अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 118 to 131
श्लोक ( Shlok ) 118 – 119
देवीति गतवांस्तस्मात्तदैवासूत सा सुतम् । तदानीमेव तं तन्त्र भविष्यद्भरताधिपः ॥ ११८ ॥बालकोऽयमिति ज्ञानात्स्वीचक्र र्वनदेवताः । ताभिः प्रपाल्यमानोऽयमनाबाधमवर्द्धत ॥ ११९ ॥
इधर रानी चित्रमतीने पुत्र उत्पन्न किया। यह बालक भरत क्षेत्रका भावी चक्रवर्ती है यह विचारकर वन-देवताओंने उसे शीघ्र ही उठा लिया। इस प्रकार वन-देवियाँ जिसकी रक्षा करती हैं ऐसा वह बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा ।। ११८-११९ ॥
Meanwhile, Queen Chitramati gave birth to a son. Realizing that this child was the future Chakravarti (universal monarch) of the Bharata Kshetra (land of Bharata), the forest deities quickly carried him away. Thus protected by the forest goddesses, the child began to grow day by day. (118-119)
श्लोक ( Shlok ) 120 – 125
दिनानि कानिचिन्नीत्वा महीमाश्लिष्य जातवान् । बालकोऽयं कथम्भावी भट्टारक, शुभाशुभम् ॥१२०॥अनुगृह्यास्य वक्तव्यमिति देव्योदितो मुनिः । एष चक्री भवेदम्ब वत्सरे षोडशे ध्रुवम् ॥ १२१ ॥साग्निचुल्लीगतस्थूल किलासघृतमध्यगान् । उष्णापूपानुपादाय भक्षयिष्यति बालकः ॥ १२२ ॥अभिज्ञानमिदं भावि चक्रित्वस्यास्य निश्चितम् । तस्मान्मा स्म भयं यासीरिति तामिति दुःखिताम् १२३ सुबन्ध्वाख्यो भृशं स्वास्थ्यमनैषीत्करुणात्मकः । ततस्तदग्रजोऽभेत्य तां नीत्वा ‘गृहमात्मनः ॥ १२४ ॥ समुद्भूतोऽयमाश्लिष्य मेदिनीमिति तस्य सः । सुभौम इति सम्प्रीत्या चक्रे नाम कृतोत्सवः ॥१२५॥
जब कुछ दिन व्यतीत हो गये तब एक दिन रानीने मुनिसे पूछा कि हे स्वामिन् ! यह बालक पृथिवीका आश्लेषण करता हुआ उत्पन्न हुआ था अतः अनुग्रह करके इसके शुभ-अशुभका निरूपण कीजिये। इस प्रकार रानीके कहने पर मुनि कहने लगे कि हे अम्ब ! यह बालक सोलहवें वर्षमें अवश्य ही चक्रवर्ती होगा और चक्रवर्ती होनेका यह चिह्न होगा कि यह बालक अग्निसे जलते हुए चूल्हेके ऊपर रखी कढ़ाईके घीके मध्यमें स्थित गरम गरम पुओंको निकालकर खा लेगा। इसलिए तू किसी प्रकारका भय मत कर । इस-प्रकार दयासे परिपूर्ण सुबन्धु मुनिने दुःखिनी रानी चित्रमतीको अत्यन्त सुखी किया । तदनन्तर बड़ा भाई शाण्डिल्य नामका तापस आकर उस चित्रमतीको अपने घर ले गया । यह बालक पृथिवीको छूकर उत्पन्न हुआ था इसलिये शाण्डिल्यने बड़ा भारी उत्सव कर प्रेमके साथ उसका सुभौम नाम रक्खा ॥ १२०-१२५ ॥
When a few days had passed, the queen one day asked the sage, “O Master! This child was born embracing the earth; therefore, please show your favor and foretell his good and bad fortune.” Upon the queen speaking thus, the sage began to say, “O Mother! This boy will definitely become a Chakravarti (universal monarch) in his sixteenth year. The sign of his becoming a Chakravarti will be that he will pluck out and eat scalding hot puas (fried pancakes) directly from the boiling ghee in a cauldron kept over a burning hearth. Therefore, do not fear in any way.”
