चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 95 to 101
श्लोक ( Shlok ) 95
अस्मिन्नेवोज्जयिन्याख्यमवन्तिविषये पुरम् । प्रजापतिमहाराजः पालकस्तस्य हेलया ॥ ९५ ॥
इसी भरत क्षेत्रके अवन्ति देशमें एक उज्जयिनी नामका नगर है। प्रजापति महाराज उसका अनायास ही पालन करते थे ॥ ९५ ॥
In the Avanti country of this very Bharatkshetra, there is a city named Ujjayini. King Prajapati ruled over and protected it effortlessly. [95]
श्लोक ( Shlok ) 96
तत्रैव धनदेवाख्यश्रेष्ठी तद्नेहिनी सती । धनमित्रा तयोः सूनुर्नागदतो महाबलः ॥ ९६ ॥
उसी नगर में धनदेव नामका एक सेठ रहता था। उसकी धनमित्रा नामकी पतिव्रता सेठानी थी। महाबलका जीव उन दोनोंके नागदत्त नामका पुत्र हुआ ॥ ९६ ॥
In that same city lived a merchant named Dhandeva. His devoted and faithful wife was named Dhanamitra. The soul of Mahabala was reborn as their son, named Nagadatta. [96]
श्लोक ( Shlok ) 97 – 98
तनूजा चानुजास्यासीदर्थस्वामिन्यभिख्यया । पलाशद्वीपमध्यस्थपलाशनगरेशिनः ॥ ९७ ॥महाबलमहीशस्य कनकादिलताऽभवत् । काञ्चनादिलतायाश्च ख्याता पद्मलता सुता ॥ ९८ ॥
इन्हीं दोनोंके अर्थस्वामिनी नामकी एक पुत्री थी जो कि नागदत्तकी छोटी बहिन थी। पलाश द्वीपके मध्यमें स्थित पलाश नगर में राजा महाबल राज्य करता था। कनकलता, इसी महाबल राजाकी काञ्चनलता नामकी रानीसे पद्मलता नामकी प्रसिद्ध पुत्री हुई ॥ ९७-९८ ॥
These same two had a daughter named Arthasvamini, who was Nagadatta’s younger sister. Meanwhile, in Palashanagara, located in the middle of Palashadvipa, King Mahabala ruled. Kanakalata was reborn as the famous daughter named Padmalata, born to this King Mahabala’s queen, Kanchanalata. [97-98]
श्लोक ( Shlok ) 99 – 100
उपयम्यापरां श्रेष्ठी श्रेष्ठिनीं विससर्ज ताम् । सापि देशान्तरंगत्वा ससुता जातसंविदा ॥ ९९ ॥शीलदत्तगुरोः पार्श्वे गृहीतश्रावकन्नता । सूनुमप्यर्पयामास शास्त्राभ्यासनिमित्ततः ॥ १०० ॥
किसी एक समय उज्जयिनी नगरीके सेठ धनदेवने दूसरी स्त्रीके साथ विवाहकर पहिली स्त्री धनमित्राको छोड़ दिया इसलिए वह अपने पुत्रसहित देशान्तर चली गई। एक समय ज्ञान उत्पन्न होनेपर उसने शीलदत्त गुरुके पास श्रावकके व्रत प्रहण किये और शास्त्रोंका अभ्यास करनेके लिए अपना पुत्र उन्हीं मुनिराजको सौंप दिया ।। ९९-१००।।
At one time, Dhandeva, the merchant of Ujjayini, married another woman and abandoned his first wife, Dhanamitra. Consequently, she left for another country along with her son. Later, upon gaining spiritual awakening, she accepted the vows of a shravaka (lay practitioner) from the guru Sheeladatta and entrusted her son to that same monk to study the scriptures. [99-100]
श्लोक ( Shlok ) 101
सोऽपि कालान्तरे बुद्धिनौनिस्तीर्णश्रुताम्बुधिः । सत्कविश्व स्वयम्भूत्वा शास्त्रव्याख्याप्तसयशाः ॥१०१॥
समय पाकर वह पुत्र भी अपनी बुद्धिरूपी नौकाके द्वारा शास्त्र रूपी समुद्रको पार कर गया। वह उत्तम कवि हुआ और शास्त्रोंकी व्याख्या से सुयश प्राप्त करने लगा ।। १०१ ।।
In due course of time, that son also crossed the ocean of scriptures using the boat of his intellect. He became an excellent poet and began to earn great renown through his expositions of the scriptures. [101]
श्लोक 102 से 113
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94
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