चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 392 to 403
श्लोक ( Shlok ) 392 – 393
सा विहर्तुं वनं याता दष्टा दुष्टाहिना तदा । य इमां निर्विषीकुर्यान्मणिमन्त्रौषधादिभिः ॥ ३९२ ॥मयेयं कन्यका तस्मै सार्धराज्या प्रदास्यते । घोषणामिति भूपालः पुरे तस्मिन्नचीकरत् ॥ ३९३ ॥
वह कन्या विहार करनेके लिए वनमें गई थी, वहाँ दुष्ट साँपने उसे काट खाया, यह यह देख राजाने अपने नगर में घोषणा कराई कि जो कोई मणि मन्त्र औषधि आदिके द्वारा इस कन्याको निर्विष कर देगा मैं उसे यह कन्या और आधा राज्य दूंगा ॥ ३९२-३९३ ॥
The princess had gone to the forest for recreation, where she was bitten by a venomous serpent. When the king learned of this calamity, he caused a proclamation to be made throughout the city:
“Whoever succeeds in neutralizing the poison and restoring my daughter to health by means of a precious gem, sacred mantras, medicinal remedies, or any other effective method shall receive this princess in marriage, together with half of my kingdom.”॥392–393॥
श्लोक ( Shlok ) 394 – 396
फणिवैद्यास्तदाकर्ण्य प्रागप्यादिष्टमीदृशम् । मुनिनादित्यनान्नेति कन्यालोभाष्चिकित्सितुम् ॥ ३९४ ॥सम्प्राप्य बहवो नोपसंहर्तु तदशक्नुवन् । राजाज्ञया पुनर्वैधमन्वेष्टुं परिचारकाः ॥ ३९५ ॥ धावन्तो दैवसंयोगात्कुमारमवलोक्य ते । किमस्ति विषविज्ञानमित्यपृच्छंस्तमाकुलाः ॥ ३९६ ॥
आदित्य नामके मुनिराजने यह बात पहले ही कह रक्खी थी इसलिए राजाकी यह घोषणा सुनकर साँपके काटनेका दवा करने वाले बहुत से वैद्य, कन्याके लोभसे चिकित्सा करनेके लिए आये परन्तु उस विषको दूर करनेमें समर्थ नहीं हो सके । तदनन्तर राजाकी आज्ञासे सेवक लोग फिर भी किसी वैद्यको ढूँढ़नेके लिए निकले और इधर-उधर दौड़-धूप करनेवाले उन सेवकोंने भाग्यवश जीवन्धर कुमारको देखा । देखते ही उन्होंने बड़ी व्यग्रतासे पूछा कि क्या आप विष उतारना जानते हैं ? ३९४-३९६ ।।
The venerable monk Āditya had foretold this event long beforehand. Therefore, upon hearing the king’s proclamation, many physicians skilled in treating snakebite came forward, tempted by the prospect of winning the princess. Yet, despite their utmost efforts, none was able to neutralize the deadly venom.
Thereafter, by the king’s command, his attendants once again set out in search of a physician. As they hurried anxiously from place to place, fortune led them to Prince Jīvandhara. The moment they saw him, they eagerly asked:
“Do you know how to counteract the effects of poison?”॥394–396॥
श्लोक ( Shlok ) 397
सोऽपि तज्ज्ञायते किञ्चिन्मयेति प्रत्यभाषत । तद्वषः श्रुतिसन्तुष्टास्ते नयन्ति स्म तं मुदा ॥ ३९७ ॥
जीवन्धर कुमारने भी उत्तर दिया कि हाँ, कुछ जानता हूं। उनके वचन सुनकर सेवक लोग बहुत ही सन्तुष्ट हुए और उन्हें बड़े हर्षसे साथ ले गये ॥ ३९७ ॥
Prince Jīvandhara replied, “Yes, I know something of the art.” Hearing his words, the attendants were greatly delighted and, filled with joy, respectfully escorted him with them. ॥397॥
श्लोक ( Shlok ) 398
सोऽपि यक्षमनुस्मृत्य ‘फणिमन्त्रविशारदः । अभिमन्त्र्याकरोद्वीतविषवेगां नृपात्मजाम् ॥ ३९८ ॥
साँप काटनेका मन्त्र जाननेमें निपुण जीवन्धरने भी उस यक्षका स्मरण किया और मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर राजपुत्रीको विष-वेगसे रहित कर दिया ।। ३९८ ।।
Prince Jīvandhara, who was well versed in the sacred mantras for curing snakebite, remembered the Yakṣa. Then, by chanting and consecrating the appropriate mantra, he freed the princess from the violent effects of the venom. ॥398॥
श्लोक ( Shlok ) 399 – 403
जाततोषो नृपस्तस्य सत्त्वच्छायादिलक्षणैः । अवश्यं राजवंशोऽयमिति निश्चित्य पुत्रिकाम् ॥ ३९९ ॥अर्धराज्यञ्च पूर्वोक्तं तस्मै वितरति स्म सः । ततः स लोकपालादिकन्यकाभ्रातृभिः समम् ॥ ४०० ॥द्वात्रिंशता चिरं रेमे तद्गुणैरनुरञ्जितः । दिनानि कानिचित्तत्र स्थित्वा दैवप्रचोदितः ॥ ४०१ ॥कदाचिग्निशि केनापि जनेनानुपलक्षितः । गत्वा गव्यूत्तिकाः काश्चित्क्षेमाख्यविषये पुरम् ॥ ४०२ ॥झेमाह्वयमवाप्यास्य वने बाह्य मनोरमे । सहस्रकूटै राजन्तं जिनालयमलोकत ॥ ४०३ ॥
इससे राजाको बहुत सन्तोष हुआ उसने तेज तथा कान्ति आदि लक्षणोंसे निश्चय कर लिया कि यह अवश्य ही राजवंशमें उत्पन्न हुआ है इसलिए उसने अपनी पुत्री और पहले कहा हुआ आधा राज्य उन्हें समर्पण कर दिया। उस कन्याके लोकपाल आदि बत्तीस भाई थे उनके गुणोंसे अनुरञ्जित होकर जीवन्धर कुमार उन्हीं के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे । तदनन्तर वहाँ कुछ दिन रहकर भाग्यकी प्रेरणाले वे किसीसे कुछ कहे बिना ही रात्रिके समय चुपचाप वहाँ से 1चल पड़े और कितने ही कोश चलकर क्षेम देशके क्षेम नामक नगर में जा पहुँचे । वहाँ उन्होंने नगरके बाहर मनोहर वनमें हजार शिखरोंसे सुशोभित एक जिन मन्दिर देखा ॥ ३९९-४०३ ॥
This greatly delighted the king. Judging from Prince Jīvandhara’s splendour, radiance, and other noble marks, he became convinced that the Prince must surely have been born into a royal lineage. Accordingly, he bestowed upon him his daughter in marriage, together with the half of the kingdom that he had previously promised.
The princess had thirty-two brothers, including Lokapāla and others. Delighted by their virtues and noble qualities, Prince Jīvandhara spent a long time joyfully sporting and enjoying himself in their company.
After residing there for some days, however, he was impelled by destiny to depart secretly in the night, without informing anyone. Travelling for many kos, he eventually reached a city named Kṣema, situated in the country of Kṣema. There, in a beautiful grove outside the city, he beheld a splendid Jina temple adorned with a thousand lofty spires. ॥399–403॥
श्लोक 404 से 412
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391
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