अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103 – 110
विश्वनन्दी तदाकर्ण्य सद्यः क्रोधाग्निदीपितः । पश्य मामतिसन्धाय प्रत्यन्तनृपतीन्प्रति ॥ १०३ ॥प्रहित्य मगनं दत्तं पितृव्येनात्मसूनवे । देहीति वचनान्नाहं किं ददामि कियद्वनम् ॥ १०४ ॥विधात्यस्य दुश्चेष्टा मम सौजन्यभञ्जनम् । इति मत्वा निवृत्त्यासौ हन्तुं स्ववनहारिणम् ॥ १०५ ॥प्रारब्धवान् भयाङ्गत्वा स कपित्थमहीरुहम् । कृत्वावृतिं स्थितः स्फीतं कुमारोऽपि महीरुहम् ॥ १०६ ॥समुन्मूल्य निहन्तुं तं तेनाधावत्ततोऽप्यसौ । अपसृत्य शिलास्तम्भस्यान्तर्धानं ययौ पुनः ॥ १०७ ॥चली तलप्रहारेण स्तम्भञ्चाहत्य स द्रुतम् । पलायमानमालोक्य तस्मादप्यपकारिणम् ॥ १०८ ॥मा भैषीरिति सौहार्दकारुण्याभ्यां प्रचोदितः । समाहूय वनं तस्मै दत्वा संसारदुःस्थितिम् ॥ १०९ ॥भावयित्वा ययौ दीक्षां सम्भूतगुरुसन्निधौ । अपकारोऽपि नीचानामुपकारः सतां भवेत् ॥ ११० ॥
विश्वनन्दीको इस घटनाका तत्काल ही पता चल गया। वह क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो कहने लगा कि देखो काकाने मुझे तो धोखा देकर शत्रु राजाओंके प्रति भेज दिया और मेरा वन अपने पुत्रके लिए दे दिया। क्या ‘देओ’ इतना कहनेसे ही मैं नहीं दे देता ? वन है कितनी-सी चीज ? इसकी दुश्चेष्टा मेरी सज्जनताका भङ्ग कर रही है। ऐसा विचारकर वह लौट पड़ा और अपना वन हरण करनेवालेको मारनेके लिए उद्यत हो गया। इसके भयसे विशाखनन्द बाड़ी लगाकर किसी ऊंचे कैंथाके वृक्षपर चढ़ गया। कुमार विश्वनन्दीने वह कैंथाका वृक्ष जड़से उखाड़ डाला और उसीसे मारनेके लिए वह उद्यत हुआ। यह देख विशाखनन्द वहांसे भागा और एक पत्थरके खम्भाके पीछे छिप गया परन्तु बलवान् विश्वनन्दीने अपनी हथेलियोंके प्रहारसे उस पत्थरके खम्भाको शीघ्र ही तोड़ डाला । विशाखनन्द वहांसे भी भागा। यद्यपि वह कुमारका अपकार करनेवाला था परन्तु उसे इस तरह भागता हुआ देखकर कुमारको सौहार्द और करुणा दोनोंने प्रेरणा दी जिससे प्रेरित होकर कुमारने उससे कहा कि डरो मत। यही नहीं, उसे बुलाकर वह वन भी दे दिया तथा स्वयं संसारकी दुःखमय स्थितिका विचारकर सम्भूत नामक गुरुके समीप दीक्षा धारण कर ली सो ठीक ही है क्योंकि नीचजनोंके द्वारा किया हुआ अपकार भी सज्जनोंका उपकार करनेवाला ही होता है ।। १०३-११० ।।
“Vishvanandi came to know of this incident immediately. Inflamed with the fire of anger, he began to say, ‘Look, my uncle deceived me, sent me toward the hostile kings, and gave away my forest to his own son! Had he merely said “Give it,” would I not have given it? How insignificant a thing is this forest? His wicked act violates my nobility.’ Reflecting thus, he turned back, resolved to slay the one who had usurped his forest. Out of fear of him, Vishakhananda scaled a fence and climbed up a tall wood-apple (Kapittha) tree. Prince Vishvanandi uprooted that wood-apple tree from its very roots and prepared to strike him with it. Seeing this, Vishakhananda fled from there and hid behind a stone pillar, but the mighty Vishvanandi swiftly shattered that stone pillar with the blows of his palms. Vishakhananda fled from there as well. Although he was the wrongdoer of the prince, seeing him flee in this manner inspired both affection and compassion within the prince. Guided by this, the prince said to him, ‘Do not fear.’ Not only this, but summoning him, he handed over that very forest to him and, contemplating the miserable state of the world, accepted initiation (Diksha) near the Guru named Sambhuta. This is indeed fitting, for even the harm done by base men turns out to be beneficial to the virtuous. || 103-110 ||”
श्लोक ( Shlok ) 111
तदा विशाखभूतिश्च सञ्जतानुशयो मया । कृतं पापमिति प्रायश्चित्तं वा प्राप संयमम् ॥ १११ ॥
उस समय विशाखभूतिको भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ। ‘यह मैंने बड़ा पाप किया है’ ऐसा विचारकर उसने प्रायश्चित्त त्वरूप संयम धारण कर लिया ।। १११ ॥
“At that time, Vishakhbhuti also felt deep remorse. Reflecting, ‘I have committed a great sin,’ he adopted self-restraint (Samyama) as a form of penance. || 111 ||”
श्लोक 112 से 122
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