नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 112 to 124
श्लोक ( Shlok ) 112 – 116
चम्पापुरेश्वरो यान्तीमानाय्यादित्यनामकः । बालभानुमिवान्तस्थं बालकं स सविस्मयः ॥ ११२ ॥पश्यन् स्वदेव्यै राधायै तोकः स्यादिति भाववित् । दत्वा सकृद्विलोक्यैनं राधाकर्णपरिस्पृशम् ॥११३॥अस्तु कर्णाभिधानोऽयमिति सादरमब्रवीत् । पाण्डोः कुन्त्या च मद्या च पाणिग्रहणपूर्वकम् ॥ ११४ ॥प्राजापत्येन सम्बन्धो विवाहेनाभवत्पुनः । कुन्त्यामजनि धर्मिष्ठो धर्मपुत्रो अधराधिपः ॥ ११५ ॥भीमसेनोऽनुपार्थश्च त्रयो वर्गत्रयोपमाः । माद्रयां च नकुलो ज्येष्ठः सहदेवस्ततोऽन्वभूत् ॥ ११६ ॥
चम्पापुरके राजा आदित्यने बहती हुई सन्दूकचीको मँगाकर जब खोला तो उसके भीतर स्थित बालसूर्यके समान बालकको देखकर वह विस्मयमें पड़ गया। उसने सोचा कि यह पुत्र अपनी रानी राधाके लिए हो जायगा। यह विचार कर उसने वह पुत्र राधाके लिए दे दिया। राधाने जब उस पुत्रको देखा तब वह अपने कर्ण- क्रानका स्पर्श कर रहा था इसलिए उसने बड़े आदरसे उसका कर्ण नाम रख दिया । यह सब होनेके बाद राजा पाण्डुका कुन्ती और माद्रीके साथ पाणिग्रहणपूर्वक प्राजापत्य विवाहसे सम्बन्ध हो गया । कुन्तीके धर्मपुत्र-युधिष्ठिर नामका धर्मात्मा राजा उत्पन्न हुआ फिर क्रमसे भीमसेन और अर्जुन उत्पन्न हुए। उसके ये तीनों पुत्र धर्म अर्थ काम रूप त्रिवर्गके समान जान पड़ते थे। इसी प्रकार माद्रीके ज्येष्ठ पुत्र सहदेव और उसके बाद नकुल उत्पन्न हुआ था ।। ११२-११६ ।।
“When King Aditya of Champapur brought over the floating chest and opened it, he was struck with wonder upon seeing a child inside who resembled the rising sun. He thought that this boy would be a perfect son for his queen, Radha. With this thought, he gave the child to Radha. When Radha looked at the boy, he was touching his own ears; therefore, with great respect, she named him Karna.
Following these events, King Pandu was formally wedded to Kunti and Madri through the Prajapatya form of marriage. To Kunti, a righteous king named Yudhishthira was born as the son of Dharma, followed in succession by Bhimasena and Arjuna. These three sons of hers appeared like the personification of the Trivarga—Dharma (righteousness), Artha (wealth), and Kama (desire). Similarly, Madri gave birth to her eldest son Sahadeva, followed by Nakula.” ( 112–116)
श्लोक ( Shlok ) 117 – 118
धृतराष्ट्राय गान्धारी दत्ता दुर्योधनोऽजनि । तयोर्दुःशासनः पश्चादथ दुर्धर्षणस्ततः ॥ ११७ ॥मर्षणाद्याः सर्वेऽपि शतमेकं महौजसः । एवं सुखेन सर्वेषां कालो गच्छति लीलया ॥ ११८ ॥
धृतराष्ट्रके लिए गान्धारी दी गई थी अतः उन दोनोंके सर्व प्रथम दुर्योधन उत्पन्न हुआ । उसके पश्चात् दुःशासन, दुर्धर्षण तथा दुर्मर्षण आदि उत्पन्न हुए। ये सब महाप्रतापी सौ भाई थे। इस तरह सबका काल लीला पूर्वक सुखसे व्यतीत हो रहा था ।। ११७-११८ ॥
“Gandhari had been given in marriage to Dhritarashtra, and thus, Duryodhana was born as their very first child. After him, Dushasana, Durdharshana, and Durmarshana, among others, were born. All together, they were one hundred highly majestic and powerful brothers. In this manner, time was passing happily and effortlessly for everyone.” (117–118)
