चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 251 to 261
श्लोक ( Shlok ) 251 – 253
अथेत्वा तेन यन्त्रेण तस्मात्सा विजयाह्वया । दण्डकारण्यमध्यस्थं महान्तं तापसाश्रमम् ॥ २५१ ॥तत्राप्रकाशमेवैषा वसति स्म समाकुलाम् । तां यक्षी समुपागत्य तच्छोकापनुदेच्छया ॥ २५२ ॥ सक्ष्वस्थोचितश्रव्यकथाभिः संसृतेः स्थितिम् । प्ररूप्य धर्ममार्गच प्रत्यहं समरीरमत् ॥ २५३ ॥
अथानन्तर – विजया रानी उसी गरुड़मन्त्र पर बैठकर दण्डकके मध्यमें स्थित तपस्वियों केकिसी बड़े आश्रममें पहुंची और वहाँ गुप्त रूपसे – अपना परिचय दिये बिना ही रहने लगी । जब वह विजया रानी शोकसे व्याकुल होती थी तब वह यक्षी आकर उसका शोक दूर करनेकी इच्छासे उसकी अवस्थाके योग्य श्रवणीय कथाओंसे उसे संसारकी स्थिति बतलाती थी, धर्मका मार्ग बतलाती थी और इस तरह प्रति दिन उसका चित्त बहलाती रहती थी ।। २५१-२५३ ।।
“Thereafter, seated upon the same mechanical Garuda (Garuda Yantra), Queen Vijaya reached a large hermitage of ascetics situated in the midst of the Dandaka forest, and there she began to live in secrecy, without revealing her true identity. Whenever Queen Vijaya became overwhelmed with grief, that Yakshi would appear and, with the desire to dispel her sorrow, would explain the true nature of the world through delightful stories suited to her condition, guiding her along the path of righteousness (Dharma), and thus comforting her mind day after day. || 251-253 ||”
श्लोक ( Shlok ) 254 – 257
इतः सत्यन्धराख्यस्य नृपेन्द्रस्य कनीयसी । भामारतिः परानङ्गपताका च मनोरमे ॥ २५४ ॥ मधुरं वकुलञ्चान्यमलभेतां सुतावुभौ । ज्ञात्वा तद्धर्मसद्भावं गृहीतश्रावकव्रते ॥ २५५ ॥ तौ च गन्धोत्कटेनैव पोषितौ वृद्धिमापतुः । तत्रैव श्रावको जातो मत्यन्तविजयाह्नह्वयः ॥ २५६ ॥ सागरो धनपालाख्यश्चतुर्थो मतिसागरः । सेनापतिः पुरोधाश्च श्रेष्ठी मन्त्री च भूभुजः ॥ २५७ ॥
इधर महाराज सत्यन्धरकी भांमारति और अनंगपताका नामकी दो छोटी स्त्रियाँ और थीं। उन दोनोंने मधुर और वकुल नामके दो पुत्र प्राप्त किये। इन दोनों ही रानियोंने धर्मका स्वरूप जानकर श्रावकके व्रत धारण कर लिये थे। इसलिए ये दोनों ही भाई गन्धोत्कटके यहाँ ही पालन-पोषण प्राप्तकर बढ़े हुए थे। उसी नगर में विजयमति सागर, धनपाल और मतिसागर नामके चार श्रावक और थे जो कि अनुक्रमसे राजाके सेनापांत, पुरोहित, श्रेष्ठी और मन्त्री थे ।। २५४-२५७ ।।
“Meanwhile, King Satyandhara had two other junior wives named Bhamarati and Anangapataka. They gave birth to two sons named Madhura and Vakula. Having understood the true nature of righteousness (Dharma), both these queens had taken the vows of a lay disciple (Shravaka). For this reason, these two brothers were also brought up and nurtured at the house of Gandhotkata. In that very city, there lived four other lay disciples (Shravakas) named Vijaya, Matisagara, Dhanapala, and another Matisagara, who were respectively the king’s army commander (Senapati), priest, chief merchant (Shresthi), and minister. || 254-257 ||”
श्लोक ( Shlok ) 258 – 261
भार्या जयावती श्रीमती श्रीदत्ता यथाक्रमम् । चतुर्थ्यनुपमा तेर्षा देवसेनः सुतोऽपरः ॥ २५८ ॥बुद्धिषेणो वरादिश्च दत्तो मधुमुखः क्रमात् । षट् ते जीवन्धराख्येन मधुराद्याः सुताः समम् ॥ २५९ ॥ अवर्धन्त कुमारेण बालकेलीपरायणाः । जीवादयः पदार्था वा लोकात्तस्मान्महाशयात् ॥ २६० ॥ नक्त’ दिवं निजप्राणसमाः क्वाप्यनपायिनः । अथ नन्दापि नन्दाक्यं क्रमेणाप्तवशी सुतम् ॥ २६१ ॥
इन चारोंकी स्त्रियोंके नाम अनुक्रमसे जयावती, श्रीमती, श्रीदत्ता और अनुपमा थे। इनसे क्रमसे देवसेन, बुद्धिषेण, वरदत्त और मधुमुख नामके पुत्र उत्पन्न हुए थे। मधुरको आदि लेकर वे छहों पुत्र, जीवन्धर कुमारके साथ ही वृद्धिको प्राप्त हुए थे, निरन्तर कुमारके साथ ही बालक्रीड़ा करनेमें तत्पर रहते थे और जिस प्रकार जीवाजीवादि छह पदार्थ कभी भी लोकाकाशको छोड़कर अन्यन्त्र नहीं जाते हैं उसी प्रकार वे छहों पुत्र उत्कृष्ट अभिप्रायके धारक जीवन्धर कुमारको छोड़कर कहीं अन्यत्र नहीं जाते थे । रात-दिन उनके साथ ही रहते थे और उनके प्राणोंके समान थे। तदनन्तर गन्धोत्कटकी स्त्री सुनन्दाने भी अनुक्रमसे नन्दाढ्य नामका पुत्र प्राप्त किया ।। २५८-२६१ ॥
“The wives of these four were named Jayavati, Shrimati, Shridatta, and Anupama, respectively. To them were born sons named Devasena, Buddhishena, Varadatta, and Madhumukha, in due order. These six sons, beginning with Madhura, grew up alongside Prince Jivandhara and were constantly engaged in childhood sports with him. Just as the six substances (Dravyas)—soul, non-soul, and others (Jiva-Ajiva)—never leave the inhabited universe (Loka-akasha) to go elsewhere, those six sons never left the side of Prince Jivandhara, who possessed the noblest dispositions. They remained with him day and night and were like his very life-breaths. Thereafter, Gandhotkata’s wife, Sunanda, also gave birth to a son named Nandadhya. || 258-261 ||”
श्लोक 262 से 273
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250
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