दन नामका वन देखने लगा। वह नन्दन वन भ्रमरोंके शब्दसे सुशोभित था, उसमें समस्त ऋतुओंकी शोभा बिखर रही थी, साथ ही नन्दन-बनके समान जान पड़ता था, फल और फूलोंके बोझसे झुके हुए सुन्दर सुन्दर वृक्षों, मन्दमन्द वायुसे उड़ती हुई नाना प्रकारके फूलोंकी परागों, कृत्रिम पर्वतों, सरोवरों, बावलियों, तथा लताओंसे सुशोभित मण्डपों और कामको उद्दीपित करनेवाले अन्य अनेक स्थानोंसे अन्यन्त मनोहर था। उसे देख वह अणुमान् कुछ देर तक हर्ष और कौतुकके साथ वहां खड़ा रहा ॥ ३०६-३०९ ॥ वहीं किसी समीपवर्ती स्थानमें उसने सीताको देखा । उस सीताको साम आदि उपायोंके द्वारा वश करनेके लिए अभिप्रा-यानुकूल चेष्टाओंको जानने वाली अनेक विद्याधरियाँ घेरे हुई थीं। वह शिंशपा वृक्षके नीचे शोकसे व्याकुल हुई बैठी थी, चुप चाप ध्यान कर रही थी, मरकर अथवा जीर्ण शीर्ण होकर भी कुलकी रक्षा करनेमें प्रयत्नशील थी, तथा ऐसी जान पड़ती थी मानो शीलकी-पातिव्रत्य धर्मकी माला ही हो । ऐसी सीताको देख अणुमान्ने विचार किया कि यह वही सीता है जिसे रावण हरकर लाया है। उसने राजा रामचन्द्रजीके द्वारा बतलाये हुए चिह्नोंसे उसे पहिचान लिया और साथ ही यह विचार किया कि मेरे पुण्योदयसे ही मुझे आज इस सतीके दर्शन हुए हैं। दर्शन करनेसे उसे बड़ा अनुराग उत्पन्न हुआ । उसने समझा कि जिस प्रकार दावानलके द्वारा कल्पलता संतापित होती है उसी प्रकार पापी रावणके द्वारा यह सती सन्तापित की गई है। इस प्रकार उसका वित्त यद्यपि शोकसे सन्तप्त होगया तथापि वह नीतिमार्गमें विशारद होनेसे सोचने लगा कि जो विवेकी मनुष्य अपने प्रारम्भकिये हुए कर्मको सिद्ध करनेमें उद्यत रहता है उसे क्रोध करना एक प्रकारका व्यसन है और कार्यमें विघ्न्न करनेवाला है ऐसा नीतिज्ञ मनुष्य कहते हैं। इसलिए असमयमें क्रोध करना व्यर्थ है ऐसा विचारकर उसने क्षमा धारण की और उस पतिव्रताको अपने आनेका समाचार बतलानेके लिए अवसरकी प्रतीक्षा करता हुआ वह वहीं कुछ समयके लिए खड़ा हो गया। उसी समय चन्द्रमाका उदय हो गया और वह उद्याचल के शिखर पर चूडामणिके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३१०-३१७ ।।
श्लोक 318 से 332 : रावण का प्रलोभन और सीता की अडिग निष्ठा
उसी समय ‘आज सीताको लाये हुए सात दिन बीत चुके हैं अतः देखना चाहिये कि उसकी क्या दशा है’ ऐसा विचार करता हुआ रावण वहाँ आया। वह अनेक दीपिकाओंसे आवृत था -उसके चारों ओर अनेक दीपक जल रहे थे इसलिए वह ऐसा जान पड़ता था मानो देदीप्यमान कल्पवृक्षोंसे सहित चलता फिरता नीलगिरि ही हो। वह उत्कण्ठासे सहित था तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंसे युक्त था ॥ ३१८-३१९ ॥ ‘मैं अपने पतिका कुशल समाचार कब सुनूँगी’ ऐसा विचार करती हुई सीता चुपचाप स्थिर बैठी हुई थी। उसे रावण बड़ी देर तक आश्चर्यसे देखता रहा और त्रियोंके बीच ऐसी पतिव्रता स्त्री कोई दूसरी नहीं है ऐसा विचार कर वह कुछ पीछे हटकर दूर खड़ा रहा। वहींसे उसने सीताका अभिप्राय जाननेके लिए अपनी मञ्जरिका नामकी विवेकवती दूती उसके पास भेजी। वह दूती सीताके पास आकर विनयसे कहने लगी कि हे स्वामिनी, विद्याधरोंके राजा रावणकी पाँच हजार स्त्रियाँ हैं जो विद्याधर राजाओंकी पुत्रियाँ हैं और तुम्हारे ही समान मनोहर हैं। तुम उन सबकी स्वामिनी होकर महादेवीके पदपर स्थित होओ और तीन खण्डके स्वामी राबणके बक्षःस्थलपर चिरकाल तक लक्ष्मीके साथ साथ निवास करो ।। ३२०-३२४ ।। बिजलीके समान चञ्चल अपने इस यौवनको निष्फल न करो। ‘रावणके हाथसे राम तुम्हें बापिस ले जावेगा’ इस विचारको तुम कदम्बके विशाल बनके समान निष्फल समझो । भूखसे पीड़ित सिंहके मुखके भीतर वर्तमान मृगको छुड़ानेके लिए कौन मनुष्य समर्थ है ? इस प्रकार उस मञ्जरिका नामकी दूतीने कहा सही परन्तु सीता उसे सुनकर पृथिवीके समान ही निश्चल बैठी रही सो ठीक ही है क्योंकि पतिव्रता स्त्रीको भेदन करनेके लिए कौन समर्थ हो सकता है ? उसे निश्चल देख रावण स्वयं डरते डरते पास आकर कहने लगा कि यदि तू कुलकी रक्षा करनेके लिए बैठी है तो यह बात विचार करनेके योग्य नहीं है। यदि लज्जा आती है तो वह नीच मनुष्योंके संसर्गसेहोती है अतः यहाँ ज्सकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।। ३२५-३२९ ।। यदि राममें तेरा प्रेम है तो तू उसे अब मरे हुएके समान समझ । जो चिरकालसे परिचित है उसे इस समय एकदद्म कैसे भूल जाऊँ ? यदि यह तेरा कहना है तो इस संसारमें किसका किसके साथ परिचय नहीं है? कदाचित् यह सोचती हो कि राम यहाँ आकर मुझे ले जावेंगे सो यह भी ठीक नहीं हैं क्योंकि समुद्र तो यहाँकी खाई है, त्रिकूटाचल किला है, विद्याधर लोकपाल हैं, लङ्का नगर है, मेघनाद आदि योद्धा हैं और मैं उनका स्वामी हूँ फिर तुम्हारे रामका यहाँ प्रवेश ही कैसे हो सकता है ? ॥ ३३०-३३२ ॥
श्लोक 333 से 353 : रावण का क्रोध और मन्दोदरी का उपदेश
इसलिए हे प्रिये ! रामकी आशा छोड़कर मेरी आशा पूर्ण करो। जो कार्य अवश्य ही पूर्ण होने-वाला है उसमें समय बितानेसे तुझे क्या लाभ है ? ॥ ३३३ ॥ तू चाहे रो और चाहे हँस, मैं तो तेरा पाहुना हो चुका हूं। हे सुन्दरी ! तू मेरी सुन्दर स्त्रियोंके समूहमें चूडामणिके समान हो ।॥ ३३४ ॥ यदि तू अभाग्य वश मेरा कहना नहीं मानेगी तो तुझे आज ही मेरी घटदासी बनना पड़ेगा अथवा यमराजके घर रहनेवालोंका अतिथि होना पड़ेगा ।। ३३५ ॥ इस तरह जिस प्रकार पुण्यहीन मनुष्य लक्ष्मीको वश करने के लिए व्यर्थ ही बकवास करता है उसी प्रकार उस रावणने सीताको वश करनेके लिए व्यर्थ ही बकवास किया। उसे सुनकर सीता निश्चल चित्त हो धर्म्यध्यानके समान निर्मलता धारण करती हुई निश्चल बैठी रही। रावणके मुखसे निकले हुए वचन-समूहरूपी अग्निकी पंक्ति सीताके धैर्यरूपी समुद्रको पाकर शीघ्र ही उसी समय शान्त हो गई। उस समय रावण सोचने लगा कि ‘मैं जिस प्रकार पराक्रमके द्वारा समस्त पुरुषोंको जीतता हूँ उसी प्रकार अपनी सौभाग्य-रूपी सम्पदाके द्वारा समस्त स्त्रियोंको भी जीतता हूं- उन्हें अपने वश कर लेता हूं फिर भी यह सीता मेरा तिरस्कार कर रही है’ ऐसा विचारकर रावण क्रोध करने लगा। सीतारूपी लताको शीघ्र ही जलानेके लिए रावणके मनरूपी युद्धस्थलमें जो प्रचण्ड क्रोधरूपी दावानल फैल रही थी उसे मन्दोदरीने हितकारी तथा सुननेके योग्य वचनरूपी अमृत जलसे शान्तकर कहा कि आप इसतरह साधारण पुरुषके समान अस्थानमें क्यों क्रोध करते हैं ? जरा सोचो तो सही, यह स्त्री क्या आपके दण्ड देने योग्य मालूम होती है ? अरे, मन्दारवृक्ष के फूलोंसे बनी हुई माला क्या अग्निमें डाली जानेके योग्य है ? आप यह याद रखिये कि सती स्त्रियोंका तिरस्कार करनेसे आकाशगामिनी आदि विद्याएँ निश्चित ही नष्ट हो जाती हैं और ऐसा होनेसे आप पक्षरहित पक्षीके समान हो जायेंगे। पहले स्वयंप्रभाके लिए अश्वग्रीव विद्याधर, पद्मावतीके कारण राजा मधुसूदन और सुतारामें आसक्त हुआ निर्बुद्धि अशनिघोष पराभवको पा चुका है अतः आप भी उन जैसे मत होओ। ऐसा मत सम-झिये कि मैं सौतके भयसे ऐसा कह रही हूँ। आप मेरे वचनको प्रमाण मानते हुए सीता सम्बन्धी मोह छोड़ दीजिये। ऐसा मन्दीदीने रावणसे कहा । रावण उसके वचनोंका उत्तर देनेमें समर्थ नहीं हो सका अतः यह कहता हुआ कुपित हो नगर में वापिस चला गया कि अब तो यह प्राणोंके साथ ही छोड़ी जा सकेगी ॥ ३३६-३४७ ॥ इधर जो अपनी छोड़ी हुई पुत्रीके शोकसे युक्त है ऐसी मन्दोदरी सीतासे एकान्तमें कहने लगी कि जिस पुत्रीको मैंने निमित्तज्ञानीके आदेशके डरसे पृथिवीमें नीचे गड़वा दिया था वही कलह करनेके लिए मेरी पुत्री तू आ गई है ऐसा मेरा मन मानता है। हे भद्रे ! तू दुःख देने वाले पापी विधाताके द्वारा यहाँ लाई गई है। सो ठीक ही है क्यों कि इस लोकमें प्रायः विधाताकी चेष्टाका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। मालूम नहीं पड़ता कि तू मेरी इस जन्मकी सम्बन्धिनी है अथवा पर जन्मकी सम्बन्धिनी है। न जाने क्यों तुझे देखकर आज मेरा स्नेह बढ़ रहा है। हे कमललोचने ! बहुत कुछ सम्भव है कि मैं तेरी माँ हूँ और तू मेरी पुत्री है, यह तू भी समझ रही है। परन्तु यह विद्याधरोंका राजा तुझे मेरी सौत बनाना चाहता है इसलिए हे बच्चे ! चाहे मरणको भले ही प्राप्त हो जाना परन्तु इसके मनोरथको प्राप्त न होना, इसकी इच्छानुसार काम नहीं करना। इस प्रकार कहती हुई मन्दोदरी बहुत ही उत्सुक हो गई। उसके स्तनोंसे दूध झरने लगा और उसके स्तनयुगल सीताका अभिषेक करनेके लिए ही मानो नीचेकी ओर झुक गये ॥ ३४८-३५३ ॥
श्लोक 354 से 364 : मन्दोदरी की करुणा और अणुमान का आगमन
उसका कण्ठ गद्गद हो गया, दोनों नेत्रोंसे स्नेहको सूचित करनेवाला जल गिरने लगा और उस समय उसका मुखकमल शोकरूपी अग्निसे मलिन हो गया ॥ ३५४ ॥ यह सब देख सीताको ऐसा लगने लगा मानो मैं अपनी माताके पास ही आ गई हूं, उसका हृदय आर्द्र हो गया और नेत्र आँसुओंसे भर गये ।। ३५५ ।। उसका अभिप्राय जानकर रावणकी पट्टरानी मन्दोदरी कहने लगी कि यदि तू अपना कार्य अच्छी तरह सिद्ध करना चाहती है तो हे माँ ! मैं हाथ जोड़कर याचना करती हूँ, तू आहार ग्रहण कर, क्योंकि सबका साधन शरीर है और शरीरका साधन आहार है ।। ३५६-३५७ ॥ चतुर मनुष्य यही कहते हैं कि यदि वृक्ष नहीं होगा तो फूल आदि कहाँ से आवेंगे ? इसी प्रकार शरीरके रहते ही तुझे तेरे स्वामी रामचन्द्रका दर्शन हो सकेगा ।। ३५८ ॥ यदि उनका दर्शन साध्य न हो तो इस शरीरसे महान् तप ही करना चाहिये। यह सब कहनेके बाद मन्दोदरीने यह भी कहा कि यदि मेरे वचन नहीं मानती है तो मैं भी भोजन छोड़े देती हूं। मन्दोदरीके वचन सुनकर सीताने विचार किया कि यद्यपि यह मेरी माता नहीं है तथापि माताके समान ही मेरे दुःखसे दुःखी हो रही है। ऐसा विचारकर वह मन ही मन मन्दोदरीके चरणोंको नमस्कारकर उनकी ओर बड़े स्नेहसे देखने लगी। उसे ऐसी देख मन्दोदरी सोचने लगी कि मंजूषामें रखते समय जिस प्रकार मेरी पुत्री मेरी ओर देख रही थी उसी प्रकार आज यह सीता मेरी ओर देख रही है। इस पतिव्रताका यह मधुर दर्शन मुझे सब ओरसे सन्तप्त कर रहा है। इस प्रकार शोकको प्राप्त हुई मन्दोदरीने सीताके दुःखसे विनम्र हो आप्तजनोंके साथ साथ नगरमें बड़े दुःखसे प्रवेश किया । तदनन्तर उसी शिंशपा वृक्षपर बैठे हुए दूत अणुमान्ने प्लवेग नामक विद्याके द्वारा अपना बन्दर जैसा रूप बना लिया और वनकी रक्षा करनेवाले पुरुषोंको निद्रासे युक्तकर वह स्वयं सीतादेवीके आगे जा खड़ा हुआ ॥ ३५९-३६४ ॥
