अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 503 to 513
श्लोक ( Shlok ) 503 – 506
क्वचिदात्यन्तिकीं पुंसि यान्ति सार्धमविद्यया । रागादयस्तिरोभूतिं तारतम्यावलोकनात् ॥ ५०३ ॥सामग्रीसनिधानेन कनकाश्मकलङ्कवत् । तत्तथावन्न जायेत तारतम्यञ्च नो भवेत् ॥ ५०४ ॥ दृष्टेस्तदस्तु चेन्मूलहानिः केन निवार्यते । सर्वशास्त्रकलाभिज्ञे सर्वज्ञोक्तिर्जिनोदिता ॥ ५०५ ॥ मुख्यसर्वज्ञसंसिद्धिं गौणत्वात्साधयेदियम् । चैत्रे सिंहाभिधानेन मुख्यसिंहस्य सिद्धिवत् ॥ ५०६ ॥
रागादिक भावों और अविद्यामें तारतम्य देखा जाता है अतः किसी पुरुषमें अविद्याके साथ-साथ रागादिक भाव सर्वथा अभावको प्राप्त हो जाते हैं। जिस प्रकार सामग्री मिलनेसे सुवर्ण पाषाणकी कीट कालिमा आदि दोष दूर हो जाते हैं उसी प्रकार तपश्चरण आदि सामग्री मिलनेपर पुरुषके रागादिक दोष भी दूर हो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं माना जाय तो उनमें तारतम्य – हीनाधिकपंना भी सिद्ध नहीं हो सकेगा परन्तु तारतम्य देखा जाता है इसलिए रागादि दोषोंकी निर्मूल हानिको कौन रोक सकता है? समस्त शास्त्रों और कलाओंके जानने वाले मनुष्यको लोग सर्वज्ञ कह देते हैं सो उनकी यह सर्वज्ञकी गौण युक्ति ही मुख्य सर्वज्ञको सिद्ध कर देती है जिस प्रकार कि चैत्र नामक किसी पुरुषको सिंह कह देनेसे मुख्य सिंहकी सिद्धि हो जाती है ॥ ५०३-५०६ ।।
“‘A degree of variation—an increase or decrease—is observed in the states of attachment (Raga) and ignorance (Avidya); therefore, it is entirely possible for attachment and ignorance to achieve absolute non-existence in a particular soul. Just as the impurities, dross, and blackness of gold ore are completely removed when the appropriate purifying materials are applied, in the very same way, the flaws of attachment and aversion in a soul can be completely eradicated upon attaining the proper spiritual means, such as the practice of austerities (Tapashcharana).
If this were not accepted, then the variation—the relative degrees of lesser or greater intensity—in these flaws could not be established either. Yet, this variation is clearly perceived; therefore, who can deny the root-level destruction of attachment and other flaws?
When people label a man who has mastered all arts and sciences as “omniscient,” their figurative application of omniscience actually serves to prove the existence of the primary, literal Omniscient Being (Mukhya Sarvajna)—just as calling a man named Chaitra a “lion” figuratively presupposes the existence of a real, actual lion.’” [503-506]
श्लोक ( Shlok ) 507 – 510
न मां प्रति प्रयोगोऽयं मुक्तिहेतोर्निराकृतेः । अवस्थादेशकालादिभेदाद्भिनासु शक्तिसु ॥ ५०७ ॥ भावानामनुमानेन प्रतीतिरतिदुर्लभा । यत्नेन साधितोऽप्यर्थः कुशलैरनुमातृभिः ॥ ५०८ ॥ अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथा क्रियते यतः । हस्तस्पर्शादिवान्धस्य विषमे पथि धावतः ॥ ५०९ ॥ अनुमानप्रधानस्य विनिपातो न दुर्लभः । इति चेद्विप्र नैतेन गृह्यते महतां मनः ॥ ५१० ॥
‘कदाचित् यह कहा जाय कि सर्वज्ञ सिद्ध करनेका यह प्रयोग मेरे लिए नहीं हो सकता क्योंकि आपने जो मोक्षका कारण बतलाया है उसका निराकरण किया जा चुका है । अवस्था देश-काल आदिके भेदसे शक्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रकारकी हैं इसलिए रागादि दोषोंकी हीनाधिकता तो संभव है परन्तु उनका सर्वथा अभाव संभव नहीं है। अनुमानके द्वारा भावोंकी प्रतीति करना अत्यन्त दुर्लभ है क्योंकि बड़े कुशल अनुमाता यत्न पूर्वक जिस पदार्थको सिद्ध करते हैं अन्यप्रवादियोंकी ओरसे वह पदार्थ अन्यथा सिद्ध कर दिया जाता है। जिस प्रकार केवल हाथके स्पर्शसे विषय-मार्ग में दौड़ने वाले अन्धे मनुष्यका मार्गमें पड़जाना दुर्लभ नहीं है उसीप्रकार अनुमानको प्रधान मानकर चलने वाले पुरुषका भी पड़ जाना दुर्लभ नहीं है। हे विप्र ! यदि तुम ऐसा कहते हो तो इससे महापुरुषोंका मन आकर्षित नहीं हो सकता’ ।। ५०७-५१०॥
“‘Should you argue: “This syllogistic proof for establishing an omniscient being cannot be applicable to me, because the cause of liberation (Moksha) that you stated has already been refuted. Potencies vary distinctly based on differences in state, place, and time; therefore, while varying degrees of intensity in flaws like attachment are possible, their absolute non-existence is impossible.
