चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 384 to 391
श्लोक ( Shlok ) 384 – 386
सहाया बान्धवाश्चास्य प्रवृत्तेरनभिज्ञकाः । पवनान्दोलितालोलबालपल्लवलीलया ॥ ३८४ ॥अकम्पिषत सर्वेऽपि स्वान्सन्धर्तुमशक्तकाः । गन्धर्वदत्ता तद्याननिमिराज्ञा निराकुला ॥ ३८५ ॥कुमारस्य न भीरस्ति तद्विभीत स्म मात्र भोः। स मङ्क्ष्वेतीति तान् सर्वान् प्रशान्ति प्रापयत्सुधीः ॥ ३८६॥
जीवन्धर कुमारकी प्रवृत्तिको नहीं जानने वाले उनके साथी और भाई-बन्धु लोग हवासे हिलते हुए चञ्चल छोटे पत्तोंके समान कँपने लगे और वे सब अपने आपको संभालनेमें समर्थ नहीं हो सके । परन्तु गन्धर्वदत्ता जीवन्धरके जानेका कारण जानती थी इसलिए वह निराकुल रही। ‘कुमारको कुछ भी भय नहीं है, इसलिए आप लोग डरिये नहीं, वे शीघ्र ही आजायेंगे, ऐसा कह कर उस बुद्धिमतीने सबको शान्त कर दिया ।। ३८४-३८६ ।।
Unaware of the course of Prince Jīvandhara’s actions, his companions and kinsmen began to tremble like tender, restless leaves shaken by the wind. Overwhelmed with anxiety, none of them was able to compose or steady himself.
Gandharvadattā, however, knew the reason for Jīvandhara’s departure and therefore remained calm and undisturbed. Addressing them, that wise lady said:
“Prince Jīvandhara is in no danger whatsoever; therefore, do not be afraid. He will return very soon.”
With these reassuring words, the intelligent Gandharvadattā comforted them all and restored peace to their troubled hearts. ॥384–386॥
श्लोक ( Shlok ) 387
जीवन्धरोऽपि यक्षस्य वसतौ सुचिरं सुखम् । स्थित्वा जिगमिषां स्वस्याज्ञापयद्यक्षमिङ्गितैः ॥ ३८७ ॥
उधर जीवन्धर कुमार भी यक्षके घरमें बहुत दिनतक सुखसे रहे । तदनन्तर चेष्टाओंसे उन्होंने यक्षसे अपने जानेकी इच्छा प्रकट की ।। ३८७॥
Meanwhile, Prince Jīvandhara continued to reside happily in the Yakṣa’s abode for many days. Thereafter, through his gestures and manner, he conveyed to the Yakṣa his desire to depart. ॥387॥
श्लोक ( Shlok ) 388 – 389
तदभिप्रायमालक्ष्य यक्षो दत्वा स्फुरत्प्रभाम् । साधनीमीप्सितार्थानां मुद्रिकां कामरूपिणीम् ॥ ३८८ ॥तदद्रेश्वतार्येनं न भीरस्य कुतश्चन । इति किञ्चिदनुब्रज्य तममुञ्चत्कृताञ्चनः ॥ ॥ ३८९ ॥
उनका अभिप्राय जानकर यक्षने उन्हें जिसकी कान्ति देदीप्यमान है, जो इच्छित कार्योंको सिद्ध करने वाली है, और इच्छानुसार रूप बना देने वाली है ऐसी एक अंगूठी देकर उस पर्वतसे नीचे उतार दिया और उन्हें किसीसे भी भयकी आशंका नहीं है यह विचार कर वह यक्ष कुछ दूर तो उनके पीछे आया और बादमें पूजा कर चला गया ॥ ३८८-३८९ ॥
Having understood Prince Jīvandhara’s intention, the Yakṣa presented him with a ring of resplendent radiance—one capable of accomplishing all desired purposes and of assuming whatever form its wearer wished. He then helped the Prince descend from the mountain.
Believing that Prince Jīvandhara had no cause to fear anyone, the Yakṣa accompanied him for some distance. Thereafter, having reverently paid his respects to him, the Yakṣa took his leave and departed. ॥388–389॥
श्लोक ( Shlok ) 390
कुमारोऽपि ततः किञ्चिद्वस्वान्तरमुपेयिवान् । पुरं चन्द्राभनामानं सज्योत्स्रं वा सुधागृहैः ॥३९०॥
कुमार भी वहाँ से कुछ दूर चल कर चन्द्राभ नामक नगरमें पहुँचे। वह नगर चूनासे पुते हुए महलोंसे ऐसा जान पड़ता था मानों चाँदनीसे सहित ही हो ॥ ३९० ॥
Proceeding some distance from that place, the Prince arrived at a city named Candrābha. With its palaces gleaming white beneath their fresh coating of lime, the city appeared as though it were suffused with the very radiance of moonlight. ॥390॥
श्लोक ( Shlok ) 391
नृपो धनपतिस्तस्य पालको लोकपालवत् । देवी तिलोतमा तस्य तयोः पश्चोरामा सुता ॥ ३९१ ॥
वहाँ के राजाका नाम धनपति था जो कि लोकपालके समान नगरकी रक्षा करता था। उसकी रानीका नाम तिलोत्तमा था और उन दोनोंके पद्मोत्तमा नामकी पुत्री थी ॥ ३९१ ॥
The king of that city was named Dhanapati. Like a guardian deity of the world, he diligently protected and governed his kingdom. His queen was named Tilottamā, and the two had a daughter named Padmottamā. ॥391॥
श्लोक 392 से 403
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383
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