Summary of Uttar Puran Parv 73 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 73 (श्लोक 1–170) का संक्षिप्त सारांश
उत्तरपुराण के तिहत्तरवें पर्व में भगवान् पार्श्वनाथ तीर्थंकर के पूर्वभवों, उनके वैराग्य, तप, केवलज्ञान तथा मोक्ष का विस्तृत वर्णन किया गया है। मरुभूति और कमठ के बीच उत्पन्न वैर अनेक जन्मों तक चलता रहा। मरुभूति ने विभिन्न भवों में धर्म, संयम और तप का आश्रय लिया, जबकि कमठ बार-बार क्रोध, हिंसा और द्वेष के कारण दुर्गति को प्राप्त होता रहा। मरुभूति का जीव हाथी, देव, राजकुमार, चक्रवर्ती, मुनि, देव और राजा आनन्द आदि भवों को प्राप्त कर क्रमशः तीर्थंकरत्व के योग्य पुण्य संचय करता रहा।
राजा आनन्द ने जिनप्रतिमा-पूजा का महत्व समझकर श्रद्धापूर्वक धर्म आराधना की, राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की और सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन कर तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। इसके पश्चात् वे उच्च देवगति में जन्म लेकर अन्ततः काशी के राजा विश्वसेन और रानी ब्राह्मी के यहाँ भगवान् पार्श्वनाथ के रूप में अवतरित हुए। गर्भ और जन्म कल्याणकों के समय देवों ने महान उत्सव मनाया तथा इन्द्रों ने मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक किया।
युवावस्था में भगवान् पार्श्वनाथ ने एक मिथ्यादृष्टि तपस्वी द्वारा लकड़ी में निवास करने वाले सर्प-सर्पिणी की हिंसा को रोका। उन्हीं सर्पों का जीव आगे चलकर धरणेन्द्र और पद्मावती बना, जबकि वह तपस्वी शम्बर देव हुआ। तीस वर्ष की आयु में भगवान् को वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने तीन सौ राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण कर कठोर तप एवं ध्यान आरम्भ किया।
ध्यानस्थ अवस्था में पूर्वजन्म का वैरी शम्बर देव उन पर भयंकर उपसर्ग करने लगा, किन्तु भगवान् पूर्ण समता में स्थित रहे। धरणेन्द्र और पद्मावती ने उनकी सेवा एवं रक्षा की। भगवान् के अटूट ध्यान और क्षमा के प्रभाव से मोहनीय कर्म का क्षय हुआ तथा चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। शम्बर देव भी अन्ततः सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुआ और अनेक तपस्वियों ने मिथ्यात्व त्यागकर संयम धारण किया।
भगवान् पार्श्वनाथ ने विशाल धर्मसंघ की स्थापना कर लगभग सत्तर वर्षों तक धर्मोपदेश दिया और असंख्य जीवों का कल्याण किया। अंत में सम्मेद शिखर पर शुक्लध्यान के माध्यम से समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। आचार्य गुणभद्र उनके अद्वितीय धैर्य, क्षमा, समता और करुणा की प्रशंसा करते हुए बताते हैं कि कमठ जैसे घोर वैरी का भी अंततः कल्याण हो गया। इस प्रकार यह पर्व भगवान् पार्श्वनाथ के चरित्र, उनके पूर्वभवों, तीर्थंकरत्व की साधना और मोक्ष-महिमा का प्रेरणादायी वर्णन प्रस्तुत करता है।
पर्व 73 हिन्दी-भाषानुवाद
श्लोक 1 से 11 मरुभूति और कमठ का प्रारम्भिक वैर
