चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 163 to 171
श्लोक ( Shlok ) 163 – 165
तन्त्र निर्विष्टदिव्योरुभोगश्च्युत्वा ततोऽजनि । द्वीपेऽस्मिन् भारते खेचराचले नगरे बरे ॥ १६३॥ शिवङ्करे तदीशस्य विद्याधरधरेशिनः । सुतः पवनवेगस्य सुवेगायां सुखावहः ॥ १६४ ॥ मनोवेगोऽन्यजन्मोद्यत्स्नेहेन विवशीकृतः । अनैषीच्चन्दनामेनामतिस्नेहोऽपर्थ नयेत् ॥ १६५ ॥
स्वर्गके श्रेष्ठ भोगोंका उपभोगकर वह वहाँसे च्युत हुआ और इसी भरत क्षेत्रके विजयार्ध पर्वत पर शिवंकर नगर में विद्याधरोंके स्वामी राजा पवनवेगकी रानी सुवेगासे यह अत्यन्त सुखी मनोवेग नामका पुत्र हुआ है। दूसरे जन्मके बढ़ते हुए स्नेहसे विवश होकर ही इसने चन्दनाका हरण किया था सो ठीक ही है क्योंकि भारी स्नेह कुमार्ग में ले ही जाता है ॥ १६३-१६५ ॥
Having enjoyed the supreme pleasures of heaven, he fell from that realm and was reborn in this very Bharata region on Mount Vijayardha, in the city of Shivankara. He became the exceedingly happy son named Manovega, born to Queen Suvega and King Pavanavega, the lord of the Vidyadharas. It was solely because he was helpless under the influence of an intensifying affection carried over from his previous birth that he abducted Chandana. And it is rightly said—for intense attachment inevitably leads one onto the wrong path. || 163-165 ||
श्लोक ( Shlok ) 166
स एषोऽभ्यर्णभव्यत्वादसुष्मिन्नेव जन्मनि । जिनाकृतिं समादाय सम्प्राप्स्यस्यग्रिमं पदम् ॥ १६६॥
यह निकटभव्य है और इसी जन्ममें दिगम्बर मुद्रा धारणकर मोक्ष पद प्राप्त करेगा ॥ १६६ ॥
“He is a nikatabhavya (a soul near to liberation) and, by adopting the Digambara posture (monastic state) in this very birth, he will attain the state of salvation (moksha).” || 166 ||
श्लोक ( Shlok ) 167
ततः श्रीनागदत्तस्य नाकलोकात्कनीयसी । इहागत्याभवन्नान्ना मनोवेगा महाद्युतिः ॥ १६७ ॥
नागदत्तकी छोटी बहिन अर्थस्वामिनी स्वर्गलोक से आकर यहाँ महाकान्तिको धारण करने वाली मनोवेगा हुई है ॥ १६७ ॥
“Nagadatta’s younger sister, Arthasvamini, has descended from the heavenly realm to be reborn here as Manovega, a maiden endowed with magnificent splendor.” || 167 ||
श्लोक ( Shlok ) 168
पलाशनगरे नागदशहस्तमृतः खगः । सुरलोकादभूः सोमवंशे त्वं चेटको नृपः ॥ १६८ ॥
जो विद्याधर पलाशनगरमें नागदत्तके हाथसे मारा गया था वह स्वर्गसे आकर तू सोमवंशमें राजा चेटक हुआ है ॥ १६८ ॥
“The Vidyadhara who was killed at the hands of Nagadatta in Palashanagara has descended from heaven to be reborn in the Soma lineage as you, King Chetaka.” || 168 ||
श्लोक ( Shlok ) 169
माता श्रीनागदत्तस्य धनमित्रा दिवङ्गता । ततश्च्युत्वा तवैवासीत्सुभद्रेयं मनःप्रिया ॥ १६९ ॥
धनमित्रा नामकी जो नागदत्तकी माता थी वह स्वर्ग गई थी और वहाँ से च्युत होकर मनको प्रिय लगनेवाली वह तेरी सुभद्रा रानी हुई है ॥ १६९ ॥
“Nagadatta’s mother, who was named Dhanamitra, had ascended to heaven, and falling from that realm, she has now become your queen, Subhadra, who is so dear to the heart.” || 169 ||
श्लोक ( Shlok ) 170
पद्मलता सापि कृतोपवसना दिवम् । गत्वागत्य जनिष्टेयं चन्दना नन्दना तव ॥ १७० ॥
जो नागदत्तकी स्त्री पद्मलता थी वह अनेक उपवासकर स्वर्ग गई थी और वहाँ से आकर यह चन्दना नामकी तेरी पुत्री हुई है ॥ १७० ॥
“She who was Nagadatta’s wife, Padmalata, ascended to heaven after performing numerous fasts, and descending from that realm, she has now been reborn as this daughter of yours named Chandana.” || 170 ||
श्लोक ( Shlok ) 171
नकुलः संसृतौ भ्रान्त्वा सिंहाख्योऽभूद्धनेचरः । प्राग्जन्मस्नेहवैराभ्यामबाधिष्ट स चन्दनाम् ॥ १७१ ॥
नकुल संसारमें भ्रमणकर सिंह नामका भील हुआ है उसने पूर्व जन्मके स्नेह और वैरके कारण ही चन्दनाको तंग किया था ।। १७१ ॥
“Nakula, after wandering through the cycle of worldly existence, was reborn as a Bhil (tribal hunter) named Sinha. It was solely due to the affection and animosity carried over from his past birth that he tormented Chandana.” || 171 ||
श्लोक 172 से 181
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162
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