Furthermore, comprehending inner states through inference (Anumana) is exceedingly difficult. A reality established with great effort by a highly skilled logician is easily proven otherwise by opponents of differing philosophical traditions.
Just as a blind man running along a path relying solely on the touch of his hands is bound to fall, in the same way, a man who moves forward treating inference as his primary guide is highly likely to stumble. O Brahmin! If this is what you claim, then it cannot win over the minds of great thinkers.”’” [507-510]
श्लोक ( Shlok ) 511 – 513
हेतुवादोऽप्रमाणं चेद्यथाश्रुतिरकृत्रिमा । इतीदं सत्यमेवं किं कृत्रिमा श्रुतिरित्यपि ॥ ५११ ॥ वाक्प्रयोगो न तथ्यः स्याद्धेत्वभावाविशेषतः । मृत्वा शीर्वापि तद्धेतुरेषितव्यस्त्वयापि सः ॥ ५१२ ॥इष्टं तस्मिन्मयाभीष्टो विश्ववित्किं न सिध्यति । ततस्तत्प्रोक्तसूक्तेन विरुद्धं नेष्यते बुधैः ॥ ५१३ ॥
इसका भी कारण यह है कि यदि हेतुवादको अप्रमाण मान लिया जाता है तो जिस प्रकार ‘वेद अकृत्रिम हैं- अपौरुषेय हैं’ आपका यह कहना सत्य है तो उसी प्रकार ‘वेद कृत्रिम हैं- पौरुषेय हैं’ हमारा यह कहना भी सत्य ही क्यों नहीं होना चाहिये ? हेतुके अभावकी बात कहो तो वह दोनों ओर समान है। इस प्रकार मर-सड़ कर भी आपको हेतुवाद स्वीकृत करना ही पड़ेगा और जब आप इस तरह हेतुवाद स्वीकृत कर लेते है तब मेरे द्वाराअभीष्ट सर्वज्ञ क्या सिद्ध नही हो जाता है? अवश्य सिद्ध हो जाता है। इसलिए विद्वान् लोग सर्वज्ञ भगवान्के द्वारा कहे हुए वचनोंके विरुद्ध कोई बात स्वीकृत नहीं करते हैं ।॥ ५११-५१३ ॥
“‘The reason for this is that if logical reasoning (Hetuvada) is considered unauthoritative, then just as your assertion that “the Vedas are unauthored and eternal (Apaurusheya)” is taken as true, why shouldn’t our assertion that “the Vedas are authored and man-made (Paurusheya)” be considered equally true? If you point out the lack of logical evidence, that deficiency is identical on both sides.
Thus, even if it pains you to the core, you will ultimately be forced to accept the validity of logical reasoning (Hetuvada). And once you accept logical reasoning in this manner, does it not successfully establish the existence of the Omniscient Being (Sarvajna) as intended by me? It most certainly does. Therefore, wise scholars do not accept any proposition that contradicts the words spoken by the Omniscient Lord.’” [511-513]
श्लोक 514 से 521
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485 | श्लोक 486 से 502
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51