चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 64 to 72
श्लोक ( Shlok ) 64 – 66
अग्रजास्यास्तदागत्य पुत्रेणामा मृगावती । तद्ज्ञात्योदयनाख्येन स्नेहादालिङ्गय चन्दनाम् ॥ ६४ ॥ पृष्ट्वा तां प्राक्तनं वृत्तं श्रुत्वा शोकाकुला भृशम् । ‘निजगेहं समानीय सुस्थिता भयविह्नलौ ॥ ६५ ॥ स्वपादशरणौ भद्रां श्रेष्ठिनञ्च दयावती । चन्दनापादपङ्के जयुगलं तावनीननमन् ॥ ६६॥
तदनन्तर चन्दनाकी बड़ी बहिन मृगावती यह समाचार जानकर उसी समय अपने पुत्र उद्यनके साथ उसके समीप आई और स्नेहसे उसका आलिङ्गन कर पिछला समाचार पूछने लगी तथा सब पिछला समाचार सुनकर बहुत ही व्याकुल हुई। तदनन्तर रानी मृगावती उसे अपने घर ले जाकर सुखी हुई। यह देख भद्रा सेठानी और वृषभसेन सेठ दोनों ही भयसे धबड़ाये और मृगावतीके चरणोंकी शरणमें आये। दयालु रानीने उन दोनों से चन्दना के चरण-कमलोंमें प्रणाम कराया ।। ६४-६६ ।।
Thereafter, upon learning of this news, Chandana’s elder sister Mrigavati immediately came to her along with her son Udayana. Embracing her with deep affection, she began to inquire about what had happened, and upon hearing the entire story of her past plight, she became extremely distressed. Afterward, Queen Mrigavati was overjoyed to take Chandana to her own palace. Seeing this, both the merchant’s wife Bhadra and the merchant Vrishabhasena became terrified with fear and sought refuge at the feet of Mrigavati. The compassionate queen then had both of them bow down and pay obeisance at the lotus-like feet of Chandana. [64-66]
श्लोक ( Shlok ) 67 – 72
मूर्तिमतीवेयं कृत्वाह्लादं तयोस्ततः । तद्वाताकर्णनोदीर्णरागादागतवन्धुभिः ॥ ६७ ॥ प्रापितैतत्पुरं वीरं वन्दितुं निजबान्धवान् । विसृज्य जातनिर्देगा गृहीत्वात्रैव संयमम् ॥ ६८ ॥ तपोवगममाहात्म्यादध्यस्थादृणिनीपदम् । इतीहजन्मसम्बन्धं श्रुत्वा तत्रानुचेटकः ॥ ६९ ॥ प्राक्किं कृत्वागता चन्दनात्रैतत्स च पृष्टवान् । सोऽप्यवादीदिहैवास्ति मगधे नगरी पृथुः ॥ ७० ॥वत्सेति पालयत्येनां महीपाले प्रसेनिके । विप्रस्तत्राग्निमित्राख्यस्तस्यैका ब्राह्मणी प्रिया ॥ ७१ ॥परा वैश्यसुता सूनुर्याह्मण्यां शिवभूतिवाक् । दुहिता चित्रसेनाख्या “विद्युतायामजायत ॥ ७२ ॥
चन्दना के क्षमाकर देनेपर वे दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि यह मानो मूर्तिमती क्षमा ही है। इस समाचार के सुननेसे उत्पन्न हुए स्नेहके कारण चन्दनाके भाई-बन्धु भी उसके पास आ गये। उसी नगर में सबलोग महावीर स्वामीकी वन्दना के लिए गये थे, चन्दना भी गई थी, वहाँ वैराग्य उत्पन्न होनेसे उसने अपने सब भाई-बन्धुओंको छोड़कर दीक्षा धारण कर ली और तपञ्चरण तथा सम्यग्ज्ञानके माहात्म्यसे उसने उसी समय गणिनीका पद प्राप्त कर लिया। इस प्रकार चन्दना वर्तमानके भवकी बात सुनकर राजा चेटकने फिर प्रश्न किया कि चन्दना पूर्व जन्ममें ऐसा कौन-सा काये करके यहाँ आई है। इसके उत्तर में गणधर भगवान् कहने लगे-इसी मगध देशमें एक वत्सा नामकी विशाल नगरी है। राजा प्रसेनिक उसमें राज्य करता था। उसी नगरीमें एक अग्निमित्र नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी दो स्त्रियाँ थीं एक ब्राह्मणी और दूसरी वैश्यकी पुत्री । ब्राह्मणी के शिवभूति नामका पुत्र हुआ और वैश्य पुत्रीके चित्रसेना नामकी लड़कीउत्पन्न हुई ।। ६७-७२ ॥
Upon being forgiven by Chandana, both of them became immensely delighted and remarked that she was like forgiveness personified. Drawn by the affection generated upon hearing this news, Chandana’s kinsmen and relatives also arrived to see her. Everyone in that city had gone to pay their respects to Lord Mahavira Swami, and Chandana went too. Experiencing a profound sense of detachment (renunciation) there, she left all her relatives behind and accepted initiation into asceticism. Through the spiritual power of her penance and right knowledge, she attained the status of a Ganini (the head of the female ascetic order) at that very moment.
Having heard this account of Chandana’s present life, King Chetaka asked yet another question: “What actions did Chandana perform in her past life that led her to be born here?” In response, the Ganadhar Lord began to narrate—in this very region of Magadha, there is a vast city named Vatsa. King Prasenika ruled over it. In that same city lived a Brahmin named Agnimitra. He had two wives: one a Brahmin woman, and the other the daughter of a Vaishya. The Brahmin wife gave birth to a son named Shivabhuti, and the Vaishya’s daughter gave birth to a daughter named Chitrasena. [67-72]
श्लोक 73 से 81
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63
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