श्लोक 365 से 382 : अणुमान का संदेश और राम की तैयारी
वानर रूपधारी अणु-मान्ने सीताको नमस्कारकर उप्से अपना सब वृत्तान्त सुना दिया और कहा कि मैं राजा रामचन्द्र-जीके आदेशसे, जिसके भीतर पत्र रखा हुआ है ऐसा यह एक पिटारा ले आया हूं। इतना कह उसने वह पिटारा सीता देवीके आगे रख दिया। वानरको देखकर सीताको सन्देह हुआ कि क्या यह मायामयी शरीरको धारण करनेवाला नीच रावण ही है ? ॥ ३६५-३६६ ॥ इस प्रकार सीता संशय कर रही थी कि उसकी दृष्टि श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित एवं अपने पतिके नामाक्षरोंसे अङ्कित रत्नमयी अंगूठीपर जा पड़ी। उसे देख वह फिर भी संशय करने लगी कि मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह दुष्ट रावणकी ही माया है। क्या है? यह कौन जाने, परन्तु यह पत्र तो उन्हींका है और मेरे भाग्यसे ही यहाँ आया है ऐसा सोचकर उसने पत्रपर लगी हुई मुहर तोड़कर पत्र बाँचा। पत्र बाचते ही उसका शोक नष्ट हो गया। वह स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखकर कहने लगी कि तूने मुझे जीत्रित रक्खा है अतः मेरे पिताके पदपर अधिष्ठित है – मेरे पिताके समान है। जब सीताने उक्त वचन कहे तब पवनपुत्र अणुमान्ने अपने कान ढककर उत्तर दिया कि हे माता ! आप मेरे स्वामीकी महादेवी हैं, इसपर अन्य कल्पना न कीजिये । हे पतिव्रते ! यद्यपि तुम्हें आज ही ले जानेकी मेरी शक्ति है तथापि स्वामीकी आज्ञा नहीं है। राजा रामचन्द्रजी स्वयं ही आकर रावणको मारेंगे और उसकी लक्ष्मीके साथ साथ तुम्हें ले जावेगें । उस साहसपूर्ण कार्यसे उनकी कीर्ति तीनों लोकोंमें व्याप्त होकर रहेगीअतः शरीर धारण करनेके लिए आहार ग्रहण करो ।। ३६५-३७३ ॥ हे भगवति ! आहार ग्रहण करनेमें क्या दोष है ? राजा रामचन्द्रके साथ तुम्हारा समागम शीघ्र ही हो जावेगा । इस प्रकार जब अणुमान्ने कहा तब सीताने उदासीनता छोड़कर शीघ्र ही शरीरकी स्थितिके लिए आहार ग्रहण करना स्वीकृत कर लिया और उस समयके योग्य कार्यों के कहनेमें कुशल सीताने उस दूतको शीघ्र ही बिदा कर दिया ।।३७४-३७५।। दूत-अणुमान् भी सीताके चरणकमलोंको नमस्कार कर सूर्योदयके समय चला और अपने आगमनकी प्रतीक्षा करनेवाले रामचन्द्रके समीप शीघ्र ही पहुँच गया ।॥ ३७६।। उसने पहुँचते ही पहले अपने मुखकमलकी प्रसन्नतासे रामचन्द्रजीको कार्यसिद्धिकी सूचना दी फिर उन्हें प्रणाम किया। स्वामी रामचन्द्रने उसे अच्छी तरह आलिङ्गन कर आसन पर बैठनेके लिए कहा। जब वह हर्ष पूर्वक आसन पर बैठ गया तब रामचन्द्रने उससे पूछा कि क्यों मेरी प्रिया देखी है? उत्तर में अणुमान्ने राम-बम्द्रको प्रीति उत्पन्न करनेवाले उत्कृष्ट वचन विस्तारके साथ कहे। वह कहने लगा कि रावण स्वभाव से ही अहङ्कारी है फिर उसके चक्ररत्न भी प्रकट हो गया है। इसके सिवाय लङ्कामें बहुतसे अपशकुन हो रहे हैं और उसके विद्याधर सेवक बहुत ही कुशल हैं। इन सब बातोंका मन्त्रियोंके साथ अच्छी तरह विचार कर जिस तरह सम्भव हो उसी तरह सीताको लानेके उपायका शीघ्र ही निश्चय करना श्राहिये । इस प्रकार यह योग्य कार्य अणुमान्ने सूचित किया। बलिष्ठ अभिप्रायको धारण करनेवाले रामचन्द्रने अणुमान्के कहे वचनोंका हृदयमें अच्छी तरह विचार किया। उसी समय उन्होंने अणुमान्-को सेनापतिका पट्ट बाँधा और सुग्रीवको युवराज बनाया ॥ ३७७-३८२ ॥
श्लोक 383 से 401 : विभीषण के माध्यम से सामोपाय का निर्णय
तदनन्तर उन्होंने उन दोनोंके साथ-साथ मन्त्रीसे करने योग्य कार्यका निर्णय पूछा। उत्तर में अङ्गदने कहा कि हे स्वामिन् ! राजा तीन प्रकारके होते हैं- १ लोभ-विजय, २ धर्म-विजय और ३ असुर-विजय । नीतिके जानने-वाले विद्वान् अपना कार्य सिद्ध करनेके लिए, पहलेके लिए दान देना, दूसरेके साथ शान्तिका व्यवहार करना और तीसरेके लिए भेद तथा दण्डका प्रयोग करना यही ठीक उपाय बतलाते हैं। इन तीन प्रकारके राजाओंमें रावण अन्तिम असुरविजय राजा है। वह नीच होनेसे क्रूर कार्य करने-ब्राला है इसलिए नीतिज्ञ मनुष्योंको उसके साथ भेद और दण्ड उपायका ही यद्यपि प्रयोग करना चाहिये तो भी क्रमका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए। सर्व प्रथम उसके साथ सामका ही प्रयोग करना चाहिए ।। ३८३-३८६ ।। यदि आप इसका निश्चय करना चाहते हैं कि ऐसा सामका जाननेबाला कौन है जिसे वहाँ भेजा जावे ? तो उसका उत्तर यह है कि यद्यपि दक्षता – चतुरता आदि गुणोंसे सहित अनेक भूमिगोचरी राजा हैं परन्तु उनमें आकाशमें चलनेकी सामर्थ्य नहीं है इसलिए आपने जो यह नया सेनापति बनाया है इसे ही भेजना चाहिए ॥ ३८७-३८८ ॥ इस अणुमान्ने मार्ग देखा है, इसे दूसरे दबा नहीं सकते, एक बार यह कार्य सिद्ध कर आया है, अनेक शास्त्रोंका जान-कार है तथा जाति आदि विद्याओंसे सहित है, इसलिए इससे कार्यका निर्णय अवश्य ही हो जावेगा ॥३८९॥ अङ्गदके इस उपदेशसे रामचन्द्रने मनोवेग, विजय, कुमुद और हितकारी रविगतिको सहायक बनाकर अणुमान्का आदर-सत्कार कर उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि हे कुमार ! यहाँ आपके सिवाय कार्यको जाननेवाला तथा कायको करनेवाला दूसरा नहीं है। राजा रामचन्द्रने अणुमान्से यह भी कहा कि तुम सर्वप्रथम विभीषणसे कहना कि इस लङ्का द्वीपमें आपही धर्मके जानकार हैं, विद्वान हैं और कार्यके परिपाक-फलको जाननेवाले हैं। लङ्काके ईश्वर रावण और सूर्यवंशके प्रधान रामचन्द्र दोनोंका हित करनेवाले हैं, इसलिए आप रावणसे कहिए- जो तू सीताको हरकर लाया है सो तेरा यह कार्य अन्यायपूर्ण है, कल्पान्तकाल तक अपयश करनेवाला है, तथा अहितकारी है। इस प्रकार रतिसे मोहित रावणको सुनाकर आप सीताको छुड़ा दीजिये । ऐसा करने पर आप अपने कुलकी पापसे, विनाशसे तथा अपवादसे स्वयं ही रक्षा कर लेंगे। इस प्रकारकी सामोक्तियोंसे यदि विभी-षण वशमें हो गया तो शत्रु अपने वशमें ही समझिये । हे दूतोत्तम ! इतना ही नहीं, लक्ष्मीके साथ-साथ सीता भी आई हुई ही समझिए। इसके सिवाय और जो कुछ करने योग्य कार्य हों उनका तथा शत्रुके समाचारोंका निर्णय कर शीघ्र ही मेरे पास वापिस आओ ॥ ३९०-३९६ ॥ इस प्रकार कह-कर रामचन्द्रने अणुमान्को सहायकोंके साथ बिदा किया। कुमार अणुमान् भी रामचन्द्रको नमस्कार कर गया और शीघ्र ही लङ्का पहुँच गया। वहाँ उसने सब समाचार जानकर विभीषणके दर्शन किये और विनयपूर्वक कहा कि ‘मैं राजा रामचन्द्रके द्वारा आपके पास भेजा गया हूँ’ ऐसा कहकर उसने, रामचन्द्रने जो कुछ कहा था वह सब बड़ी विनयके साथ विभीषणसे निवेदन कर दिया ॥३९७-३९८।। साथ ही उसने अपनी ओरसे यह बात भी कही कि हे विद्याधरोंके ईश ! आप स्वामीका सन्देश लानेवाले तथा हित करनेवाले मुझको रावणके पास तक भेज दीजिये । आपसे रामचन्द्रके इष्ट-कार्यकी सिद्धि अवश्य हो जावेगी और ऐसा हो जानेपर यह कार्य मेरे द्वारा आपसे ही सिद्ध हुआ सीताको नहीं छोड़ता कहलावेगा ।। ३९९-४०० ॥ आपके द्वारा ऐसा कहे जानेपर भी वह मूर्ख यदिहै तो इसमें आपका अपराध नहीं है वह पापी अपने आप ही नष्ट होगा ॥ ४०१ ॥
श्लोक 402 से 412 : विभीषण द्वारा दूत-परिचय और राम का सन्देश
इस समय जिनकी लक्ष्मी बढ़ रही है ऐसे रामचन्द्रको देख उनके पुण्यसे प्रेरित हुई तथा ‘हम लोगोंको दोनों लोकोंका एक कल्याण करनेवाले रामचन्द्रजीकी शरण जाना चाहिए, इस प्रकार अनुरागसे भरी रणकी भावनासे ओतप्रोत पचास करोड़ चौरासी लाख भूमिगोचरियोंकी सेना और साढ़े तीन करोड़ विद्याधरोंकी सेना स्वयं ही उनसे आ मिली है। वे रामचन्द्र इतनी सब सेना तथा लक्ष्मणको साथ लेकर स्वयं ही यहाँ आ पहुँचेंगे। यद्यपि वे सीताके समान विद्याधरोंके राजा रावणकी लक्ष्मीको भी आज ही हरनेमें समर्थ हैं किन्तु उनका आपमें स्वाभाविक प्रेम है इसीलिए उन्होंने मुझे भेजा है। क्या आप इस तरहके सत्र समाचार नहीं जानते ? इस प्रकार अणुमान्के वचन सुनकर कार्यको जाननेवाला विभीषण उसी समय उसे रावणके समीप ले जाकर निवेदन करने लगा कि हे देव ! रामचन्द्रने यह दूत आपके पास भेजा है ॥ ४०२-४०७ ॥ बुद्धिमान् तथा स्पष्ट और मधुर शब्द बोलनेवाले अणुमान्ने भी विनयपूर्वक रावणके दर्शन किये, योग्य भेंट समर्पित की। तदनन्तर रावणके द्वारा बतलाये हुए आसन पर बैठकर श्रवण करनेके योग्य हित मित शब्दों द्वारा उसने इस प्रकार कहना शुरू किया कि हे देव, सुनिये ॥ ४०८-४०९॥ जो अपने तेजसे बढ़ रहे हैं, जिनकी बुद्धि तथा साहस सबको अपने अनुकूल बनानेवाला है, गुण ही जिनके आभूषण हैं तथा जो कुशल युक्त हैं ऐसे राजा रामचन्द्रने इस समय अयोध्यानगर में ही विराजमान होकर तीन खण्डके एक स्वामी आपका पहले तो कुशल-प्रश्न पूछा है और फिर यह कहला भेजा है कि आप सीताको किसी दूसरेकी समझ कर ले आये हैं। परन्तु वह मेरी है, आप बिना जाने लाये हैं इसलिए कुछ बिगड़ा नहीं है। आप बुद्धिमान् हैं अतः उसे शीघ्र भेज दीजिए ॥ ४१०-४१२ ।।
श्लोक 413 से 422 | : अणुमान् की नीति-युक्त सलाह और रावण का अहंकार
