मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 22 to 32
श्लोक ( Shlok ) 22
चैत्रमासे सिते पक्षे निशान्ते प्रतिपद्दिने । अश्विन्यां षोडश स्वप्नान् व्यलोकिष्टेष्टसूचिनः ॥ २२ ॥
उसने चैत्रशुक्ल प्रतिपदाके दिन प्रातःकालके समय अश्विनी नक्षत्रमें इष्ट फलको सूचित करनेवाले सोलह स्वप्न देखे ॥ २२ ॥
“On the morning of the first day of the bright half of the month of Caitra (Caitra-Śukla-Pratipadā), under the auspicious astrological mansion of the Aśvinī constellation (Aśvinī Nakṣatra), she beheld sixteen dreams that foretold the fulfillment of her heart’s greatest desires.”22
श्लोक ( Shlok ) 23
तदैव मङ्गलान्युच्चेः पेठुर्मङ्गलपाठकाः । हता प्रभातमेरी च दरनिद्राविघातिनी ॥ २३ ॥
उसी समय मङ्गल पढ़ने वाले लोग उच्च स्वरसे मङ्गल पढ़ने लगे और अल्प निद्राका विघात करनेवाली प्रातः-कालकी भेरी बज उठी ।॥ २३ ॥
“At that very moment, the bards and panegyrists began to chant auspicious hymns in resounding voices, and the morning kettledrums (Bherī) resounded, gently dissolving the last traces of light slumber.” 23
श्लोक ( Shlok ) 24
प्रबुध्याधिकसन्तोषात्स्नात्वा मङ्गलवेषटक् । पतिं प्रति गता रेखा चन्द्रस्येव तदातनी ॥ २४ ॥
प्रजावती रानीने जागकर बड़े सन्तोषसे स्नान किया, मङ्गलवेष धारण किया, और चन्द्रमाकी रेखा जिस प्रकार चन्द्रमाके पास पहुँचती है उसी प्रकार वह अपने पतिके पास पहुँची ॥ २४ ॥
“Upon awakening, Queen Prajāvatī bathed with immense contentment and adorned herself in auspicious, festive attire. Then, just as a crescent of the moon glides gracefully toward the full moon, she approached her husband.”24
श्लोक ( Shlok ) 25
संसत्कुमुद्दती सा विकासयन्ती स्वतेजसा । आनन्दयद्विलोक्यैनामधीशोऽप्यासनादिभिः ॥ २५ ॥
वह अपने तेजसे सभारूपी कुमुदिनीको विकसित कर रही थी। राजाने उसे आनी हुई देख आसन आदि देकर आनन्दित किया ।। २५ ।।
“With her radiant splendor, she caused the assembly hall—which resembled a bed of night-lotuses (Kumudinī)—to blossom with joy. Seeing her arrive, the king delighted her by offering an honored seat and other warm welcomes.”25
श्लोक ( Shlok ) 26
सुस्थिताऽर्द्धासने सापि स्वमांस्तांस्तमवेदयत् । फलान्यमीषां शुश्रूषुः परितोषकराण्यतः ॥ २६ ॥
तदनन्तर अर्धासन पर बैठी हुई रानीने वे सब स्वप्न पतिके लिए निवेदन किये – कह सुनाये क्योंकि वह उनसे उन स्वप्नोंका सुख-दायी फल सुनना चाहती थी ।। २६ ॥
“Thereafter, seated upon half of the king’s royal throne, the queen narrated all those dreams to her husband, for she was eager to hear from him their blissful and auspicious fruits.”26
श्लोक ( Shlok ) 27 – 29
यथाक्रमं नृपोऽप्युक्त्वा फलं तेषां पृथक् पृथक् । गजवक्त्रप्रवेशावलोकनाद्गर्भमाश्रितः ॥ २७ ॥तवाहेमिन्द्र “इत्येनामानयत्प्रमदं परम् । कुर्वन्तस्तद्वचः सत्यं समन्तादमरेश्वराः ॥ २८ ॥समागत्य तयोः कृत्वा स्वर्गावतरणोत्सवम् । कल्याणभागिनोः पित्रोर्ययुस्तोषात्स्वमाश्रयम् ॥ २९ ॥
राजाने भी क्रम-क्रमसे उन स्वप्नोंका पृथक् पृथक् फल कहकर बतलाया कि चूँकि तूने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा है अतः अहमिन्द्र तेरे गर्भमें आया है। इधर यह कहकर राजा, रानीको अत्यन्त हर्षित कर रहा था उधर उसके वचनोंको सत्य करते हुए इन्द्र सब ओरसे आकर उन दोनोंका स्वर्गावतरण – गर्भकल्याणकका उत्सव करने लगे । भगवान्के माता-पिता अनेक कल्याणोंसे युक्त थे, उनकी अर्चा कर देव लोग बड़े सन्तोषसे अपने-अपने स्थानों पर चले गये ॥ २७-२९ ॥
“The king, in proper sequence, explained the distinct fruit of each dream, saying, ‘Since you saw a magnificent elephant entering your mouth, it signifies that an Ahamindra deity has descended into your womb.’ While the king was thus filling the queen with immense joy with his words, Indra and the other celestial gods arrived from all directions to fulfill his prophecy, celebrating their Garbha-Kalyāṇaka (the auspicious festival of divine conception). After worshiping and honoring the Lord’s parents, who were now endowed with manifold blessings, the deities returned to their respective heavenly abodes with deep contentment.”27 – 29
श्लोक ( Shlok ) 30
तमादायोदरं तस्या निर्बाधं भासते स्म तत् । संक्रान्तपूर्णशीतांशुसम्मुखीनतलोपमम् ॥ ३० ॥
माताका उदर जिन-बालकको धारण कर बिना किसी बाधाके ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिसमें चन्द्रमाका पूर्ण प्रतिबिम्ब पड़ रहा है ऐसा दर्पणका तल ही हो ।॥ ३० ॥
“The mother’s womb, bearing the divine Jina-child without any pain or discomfort, shone with such exquisite beauty as if it were the polished surface of a mirror perfectly reflecting the full orb of the moon.”30
श्लोक ( Shlok ) 31 – 32
सुखेन नवमे मासि पूर्णे पूर्णेन्दुभास्वरम् । विभक्तसर्वावयवं सर्वलक्षणलक्षितम् ॥ ३१ ॥मार्गशीर्षसितैकादशीदिनेऽश्विनीसङ्गमे । त्रिज्ञानलोचनं देवं तं प्रासूत प्रजावती ॥ ३२ ॥
सुखसे नौ मास व्यतीत होने पर रानी प्रजावतीने मगसिर सुदी एकादशीके दिन अश्विनी नक्षत्रमें उस देवको जन्म दिया जो कि पूर्ण चन्द्रमाके समान देदीप्यमान था, जिसके समस्त अवयव अच्छी तरह विभक्त थे, जो समस्त लक्षणोंसे युक्त था और तीन ज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाला था ।। ३१-३२ ॥
“When nine months had passed in absolute bliss, Queen Prajāvatī, on the eleventh day of the bright half of the month of Mārgaśīrṣa (Magsira Sudī Ekādaśī), under the constellation of Aśvinī, gave birth to that divine child. He shone with the radiant splendor of the full moon, his limbs were perfectly formed and distinct, he was endowed with all the auspicious bodily marks, and he possessed the three eyes of spiritual knowledge (Mati, Śruta, and Avadhi Jñāna).”31 – 32
श्लोक 33 से 42
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