आचार्य भगवान् पार्श्वनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए उनकी धर्मध्वनि और धर्मकथा की प्रशंसा करते हैं। दक्षिण भरत क्षेत्र के पोदनपुर नगर में राजा अरविन्द राज्य करते थे। वहीं विश्वभूति ब्राह्मण और उनकी पत्नी अनुन्धरी के दो पुत्र कमठ और मरुभूति थे। दोनों राजा के मन्त्री बने, परन्तु स्वभाव से एक-दूसरे के विपरीत थे। दुराचारी कमठ ने अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण सदाचारी मरुभूति की हत्या कर दी, जिससे दोनों जीवों के बीच जन्म-जन्मान्तर का वैर प्रारम्भ हुआ।
श्लोक 12 से 24 वज्रघोष हाथी का धर्मग्रहण और मृत्यु
मरुभूति का जीव वज्रघोष नामक हाथी और कमठ की पत्नी वरुणा हथिनी बनी। एक अवसर पर विरक्त होकर मुनि बने राजा अरविन्द उस वन में पहुँचे। वज्रघोष हाथी उन्हें मारने के लिए बढ़ा, किन्तु पूर्वजन्म के संबंध का स्मरण होते ही शांत हो गया और उनसे श्रावक धर्म ग्रहण कर लिया। वह तपस्वी जीवन व्यतीत करने लगा। अंततः कीचड़ में फँस जाने पर पूर्वजन्म का वैरी कमठ, जो कुक्कुट सर्प बना था, उसे डँसकर मार देता है। वज्रघोष का जीव सहस्त्रार स्वर्ग में देव बनकर जन्म लेता है।
श्लोक 25 से 32 रश्मिवेग मुनि और अजगर का उपसर्ग
स्वर्ग से च्युत होकर मरुभूति का जीव रश्मिवेग नामक राजकुमार बना। वैराग्य प्राप्त कर उसने दीक्षा धारण की और कठोर तप किया। एक दिन हिमगिरि की गुफा में ध्यानस्थ अवस्था में पूर्वजन्म का वही शत्रु, जो नरक से निकलकर अजगर बना था, उसे निगल गया। परिणामस्वरूप रश्मिवेग का जीव अच्युत स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से पुनः वज्रनाभि नामक राजकुमार के रूप में जन्मा।
श्लोक 33 से 43 वज्रनाभि का संयम और भील द्वारा उपसर्ग
वज्रनाभि ने चक्रवर्ती वैभव का उपभोग करने के बाद वैराग्य ग्रहण किया और क्षेमंकर मुनि से दीक्षा लेकर संयम धारण किया। दूसरी ओर कमठ का जीव नरक में दुःख भोगकर कुरंग नामक भील बना। एक दिन उसने तप में लीन वज्रनाभि मुनि पर अनेक भयंकर उपसर्ग किए। मुनि ने धर्मध्यानपूर्वक उन्हें सहन किया और देह त्यागकर सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव बने। बाद में वे अयोध्या में आनन्द नामक राजकुमार के रूप में जन्मे।
श्लोक 44 से 53 आनन्द का संशय और प्रतिमा-पूजा का महत्व
राजा आनन्द ने विपुलमति मुनि से धर्मश्रवण किया और पूछा कि अचेतन जिनप्रतिमा पूजा का फल कैसे दे सकती है। मुनि ने समझाया कि प्रतिमा स्वयं फल देने वाली नहीं है, किन्तु उसके दर्शन और पूजा से उत्पन्न होने वाले शुभ परिणाम पुण्यबन्ध का कारण बनते हैं। जिनेन्द्र की वीतराग प्रतिमा भव्य जीवों में श्रद्धा, भक्ति और शुभभाव उत्पन्न करती है, इसलिए वह पुण्य की प्रेरक बनती है।
श्लोक 54 से 66 सूर्य-विमान पूजा और सूर्योपासना की परम्परा
मुनि ने सूर्य-विमान स्थित जिनमन्दिर की अद्भुत विभूति का वर्णन किया। उसे सुनकर राजा आनन्द अत्यन्त श्रद्धावान् हो गया। उसने सूर्य-विमान का प्रतिरूप बनवाकर उसमें जिनमन्दिर स्थापित किया और विधिपूर्वक आष्टाह्निक तथा विविध पूजाएँ सम्पन्न कीं। उसके प्रभाव से प्रजा भी सूर्य-मण्डल स्थित जिनप्रतिमाओं की स्तुति करने लगी। बाद में सफेद बाल देखकर राजा को वैराग्य हुआ और उसने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन किया तथा तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया।
श्लोक 67 से 79 आनन्द मुनि की आराधना और देवगति