यदि आप सीताको न भेजेंगे तो विनम्ि वंशके एक रत्न और महात्मा स्वरूप आपका यह विचित्र कार्य धर्म तथा सुखका विधात करनेवाल होगा ।। ४१३ ।। कुलीन पुत्ररूपी महासागरको यह कलङ्क धारण करना उचित नहीं है। अत सीताको छोड़ने रूप बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके द्वारा इसे बाहर फेंक देना चाहिए ॥ ४१४ ॥ अणुमान्के यह वचन सुनकर रावणने उत्तर दिया कि मैं सीताको बिना जाने नहीं लाया हूं किन्तु जानकर लाय हूं। मैं राजा हूं अतः सर्वं रत्न मेरे ही हैं और विशेष कर स्त्रीरत्न तो मेरा ही है। तुम्हारे राजरामचन्द्रने जो कहला भेजा है कि सीताको भेज दो सो क्या ऐसा कहना उसे योग्य है ।। ४१५-४१६ ॥ [ वह अभिमानियोंमें बड़ा अभिमानी मालूम होता है। वह मेरी श्रेष्ठ-ताको नहीं जानता है। ‘मेरे चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है’ यह समाचार क्या उसके कानोंके समीप तक नहीं पहुँचा है? भूमिगोचरियों तथा विद्याधर राजाओंके मुकुटों पर मेरे चरण-युगल, स्थल-कमल – गुलाबके समान सुशोभित होते हैं यह बात आबाल-गोपाल प्रसिद्ध है–बड़ेसे लेकर छोटे तक सब जानते हैं। सीता मेरी है यह बात तो बहुत चौड़ी है किन्तु समस्त विजयांर्ध पर्वत तक मेरा है। मेरे सिवाय सीता किसी अन्यकी नहीं हो सकती। तुम्हारा राजा जो इसे ग्रहण करना चाहता है वह पराक्रमी नहीं है- शूर-वीर नहीं है। इस सीताको अथवा अन्य किसी स्त्रीको ग्रहण करनेकी उसमें शक्ति है तो वह यहाँ आवे और युद्धके द्वारा मुझे जीत कर शीघ्र ही सीताको ले जावे । कौन मना करता है?१] इस प्रकार भाग्यकी प्रेरणासे रावणके नाशको सूचित करनेवाले वचन सुनकर अणुमान्ने मनमें विचार किया कि इस समय रामचन्द्रके अभ्युदयको प्रकट करनेवाले शुभ सूचक निमित्त हो रहे हैं और इस विषयमें मुझे भी यही इष्ट है- मैं चाहता हूँ कि रामचन्द्र यहाँ आकर युद्धमें रावणको परास्त करें और अपना अभ्युदय बढ़ावें ।॥ ४१७-४१८ ।। तदनन्तर वह अणुमान् रामचन्द्रकी ओरसे दुष्ट और दुराचारी रावणसे फिर कहने लगा कि ‘आप अन्यायको रोकनेवाले हैं, यदि रोकनेवालेको ही रोकना पड़े तो समुद्र में बड़वानलके समान उसे कौन रोक सकता है ? यह सीता अभेद्य है-इसे कोई विचलित नहीं कर सकता और मैं सिंहके समान पराक्रमी प्रसिद्ध रामचन्द्र हूँ ।। ४१९-४२० ।। इस अकार्यके करनेसे जब तक चन्द्रमा रहेगा तबतक आपकी निष्प्रयोजन अकीर्ति बनी रहेगी इस बातका भी आपको विचार करना उचित है। मैंने भाईपनेके सम्बन्धसे आपके लिए हितकारी वच्चन कहे हैं। हे स्वामिन् ! यदि आपको रुचिकर हों तो ग्रहण कीजिए अन्यथा मत कीजिये।’ इस प्रकार दूत-अणुमान्के। वचन सुनकर रावण फिर कहने लगा ।। ४२१-४२२ ।।
श्लोक 423 से 435 : दूत का अपमान और युद्ध की अनिवार्यता
कि ‘चूँकि राजा जनकने अहंकार वश मुझे सूचना दिये बिना ही यह सीता रूपी रत्न रामचन्द्रके लिए दिया था इसलिए क्रोधसे मैं इसे ले आया हूं ॥ ४२३ ॥ मेरे योग्य वस्तु स्वीकार करनेसे यदि मेरी अकीर्ति होती है तो हो। वह रामचन्द्र तो मेरे हाथसे चक्ररत्न भी ग्रहण करना चाहता है’ इस प्रकार रावणने कहा। तदनन्तर अणुमान् रावणके कहे अनुसार उससे प्रसन्न तथा गम्भीर वचन कहने लगा कि सीता मैंने हरी है यह आप क्यों कहते हैं? यह सब जानते है कि जिस समय आपने सीता हरी थी उस समय वह किसके हाथमें थी किसके पास थी ? आप सीताको हर कर नहीं लाये हैं किन्तु चुरा कर लाये हैं। अतः यह कहिये कि इस कार्यसे क्या आपकी शूर-वीरता प्रकट होती है ? अथवा इन व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ है। आप मीठे वचनोंसे ही रानी सीताको शीघ्र वापिस कर दीजिये ।। ४२४-४२७ ।। इस प्रकार अणुमान्से उत्पन्न हुए तिरस्कार सूचक रूपी अग्निसे जिसका हृदय संतप्त हो रहा है ऐसा पुष्पक विमानका स्वामी रावण कहने लगा कि ‘रामचन्द्र, दृष्टिविष सर्पके फणामणिको ग्रहण करनेकी इच्छा करनेवाले पुरुषकी गतिको प्राप्त करना चाहता है–मरना चाहता है। तू दूत होनेके कारण मारने योग्य नहीं है अतः यहाँ से चला जा, चला जा, इस प्रकार रावणने सिंहको जीतनेवाली अपनी गर्जनासे अणुमान्को ललकारा । तदनन्तर कुम्भ, निकुम्भ एवं क्रूर प्रकृतिवाले कुम्भकर्ण आदि योद्धाओंने इन्द्रजित्, इन्द्रचर्म, अति-कन्यार्क, खरदूषण, खर, दुर्मुख, महामुख आदि विद्याधरोंने और क्रुद्ध हुए अन्य कुमारोंने अणुमान् को बहुत ही ललकारा। तब अणुमान्ने कहा कि स्त्रीजनोंके सामने इस व्यर्थकी गर्जनासे क्या लाभहै ? इससे कौनसा कार्य सिद्ध होता है ? आप लोग मेरा उत्तर संग्राममें ही सुनिये । यह सुन नयोंके जाननेवाले विभीषणने उन क्रुद्ध विद्याधरोंको रोकते हुए कहा कि यह दुर्वचन कहना ठीक नहीं है। विभीषणने अणुमान्से भी कहा कि हे भद्र ! तुम अपने घर जाओ। अकार्य करनेके कारण जिसे आर्य मनुष्योंने छोड़ दिया है ऐसे इस रावणको कोई नहीं रोक सकता – यह किसीकी बात मानने-वाला नहीं है। ठीक ही है आगे आने वाले शुभ-अशुभ कर्मके उदद्यको भला कौन रोक सकता है ? इस प्रकार विभीषणने कहा तब अणुमान्, जिसने आहार पानी छोड़ रक्खा था ऐसी सीताके पास गया ।॥ ४२८-४३५ ।।
श्लोक 436 से 452 : युद्ध की तैयारी और बाली का प्रस्ताव
मन्दोदरीके उपरोधसे सीताने कुछ थोड़ा-सा खाया था उसे देख अणुमान् शीघ्र ही समुद्रको पार कर रामचन्द्रके समीप आ गया ॥ ४३६ ॥ और नमस्कार कर कहने लगा कि बहुत कहनेसे क्या लाभ है? सबका सारांश यह है कि रावण सीताको नहीं छोड़ेगा इसलिए इसके अनुरूप कार्य करना चाहिए, विलम्ब मत कीजिए, क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य निश्चित किये हुए कार्यमें शीघ्रता करनेकी प्रशंसा करते हैं- जो कार्य निश्चित किया जा चुका है उसे शीघ्र ही कर डालना चाहिए । अणुमान्की बात सुनकर इक्ष्वाकु वंशके सिंह रामचन्द्र अपनी चतुरङ्ग सेनाके साथ चित्रकूट नामक वनमें जा पहुँचे। वे यद्यपि शीघ्र ही लंकाकी ओर प्रयाण करना चाहते थे तथापि समयको
बलवान् मानकर उन्होंने वर्षाऋतु वहीं बिताई ।। ४३७-४३९ ।। जब रामचन्द्र चित्रकूट वनमें निवास कर रहे थे तब राजा बालिका दूत उनके पास आया और प्रणाम करनेके अनन्तर भेंट समर्पित करता हुआ बड़ी सावधानीसे यह कहने लगा ।। ४४० ॥ कि हे देव! मेरे स्वामी राजा वाली बहुत ही बलवान् हैं। वे आपसे इस प्रकार निवेदन कर रहे हैं कि यदि पूज्यपाद महाराज रामचन्द्र मुझे दूत बनाना चाहते हैं तो सुग्रीव और अणुमान्को दूत न बनावें क्योंकि वे दोनों बहुत थोड़ा कार्य करते हैं। यदि आप मेरा पराक्रम देखना चाहते हैं तो आप यहीं ठहरिये, मैं अकेला ही लङ्का जाकर और रावणका मानभङ्ग कर आर्या जानकीको आज ही लिये आता हूँ ।। ४४१-४४३ ॥ इस प्रकार बालिके दूतके वचन सुनकर रामचन्द्र ने साम और भेदको जानने वाले मन्त्रियोंसे पूछा कि किष्किन्धा नगरके राजा बालीको क्या उत्तर दिया जावे ।। ४४४ ॥ इस प्रकार मन्त्रि-समूहसे पूछा। तब सर्वप्रिय एवं सर्व प्रशंसित अङ्गदने कहा कि शत्रु, मित्र और उदासीनके भेदसे राजा तीन प्रकार के होते हैं। इन तीन प्रकारके राजाओंमें रावण हमारा शत्रु है, और बालि मित्रका शत्रु है। यदि हम लोग उसके कहे अनुसार कार्य नहीं करेंगे तो वह शत्रुके साथ सन्धि कर लेगा उसके साथ मिल जावेगा ।। ४४५-४४६ ।। और ऐसा होनेसे शत्रुकी शक्ति बढ़ जायगी जिससे उसका उच्छेद करना दुःख-साध्य हो जायगा। यदि बालिकी बात मानते हैं तो यह कार्य आपके लिए कठिन है ।। ४४७ ॥ इसलिए सबसे पहले किष्किन्धा नगरीके स्वामीके नाश करनेका काम जबर्दस्ती आपके लिए आ पड़ा है इसके बाद शक्ति और सम्पत्ति बढ़ जानेसे रावणका नाश सुखपूर्वक किया जा सकेगा ।। ४४८ ॥ इस प्रकार अंगदके वचन स्वीकृत कर रामचद्रने बालिके दूतको बुलाया और कहा कि आपके यहाँ जो महामेघ नामका श्रेष्ठ हाथी है वह मेरे लिए समर्पित करो तथा मेरे साथ लङ्काके लिए चलो, पीछे आपके इष्ट कार्यकी चर्चा की जायगी। ऐसा कह कर उन्होंने बालिके दूतको बिदा किया और उसके साथ ही अपना दूत भी भेज दिया ।। ४४९-४५० ।। वे दोनों ही दूत जाकर सुग्रीवके बड़े भाई बालिके पास पहुँचे और उन्होंने रामचन्द्रका संदेश सुनाकर उसे बहुत ही कुपित कर दिया। तब मदसे उद्धत हुआ बालि कहने लगा कि इस तरह मुझपर आक्रमण करनेवाले रामचन्द्र क्या स्त्रीको अपहरण करनेवाले रावणको नष्ट कर तथा सीताको वापिस लाकर दिशाओंमें अपना यशफैला लेंगे ? ।। ४५१-४५२ ।।
श्लोक 453 से 462 : बाली का विरोध और युद्ध का आरम्भ
स्त्रीका अपहरण करनेवाले रावणके लिए तो इन्होंने शान्तिके वचन कहला भेजे हैं और जो मिलकर इनके साथ रहना चाहता है ऐसे मेरे लिए ये कठोर शब्द कहला रहे हैं। इनकी बुद्धि और शूर-वीरता तो देखो कैसी है ? ॥ ४५३ ॥ गर्वसे भरी हुई वालिकी इस नीच भाषाको सुनकर रामचन्द्रके दूतने कहा कि रावण चोरीसे परस्त्री हर कर ले गया है सो उस उन्मार्गगामीको दोनों अपराधोंके अनुरूप जो दण्ड दिया जावेगा उसे आप शीघ्र ही देखेंगे । अथवा इससे आपको क्या प्रयोजन ? यदि आपको महामेघ हाथी देना इष्ट है तो इस दुष्ट अहंकारको छोड़-कर वह हाथी दे दो और स्वामीकी सेवा करो। ऐसा करनेसे आप अवश्य ही शीघ्र वृद्धिको प्प्राप्त होंगे। इस प्रकार कह कर दूतने बालिको क्रोधसे प्रज्वलित कर दिया ॥ ४५४-४५६ ॥ तब यमराजका अनुकरण करनेवाला बालि उत्तर में निम्न प्रकार कठोर वचन कहने लगा। उसने कहा कि ‘यदि राम-चन्द्रको जीनेकी आशा है तो हाथीकी आशा छोड़ दें, यदि जीनेकी आशा नहीं है तो युद्धमें मेरे सामने आवें और उन्हें हाथी पर बैठनेकी ही इच्छा है तो मेरे चरणोंकी सेवाको प्राप्त हों फिर मेरे साथ इस हाथी पर बैठ कर गमन करें।’ इस प्रकार बालिका विनाश करनेवाली उसकी अशुभ वाणी को सुनकर वह दूत उसी समय बालिको नष्ट करनेवाले बलवान् रामचन्द्रके पास वापिस आ गया और कहने लगा कि बालि प्रतिकूलतासे आपका कृत्रिम शत्रु प्रकट हुआ है ।। ४५७-४५९ ।। उस विरोधीके रहते हुए आपका मार्ग चोरोंके मार्गके समान दुर्गम है अर्थात् जब तक आप उसे नष्ट नहीं कर देते हैं तब तक आपका लङ्काका मार्ग सुगम नहीं है। इस प्रकार जब दूत कह चुका तब रामचन्द्रने लक्ष्मणको नायक बनाकर सुग्रीव आदिकी सेना खदिर-वनमें भेजी। जिसमें शस्त्रोंके समूह देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसी विद्याधरोंकी सेनाने सामने आई हुई बालिकी सेनाको उस तरह काट डाला जिस तरह कि बत्र बनको काट डालता है- नष्ट कर देता है। जब सेना नष्ट हो चुकी तब बालि अपनी सम्पूर्ण शक्ति अथवा समस्त सेनाके साथ स्वयं युद्ध करनेके लिए आया ।। ४६०-४६२ ।।
श्लोक 463 से 472 : बाली-वध और लङ्का-प्रयाण
