चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 262 to 273
श्लोक ( Shlok ) 262 – 267
अन्येधुर्नगरोद्याने कोऽपि तापसरूपधृत् । कुमारं गोलकाद्युक्तबालक्रीडानुषङ्गिणम् ॥ २६२ ॥ विलोक्यास्मात्कियद्दूरं पुरं ब्रूहीति पृष्टवान् । वृद्धस्यापि तवाज्ञत्वं बालोऽप्यत्र न मुह्यति ॥ २६३ ॥ बाह्यं पुरवरोद्याने बालक्रीडावलोकनात् । पुरस्यासन्नवर्तित्वं केन वा नानुमीयते ॥ २६४ ॥ धूमोपलम्भनादग्निद्रव्यं वेति कृतस्मितः । जीवन्धरोऽवदत्तस्य चेप्टाछ यास्वरादिकम् ॥ २६५ ॥दृष्ट्वा श्रुत्वा विविच्यैष सामान्यो नैव बालकः । राजवंशसमुद्भूतिः चिह्नरस्यानुमीयते ॥ २६६ ॥ इति केनाप्युपायेन तद्वंशं स परीक्षितुम् । वाब्छत्नयाचतैनं मे भोजनं दीयतामिति ॥ २६७ ॥
किसी एक दिन जीवन्धर कुमार नगरके बाह्य बगीचेमें अनेक बालकोंके साथ गोली बंटा आदि बालकोंके खेल खेलनेमें व्यस्त थे कि इतनेमें एक तपस्वी आकर उनसे पूछता है कि यहाँ से नगर कितनी दूर है ? तपस्वीका प्रश्न सुनकर जीवन्धर कुमारने उत्तर दिया कि ‘आप वृद्ध तो हो गये परन्तु इतना भी नहीं जानते। अरे, इसमें तो बालक भी नहीं भूलते। नगरके बाह्य बगीचेमें बालकोंको खेलता देख भला कौन नहीं अनुमान लगा लेगा कि नगर पास ही है ? जिस प्रकार कि धूम देखनेसे अग्निका अनुमान हो जाता है उसी प्रकार नगरके बाह्य बगीचेमें बालकोंकी क्रीड़ा देख नगरकी समीपताका अनुमान हो जाता है’ इस प्रकार मुस्कुराते हुए जीवन्धर कुमारने कहा। कुमारकी चेष्टा कान्ति तथा स्वर आदिको देखकर तपस्त्रीने सोचा कि यह बालक सामान्य बालक नहीं है, इसके चिह्नोंसे पता चलता है कि इसकी उत्पत्ति राजवंशमें हुई है। ऐसा विचार कर उस तपस्वीने फिसी उपायसे उसके वंशकी परीक्षा करनी चाही। अपना मनोरथ सिद्ध करनेके लिए उसने जीबन्धरकुमारसे याचना की कि तुम मुझे भोजन दो ।।२६२-२६७॥
“One day, Prince Jivandhara was busy playing childhood games like marbles (Goli-Banta) with many other boys in a garden on the outskirts of the city. Just then, an ascetic arrived and asked him, ‘How far is the city from here?’ Hearing the ascetic’s question, Prince Jivandhara replied with a smile, ‘You have grown old, yet you do not even know this? Why, even a child wouldn’t mistake this! Seeing children playing in the outer garden of a city, who wouldn’t deduce that the city is nearby? Just as the sight of smoke leads to the inference of fire, observing children at play in an outer garden naturally indicates the proximity of the city.’
Beholding the prince’s gestures, radiant splendor, and voice, the ascetic thought to himself that this was no ordinary child, and that his distinct marks revealed his birth in a royal lineage. With this thought, the ascetic wished to test the boy’s lineage through some means. To accomplish his purpose, he made a request to Prince Jivandhara, saying, ‘Give me food.’ || 262-267 ||”
श्लोक ( Shlok ) 268 – 270
कुमारोऽपि प्रतिज्ञाय नीत्वा साथ तमात्मना । पितुः सन्निधिमाहारो मयास्मै स्म प्रदीयतें ॥ २६८ ॥भवाम्प्रमाणमित्याख्यच्छ्रुत्वा तत्तत्पिता मुदा । विनीतोऽयं सुतः श्लाघ्यो ममेत्याश्लिष्य तं मुहुः ॥ २६९॥पुत्र स्नानावसानेऽयं मयामा साधु भोक्ष्यते । त्वया व्यपगताशङ्क भोक्तव्यमिति सोऽभ्यधात् ॥ २७० ॥
जीवन्धरकुमार उसे भोजन देना स्वीकृत कर अपने साथ ले पिताके पास पहुँचे और कहने लगे कि मैंने इसे भोजन देना स्वीकृत किया है फिर, जैसी आप आज्ञा दें। कुमारकी बात सुनकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि मेरा यह पुत्र बड़ा ही विनम्र और प्रशंसनीय है। यह कहकर उन्होंने उसका बार-बार आलिंगन किया और कहा कि हे पुत्र ! यह तपस्वी स्नान करनेके बाद मेरे साथ अच्छी तरह भोजन कर लेगा। तू निःशङ्क होकर भोजन कर ॥ २६८-२७० ॥
“Agreeing to give him food, Prince Jivandhara brought the ascetic along with him to his father and said, ‘I have agreed to provide food to him; now, whatever you command.’ Hearing the prince’s words, the father was immensely pleased and said, ‘This son of mine is exceedingly humble and praiseworthy.’ Saying this, he embraced him again and again and said, ‘O son! After bathing, this ascetic shall comfortably partake of food with me. You may go and eat without any hesitation.’ || 268-270 ||”
श्लोक ( Shlok ) 271 – 273
सहायैः सह संविश्य भोक्तुं प्रारब्धवानसौ । अथार्भकस्वभावेन सर्वमुष्णमिदं कथम् ॥ २७१ ॥भुझेऽहमिति रोदित्वा जननीमकदर्थंयत् । रुदन्तं तं समालोक्य भद्वैशत्ते न युज्यते ॥ २७२ ॥अपि त्वं बयसाल्पीयान् धीस्थो वीर्यादिभिर्गुणैः । अधरीकृतविश्वोऽसि हेतुना केन रोदिषि ॥ २७३ ॥
तदनन्तर जीवन्धरकुमार अपने मित्रोंके साथ बैठकर भोजन करनेके लिए तैयार हुए। भोजन गरम था इसलिए जीवन्धर कुमार रोकर कहने लगे कि यह सब भोजन गरम रखा है मैं कैसे खाऊँ ? इस प्रकार रोकर उन्होंने माताको तंग किया। उन्हें रोता देख तपस्वी कहने लगा कि भद्र ! तुझे रोना अच्छा नहीं लगता । यद्यपि तू अवस्थासे छोटा है तो भी बड़ा बुद्धिमान् है, तूने अपने वीर्य आदि गुणोंसे सबको नीचा कर दिया है। फिर तू क्यों रोता है ? ॥ २७१-२७३ ।।
“Thereafter, Prince Jivandhara sat down with his friends, ready to partake of the meal. Because the food was hot, Prince Jivandhara began to cry, saying, ‘All this food has been served hot, how am I to eat it?’ Crying in this manner, he troubled his mother. Seeing him weep, the ascetic said, ‘O noble youth! It does not suit you to cry. Although you are young in age, you are highly intelligent, and you have surpassed everyone through your virtues such as valor. Why, then, do you weep?’ || 271-273 ||”
श्लोक 274 से 290
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122
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