शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 154 to 161
श्लोक ( Shlok ) 154 -155
इति स्मरंश्च भव्यानां बहूनामुपशान्तये । स्वकीयपुत्रमाहात्म्य प्रकाशनधिया च तत् ॥ १५४ ॥युद्धं घनरथाधीशो लोकमानो दृढक्रुधोः । स मेघरथमप्राक्षीत् बलमेतत्कुतोऽनयोः ॥ १५५॥
ऐसा विचार कर बहुतसे भव्य जीवोंको शान्ति प्राप्त कराने तथा अपने पुत्रका माहात्म्य प्रकाशित करनेकी बुद्धिसे राजा घनरथ उन दोनों क्रोधी मुर्गोंका युद्ध देखते हुए मेघरथसे पूछने लगे कि इनमें यह बल कहाँ से आया ? ।। १५४-१५५ ।।
“With the thoughts of bringing peace to many noble souls and illuminating the greatness of his son, King Ghanaratha, while watching the fight between those two furious roosters, began to ask Megharatha: ‘From where did they acquire such strength?'” [154-155]
श्लोक ( Shlok ) 156
इति तेन स पृष्ठः सन् विशुद्धावधिलोचनः । तयोस्तादृशयुद्धस्य हेतुमेवमुदाहरत् ॥१५६॥
इस प्रकार घनरथके पूछने पर विशुद्ध अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करने वाला मेधरथ, उन दोनों मुर्गोंके वैसे युद्धका कारण कहने लगा ।। १५६ ॥
“Upon being asked thus by Ghanaratha, Megharatha—who possessed the eyes of pure Avadhijnana (clairvoyant knowledge)—began to explain the cause behind that intense fight between the two roosters.” [156]
श्लोक ( Shlok ) 157 – 159
अस्मिन्नैरावते रत्नपुरे शाकटिकौ क्रुधा । सोदयौं भद्रधन्याख्यौ बलीवर्दनिमित्ततः ॥ १५७॥ पापिष्ठौ ‘श्रीनदीतीरे हत्वा मृत्वा परस्परम् । काञ्चनाख्यसरित्तीरे श्वेतताम्नादिकर्णकौ ॥१५८॥ स्वपूर्वजन्मपापेन जायेतां वनवारणौ । तत्रापि भवसम्बद्धक्रोधाद्युध्वा मृतिं गतौ ॥ १५९॥
उसने इस प्रकार कहना शुरू किया कि इसी जम्बूद्वीपके ऐरावत क्षेत्रमें एक रत्नपुर नामका नगर है उसमें भद्र और धन्य नामके दो सगे भाई थे। दोनों ही गाड़ी चलानेका कार्य करते थे। एक दिन वे दोनों ही पापी श्रीनदीके किनारे बैलके निमित्त से लड़ पड़े और परस्पर एक दूसरेको मार कर मर गये। अपने पूर्व जन्मके पाप से मर कर वे दोनों काञ्चन नदी के किनारे श्वेतकर्ण और ताम्रकर्ण नामके जंगली हाथी हुए। वहाँपर भी वे दोनों पूर्व भव के बँधे हुए क्रोधसे लड़कर मर गये ।। १५७-१५९ ॥
“He began to narrate thus: In the Airavata region of this very Jambudvipa, there is a city named Ratnapura. In that city lived two real brothers named Bhadra and Dhanya, both of whom worked as cart-drivers. One day, owing to their sins, those two fought on the banks of the Shri river over a bullock, and killing each other, they died.
Due to the sins of their previous birth, they were reborn after death as wild elephants named Shvetakarna and Tamrakarna on the banks of the Kanchana river. There too, fighting out of the residual anger bound from their past life, they died.” [157-159]
श्लोक ( Shlok ) 160
अयोध्यापुरत्रास्तव्यो नन्दिमित्रोऽस्ति बल्लवः । महिषीमण्डले तस्य जज्ञाते गवलोत्तमौ ॥ १६०॥
मर कर अयोध्या नगरमें रहने वाले नन्दिमित्र नामक गोपालकी भैंसोंके झुण्डमें दो उत्तम भैंसे हुए ॥ १६० ॥
“After dying, they were reborn as two excellent buffaloes within the herd belonging to a cowherd named Nandimitra, who lived in the city of Ayodhya.” [160]
श्लोक ( Shlok ) 161
दृप्तौ तत्रापि संरम्भसम्भृतौ तौ परस्परम् । बभूवतुश्चिरं युद्ध्वा श्रृङ्गाग्राकृष्टजीवितौ ॥१६१।।
दोनों ही अहंकारी थे अतः परस्परमें बहुत ही कुपित हुए और चिरकाल तक युद्धकर सींगोंके अग्रभाग की चोटसे दोनोंके प्राण निकल गये ॥ १६१ ॥
“Both of them were filled with immense pride and thus became fiercely enraged with one another. After fighting for a very long time, both of them lost their lives due to the severe blows exchanged from the tips of their horns.” [161]
श्लोक 162 से 171
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