अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 414 to 422
श्लोक ( Shlok ) 414 – 415
प्रकृष्टदिव्यभोगानां भोक्तेति बननायकः । तत्त्वार्थ तद्वचो ध्यायन्नहो माहात्म्यमीदृशम् ॥ ४१४ ॥व्रतस्याभीप्सितं सौख्यं प्रापयेदिति भावयन् । समाधिगुप्तमभ्येत्य श्रावकव्रतमग्रहीत् ॥ ४१५ ॥
वह तो स्वर्ग के श्रेष्ठ भोगोंका भोक्ता हुआ है। इस प्रकार वनका स्वामी शूरवीर, यक्षीके यथार्थ वचनोंपर विचार करता हुआ कहने लगा कि अहो ! व्रतका ऐसा माहात्म्य है ? अवश्य ही वह इच्छित सुख को प्राप्त कराता है। ऐसा विचार कर उसने समाधिगुप्त मुनिराजके समीप जाकर श्रावकके व्रत धारण कर लिये ।। ४१४-४१५ ।।
“‘He has instead become the enjoyer of the supreme, sublime pleasures of the heavenly realm.’ In this manner, reflecting deeply upon the truthful words of the Yakshi, the courageous master of the forest began to ponder, ‘Ah! Such is the transcendent glory of a spiritual vow? It most certainly fulfills and bestows every desired happiness.’ Contemplating thus, he approached the holy ascetic Muni Samadhigupta and formally adopted the vows of a layman (Shravaka). || 414–415 ||”
श्लोक ( Shlok ) 416
भध्योऽयमिति तं मत्वा यक्षी तत्पक्षपाततः । उपायेनानयज्जैनं धर्म सा हि हितैषिता ॥ ४१६ ॥
इस प्रकार उस यक्षीने उसे भव्य समझकर उसके पक्षपातसे इस उपाय के द्वारा उसे जैनधर्म धारण कराया सो ठीक ही है क्योंकि हितैषिता-पर हितकी चाह रखना, यही है ।। ४१६ ॥
“In this manner, discerning that he was a capable and virtuous soul (Bhavya), that deity (Yakshi), out of pure benevolent partiality toward him, employed this skillful artifice to establish him firmly in the Jain faith. And this is entirely fitting; for what else constitutes true well-wishing (Hitaishita) if not the unadulterated desire for the absolute spiritual welfare of others? || 416 ||”
श्लोक ( Shlok ) 417 – 422
स्वर्गात्खदिरसारोऽपि द्विसागरमितायुषा । दिव्यं भोगोपभोगान्ते निदानात्यच्युतस्ततः ॥ ४१७ ॥सूनुः कुणिकभूपस्य श्रीमत्यां त्वमभूरसौ । अथान्यदा पिता तेऽसौ’ मत्पुत्रेषु भवेत्पतिः ॥ ४१८ ॥राज्यस्य कतमोऽत्रेति निमित्तैः सकलैरपि । सम्यक्परीक्ष्य सन्तुष्टो निसर्गात्स्नेहितस्त्वयि ॥ ४१९ ॥ राज्यस्यार्थोऽयमेवेति निश्चित्यापायशङ्कया । दायादेभ्यः परित्रातुं त्वां सुधीः कृत्रिमक्रुधा ॥ ४२० ॥ निराकरोत्पुरात्तस्माद्देशान्तरमभीयुषः । अप्रकाशनृपादेशभयात्ताः सकलाः प्रजाः ॥ ४२१ ॥ नन्दिग्रामनिवासिन्यः प्रत्युत्थानपुरस्सरम् । स्नानभोजनशय्यादिक्रियावैमुख्यमागमन् ॥ ४२२ ॥
उधर खदिरसारका जीव भी दो सागर तक दिव्य भोगोंका उपभोगकर स्वर्गसे च्युत हुआ और यहाँ राजा कुणिककी श्रीमती रानीसे तू श्रेणिक नामका पुत्र हुआ है। अथानन्तर किसी दिन तेरे पिताने यह जानना चाहा कि मेरे इन पुत्रोंमें राज्यका स्वामी कौन होगा ? उसने निमित्तज्ञानियोंके द्वारा बताये हुए समस्त निमित्तों से तेरी अच्छी तरह परीक्षा की और वह इस बातका निश्चय कर बहुत ही संतुष्ट हुआ कि राज्यका स्वामी तू ही है। तुझपर वह स्वभावसे ही स्नेह करता था अतः राज्यका अधिकारी घोषित होनेके कारण तुझपर कोई संकट न आ पड़े इस भयसे दायादोंसे तेरी रक्षा करनेके लिए उस बुद्धि-मान् ने तुझे बनावटी क्रोधसे उस नगरसे निकाल दिया। तू दूसरे देशको जानेकी इच्छासे नन्दिग्राममें पहुँचा। राजाकी प्रकट आज्ञाके भयसे नन्दिग्राम में रहने वाली समस्त प्रजा तुझे देखकर न उठी और न उसने स्नान, भोजन, शयन आदि कार्योंकी व्यवस्था ही की, वह इन सबसे विमुख रही ।। ४१७-४२२ ।।
“Meanwhile, the soul of Khadirasara, after enjoying the sublime celestial pleasures for a duration of two Sagaras (ocean-like cosmic spans), descended from that heavenly realm and was conceived here by Queen Shrimati, the consort of King Kunika, as thee—her son named Shrenika. Subsequently, one day, thy father desired to ascertain which among his sons would inherit the sovereignty of the kingdom. He rigorously tested thee according to all the signs foretold by the master astrologers (Nimittagyanis); upon determining that thou alone wert destined to be the master of the realm, he was profoundly gratified.
Because he naturally possessed deep affection for thee, and fearing lest some calamity should befall thee upon being declared the heir to the throne, that wise king—intending to protect thee from rival kinsmen (dayadas)—banished thee from the city under the guise of an artificial, fabricated anger. With the intent of traveling to another land, thou arrivedst at Nandigram. Stricken by the terror of the king’s public decree, the entire populace residing in Nandigram neither rose to welcome thee upon thy arrival nor made any arrangements for thy bathing, dining, or lodging; instead, they remained entirely aloof from all such hospitable acts. || 417–422 ||”
श्लोक 423 से 431
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22| श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413
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