नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 455 | श्लोक 456 से 471 | श्लोक 472 से 481
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 482 to 491
श्लोक ( Shlok ) 482 – 486
तदा कंसाज्ञया विष्णुविधेया गोपसूनवः । दपिंणो भुजमास्फाल्य धृतमल्लपरिच्छदाः ॥ ४८२ ॥श्रवणाह्लादिवादित्रचटुलध्वनिसङ्गताः । “क्रमोत्क्षेपविनिक्षेपाः प्रोन्नतासद्वयोद्धराः ॥ ४८३ ॥पर्यायनतितप्रेक्ष्यभ्र भङ्गा भीषणारवाः । निवर्तनैः ‘समावर्तनैः सम्भ्रमणवल्गनैः ॥ ४८४ ॥प्लवनैः समवस्थानैरन्यैश्च करणैः स्फुटैः। रङ्गाभ्यर्णमलंकृत्य तस्थुर्नैत्रमनोहराः ॥ ४८५ ॥’प्रोद्दताः कंसमलाश्च चाणूरप्रमुखास्तथा । रङ्गाभ्याशं समाक्रम्य विक्रमैकरसाः स्थिताः ॥ ४८६ ॥
इसके बाद कंसकी आज्ञासे कृष्ण के सेवक, अहंकारी तथा मल्लोंका वेष धारण करनेवाले अनेक गोपाल बालक अपनी भुजाओंको ठोकते हुए रङ्गभूमिमें उतरे । उस समय कानोंको आनन्दित करनेवाले बाजोंकी चञ्चल ध्वनि हो रही थी और उसीके अनुसार वे सब अपने पैर रखते उठाते थे, ऊँचे उठे हुए अपने दोनों कन्धोंसे वे कुछ गर्विष्ठ हो रहे थे, कभी दाहिनी भ्रुकुटि चलाते थे तो कभी बांई। बीच-बीचमें भयंकर गर्जना कर उठते थे, वे कभी आगे जाकर पीछे लौट जाते थे, कभी आगे चक्कर लगाते थे, कभी थिरकते हुए चलते थे, कभी उछल पड़ते थे और कभी एक ही स्थान पर निश्चल खड़े रह जाते थे। इस तरह साफ-साफ दिखनेवाले अनेक पैंतरोंसे नेत्रोंको अच्छे लगनेवाले वे मल्ल रङ्गभूभिको अलंकृत कर खड़े थे। उनके साथ ही रङ्गभूमिको घेर कर चाणूर आदि कंसके प्रमुख मल्ल भी खड़े हुए थे। कंसके वे मलअहंकारसे भरे हुए थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो वीर रसके अवतार ही हों ।। ४८२-४८६ ॥
“Thereafter, at Kansa’s command, many cowherd boys who served Krishna—proudly arrayed in the attire of professional wrestlers—entered the arena, slapping their arms in challenge. At that moment, the lively and delightful sound of musical instruments filled the air, and they raised and placed their feet in perfect sync with the rhythm. With their shoulders held high, they exuded a certain pride, occasionally twitching their right eyebrow, and at times the left.
Every now and then, they would let out a terrifying roar. They would step forward and then fall back, sometimes circle ahead, sometimes move with a dancing step, sometimes leap up, and sometimes stand completely motionless in one spot. Thus, gracing the arena with their visually striking movements and maneuvers, those wrestlers stood ready. Alongside them, encircling the arena, stood Chanoora and other prominent wrestlers of Kansa. Those wrestlers of Kansa were filled with immense arrogance and appeared as though they were the very incarnation of the Veer Rasa (the heroic sentiment).” || 482-486 ||
श्लोक ( Shlok ) 487
मध्येरङ्गमुदात्तचित्तविसरो वीरोरुमल्लाग्रणीः प्रागेव प्रतिमल्लयुद्धविजयं प्राप्येव दीप्रद्युतिः ।भास्वन्तञ्च दिवोऽवतीर्णमधुना योद्धं गतं मलताम् जेष्यामीति विवृद्धविक्रमरसः सम्भावयन्स स्वयम् ॥ ४८७ ॥
उस ” समय रङ्गभूमिमें खड़े हुए कृष्ण बहुत भले जान पड़ते थे, उनके चित्तका विस्तार अत्यन्त उदार था, वे बड़े-बड़े वीर पहलवानोंमें अग्रेसर थे, उनकी कान्ति ऐसी दमक रही थी मानो उन्होंने पहले ही प्रतिमल्लके युद्धमें विजय प्राप्त कर ली हो, उनका पराक्रम रूपी रस उत्तरोत्तर बढ़ रहा था और उन्हें ऐसा उत्साह था कि यदि इस समय मल्लका रूप धर कर सूर्य भी आकाशसे नीचे उतर आवे तो उसे भी जीत लूँगा ॥ ४८७ ॥
“At that moment, Krishna looked exceptionally magnificent standing in the arena. The expanse of his heart was immensely noble, and he was the foremost among the greatest, most heroic wrestlers. His aura was shining so brilliantly as if he had already achieved victory over his opponent in battle. His essence of valor was growing greater by the moment, and his enthusiasm was such that he felt, ‘Even if the Sun itself were to descend from the sky today in the form of a wrestler, I would conquer him too.'” || 487 ||
