अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475 | श्लोक 476 से 485
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 486 to 502
श्लोक ( Shlok ) 486 – 487
तेनैव पापं प्रक्षाल्यं सर्वत्र सुलभं जलम् । मिथ्यात्वादिचतुष्केण बध्यते पापमूर्जितम् ॥ ४८६ ॥ सम्यक्त्वादिचतुष्केण पुण्यं प्रान्ते च निर्वृतिः । एतज्जैनेश्वरं तत्त्वं गृहाणेत्यवदत्पुनः ॥ ४८७ ॥
जल सब जगह सुलभ है अतः उसीके द्वारा पाप धो डालना चाहिये । यथार्थ में बात यह है कि मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद तथा कषाय इन चारके द्वारा तीव्र पापका बन्ध होता है और सम्यक्त्व, ज्ञान, चारित्र तथा तप इन चारके द्वारा पुण्यका बन्ध होता है। और अन्तमें इन्हींसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह जिनेन्द्र देवका तत्त्व है – मूल उपदेश है, इसे तू ग्रहण कर। ऐसा उस श्रावकने ब्राह्मणसे कहा ।। ४८६-४८७ ॥
“‘Water is easily available everywhere; hence, sins should be washed away by it alone (if it were actually possible). In reality, the truth is that intense bondage of sin (Papa) occurs through these four: wrong belief (Mithyatva), non-abstainment (Avirati), spiritual laziness (Pramada), and passions (Kashaya). On the other hand, the bondage of merit (Punya) occurs through these four: right faith (Samyaktva), right knowledge (Jnana), right conduct (Charitra), and austerities (Tapa). And ultimately, liberation (Moksha) is attained through these very four. This is the absolute reality—the core teaching of the Lord Jinendra; you must accept this.’
Thus did that Shravak speak to the Brahmin.” [486-487]
श्लोक ( Shlok ) 488 – 495
श्रुत्वा तद्वचनं विप्रस्तीर्थमौढ्यं निराकरोत् । अथ तत्रैव पञ्चाग्निमध्येऽन्यैर्दुस्सहं तपः ॥ ४८८ ॥कुर्वतस्तापसस्योच्चैः प्रज्वलद्वह्विसंहतौ । व्यञ्जयन्प्राणिनां घातं षड्भेदानामनारतम् ॥ ४८९ ॥तस्य पाषण्डमौक्ष्यञ्च युक्तिभिः स ‘निराकृत । गोमांसभक्षणागम्यागमाद्यैः एतितेक्षणात् ॥ ४९० ॥त्रर्णाकृत्यादिभेदानां देहेऽस्मिन्नप्यदर्शनात् । ब्राह्मण्यादिषु शूद्राद्यैर्गर्भाधानप्रदर्शनात् ॥ ४९१ ॥नास्ति जातिकृतो भेदो मनुष्याणां गवाश्श। आकृतिग्रहणा तस्मादन्यथा परिकल्प्यते ॥ ४९२ ॥जातिगोत्रादिकर्माणि शुक्लध्यानस्य हेतवः । येषु ते स्युस्त्रयो वर्णाः शेषाः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥ ४९३ ॥अच्छेदो मुक्तियोग्याया विदेहे जातिसन्ततेः । तद्धेतुनामगोत्राढ्यजीवाविच्छिन्नसम्भवात् ॥ ४९४ ।।शेषयोस्तु चतुर्थे स्यात्काले तज्जातिसन्ततिः । एवं वर्णविभागः स्यान्मनुष्येषु जिनागमे ॥ ४९५ ॥
श्रावकके उक्त वचन सुनकर ब्राह्मणने तीर्थमूढ़ता छोड़ दी। तदनन्तर वहीं एक तापस, पञ्चाग्नियोंके मध्यमें अन्य लोगोंके द्वारा दुःसह- कठिन तप कर रहा था। वहाँ जलती हुई अग्निके बीचमें छह कायके जीवोंका जो निरन्तर घात होता था उसे दिखलाकर श्रावकने युक्तियोंके द्वारा उस ब्राह्मणकी पार्षाण्डमूढ़ता भी दूर कर दी। तदनन्तर जातिमूढ़ता दूर करनेके लिए वह श्रावक कहने लगा कि गोमांस भक्षण और अगम्यस्त्रीसेवन आदिसे लोग पतित हो जाते हैं यह देखा जाता है, इस शरीरमें वर्ण तथा आकृतिकी अपेक्षा कुछ भी भेद देखनेमें नहीं आता और ब्राह्मणी आदिमें शुद्र आदिके द्वारा गर्भधारण किया जाना देखा जाता है इसलिए जान पड़ता है कि मनुष्योंमें गाय और घोड़ेके समान जाति कृत कुछ भी भेद नहीं है यदि आकृतिमें कुछ भेद होता तो जातिकृत भेद माना जाता परन्तु ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और शूद्रमें आकृति भेद नहीं है अतः उनमें जातिकी कल्पना करना अन्यथा है। जिनकी जाति तथा गोत्र आदि कर्म शुक्लध्यानके कारण हैं वे त्रिवर्ण कहलाते हैं और बाकी शूद्र कहे गये हैं। विदेह क्षेत्रमें मोक्ष जानेके योग्य जातिका की विच्छेद नहीं होता क्योंकि वहीं उस जातिमें कारणभूत नाम और गोत्रसे सहित जीवोंकी निरन्तर उत्पत्ति होती रहती है परन्तु भरत और ऐरावत क्षेत्रमें चतुर्थकालमें ही जातिकी परम्परा चलती है अन्य कालोंमें नहीं। जिनागममें मनुष्योंका वर्णविभाग इस प्रकार बतलाया गया है ॥ ४८८-४९५ ॥
“Hearing these words of the Shravak, the Brahmin abandoned his delusion regarding false places of pilgrimage (Teertha-mudhata).
