नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 244 to 252
श्लोक ( Shlok ) 244 – 245
ततः सूर्योदये राजगेहे तद्रक्षकाग्रणीः । अनिरीक्ष्यानुजं राज्ञो राजादेशादितस्ततः ॥ २४४ ॥ पर्यटन्बहुभिः सार्द्धं तमन्वेष्टुमथैक्षत । भस्मीभूतं शवं तत्र भ्राम्यन्तं च तुरङ्गमम् ॥ २४५ ॥
तदनन्तर सूर्योदय होनेपर जब उनके प्रधान प्रधान रक्षकोंने राजमन्दिरमें कुमार वसुदेवको नहीं देखा तो उन्होंने राजा समुद्र-विजयको खबर दी और उनकी आज्ञानुसार अनेक लोगोंके साथ उन्हें खोजनेके लिए वे रक्षक लोग इधर-उधर घूमने लगे। कुछ समय बाद उन्होंने श्मशानमें जला हुआ मुर्दा और उसीके आस पास घूमता हुआ कुमार वसुदेवका घोड़ा देखा ।। २४४-२४५ ।।
Thereafter, at sunrise, when the chief guards did not find Prince Vasudeva in the royal palace, they informed King Samudra-vijaya. Following his orders, the guards, accompanied by many people, began searching for him in all directions. After some time, they spotted a burnt corpse in the cremation ground and Prince Vasudeva’s horse wandering around nearby. || 244-245 ||
श्लोक ( Shlok ) 246 – 247
तत्कण्ठे पत्रमादाय नीत्वा राज्ञे समार्पयत् । तत्पत्रार्थ समाकर्ण्य समुद्रविजयादयः ॥ २४६ ॥ महीभुजः परे चातिशोकसन्तप्तचेतसः । “नैमित्तिकोक्ततद्योगक्षेमज्ञाः शममागताः ॥ २४७ ॥
घोड़ाके गलेमें जो पत्र बँधा था उसे लेकर उन्होंने राजा समुद्रविजयके लिए सौंप दिया । पत्रमें लिखा हुआ समाचार सुनकर समुद्रविजय आदि भाई तथा अन्य राजा लोग सभी शोकसे अत्यन्त दुःखी हुए परन्तु निमित्तज्ञानीने जब कुमार वसुदेवके योग्य और क्षेमका वर्णन किया तो उसे जानकर सब शान्त हो गये ॥ २४६-२४७ ॥
Taking the letter that was tied around the horse’s neck, they handed it over to King Samudra-vijaya. Upon hearing the news written in the letter, Samudra-vijaya, his brothers, and the other kings were all deeply grieved with sorrow. However, when the astrologer (one who knows omens/signs) described Prince Vasudeva’s capability and well-being, everyone was comforted and became calm upon learning it. || 246-247 ||
श्लोक ( Shlok ) 248
भृत्यान्महीपतिः स्नेहात्स तदैव समन्ततः । तं गवेषयितुं दक्षान् प्राहिणोत्सहितान् बहून् ॥ २४८ ॥
राजा समुद्रविजयने उसी समय स्नेह वश, बहुतसे हितैषी तथा चतुर सेवकोंको कुमार वसुदेवकी खोज करनेके लिए भेजा ।। २४८ ।।
At that very moment, out of affection, King Samudra-vijaya dispatched many well-wishing and clever servants to search for Prince Vasudeva. || 248 ||
श्लोक ( Shlok ) 249 – 252
विजयाख्यं पुरं गत्वा सोऽप्यशोकमहीरुहः । मूले विश्रान्तये तस्थौ तरुच्छायामवस्थिताम् ॥ २४९ ॥ समीक्ष्यादैशिकप्रोक्तमभूदवितथं वचः । इत्युद्यानपतिर्गत्वा मगधेशमबुबुधत् ॥ २५० ॥ राजापि ध्यामलाख्यां स्वां सुतां तस्मै समार्पयत् । दिनानि कानिचित्तत्र विश्रम्य गतवांस्ततः ॥२५१॥ देवदारुवने पुष्परम्याख्ये वनजाकरे । अरण्यवारणेनासौ क्रिडित्वारुह्य तं सुदा ॥ २५२ ॥
इधर कुमार वसुदेव विजयपुर नामक गाँवमें पहुँचे और विश्राम करनेके लिए अशोक वृक्षके नीचे बैठ गये । कुमारके बैठनेसे उस वृक्षकी छाया स्थिर हो गई थी उसे देख कर वागवान् ने सोचा कि उस निमित्तज्ञानीके वचन सत्य निकले। ऐसा विचार कर उसने मगधदेशके राजाको इसकी खबर दी और राजाने भी अपनी श्यामला नामकी कन्या कुमार वसुदेवके लिए समर्पित की । कुमारने कुछ दिन तक तो वहाँ विश्राम किया, तदनन्तर वहाँ से आगे चल दिया। अब वे देवदारु वनमें पुष्परम्य नामक कमलोंके सरोवरके पास पहुँचे और वहाँ किसी जंगली हाथीके साथ क्रीड़ा कर बड़ी प्रसन्नतासे उसपर सवार हो गये ॥ २४९-२५२ ॥
Meanwhile, Prince Vasudeva reached a village named Vijayapur and sat down under an Ashoka tree to rest. Seeing that the tree’s shadow had become stationary because the Prince was sitting under it, the gardener thought to himself that the words of the astrologer had indeed come true. Reflecting on this, he informed the King of Magadha, who then offered his daughter, named Shyamala, to Prince Vasudeva in marriage. The Prince rested there for a few days and thereafter moved ahead from that place. He then reached a lotus lake named Pushparamya in a Deodar forest, where he playfully engaged with a wild elephant and joyfully mounted it. || 249-252 ||
श्लोक 253 से 273
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144
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