कालके समान लीला करनेवाली दोनों सेनाओंमें फिरसे भयंकर युद्ध होने लगा और काल उस युद्धमें प्रलयके समान प्रायः तृप्त हो गया ॥ ४६३ ॥ अन्तमें लक्ष्मणने कान तक खींच कर छोड़े हुए तीक्ष्ण सफेद वाणसे ताल वृक्षके फलके समान बालिका शिर काट डाला ॥ ४६४ ॥ उसी समय सुग्रीव और अणुमान्को अपना स्थान मिल गया सो ठीक ही है क्योंकि अच्छी तरह की हुई प्रभुकी सेवा प्रायः शीघ्र ही फल देती है ।। ४६५ ।। तदनन्तर सब लोग राजा रामचन्द्रके पास गये । सुग्रीव, रामचन्द्रको लक्ष्मण और सब सेनाके साथ-साथ बड़ी भक्तिसे अपने नगरमें ले आया और किष्किन्धा नगरके मनोहर उद्यानमें उन्हें ठहरा दिया। उस समय शरद् ऋतु आ गई थी और रामचन्द्र के साथ राजाओंकी चौदह अक्षौहिणी प्रमाण सेना इकट्ठी हो गई थी ।। ४६६-४६७ ।। जहाँ से शिवघोष मुनिने मोक्ष प्राप्त किया था ऐसे जगत्पाद नामक पर्वत पर जाकर लक्ष्मणने सात दिन तक निराहार रहकर पूजा की और प्रज्ञप्ति नामकी विद्या सिद्ध की। विद्या सिद्ध करते समय एक सौ आठ योद्धाओंने उसकी रक्षा की थी। इसी प्रकार सुग्रीवने भी उस समय उत्तम व्रत और उपवास धारण कर सम्मेदा-चल पर सिद्धशिलाके ऊपर महाविद्याओंकी पूजा की। इनके सिवाय अन्य विद्याधरोंने भी अपनी अपनी विद्याओंकी पूजा की। इस प्रकार जिसमें ध्वजाएँ फहरा रही हैं, राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और अणुमान् जिसमें प्रधान हैं, जो बड़े बड़े हाथीरूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त है, और घोड़े ही जिसमें बड़ी-बड़ी तरंगे हैं ऐसे प्रलयकालके समुद्रके समान वह भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजाओंकी सेना लङ्काके लिए रवाना हुई ।। ४६८-४७२ ॥
श्लोक 473 से 484 : विभीषण का धर्मोपदेश
अथानन्तर- जब अणुमान् लङ्कासे लौट आया था तब कुम्भकर्ण आदि भाइयोंने रावणसे कहा था कि ‘हे प्रभो ! आप हमारे उच्च वंशमें सूर्यके समान देदीप्यमान हैं और आपका पौरुष भी सर्वत्र प्रसिद्ध है अतः आपको यह कार्य करना उचित नहीं है। यह स्त्रीरत्न उच्छिष्ट है इसलिए हमलोगोंके अनुरोधसे आप इसे छोड़ दीजिए।’ इस प्रकार सबने कहा परन्तु चूँकि रावण सीता में आसक्त था इसलिए उसे छोड़ नहीं सका। वह फिर कहने लगा कि रामचन्द्र तृण-मनुष्य हैं- तृणके समान अत्यन्त तुच्छ हैं, ‘उनकी सेना सीताको लेनेके लिए यहाँ हमारे ऊपर आ रही है’ ऐसे शब्द आज सुनाई दे रहे हैं इसलिए सीताको कैप्ते छोड़ा जा सकता है, यह बात तो कुलको कलङ्क लगाने वाली है ।। ४७३-४७६ ।। रावणका छोटा भाई विभीषण उसकी यह बात सह नहीं सका अतः कहने लगा कि आप रामचन्द्रको तृणमनुष्य मानते हैं पर सूर्यवंशीय रामचन्द्रकी क्या शूर-वीरता है इसका आपको पता नहीं है। आप कामसे अन्धे हो रहे हैं इसलिए भाइयोंके हितकारी वचन नहीं सुन रहे हैं। आप परस्त्रीके समर्पण करनेको दोष बतला रहे हैं इसलिए मालूम होता है कि आप दोषोंके जानकारोंमें श्रेष्ठ हैं ? (व्यङ्गथ) ।। ४७७-४७८ ॥ परस्त्रीग्रहण करना शूर-वीरता है, संसारमें इस बातका प्रारम्भ आपसे ही हो रहा है। आप जो अपनी दुर्बुद्धिसे मिथ्या उत्तर दे रहे हैं उससे क्या दोनों लोकोंमें भय उत्पन्न करनेवाले एवं दुर्धर उन्मार्गकी प्रवृत्ति नहीं होगी और सुमार्ग-का विनाश नहीं होगा ? जो विषय निषिद्ध नहीं है उनका भी त्याग करनेकी आपकी अवस्था है फिर जरा विचार तो कीजिये इस अवस्थामें निषिद्ध विषयकी इच्छा करना क्या आपके योग्य है ? आप यह निश्चित समझिये कि यह विद्याधरोंकी लक्ष्मी आपके गुणोंकी प्रिया है। यदि आप सीताको वापिस नही करेंगे तो निर्गुण समझ कर यह आपको आज ही छोड़ देगी। पर-स्त्रीकी अभिलाषा करने रूप इस अकार्यसे आप अपने आपको अकार्य करनेवालोंमें अग्रणी- मुखिया क्यों बनाते हैं ? इस समय आप इस दुष्ट प्रवृत्तिसे पापका संचय कर पुण्यके प्रतिकूल हो रहे हैं, पुण्यके प्रतिकूल रहनेसे दैव अनुकूल नहीं रहता और दैवके बिना लक्ष्मी कहाँ प्राप्त हो सकती है ? पर-स्त्रीका हरण करना यह पाप सब पापोंसे बड़ा पाप है ।। ४७९-४८४ ॥
श्लोक 485 से 493 : पाप के परिणाम और भविष्यवाणी का स्मरण
अधिक विस्तारके साथ कहनेमें क्या लाभ है ? यह पाप आपको सातवें नरक ले जावेगा। अथवा इसे जाने दो, यह पाप पर भवमें दुःख देगा परन्तु शीलकी भाण्डारभूत स्त्रियाँ अपने प्रति क्रोध करनेवालोंके कुलको शापके द्वारा इसी भवमें आमूल नष्ट करनेके लिए समर्थ रहती हैं। आपने व्रत लिया था कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे नहीं चाहूंगा। आपका यह एक व्रत ही आपको संसाररूपी समुद्रसे पार करनेके लिए जहाजके समान है इसे क्यों नष्ट कर रहे हो? सज्जन पुरुषोंको प्राण देकर यश खरीदना चाहिए परन्तु आप ऐसे अज्ञानी हैं कि प्राण और यश देकर दूसरे कल्प काल तक टिकनेवाला पाप तथा अपयश खरीद रहे हैं अतः आपके लिए धिक्कार है। यह सीता किसकी पुत्री है यह क्या आप नहीं जानते ? ठीक ही है जिनका चित्त कामसे मोहित रहता है उनके लिए जानी हुई बात भी नहीं जानीके समान होती है। क्या आप यह नहीं जानते कि ये पश्चेन्द्रियोंके विषय जबतक प्राप्त नहीं हो जाते तब तक इनमें उत्सुकता रहती है, प्राप्त हो जानेपर सन्तोष होने लगता है, और जब इनका उपभोग कर चुकते हैं तब नीरसता आ जाती है। इसलिए अयोग्य, अनाथ, विनाशका कारण, पाप और दुःखका सञ्चय करनेवाली परस्त्री में व्यर्थका प्रेम मत कीजिए । भविष्यत्की बात जाननेवाले निमित्तज्ञानियोंने कैसा आदेश दिया था- क्या कहा था इसका भी आपको स्मरण करना चाहिए ।। ४८५-४९१ ।। तथा चक्र उत्पन्नके फलका भी विचार कीजिए। पुराणोंके जाननेवाले रामको आठवाँ बलभद्र और लक्ष्मणको नौवाँ नारायण कहते हैं। हे विद्वन् ! आप इसका भी विचार कीजिए । सीताको नहीं सौंपनेमें जैसा दोष है वैसा दोष उसके सौंपनेमें नहीं है ।। ४९२-४९३ ॥
श्लोक 494 से 501: विभीषण का निष्कासन और राम की शरणागति
इसलिए इन सब बातोंकानिश्चय कर सीता रामचन्द्रके लिए सौंप दीजिये। इस प्रकार विभीषणने अच्छी तरह विचार कर यशको चन्द्रमा के समान उज्ज्वल करनेके लिए लक्ष्मीरूपी लताको बढ़ानेवाले तथा धर्म और सुख देनेवाले उत्कृष्ट वचन कहे। परन्तु इस प्रकारके उत्तम वचन कहनेवाले विभीषणके लिए वह भयङ्कर रात्रण कुपित होकर कहने लगा कि ‘तूने दूतके साथ मिलकर पहले सभाके बीच मेरा असहनीय तिरस्कार किया था और इस समय भी तू दुर्वचन बोल रहा है। तू मेरा भाई होनेसे मारने योग्य नहीं है इसलिए जा मेरे देशसे निकल जा’। इस प्रकार रावणने बहुत ही कठोर शब्द काहे ॥ ४९४-४९७ ॥ रावणकी बात सुनकर विभीषणने विचार किया कि इस दुराचारीका नाश अवश्य होगा, इसके साथ मेरा भी नाश होगा और यह अपयश करनेवाला नाश मुझे दूषित करेगा ।। ४९८॥ इसने तिरस्कार कर मुझे देशसे निकाल दिया है यह अच्छा ही किया है क्योंकि मुझे यह इष्ट ही है। ‘बादल जङ्गलमें ही बरसे’ यह कहावत आज मेरे पुण्यसे सम्पन्न हुई है। अब मैं रामचन्द्रके चरणकमलोंके समीप ही जाता हूँ। इस प्रकार चित्तमें विभीषणने विचार किया और ऐसा ही निश्चय कर लिया ।। ४९९-५०० ।। वह शीघ्र ही सौजन्यकी तरह समुद्रके जलका उल्लङ्घन कर गया और जिस प्रकार किसी महानदीका प्रवाह समुद्रके पास पहुँचता है उसी प्रकार वह रामचन्द्रके समीप जा पहुँचा ।। ५०१ ।।
श्लोक 502 से 515 अणुमान द्वारा लंका पर आक्रमण और वन-विनाश
रामचन्द्रने तरङ्गोंकी लीला धारण करनेवाले लक्ष्मण आदि अनेक बड़े-बड़े योद्धाओं को विभीषणकी अगवानी करनेके लिए भेजा और वे सब परीक्षा कर तथा विश्वास प्राप्त कर उसे ले आये । विभीषण भी रामचन्द्रके प्रभावको समझता था अतः उनके साथ एकीभावको प्राप्त हो गया – हिलमिल गया। तदनन्तर कुछ ही पड़ाव चलकर रामचन्द्रकी सेना समुद्रके तटपर आ पहुंची और चारों ओर ठहर गई। उस समय अणुमान्ने परस्पर रामचन्द्रसे इस प्रकार कहा कि हे देव ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपनी शूर-वीरता प्रकट करनेकी इच्छासे लङ्कामें जाऊँ और बनका नाश कर आपके शत्रुका मान भङ्ग करूँ ।। ५०२-५०५ ।। साथ ही लङ्काको जलाकर शत्रुके शरीर में दाह उत्पन्न करूँ। ऐसा करने पर वह अहङ्कारी रावण अभिमानी होनेसे यहाँ आवेगा और उस दशामें स्थान-भ्रष्ट होनेके कारण वह सुखसे नष्ट किया जा सकेगा। यदि यहाँ नहीं भी आवेगा तो उसके प्रतापकी अति तो अवश्य होगी। अणुमान्की यह विज्ञप्ति सुनकर राजा रामचन्द्रने वैसा कस्नेकी अनुमति दे दी और शूर-वीरतासे सुशोभित अनेक विद्याधरोंको उसका सहायक बना दिया । रामचन्द्रकी आज्ञा पाकर अणुमान् बहुत सन्तुष्ट हुआ। उसने वानर-विद्याके द्वारा शीघ्र ही अनेक भयङ्कर वानरोंकी सेना बनाई और उसे साथ ले शीघ्र ही समुद्रका उल्लङ्घन किया। वहाँ वह अपने पराक्रमसे वन-पालकोंको पकड़ कर उनका निग्रह करने लगा और क्रोधसे उसने रावणक समस्त वन नष्ट कर डाला। तब वनके रक्षक लोग अपनी भुजाएँ ऊँची कर जोर-जोरसे चिल्लाते हुए नगरीमें गये और जो कभी नहीं सुने थे उन भयङ्कर शब्दोंको सुनाने लगे। उस समय राक्षस-विद्यावे प्रभावसे फहराती हुई ध्वजाओंके समूहसे उपलक्षित नगरके रक्षक लोग अणुमान्से युद्ध करनेवे लिए उसके सामने आये। यह देख अणुमान्ने भी वानर-सेनाके सेनापतियोंको आज्ञा दी और तदनुसार वे सेनापति लोग वनके वृत्त उखाड़कर उन्हींसे प्रहार करते हुए उन्हें मारने लगे । तदनन्तर बलवान् अणुमान्ने नगरके बाहर स्थित राक्षसोंकी रूखी सेनाको अपनी देदीप्यमान महाज्वाल नामकी विद्यासे वहाँका वहीं भस्म कर दिया। इस प्रकार वानर सेनाका सेनापति अणुमान्, रावण के दुर्बार प्रताप रूपी ऊँचे वृक्षको उखाड़ कर रामचन्द्र के समीप वापिस आ गया। इधर रामचन्द्र तबतक सेनाको तैयार कर युद्धके सन्मुख खड़े हो गये ।। ५०६-५१५ ॥
श्लोक 516 से 531 रावण की विद्यासिद्धि और अहंकार