Right there, an ascetic (Tapasa) was performing a rigorous penance amidst the five fires (Panchagni), which was unbearable for others. By pointing out the constant destruction of the six classes of living beings (Chhah Kaya Jivas) occurring in the midst of that burning fire, and through logical reasoning, the Shravak dispelled that Brahmin’s delusion regarding heretics (Pakhandi-mudhata) as well.
Thereafter, to remove his delusion regarding caste and birth (Jati-mudhata), the Shravak began to say: ‘It is observed that people become fallen by consuming beef or engaging in forbidden sexual relationships. In this human body, no difference is visible in terms of complexion (Varna) or physical form (Akruti), and it is also seen that women of the higher classes can conceive through men of the lower classes. Therefore, it appears that among human beings, there is no inherent caste distinction like that found between a cow and a horse. Had there been a difference in physical form, a distinction based on caste could be accepted; but there is no difference in form among Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras. Hence, imagining an absolute caste system among them is ungrounded.
Those whose caste and lineage (Gotra) karmas serve as a cooperative cause for pure meditation (Shukla-dhyana) are called the Trivarna (the three twice-born orders), while the rest are called Shudras. In the Videha Kshetra (a stable cosmic region), the lineage capable of attaining liberation (Moksha) is never interrupted, because souls possessing the necessary name-karma (Nama-karma) and lineage-karma (Gotra-karma) are continuously born there. However, in the Bharata and Airavata regions, this pure lineage tradition thrives only during the fourth cosmic period (Chauthakala), and not during the other periods.
This is how the classification of human orders has been expounded in the sacred scriptures of the Jina (Jinagama).'” [488-495]
श्लोक ( Shlok ) 496 – 498
इत्यादिहेतुभिर्जातिमौक्ष्यमस्य निराकरोत् । वटेऽस्मिन् खलु विशेशो वसतीत्येवमादिकम् ॥४९६॥वाक्यं श्रद्धाय तद्योग्यमाचरन्तो महीभुजः । किं न जानन्ति लोकस्य मार्गोयं प्रथितो महान् ॥ ४९७ ॥न त्यक्तुं शक्य इत्यादि न ग्राह्यं लौकिकं वचः । आप्तोक्तागमबाह्यत्वा न्मत्तोन्मत्तकवाक्यवत् ॥ ४९८ ॥
इत्यादि हेतुओंके द्वारा श्रावकने ब्राह्मणकी जातिमूढ़ता दूर कर दी। ‘इस वटवृक्षपर कुबेर रहता है’ इत्यादि वाक्योंका विश्वासकर राजा लोग जो उसके योग्य आचरण करते हैं, उसकी पूजा आदि करते हैं सो क्या कुछ जानते नहीं है। कुछ सचाई होगी तभी तो ऐसा करते हैं। यह लोकका मार्ग बहुत बड़ा प्रसिद्ध मार्ग है इसे छोड़ा नहीं जा सकता-लोकमें जो रूढ़ियाँ चली आ रही हैं उन्हें छोड़ना नहीं चाहिये इत्यादि लौकिक जनोंके बचन, आप्त भगवान्के द्वारा कहे इस आगमसे बाह्य होनेके कारण नशेसे मस्त अथवा पागल मनुष्यके वचनोंके समान ग्राह्य नहीं हैं ।। ४९६-४९८ ॥
“Through these and other logical reasons, the Shravak dispelled the Brahmin’s delusion regarding caste (Jati-mudhata).
