अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 282 to 293
श्लोक ( Shlok ) 282 – 283
सञ्जयस्यार्थसन्देहे सब्जाते विजयस्य च । जन्मानन्तरमेवैनमभ्येत्यालोकमात्रतः ॥ २८२ ॥ तत्सन्देहे गते ताभ्यां चारणाभ्यां स्वभक्तितः । अस्त्वेष सन्मतिर्देवो भाबीति समुदाहृतः ॥ २८३ ॥
एक बार सञ्जय और विजय नामके दो चारणमुनियोंको किसी पदार्थमें संदेह उत्पन्न हुआ था परन्तु भगवान्के जन्मके बाद ही वे उनके समीप आये और उनके दर्शन मात्रसे ही उनका संदेह दूर हो गया इस-लिए उन्होंने बड़ी भक्तिसे कहा था कि यह बालक सन्मति तीर्थंकर होनेवाला है, अर्थात् उन्होंने उनका सन्मति नाम रक्खा था ।। २८२-२८३ ।।
Once, two Charana monks (ascetics with the miraculous power of flight) named Sanjaya and Vijaya developed a doubt regarding a certain metaphysical concept. However, right after the Lord’s birth, they approached Him, and by His mere sight, their doubt was instantly resolved. For this reason, they filled with deep devotion and proclaimed that this child would become the Tirthankara named Sanmati (meaning “one with noble or true intellect”), thereby bestowing the name Sanmati upon Him. || 282-283 ||
श्लोक ( Shlok ) 284
अर्थिनः किं पुनर्वाच्याः शब्दाश्च गुणगोचराः । अप्राप्तार्थाः परेष्वस्मिन्नर्थवन्तोऽभवन् यदि ॥ २८४ ॥
गुणोंको कहनेवाले सार्थक शब्दोंकी तो बात ही क्या थी श्रीवीरनाथको छोड़कर अन्यत्र जिनका गुणवाचक अर्थ नहीं होता ऐसे शब्द भी श्रीवीरनाथ में प्रयुक्त होकर सार्थक हो जाते थे ।। २८४ ॥
What need is there to even speak of words that naturally possess meaningful attributes? Leaving aside all other contexts where their descriptive meanings might not apply, even those words became profoundly meaningful and perfectly fitting when used in reference to Lord Veeranatha. || 284 ||
श्लोक ( Shlok ) 285
त्यागेऽयमेव दोषोऽस्य शब्दा दोषाभिधायिनः । पुष्कलार्थाः परत्रास्माद्गता दूरमनर्थकाः ॥ २८५ ॥
उन भगवान् के त्यागमें यही दोष था कि दोषोंको कहनेवाले शब्द जहाँ अन्य लोगोंके पास जाकर खूब सार्थक हो जाते थे वहां वे ही शब्द उन भगवान के पास आकर दूरसे ही अनर्थक हो जाते थे ॥ २८५ ।।
The only “flaw” in the renunciation of that Lord was this: while words that describe flaws became perfectly meaningful when applied to other people, those very same words lost all meaning and became completely obsolete from afar the moment they approached the Lord. || 285 ||
श्लोक ( Shlok ) 286
न गोमिन्यां न कीर्त्या वा प्रीतिरस्याभवद्विभोः । गुणेष्विव सुलेश्यानां प्रायेण हि गुणाः प्रियाः ॥२८६॥
उन भगवान्की जैसी प्रीति गुणोंमें थी वैसी न लक्ष्मी में थी और न कीर्तिमें ही थी। सो ठीक ही है क्योंकि शुभलेश्याके धारक पुरुषोंको गुण ही प्यारे होते हैं ।। २८६ ॥
The kind of love that the Lord possessed for virtuous qualities was neither found in royal opulence (Lakshmi) nor in worldly fame (Kirti). And that is only fitting, for individuals who hold a pure and auspicious aura (shubha-leshya) naturally hold virtue alone as dearest to their hearts. || 286 ||
