मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 122 to 125
श्लोक ( Shlok ) 122
चिरं राज्यसुखं भुक्त्वा स्वायुरन्ते स चक्रभृत् । बद्ध्वायुर्नारकं घोरम ‘वधिस्थानमेयिवान् ॥ १२२ ॥
चिरकाल तक राज्य सुख भोगनेके बाद चक्रवर्ती – नारायणदत्त, नरकगति सम्बन्धी भयङ्कर आयुका बन्ध कर सातवें नरक गया ॥ १२२ ॥
“After enjoying the immense pleasures of royal sovereignty for a very long time, the Narayana, Datta, bound the terrifying karma that determines a life span in hell, and consequently descended into the seventh hell.” || 122 ||
श्लोक ( Shlok ) 123
तन्निर्वेदेन रामोऽपि सम्भूतजिनसन्निधौ । दीक्षित्वा बहुभिर्भूपैरभूद गृहकेवली ॥ १२३ ॥
भाईके वियोगसे बलभद्रको बहुत वैराग्य हुआ अतः उसने सम्भूत जिनेन्द्रके पास अनेक राजाओंके साथ दीक्षा ले ली तथा अन्तमें केवली होकर मोक्ष प्राप्त किया ।॥ १२३ ॥
“Deeply detached from all worldly attachments due to the separation from his brother, Balabhadra embraced complete renunciation. Along with numerous other kings, he accepted initiation into asceticism under the Lord Jinendra Sambhuta. Ultimately, he attained omniscience (Kevala Jnana) and achieved final liberation (Moksha).” || 123 ||
श्लोक ( Shlok ) 124
वाराणस्यामभूतां पुरुकुलतिलकौ नन्दमित्रश्च दत्तोदत्तोऽसौ सप्तमीं क्ष्मां समगमदपरोऽप्याप कैवल्यलक्ष्मीम् ॥ १२४ ॥
जो पहले अयोध्यानगर में प्रसिद्ध राजपुत्र हुए थे, फिर दीक्षा लेकर आयुके अन्तमें सौधर्म-स्वर्गमें देव हुए, वहाँसे च्युत होकर जो बनारस नगरमें इक्ष्वाकु वंशके शिरोमणि नन्दिमित्र और दत्त नामके बलभद्र तथा नारायण हुए। उनमेंसे दत्त तो मर कर सातवीं भूमिमें गया और नन्दिषेण कैवल्य-लक्ष्मीको प्राप्त हुआ ।॥ १२४ ॥
“Those who were first born as the renowned princes in the city of Ayodhya, who then accepted initiation into asceticism and, upon the completion of their lifespans, became celestial beings (Devas) in the Saudharma Heaven; after descending from that celestial realm, they were born in the city of Varanasi as Nandimitra and Datta—the crown jewels of the Ikshvaku dynasty, who ruled as Balabhadra and Narayana respectively. Among them, Datta upon his death descended to the seventh hellish ground, while Nandishena attained the ultimate glory of absolute omniscience (Kevala Jnana).” || 124 ||
श्लोक ( Shlok ) 125
मन्त्री चिरं जननवारिनिधौ भ्रमित्वा पश्चाद् बलीन्द्र इति नामधरः खगेशः ।दत्तादवाप्तमरणो नरकं दुरन्तं प्रापत्ततः परिहरन्त्वनुबद्धवैरम् ॥ १२५ ॥
मंत्रीका जीव चिरकाल तक संसार-सागर में भ्रमण कर पीछे बर्लीन्द्र नामका विद्याधर हुआ और दत्त नारायणके हाथसे मरकर भयंकर नरकमें पहुँचा, इसलिए सज्जन पुरुषोंको वैरका संस्कार छोड़ देना चाहिये ।। १२५ ।।
“The soul of the minister wandered through the ocean of worldly existence for an immense period before becoming the Vidyadhara named Balindra, only to be slain at the hands of Datta-Narayana and cast into a terrifying hell. Therefore, virtuous and righteous souls must completely uproot and abandon the imprint of enmity (Vair) from their hearts.” || 125 ||
इत्यार्षे भगवद्रुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे मल्लितीर्थंकर-पद्मचक्रि-नन्दिमित्र-बलदेव-दत्तनामवासुदेव-बलीन्द्राख्यप्रतिवासुदेवपुराणं परिसमाप्तम् ॥ ६६ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहमें मल्लिनाथतीर्थंकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन करने वाला छयासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
“Thus ends the sixty-sixth chapter—which narrates the sagas of Tirthankara Mallinatha, Chakravarti Padma, Baladeva Nandimitra, Narayana Datta, and Prati-Narayana Balindra—in the great compendium Trishashti-Lakshana Mahapurana Sangraha composed by the venerable Acharya Gunabhadra, widely renowned as the sacred word of the ancient seers (Arsha).”
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन
पर्व 67 – श्लोक 1 से 11
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 192
मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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