अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 373 to 385
श्लोक ( Shlok ) 373 – 374
ततः परं जिनेन्द्रस्य वायुभूत्यग्निभूतिकौ । सुधर्ममौयौं मौन्द्राख्यः पुत्रमैत्रेयसम्ज्ञकौ ॥ ३७३ ॥ अकम्पनोऽन्धवेलाख्यः १ प्रभासश्च मया सह । एकादशेन्द्रसम्पूज्याः सन्मतेर्गणनायकाः ॥ ३७४ ॥
इसके बाद वायुभूति, अग्निभूति, सुधर्म, मौर्य, मौन्द्रय, पुत्र, मैत्रेय, अकम्पन, अन्धवेला तथा प्रभास ये गणधर और हुए। इस प्रकार मुझे मिलाकर श्रीवर्धमान स्वामीके इन्द्रों द्वारा पूजनीय ग्यारह गणधर हुए. ।।३७३-३७४।।
“Following this, Vayubhuti, Agnibhuti, Sudharma, Maurya, Maundraya, Putra, Maitreya, Akampana, Andhavela, and Prabhasa also became Ganadharas. In this manner, counting myself, there were altogether eleven Ganadharas (chief disciples) of the venerable Lord Vardhamana, all of whom were profoundly worshiped by the celestial Indras. || 373–374 ||”
श्लोक ( Shlok ) 375 – 378
शतानि श्रीणि पुर्वाणां धारिणः शिक्षकाः परे । शून्यद्वितयरन्ध्रादिरन्ध्रोक्ताः सत्यसंयमाः ॥ ३७५ ॥ शतानि नवविज्ञेया विक्रियद्धिविवर्द्धिताः । शतानि पञ्च सम्पूज्याश्चतुर्थज्ञानलोचनाः ।। ३७७ ॥सहस्त्रमेकं त्रिज्ञानलोचनास्त्रिशताधिकम् । पञ्चमावगमाः सप्तशतानि परमेष्ठिनः ॥ ३७६ ॥चतुःशतानि सम्प्रोक्तास्तत्रानुत्तरवादिनः । चतुर्दशसहस्त्राणि पिण्डिताः स्युर्मुनीश्वराः ।। ३७८ ॥
इनके सिवाय तीन सौ ग्यारह अङ्ग और चौदह पूर्वोके धारक थे, नौ हजार नौ सौ यथार्थ संयमको धारण करनेवाले शिक्षक थे, एक हजार तीन सौ अवधिज्ञानी थे, सात सौ केवलज्ञानी परमेष्ठी थे, नौ सौ विक्रियाऋद्धिके धारक थे, पाँच सौ पूजनीय मनःपर्ययज्ञानी थे और चार सौ अनुत्तर-वादी थे इस प्रकार सब मुनीश्वरोंकी संख्या चौदह हजार थी ।। ३७५-३७८ ॥
“Apart from these [the chief disciples], there were three hundred and eleven ascetics who possessed the complete knowledge of the eleven Angas and fourteen Purvas; nine thousand nine hundred teachers who maintained flawless, absolute self-restraint; one thousand three hundred who possessed clairvoyant knowledge (Avadhi-jnani); seven hundred supreme omniscient saints (Kevala-jnani Paramesthi); nine hundred who possessed the supernatural power of transformation (Vikriya-riddhi); five hundred revered sages endowed with telepathic knowledge (Manah-paryaya-jnani); and four hundred undefeated debaters (Anuttara-vadi). In this manner, the total number of all these lords among monks (Munishvaras) was fourteen thousand. || 375–378 ||”
श्लोक ( Shlok ) 379 – 385
चन्दनाद्यार्थिकाः शून्यत्रयषड्वह्विसम्मिताः । श्रावका लक्षमेकं तु त्रिगुणाः श्राविकास्ततः ॥ ३७९ ॥देवा देव्योप्यसंख्यातास्तिर्यञ्चः कृतसङ्ख्यकाः । गणैर्द्वादशभिः प्रोक्तैः परीतेन जिनेशिना ॥ ३८०॥ सिंहविष्टरमध्यस्थेनार्थमागध्वभाषया । षड्द्रव्याणि पदार्थाश्च सप्तसंसृतिमोक्षयोः ॥ ३८१ ॥ प्रत्ययस्तत्फलञ्चैतत्सर्वमेव प्रपञ्चतः । प्रमाणनयनिक्षेपाद्युपायैः सुनिरूपितम् ॥ ३८२ ॥औत्पत्तिक्यादिधीयुक्ताः श्रुतवन्तः सभासदाः । केचित्संयमापन्नाः संयमासंयमं परे ॥ ३८३ ॥सम्यक्त्वमपरे सद्यः स्वभव्यत्वविशेषतः । एवं श्रीवर्धमानेशो विदधद्धर्मदेशनाम् ॥ ३८४ ॥क्रमाद्राजगृहं प्राप्य तस्थिवान् विपुलाचले । श्रत्वैतदागमं सद्यो मगधेशत्वमागतः ॥ ३८५ ॥
चन्दनाको आदि लेकर छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएं थीं, असंख्यात देव देवियाँ थीं, और संख्यात तिर्यञ्च थे। इस प्रकार ऊपर कहे हुए बारह गणोंसे परिवृत भगवान् ने सिंहासनके मध्यमें स्थित हो अर्धमागधी भाषाके द्वारा छह द्रव्य, सात तत्त्व, संसार और मोक्षकेकारण तथा उनके फलका प्रमाण नय और निक्षेप आदि उपायोंके द्वारा विस्तारपूर्वक निरूपण किया । भगवान्का उपदेश सुनकर स्वाभाविक बुद्धिवाले कितने ही शास्त्रज्ञ सभासदोंने संयम धारण किया, कितनों ही ने संयमासंयम धारण किया, और कितनोंने अपने भव्यत्व गुणकी विशेषतासे शीघ्र ही सम्यग्दर्शन धारण किया। इस प्रकार श्रीवर्धमान स्वामी धर्मदेशना करते हुए अनुक्रमसे राजगृह नगर आये और वहाँ विपुलाचल नामक पर्वतपर स्थित हो गये। हे मगधेश ! जब तुमने भगवान्के आगमनका समाचार सुना तब तुम शीघ्र ही यहाँ आये ॥ ३७९-३८५ ।।
“Led by Chandana, there were thirty-six thousand female ascetics (Aryikas); there were one hundred thousand laymen (Shravakas); three hundred thousand laywomen (Shravikas); innumerable celestial gods and goddesses; and a countable number of animals (Tiryanchas). Encircled by these aforementioned twelve congregations (Ganas), the Lord, seated in the center of the divine throne, expounded in detail through the medium of the Ardhamagadhi language the six substances (Dravyas), the seven principles (Tattvas), the causes of both worldly transmigration and final liberation, and their respective consequences, employing the analytical methodologies of viewpoints (Nayas) and installations (Nikshepas).
Upon listening to the discourse of the Lord, many scholarly members of the assembly possessing innate wisdom embraced the vows of complete self-restraint (Sanyama); many adopted the vows of partial self-restraint (Sanyamasanyama); and many others, by virtue of the exceptional awakening of their capacity for liberation (Bhavyatva), instantly attained right conviction (Samyag-darshana). In this manner, while delivering His sermons on righteousness, the venerable Lord Vardhamana arrived in due course at the city of Rajagriha and established Himself upon the Vipulachala mountain. O Lord of Magadha! The moment you received the tidings of the Lord’s arrival, you hastened to this very place. || 379–385 ||”
श्लोक 386 से 396
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 386 से 396
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