राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 236 to 252
श्लोक ( Shlok ) 236 – 237
इतः परिजनो रामं मायामणिमृगानुगम् । विपिंने नष्टदिग्भागं सूर्येऽस्ताचलमेयुषि ॥ २३६ ॥अदृष्ट्वान्विष्य सीतां च वैमनस्यमगात्तराम् । सह्य स्तनोवियोगोऽपि स्वामिनः केन सह्यते ॥ २३७ ॥
इधर रामचन्द्रजी मणियोंसे बने मायामय मृगका पीछा करते-करते वनमें बहुत आगे चले गये वहाँ वे दिशाओंका विभाग भूल गये और सूर्य अस्ताचलपर चला गया। परिवारके लोगोंने उन्हें तथा सीताको बहुत ढूँढ़ा पर जब वे न दिखे तो बहुत ही खेद-खिन्न हुए। सो ठीक ही है क्योंकि शरीरका वियोग तो सहा जा सकता है परन्तु स्वामीका वियोग कौन सह सकता है ॥२३६-२३७ ।।
“Meanwhile, Rama went very far into the forest while pursuing the illusory deer made of precious gems. There, he lost his sense of direction, and the sun set behind the western mountains. His family members searched extensively for both him and Sita, but when they could not find them, they became deeply distressed and sorrowful. And this is only natural; for while the separation from one’s own body can be endured, who can bear the separation from their Master (Lord)?” [236-237]
श्लोक ( Shlok ) 239 – 242
घटामटति कोकानां युग्मे युग्मद्विषा मुदा । अर्थः शब्देन वा योगं साधुना जानकीप्रियः ॥ २३९ ॥स्वयं परिजनेनापि भास्करो दिवसेन वा । दृष्ट्वा तं मत्प्रिया केति नृपः प्रपृच्छ साकुलः ॥ २४० ॥ देव देवी च देवो वा नास्माभिरवलोकितः । देवी छायेव ते तस्मात्त्वमवैषीति सोऽभ्यधात् ॥ २४१ ॥इति तद्वचनालब्धरन्ध्रा रामं समग्रहीत् । मूच्छो सीतासपनीव मोहयन्ती मनः क्षणम् ॥ २४२ ॥
सबेरा होनेपर मनुष्य-लोकके चक्षुस्वरूप सूर्यका उदय हुआ, अन्धकार मानो भयसे भाग गया, कमलोंके समूह फूल उठे, रात्रिके कारण परस्पर द्वेष रखनेवाले चकवा-चकवियोंके युगल हर्षसे मिलने लगे और जिस प्रकार अर्थ निर्दोष शब्दके साथ संयोगको प्राप्त होता है अथवासूर्य दिनके साथ आ मिलता है उसी प्रकार जानकीवल्लभ रामचन्द्रजी परिवारके लोगोंके साथ आ मिले। परिजनको देखकर राजा रामचन्द्रजीने बड़ी व्यग्रतासे पूछा कि हमारी प्रिया-सीता कहाँ है ? परिजनने उत्तर दिया कि हे देव ! हम लोगोंने न आपको देखा है और न देवीको देखा है । देवी तो छायाके समान आपके पास ही थी अतः आप ही जाने कि वह कहाँ गई ? इस प्रकार परिजनके वचनोंसे प्रवेश पाकर क्षण भरके लिए मनको मोहित करती हुई सीताकी सपत्नीके समान मूर्च्छाने रामचन्द्रको पकड़ लिया – उन्हें मूर्च्छा आ गई ।। २३९-२४२ ।।
With the arrival of dawn, the sun—the very eye of the human world—arose, and darkness fled as if struck by fear. Clusters of lotuses bloomed, and pairs of Chakravaak birds, who held mutual resentment due to their forced nighttime separation, joyfully reunited.Then, just as a flawless word unites with its true meaning, or as the sun unites with the day, Ramachandra, the beloved of Janaki (Sita), reunited with his family members.Upon seeing his kin, King Ramachandra anxiously asked, “Where is my beloved Sita?”The family members replied, “O Lord! We had seen neither you nor the Goddess. The Goddess was always by your side like a shadow; therefore, only you would know where she has gone.”Hearing these words from his kin, a swoon (fainting spell)—creeping in like a rival co-wife to Sita—seized Ramachandra, momentarily clouding his mind, and he fell unconscious. [239-242]
श्लोक ( Shlok ) 243
तदा शीतक्रिया सीतासखीव सहसा नृपम् । व्यश्लेषयत्ततः सोऽपि क्क सीतेति प्रबुद्धधान् ॥ २४३ ॥
तदनन्तर-सीताकी सखीके समान शीतोपचारकी क्रियाने राजा रामचन्द्रको मूर्च्छासे जुदा किया और ‘सीता कहाँ है’ ? ऐसा कहते हुए वे प्रबुद्ध-सचेत हो गये ।। २४३ ॥
Thereafter, the application of cooling remedies—acting like a comforting companion to Sita—released King Ramachandra from his swoon. Crying out, “Where is Sita?”, he regained consciousness and awoke to his senses. [243]
श्लोक ( Shlok ) 244 – 245
देवीं परिजनः सर्वः समन्तात्प्रतिभूरुहम् । अन्वेषयन् विलोक्योत्तरीयं वंशविदारितम् ॥ २४४ ॥तस्यास्तदा तदानीय राघवाय समर्पयत् । उत्तरीयांशुकं देव्या भवत्येतदितः कुतः ॥ २४५ ॥