पूर्वजन्म का वैरी कमठ नरक से निकलकर सिंह बना और उसने ध्यानस्थ आनन्द मुनि का कण्ठ पकड़ लिया। मुनि ने समभावपूर्वक उपसर्ग सहन किया और चारों आराधनाओं की सिद्धि के साथ देह त्याग दिया। वे अच्युत स्वर्ग के प्राणत विमान में इन्द्र बने। वहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया और आयु पूर्ण होने पर आगामी भव में तीर्थंकर बनने के लिए अवतरण का समय निकट आया।
श्लोक 80 से 92 पार्श्वनाथ के गर्भकल्याणक की पूर्वपीठिका
भरत क्षेत्र के काशी देश में राजा विश्वसेन और रानी ब्राह्मी के यहाँ तीर्थंकर जीव का गर्भावतरण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न और मुख में प्रवेश करता हुआ हाथी देखा। राजा विश्वसेन ने उनके फल बताते हुए कहा कि यह पुत्र असाधारण महापुरुष और लोकनायक होगा। देवों ने माता-पिता का कल्याणाभिषेक किया। समय आने पर पौष कृष्ण एकादशी को भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर जन्मकल्याणक सम्पन्न कर उनका नाम “पार्श्वनाथ” रखा।
श्लोक 93 से 105 युवराज पार्श्वनाथ और मिथ्यातप का खण्डन
यौवन प्राप्त करने पर भगवान् पार्श्वनाथ एक दिन विहार करते हुए एक आश्रम पहुँचे, जहाँ उनके नाना महीपाल पंचाग्नि तप कर रहे थे। भगवान् ने एक लकड़ी में जीव होने की सूचना देकर उसे न काटने का उपदेश दिया, परन्तु तपस्वी ने अहंकारवश लकड़ी काट दी। उसमें निवास करने वाले सर्प और सर्पिणी घायल होकर मरने लगे। यह देखकर देवकुमार ने उस तपस्वी को समझाया कि अहिंसा-विहीन तप वास्तविक तप नहीं है और ऐसा अज्ञानपूर्ण तप इस लोक तथा परलोक दोनों में दुःख का कारण बनता है। किन्तु अहंकारी तपस्वी इस उपदेश से और अधिक क्रोधित हो गया।
श्लोक 106 से 114 मिथ्यातप का खण्डन और सुभौमकुमार का उपदेश
तपस्वी ने अपने कठोर शरीर-पीड़क तप का गर्वपूर्वक वर्णन करते हुए उसे सर्वोच्च साधना बताया। इसके उत्तर में सुभौमकुमार ने स्पष्ट किया कि आप्त पुरुषों और आगम के विपरीत चलकर, हिंसा तथा कषायों में प्रवृत्त होकर किया गया तप मोक्ष का साधन नहीं बन सकता। ऐसा मिथ्यातप धान के छिलकों को कूटकर चावल प्राप्त करने या जल को मथकर घी निकालने के समान निष्फल है। उन्होंने कहा कि ज्ञानविहीन कायक्लेश भविष्य के दुःखों का कारण बनता है और सच्चा तप सम्यग्दर्शन एवं अहिंसा से युक्त होना चाहिए।
श्लोक 115 से 124 कमठ का देवगति में जन्म और पार्श्वनाथ का वैराग्य
सुभौमकुमार के उपदेश को तपस्वी ने समझ तो लिया, किन्तु पूर्वजन्म के वैर और अपने मत के मोह के कारण उसे स्वीकार नहीं किया। क्रोधपूर्वक जीवन समाप्त कर वह शम्बर नामक ज्योतिषी देव बना, जबकि सर्प और सर्पिणी शांत भाव से मृत्यु पाकर धरणेन्द्र और पद्मावती बने। उधर तीस वर्ष की आयु में भगवान् पार्श्वनाथ के पास अयोध्या के राजा जयसेन का दूत आया। दूत द्वारा भगवान् ऋषभदेव की महिमा और अयोध्या की विभूति सुनकर पार्श्वनाथ के मन में वैराग्य जागा और उन्होंने अपने पूर्वभवों का साक्षात्कार कर लिया।
श्लोक 125 से 133 दीक्षा-कल्याणक और प्रथम आहार
