अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 193 to 202
श्लोक ( Shlok ) 193
ततोऽपीह समुद्भूय क्रौर्यमेवं समुद्वहन् । महदंहः समावर्ज्य दुःखायोत्सहसे पुनः ॥ १९३ ॥
वहाँसे निकलकर तू फिर सिंह हुआ है और इस तरह क्रूरता कर महान् पापका अर्जन करता हुआ दुःखके लिए फिर उत्साह कर रहा है ॥ १९३ ॥
“Having emerged from there, you have become a lion again, and by committing such cruelty and earning great sin, you are once more striving for misery.”193
श्लोक ( Shlok ) 194 – 195
अहो प्रवृद्धमज्ञानं तत्ते यस्य प्रभावतः । पापिस्तत्त्वे न जानासीत्याकर्ण्य तदुदीरितम् ॥ १९४ ॥सद्यो जातिस्मृतिं गत्वा घोरसंसारदुःखजात् । भयाच्चलितसर्वाङ्गो गलद्वाष्पजलोऽभवत् ॥ १९५ ॥
अरे पापी ! तेरा अज्ञान बहुत बढ़ा हुआ है उसीके प्रभावसे तू तत्त्वको नहीं जानता है। इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर उस सिंहको शीघ्र ही जातिस्मरण हो गया । संसारके भयंकर दुःखों से उत्पन्न हुए भयसे उसका समस्त शरीर काँपने लगा तथा आँखोंसे आँसू गिरने लगे ॥१९४–१९५ ।।
“O sinner! Your ignorance is immense, and under its influence, you do not know the ultimate truth.” Hearing these words of the great sage (Muniraj), the lion suddenly regained the memory of his past lives (Jatismaran). Out of fear born from the terrifying miseries of the world, his entire body began to tremble, and tears started flowing from his eyes.194 – 195
श्लोक ( Shlok ) 196
लोचनाभ्यां हरेर्बाष्पसलिलं न्यगलच्चिरम् । सम्यक्त्वाय हृदि स्थानं मिथ्यात्वमिव दित्सु तत् ॥ १९६ ॥
सिंहकी आँखोंसे बहुत देर तक अश्रुरूपी जल गिरता रहा जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो हृदयमें सम्यक्त्यके लिए स्थान देनेकी इच्छासे मिथ्यात्व ही बाहर निकल रहा था ।। १९६ ।।
“For a long time, tear-like water kept flowing from the lion’s eyes, making it appear as if delusion (Mithyatva) itself was flowing out of his body, driven by the desire to clear a space in his heart for right faith (Samyaktva).”196
श्लोक ( Shlok ) 197
प्रत्यासन्नविनेयानां स्मृतप्राग्जन्मजन्मिनाम् । पश्चात्तापेन यः शोकः संसृतौ स न कस्यचित् ॥ १९७ ॥
जिन्हें पूर्व जन्मका स्मरण हो गया है ऐसे निकटभव्य जीवोंको पश्चात्ताप से जो शोक होता है वह शोक संसारमें किसीको नहीं होता ॥ १९७ ॥
“The intense sorrow born of repentance that is experienced by nikat-bhavya souls (those nearing liberation) who have recalled their past lives, is a sorrow unmatched by anyone else in the entire world.”197
श्लोक ( Shlok ) 198 – 199
हरिं शान्तान्तरङ्गत्वात्स्वस्मिन्बद्धनिरीक्षणम् । विलोक्यैष हितग्राहीत्याहैवं स मुनिः पुनः ॥ १९८ ॥पुरा पूरूखा भूत्वा धर्मात्सौधर्मकल्पजः । जातस्ततोऽवतीर्यात्र मरीचिरतिदुर्मतिः ॥ १९९ ॥
मुनिराजने देखा कि इस सिंहका अन्तःकरण शान्त हो गया है और यह मेरी ही ओर देख रहा है इससे जान पड़ता है कि यह इस समय अवश्य ही अपना हित ग्रहण करेगा, ऐसा विचार कर मुनिराज फिर कहने लगे कि तू पहले पुरूरवा भील था फिर धर्म सेवन कर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ। वहाँसे चयकर इसी भरत क्षेत्रमें अत्यन्त दुर्मति मरीचि हुआ ।। १९८-१९९ ॥
“Seeing that the lion’s inner self had become calm and that he was looking directly at them, the great sage (Muniraj) thought, ‘It appears that he will certainly accept what is beneficial for his soul at this moment.’ Reflecting thus, the sage spoke again, ‘In a past life, you were first Pururava the Bhil (tribal hunter). Then, by practicing righteousness, you became a celestial being (Deva) in the Saudharma heaven. Descending from there, you were born in this Bharat-kshetra as the highly close-minded Marichi.'”198 – 199
श्लोक ( Shlok ) 200 – 202
सन्मार्गदूषणं कृत्वा कुमार्गमतिवर्धयन् । वृषभस्वामिनो वाक्यमनादृत्याजवञ्जवे ॥ २०० ॥भ्रान्तो जातिजरामृत्युसन्ततेः पापसञ्चयात् । विप्रयोगं प्रियैर्योगमप्रियैराप्नुवंश्चिरम् ॥ २०१ ॥अपरञ्च महादुःखं बृहत्पापोदयोदितम् । त्रसस्थावरसम्भूतावसङ्ख्यातसमा भ्रमन् ॥ २०२ ॥
उस पर्यायमें तूने सन्मार्गको दूषित कर कुमार्गकी वृद्धि की। श्री ऋषभदेव तीर्थंकरके वचनोंका अनादर कर तू संसारमें भ्रमण करता रहा। पापोंका संचय करनेसे जन्म, जरा और मरणके दुःख भोगता रहा तथा बड़े भारी पापकर्मके उदयसे प्राप्त होनेवाले इष्ट-वियोग तथा अनिष्ट संयोगका तीव्र दुःख चिरकाल तक भोगकर तूने त्रस स्थावर योनियोंमें असंख्यात वर्ष तक भ्रमण किया ।। २००-२०२ ।।
“In that birth, you defiled the right path and promoted the wrong path. By disregarding the words of the Tirthankara, Lord Rishabhdev, you continued to wander in the cycle of transmigration (Samsara). Due to the accumulation of sins, you kept suffering the miseries of birth, old age, and death. And through the rise of heavy, sinful karmas, you endured for a very long time the intense agony of separation from the desired (Ishta-viyoga) and association with the undesired (Anishta-sanyoga), wandering across the mobile (Trasa) and immobile (Sthavara) life-forms for countless years.”200 – 202
श्लोक 203 से 211
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
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