परिजनके समस्त लोगोंने सीताको प्रत्येक वृक्षके नीचे खोजा पर कहीं भी पता नहीं चला। हाँ, किसी वंशकी झाड़ी में उसके उत्तरीय वस्त्रका एक टुकड़ा फटकर लग रहा था परिजनके लोगोंने उसे लाकर रामचन्द्रजीको सौंप दिया। उसे देखकर वे. कहने लगे कि यह तो सीताका उत्तरीय वस्त्र है, यहाँ कैसे आया ? ॥ २४४-२४५. ।।
Every member of the household searched for Sita beneath each and every tree, but no trace of her could be found. However, a fragment of her upper garment (Uttariya) was found caught and torn within a thicket of bamboo. The family members brought it back and handed it to Ramachandra. Upon seeing it, he began to say, “This is indeed Sita’s upper garment; how did it come to be here?” [244-245]
श्लोक ( Shlok ) 246
इति विज्ञाततत्तत्वं शोकव्याकुलमानसः । सहानुजस्ततश्चिन्तां कुर्वनुर्वीश्वरः स्थितः ॥ २४६ ॥
थोड़ी ही देरमें राम-चन्द्रजी उसका सब रहस्य समझ गये । उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया और वे छोटे भाईके साथ चिन्ता करते हुए वहीं बैठ रहे ॥ २४६ ॥
In just a few moments, Ramachandra understood the entire mystery behind it. His heart became overwhelmed with grief, and he sat down right there, immersed in deep anxiety alongside his younger brother. [246]
श्लोक ( Shlok ) 247
तत्क्षणे सम्भ्रमाक्रान्तो दूतो दशरथान्तिकात् । तं प्राप्य विनतो मूर्धा कार्यमित्थमभाषत ॥ २४७ ॥
उसी समय संभ्रमसे भरा एक दूत राजा दशरथके पाससे आकर उनके पास पहुँचा और मस्तक झुकाकर इस प्रकार कार्यका निवेदन करने लगा ॥ २४७ ॥
At that very moment, a messenger—breathless with haste and anxiety—arrived from King Dasharatha. He bowed his head low and began to report the matter of his mission in this manner. [247]
श्लोक ( Shlok ) 248 – 252
गृहीत्वा रोहिणीं राहौ प्रयाते गगनान्तरम् । एकाकिनं तुषारांशुं भ्राम्यन्तं समलोकिषि ॥ २४८ ॥ स्वप्ने किं फलमेतस्येत्यन्वयुक्त महीपतिः । पुरोहितमसौ चाह सीतामद्य दशाननः ॥ २४९ ॥गृहीत्वायात्स मायावी रामः स्वामी च कानने । तां समन्वेषितु’ शोकादाकुलो भ्राम्यति स्वयम् ॥२५०॥मङ्क्षु दूतमुखादेतत्प्रापणीयमिति स्फुटम् । तद्राजाज्ञागतोऽस्मीति लेखगर्भकरण्डकम् ॥ २५१॥न्यधाच्चाग्रे तदादाय शिरसा रघुनन्दनः । विमोच्य पत्रमत्रस्थं स्वयमित्थमवाचयत् ॥ २५२ ॥
उसने कहा कि आज महाराज दशरथने स्वप्न देखा है कि राहु रोहिणीको हरकर दूसरे आकाशमें चला गया है और उसके विरहमें चन्द्रमा अकेला ही वनमें इधर-उधर भ्रमण कर रहा है। स्वप्न देखनेके बाद ही महाराजने पुरोहितसे पूछा कि ‘इस स्वप्नका क्या फल है’ ? पुरोहितने उत्तर दिया कि आज मायावी रावण सीताको हरकर ले गया है और स्वामी रामचन्द्र उसे खोजनेके लिए शोकसे आकुल हो वनमें स्वयं भ्रमण कर रहे हैं। दूतके मुखसे यह समाचार स्पष्टरूपसे शीघ्र ही उनके पास भेज देना चाहिये। इस प्रकार पुरोहितने महाराजसे कहा और महाराजकी आज्ञानुसार मैं यहाँ आया हूं। ऐसा कह दूतने जिसमें पत्र रखा हुआ था ऐसा पिटारा रामचन्द्रके सामने रख दिया । रामचन्द्रने उसे शिरसे लगाकर उठा लिया और खोलकर भीतर रखा हुआ पत्र इस प्रकार बाँचने लगे ।। २४८-२५२ ।।
The messenger said, “Today, King Dasharatha saw a dream in which Rahu had abducted Rohini and fled to another sky, and in her separation, the Moon was wandering aimlessly here and there in the forest all alone. Immediately after witnessing this dream, the King asked the royal priest, ‘What is the consequence of this dream?’
The priest replied, ‘Today, the illusory Ravana has abducted Sita and taken her away, and Lord Ramachandra, overwhelmed with grief, is wandering the forest himself in search of her. This news must be sent to him clearly and swiftly through a messenger.’ The priest spoke thus to the King, and in accordance with the King’s command, I have come here.”
Saying this, the messenger placed the box containing the letter before Ramachandra. Ramachandra reverently raised it to his forehead, opened it, and began to read the letter kept inside in this manner. [248-252]
श्लोक 253 से 262
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