उस समय उन्होंने विभीषण से पूछा कि रावण किस कारणसे नहीं आया है ? तदनन्तर विभीषणने उत्तर दिया कि इस समय रावण लङ्कामें नहीं है। बालिका परलोक गमन और सुग्रीव तथा अणुमान्के विद्याबलका अभिमान सुनकर उसने अपनी रक्षाके लिए इन्द्रजित् नामक पुत्रको नियुक्त किया है तथा आठ दिनका उपवास लेकर और इन्द्रियोंको अच्छी तरह वश कर आदित्यपाद नामके पर्वत पर विद्याएँ सिद्ध करता हुआ बैठा है। राक्षसादि महाविद्याओंके सिद्ध हो जानेपर वह बहुत ही शक्तिसम्पन्न हो जावेगा। इसलिए इस समय हम लोगोंका यही काम है कि उसकी विद्यासिद्धिमें विघ्न किया जाय और लङ्का को घेरकर ठहरा जाय, इस प्रकार विभीषणने रामचन्द्रसे कहा । तदनन्तर सुग्रीव और अणुमान् ने अपने द्वारा सिद्ध की हुई गरुड़वाहनी, सिंहवाहनी, बन्धमोचनी और हननावरणी नामकी चार विद्याएँ अलग-अलग रामचन्द्र और लक्ष्मणके लिए दीं। इसके बाद दोनों भाइयोंने प्रज्ञप्ति नामकी विद्यासे बनाये हुए अनेक विमानोंके द्वारा अपनी उस बड़ी भारी सेनाको लङ्कानगरीके बाहर मैदानमें ले जाकर खड़ी कर दी। उसी समय कितने ही विद्याधर कुमार रामचन्द्रकी आज्ञासे आदित्यपाद नामक पर्वत पर जाकर उपद्रव करने लगे । तब रावणके बड़े पुत्र इन्द्रजित्ने क्रोधमें आकर विद्याधर राजाओं तथा पहले सिद्ध किये हुए समस्त देवताओंको यह आदेश देकर भेजा कि तुम सब लोग मिलकर इनसे युद्ध करो। इन्द्रजित्की बात सुनकर विद्या-देवताओंने कहा कि हमलोगोंने आपकेपुण्योदयसे इतने समय तक आपका वाब्छित कार्य किया परन्तु अब आपका पुण्य क्षीण हो गया ‘है इसलिए आपके कहे अनुसार कार्य करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। जब उक्त विद्या-देवताओंने रावण-से इस प्रकार स्पष्ट कह दिया तब रावण उनसे कहने लगा कि आप लोग जा सकती हैं, आप नीच देवता हैं, आपसे मेरा कौन-सा कार्य सिद्ध होनेवाला है? मैं अपने पुरुषार्थसे ही इन मनुष्य रूपी हरिणोंको विद्याधरोंके साथ-साथ अभी मार डालता हूं ॥ ५१६-५२७ ।। सहायकोंके द्वारा सिद्ध किया हुआ कार्य अभिमानी मनुष्योंके लिए लज्जा उत्पन्न करता है। इस प्रकार क्रुद्ध होकर रावण उसी समय इन्द्रजित्के साथ नगर में आ गया। देखो, जिसका पुण्य नष्ट हो चुकता है ऐसे दुश्चरित्र मनुष्यका भूत और भावी सब नष्ट हो जाता है। नगरमें आनेपर उसने परिवारके लोगोंसे ज्ञात किया कि शत्रुओंने लङ्काको घेर लिया है ॥ ५२८-५.२९ ॥ उस समय रावण कहने लगा कि समयकी विपरीतता तो देखो, हरिणोंने सिंहको घेर लिया है। अथवा जिनकी मृत्यु निकट आ जाती है उनके स्वभावमें विभ्रम हो जाता है ।। ५३० ॥ इस प्रकार किसी ऊँचे हाथी पर आक्रमण करनेवाले सिंहके समान गरजते हुए रावणने हरिणकी ध्वजा धारण करनेवाले अपनी रविकीर्ति नामक सेनापतिको आदेश दिया ॥ ५३१॥
श्लोक 532 से 542 रावण की युद्ध-तैयारी
कि युद्धके लिए शत्रुपक्षका क्षय करनेवाली भेरी बजा दो। उसने उसी प्रकार रणभेरी बजा दी और कल्पकालके अन्तमें यमराजके दूतके समान अपनी समस्त सेना इकट्ठी की। तदनन्तर सेनाका अलग-अलग विभाग कर रावण लङ्कासे बाहर निकला ।। ५३२-५३३ ॥ उस समय वह सुकुम्भ, निकुम्भ, कुम्भकर्ण तथा अन्य भाइयोंमें सबसे मुख्य इन्द्रजित्, इन्द्रकीर्ति, इन्द्रवर्मा तथा अन्य राजपुत्रोंसे एवं महाबलवान् महामुख, अतिकाय, दुर्मुख, खरदूषण और धूम आदि प्रमुख विद्याधरोंसे घिरा हुआ था अतः दुष्ट ग्रहोंसे घिरे हुए ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान जान पड़ता था और तीनों जगत्को प्रसनेके लिए सतृष्ण यमराजकी लीलाको विडम्बित कर रहा था। वह कह रहा था कि राम और लक्ष्मण मेरे सामने खड़ा होनेके लिए समर्थ नहीं हैं। अरे, बहुतसे खरगोश और शृगाल इकट्ठे हो जायें तो क्या वे सिंहके सामने खड़े रहे सकते हैं ? आज उनके जीते जी यह संसार रावणसे रहित भले ही हो जाय परन्तु मैं उनके साथ इस पृथिवीका पालन कदापि नहीं करूँगा। इस प्रकार अतर्कित रूपसे उपस्थित अपने अमङ्गलको बह रावण स्वयं कह रहा था ॥ ५३४-५.३९ ॥ उस समय वह कालमेघ नामक मदा मदोन्मत्त हाथीके ऊपर सवार था, प्रतिकूल (सामनेकी ओरसे आनेवाली) वायुसे ताड़ित होकर फहराती हुई राक्षस-ध्वजाओंसे सुशोभित था, उसके आगे-आगे चक्ररत्न देदीप्यमान हो रहा था, उसके छत्रसे सूर्य आच्छादित हो गया था – सूर्यका आताप रुक गया था और उसने अपने अनेक प्रकार के बड़े-बड़े नगाड़ोंके शब्दसे दिग्गजोंके कान बहिरे कर दिये थे। इस प्रकार उस ओर मदसे उद्धत हुआ रावण युद्धके लिए तैयार होकर खड़ा हो गया और इस ओर रामचन्द्र उसके आनेकी बात सुनकर क्रोधसे झूमने लगे ।। ५४०-५४२ ।।
श्लोक 543 से 551 राम-लक्ष्मण का धर्मपूर्वक युद्ध-प्रस्थान
वह उस समय अत्यन्त दुर्निवार थे और क्रोध रूपी अग्निके द्वारा मानो शत्रुको जला रहे थे। उनके नेत्रोंके समीपसे जो जलती हुई दृष्टि निकल रही थी वह वाणोंके समान जान पड़ती थी और उसे वे जलते हुए अंगारोंके समान युद्ध करनेके लिए दिशाओंमें बड़ी शीघ्रतासे फेंक रहे थे । महाविद्याओंके समूहसे जो उन्हें सेनाका पाँचवाँ अङ्ग प्राप्त हुआ था वे उससे सुहित थे । उनकी तालकी ध्वजा थी और वे अञ्जनपर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकले थे । साथ ही, जिसकी ध्वजामें वलयाकार साँपको पकड़े हुए गरुड़का चिह्न बना है ऐसा लक्ष्मण भी विजय-पर्वत नामक हाथी पर सवार होकर निकला। इन दोनोंने पहले तो समस्त विघ्न्न नष्ट करनेवाले श्री जिनेन्द्रदेवको नमस्कार किया और फिर दोनों ही सुग्रीव तथा अणुमान् आदि विद्याधरोंसे वेष्टित हो सूर्य-चन्द्रमाके समान शत्रु रूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए चल पड़े ॥ ५४३-५४७ ।। वे दोनों भाई नयोंके समान सुशोभित थे और दृप्त तथा दुर्बुद्धियोंका घात करनेवाले थे। रावणके सामने युद्ध करनेके लिए उन्होंने अपनी सेनाका विभाग कर रक्खा था, इस प्रकार शत्रुओंको भय-भीत करते हुए वे युद्ध-भूमिमें जाकर ठहर गये। वहाँ इनके नगाड़ोके बड़े भारी शब्द शत्रुओंके नगाड़ोंके शब्दोंको तिरस्कृत कर रहे थे सो ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे शब्द ऊँचे उठते हुए दण्डोंके कठोर प्रहारसे भयभीत हो गुहा अथवा गढ़े आदि देशोंमें सब ओरसे प्रवेश कर रहे हों-छिप रहे हों ।। ५४८-५.५० ।। हाथियोंकी चिंघाड़ें और घोड़ोंके हींसनेके शब्द विशेष रूपसे योद्धाओं की शूर-बीरता रूप सम्पत्तिको अच्छी तरह बढ़ा रहे थे ।। ५५१ ।।
श्लोक 552 से 560 सेना का अद्भुत वैभव
उस समय जो आरम्भ प्रकट हो रहे थे वे शत्रुओंको भयभीत करते हुए आकाश-मार्गको रोक रहे थे और स्त्रियोंके समान दुर्जय थे ।। ५५.२ ।। धनुष धारण करनेवाले लोग अपने-अपने धनुष लेकर निकले थे। उन धनुषोंका मध्यम भाग हाथके अग्रभागके बराबर था, वे नये बादलों के समूहके समान जान पड़ते थे, बाण सहित थे, बुद्धिमान् पुरुषोंके मनके समान गुण- डोरी (पक्षमें दया दाक्षिण्य आदि गुणों) से नम्र थे, कठोर वचनोंके समान दूरसे ही हृदयको भेदन करनेवाले थे, उनकी प्रत्यञ्चाका शब्द दिशाओंमें फैल रहा था अतः ऐसे जान पड़ते थे मानो क्रोध वश हुक्ङ्कार ही कर रहे हों, खिंचकर कानोंके समीप तक पहुँचे हुए थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो कुछ मन्त्र ही कर रहे हों, और सज्जनोंकी संगतिके समान बे कठिन कार्य करते हुए भी कभी भग्न नहीं होते थे ऐसे धनुषोंको धारण कर धनुर्धारी लोग बाहर निकले । कुछ धीर वीर योद्धा तलवार और कवच धारण कर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो बिजली सहित गरजते हुए काले मेघोंको ही जीतना चाहते हों। इनके सिवाय नाना प्रकारके हथियारोंसे सहित नाना प्रकार युद्ध करनेमें चतुर अन्य अनेक योद्धा भी चारों ओरसे शत्रुओंकी सेनाके साथ युद्ध करनेके लिए आ पहुँचे। उनके साथ जो घोड़े थे वे बड़े वेगसे चल रहे थे और खुरोंके आघातसे मानो पृथिवीको बिदार रहे थे ।। ५५३-५५८ ।। वे घोड़े चमरोंसे
सहित थे तथा महामणियोंसे बनी हुई पीठ (काठी) से युक्त थे अतः राजाके समान जान पड़ते थे ।
अथवा किसी इष्ट-विश्वासपात्र सेवकके समान मरण-पर्यन्त अपने स्वामीका हित करनेवाले थे ॥५५९।॥
उनके मुखमें घासके ग्रास लग रहे थे जिससे भोजन करते हुएसे जान पड़ते थे और छोटी-छोटी
वंटियोंके मनोहर शब्दोंसे ऐसे मालूम हो रहे थे मानो निरन्तर अपनी जीतकी घोषणा ही कर रहे
हों ।॥ ५६० ॥
श्लोक 561 से 575 हाथियों और रथों से सुसज्जित विशाल सेना
वे घोड़े कवच पहने हुए थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो पंखोंसे युक्त होकर आकाशके मध्यभागको ही लाँघना चाहते हों। उनके मुखोंसे लार रूपी जलका फेन निकल रहा था जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने पैररूपी नटोंके नृत्य करनेके लिए फूलोंसे पृथिवीकी पूजा ही कर रहे हों। वे घोड़े यूनान, काश्मीर और वाल्हीक आदि देशोंमें उत्पन्न हुए थे, उन पर ऊँची उठाई हुईं देदीप्यमान तलवारोंकी किरणोंसे सुशोभित घुड़सवार बैठे हुए थे, वे महासेना रूपी
समुद्रमें उत्पन्न हुई तरंगोंके समान इधर-उधर चल रहे थे, और जोर-जोरसे हींसनेके शब्द रूपी
आभूषणोंसे शत्रुओंको भयभीत करनेके लिए ही मानो निकले हुए थे। इनके सिवाय वायु जिनके
अनुकूल चल रही है जिसमें शस्त्र रूपी वर्तन भरे हुए हैं, जिनपर ऊँचे दण्ड वाली पताकाएँ फहरा
रही हैं, और संग्राम रूपी समुद्रके जहाजके समान जान पड़ते हैं ऐसे बड़े-बड़े रथ भी वहाँ चल रहे
थे । चक्रवर्ती रावण यदि एक चक्रसे पराक्रमी है तो हमारे पास ऐसे दो चक्र विद्यमान हैं ऐसा
समझ कर समस्त दिशाओंमें आक्रमण करनेवाले रथ वहाँ बड़ी तेजीसे आ रहे थे। जिनके भीतरउनके स्वामी बैठे हुए हैं, जो अनेक शस्त्रोंसे परिपूर्ण हैं और जिनमें शीघ्रतासे चलनेवाले वेगगामी घोड़े जुते हुए हैं ऐसे तैयार खड़े हुए हमारे रथ युद्धके लिए बद्धकक्ष क्यों न हों ? पैदल चलनेवाले सिपाही, घोड़े और हाथी भले ही आगे दौड़ते चले जावें पर इन व्यम प्राणियोंसे क्या होनेवाला है ? विजय तो हम लोगोंपर ही निर्भर है। यह सोचकर ही मानो बोझसे भरे रथ धीरे-धीरे चल रहे थे । सन्मार्ग पर चलनेवाले, शस्त्रोंके धारक एक चक्रवाले चक्रवर्तियोंने जब समस्त दिशाओं पर आक्रमण किया था तब दो चक्रवाले रथोंने समस्त दिशाओं पर आक्रमण किया इसमें आश्चर्य ही क्या है ? इसी प्रकार पर्वतके समान जिनका अग्रभाग कुछ ऊँचा उठा हुआ था, पीछेकी ओर फैली हुई पूँछसे जिनकी पूँछका उपान्त भाग कुछ खुल रहा था, जो ऊपरकी ओर उठते हुए सूँड़के लाल लाल अग्र-भागसे सुशोभित थे और इसीलिए जो कमलोंके सरोवरके समान जान पड़ते थे। जिनकी वृत्ति पर-प्रणेय थी- दूसरोंके आधीन थी अतः जो बच्चोंके समान जान पड़ते थे, जो अपने गण्डस्थलों पर स्थित भ्रमरोंको मानो क्रोधसे ही कान रूपी पंखोंकी फटकारसे उड़ा रहे थे। उड़ती हुई सफेद ध्वजाओंसे जो बगलाओंकी पंक्तियों सहित काले मेघोंके समान जान पड़ते थे, जिनमें कितने ही हाथी दूसरे हाथियोंके मदकी सुगन्ध सूंघकर आकाशमें खिले हुए कमलके समान जिनका अग्रभाग बिकसित हो रहा है ऐसी सूँडोंसे युद्ध करनेके लिए तैयार हो रहे थे, जो पैनी नोकवाले अंकुशोंकी चोटसे अपाङ्ग प्रदेशमें घायल होनेके कारण युद्ध-क्रियासे रोके जा रहे थे, जो हथिनियोंके समूहके समीप बार-बार अपना मस्तक हिला रहे थे, जिनका सब क्रोध शान्त हो गया था, जिनपर प्रधान पुरुष बैठे हुए थे और जो उन्नत शरीर होनेके कारण समस्त संसार पर आक्रमण करते हुएसे जान पड़ते थे ऐसे चलते फिरते पर्वतोंके समान ऊँचे-ऊँचे हाथी सब ओरसे निकल कर चल रहे थे ॥५६१-५७५ ।।