श्लोक ( Shlok ) 488
घनधृतपरिधानो बद्धकेशो विकूर्चः सहजमसृणगात्रश्चित्तवृत्तिप्रवीणः ।सततकृतनियोगाद्गोपमल्लैरमले -रविकलजयलम्भः सर्वसम्भावितौजाः ॥ ४८८ ॥
उस समय उनके वक्ष बहुत कड़े बँधे थे, बाल बँधे थे, ढाँढ़ी मूँछ थी ही नहीं, शरीर स्वभावसे ही चिकना था, वे गोप मल्लोंके साथ अमल्लोंकी तरह सदा युद्धका अभ्यास करते और पूर्ण विजय प्राप्त करते थे, और उनके पराक्रमकी सब सराहना करते थे ।। ४८८ ॥
“At that time, his chest was firmly bound, his hair was tied up, and he had no beard or mustache at all; his body was naturally sleek and smooth. He used to practice wrestling constantly with the cowherd boys in a friendly, non-adversarial manner (amallon ki tarah), always achieving complete victory, and everyone highly praised his valor.” || 488 ||
श्लोक ( Shlok ) 489
स्थिरचरणविवेशो वज्रसारास्थिबन्धो भुजपरिघविधायी मुष्टिसंमाय्यमध्यः ।कठिनपृथुलवक्षाः स्थूलनीलाव्रितुङ्ग-स्त्रिगुणितनिजमूतिर्दर्पस पाहुर्राक्ष्यः ॥ ४८९ ॥
उनके चरणोंका रखना स्थिर होता था, उनकी हड्डियोंका गठन वञ्जके सारके समान सुदृढ़ था, उनकी भुजाएँ अर्गलके समान लम्बी तथा मजबूत थीं, उनकी कमर मुट्ठीमें समानेके योग्य थी, वक्षःस्थल अत्यन्त कठोर तथा चौड़ा था, वे बड़े भारी नीलगिरिके समान थे, उनका शरीर सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंकी मानो मूर्ति था और गर्वके संचारसे कोई उनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकता था ।। ४८९ ।।
“The placement of his feet was perfectly steady, and the structure of his bones was as unshakable and strong as the core of a thunderbolt (vajra). His arms were as long and powerful as iron door-bolts, his waist was slender enough to be held in a single fist, and his chest was exceptionally firm and broad. He resembled the vast and massive Nilgiri mountain. His body was like the very embodiment of the three cosmic qualities—Sattva (purity), Rajas (passion), and Tamas (inertia)—and due to his majestic pride, no one dared to even raise their eyes to look directly at him.” || 489 ||
श्लोक ( Shlok ) 490
ज्वलितचलितनेत्रों निष्ठुराबद्धमुष्टिः परिणतकरणौघो मंक्षु सञ्चारदक्षः ।भृशमशनिरिवोओं नन्दसूनुः स्थितः सन् भयमवहदसह्यं प्रेतनाथस्य चोच्चैः ॥ ४९० ॥
उनके चमकीले नेत्र चञ्चल हो रहे थे, वे बड़ी मजबूत मुट्ठी बाँधे थे, उनकी इन्द्रियोंका समूह पूर्ण परिपक्क था, वे शीघ्र गमन करनेमें दक्ष थे, और वज्रके समान अत्यन्त उग्र थे, इस प्रकार युद्ध-भूमिमें खड़े हुए नन्द गोपके पुत्र श्रीकृष्ण यमराजके लिए भी असहनीय भारी भय उत्पन्न कर रहे थे ॥ ४९० ।।
“His brilliant eyes were sharp and dynamic, his fists were clenched incredibly tight, and his sensory faculties were fully matured and perfected. He was highly skilled in swift movement and was as intensely fierce as a thunderbolt. Standing thus in the arena, Shri Krishna, the son of Nandagopa, evoked an overwhelming and intolerable fear even in Yama, the God of Death himself.” || 490 ||
श्लोक ( Shlok ) 491
रूपीव शौर्यमखिलं मिलितं वलं वा रंहः समस्तमपि संहतिमीयिवद्वा ।सिंहाकृतिः स सहसा कृतसिंहनादो रङ्गादलङ्घत नभोऽङ्गणमङ्गणं वा ॥ ४९१ ॥
वे श्रीकृष्ण ऐसे जान पड़ते थे मानो समस्त शुरवीरता ही रूप धरकर आ गईथी, अथवा समस्त बल आकर इकट्ठा हुआ था, अथवा समस्त बल एकत्रित हो गया था, सिंह जैसी आकृतिको धारण करनेवाले उन्होंने सिंहनाद किया और रङ्गभूमिसे उछल कर आकाश रूपी आंगनको लाँघ दिया मानो घरका आंगन ही लाँघ दिया हो ॥ ४९१ ॥
“Shri Krishna appeared as though the entirety of heroism itself had assumed a physical form, or as if all the strength in the universe had gathered and concentrated into one place. Possessing a lion-like stature, he let out a thunderous roar and leaped from the arena, effortlessly clearing the courtyard of the sky as if it were merely the courtyard of a house.” || 491 ||
श्लोक 492 से 497
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