चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 52 to 63
श्लोक ( Shlok ) 52 – 55
अथ वत्साह्वये देशे कौशाम्ब्यां प्रवरे पुरे । श्रेष्ठी वृषभसेनाख्यस्तस्य कर्मकरोऽभवत् ॥ ५२॥ मित्रवीरो बनेशस्य मित्रं तस्य वनाधिपः । चन्दनामर्पयामास सोऽपि भक्तया वणिक्पतेः ॥ ५३ ॥ धनेन महता साधं नीत्वा कन्यां न्यवेदयत् । कदाचिच्छेष्टिनः पातुं जलमुखत्य यत्नतः ॥ ५४ ॥ आवर्जयन्त्याः केशानां कलापं मुक्तबन्धनम् । लम्बमानं करेणादात्सजलाई घरातले ॥ ५५ ॥
अथानन्तर-वत्स देशके कौशाम्बी नामक श्रेष्ठ नगरमें एक वृषभसेन नामका सेठ रहता था। उसके मित्रवीर नामका एक कर्मचारी था जो कि उस भीलराज का मित्र था। भीलोंके राजाने वह चन्दना उस मित्रवीरके लिए दे दी और मित्रवीरने भी बहुत भारी धनके साथ भक्तिपूर्वक वह चन्दना अपने सेठके लिए सौंप दी। किसी एक दिन वह चन्दना उस सेठके लिए जल पिला रही थी उस समय उसके केशोंका कलाप छूट गया था और जलसे भीगा हुआ पृथिवीपर लटक रहा था उसे वह बड़े यत्नसे एक हाथसे संभाल रही थी ।। ५२-५५ ।।
Thereafter, in a magnificent city named Kaushambi, located in the Vatsa country, there lived a merchant named Vrishabhasena. He had an employee named Mitraveer, who happened to be a friend of the king of the Bhils (tribal chief). The king of the Bhils gave Chandana to Mitraveer, and Mitraveer, in turn, devotedly handed Chandana over to his merchant master along with a vast amount of wealth. One day, while Chandana was offering water to the merchant, her bundle of hair untied and, drenched with water, hung down toward the ground. She was managing it with great effort using one of her hands. [52-55]
श्लोक ( Shlok ) 56 – 59
चन्दनायास्तदालोक्य तद्रूपादतिशङ्किनी । श्रेष्ठिनी तस्य भद्राख्या स्वभर्तुरनया समम् ॥ ५६ ॥सम्पर्क मनसा मत्वा कोपात्प्रफुरिताधरा । निक्षिप्तश्शृङ्खलां कन्यां दुराहारेण दुर्जना ॥ ५७ ॥प्रतर्जनादिभिश्चैनां निरन्तरमबाधत । सापि मत्कृतपापस्य विपाकोऽयं वराकिका ॥ ५८ ॥श्रेष्ठिनी किं करोतीति कुर्वन्त्यात्मविगर्हणम् । स्वाग्रजाया मृगावत्या अप्येतन्न न्यवेदयन् ॥ ५९ ॥
सेठकी स्त्री भद्रा नामक सेठानीने जब चन्दनाका वह रूप देखा तो वह शङ्कासे भर गई। उसने मनमें समझा कि हमारे पतिका इसके साथ सम्पर्क है। ऐसा मानकर वह बहुत ही कुपित हुई। क्रोधके कारण उसके ओंठ काँपने लगे । उस दुष्टाने चन्दनाको साँकलसे बाँध दिया तथा खराब भोजन और ताड़न मारण आदिके द्वारा वह उसे निरन्तर कष्ट पहुँचाने लगी। परन्तु चन्दना यही विचार करती थी कि यह सब मेरे द्वारा किये हुए पाप-कर्मका फल है यह बेचारी सेठानी क्या कर सकती है? ऐसा विचारकर वह निरन्तरआत्मनिन्दा करती रहती थी। उसने यह सब समाचार अपनी बड़ी बहिन मृगावती के लिए भी कहलाकर नहीं भेजे थे ।। ५६-५९ ।।
When the merchant’s wife, a woman named Bhadra, saw Chandana’s exceptional beauty, she became filled with suspicion. She assumed in her mind that her husband was having an affair with her. Believing this, she grew extremely furious, and her lips began to tremble with rage. That wicked woman bound Chandana with chains and began to torture her constantly by giving her wretched food and beating her severely. However, Chandana kept thinking, “All this is merely the fruit of my own past sinful deeds; what can this poor merchant’s wife do?” Reflecting in this manner, she continuously engaged in self-reproach. Out of this same consideration, she did not even send word of any of this news to her elder sister, Mrigavati. [56-59]
श्लोक ( Shlok ) 60 – 63
अन्यदा नगरे तस्मिन्नेव वीरस्तनुस्थितः । प्रविष्टवानिरीक्ष्यासो तं भक्तया मुक्तश्रृङ्खला ॥ ६० ॥ सर्वाभरगहश्याङ्गी’ तद्भारेणेत्र भूतलम् । शिरसा स्पृश्य नत्वोच्चैः प्रतिगृह्य यथाविधि ।। ६१ ।। भोजयित्वाप तद्दानान्मानिनी मानितामरैः । वसुधारां नरुत्पुष्पवृष्टि सुरभिमास्नम् ॥ ६२ ॥ सुरदुन्दुभिनिर्घोषं दानस्तवनघोषगम् । तदैवोत्कृष्टपुण्यानि फलन्ति विपुलं फलम् ॥ ६३ ॥
तदनन्तर किसी दूसरे दिन भगवान् महावीर स्वामीने आहारके लिए उसी नगरी में प्रवेश किया। उन्हें देख चन्दना बड़ी भक्तिसे आगे बढ़ी। आते बढ़ते ही उसकी साँकल टूट गई और आभरणोंसे उसका सब शरीर सुन्दर दिखने लगा। उन्हीं के भारसे मानो उसने झुककर शिरसे पृथिवी तलका स्पर्श किया, उन्हें नमस्कार किया और विधिपूर्वक पडगाह कर उन्हें भोजन कराया । इस आहार दानके प्रभावसे वह मानिनी बहुत ही सन्तुष्ट हुई, देवांने उसका सन्मान किया, रत्नधारा की वृष्टि की, सुगन्धित फूल बरसाये, देव-दुन्दुभियांका शब्द हुआ और दानकी स्तुतिकी घोषणा होने लगी सो ठीक ही है क्योंकि उत्कृष्ट पुण्य अपने बड़े भारी फल तत्काल ही फलते हैं ।। ६०-६३ ।।
Thereafter, on another day, Lord Mahavira Swami entered that very city to seek alms (food). Upon seeing him, Chandana stepped forward with immense devotion. The moment she advanced, her chains broke apart, and her entire body began to look beautiful, adorned with ornaments. As if bending under their weight, she bowed down and touched the ground with her head, paid her respects to him, and formally requested him to accept the food before reverently offering it to him. Due to the power of this offering of food, that proud lady (Bhadra) became highly gratified, the celestial deities honored Chandana, a shower of gems and fragrant flowers rained down, divine drums resonated, and proclamations praising her charity echoed aloud. And this is indeed fitting, for supreme merits yield their magnificent rewards immediately. [60-63]
श्लोक 64 से 72
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51
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