श्लोक 576 से 585 युद्धारम्भ और बाणवर्षा
उस समय अनुकूल पवनसे प्रेरित ध्वजाएँ शत्रुओंकी ओर ऐसी जा रही थीं मानो दण्डोंको छोड़कर पहले ही युद्ध करनेके लिए उद्यत हो रही हों ।॥ ५७६ ।। अथवा सूर्यकी किरणोंको ढकनेवाली बे ध्वजाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो निर्मल आकाशमें जो मेघरूपी मैल छाया हुआ था उसे ही दूर कर रही हों ।। ५७७ ।। अथवा वे ध्वजाएँ दण्ड धारण कर रही थीं अर्थात् दण्डोंमें लगी हुई थीं इसलिए वृद्ध पुरुषोंका अनुकरण कर रही थीं अथवा समय पर मुक्त होती थीं- खोलकर फहराई जाती थीं इसलिए मुनिमार्गका अनुसरण करती थीं ।॥ ५७८ ॥ उस समय धूलि उड़कर चारों ओर फैल गई थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो सेनाके बोझसे खिन्न हुई पृथिवी साँस ही ले रही हो । अथवा पूर्ण ज्ञानको नाश करनेका कारण मिथ्याज्ञान ही फैल रहा हो ।। ५७९ ।। अथवा युद्धमें विघ्न्न करनेवाला कोई बड़ा भारी भय ही आकर उपस्थित हुआ था। जिसने पूर्वभवमें पुण्य संचित नहीं किया ऐसा मनुष्य जिस प्रकार सबके नेत्रोंके लिए अप्रिय लगता है इसी प्रकार वह धूलि भी सब के नेत्रोंके लिए अप्रिय लग रही थी ।। ५८० ।। इस प्रकार वेगसे भरी धूलि आकाशको उल्लंघन कर रही थी अर्थात् समस्त आकाशमें फैल रही थी। उस धूलिके भीतर समस्त सेना ऐसी हो गई मानो मूच्छित हो गई हो अथवा गर्भमें स्थित हो, अथवा दीवाल पर लिखे हुए चित्रके समान निश्चेष्ट हो गई हो। उसका समस्त कलकल शान्त हो गया। जिस प्रकार किसी पराजित राजाके चित्तका क्षोभ धीरे-धीरे शान्त हो जाता है उसी प्रकार जब वह धूलिका बहुत भारी क्षोभ धीरे-धीरे शान्त हो गया और दृष्टिका कुछ-कुछ संचार होने लगा तब सेनापतियोंके द्वारा जिन्हें प्रेरणा दी गई है ऐसे क्रोधसे भरे योद्धा गमन करनेसे शुद्ध हुए नये बादलोंके समान धनुष धारण करते हुए बाणोंकी वर्षा करने लगे और युद्धके मैदानमें शत्रु-योद्धाओंके हृदय रागरहित करने लगे। सेनापतियोंके द्वारा प्रेरित हुए योद्धा बड़े उत्साहसे युद्ध कर रहे थे ॥ ५८१-५८५ ॥
श्लोक 586 से 594 वीरों का कर्तव्य और घमासान संघर्ष
सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनों का बल शत्रुसे प्रकट नहीं होता किन्तु मित्रसे प्रकट होता है। मैंने अपना जीवन देनेके लिए ही राजासे आजीविका पाई है- वेतन ग्रहण किया है। अब उसका समय आ गया है यह विचार कर कोई योद्धा रणमें वह ऋण चुका रहा था। युद्ध करने में एक तो सेवकका कर्तव्य पूरा होता है, दूसरे यश की प्राप्ति होती है और तीसरे शूर-वीरोंकी गति प्राप्त होती है ये तीन फल मिलते हैं ॥ ५८६-५८७ ।। तथा हम लोगों के यही तीन पुरुषार्थ हैं यही सोचकर कोई योद्धा किसी दूसरे योद्धासे परस्पर लड़ रहा था। मैं अपनी सेनामें किसीका मरण नहीं देखूँगा क्योंकि वह मेरा ही पराभव होगा’ यह मानता हुआ कोई एक योद्धा स्वयं सबसे पहले युद्ध कर मर गया था। इस प्रकार तीव्र क्रोध करते हुए सब योद्धा, दायें-बायें दोनों हाथोंसे छोड़ने योग्य, आधे छोड़ने योग्य, और न छोड़ने योग्य सब तरहके शस्त्रोंसे विना किसी आकुलताके निरन्तर युद्ध कर रहे थे। दोनों ओरसे एक दूसरेके सन्मुख छोड़े जानेवाले बाण, बीचमें ही अपना मार्ग बनाकर बड़ी शीघ्रतासे एक दूसरेकी सेनामें जाकर पड़ रहे थे। गुण अर्थात् धनुषकी डोरीको छोड़कर दूर जानेवाले, तीक्ष्ण एवं खून पीने-वाले बाण सीधे होनेपर भी प्राणोंका घात कर रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट पुरुषमें रहनेवाले गुण, गुण नहीं कहलाते हैं। बाणोंका न तो किसीके साथ वैर था और न उन्हें कुछ फल ही मिलता था तो भी वे शत्रुओंका घात कर रहे थे ॥ ५८८-५९१॥ सो ठीक ही है क्योंकिजिनकी वृत्ति दूसरोंके द्वारा प्रेरित रहती है ऐसे तीक्ष्ण (पैने-कुटिल) पदार्थोकी ऐसी ही अवस्था होती है। जिनका परस्पर वैर बँधा हुआ है ऐसे अनेक विद्याधर पक्षियोंके समान अपने प्राणोंको तृणके समान मानते हुए बाणोंके द्वारा परस्पर विद्याधरोंका घात कर रहे थे ।। ५९२-५९४ ।।
श्लोक 595 से 604 रणभूमि का भीषण दृश्य और रामसेना की बढ़त
धनुष धारण करनेवाले कितने ही योद्धा लक्ष्य पर लगाई हुई अपनी दृष्टिके साथ ही साथ शीघ्र पड़नेवाले तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा पर्वतोंके समान बहुतसे हाथियोंको मारकर गिरा रहे थे। किसी एक योद्धाने अपने मर्मभेदी एक ही बाणसे हाथीको मार गिराया था सो ठीक ही है क्योंकि इसीलिए तो विजय-की इच्छा करनेवाले शूर-बीर दूसरेका मर्म जाननेवालोंको स्वीकार करते हैं-अपने पक्षमें मिलाते हैं। कोई एक योद्धा चोटले मूच्छित हो खूनप्ते लथपथ हो गया था तथा आये हुए गृद्ध पक्षियोंके पंखों-की वायुसे उठकर पुनः अनेक योद्धाओंको मारने लगा था। कोई एक अल्प मूच्छित योद्धा. अपने आपको देवकन्या द्वारा ले जाया जाता हुआ देख उत्सवके साथ हँसता हुआ अकस्मात् उठ खड़ा हुआ । जो बाणोंसे भरा हुआ है, जिसमें रणके मारू बाजे गूंज रहे हैं, जिसमें निरन्तर शिर रहित धड़ नृत्य कर रहे हैं, और जिसमें बाणोंका मण्डप छाया हुआ है ऐसे युद्ध-स्थलमें जिसकी सब अॅतड़ियोंका समूह बँध रहा है और जो बहुतसे खूनके प्रवाहसे पूजित है ऐसे किसी एक योद्धाने राक्षस-विवाह के द्वारा वीर-लक्ष्मीको अपनी ओर खींचा था। उस युद्धस्थलमें ढाकिनियाँ बड़ी चपलताने नृत्य कर रही थीं और शृगाल भयङ्कर शब्द कर रहे थे। वे शृगाल ऊपरकी ओर किये हुए मुखोंसे निकलनेवाले अग्निके तिलगोंसे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ने थे। जिसकी कैंचियोंका समूह ऊपरकी ओर उठ रहा है और जो चञ्चल कपालोंको धारण कर रहा है ऐसा राक्षसियोंका समूह बहुत अधिक पिये हुए खूनको उगल रहा था। अत्यन्त तीक्ष्ण बाण नाराच और चक्र आदि शोंके पढ़नेसे उस समय सूर्यका मण्डल भी प्रभाहीन तथा कान्ति रहित हो गया था। जिस प्रकार स्याद्वादियोंके द्वारा आक्रान्त हुआ मिथ्यावादियोंका समूह पराजयको प्राप्त होता है उसी प्रकार उस समय रामचन्द्रजीके सैनिकों के द्वारा आक्रान्त हुई रावणकी सेनाएँ पराजयको प्राप्त हो रही थीं। इस प्रकार उस रणाङ्गणमें संप्राम प्रवृत्त हुए बहुत समय हो गया ।। ५९५-६०४ ॥
श्लोक 605 से 622: युद्ध की भीषणता, रावण की माया और मायायुद्ध का आरम्भ
उस युद्धमें कितने ही लोग मर गये, कितने ही घायल हो गये, और कितने ही पापी, प्राण छोड़नेमें असमर्थ हो कण्ठगत प्राण हो गये ।। ६०५ ॥ उस समय वे मरणासन्न पुरुष ऐसा सन्देह उत्पन्न कर रहे थे कि यमराजखाते समय तो सबको खा गया परन्तु वह खाये हुए समस्त लोगोंको पचानेमें समर्थ नहीं हो सका, इसलिए ही मानो उसने उन्हें उगल दिया था ।। ६०६ ॥ जिनके अङ्ग जर्जर हो रहे हैं ऐसे कितने ही योद्धा उस युद्धस्थलमें जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हुए थे और वे देखनेवाले यमराजको भी भयानक रस उत्पन्न कर रहे थे- उन्हें देख यमराजं भी भयभीत हो रहा था ॥ ६०७ ॥ जिनके पैर कट गये हैं ऐसे कितने ही प्रतापी एवं बलशाली घोड़े अपने शरीर से ही उठनेका प्रयत्न कर रहे थे ।। ६०८ ॥ योद्धाओंके द्वारा छोड़े हुए बाणों और नाराचोंसे कीलित हाथी ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनसे गेरूके निर्भर कर रहे हैं और जिनपर छोटे-छोटे बाँस लगे हुए हैं ऐसे पर्वत ही हों ॥ ६०९ ॥ चक्र आदि अवयवोंके टूट जानेसे सब ओर बिखरे पड़े रथ ऐसे जान पड़ते थे मानो उस संग्राम रूपी समुद्रके बीच में चलनेवाले जहाज ही टूटकर बिखर गये हों ।। ६१० ।। इस प्रकार उन दोनों सेनाओंमें बहुत दिन तक युद्ध होता रहा। एक दिन रावण भाग्यके प्रतिकूल होनेसे अपनी सेनाको नष्ट होती देख बहुत दुःखी हुआ। उसी समय उसने मायासे सीताका शिर काट कर ‘लो, यह तुम्हारी देवी है ग्रहण करो’ यह कहते हुए क्रोधसे रामचन्द्रजीके सामने फेंक दिया ।। ६११-६१२ ।। इधर सीताका कटा हुआ शिर देखते ही रामचन्द्रजीके हृदयमें मोहने अपना स्थान जमाना शुरू किया और उधर रावणकी सेनामें युद्धका उत्सव होना शुरू हुआ। यह देख, विभीषणने रामचन्द्रजीसे सच बात कही कि शीलवती सीताको आपके सिवाय कोई दूसरा छूनेके लिए भी समर्थ नहीं है। हे नाथ, यह रावणकी माया है अतः आप इस विषयमें शोक न कीजिए । विभीषणकी इस बातपर विश्वास रख कर रामचन्द्रजी रावणकी सेनाको शीघ्र ही इस प्रकार नष्ट करने लगे जिस प्रकार कि सिंह हाथियोंके समूहको अथवा सूर्य अन्धकारके समूहको नष्ट करता है ॥ ६१३-६१६ ॥ अब रावण खुला ‘युद्ध छोड़कर माया-युद्ध करनेकी इच्छासे अपने पुत्रोंके साथ आकाश रूपी आँगनमें जा पहुँचा ।। ६१७।। उस माया-युद्धमें रावणको दुरीक्ष्य (जो देखा न जा सके) देख कर, अत्यन्त चतुर राम और लक्ष्मण, सिंहवाहिनी तथा गरुड़वाहिनी विद्याओंके द्वारा अर्थात् इन विद्याओंके द्वारा निर्मित -आकाशगामी सिंह और गरुड़ पर आरूढ़ होकर युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए । सुग्रीव, अणुमान् आदि अपने पत्तके समस्त विद्याधरोंकी सेना भी उनके साथ थी। रावणके साथ रामचन्द्र, इन्द्रजीतके साथ लक्ष्मण, कुम्भकर्णके साथ सुग्रीव, रविकीर्तिके साथ अणुमान् खरके साथ कमलकेतु, इन्द्रकेतुकेसाथ अङ्गद, इन्द्रवर्माके साथ युद्धमें प्रसिद्ध कुमुद और खर-दूषणके साथ माया करनेमें चतुर नील युद्ध कर रहे थे। इसी प्रकार युद्ध करनेमें अत्यन्त उद्धत रामचन्द्रजीके अन्य भृत्य भी रावणके मुखिया लोगोंके साथ मायायुद्ध करने लगे ।। ६१८-६२२ ।।
श्लोक 623 से 631 : लक्ष्मण द्वारा रावण-वध
