नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 162 से 171 श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 212 to 222
श्लोक ( Shlok ) 212
द्रुपदाधुग्रवंशोत्थमहीशाः कुरुवंशजाः । अन्येऽपि चानुरूपोऽयमिति तुष्टि समागमन् ॥ २१२ ॥
यह देखकर द्रुपद आदि उग्र वंशमें उत्पन्न हुए राजा कुरुवंशी तथा अन्य अनेक राजा ‘यह सम्बन्ध अनुकूल सम्बन्ध है’ यह कहते हुए संतोषको प्राप्त हुए ॥ २१२ ॥
“Seeing this, King Drupada and other kings born of the Ugra lineage, along with the kings of the Kuru dynasty and many others, attained great satisfaction, saying: ‘This is indeed a highly suitable and compatible alliance.'”— 212
श्लोक ( Shlok ) 213
एवं सम्प्राप्तकल्याणाः प्रविश्य पुरमात्मनः । गमयन्ति स्म सौख्येन कालं दीर्घमिव क्षणम् ॥ २१३ ॥
इस प्रकार अनेक कल्याणोंको प्राप्तकर वे पाण्डव अपने नगरमें गये और सुख पूर्वक बड़े लम्बे समयको क्षणभरके समान व्यतीत करने लगे ।। २१३ ।।
“In this manner, having attained numerous blessings and auspicious fortunes, those Pandavas returned to their city and happily spent a very long period of time as if it were a mere moment.”— 213
श्लोक ( Shlok ) 214
ततः पार्थात्सुभद्रायामभिमन्युरभूत्सुतः । द्रौपद्यां पञ्च पाञ्चालनामानोऽन्वभवन्क्रमात् ॥ २१४ ॥
तदनन्तर अर्जुनके सुभद्रासे अभिमन्यु नामका पुत्र हुआ और द्रौपदीके अनुक्रमसे पाञ्चाल नामके पाँच पुत्र हुए ॥ २१४ ।।
“Thereafter, a son named Abhimanyu was born to Arjuna from Subhadra, and five sons named Panchala were born to Draupadi in successive order.”— 214
श्लोक ( Shlok ) 215 – 217
धूतं युधिष्ठिरस्यात्र दुर्योधनमहीभुजा । भुजङ्गशैलपुर्या यत्कीचकानां विनाशनम् ॥ २१५ ॥विराटभूपतेर्भूरिगोमण्डलनिवर्तनम् । अनुयानेन भूपस्य विराटस्य सुशर्मणः ॥ २१६ ॥अल्पगोमण्डलस्यार्जुनोत्तराभ्यां निवर्तनम् । पुराणवेदिभिर्वाच्यं विस्तरेण यथाश्रुतम् ॥ २१७ ॥
यहाँ युधिष्ठिरका राजा दुर्योधनके साथ जुआ खेला जाना, भुजंगशैल नामक नगरीमें कीचकोंका मारा जाना, पाण्डव का विराट नगरीके राजा विराटका सेवक बनकर रहना, अर्जुनके द्वारा राजा विराटकी बहुत भारी गायोंके समूहका लौटाया जाना, तथा अर्जुनके अनुज सहदेव और नकुलके द्वारा उसी सुख-सम्पन्न राजा विराटकी कुछ गायोंका वापिस लौटाना, आदि जो घटनाएँ हैं उनका आगमके अनुसार पुराणके जाननेवाले लोगोंको विस्तारसे कथन करना चाहिए ।। २१५-२१७ ।।
“The events mentioned here—such as Yudhishthira playing the game of dice with King Duryodhana, the killing of the Keechakas in the city named Bhujangashaila, the Pandavas living disguised as servants to King Virata in the city of Virata, Arjuna rescuing and bringing back King Virata’s massive herd of cattle, and Arjuna’s younger brothers Sahadeva and Nakula similarly recovering some of the cows belonging to that prosperous King Virata—should be narrated in detail by those well-versed in the Puranas, in accordance with the sacred scriptures (Agamas).”— 215–217
श्लोक ( Shlok ) 218 – 219
अथ युद्धे कुरुक्षेत्रे प्रवृत्ते कौरवैः समम् । “पाण्डवानां विनिर्जित्य दुर्योधनधराधिपम् ॥ २१८ ॥युधिष्ठिरः समस्तस्य विषयस्याभवद्विभुः । विभज्य स्वानुजैर्लक्ष्मी भुञ्जानोऽरञ्जयज्जनम् ॥ २१९ ॥
अथानन्तर-कुरुक्षेत्रमें पाण्डवोंका कौरवोंके साथ युद्ध हुआ उसमें युधिष्ठिरदुर्योधन राजाको जीतकर समस्त देशका स्वामी हो गया और छोटे भाइयों के साथ विभागकर राज्यलक्ष्मीका उपभोग करता हुआ सबको प्रसन्न करने लगा ।। २१८-२१९ ॥
“Thereafter, a war took place in Kurukshetra between the Pandavas and the Kauravas. In that battle, Yudhishthira conquered King Duryodhana, became the sovereign ruler of the entire land, and by sharing the royal fortune with his younger brothers, began to rule while keeping everyone happy and delighted.”— 218–219
श्लोक ( Shlok ) 220
एवं स्वकृतपुण्यस्य ते सर्वे परिपाकजम् । सुखं निखिलमव्यग्रमन्वभूवन्ननारतम् ॥ २२० ॥
इस प्रकार वे सब पांडव अपने द्वारा किये हुए पुण्य कर्मके उदयसे उत्पन्न सम्पूर्ण सुखका बिना किसी आकुलताके निरन्तर उपभोग करने लगे ।। २२० ।।
“In this manner, by the rise of their past meritorious deeds (Punya Karma), all those Pandavas continuously enjoyed absolute, uninterrupted happiness completely free from any anxiety or distress.”— 220
श्लोक ( Shlok ) 221 – 222
तदा द्वारावतीदाहः कौशाम्बीगहनान्तरे । मृतिर्जरत्कुमारेण विष्णोर्येष्ठस्य संयमः ॥ २२१ ॥भविष्यतीति यत्त्रोक्त’ द्वारावत्यां जिनेशिना । निर्वृत्तं तत्र तत्सर्वं न मिथ्यावादिनो जिनाः ॥ २२२ ॥
तदनन्तर – ‘द्वारावती जलेगी, कौशाम्बी-वनमें जरत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णकी मृत्यु होगी और उनके बड़े भाई बलदेव संयम धारण करेंगे’ इस प्रकार द्वारावतीमें नेमिनाथ भगवान ने जो कुछ कहा था वह सब वैसा ही हुआ सो ठीक ही है क्योंकि जिनेन्द्र भगवान् अन्यथावादी नहीं होते हैं ।॥२२१-२२२ ।।
“Thereafter—’Dvaravati (Dvaraka) will burn, Shri Krishna will meet his end at the hands of Jaratkumara in the Kaushambi forest, and his elder brother Baladeva (Balarama) will embrace self-restraint (Sanyama)’—everything that Lord Neminatha had predicted in Dvaravati transpired exactly in that manner. And this is only fitting, for the Jinendra Lords (the Tirthankaras) never speak untruth.”— 221–222
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
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