मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 102 to 112
श्लोक ( Shlok ) 102
कृत्याकृत्यविवेकोऽस्य न बाल्यादेव विद्यते । प्रमादोऽस्माकमेवायं विनेयाः पितृभिः सुताः ॥ १०२ ॥
हे देव ! इसे कार्यऔर अकार्यका विवेक बाल्य-अवस्थासे ही नहीं है, यह हमलोगोंका ही प्रमाद है क्योंकि माता- पिताके द्वारा ही बालक सुशिक्षित और सदाचारी बनाये जाते हैं ।॥ १०२ ॥
“O Lord! He has lacked the discrimination between what should be done and what should not be done since his very childhood, and this is entirely our own negligence; for it is only by the parents that a child is made well-educated and virtuous.”102
श्लोक ( Shlok ) 103
न दान्तोऽयं नृभिर्दन्ती शैशवे चेद् यथोचितम् । प्राप्तैश्वर्यो न किं कुर्यादसौ दर्पग्रहाहितः ॥ १०३ ॥
यदि हाथीको बाल्या-वस्थामें यथायोग्य रीतिसे वशमें नहीं किया जाता तो फिर वह मनुष्योंके द्वारा वशमें नहीं कियाजा सकता; यही हाल बालकोंका है। यदि ये बाल्यावस्थामें वश नहीं किये जाते हैं तो वे आगे चलकर ऐश्वर्य प्राप्त होनेपर अभिमानरूपी ग्रहसे आक्रान्त हो क्या कर गुजरेंगे इसका ठिकाना नहीं ॥ १०३ ॥
“If an elephant is not properly brought under control during its youth, it can never be tamed by men later on; the exact same is the case with children. If they are not disciplined in their childhood, there is no telling what they might do in the future when they attain wealth and power, being completely possessed by the demon of arrogance.”103
श्लोक ( Shlok ) 104
न बुद्धिमान् न दुर्बुद्धिर्न वधं दण्डमर्हति । आहार्यबुद्धिरेषोऽतः शिक्षणीयोऽधुनाप्यलम् ॥ १०४ ॥
यह कुमार न तो बुद्धिमान् है और न दुबुद्धि ही है इसलिए प्राणदण्ड देनेके योग्य नहींहै। अभी यह आहार्य बुद्धि है- इसकी बुद्धि बदली जा सकती है अतः इस समय इसे अच्छी तरहशिक्षा देना चाहिये ॥ १०४ ॥
“This prince is neither wise nor is he wicked; therefore, he does not deserve the death penalty. At present, his intellect is malleable (receptive to external influence)—his mindset can be changed. Hence, at this time, he must be given a thorough and wholesome education.”104
श्लोक ( Shlok ) 105
न कोपोऽस्मिस्तवास्त्येव न्यायमार्गे निनीषया । निगृह्रास्येक एवायं राज्यसन्ततिसंवृतौ ॥१०५॥
कुमार पर आपका कोप तो है नहीं, आप तो न्यायमार्गपर लेजानेके लिए ही इसे दण्ड देना चाहते हैं परन्तु ‘आपको इस बातका भी ध्यान रखना चाहिये कि राज्यकी संतति धारण करनेके लिए यह एक ही है- आपका यही एक मात्र पुत्र है ।॥ १०५ ॥
“Your Majesty holds no malice or anger toward the prince; you merely wish to punish him to lead him back to the path of justice. However, you must also keep in mind that he is the sole heir to sustain the lineage of this kingdom—he is your one and only son.”105
श्लोक ( Shlok ) 106
अन्यत्संधित्सतोऽत्रान्यत्प्रच्युतं तदिति श्रुतिः । सा तवाद्य समायाति सन्तानोच्छेदकारिणः ॥१०६॥
यदि आप इस एक ही संतानको नष्ट कर देंगे तो ‘कुछ करना चाहते थे और कुछ हो गया’ यह लोकोक्तिआज ही आपके शिर आ पड़ेगी ॥ १०६ ॥
“If you destroy this only child of yours, then the proverb—’one set out to do something, but something completely different happened’—will come true upon your own head this very day.”106