उस समय इन्द्रजीतने देखा कि रामचन्द्रजी युद्धमें रावणको दबाये जा रहे हैं- उसका तिरस्कार कर रहे हैं तब वह रावणके प्राणोंके समान वीचमें आ घुसा ।। ६२३ ।। परन्तु रामचन्द्रजीने उसे शक्तिकी चोटसे गिरा दिया। यह देख रावण कुपित होकर शस्त्रोंसे सुशोभित रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा ॥ ६२४ ॥ इसी बीच में लक्ष्मण बड़ी शीघ्रतासे उन दोनां के बीचमें आ गया और रावणने मायामयी हाथीपर सवार होकर उने नाराच-पञ्जरमें घेर लिया । अर्थात् लगातार वाण वर्षा कर उसे ढँक लिया ।। ६२५ ।। परन्तु गरुड़की ध्वजा फहरानेवाला लक्ष्मण प्रहरणावरण नामकी विद्याप्से बड़ा प्रतापी था। वह सिंहके बच्चे के समान दृप्त बना रहा और शत्रुरूपी हाथी उसे रोक नहीं सके ।। ६२६ ॥ वह अपनी विद्यासे नाराच-पञ्जरको तोड़कर बाहुर् निकल आया। यह देख रावण बहुत कुपित हुआ और उसने क्रोधित होकर विश्वासपात्र चक्रात के लिए आदेश दिया ॥ ६२७ ॥ उसी समय नारद आदि आकाशमें सिंहनाद करने लगे । वह चक्ररत्न मूर्तिधारी पराक्रमके समान प्रदक्षिणा देकर लक्ष्मणके दाहिने हाथ पर आकर ठहर गया। तदनन्तर चक्ररत्नको धारण करनेवाले लक्ष्मणने उसी चक्ररत्नसे तीन खण्डके समान रावणका शिर काटकर अपने आधीन कर लिया ।। ६२८-६२९ ॥ रावण, अपने दुराचारके कारण पहले ही नरकायुका बन्ध कर चुका था। अतः, दुःख देनेवाली भयंकर (अधोगति) नरक गतिको प्राप्त हुआ सो ठीक ही है; क्योंकि, पापी मनुष्योंकी और क्या गति हो सकती है ? ॥ ६३० ॥ तदनन्तर लक्ष्मणने विजय-शङ्ख बजाकर समस्त शत्रुओंको अभयदानकी घोषणा की सो ठीक ही है। क्यांकि, राजाओंको जीतनेवाले विजयी राजाओंका यही धर्म है ।। ६३१ ॥
श्लोक 632 से 641 : विभीषण का राज्याभिषेक और राम-सीता मिलन
उसी समय रावणके बचे हुए महामन्त्री आदिने भ्रमरोंके समान मलिन होकर रामचन्द्र तथा लक्ष्मणके चरण-कमलोंका आश्रय लिया ॥ ६३२ ॥ रावणकी मन्दोदरी आदि जो देवियाँ दुःखसे रो रही थीं उनका दुःख दूर कर राम और लक्ष्मणने विभीषणको लंकाका राजा बनाया तथा रावणकी वंश-परम्परासे आई हुई समस्त विभूति उसे प्रदान कर दी। इस प्रकार दोनों भाई बलभद्र और नारायण होकर तीन खण्डके बलशाली स्वामी हुए ।। ६३३-६३४ ।। तदनन्तर जो अशोक वनके मध्यमें बैठी है, और संग्राममें रामचन्द्रजीकी विजयके समाचार सुननेसे प्रकट हुए हर्षसे युक्त है ऐसी शीलवती सीताके पास जाकर विभीषण, सुग्रीव तथा अणु-मान् आदिने उसके यथा योग्य दर्शन किये और विजयोत्सवकी खबर सुनाई ॥ ६३५-६३६ ।। तत्पश्चात् जिस प्रकार कुशल कारीगर महामणिको हारके साथ, अथवा कुशल कवि शब्दको मनोहर अर्थके साथ अथवा सज्जन पुरुष अपनी बुद्धिको धर्मके साथ मिलाते हैं उसी प्रकार उन विभीषण आदिने दूसरी लक्ष्मीके समान सीताजीको रामचन्द्रजीके साथ मिलाया। सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम भृत्य और मित्रोंके सम्बन्धसे इष्ट-सिद्धियाँ हो ही जाती हैं ।॥ ६३७-६३८ ॥ उधर जब तक रामचन्द्रजीका दर्शन नहीं हो गया था तब तक सीता दुःखको धारण कर रही थी और इधर राम-चन्द्रजीका हृदय भी सीताके वियोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकसे व्याकुल हो रहा था। परन्तु उस समय परस्पर एक-दूसरेके दर्शन कर दोनों ही परम प्रीतिको प्राप्त हुए। रामचन्द्रजी तृतीय प्रकृति-वाली शान्त स्वभाववाली सीताको और सीता शान्त स्वभाववाले राजा रामचन्द्रजीको पाकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६३९-६४० ॥ विरहसे लेकर अब तकके जो-जो वृत्तान्त थे वे सब दोनोंने एक-दूसरेसे पूछे सो ठीक ही है क्योंकि स्त्री-पुरुष परस्पर एक-दूसरेको अपना सुख-दुःख बतलाकर ही सुखी होते हैं ।॥ ६४१ ॥
श्लोक 642 से 651 : सीता की स्वीकृति और विजय के उपरान्त दिग्विजय का प्रारम्भ
जिसने दोष किया था ऐसा रावण मारा गया, रही सीता, सो यह निर्दोष है’ ऐसा विचार कर रामचन्द्रजीने उसे स्वीकृत कर लिया। सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन हमेशा विचारके अनुसार ही काम करते हैं ॥ ६४२ ॥ तदनन्तर-दोनों भाई लंकापुरीसे निकलकर अतिशय-सुन्दरपीठ नामके पर्वत पर ठहरे वहाँ पर देव और विद्याधरोंके राजाओंने अपने हाथसे उठाते हुए सुवर्णके एक हजार आठ बड़े-बड़े कलशोंके द्वारा दोनोंका बड़े हर्षसे अभिषेक किया। वहीं पर लक्ष्मणने कोटि-शिला उठाई और उसके माहात्म्यसे सन्तुष्ट हुए रामचन्द्रजीने सिंहनाद किया ।। ६४३-६४५ ।। वहाँ के रहनेवाले सुनन्द नामके यक्षने उन दोनोंकी बड़े हर्षसे पूजा की और लक्ष्मण के लिए बड़े सन्मानसे सौनन्दक नामकी तलवार दी ।। ६४६ ॥ तदनन्तर दोनों भाइयोंने गङ्गा नदीके किनारे-किनारे जाकर गङ्गाद्वारके समीप ही वनमें सेना ठहरा दी। लक्ष्मणने रथपर सवार हो गोपुर द्वारसे समुद्रमें प्रवेश किया और पैरको कुछ टेढ़ाकर मागध देवके निवास स्थानकी ओर अपने नामसे चिह्नित वाण छोड़ा ॥ ६४७-६४८ ॥ मागध देवने भी बाण देखकर अपने आपकोअल्प पुण्यवान् माना और यह महापुण्यशाली चक्रवर्ती है ऐसा समझकर लक्ष्मणकी स्तुति की । यही नहीं, उसने रत्नोंका हार, मुकुट, कुण्डल और उस वाणको तीर्थ-जलसे भरे हुए कलशके भीतर रखकर लक्ष्मणके लिए भेंट किया ॥ ६४९-६५० ।। तदनन्तर समुद्र के किनारे-किनारे चलकर वैजयन्त नामक गोपुर पर पहुँचे और वहाँ पूर्वकी भाँति वरतनु देवको वश किया ।। ६५१ ॥
श्लोक 652 से 661 : लक्ष्मण की दिग्विजय और अयोध्या प्रवेश
उस देवसे लक्ष्मणने कटक, केयूर, मस्तकको सुशोभित करनेवाला चूडामणि, हार और कटिसूत्र प्राप्त किया ।। ६५२ ।। तदनन्तर रामचन्द्रजीके साथ ही साथ लक्ष्मण पश्चिम दिशाकी ओर गया और वहाँ सिन्धु नदीके गोपुर द्वारसे समुद्रमें प्रवेश कर उसने पूर्वकी ही भांति प्रभास नामके देवको वश किया ॥ ६५३ ॥ प्रभास देवसे लक्ष्मणने सन्तानक नामकी माला, जिस पर मोतियोंका जाल लटक रहा है ऐसा सफेद छत्र, और अन्य-अन्य आभूषण प्राप्त किये ॥ ६५४ ॥ तत्पश्चात् सिन्धु नदीके किनारे-किनारे जाकर पश्चिम दिशाके म्लेच्छ खण्डमें रहनेवाले लोगोंको अपनी आज्ञा सुनाई और वहाँकी श्रेष्ठ वस्तुओंको ग्रहण किया ।। ६५५ ।। फिर दोनों भाई पूर्व दिशाकी ओर सन्मुख होकर चले और विजयार्ध पर्वत पर रहनेवाले लोगोंको वश कर उसने हाथी, घोड़े, अस्त्र, विद्याधर कन्याएँ एवं अनेक रत्न प्राप्त किये, पूर्व खण्डमें रहनेवाले म्लेच्छोंको कर देनेवाला बनाया और तदनन्तर विजयी होकर वहाँ से बाहर प्रस्थान किया ।। ६५६-६५७ ॥ इस प्रकार लक्ष्मणने सोलह हजार पट्टबन्ध राजाओंको, एक सौ दश नगरियोंके स्वामी विद्याधरोंको और तीन खण्डके निवासी देवोंको आज्ञाकारी बनाया था। उसकी यह दिग्विजय व्यालीस वर्षमें पूर्ण हुई थी। देव, विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजा हाथ ओड़कर सेवा करते थे। इस तरह बड़े भाई रामचन्द्रजीके आगे-आगे चलने वाले चक्ररत्नके स्वामी एवं सबके द्वारा पूजित लक्ष्मणने, माङ्गलिक वेषभूषासे सुशोभित तथा समागमकी प्रार्थना करनेवाली कान्ताके समान उस आयोध्या नगरीमें इन्द्रके समान प्रवेश किया ।। ६५८-६६१ ।।
श्लोक 662 से 672 : साम्राज्याभिषेक और राज्यवैभव
तदनन्तर किसी शुद्ध लग्न और शुभ मुहूर्तके आनेपर मनुष्य, विद्याधर और व्यन्तर देवोंके मुखिया लोगोंने एकत्रित होकर श्रीमान् राम और लक्ष्मणको एक ही साथ सिंहासन पर विराजमान कर उनका तीर्थ-अलसे भरे हुए सुवर्णके एक हजार आठ बड़े-बड़े कलशोंसे अभिषेक किया। इस प्रकार उन्हें तीन खण्डके साम्राज्य पर विराजमान कर प्रार्थना की कि आपकी लक्ष्मी बढ़ती रहे और आपका यश दिशाओंके अन्त तक फैल जावे। प्रार्थना करनेके बाद उन्हें रत्नोंके बड़े-बड़े मुकुट बाँधे, मणिमयंआभूषण पहिनाये और बड़े-बड़े आशीर्वादोंसे अलंकृत कर उत्सुक हो उनकी पूजा की ॥६६२-६६५।। लक्ष्मणके पृथिवीसुन्दरीको आदि लेकर लक्ष्मीके समान मनोहर सोलह हजार पतिव्रता
रानियाँ थीं और रामचन्द्रजीके सीताको आदि लेकर आठ हजार प्राणप्यारी रानियाँ थीं। सोलह हजार देश और सोलह हजार राजा उनके आधीन थे। नौ हजार आठ सौ पचास द्रोणमुख थे, पच्चीस हजार पत्तन थे, इच्छानुसार फल देनेवाले बारह हजार कर्वट थे, बारह हजार मटंव थे, आठ हजार खेटक थे, महाफल देनेवाले अड़तालीस करोड़ गाँव थे, समुद्रके भीतर रहनेवाले अट्ठाईस द्वीप थे, व्यालीस लाख बड़े-बड़े हाथी थे, इतने ही श्रेष्ठ रथ थे, नव करोड़ घोड़े थे, युद्ध करनेमें शूर-वीर व्यालीस करोड़ पैदल सैनिक थे और आठ हजार गणबद्ध नामके देव थे ।। ६६६-६७२ ।।
श्लोक 673 से 681 : महारत्न और धर्मोपदेश की प्राप्ति
रामचन्द्रजीके अपराजित नामका हलायुध, अमोघ नामके तीक्ष्ण वाण, कौमुदी नामकी गदा और रत्नावतंसिका नामक माला ये चार महारत्न थे। इन सब रत्नोंकी अलग-अलग एक-एक हजार यक्षदेव रक्षा करते थे ॥ ६७३-६७४ ।। इसी प्रकार सुदर्शन नामका चक्र, कौमुदी नामकी गदा, सौनन्दक नामका खड्ग, अमोघमुखी शक्ति, शाङ्ग नामका धनुष, महाध्वनि करनेवाला पाँच मुखका पाश्चजन्य नामका शङ्ख और अपनी कान्तिके भारसे शोभायमान कौस्तुभ नामका महामणि ये सात रत्न अपरिमित कान्तिको धारण करनेवाले लक्ष्मणके थे और सदा एक-एक हजार यक्ष देव उनकी पृथक् पृथक् रक्षा करते थे ।। ६७५-६७७ ।।
इस प्रकार सुख रूपी सागर में निमग्न रहनेवाले महाभाग्यशाली दोनों भाइयोंका समय भोग, और सम्पदाओंके द्वारा व्यतीत हो रहा था कि किसी समय मनोहर नामके उद्यानमें शिवगुप्त नामके जिनराज पधारे । श्रद्धासे भरे हुए बुद्धिमान् राम और लक्ष्मणने बड़ी विनयके साथ जाकर उनकी पूजा-बन्दना की। तदनन्तर आत्म-निष्ठाके अत्यन्त निकट होनेके कारण कृतकृत्य एवं कर्ममलकलङ्कसे रहित उक्त जिनराजसे धर्मका स्वरूप पूछा ।। ६७८-६८० ॥ भव्य जीवोंका अनुग्रह करना ही जिनका मुख्य कार्य है ऐसे शिवगुप्त जिनराज भी अपने वचन-समूह रूपी उत्तम चन्द्रिकासे उस सभाको आह्लादित करते हुए कहने लगे ।। ६८१ ॥
श्लोक 682 से 691 : श्रावकधर्म, लक्ष्मण का निदान और वाराणसी गमन
