Summary of Uttar Puran Parv 59 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 59 (श्लोक 1–319) का संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में मुख्यतः बलभद्र, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, जयन्त, विद्युदंष्ट्र, मेरु और मन्दर आदि जीवों के अनेक जन्मों तथा उनके कर्मफल का वर्णन किया गया है। कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि मोह, निदान, क्रोध, लोभ और वैर जीव को दुःख एवं दुर्गति में डालते हैं, जबकि समता, संयम, तप और धर्म अंततः मोक्ष का कारण बनते हैं।
बलभद्र ने सामायिक संयम धारण कर कठोर तप किया और सूर्य के समान तेजस्वी एवं निर्मल होकर मोक्ष को प्राप्त हुए। दूसरी ओर स्वयंभू और मधु मोह तथा पापकर्मों के कारण दुर्गतियों को प्राप्त हुए। सुकेतु जैसे तपस्वी भी निदान-बन्ध के कारण कुगति में गये, इसलिए निदान को अत्यन्त त्याज्य बताया गया है।
विमलवाहन तीर्थंकर के तीर्थ में मेरु और मन्दर नामक दो महान् गणधर हुए। उनके पूर्वभवों का वर्णन करते हुए संजयन्त और जयन्त नामक राजकुमारों की कथा कही गई है। दोनों भाइयों ने तीर्थंकर के उपदेश से वैराग्य ग्रहण किया और संयम धारण किया। संजयन्त मुनि ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया, जबकि जयन्त ने धरणेन्द्र पद का निदान कर लिया और उसी फलस्वरूप धरणेन्द्र बना।
पूर्वजन्म के वैर से प्रेरित विद्युदंष्ट्र नामक विद्याधर ने संजयन्त मुनि पर भयंकर उपसर्ग किया। उसने उन्हें नदी में फेंक दिया तथा अन्य विद्याधरों को भ्रमित कर उन पर आक्रमण करवाया। संजयन्त मुनि ने समता और शुक्लध्यान से सब उपसर्ग सहन कर मोक्ष प्राप्त किया। धरणेन्द्र क्रोधित होकर विद्युदंष्ट्र को दण्ड देना चाहता था, पर आदित्याभ देव ने संसार की परिवर्तनशीलता और कर्मफल का उपदेश देकर उसका वैर शांत कराया।
इसके बाद अनेक पूर्वभवों की विस्तृत श्रृंखला वर्णित है। सत्यघोष नामक मंत्री ने लोभवश भद्रमित्र सेठ के रत्न हड़प लिये, जिसके कारण उसे अपमान, दण्ड और दुर्गति प्राप्त हुई। भद्रमित्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर राजा ने उसे सम्मान दिया। सत्यघोष अनेक भवों में सर्प, नरकी, अजगर और व्याध आदि बना तथा अपने वैरभाव के कारण बार-बार पापकर्म करता रहा।
भद्रमित्र, सिंहसेन, रामदत्ता, पूर्णचन्द्र, सिंहचन्द्र, रश्मिवेग, वज्रायुध और रत्नमाला आदि जीव अनेक जन्मों में परस्पर माता, पुत्र, भाई, पति-पत्नी और मित्र के रूप में जन्म लेते रहे। कहीं उन्होंने धर्म अपनाया, कहीं मोह और निदान में फँसे, तो कहीं कठोर तप एवं संयम द्वारा उच्च देवगति अथवा मोक्ष प्राप्त किया। कथा में बार-बार यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं है; कर्मानुसार जीव निरन्तर विभिन्न सम्बन्धों और योनियों में भ्रमण करता रहता है।
वज्रायुध मुनि, रश्मिवेग मुनि और अन्य तपस्वियों ने भयंकर उपसर्ग सहकर भी धर्म नहीं छोड़ा और अंततः उच्च देवगति या मोक्ष को प्राप्त हुए। वहीं काम, लोभ और धर्मभ्रष्टता के कारण विचित्रमति, अतिदारुण तथा विद्युदंष्ट्र जैसे जीव दुर्गतियों में गये। चोरी, कपट, क्रोध और हिंसा के दोषों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है।
अंत में आदित्याभ देव ने धरणेन्द्र को समझाया कि संसार में कोई स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता; सब कर्मवश परिवर्तित होता रहता है। इस उपदेश से धरणेन्द्र का वैर शांत हुआ। बाद में वही आदित्याभ और धरणेन्द्र क्रमशः मेरु और मन्दर नामक गणधर बने तथा विमलनाथ भगवान् के शिष्य होकर मोक्षमार्ग के अग्रणी साधु बने।
पर्व के उपसंहार में कहा गया है कि इन सभी जीवों ने अपने-अपने कर्मों के अनुसार अनन्त सुख-दुःख भोगे, परन्तु अंततः समता, संयम और शुद्ध ध्यान के प्रभाव से पापरहित होकर परमपद को प्राप्त हुए। संजयन्त मुनि की समता, शुक्लध्यान और उपसर्ग-सहन की महिमा तथा मेरु-मन्दर गणधरों की वीतरागता की विशेष प्रशंसा की गई है।
श्लोक 1 से 13 : पद्मसेन राजा का वैराग्य और देवगति
इस श्लोक समूह में भगवान् विमलनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए पश्चिम धातकीखण्ड के रम्यकावती देश के राजा पद्मसेन का चरित्र बताया गया है। राजा पद्मसेन न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल थे। उनकी प्रजा धर्म, अर्थ और काम के संतुलित पालन में स्थित थी। एक दिन प्रीतिंकर वन में स्वर्गगुप्त केवली से धर्म का स्वरूप सुनकर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके केवल दो भव शेष हैं। इससे उनमें वैराग्य जागृत हुआ और उन्होंने राज्य पुत्र पद्मनाभ को देकर तपश्चर्या आरम्भ कर दी। ग्यारह अंगों का अध्ययन, सोलह कारण भावनाओं का अभ्यास तथा चार आराधनाओं की सिद्धि द्वारा उन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अंत में वे सहस्त्रार स्वर्ग में इन्द्र हुए और वहाँ दिव्य सुखों का दीर्घकाल तक उपभोग किया।
श्लोक 14 से 21 : गर्भकल्याणक और भगवान् का जन्म
सहस्त्रार स्वर्ग से च्युत होकर वही जीव भरत क्षेत्र के काम्पिल्य नगर में राजा कृतवर्मा और रानी जयश्यामा के यहाँ गर्भ में आया। देवों ने रानी की पूजा की और रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। रानी के गर्भ की वृद्धि से समस्त नगर में हर्ष फैल गया। माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में रानी ने तीन ज्ञानों के धारक, तीन लोकों के स्वामी भगवान् विमलवाहन को जन्म दिया।
श्लोक 22 से 31 : विमलवाहन भगवान् का ऐश्वर्य और राज्यकाल
जन्माभिषेक के पश्चात् देवों ने उनका नाम विमलवाहन रखा। भगवान् वासुपूज्य के तीर्थ के पश्चात धर्म का विच्छेद हो जाने पर विमलवाहन भगवान् का अवतार हुआ। उनकी आयु साठ लाख वर्ष, शरीर साठ धनुष ऊँचा तथा कान्ति सुवर्ण के समान थी। वे समस्त पुण्यों की मूर्ति प्रतीत होते थे। राज्याभिषेक के पश्चात उन्होंने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य किया। लक्ष्मी, कीर्ति और सरस्वती मानो उनकी सहचरिणी थीं। उनके सत्य और सद्गुण मुनियों द्वारा भी प्रशंसनीय थे। वे केवलज्ञान प्राप्त कर देवाधिदेव कहलाए और उनका निर्मल यश समस्त दिशाओं में फैल गया।
श्लोक 32 से 41 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
एक दिन हेमन्त ऋतु में हिम की क्षणभंगुर शोभा देखकर भगवान् को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति हुई और वे संसार से विरक्त हो गए। उन्होंने विचार किया कि सीमित ज्ञान और अपूर्ण चारित्र से मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। मोह, परिग्रह और प्रमाद की सत्ता को पहचानकर उन्होंने वैराग्य धारण किया। लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की और देवों ने दीक्षाकल्याणक का उत्सव मनाया। भगवान् देवदत्ता पालकी में सवार होकर सहेतुक वन पहुँचे और माघ शुक्ल चतुर्थी को एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हुए। उसी दिन उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 42 से 54 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के दूसरे दिन नन्दनपुर में राजा कनकप्रभु ने उन्हें आहारदान दिया। भगवान् ने तीन वर्ष तक कठोर तप किया। माघ शुक्ल षष्ठी को जामुन वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने आठ प्रातिहार्यों सहित उनकी पूजा की। भगवान् मन्दर आदि पचपन गणधरों, हजारों मुनियों, आर्यिकाओं, श्रावकों और श्राविकाओं से घिरे रहते थे। वे धर्मक्षेत्रों में विहार कर संसार-दग्ध जीवों को शांति प्रदान करते रहे। अंततः वे सम्मेदशिखर पर विराजमान हुए।
श्लोक 55 से 61 : मोक्ष और विमलनाथ नाम की सार्थकता
भगवान् ने आठ हजार छह सौ मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया और आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को शुक्लध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया। उसी दिन से कालाष्टमी का महत्त्व प्रसिद्ध हुआ। देवों ने उनका अन्त्येष्टि संस्कार कर स्तुति की। भगवान् ने शिक्षा दी कि जीव पाप-पुण्य दोनों से मल संचय करता है, इसलिए शुद्धोपयोग द्वारा आत्मा को निर्मल बनाना चाहिए। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, चार आराधनाएँ और धर्मरूपी हाथी द्वारा उन्होंने पापरूपी शत्रु का नाश किया, इसलिए वे विमलवाहन कहलाए। पूर्वभव में पद्मसेन राजा, फिर सहस्त्रार स्वर्ग के इन्द्र और अंततः तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ बने।
श्लोक 62 से 71 : धर्म बलभद्र का पूर्वभव और जन्म
यहाँ धर्म नामक बलभद्र के पूर्वभव का वर्णन है। पश्चिम विदेह क्षेत्र के मित्रनन्दी राजा प्रजावत्सल और धर्मनिष्ठ थे। वे प्रजा की भलाई में ही अपना सुख मानते थे। एक दिन सुव्रत जिनेन्द्र के उपदेश से उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने संयम धारण कर लिया। अंत में वे अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुए। वहाँ से च्युत होकर द्वारावती नगरी में राजा भद्र और रानी सुभद्रा के यहाँ धर्म नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 72 से 81 : सुकेतु राजा और जुए के दोष
कुणाल देश के श्रावस्ती नगर में सुकेतु नामक राजा रहता था जो जुए और भोगों में आसक्त था। मंत्रियों और बन्धुओं के समझाने पर भी उसने जुआ नहीं छोड़ा और अंततः राज्य, धन, बल तथा रानी सब हार गया। शास्त्रों में जुए को अत्यन्त निकृष्ट व्यसन बताया गया है, क्योंकि इससे सत्य, लज्जा, कुल, सुख, धर्म, यश और परिवार सब नष्ट हो जाते हैं। जुआरी न स्नान करता है, न भोजन, न निद्रा; वह रोगी और अपमानित हो जाता है। सुकेतु इसका जीवंत उदाहरण बना। इसलिए जो दोनों लोकों का कल्याण चाहता है, उसे जुए का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 82 से 91 : स्वयंभू नारायण का पूर्वभव और मधु से वैर
सर्वस्व हारने के बाद सुकेतु सुदर्शनाचार्य के पास पहुँचा और वैराग्य लेकर दीक्षित हो गया। किन्तु उसका अंतःकरण निर्मल नहीं हुआ। उसने तप करते हुए निदान किया कि भविष्य में उसका बल और वैभव प्रकट हो। इस कारण वह लान्तव स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से च्युत होकर द्वारावती के राजा भद्र और रानी पृथिवी के यहाँ स्वयंभू नामक पुत्र हुआ। धर्म बलभद्र और स्वयंभू नारायण बने। पूर्व जन्म के वैर के कारण स्वयंभू राजा मधु से द्वेष रखता था। एक बार उसने मधु के लिए भेजी गई भेंट छीन ली और दूतों को मार डाला। आचार्य बताते हैं कि प्रेम और द्वेष दोनों के संस्कार स्थायी हो जाते हैं, इसलिए ज्ञानी पुरुष को किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए।
श्लोक 92 से 101 : मधु और स्वयंभू का युद्ध तथा धर्म का वैराग्य
जब मधु को दूतों के मारे जाने का समाचार मिला तो वह युद्ध के लिए चला। स्वयंभू और धर्म भी युद्ध के लिए तैयार थे। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। अंत में मधु ने क्रोध में चक्र फेंका, पर वह स्वयंभू के हाथ में आकर ठहर गया। तब स्वयंभू ने उसी चक्र से मधु का वध कर दिया और आधे भरतक्षेत्र का राज्य प्राप्त किया। मधु घोर पाप के कारण सातवें नरक में गया और स्वयंभू भी वैरभाव के कारण बाद में उसी नरक में गया। स्वयंभू के वियोग से धर्म बलभद्र अत्यन्त शोकाकुल हुए और संसार से विरक्त होकर भगवान् विमलनाथ के पास पहुँचे।
श्लोक 102 से 111 : धर्म बलभद्र का मोक्ष और मेरु-मन्दर गणधरों की भूमिका
धर्म बलभद्र ने सामायिक संयम धारण कर कठोर तप किया और संयमियों में श्रेष्ठ बन गए। वे सूर्य के समान तेजस्वी, निर्मल और अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाले थे। अंततः उन्होंने समस्त कर्ममल नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया। इसके विपरीत स्वयंभू और मधु वैर तथा जुए के कारण पाप संचय कर नरकगति को प्राप्त हुए। यहाँ निदान-बन्ध की भी निन्दा की गई है, क्योंकि तप करने पर भी यदि मन में वासना या अभिलाषा बनी रहे तो वह भवभ्रमण का कारण बनती है। इसके पश्चात् मेरु और मन्दर नामक दो गणधरों की कथा आरम्भ होती है। पश्चिम विदेह क्षेत्र के वीतशोक नगर में वैजयन्त राजा तथा रानी सर्वश्री के संजयन्त और जयन्त नामक दो पुत्र थे। स्वयंभू तीर्थंकर के उपदेश से दोनों भाई वैराग्य को प्राप्त हुए।
श्लोक 112 से 125 : संजयन्त मुनि पर उपसर्ग
संजयन्त और जयन्त ने राज्य त्यागकर संयम धारण किया। संजयन्त मुनि ने कषायों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया। जयन्त मुनि ने धरणेन्द्र का वैभव देखकर धरणेन्द्र बनने का निदान किया और अगले भव में धरणेन्द्र बना। एक दिन संजयन्त मुनि भीम वन में प्रतिमायोग धारण कर स्थित थे। तभी विद्युदंष्ट्र नामक विद्याधर पूर्वभव के वैर से प्रेरित होकर उन्हें उठा लाया और नदियों के संगमस्थल में डाल दिया। उसने अन्य विद्याधरों को भ्रमित कर यह कहकर भड़काया कि यह कोई भयंकर राक्षस है। भयभीत विद्याधरों ने समाधिस्थ संजयन्त मुनि पर शस्त्रों से प्रहार करना आरम्भ कर दिया।
श्लोक 126 से 131 : संजयन्त मुनि का मोक्ष और धरणेन्द्र का क्रोध
संजयन्त मुनि ने समस्त उपसर्गों को समभाव से सहन किया। वे पर्वत के समान अचल रहे और शुक्लध्यान के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त हुए। उनके निर्वाणकल्याणक के अवसर पर चारों निकायों के देव उपस्थित हुए। धरणेन्द्र ने अवधिज्ञान से जाना कि विद्याधरों ने उसके बड़े भाई पर उपसर्ग किया है, इसलिए उसने क्रोधित होकर सब विद्याधरों को नागपाश में बाँध लिया। विद्याधरों ने विनयपूर्वक निवेदन किया कि वे तो विद्युदंष्ट्र के छल में आ गए थे। तब धरणेन्द्र ने उन्हें छोड़ दिया और विद्युदंष्ट्र को दण्डित करने के लिए उद्यत हुआ।
श्लोक 132 से 141 : आदित्याभ देव का उपदेश और वैर की निरर्थकता
उसी समय आदित्याभ नामक देव वहाँ आया और उसने धरणेन्द्र को समझाया कि महापुरुषों को क्षुद्र जीवों पर क्रोध नहीं करना चाहिए। उसने कहा कि संसार में बन्धुता और अबन्धुता स्थायी नहीं होती। पूर्वजन्मों में संजयन्त ने भी विद्युदंष्ट्र के जीव को दण्ड दिया था, उसी वैरभाव के संस्कार से उसने यह उपसर्ग किया है। आदित्याभ ने यह भी बताया कि विद्युदंष्ट्र ने पूर्व के चार जन्मों में भी संजयन्त के जीव के साथ वैर किया था। इस प्रकार संसार में वैर का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
श्लोक 142 से 151 : भद्रमित्र और सत्यघोष की कथा का प्रारम्भ
आदित्याभ ने कहा कि इस जन्म में विद्युदंष्ट्र ने उपसर्ग देकर भी संजयन्त मुनि के मोक्ष का कारण बनकर उपकार ही किया है। फिर उसने पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की। भरतक्षेत्र के सिंहपुर नगर में सिंहसेन राजा और रामदत्ता रानी राज्य करते थे। उनके मंत्री श्रीभूति थे, जो स्वयं को सत्यघोष कहते थे। पद्मखण्डपुर के सेठ सुदत्त के पुत्र भद्रमित्र ने रत्नद्वीप से बहुत से रत्न अर्जित किए और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए सत्यघोष मंत्री को सौंप दिया। जब वह लौटकर आया और अपने रत्न माँगे, तब लोभवश मंत्री मुकर गया और कहने लगा कि वह कुछ नहीं जानता।
श्लोक 152 से 161 : भद्रमित्र का विलाप और सत्यघोष की कपटपूर्ण वृत्ति
भद्रमित्र नगर में विलाप करने लगा, जबकि सत्यघोष अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोगों को भ्रमित करता रहा कि भद्रमित्र का धन चोरों ने लूट लिया है। उसने न्यायालय में झूठी शपथ भी खाई। भद्रमित्र बार-बार मंत्री को स्मरण कराता रहा कि उसने उसे सत्यवादी और श्रेष्ठ मंत्री मानकर विश्वासपूर्वक रत्न सौंपे थे। उसने कहा कि मंत्री के पास सब प्रकार का वैभव होते हुए भी वह धर्म, यश और सत्य का नाश कर रहा है। भद्रमित्र ने न्यासापहार अर्थात् विश्वासघात के दोष को अत्यन्त निन्दनीय बताया।
श्लोक 162 से 171 रानी की बुद्धिमत्ता और रत्नों की पुनर्प्राप्ति
भद्रमित्र प्रतिदिन वृक्ष पर चढ़कर अपना दुःख प्रकट करता था। रानी रामदत्ता ने उसकी बातों से अनुमान किया कि वह पागल नहीं, बल्कि सत्य बोल रहा है। उसने चतुराई से मंत्री का यज्ञोपवीत और अंगूठी प्राप्त की तथा धाय को मंत्री के घर भेजकर उन्हीं की पहचान से रत्नों का पिटारा मँगवा लिया। राजा सिंहसेन ने उस पिटारे में कुछ और रत्न मिलाकर भद्रमित्र को बुलाया और पूछा कि क्या यह तुम्हारा पिटारा है। भद्रमित्र ने सत्यपूर्वक स्वीकार किया कि इसमें कुछ अतिरिक्त रत्न भी हैं। उसकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर राजा ने उसे राजश्रेष्ठी बना दिया।
श्लोक 172 से 181 : सत्यघोष का दण्ड और चोरी की निन्दा
भद्रमित्र ने केवल अपने रत्न ही ग्रहण किए। इससे राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और भद्रमित्र को ‘सत्यघोष’ उपनाम प्रदान किया। दूसरी ओर श्रीभूति मंत्री को दोषी सिद्ध कर दण्डित किया गया। उसका धन छीन लिया गया, उसे कठोर शारीरिक दण्ड दिए गए और अपमानित किया गया। इसके बाद चोरी के दोषों का विस्तार से वर्णन किया गया है। चोरी दो प्रकार की बताई गई है—एक स्वभावजन्य और दूसरी परिस्थितिजन्य। स्वभावजन्य चोर करोड़ों का धन होते हुए भी चोरी से तृप्त नहीं होता। चोरी जीव को दुर्गति और दुःख की ओर ले जाती है तथा उसकी कीर्ति और विश्वास दोनों नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 182 से 191 : दुराचार का फल और व्याघ्री का प्रसंग
चोरी करने वाला जीव अशुभ आयु बाँधता है और दीर्घकाल तक दुःख भोगता है। सत्यघोष मंत्री भी चोरी के कारण पदच्युत हुआ और दुर्गति को प्राप्त हुआ। उसके स्थान पर धर्मिल नामक ब्राह्मण मंत्री बनाया गया। समय बीतने पर भद्रमित्र ने मुनि वरधर्म से धर्मोपदेश सुनकर बहुत-सा दान दिया। उसकी माता सुमित्रा यह सहन न कर सकी और क्रोधवश मरकर व्याघ्री बनी। एक दिन उसी व्याघ्री ने अपने पूर्वजन्म के पुत्र भद्रमित्र को मार डाला। इससे बताया गया है कि क्रोध जीव को कितना अन्धा बना देता है।
श्लोक 192 से 201 : नवीन भव और वैराग्य की प्रेरणा
भद्रमित्र अगले जन्म में रानी रामदत्ता के सिंहचन्द्र नामक पुत्र हुए और पूर्णचन्द्र उनके छोटे भाई बने। उधर सत्यघोष मंत्री का जीव अगन्धन नामक सर्प हुआ। उसने क्रोधवश राजा सिंहसेन को डस लिया। बाद में वह सर्प अग्नि में जलकर मृग बना और सिंहसेन हाथी के रूप में जन्मा। सिंहचन्द्र राजा बना और पूर्णचन्द्र युवराज। जब रानी रामदत्ता ने आर्यिकाओं से अपने पति की मृत्यु का समाचार सुना, तब उसने संयम धारण कर लिया। इस घटना से सिंहचन्द्र के भीतर वैराग्य जागृत हुआ और उसने मुनि पूर्णचन्द्र से धर्मोपदेश सुना।
श्लोक 202 से 211 : सिंहचन्द्र का संयम और पूर्वभवों का रहस्य
सिंहचन्द्र ने राज्य छोटे भाई पूर्णचन्द्र को सौंपकर दीक्षा ग्रहण की और अप्रमत्त विरत गुणस्थान को प्राप्त हुआ। तप के प्रभाव से उसे मनःपर्ययज्ञान और आकाशगामिनी ऋद्धि प्राप्त हुई। एक दिन रानी रामदत्ता ने उनसे पूछा कि क्या पूर्णचन्द्र भी कभी धर्ममार्ग पर आएगा। तब सिंहचन्द्र मुनि ने पूर्वभवों की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि पूर्णचन्द्र पूर्वजन्म में वारुणी नामक कन्या थी और रामदत्ता स्वयं पूर्वभव में मधुरा थी। भद्रमित्र का जीव सिंहचन्द्र बना था। इस प्रकार उन्होंने अनेक जन्मों के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कर संसार की अनित्यता और कर्मबंधन का बोध कराया।
श्लोक 212 से 221 : हाथी का संयम, सर्प का वैर और श्रीधर देव
सिंहचन्द्र मुनि ने रामदत्ता को बताया कि पूर्वजन्म का राजा सिंहसेन हाथी बना था। सिंहचन्द्र ने उसे पूर्वभव का स्मरण कराकर देशव्रत धारण कराया। वह हाथी विरक्त होकर कठोर तप करता, उपवास करता और सूखे पत्तों से पारणा करता था। एक दिन नदी में जल पीते समय सत्यघोष के जीव, जो कुर्कुट सर्प बना था, ने उसे डस लिया। समाधिमरण के प्रभाव से वह हाथी सहस्त्रार स्वर्ग में श्रीधर देव हुआ। धर्मिल ब्राह्मण का जीव वानर बना था, उसने उस सर्प को मार डाला, जिससे वह तीसरे नरक में गया। हाथी के दाँत और मोती धनमित्र सेठ द्वारा राजा पूर्णचन्द्र को भेंट किए गए।
श्लोक 222 से 232 : रामदत्ता का बोध और नवीन भव
राजा पूर्णचन्द्र ने हाथी के दाँतों से पलंग बनवाया और मोतियों का हार धारण किया। सिंहचन्द्र मुनि के उपदेश से रामदत्ता को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उसने पूर्णचन्द्र को धर्ममार्ग का उपदेश दिया। पूर्णचन्द्र ने धर्म को स्वीकार कर दीर्घकाल तक राज्य किया। रामदत्ता पुत्रस्नेह के कारण निदान बाँधकर महाशुक्र स्वर्ग में भास्कर देव हुई और पूर्णचन्द्र वैडूर्य विमान में वैर्य देव बना। सिंहचन्द्र मुनि समाधिमरण कर प्रीतिंकर विमान में अहमिन्द्र हुए। आगे चलकर रामदत्ता का जीव श्रीधरा और पूर्णचन्द्र का जीव यशोधरा नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुए। सिंहसेन का जीव श्रीधर देव से रश्मिवेग नामक पुत्र बना। सूर्यावर्त राजा के वैराग्य लेने पर श्रीधरा और यशोधरा ने भी दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 233 से 242 : रश्मिवेग मुनि और अजगर का उपसर्ग
रश्मिवेग ने हरिचन्द्र मुनि से धर्मोपदेश सुनकर संयम ग्रहण किया और आकाशचारण ऋद्धि प्राप्त की। एक दिन काञ्चन गुफा में श्रीधरा और यशोधरा आर्यिकाएँ उन्हें नमस्कार कर बैठीं। उसी समय सत्यघोष का जीव, जो अनेक भवों के बाद अजगर बना था, क्रोधवश तीनों को निगल गया। दोनों आर्यिकाएँ समाधिमरण से देवगति को प्राप्त हुईं और रश्मिवेग भी स्वर्ग में देव हुए, जबकि अजगर चौथे नरक में गया। बाद में सिंहचन्द्र का जीव चक्रायुध और रश्मिवेग का जीव वज्रायुध नामक राजपुत्र बना। श्रीधरा का जीव रत्नमाला और यशोधरा का जीव रत्नायुध बना।
श्लोक 243 से 252 : चक्रायुध और वज्रायुध का वैराग्य
राजा अपराजित ने धर्मोपदेश सुनकर चक्रायुध को राज्य देकर दीक्षा ले ली। बाद में चक्रायुध ने भी वज्रायुध को राज्य सौंपकर संयम ग्रहण किया और उसी भव में मोक्ष प्राप्त किया। वज्रायुध ने भी राज्य रत्नायुध को देकर दीक्षा ले ली। दूसरी ओर रत्नायुध भोगों में आसक्त रहा। एक दिन वज्रदन्त मुनि के लोकानुयोग प्रवचन को सुनकर मेघविजय हाथी को जातिस्मरण हुआ। उसने मांसादि आहार त्याग दिया और संसार की दुःखमयता पर विचार करने लगा। वैद्यों ने समझा कि यह कोई शारीरिक रोग नहीं, बल्कि धर्मश्रवण से उत्पन्न वैराग्य है।
श्लोक 253 से 262 : प्रीतिंकर और विचित्रमति की कथा
राजा के प्रश्न पर वज्रदन्त मुनि ने पूर्वजन्म की कथा सुनाई। छत्रपुर के राजा प्रीतिभद्र के पुत्र प्रीतिंकर और मंत्रीपुत्र विचित्रमति ने धर्मरुचि मुनि से उपदेश सुनकर दीक्षा ली। प्रीतिंकर मुनि को क्षीरास्त्रव ऋद्धि प्राप्त हुई। साकेतपुर में एक वेश्या बुद्धिषेणा ने प्रीतिंकर मुनि से श्रेष्ठ कुल और रूप प्राप्ति का कारण पूछा। उन्होंने मद्य-मांस त्याग का उपदेश दिया। बाद में विचित्रमति मुनि ने उसी वेश्या से अनुचित रागपूर्ण बातें कीं और अपमानित होकर मुनिपना छोड़ दिया।
श्लोक 263 से 271 : विचित्रमति का पतन और राजा का वैराग्य
विचित्रमति ने राजसेवा ग्रहण कर मांसाहार द्वारा राजा गन्धमित्र को अपने वश में कर लिया और बुद्धिषेणा को भी प्राप्त कर लिया। अंत में वह मरकर मेघविजय हाथी बना। वज्रदन्त मुनि ने बताया कि त्रिलोकप्रज्ञप्ति सुनकर उसे जातिस्मरण हुआ है, इसलिए वह अशुद्ध आहार का त्याग कर चुका है। धर्म को भोगों के लिए छोड़ना महामणि के बदले काँच लेने के समान है। यह सुनकर राजा रत्नायुध धर्म में प्रवृत्त हुआ। उसने राज्य त्यागकर माता सहित संयम धारण किया और तप कर सोलहवें स्वर्ग में देव हुआ।
श्लोक 272 से 281 : अतिदारुण व्याध और विभीषण का चरित्र
सत्यघोष का जीव चौथे नरक से निकलकर अनेक योनियों में भटका और अंततः अतिदारुण नामक व्याध बना। उसने प्रियंगुखण्ड वन में प्रतिमायोगस्थ वज्रायुध मुनि की हत्या कर दी। वज्रायुध मुनि धर्मध्यान से सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग को प्राप्त हुए और अतिदारुण सातवें नरक में गया। आगे रत्नमाला का जीव वीतभय और रत्नायुध का जीव विभीषण नामक बलभद्र-नारायण बने। विभीषण नरकगति को प्राप्त हुआ, जबकि वीतभय ने अंत में दीक्षा लेकर लान्तव स्वर्ग पाया। आदित्याभ देव ने विभीषण को नरक में जाकर सम्बोधित किया था।
श्लोक 282 से 291 : जयन्त, धरणेन्द्र और विद्युदंष्ट्र के पूर्वभव
विभीषण का जीव श्रीधर्मा बना और आगे ब्रह्मस्वर्ग का देव हुआ। वज्रायुध का जीव संजयन्त बना। श्रीधर्मा का जीव जयन्त होकर निदान के कारण धरणेन्द्र बना। सत्यघोष का जीव सातवें नरक से निकलकर अनेक तिर्यंच योनियों में भ्रमण करता हुआ मृगशृंग तपस्वी बना। उसने विद्याधर राजा को देखकर निदान बाँधा और मरकर विद्युदंष्ट्र विद्याधर बना। पूर्ववैर के संस्कार से उसने पुनः कर्मबंध किया और अनेक दुःख भोगे।
श्लोक 292 से 301 : वैरत्याग का उपदेश और ह्रीमन्त पर्वत
आदित्याभ देव ने धरणेन्द्र को समझाया कि संसार में कोई स्थायी बन्धु या शत्रु नहीं होता। जीव कर्मवश कभी पिता, पुत्र, माता, भाई या बहन बनता रहता है। इसलिए वैर धारण नहीं करना चाहिए। इन वचनों से धरणेन्द्र का हृदय शान्त हुआ। उसने विद्युदंष्ट्र की महाविद्याएँ छीनने का निश्चय किया, पर देव के अनुरोध पर केवल इतना शाप दिया कि उसके वंश के पुरुष महाविद्या सिद्ध नहीं कर पाएँगे, केवल स्त्रियाँ संजयन्त स्वामी के समीप उन्हें सिद्ध कर सकेंगी। इस घटना से लज्जित विद्याधरों के कारण उस पर्वत का नाम ‘ह्रीमान्’ पड़ा। धरणेन्द्र ने वहाँ संजयन्त मुनि की प्रतिमा स्थापित की।
श्लोक 302 से 312 : मेरु और मन्दर गणधरों के पूर्वभव
आदित्याभ देव आयु पूर्ण कर मेरु नामक राजपुत्र हुआ और धरणेन्द्र मन्दर नामक पुत्र बना। दोनों अत्यन्त निकट भव्य थे। उन्होंने विमलवाहन भगवान् से अपने पूर्वभव सुने और दीक्षा लेकर गणधर बने। आगे उनके अनेक भवों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। सिंहसेन का जीव अनेक भवों से होकर संजयन्त केवली बना। मधुरा का जीव रामदत्ता, श्रीधरा, रत्नमाला आदि भवों से गुजरकर मेरु गणधर बना। वारुणी का जीव पूर्णचन्द्र, यशोधरा, रत्नायुध, विभीषण, श्रीधर्मा, जयन्त और धरणेन्द्र होते हुए मन्दर गणधर बना और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 313 से 319: सत्यघोष, भद्रमित्र और उपसंहार
सत्यघोष मंत्री का जीव अनेक दुर्गतियों—सर्प, नरक, अजगर, व्याध और विद्युदंष्ट्र—में भटकता रहा, पर अंत में वैररहित होकर शांत हुआ। भद्रमित्र का जीव सिंहचन्द्र, प्रीतिंकरदेव और चक्रायुध आदि भवों से गुजरकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रकार तीनों जीव कर्मों के अनुसार कभी सुख और कभी दुःख भोगते रहे, पर अंत में निष्पाप होकर परमपद को प्राप्त हुए। संजयन्त स्वामी ने भीषण उपसर्ग को समता से सहन कर शुक्लध्यान धारण किया और कर्ममल से रहित हुए। अंत में मेरु और मन्दर गणधरों की महिमा का वर्णन कर पर्व का समापन किया गया।
पर्व 60
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय उत्तरपुराण
उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58
उत्तरपुराण सारांश
पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47