अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 386 to 396
श्लोक ( Shlok ) 386 – 390
इति सर्व समाकर्ण्य प्रतुष्टः प्रणतो मुहुः । जातसंवेगनिर्वेदः स्वपूर्वभवसन्ततिम् ॥ ३८६ ॥अन्वयुरुक्त गणाधीशं सोऽपीति प्रत्यबूबुधत् । त्रिषष्टिलक्षणं पूर्व पुराणं पृष्टमादितः ॥ ३८७ ॥निर्दिष्टञ्च मया स्पष्टं श्रुतञ्च भवता स्फुटम् । शृणु चित्तं समाधाय श्रेणिक श्रावकोत्तमः ॥ ३८८ ॥वृत्तकं तव वक्ष्यामो भवत्रयनिबन्धनम् । इह जम्बूमति द्वीपे विन्ध्याद्रौ कुटजाह्वये ॥ ३८९ ॥वने खदिरसाराख्यः किरातः सोऽन्यदा मुनिम् । समाधिगुप्तनामानं समीक्ष्य व्यनमन्मुदा ॥ ३९० ॥
यह सब सुनकर राजा श्रेणिक बहुत ही संतुष्ट हुआ, उसने बार-बार उन्हें प्रणाम किया, तथा संवेग और निर्वेदसे युक्त होकर अपने पूर्वभव पूछे। उसके उत्तर में गणधर स्वामी भी समझाने लगे कि तूने पहले तिरसठशलाका पुरुषोंका पुराण पूछा था सो मैंने स्पष्ट रूपसे तुझे कहा है और तूने उसे स्पष्ट. रूपसे सुना भी है। हे श्रावकोत्तम श्रेणिक ! अब मैं तेरे तीन भवका चरित कहता हूँ सो तू चित्तको स्थिरकर सुन । इसी जम्बूद्वीपके विन्ध्याचल पर्वतपर एक कुटज नामक वन है उसमें किसी समय खदिरसार नामका भील रहता था। एक दिन उसने समाधिगुप्त नामके मुनिराजके दर्शनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नतासे नमस्कार किया ॥ ३८६-३९० ॥
“Hearing all this, King Shrenika was profoundly gratified; he bowed before them repeatedly, and filled with the spiritual emotions of fear of worldly suffering (Samvega) and detachment (Nirveda), he inquired about his previous incarnations. In response, the Lord among Ganadharas (Ganadhara Swami) began to elucidate, saying, ‘Previously, you had asked about the sacred history (Purana) of the sixty-three illustrious personalities (Trishashti-Shalaka-Purushas), which I have already explicitly narrated to you, and you have listened to it with absolute clarity.
O Shrenika, foremost among laymen (Shravakottama)! I shall now narrate the chronicle of your own three past existences; therefore, listen with a calm and concentrated mind. Upon the Vindhyachala mountain within this very planet (Jambudvipa), there is a forest named Kutaja; once upon a time, a tribal hunter (Bhila) named Khadirasara lived there. One day, upon beholding the holy ascetic Muni Samadhigupta, he bowed down to him with immense joy.’ || 386–390 ||”
श्लोक ( Shlok ) 391 – 393
धर्मलाभोऽस्तु तेऽद्येति चाकृताशासनं मुनिः । स धर्मो नाम किंरूपस्तेन किं कृत्यमङ्गिनाम् ॥ ३९१ ॥किरातेनेति सम्पृष्टः सोऽपीति प्रत्यभाषत । निवृत्तिर्मधुमांसादिसेवायाः पापहेतुतः ॥ ३९२ ॥स धर्मस्तस्य लाभो यो धर्मलाभः स उच्यते । तेन कृत्यं परं पुण्यं पुण्यात्स्वर्गे सुखं परम् ॥ ३९३ ॥
इसके उत्तर में मुनिराजने ‘आज तुझे धर्म लाभ हो’ ऐसा आशीर्वाद दिया। तब उस भीलने पूछा कि हे प्रभो ! धर्म क्या है? और उससे लाभ क्या है ? भीलके ऐसा पूछने पर मुनिराज कहने लगे कि मधु, मांस आदिका सेवन करना पापका कारण है अतः उससे विरक्त होना धर्म कहलाता है। उस धर्मकी प्राप्ति होना धर्मलाभ कहलाता है। उस धर्मसे पुण्य होता है और पुण्यसे स्वर्गमें परम सुखकी प्राप्ति होती है ।॥ ३९१-३९३ ॥
“In response, the holy ascetic (Muniraja) bestowed upon him the blessing, saying, ‘May you attain spiritual merit (Dharma-labha) today.’ Thereupon, that tribal hunter (Bhila) inquired, ‘O Lord! What is this Dharma, and what is the benefit derived from it?’ Upon the hunter asking thus, the holy ascetic began to explain: ‘The consumption of honey, flesh, and similar substances is the root cause of sin; therefore, detaching oneself from them is called Dharma. The realization of that Dharma is known as the attainment of spiritual merit (Dharma-labha). Through that Dharma, spiritual merit (Punya) is accumulated, and from that merit, one achieves supreme celestial happiness in the heavenly realms.’ || 391–393 ||”
श्लोक ( Shlok ) 394 – 396
श्रुत्वा तन्नाहमस्य स्यामित्युवाच वनेचरः । ‘तदाकूतं वितर्व्याह मुनिः किं काकमांसकम् ॥ ३९४॥भव्य भक्षितपूर्व ते न वेति सुधियां वरः । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याख्यत्तत्कदापि न भक्षितम् ॥ ३९५ ॥मयेत्येवं यदि त्याज्यं तत्वयेत्यब्रवीन्मुनिः । सोऽपि तद्वाक्यमाकर्ण्य प्रतुष्टो दीयतां व्रतम् ॥ ३९६ ॥
यह सुनकर भील कहने लगा कि मैं ऐसे धर्मका अधिकारी नहीं हो सकता। मुनिराज उसका अभिप्राय समझ कर कहने लगे कि, हे भव्य ! क्या तूने कभी पहले कौआ का मांस खाया है ? बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भील, मुनिराजके बचन सुनकर और विचारकर कहने लगा कि मैंने वह तो कभी नहीं खाया है। इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा कि यदि ऐसा है तो उसे छोड़ देना चाहिये । मुनिराजके वचन सुनकर उसने बहुत ही संतुष्ट होकर कहा कि हे प्रभो ! यह व्रत मुझे दिया जाय ॥ ३९४-३९६ ॥
“Hearing this, the tribal hunter (Bhila) began to speak, ‘I am simply not capable or worthy of such a Dharma.’ Discernment-guided, the holy ascetic (Muniraja) perceived his inner state and asked, ‘O virtuous soul (Bhavya)! Have you ever consumed the flesh of a crow in the past?’
The hunter, preeminent among the wise of his clan, pondered deeply over the holy ascetic’s words and replied, ‘No, I have never eaten that.’ In response, the holy ascetic said, ‘If that is so, then you ought to vow to give it up forever.’ Hearing the words of the holy ascetic, he was deeply gratified and said, ‘O Lord! Pray, bestow this vow upon me.’ || 394–396 ||”
श्लोक 397 से 413
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