In this manner, the compassionate sage Subandhu brought immense comfort to the grieving Queen Chitramati. Sometime later, her elder brother, the ascetic named Shandilya, arrived and took Chitramati back to his house. Because the child was born touching the earth (prithvi), Shandilya held a grand celebration and affectionately named him Subhauma. (120-125)
श्लोक ( Shlok ) 126
तत्र शास्त्राणि सर्वाणि सप्रयोगाणि सन्ततम् । सोपदेशं समभ्यस्यन् वर्द्धते स्म स गोपितः ॥ १२६ ॥
वहाँ पर वह उपदेशके अनुसार निरन्तर प्रयोग सहित समस्त शास्त्रोंका अभ्यास करता हुआ गुप्तरूपसे बढ़ने लगा ॥ १२६ ॥
There, in accordance with the guidance received, he began to grow up in secrecy while continuously studying and practicing all the scriptures through regular application. (126)
श्लोक ( Shlok ) 127
अथ तौ रेणुकीपुत्रौ प्रवृद्धोग्रपराक्रमौ । त्रिः सप्तकृत्वो निर्मूलमापाद्य क्षत्रियान्वयम् ॥ १२७ ॥
इधर जिनका उम्र पराक्रम बढ़ रहा है ऐसे रेणुकीके दोनों पुत्रोंने इक्कीस वार क्षत्रिय वंशको निर्मूल नष्ट किया ॥ १२७ ॥
Meanwhile, the two sons of Renuka, whose fierce prowess was growing, completely eradicated the Kshatriya lineage twenty-one times. (127)
श्लोक ( Shlok ) 128
स्वहस्ताखिलभूपालशिरांसि स्थापनेच्छया । शिलास्तम्भेषु सङ्गृह्य वद्धवैरौ गुरोर्वधात् ॥ १२८ ॥
पिताके मारे जानेसे जिन्होंने वैर बाँध लिया है ऐसे उन दोनों भाइयोंने अपने हाथसे मारे हुए समस्त राजाओंके शिरोंको एकत्र रखनेकी इच्छासे पत्थरके खम्भोंमें संगृहीतकर रक्खा था ॥ १२८ ॥
With a desire to gather the heads of all the kings they had slain with their own hands, the two brothers—who had sworn enmity due to the killing of their father—collected and kept them stored within stone pillars. (128)
श्लोक ( Shlok ) 129 – 131
सार्वभौमीं श्रियं सम्यक् सम्भूयानुबभूवतुः । निमित्तकुशलो नान्ना कदाचित्स निमित्तवित् ॥ १२९ ॥भवतः शत्रुरुत्पन्नः प्रयनोऽत्र विधीयताम् । कः प्रत्ययोऽस्य चेद्वच्मि अविध्वस्ताखिलभूभुजाम् ।।१३०।। दन्ता यस्याशनं भूत्वा परिणंस्यत्यसौ रिपुः । इतीन्द्ररामं राजानं परश्वीशमबूबुधत् ।। १३१ ॥
इस तरह दोनों भाई मिलकर समस्त पृथिवीकी राज्यलक्ष्मीका अच्छी तरह उपभोग करते थे । किसी एक दिन निमित्तकुशल नामके निमित्तज्ञानीने फरशाके स्वामी राजा इन्द्ररामसे कहा कि आपका शत्रु उत्पन्न हो गया है इसका प्रतिकार कीजिये। इसका विश्वास कैसे हो ? यदि आप यह जानना चाहते हैं तो मैं कहता हूं। मारे हुए राजाओंके जो दांत आपने इकट्ठे किये हैं वे जिसके लिए भोजन रूप परिणत हो जायेंगे वही तुम्हारा शत्रु होगा ॥ १२९-१३१ ॥
In this manner, both brothers together thoroughly enjoyed the royal fortune and sovereignty of the entire earth. One day, an astrologer skilled in reading omens said to King Indrarama (Parashurama), the master of the axe, “Your enemy has been born; take measures to counter him.” When asked, “How can this be believed?”, the astrologer replied, “If you wish to know this, I shall tell you. The teeth of the slain kings that you have collected—the one for whom they turn into food will be your enemy.” (129-131)
श्लोक 132 से 143
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117
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