कि इस संसारमें जीवादिक नौ पदार्थ हैं उनका प्रमाण नय निक्षेप तथा निर्देश आदि अनुयोगोंसे जो कि ज्ञान प्राप्तिके कारण हैं बोध होता है। गौण और मुख्य नयोंके स्वीकार करने रूप बलके मिल जानेसे ‘स्यादस्ति’, ‘स्यान्नास्ति’ आदि भङ्गों द्वारा प्रतिपादित धर्मोंसे वे जीवादि पदार्थ सदा युक्त रहते हैं। इनके सिवाय शिवगुप्त जिनराजने आप्त भगवान्का स्वरूप, मार्गणा, गुणस्थान, जीवसमास, संसारका स्वरूप, धर्मसे सम्बन्ध रखने-वाले अन्य युक्ति-युक्त पदार्थ, कर्मोंके भेद, सुख-दुःखादि अनेक भेद रूप कर्मोंके फल, बन्ध और मोक्षका कारण, मुक्ति और मुक्त जीवका स्वरूप आदि विविध पदार्थोंका विवेचन भी किया। इस प्रकार उनसे धर्मका विशेष स्वरूप सुनकर रामचन्द्रजी आदि समस्त बुद्धिमान् पुरुषोंने श्रावकके व्रत ग्रहण किये ।। ६८२-६८६ ।। परन्तु भोगोंमें आसक्त रहनेवाले लक्ष्मणने निदान शल्य नामक दोषके कारण नरककी भयङ्कर आयुका बन्ध कर लिया था इसलिए उसने सम्यग्दर्शन आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया ।। ६८७ ।। इस प्रकार राम और लक्ष्मणने कुछ वर्ष तो अयोध्यामें ही सुखसे बिताये तदनन्तर वहाँका राज्य भरत और शत्रुन्नके लिए देकर वे दोनों अपने परिवारके साथ बनारस चले गये और अपनी सम्पदासे इन्द्रकी लीलाको तिरस्कृत करते हुए नगरी में प्रविष्ट हुए ।। ६८८-६८९ ॥ रामचन्द्रके देवके समान विजयराम नामका पुत्र था और लक्ष्मणके चन्द्रमाके समान पृथिवीचन्द्र नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था ।। ६९० ॥ जिनका अभ्युदय प्रसिद्ध है और जो धर्म, अर्थ, काम रूप त्रिवर्गके फलसे सुशोभित हैं ऐसे रामचन्द्र और लक्ष्मण अन्य पुत्र-पौत्रादिकसे युक्त होकर सुखसे समय बिताते थे ।। ६९१ ॥
श्लोक 692 से 701 : लक्ष्मण के अशुभ स्वप्न और मृत्यु
किसी एक दिन लक्ष्मण नागवाहिनी शय्या पर सुखसे सोया हुआ था। वहाँ उसने तीन स्वप्न देखे – पहला मन्त हाथीके द्वारा वट वृक्षका उखाड़ा जाना, दूसरा राहुके द्वारा निगले हुए सूर्यका रसातलमें चला जाना और तीसरा चूनासे सफेद किये हुए ऊँचे राजभवनका एक-देश गिर जाना । इन स्वप्नोंको देखकर वह उठा, बड़े भाई रामचन्द्रजीके पास गया और विनयके साथ सब स्वप्नोंको जिस प्रकार देखा था उसी प्रकार निवेदन कर गया ।। ६९२-६९४ ।। पुरोहितने सुनते ही उनका फल इस प्रकार कहा कि, वट वृक्षके उखड़नेसे लक्ष्मण असाध्य बीमारीको प्राप्त होगा, राहुके द्वारा मस्त सूर्यके गिरनेसे उसके भाग्य, भोग और आयुका क्षय सूचित करता है तथा ऊँचे भवनके गिरनेसे आप तपोवनको जावेंगे ॥ ६९५-६९६ ॥ पदार्थों के यथार्थ स्वरूपको जानने वाले रामचन्द्रजीने पुरोहितके यह वचन एकान्तमें सुने परन्तु धीर-बीर होनेके कारण मनमें कुछ भी विकार-भावको प्राप्त नहीं हुए ॥ ६९७ ॥ तदनन्तर दयामें उद्यत रहनेवाले रामचन्द्रजीने दोनों लोकोंका हितकर मान कर यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करे ॥ ६९८ ॥ इसके सिवाय उन्होंने सर्वज्ञ देवका स्नपन तथा शान्ति-पूजा की और दीनोंके लिए जिसने जो चाहा वह दान दिया ॥ ६९९ ॥ तदनन्तर जिसका पुण्य क्षीण हो गया है ऐसे लक्ष्मणको कुछ दिनोंके बाद असाता वेदनीय कर्म के उदयसे प्रेरित हुआ महारोग उत्पन्न हुआ ।। ७०० ॥ उसी असाध्य रोगके कारण चक्ररत्नका स्वामी लक्ष्मण मरकर माघ कृष्ण अमावस्याके दिन चौथी पङ्क-प्रभा नामकी पृथिवीमें गया ॥ ७०१ ॥
श्लोक 702 से 711 : राम का वैराग्य और दीक्षा
लक्ष्मणके वियोगसे उत्पन्न हुई शोक-रूपी अग्निसे जिनका हृदय सन्तप्त हो रहा है ऐसे रामचन्द्रजीने ज्ञानके प्रभावसे किसी तरह अपने आप आत्माको सुस्थिर किया, छोटे भाई लक्ष्मणका विधि पूर्वक शरीर संस्कार किया और प्रसन्नतापूर्ण वचन कहकर समस्त अन्तःपुरका शोक शान्त किया ।। ७०२-७०३ ॥ फिर उन्होंने सब प्रजाके सामने पृथिवीसुन्दरी नामकी प्रधान रानीसे उत्पन्न हुए लक्ष्मणके बड़े पुत्रके लिए राज्य देकर अपने ही हाथसे उसका पट्ट बाँधा ॥ ७०४ ।। सात्त्विक वृत्तिको धारण करनेवाले सीताके विजयराम आदिक आठ पुत्र थे। उनमें से सात बड़े पुत्रोंने राज्यलक्ष्मी लेना स्वीकृत नहीं किया इसलिए उन्होंने अजितञ्जय नामके छोटे पुत्रके लिए युवराज पद देकर मिथिला देश समर्पण कर दिया और स्वयं संसार, शरीर तथा भोगोंसे विरक्त हो गये ।। ७०५-७०६ ॥ विरक्त होते ही वे अयोध्या नगरीके सिद्धार्थ नामक उस वनमें पहुँचे जो कि भगवान् वृषभदेवके दीक्षाकल्याणकका स्थान होनेसे तीर्थस्थान हो गया था। वहाँ जाकर उन्होंने महाप्रतापी शिवगुप्त नामके केवलीके समीप संसार और मोक्षके कारण तथा फलको अच्छी तरह समझा ॥ ७०७-७०८ ।। जब उन्हें इन्हीं केवली भगवान्से इस बातका पता चला कि लक्ष्मण निदान नामक शल्यके दोषसे चौथे नरक गया है तब उनकी बुद्धि और भी अधिक निर्मल हो गई । तदनन्तर जिन्होंने लक्ष्मणका समस्त स्नेह छोड़ दिया है और आभिनिबोधिक-मतिज्ञानसेजिन्हें रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई है ऐसे रामचन्द्रजीने सुग्रीव, अणुमान् और विभीषण आदि पाँच सौ राजाओं तथा एक सौ अस्सी अपने पुत्रोंके साथ संयम धारण कर लिया ॥ ७०९-७११ ।।
श्लोक 712 से 721 : राम का केवलज्ञान और मोक्ष
इसी प्रकार सीता महादेवी और पृथिवीसुन्दरीले सहित अनेक देवियोंने श्रुतवती आर्यिकाके समीप दीक्षा धारण कर ली ।। ७१२ ॥ तदनन्तर जिन्होंने श्रावकके व्रत ग्रहण किये हैं ऐसे राजा तथा युव-राजने जिनेन्द्र भगवान्के चरण-युगलको अच्छी तरह नमस्कार कर नगरी में प्रवेश किया ।। ७१३ ॥ रामचन्द्र और अणुमान् दोनों ही मुनि, शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक मोक्षमार्गका अनुष्ठान कर श्रुतकेवली हुए ॥ ७१४ ॥ शेष बचे हुए मुनिराज भी बुद्धि आदि सात ऋद्धियोंके ऐश्वर्यको प्राप्त हुए । इस प्रकार जब छद्मस्थ अवस्थाके तीन सौ पंचानवे वर्ष बीत गये तब शुक्ल ध्यानके प्रभाषसे घातिया कर्मोंका क्षय करनेवाले मुनिराज रामचन्द्रको सूर्य-विम्बके समान केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ।। ७१५-७१६ ॥ प्रकट हुए एकछत्र आदि प्रातिहार्योंसे विभूषित हुए केवल रामचन्द्रजीने धर्ममयी वृष्टिके द्वारा भव्य-जीवरूपी धान्यके पौधोंको सींचा ॥ ७१७ ॥ इस प्रकार केवलज्ञानके द्वारा उन्होंने छह सौ वर्ष बिताकर फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशीके दिन प्रातःकालके समय सम्मेदाचलकी शिखर पर तीसरा शुक्लध्यान धारण किया और तीनों योंगोंका निरोधकर समुच्छिन्नक्रियाप्रतिपाती नामक चौथे शुक्त ध्यानके आश्रयसे समस्त अघातिया कर्मोंका क्षय किया। इस प्रकार औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंका नाश हो जानेसे उन्होंने अणुमान् आदिके साथ उन्नत पद-सिद्ध क्षेत्र प्राप्त किया ।। ७१८-७२० ।। विभीषण आदि कितने ही मुनि अनुदिशको प्राप्त हुए और रामचन्द्र तथा लक्ष्मणकी पट्टरानियाँ सीता तथा पृथिवीसुन्दरी आदि कितनी ही आर्यिकाएँ अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न हुई ।। ७२१ ।।
श्लोक 722 से 732 : उपसंहार, पूर्वभव और शिक्षा
शेष रानियाँ प्रथम स्वर्गमें उत्पन्न हुई । लक्ष्मण नरकसे निकल कर क्रम-क्रमसे संयम धारण कर मोक्ष-लक्ष्मीको प्राप्त होगा ।। ७२२ ।। सो ठीक ही है क्योंकि जीवोंके इसी प्रकारकी विचित्रता होती है ।। ७२३ ॥ जिन्होंने समुद्रको गोपदके समान उल्लङ्घन किया, जिन्होंने अपनी सेनासे शत्रुके नगरको एक छोटेसे घरके समान घेर लिया, जिन्होंने शत्रुके समस्त वंशको धानके खेतके समान शीघ्र ही निर्मूल कर दिया, जिन्होंने लक्ष्मीके साथ-साथ शत्रुसे सीताको छीन लिया, जिनके दोनों चरण, नम्रीभूत देव, भूमिगोचरी राजा तथा विद्याधरोंके मस्तकरूपी सिंहासन पर सदा विद्यमान रहते थे, जिन्होंने दक्षिण दिशाके अर्धभरत क्षेत्रको निष्कण्टक बना दिया था, जो समस्त तीन खण्डोंके स्वामी थे, अयोध्या नगरीमें रहते थे, जिनकी प्रभा ज्येष्ठ मास के सूर्यकी प्रभाको भी तिरस्कृत करती थी। जिनकी बीरलक्ष्मी दिशाओंके अन्तमें रहनेवाले दिग्गजोंके गर्व-रूपी सर्पको शान्त करनेमें सदा व्यग्र रहती थी, हल आदि प्रसिद्ध तथा सुशोभित रत्नोंकी पंक्तिले अनुरञ्जित लक्ष्मीके द्वारा प्राप्त कराये हुए भोगोंके संयोगसे जो सदा सुखी रहते थे, जो समस्त याचकोंको संतुष्ट रखते थे, जो तेजते चन्द्र और सूर्यके समान थे, और जिन्होंने अपने यशसे समस्त संसारको अत्यन्त प्रकाशित कर दिया था ऐसे श्रीमान् बलभद्र और नारायण पदवीके धारक रामचन्द्र और लक्ष्मण चिरकाल तक साथ ही साथ इस पृथिवीका पालन करते रहे। उन दोनोंमेंसे एक तो भोगोंकी समानता होनेपर भी परि-णामोंके द्वारा की हुई विशेषतासे तीन लोकके शिखर पर सुखसे विराजमान हुआ और दूसरा चतुर्थ नरककी भूमिका नायक हुआ। इसलिए आचार्य कहते हैं कि विद्वानोंको मूर्ख के समान कभी भी निदान नहीं करना चाहिये ।। ७२४-७२७ ॥ रावणका जीव पहले सारसमुच्चय नामके देशमें नरदेव नामका राजा था। फिर सौधर्म स्वर्गमें सुखका भाण्डार-स्वरूप देव हुआ और तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर इसी भरत क्षेत्रके राजा विनमि विद्याधरके वंशमें समस्त विद्याधरोंके देदीप्यमान मस्तकोंकी मालापर आक्रमण करनेत्राला, स्त्रीलम्पट, अपने वंशको नष्ट करनेके लिए केतु (पुच्छलतारा) के समान तथा दुराचारियोंमें अग्रेसर रावण हुआ ।। ७२८ ॥ लक्ष्मणका जीव पहलेइसी क्षेत्रके मलयदेशमें चन्द्रचूल नामका राजपुत्र था, जो अत्यन्त दुराचारी था। जीवनके पिछले भाममें तपञ्चरण कर वह सनत्कुमार स्वर्गमें देव हुआ फिर वहाँ से आकर यहाँ अर्धचक्री लक्ष्मण हुआ था ॥ ७२९ ॥ सीता पहले गुणरूपी आभूषणोंसे सहित मणिमति नामकी विद्याधरी थी । उसने अत्यन्त कुपित होकर निदान मरण किया जिससे यशको विस्तृत करनेवाली तथा अच्छे व्रतोंका पालन करनेवाली जनकपुत्री सती सीता हुई ॥ ७३० ॥ रामचन्द्रका जीव पहले मलय देशके मंत्रीका पुत्र चन्द्रचूलका मित्र विजय नामसे प्रसिद्ध था फिर तीसरे स्वर्गमें दिव्य भोगोंसे लालित कनकचूल नामका प्रसिद्ध देव हुआ और फिर सूर्यवंशमें अपरिमित बलको धारण करनेवाला रामचन्द्र हुआ ।। ७३१ ।। जो दुःखदायी पापकर्मके दुष्ट उद्यसे उत्पन्न होनेवाले निन्दनीय दुःखसे बहुत दूर रहते थे, जिन्होंने समस्त इन्द्रोंको नम्र बना दिया था, जो सर्वज्ञ थे, वीतराग थे, समस्त सुखोंके भाण्डार थे और जो अन्तमें देवोंके देव हुए-सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए ऐसे अष्टम बलभद्र श्री रामचन्द्रजी हम लोगोंकी इष्ट-सिद्धि करें ।॥ ७३२ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण के संग्रहमें मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकर, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मीधर (लक्ष्मण) नारायण, सीता तथा रावणके पुराणका वर्णन करनेवाला अड़सठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।॥ ६८ ॥
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena