नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 124 to 141
श्लोक ( Shlok ) 124 – 126
महाशिलाभिस्तैः सर्वैर्विधेयं “वधमात्मनः । विदित्वा कोपसन्तप्तो विद्युदंष्ट्रादिविद्विषः ॥ १२४ ॥ गाढं पाशेन बध्वाधो मुखान् प्रक्षिप्य तत्र सः । कृत्वा शिलापिधानञ्च प्रहित्य नगरं प्रति ॥ १२५ ॥ ज्योतिष्प्रर्भ कनीयांसं तेष्वाक्रम्य शिलां स्थितः । पापिनो हि स्वपापेन प्राप्नुवन्ति पराभवम् ॥ १२६ ॥
जब उसे यह मालूम हुआ कि ये सब बड़ी-बड़ी शिलाओं के द्वारा मुझे मारना चाहते थे तब वह क्रोधसे संतप्त हो उठा, उसने उसी समय विद्युदंष्ट्र आदि शत्रुओंको नागपाशसे मजबूतीके साथ बांधकर तथा नीचेकी ओर मुख कर उसी बावड़ीमें लटका दिया और ऊपरसे एक शिला ढक दी। उन सब भाइयोंमें ज्योतिप्रभ सबसे छोटा था सो प्रद्युम्नने उसे समाचार देनेके लिए नगरकी ओर भेज दिया और स्वयं वह उसी शिलापर बैठ गया सो ठीक ही है क्योंकि पापी मनुष्य अपने पापसे पराभवको प्राप्त करते ही हैं ।। १२४-१२६ ।।
When he realized that they all intended to kill him using massive boulders, he flared up with intense anger. At that very moment, he tightly bound his enemies—Vidyuddanshtra and the others—with the Nagapasha (serpent-noose), hung them upside down into that same stepped-well, and covered the top with a heavy boulder.
Among all those brothers, Jyotiprabha was the youngest; so, Pradyumna sent him back to the city to deliver the news, while he himself sat down upon that very boulder. This was only fitting, for sinful men are inevitably brought to ruin by their own misdeeds.[ 124-126]
श्लोक ( Shlok ) 127
अथात्र नारदं कामचारिणं ‘नभसस्तलात् । आगच्छन्तं निजस्थानं हरिसूनुरलोकत ॥ १२७ ॥
अथानन्तर – प्रद्युम्नने देखा कि इच्छानुसार चलनेवाले नारदजी आकाश-स्थलसे अपनी ओर आ रहे हैं ।। १२७ ।।
Thereafter, Pradyumna saw Narada, who moves freely at his own will, descending toward him from the sky.[ 127]
श्लोक ( Shlok ) 128 – 136
यथाविधि प्रतीक्ष्यैनमभ्युत्थानपुरस्सरम् । कृतसम्भाषणस्तेन प्रणीतात्मप्रपञ्चकः ॥ १२८ ॥सम्यक्श्रद्धाय तत्सर्व प्रहृष्टोऽरिबलागमम् । ‘दृष्ट्वाऽऽस्त विस्मितस्तावद्धलं तं खेचरेशितुः ॥ १२९ ॥सहसावेष्टतेवार्क प्रावृडम्भोदजालकम् । कालशम्बर मुख्यं तत्स युद्ध्वा भङ्गमापयत् ॥ १३० ॥तं सूनुकृतवृत्तान्तं बोधयित्वा खगाधिपम् । अपनीय शिलां नागपाशं चैतान्व्यपाशयत् ॥ १३१ ॥नारदागमहेतुञ्च ज्ञापयित्वा सविस्तरम् । आपृच्छयानुमतस्तेन रथं वृषभनामकम् ॥ १३२ ॥नारदेन समारुह्य प्रायात् द्वारावतीं प्रति । स्वपूर्वभवसम्बन्धं शृण्वंस्तेन निरूपितम् ॥ १३३ ॥हास्तिनाख्यपुरं प्राप्य दुर्योधनमहीभृतः । जलधेश्च सुतां कन्यां मान्यामुदधिसञ्ज्ञया ॥ १३४ ॥दातुं भानुकुमाराय महाभिषवणोत्सवम् । विधीयमानं वीक्ष्यासौ रथे प्रस्तरविद्यया ॥ १३५ ॥नारदं शिलयाच्छाद्य तस्मादुत्तीर्य भूतलम् । बहुप्रकारं हासानां तत्र कृत्वा ततो गतः ॥ १३६ ॥
वह उन्हें आता देख उठकर खड़ा हो गया उसने विधिपूर्वक उनकी पूजा की, उनके साथ बातचीत की तथा नारदने उसका सब वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर प्रद्युम्न बहुत संतुष्ट हुआ और उसपर विश्वास कर वहीं बैठ गया। शत्रुकी सेनाका आगमन देखकर वह आश्चर्य में पड़ गया । थोड़े ही देर बाद, जिस प्रकार वर्षा ऋतुमें बादलोंका समूह सूर्यको घेर लेता है उसी प्रकार अकस्मात् विद्याधर राजाकी सेनाने प्रद्युम्नको घेर लिया परन्तु प्रद्युम्ननेयुद्ध कर उन कालसंवर आदि समस्त विद्याधरोंको पराजित कर दिया। तदनन्तर- उसने राजा कालसंवरके लिए उनके पुत्रोंका समस्त वृत्तान्त सुनाया, शिला हटाकर नागपाश दूर किया और सबको बन्धन रहित किया, इसी तरह नारदके आनेका कारण भी विस्तारके साथ कहा। तत्पश्चात् वह राजा कालसंबर की अनुमति लेकर वृषभ नामक रथपर सवार हो नारदके प्रति रवाना हुआ। बीचमें नारदजीके द्वारा कहे हुए अपने पूर्वभवोंका सम्बन्ध सुनता हुआ वह हस्तिनापुर जा पहुंचा। वहां के राजा दुर्योधनकी जलधि नामकी रानीसे उत्पन्न हुई एक उदधिकुमारी नामकी उत्तम कन्या थी। भानुकुमारको देनेके लिए उसका महाभिषेक रूप उत्सव हो रहा था। उसे देख प्रद्युम्नने प्रस्तर विद्यासे उत्पन्न एक शिलाके द्वारा नारदजीको तो रथपर ही ढक दिया और आप स्वयं रथसे उतर कर पृथिवी तलपरं आ गया और उन लोगोंकी बहुत प्रकारकी हँसी कर वहाँ से आगे बढ़ा ।। १२८-१३६ ।।
Seeing him approach, Pradyumna stood up, worshiped him according to the prescribed rituals, and conversed with him; whereupon Narada narrated his entire life story to him. Hearing this, Pradyumna was deeply satisfied, and placing his trust in Narada, he sat down there.
However, seeing the arrival of an enemy army, he was struck with astonishment. Shortly after, just as a mass of clouds engulfs the sun during the rainy season, the army of the Vidyadhara king suddenly surrounded Pradyumna. Yet, Pradyumna engaged them in battle and defeated all those Vidyadharas, including Kalasamvara.
Thereafter, he related the entire account of the sons to King Kalasamvara, removed the boulder, undid the Nagapasha (serpent-noose), and freed everyone from bondage. He also explained in detail the reason behind Narada’s arrival. Afterward, with the permission of King Kalasamvara, he boarded a chariot named Vrishabha and set off with Narada.
While listening to the account of his past lifetimes narrated by Narada along the way, he arrived at Hastinapur. The king of that city, Duryodhana, had an excellent daughter named Udadhikumari, born to his queen Jaladhi. A grand coronation festival (Mahabhisheka) was being celebrated to give her hand in marriage to Bhanukumar.
Seeing this, Pradyumna used a boulder manifested through his Prastara lore to conceal Narada safely within the chariot itself. He then descended from the chariot to the ground and, after mocking those people in various ways, proceeded forward from there.[128-136]
श्लोक ( Shlok ) 137 – 138
मधुराया बहिर्भागे पाण्डवान् स्वप्रियां सुताम् । प्रदित्सून् गच्छतो भानुकुमाराय निवीक्ष्य सः ॥१३७।समारोपितकोदण्डहस्तो व्याधाकृतिं दधत् । तेषां कदर्शनं कृत्वा नाना द्वारवतीमितः ॥ १३८ ॥
चलते-चलते वह मथुरा नगरके बाहर पहुँचा, वहाँपर पाण्डव लोग अपनी प्यारी पुत्री भानुकुमारको देनेके लिए जा रहे थे उन्हें देख, उसने धनुष हाथमें लेकर एक भीलका रूप धारण कर लिया और उन सबका नाना प्रकारका तिरस्कार किया। तदनन्तर वहाँ से चलकर द्वारिका पहुँचा ।। १३७-१३८ ।।
Walking along, he arrived outside the city of Mathura. There, he saw the Pandavas on their way to give away their beloved daughter to Bhanukumar. Upon seeing them, he took a bow in his hand, assumed the form of a Bhila (tribal hunter), and subjected them all to various kinds of mockery and humiliation. Thereafter, proceeding from there, he arrived at Dwarika.[137-138]
श्लोक ( Shlok ) 139 – 141
विधाय विद्यया प्राग्वन्नारदं स्यन्दनस्थितम् । एकाकी स्वयमागत्य विद्याशाखामृगाकृतिः ॥ १३९ ॥बमञ्ज सत्यभामाया नन्दनं वा वनं वनम् । तत्यानवापीनिःशेषजलपूर्णकमण्डलुः ॥ १४० ॥ततो गत्वान्तरं किञ्चित्स्यन्दनोरघरासभान् । विपर्यासं समायोज्य मायारूपधरः स्मरः ॥ १४१ ॥
वहाँ उसने नारदजीको तो पहलेके ही समान विद्याके द्वारा रथपर अवस्थित रक्खा और स्वयं अकेला ही नीचे आया । वहाँ आकर उसने विद्याके द्वारा एक वानरका रूप बनाया और नन्दन वनके समान सत्यभामाका जो वन था उसे तोड़ डाला, वहाँकी बावड़ीका समस्त पानी अपने कमण्डलुमें भर लिया। फिर कुछ दूर जाकर उसने अपने रथमें उल्टे मेढे तथा गधे जोते और स्वयं मायामयी रूप धारण कर लिया ॥ १३९-१४१ ॥
There, using his magical lore (vidya), he kept Narada stationed inside the chariot just as before, while he himself descended alone.
Arriving there, he assumed the form of a monkey through his magical lore and completely destroyed Satyabhama’s grove, which was like the celestial Nandana-vana itself. He then emptied and filled all the water from the stepped-well (baori) there into his kamandalu (ascetic’s water-pot). Moving a short distance away, he yoked rams and donkeys backwards to his chariot, while he himself assumed an illusory form.[ 139-141]
श्लोक 142 से 153
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123
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