अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 203 to 211
श्लोक ( Shlok ) 203
केनापि हेतुनावाप्य विश्वनन्दित्वमाप्तवान् । संयमं त्वं निदानेन त्रिष्पृष्ठत्वमुपेयिवान् ॥ २०३ ॥
किसी कारणसे विश्वनन्दीकी पर्याय पाकर तूने संयम धारण किया तथा निदान कर त्रिपृष्ठ नारायणका पद प्राप्त किया ।। २०३ ॥
“Due to the fruit of some past merit, you obtained the human birth of Vishvanandi and practiced self-restraint (Sanyam). However, by making a binding spiritual desire (Nidan), you subsequently attained the status of Triprishtha Narayan.”203
श्लोक ( Shlok ) 204
इतोऽस्मिन्दशमे भावी भवेऽन्त्यस्तीर्थकृद्भवान् । सर्वमश्रावि तीर्थेशान्मयेदं श्रीधराह्वयात् ॥ २०४ ॥
अब इस भवसे तू दशवें भवमें अन्तिम तीर्थंकर होगा। यह सब मैंने श्रीधर तीर्थंकरसे सुना है ॥ २०४ ॥
“Now, in the tenth birth from this current life, you will become the final Tirthankara. I have heard all of this directly from the Tirthankara Shridhar.”204
श्लोक ( Shlok ) 205
अद्यप्रभृति संसारघोरारण्यप्रपातनात् । धीमन्विरम दुर्मार्गादारमात्महिते मते ॥ २०५ ॥
हे बुद्धिमान् ! अब तू आजसे लेकर संसाररूपी अटवीमें गिरानेवाले मिथ्यामार्गसे विरत हो और आत्माका हित करनेवाले मार्गमें रमण कर-उसीमें लीन रह ॥ २०५ ॥
“O wise one! From this day forward, turn away from the path of delusion that causes one to fall into the dense forest of worldly existence (Samsara), and immerse yourself—remain absorbed—in the path that brings ultimate well-being to the soul.” 205
श्लोक ( Shlok ) 206
क्षेमवेदाप्तुमिच्छास्ति कामं लोकाग्रधामनि । आप्तागमपदार्थेषु श्रद्धां धत्स्वेति तद्वचः ॥ २०६ ॥
यदि आत्मकल्याणकी तेरी इच्छा है और लोकके अग्रभाग पर तूस्थिर रहना चाहता है तो आप्त आगम और पदार्थोकी श्रद्धा धारण कर ।। २०६ ॥
“If you desire the ultimate well-being of your soul and wish to reside eternally at the apex of the universe (Siddhashila), then place absolute faith in the true Deity (Apta), the sacred scriptures (Agama), and the fundamental realities (Padartha).”206
श्लोक ( Shlok ) 207 – 208
विधाय हृदि योगीन्द्रयुग्मं भक्तिभराहितः । मुहुः प्रदक्षिणीकृत्य प्रप्रणम्य मृगाधिपः ॥ २०७ ॥ तत्त्वश्रद्धानमासाद्य सद्यः कालादिलब्धितः । प्रणिधाय मनः श्रावकव्रतानि समाददे ॥ २०८ ॥
इस प्रकार उस सिंहने मुनिराजके वचन हृदयमें धारण किये तथा उन दोनों मुनिराजोंकी भक्तिके भारसे नम्र होकर बार-बार प्रदक्षिणाएँ दीं, बार-बार प्रणाम किया, काल आदि लब्धियोंके मिल जानेसे शीघ्र ही तत्त्वश्रद्धान धारण किया और मन स्थिर कर श्रावकके व्रत ग्रहण किये ।। २०७-२०८ ।।
“In this manner, that lion took the words of the great sage (Muniraj) deep into his heart. Bowing low under the immense weight of devotion toward those two sages, he circumambulated (Pradakshina) them repeatedly and offered his prostrations time and again. Having rapidly attained the necessary spiritual capacities, including the right timing (Kala Labdhi), he embraced true faith in the ultimate realities (Tattva-shraddhan), steadied his mind, and took the vows of a lay devotee (Shravak).”) 207 – 208
श्लोक ( Shlok ) 209
दया मुनिगिरास्यन्ती क्रूरतां तन्मनोऽविशत् । कालस्य बलमप्राप्य को विपक्षं निरस्यति ॥ २०९ ॥
मुनिराजके वचनोंसे क्रूरता दूरकर दयाने सिंहके मनमें प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि कालका बल प्राप्त किये बिना ऐसा कौन है जो शत्रुको दूर हटा सकता है ? ॥ २०९ ॥
“Through the words of the great sage (Muniraj), cruelty was cast away, and compassion entered the lion’s mind. And this is only fitting—for without gaining the strength of the opportune time (Kala), who indeed has the power to banish an enemy?”209
श्लोक ( Shlok ) 210
स्थिररौद्ररसः सद्यः स शमं समधारयत् । यच्छैलूषसमो मोहक्षयोपशमभावतः ॥ २१० ॥
मोहनीय कर्मका क्षयोपशम होनेसे उस सिंहका रौद्र रस स्थिर हो गया और उसने नटकी भाँति शीघ्र ही शान्तरस धारण कर लिया ॥ २१० ॥
“With the subsidence and destruction (Kshayopashama) of his deluding karma (Mohaniya Karma), the lion’s furious and violent disposition (Raudra Rasa) was stilled, and like an actor changing characters, he instantly assumed a state of profound tranquility (Shanta Rasa).”210
श्लोक ( Shlok ) 211
व्रतं नैतस्य सामान्यं निराहारं यतो विना । क्रव्यादन्यस्य नाहारः साहसं किमतः परम् ॥ २११ ॥
निराहार रहनेके सिवाय उस सिंहने और कोई सामान्य व्रत धारण नहीं किया क्योंकि मांसके सिवाय उसका और आहार नहीं था। आचार्य कहते हैं कि इससे बढ़कर और साहस क्या हो सकता है ? ॥ २११ ॥
“Apart from fasting entirely (Nirahara), that lion did not adopt any other ordinary vow, because he had no food available to him other than meat. The Acharya asks—what could possibly be a greater act of spiritual courage than this?”211
श्लोक 212 से 222
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