अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 12to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
स्वावधिक्षेत्रनिर्णीतप्रकाशबलविक्रियः । अतिप्रशान्तरागादिरासन्नीकृतनिर्वृतिः ॥ १२ ॥
उसके अवधिज्ञानका जितना क्षेत्र था उतने ही क्षेत्र तक उसका प्रकाश, बल और विक्रिया ऋद्धि थी । उसके राग-द्वेष आदि अत्यन्त शान्त हो गये थे और मोक्ष उसके निकट आ चुका था ।। १२ ।।
“The expanse of his radiance, strength, and Vikriya Riddhi (the supernatural power of physical transformation) was exactly equal to the vast territory accessible to his Avadhijnana (clairvoyant knowledge). His passions, such as attachment and aversion, had become profoundly pacified, and his liberation (Moksha) was drawing near.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
सद्वेद्योदयसम्भूतमन्वभूत् भोगमुत्तमम् । उदितोदितपर्याप्तिपर्यन्तोपान्तमास्थितः ॥ १३ ॥
वह साता वेदनीयके उदयसे उत्पन्न हुए उत्तम भोगोंका उपभोग करता था।इस तरह प्राप्त हुए भोगोंका उपभोग करता हुआ आयुके अन्तिम भागको प्राप्त हुआ। – वहाँ से च्युत होनेके सम्मुख हुआ ॥ १३ ॥
“He enjoyed the supreme pleasures arising from the manifestation of Sata Vedaniya (pleasure-producing karma). While experiencing the pleasures thus attained, he reached the final segment of his lifespan and approached the moment of his departure from that celestial realm.”13
श्लोक ( Shlok ) 14 – 15
द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे देशोऽस्ति कुरुजाङ्गलः । ‘हस्तिनाख्यं पुरं तस्य पतिर्गोत्रेण काश्यपः ॥१४॥सोमवंशसमुद्भूतः सुदर्शनसमाह्वयः । मित्रसेना महादेवी प्राणेभ्योऽप्यस्य वल्लभा ॥ १५ ॥
अथानन्तर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें कुरुजांगल नामका देश है। उसके हस्तिनापुर नगर- में सोमवंशमें उत्पन्न हुआ काश्यप गोत्रीय राजा सुदर्शन राज्य करता था। उसकी प्राणोंसे भी अधिक प्यारी मित्रसेना नामकी रानी थी ॥ १४-१५ ॥
“Thereafter, in the Bharata-kshetra region of this very continent of Jambudvipa, lies a country named Kurujangala. In its city of Hastinapura, King Sudarshana—born into the Soma dynasty (Somavamsa) and belonging to the Kashyapa lineage (Gotra)—was ruling. He had a queen named Mitrasena, who was dearer to him than his own life.”14 – 15
श्लोक ( Shlok ) 16 – 18
वसुधारादिकां पूजां प्राप्य प्रीतानुफल्गुने । मासेऽसिततृतीयायां रेवत्यां निशि पश्चिमे ॥ १६ ॥भागे जयन्तदेवस्य स्वर्गावतरणक्षणे । दृष्टषोडशसुस्वप्ना फलं तेषु निजाधिपम् ॥ १७ ॥अनुयुज्यावधिज्ञानतदुक्तफलर्स श्रुतेः । प्राप्तत्रैलोक्यराज्येव प्रासीदत्परमोदया ॥ १८ ॥
जब धनपतिके जीव जयन्त विमानके अहमिन्द्रका स्वर्गसे अवतार लेनेका समय आया तब रानी मित्रसेनाने रत्नवृष्टि आदि देवकृत सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नतासे फाल्गुन कृष्ण तृतीयाके दिन रेवती नक्षत्रमें रात्रिके पिछले प्रहर सोलह स्वप्न देखे । सबेरा होते ही उसने अपने अवधिज्ञानी पतिसे उन स्वप्नोंका फल पूछा। तदनन्तर परम वैभवको धारण करनेवाली रानी पतिके द्वारा कहे हुए स्वप्नका फल सुनकर ऐसी प्रसन्न हुई मानो उसे तीन लोकका राज्य ही मिल गया हो ॥ १६-१८ ॥
“When the time arrived for the soul of Dhanapati—the Ahamindra residing in the Jayanta celestial vehicle—to descend from heaven, Queen Mitrasena received heavenly honors performed by the celestial deities, including a shower of precious gems. Filled with immense joy, she beheld the sixteen auspicious dreams during the final watch of the night on the third day of the dark fortnight of the month of Phalguna (Phalguna Krishna Tritiya), under the Revati constellation (Nakshatra).
As soon as morning dawned, she asked her husband, who possessed clairvoyant knowledge (Avadhijnana), about the meaning and fruits of those dreams. Thereupon, hearing the interpretation of the dreams from her husband, the queen, who personified supreme grandeur, became as utterly delighted as if she had attained sovereignty over the three worlds.”16 – 18
श्लोक ( Shlok ) 19 – 21
तदा गतामराधीशकृतकल्याणसम्मदा । निर्वृता निर्मदा नित्यरम्या सौम्यानना शुचिः ॥ १९ ॥संवाद्यमाना देवीभिस्तत्कालोचित ‘वस्तुभिः । मेघमालेव सद्गर्भमुद्धहन्ती जगद्धितम् ॥ २० ॥ मार्गशीर्षे सिते पक्षे पुष्ययोगे चतुर्दशी । तिथौ त्रिविधसद्बोधं तनूजमुदपीपदत् ॥ २१ ॥
उसी समय इन्द्रादि देवोंने जिसके गर्भकल्याणकका उत्सव किया है, जो अत्यन्त संतुष्ट है, मद रहित है, निरन्तर रमणीक है, सौम्य मुखवाली है, पवित्र है, उस समयके योग्य स्तुतियोंके द्वारा देवियां जिसकी स्तुति किया करती हैं, और जो मेघमालाके समान जगत्का हित करनेवाला उत्तम गर्भ धारण करती है ऐसी रानी मित्रसेनाने मगसिर शुक्ल चतुर्दशी के दिन पुष्य नक्षत्रमें तीन । ज्ञानोंसे सुशोभित उत्तम पुत्र उत्पन्न किया ।। १९-२१ ॥
“At that very time, the celestial deities, led by Indra, celebrated the Garbha Kalyanak (Conception Auspicious Event) of the one residing in her womb. Deeply contented, free from any pride, perpetually radiating charm, beautiful and serene-faced, and pure, Queen Mitrasena was continuously praised by celestial goddesses with hymns perfectly suited for the occasion.
Nurturing that supreme womb—which, like a dense gathering of rain clouds, was destined to bring ultimate welfare to the entire world—the Queen gave birth to an illustrious son adorned with three types of innate knowledge (Mati, Shruta, and Avadhi Jnana) on the fourteenth day of the bright fortnight of the month of Margashirsha (Margsir Shukla Chaturdashi), under the Pushya constellation (Nakshatra).”19 – 21
श्लोक 22 से 34
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11
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