श्लोक ( Shlok ) 119 – 124
अन्येधुः सुप्रतिष्ठाख्यो मुनीन्द्रो गन्धमादने । गिरौ सन्निहितः शूरवीराख्यो वन्दितुं निजैः ॥ ११९ ॥पुत्रपौत्रादिभिः सार्द्धं गत्वाभ्यच्र्य्याभिनुत्य तम् । श्रत्वा धर्म तदुद्दिष्टं स संवेगपरायणः ॥ १२० ॥कृत्वाभिषेचनं दत्त्वा राज्यमन्धकवृष्टये । योग्योऽयमिति संयोज्य यौवराज्यं कनीयसे ॥ १२१ ॥संयमं स्वयमादाय तपांस्युच्चैः समाचरन् । गतेषु द्वादशाब्देषु पर्वते गन्धमादने ॥ १२२ ॥प्रतिमायोगमालम्ब्य सुप्रतिष्ठस्य तिष्ठतः । देवः सुदर्शनो नाम चकारोपद्रवं क्रुधा ॥ १२३ ॥ उपसर्ग विजित्यास्य सोढ्वाऽशेपपरीषहान् । ध्यानेनाहत्य घातीनि प्रादुरासीत् स केवली ॥ १२४ ॥
किसी दूसरे दिन गन्धमादन नामक पर्वत पर श्री सुप्रतिष्ठ नामक मुनिराज आकर विराजमान हुए। राजा शूरवीर अपने पुत्र पौत्र आदि के साथ उनकी वन्दनाके लिए गया। वहाँ जाकर उसने उनकी पूजा की, स्तुति की और उनके द्वारा कहा हुआ धर्मका उपदेश सुना । उपदेश सुननेसे उसका चित्त संसारसे भयभीत हो गया अतः उसने अभिषेक कर अन्धकवृष्टिके लिए राज्य दे दिया और ‘यह योग्य है’ ऐसा समझकर छोटे पुत्र नर-वृष्टिके लिए युवराज पद दे दिया। तदनन्तर वह स्वयं संयम धारण कर उत्कृष्ट तपश्चरण करने लगा । अनुक्रमसे बारह वर्ष बीत जानेपर वही सुप्रतिष्ठ मुनिराज उसी गन्धमादन पर्वत पर प्रतिमा योग धारण कर पुनः विराजमान हुए। उस समय सुदर्शन नामके देवने क्रोधवश कुछ उपसर्ग किया परन्तु वे इसके द्वारा किये हुए समस्त उपसर्गको जीतकर तथा समस्त परिषहोंको सह कर ध्यानके द्वारा घातिया कर्मोंका क्षय करते हुए केवलज्ञानी हो गये ॥ ११९-१२४ ॥
“On another day, the great sage (Muniraj) named Shri Supratishtha arrived and took his seat on the Gandhamadan mountain. King Shuraveer, along with his sons, grandsons, and others, went to pay his respects to him. Upon reaching there, the king worshiped him, offered prayers of praise, and listened to the discourse on Dharma (righteousness) delivered by him.
On hearing this discourse, the king’s mind became detached and fearful of the cycle of worldly existence (Samsara). Therefore, after performing the anointment ceremony, he handed over the kingdom to Andhakavrishti, and deeming it appropriate, bestowed the title of Crown Prince (Yuvaraj) upon his younger son, Naravrishti. Thereafter, he himself embraced self-restraint and began practicing supreme penance.
In due course, after twelve years had passed, the same sage Supratishtha returned to the Gandhamadan mountain and sat in the Pratima Yoga (a deeply meditative, motionless posture). At that time, a deity named Sudarshana, driven by anger, inflicted several afflictions and obstacles (upsargas) upon him. However, the sage conquered all the obstacles caused by him, endured all the hardships (parishahas), and by destroying the destructive (Ghatiya) karmas through pure meditation, attained omniscience (Kevalajnana).” ( 119–124)
श्लोक 125 से 131
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