ज्ञानावरण कर्म के विशेष क्षयोपशम से भगवान् को आत्मबोध हुआ और लौकान्तिक देवों ने उन्हें दीक्षा के लिए प्रेरित किया। इन्द्रादि देवों ने दीक्षा-कल्याणक का महोत्सव सम्पन्न किया। भगवान् पार्श्वनाथ ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन अश्ववन में तीन सौ राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के पश्चात् उन्होंने सामायिक चारित्र और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। पारणा के दिन गुल्मखेट नगर में राजा धन्य ने उन्हें अष्टमंगल द्रव्यों सहित शुद्ध आहार अर्पित कर महान पुण्य अर्जित किया।
श्लोक 134 से 141 शम्बर का उपसर्ग और भगवान् की अचल साधना
चार माह की छद्मस्थ अवस्था के बाद भगवान् उसी वन में देवदारु वृक्ष के नीचे सात दिन के गहन ध्यान में स्थित हुए। उसी समय शम्बर देव ने पूर्वभव का वैर स्मरण कर उन पर भयंकर उपसर्ग आरम्भ किया। उसने प्रचण्ड वर्षा, गर्जना तथा पर्वतों के प्रहार जैसे अनेक कष्ट पहुँचाए। भगवान् पूर्ण समता और अचलता के साथ ध्यानस्थ रहे। यह उनकी असाधारण क्षमाशीलता और आत्मबल का परिचायक था।
श्लोक 142 से 152 धरणेन्द्र-पद्मावती की सेवा और केवलज्ञान की प्राप्ति
भगवान् पर हो रहे उपसर्ग को जानकर धरणेन्द्र और पद्मावती प्रकट हुए। धरणेन्द्र ने अपने फणों का विशाल मंडप बनाकर भगवान् की रक्षा की तथा पद्मावती ने उनके ऊपर दिव्य छत्र धारण किया। भगवान् के ध्यान के प्रभाव से मोहनीय कर्म का क्षय हो गया और शम्बर का उपसर्ग स्वतः समाप्त हो गया। चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को भगवान् पार्श्वनाथ ने शेष घातिया कर्मों का विनाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में दस गणधर, सोलह हजार मुनि तथा अनेक ज्ञान-ऋद्धि सम्पन्न साधु उपस्थित हुए।
श्लोक 153 से 161 धर्मतीर्थ की स्थापना और निर्वाण
भगवान् पार्श्वनाथ के तीर्थ में छत्तीस हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ तथा असंख्य देव-देवियाँ सम्मिलित थे। उन्होंने लगभग सत्तर वर्ष तक धर्म का उपदेश देकर असंख्य जीवों का कल्याण किया। आयु के अंतिम चरण में वे छत्तीस मुनियों सहित सम्मेद शिखर पर स्थित हुए। श्रावण शुक्ल सप्तमी को शुक्लध्यान के माध्यम से समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके निर्वाण कल्याणक का उत्सव मनाया। आचार्य उनकी क्षमाशीलता, गम्भीरता और शम्बर जैसे वैरी को भी कल्याणमार्ग पर लाने वाली करुणा की विशेष प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 162 से 170 पार्श्वनाथ की महिमा और पूर्वभवों का सार
आचार्य भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति करते हुए कहते हैं कि उनकी शान्ति, धैर्य और क्षमा समुद्र तथा सुमेरु से भी श्रेष्ठ हैं। कमठ के वैर के कारण ही उनके अद्भुत गुण संसार में अधिक प्रसिद्ध हुए। शम्बर देव भी अन्ततः उनके उपदेश से मिथ्यात्व छोड़कर सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सका। इसके पश्चात् पार्श्वनाथ के जीव के पूर्वभवों की श्रृंखला बताई गई—मरुभूति मन्त्री से लेकर देव, विद्याधर, चक्रवर्ती, अहमिन्द्र, आनन्द राजा और इन्द्र होकर अंततः वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ बने। इसी प्रकार कमठ का जीव अनेक दुःखद योनियों और नरकों में भटकता हुआ अंततः शम्बर देव बना। इस प्रकार पार्श्वनाथ चरित्र का वर्णन पूर्ण होता है और आचार्य गुणभद्र उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हैं।
पर्व 74
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