राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 576 to 585
श्लोक ( Shlok ) 576
केतवश्चानुकूलानिलेरिता “विद्विषं प्रति । चेलुर्दण्डान् परित्यज्य पुरो योद्धुमिवोद्यताः ॥ ५७६ ॥
उस समय अनुकूल पवनसे प्रेरित ध्वजाएँ शत्रुओंकी ओर ऐसी जा रही थीं मानो दण्डोंको छोड़कर पहले ही युद्ध करनेके लिए उद्यत हो रही हों ।॥ ५७६ ।।
“At that time, the banners, driven forward by a favorable wind, were reaching out toward the enemies in such a manner as if they were abandoning their staffs to leap ahead into battle on their own.” ॥ 576 ॥
श्लोक ( Shlok ) 577
नभसः शुद्धरूपस्य मालं जलधराकृतिम् । अथवापनयन्तो वा संच्छादितरवित्विषः ॥ ५७७ ॥
अथवा सूर्यकी किरणोंको ढकनेवाली वे ध्वजाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो निर्मल आकाशमें जो मेघरूपी मैल छाया हुआ था उसे ही दूर कर रही हों ।। ५७७ ।।
“Alternatively, those banners—blocking out the rays of the sun—appeared as though they were wiping away the cloud-like grime that had cast a shadow over the otherwise pristine sky.” ॥ 577 ॥
श्लोक ( Shlok ) 578
धृतदण्डप्रवृत्तित्वाद् वयोतीतानुकारिणः । काले विमुक्तिमत्त्वाच्च मुनिमार्गानुसारिणः ॥ ५७८ ॥
अथवा वे ध्वजाएँ दण्ड धारण कर रही थीं अर्थात् दण्डोंमें लगी हुई थीं इसलिए वृद्ध पुरुषोंका अनुकरण कर रही थीं अथवा समय पर मुक्त होती थीं- खोलकर फहराई जाती थीं इसलिए मुनिमार्गका अनुसरण करती थीं ।॥ ५७८ ॥
“Alternatively, because those banners held onto staffs (Danda), they emulated wise old men who lean upon walking sticks (Danda); or, because they were released (Mukta) at the designated time to flutter freely, they followed the path of liberated sages (Munis) who attain ultimate liberation (Mukti) at the perfect moment.” ॥ 578 ॥
श्लोक ( Shlok ) 579
बलावष्टम्भखिन्नावनीनिःश्वसितसन्निभे । मिथ्याज्ञान इवाशेषवोधविध्वंसकारणे ॥ ५७९ ॥
उस समय धूलि उड़कर चारों ओर फैल गई थी और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो सेनाके बोझसे खिन्न हुई पृथिवी साँस ही ले रही हो । अथवा पूर्ण ज्ञानको नाश करनेका कारण मिथ्याज्ञान ही फैल रहा हो ।। ५७९ ।।
“At that time, a thick shroud of dust rose and spread across all directions, looking as though the earth, exhausted and distressed by the crushing weight of the colossal army, was letting out a heavy sigh. Alternatively, it appeared as if a cloud of false knowledge (Mithyajnana) was spreading everywhere, intent on completely destroying true, perfect knowledge.” ॥ 579 ॥
श्लोक ( Shlok ) 580
महाभये वा सम्प्राप्ते रणविघ्नविधायिनी । पुरानर्जितपुण्ये वा समस्तनयनाप्रिये ॥ ५८० ॥
अथवा युद्धमें विघ्न्न करनेवाला कोई बड़ा भारी भय ही आकर उपस्थित हुआ था। जिसने पूर्वभवमें पुण्य संचित नहीं किया ऐसा मनुष्य जिस प्रकार सबके नेत्रोंके लिए अप्रिय लगता है इसी प्रकार वह धूलि भी सब के नेत्रोंके लिए अप्रिय लग रही थी ।। ५८० ।।
“Alternatively, it seemed as if some colossal, menacing fear had manifested itself to disrupt the impending battle. And just as a person who has failed to accumulate spiritual merit (Punya) in their past life (Purvabhava) becomes deeply unpleasing to the eyes of everyone, that blinding dust, too, was causing distress and proved offensive to the eyes of all.” ॥ 580 ॥
श्लोक ( Shlok ) 581 – 585
रजस्येवं नभोभागलङ्घिन्याहितरं हसि । मूर्छितं गर्भगं कुढ्य लिखितं चातिशय्य तत् ॥ ५८१ ॥बलं ‘कलकलं किञ्चिद्विचेष्टमभवत्तदा । विध्वस्तवैरिभूपालचित्तक्षोभोपमे शनैः ॥ ५८२ ॥पृथौ तस्मिन् रजःक्षोभे प्रशान्ते सति सक्रुधः । प्रस्पष्टदृष्टिसञ्चाराः सेनानायकचोदिताः ॥ ५८३ ॥गतिं प्रपातसंशुद्धा नवाब्दा वा धनुर्धराः । शरवृष्टि विमुञ्चन्तो हृदयानि विरोधिनाम् ॥ ५८४ ॥कुर्वन्ति स्मापरागाणि सद्भटानां रणाङ्गणे । युद्धयन्ते स्माहवोत्साहात्तेऽपि तैरिव चोदिताः ॥ ५८५ ॥
इस प्रकार वेगसे भरी धूलि आकाशको उल्लंघन कर रही थी अर्थात् समस्त आकाशमें फैल रही थी। उस धूलिके भीतर समस्त सेना ऐसी हो गई मानो मूर्छित हो गई हो अथवा गर्भमें स्थित हो, अथवा दीवाल पर लिखे हुए चित्रके समान निश्चेष्ट हो गई हो। उसका समस्त कलकल शान्त हो गया। जिस प्रकार किसी पराजित राजाके चित्तका क्षोभ धीरे-धीरे शान्त हो जाता है उसी प्रकार जब वह धूलिका बहुत भारी क्षोभ धीरे-धीरे शान्त हो गया और दृष्टिका कुछ-कुछ संचार होने लगा तब सेनापतियोंके द्वारा जिन्हें प्रेरणा दी गई है ऐसे क्रोधसे भरे योद्धा गमन करनेसे शुद्ध हुए नये बादलोंके समान धनुष धारण करते हुए बाणोंकी वर्षा करने लगे और युद्धके मैदानमें शत्रु-योद्धाओंके हृदय रागरहित करने लगे। सेनापतियोंके द्वारा प्रेरित हुए योद्धा बड़े उत्साहसे युद्ध कर रहे थे ॥ ५८१-५८५ ॥
“In this manner, the violently swirling dust transcended the skies, spreading across the entire firmament. Enveloped within that thick shroud of dust, the entire army became utterly obscured—appearing as though they had fallen unconscious, or were resting deep within a womb, or had become as motionless as figures painted upon a wall. All of their chaotic noise and clamor fell completely silent.
Just as the internal turmoil in the heart of a defeated king gradually subsides, that immense, overwhelming agitation of the dust also began to settle down slowly, and vision was gradually restored. At that moment, the furious warriors, spurred on by their commanders, took up their bows. Looking like fresh rain clouds purified by their swift movement, they began to rain down a relentless torrent of arrows, piercing the hearts of the enemy warriors on the battlefield and rendering them devoid of life (and passion). Driven by their generals, the soldiers engaged in combat with unbounded enthusiasm.” ॥ 581-585 ॥
श्लोक 586 से 594
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