श्लोक ( Shlok ) 287 – 289
तस्य कालवयोवाङ्छावशेनैलबिलः स्वयम् । भोगोपभोगवस्तूनि स्वर्गसाराण्यहर्दिवम् ॥ २८७ ॥शक्राज्ञया समानीय व्ययं प्रावर्तयत्सदा । अन्येद्युः स्वर्गनाथस्य सभायामभवत्कथा ॥ २८८ ॥देवानामधुना शूरो वीरस्वामीति तच्छतेः । देवः सङ्गमको नाम सम्प्राप्तस्तं परीक्षितुम् ॥ २८९ ॥
इन्द्रकी आज्ञासे कुबेर प्रतिदिन उन भगवान्के समय आयु और इच्छाके अनुसार स्वर्गकी सारभूत भोगोपभोगकी सब वस्तुएँ स्वयं लाया करता था और सदा खर्च करवाया करता था। किसी एक दिन इन्द्रकी सभामें देवोंमें यह चर्चा चल रही थी कि इस समय सबसे अधिक शूरवीर श्रीवर्धमान स्वामी ही हैं। यह सुनकर एक सङ्गम नामका देव उनकी परीक्षा करनेके लिए आया ।। २८७-२८९ ॥
By the command of Indra, Kubera himself would daily bring all kinds of excellent objects of enjoyment and consumption—the very essence of heaven—in accordance with the Lord’s age and desires, and would constantly ensure they were utilized. One day, a discussion arose among the deities in the assembly of Indra that, at this present time, Lord Shrivardhamana Swami is indeed the most valiant hero of all. Upon hearing this, a deity named Sangama came down to test His fortitude. || 287-289 ||
श्लोक ( Shlok ) 290 – 293
दृष्ट्वोद्यानवने राजकुमारैर्बहुभिः सह । काकपक्षधरैरेकवयोभिर्बाल्य चोदितम् ॥ २९० ॥कुमारं भास्वराकारं द्रुमक्रीडापरायणम् । स विभीषयितुं वाल्छन् महानागाकृतिं दधत् ॥ २९१ ॥मूलात्प्रभृति भूजस्य यावत्स्कन्धमवेष्टत । विटपेभ्यो निपत्याशु धरित्रीं भयविह्वलाः ॥ २९२ ॥प्रपलायन्त तं दृष्ट्वा बालाः सर्वे यथायथम् । महाभये समुत्पन्ने महतोऽन्यो न तिष्ठति ॥ २९३ ॥
आते ही उस देवने देखा कि देदीप्यमान आकारके धारक बालक वर्द्धमान, बाल्यावस्थासे प्रेरित हो, बालकों जैसे केश धारण करनेवाले तथा समान अवस्थाके धारक अनेक राजकुमारोंके साथ बगीचामें एक वृक्षपर चढ़े हुए क्रीड़ा करनेमें तत्पर हैं। यह देख संगम नामका देव उन्हें डरवानेकी इच्छासे किसी बड़े सांपका रूप धारणकर उस वृक्षकी जड़से लेकर स्कन्ध तक लिपट गया। सब बालक उसे देखकर भयसे काँप उठे और शीघ्र ही डालियोंपरसे नीचे जमीनपर कूदकर जिस किसी तरह भाग गये सो ठीक ही है क्योंकि महाभय उपस्थित होनेपर महापुरुषके सिवाय अन्य कोई नहीं ठहर सकता है ॥ २९०-२९३ ॥
Upon his arrival, that deity saw that the young Vardhamana—possessing a radiant form and driven by the innocence of childhood—was eagerly playing in a garden, climbed up a tree alongside several princes of his own age who wore similar boyish hairstyles. Seeing this, the deity named Sangama, wishing to frighten Him, assumed the form of a massive serpent and coiled itself around the tree from its root all the way up to its trunk.
Upon seeing it, all the other boys trembled with fear, instantly jumped down from the branches to the ground, and fled in whichever direction they could. And that is only fitting, for when a great peril arises, no one except a truly great soul (mahapurusha) can stand their ground. || 290-293 ||
श्लोक 294 से 301
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72