मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 212 to 222
श्लोक ( Shlok ) 212
मुनिसुव्रततीर्थेशसन्ताने सगरद्विषः । महाकालासुरो हिंसायज्ञमज्ञोऽन्वशादमुम् ॥ २१२ ॥
किन्तु श्री मुनिसुव्रतनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें सगर राजासे द्वेष रखने-वाला एक महाकाल नामका असुर हुआ। उसी अज्ञानीने इस हिंसा यज्ञका उपदेश दिया है ।। २१२ ।।
“However, during the spiritual reign (Tīrtha) of the twentieth Tīrthaṅkara, Śrī Munisuvratanātha, there arose a powerful Asura (demon) named Mahākāla, who harbored a deep-seated hatred and animosity toward King Sagara. It was that very ignorant person (Ajñānī) who first propagated and taught the doctrine of this violent sacrifice (Hiṃsā Yajña).” ॥ 212 ॥
श्लोक ( Shlok ) 213
कथं तदिति चेदस्मिन् भारते चारणादिके । युगले नगरे राजाऽजनि नान्ना सुयोधनः ॥ २१३ ॥
महाकालने ऐसा क्यों किया। यदि यह जाननेकी इच्छा है तो सुन लीजिये । इसी भरत क्षेत्र में चारणयुगल नामका नगर है। उसमें सुयोधन नामका राजा राज्य करता था ॥ २१३ ॥
“If you wish to know why Mahākāla did such a thing, then listen attentively! In this very region of Bharata-Kṣetra, there was a city named Cāraṇayugala. In that city, a king named Suyodhana used to rule.” ॥ 213 ॥
श्लोक ( Shlok ) 214 – 219
देवी तस्यातिधिख्यातिस्तनूजा सुलसाऽनयोः । तस्याः स्वयंवरार्थेन दूतोक्त्या पुरमागते ॥ २१४॥महीशमण्डले साकेतेशिनं सगराह्वयम् । तत्रागन्तुं समुद्युक्तमन्यदा “स्वशिरोरुहाम् ॥ २१५ ॥कलापे पलितं प्राच्यं ज्ञात्वा तैलोपलेपिना । निविंद्य विमुखं याते विलोक्य कुशला तदा ॥ २१६ ॥धात्री मन्दोदरी नाम तमित्वा पलितं नवम् । पवित्रं द्रव्यलाभं ते वदतीत्यत्यबुबुधत् ॥ २१७ ॥तत्रैव सचिवो विश्वभूरप्येत्यान्यभूभृताम् । पराङ्मुखी सा त्वामेव सुलसाभिलषत्यलम् ॥ २१८ ॥यथा तथाहं कर्तास्मि कौशलेनेत्यभाषत । तद्वचः श्रवणात्प्रीतः साकेतनगराधिपः ॥ २१९ ॥
उसकी पट्टरानीका नाम अतिथि था, इन दोनोंके सुलसा नामकी पुत्री थी। उसके स्वयं-वरके लिए दूतोंके कहनेसे अनेक राजाओंका समूह चारणयुगल नगरमें आया था। अयोध्याका राजा सगर भी उस स्वयंवरमें जानेके लिए उद्यत था परन्तु उसके बालोंके समूहमें एक बाल सफेद था, तेल लगानेवाले सेवकसे उसे विदित हुआ कि यह बहुत पुराना है यह जानकर वह स्वयंवरमें जानेसे विमुख हो गया, उसे निर्वेद वैराग्य हुआ। राजा सगरकी एक मन्दोदरी नामकी धाय थी जो बहुत ही चतुर थी। उसने सगरके पास जाकर कहा कि यह सफेद बाल नया है और तुम्हें किसी पवित्र वस्तुका लाभ होगा यह कह रहा है। उसी समय विश्वभू नामका मन्त्री भी वहाँ आ गया और कहने लगा कि यह सुलसा अन्य राजाओंसे विमुख होकर जिस तरह आपको ही चाहेगी उसी तरह मैं कुशलतासे सब व्यवस्था कर दूँगा। मन्त्रीके वचन सुननेसे राजा सगर बहुत ही प्रसन्न हुआ ।। २१४-२१९ ।।
“The name of King Suyodhana’s chief queen was Atithi, and they had a daughter named Sulasā. At the invitation of royal messengers, a vast gathering of kings arrived in the city of Cāraṇayugala to attend her Svayaṃvara (a ceremony where a princess chooses her own husband).
King Sagara of Ayodhyā was also eagerly preparing to go to this Svayaṃvara. However, while having his hair tended to, his servant who applied oil informed him that a single strand of hair among his locks had turned white, indicating it was quite old. Upon realizing this sign of aging, Sagara turned away from the idea of attending the Svayaṃvara and was struck by a profound sense of world-weariness and detachment (Nirveda/Vairāgya).
King Sagara had a highly clever and astute foster-mother named Mandodarī. She approached Sagara and comforted him, saying, ‘This white hair is new; it is actually predicting that you are about to gain something deeply sacred.’ At that very moment, his minister named Viśvabhū also arrived there and said, ‘Just as Sulasā will reject all other kings and desire only you, I will skillfully arrange everything in that exact manner.’ Hearing the reassuring words of his minister, King Sagara became immensely pleased.” ॥ 214-219 ॥
श्लोक ( Shlok ) 220 – 222
चतुरङ्गवलेनामा सुयोधनपुरं ययौ । दिनेषु केषुचित्तत्र “यातेषु सुलसाऽन्तिके ॥ २२०॥मन्दोदर्याः कुलं रूपं सौन्दर्य विक्रमो नयः । विनयों विभवो बन्धुः सम्पदन्ये च ये स्तुताः ॥ २२१ ॥गुणा वरस्य तेऽयोध्यापुरेशे राजपुत्रिका । तत्सर्वमवगम्यासीत्तस्मिन्नासंजिताशया ॥ २२२ ॥
वह चतुरङ्ग सेनाके साथ राजा सुयोधनके नगरकी ओर चल दिया और कुछ दिनोंमें वहाँ पहुँच भी । वह चतुरङ्ग सेनाके साथ राजा सुयोधनके नगरकी ओर चल दिया और कुछ दिनोंमें वहाँ पहुँच भी गया। सगरकी मन्दोदरी धाय उसके साथ आई थी। उसने सुलसा के पास जाकर राजा सगरके कुल, रूप, सौन्दर्य, पराक्रम, नय, विनय, विभव, बन्धु, सम्पत्ति तथा योग्य वरमें जो अन्य प्रशंसनीय गुण होते हैं उन सबका व्याख्यान किया। यह सब जानकर राजकुमारी सुलसा राजा सगरमें आसक्त हो गई ।। २२०-२२२ ।।
“Accompanied by his Caturaṅga Senā (four-division army), King Sagara marched toward the city of King Suyodhana and arrived there within a few days.
Sagara’s astute foster-mother, Mandodarī, had accompanied him. She went directly to Princess Sulasā and brilliantly described King Sagara’s noble lineage (Kula), striking appearance (Rūpa), unmatched beauty (Saundarya), valor (Parākrama), political wisdom (Naya), humility (Vinaya), grand majesty (Vibhava), influential kinsmen (Bandhu), vast wealth (Sampatti), and all other praiseworthy virtues that define a perfectly eligible groom.
Upon learning about all these exceptional qualities, Princess Sulasā fell deeply in love with and became entirely devoted to King Sagara.” ॥ 220-222 ॥
श्लोक 223 से 231
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181| श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211
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