[The Brahmin then reasoned:] ‘Believing in statements like “Kubera (the god of wealth) resides in this banyan tree,” even kings perform appropriate rituals and worship it; do they know nothing at all? There must be some truth to it, which is why they do so. This worldly path is a highly renowned and established tradition that cannot be abandoned—customs that have been handed down in society should not be forsaken.’
[To this, the Shravak replied that] such statements of worldly people—being external to the sacred scriptures (Agama) revealed by the omniscient Lord (Apta)—are as unacceptable as the utterances of an intoxicated or insane person.” [496-498]
श्लोक ( Shlok ) 499 – 500
इति तल्लोकमौढ्यञ्च निरास्थदथ सोऽब्रवीत् । आप्तोक्तागमवैमुख्यादिति हेतुर्न मां प्रति ॥ ४९९ ॥साङ्ख्याद्याप्तप्रवादानां पौरुषेयत्वदोषतः । दूषिताः पुरुषाः सर्वे बार्ड रागाद्यविद्यया ॥ ५०० ॥
इस प्रकार श्रावकने उस ब्राह्मणकी लोकमूढ़ता भी दूर कर दी। तद-नन्तर ब्राह्मणने श्रावकसे कहा कि तुमने जो हेतु दिया है कि आप्त भगवान्के द्वारा कहे हुए आगमसे बाह्य होनेके कारण लौकिक वचन माह्य नहीं हैं सो तुम्हारा यह हेतु मेरे प्रति लागू नहीं होता क्योंकि सांख्य आदि आप्तजनोंके जो भी आगम विद्यमान हैं वे पौरुषेयत्व दोषसे प्रमाणभूत नहींहैं। पुरुषकृत रचना होनेसे ग्राह्य नहीं हैं। यथार्थमें संसारमें जितने पुरुष हैं वे सभी रागादि अविद्यासे दूषित हैं अतः उनके द्वारा बनाये हुए आगम प्रमाण कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४९९-५००।।
“In this manner, the Shravak dispelled that Brahmin’s delusion regarding worldly superstitions (Loka-mudhata) as well.
Thereafter, the Brahmin said to the Shravak, ‘The reason you have given—that worldly words are unacceptable because they fall outside the sacred scriptures (Agama) revealed by the omniscient Lord (Apta)—does not apply to my position. This is because the scriptures that exist for Kapila (the founder of Samkhya) and other self-proclaimed authorities are not authoritative due to the flaw of Paurusheyatva (being authored by human beings); since they are creations of man, they cannot be accepted as absolute truth.
In reality, all men in this world are corrupted by ignorance, attachment, and aversion (Raga-Dvesha); therefore, how can the scriptures composed by them ever be considered authoritative?'” [499-500]
श्लोक ( Shlok ) 501 – 502
इत्यनालोचितार्थस्य वचस्तेनैति सारताम् । यतो रागाद्यविद्यानां कचिन्निर्मूलसंक्षयः ॥५०१ ॥ सर्वज्ञस्य विरागस्य प्रयोगः साधनं प्रति । क्रियते युक्तिवादानुसारिगो विदुषस्तव ॥ ५०२ ॥
इसके उत्तर में श्रावकने कहा कि चूंकि तुमने पदार्थका अच्छी तरह विचार नहीं किया है इसलिए तुम्हारे वचन सारताको प्राप्त नहीं हैं ठीक नहीं हैं। तुमने जो कहा है कि संसारके सभी पुरुष रागादि अविद्यासे दूषित हैं यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि किसी पुरुषमें राग आदि अविद्याओंका निर्मूल क्षय हो जाना संभव है। तुम युक्तिवादका अनुसरण करनेवाले विद्वान् हो अतः तुम्हारे लिए सर्वज्ञवीतरागकी सिद्धिका प्रयोग किया जाता है ।। ५०१-५०२ ॥
“In response, the Shravak said, ‘Since you have not properly contemplated the nature of reality (Padartha), your words lack substance and are incorrect.
Your claim that all men in this world are corrupted by ignorance, attachment, and aversion (Raga-Dvesha) is invalid, because it is entirely possible for attachment and ignorance to be completely eradicated from their very roots in a particular soul.
Since you are a scholar who follows the path of logical reasoning, a formal syllogistic proof (Prayoga) for the existence of the Omniscient and Passionless Being (Sarvajna-Veetaraga) is being presented to you.'” [501-502]
श्लोक 503 से 513
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