श्लोक ( Shlok ) 107
एतत्पूस्कारतो ज्येष्ठं तनूजमवधीन्नृपः । इत्यवाच्यभयग्रस्ताः पौराचैते पुरःस्थिताः ॥ १०७ ॥
दूसरी बात यह है कि इन लोगोंके रोने चिल्लानेसे महाराजने अपने बड़े पुत्रको मार डाला इस निन्दाके भयसे ग्रस्त हुए ये अभी नगरवासी आपकेसामने खड़े हुए हैं ।। १०७ ॥
“Furthermore, fearing the infamy that ‘the King executed his eldest son merely because of the weeping and wailing of these people,’ these very citizens of the city are now standing right here before you.”107
श्लोक ( Shlok ) 108 – 112
तत्क्षमस्वापराधं मे महीशप्रार्थितोऽस्यमुम् । एतन्मन्त्रिवचः श्रुत्वा विरूपकमुदीरितम् ॥ १०८॥अविद्भिरिव शास्त्रार्थ भवद्भिः श्रुतपारणैः । दुष्टानां निग्रहः शिष्टपालनं भूभुजां मतम् ॥ १०९ ॥ नीतिशास्त्रेषु तत्स्नेहमोहासक्तिभयादिभिः । अस्माभिर्लङ्घिते न्याये भवन्तस्तस्य वर्तकाः ॥ ११०॥ तस्मादयुक्तं युष्माकं मां योजयितुमुत्पथे । दुष्टो दक्षिणहस्तोऽपि स्वस्य छेद्यो महीभुजा ॥१११॥ कृत्याकृत्यविवेकातिदूरो मूढो महीभुजः । स साङ्ख्यपुरुषस्तेन कृत्यं ‘नात्रापरत्र च ॥११२॥
इसलिए हे महाराज ! हम प्रार्थना करते हैं कि हमलोंगोंका यह अपराध क्षमा कर दिया जाय। मंत्री के यह बचन सुनकर राजाने कहा कि आपका कहना ठीक नहीं है। ऐसा जान पड़ता है कि आपलोग शास्त्र के पारगामी हो कर भी उसका अर्थ नहीं जानते हैं। दुष्टोंका निग्रह करना और सज्जनोंका पालन करना यह राजाओंका धर्म, नीतिशास्त्रोंमें बतलाया गया है। संह, मोह, आसक्ति तथा भय आदि कारणोंसे यदि हम ही इस नीतिमार्गका उल्लंघन करते हैं तो आप लोग उसकी प्रवृत्ति करने लग जायेंगे। इसलिए आप लोगोंका मुझे उन्मार्गमें लगाना अच्छा नहीं है। यदि अपना दाहिना हाथ भी दुष्ट-दोषपूर्ण हो जाय तो राजाको उसे भी काट डालना चाहिये । जो मूर्ख राजा करने योग्य और नहीं करने योग्य कार्यों के विवेकसे दूर रहता है वह सांख्यमत में माने हुए पुरुषके समान है। उससे इस लोक और परलोक सम्बन्धी कोई भी कार्य सिद्ध नहीं हो सकता ।। १०८-११२ ॥
“Therefore, O King! We pray that this offense of ours be forgiven.” Hearing these words of the minister, the king replied, “What you say is not right. It appears that despite being well-versed in the scriptures, you do not understand their true meaning. Punishing the wicked and protecting the virtuous has been prescribed as the duty of kings in the treatises on ethics (Niti-shastras). If, out of affection, delusion, attachment, or fear, we ourselves violate this path of righteousness, then you all will begin to follow that wayward tendency. Therefore, it is not proper for you to lead me into the wrong path. Even if one’s own right hand becomes corrupted with evil, a king must chop it off. That foolish king who remains devoid of the discrimination between what ought to be done and what ought not to be done is like the ‘Purusha’ (passive consciousness) conceptualized in the Samkhya philosophy. Through him, no purpose—pertaining either to this world or the next—can ever be accomplished.” 108 – 112
श्लोक 113 से 121
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