शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
साधनं क्रमशो मुक्तेराहारो भेषजं श्रुतम् । सर्वप्राणिदया शुद्धं देयं सर्वशभाषितम् ॥ २७२॥
सर्वज्ञ देवने यह देय चार प्रकारका बतलाया है आहार, औषधि, शास्त्र तथा समस्त प्राणियोंपर दया करना । ये चारों ही शुद्ध देय हैं तथा क्रम-क्रमसे मोक्षके साधन हैं ॥ २७२ ॥
“The omniscient Lords (Sarvajna Deva) have declared that this righteous gift (Deya) is of four distinct kinds: the gift of food (Aahara), the gift of medicine (Aushadhi), the gift of sacred knowledge (Shastra), and the gift of fearlessness and compassion to all living beings (Abhaya-dana). These four alone constitute pure charity, serving step-by-step as the direct instruments for achieving absolute liberation (Moksha).” [272]
श्लोक ( Shlok ) 273
मोक्षमार्गे स्थितः पाता स्वस्यान्येषां च संसृतेः । पात्रं दानस्य सोऽभीष्टो निष्ठितार्थेनिरञ्जनैः ॥ २७३॥
जो मोक्षमार्गमें स्थित है और अपने आपकी तथा दूसरोंकी संसार भ्रमणसे रक्षा करता है वह पात्र है ऐसा कर्ममल रहित कृतकृत्य जिनेन्द्रदेवने कहा है ।। २७३ ॥
“He who is firmly established upon the path to ultimate liberation (Moksha-marga), and diligently protects both himself and others from wandering endlessly through the painful cycle of rebirth, is known as a worthy recipient (Patra). Thus has been proclaimed by the supreme Lord Jinendra—He who is entirely free from the stains of karmic filth and has accomplished all that was ever to be achieved.” [273]
श्लोक ( Shlok ) 274
कृतार्थः सन् जगत्त्रातुं निरवद्यं वचोऽवदत् । भव्येभ्यः स हि दाता तद्देयं तत्पात्रमुरामम् ॥२७४॥
अथवा जो कृतकृत्य होकर जगत्की रक्षा करनेके लिए भव्य जीवोंकोनिर्दोष वचन कहते हैं वही उत्तम दाता हैं, वही उत्तम देय हैं और वही उत्तम पात्र हैं ।॥ २७४ ॥
“Alternatively, those Supreme Souls who, having accomplished all that was to be achieved (Kritakritya), utter flawless, untainted words of absolute truth to protect and guide the spiritually liberatable souls (Bhavya Jivas) of the universe—They alone are the ultimate Givers (Uttama Data), Their divine words are the ultimate Gift (Uttama Deya), and They themselves are the ultimate Worthy Recipients (Uttama Patra).” [274]
श्लोक ( Shlok ) 275
न तु मांसादिकं देयं पात्रं नास्य प्रतीच्छकः । तद्दातापि न दातेमौ ज्ञेयौ नरकनायकौ ॥ २७५ ॥
मांस आदि पदार्थ देय नहीं है, इनकी इच्छा करनेवाला पात्र नहीं है, और इनका देनेवाला दाता नहीं है। ये दोनों तो नरकके अधिकारी हैं ।। २७५ ।।
“Substances such as meat and flesh can never qualify as a righteous gift (Deya); those who crave or demand such things can never be considered worthy recipients (Patra); and those who hand them over can never be called true givers (Data). Both the giver and the receiver of such impure things pave their own path straight to hell (Naraka).” [275]
श्लोक ( Shlok ) 276 – 277
ततो गृध्रो न तत्पात्रं नायं ‘देयः कपोतकः । तथा मैधरथीं वाणीमाकर्ण्य ज्यौतिषामरः ॥२७६॥असि दानविभागज्ञो दानशूरश्च पार्थिव । इति स्तुत्वा प्रदर्य स्वं तं प्रपूज्य जगाम सः ॥२७७॥
कहनेका सारांश यह है कि यह गीध दानका पात्र नहीं है और यह कबूतर देने योग्य नहीं है। इस प्रकार मेघरथकी वाणी सुनकर वह ज्योतिषी देव अपना असली रूप प्रकटकर उसकी स्तुति करने लगा और कहने लगा कि हे राजन् ! तुम अवश्य ही दानके विभागको जाननेवाले हो तथा दानके शूर हो। इस तरह पूजाकर चला गया ।। २७६-२७७ ।।
“The ultimate summary of this matter is this: this vulture is not a worthy recipient of charity (Patra), and this dove is not an object that can righteously be given away (Deya).’
Hearing these profound and uncompromising words from King Megharatha, the astral deity (Jyotishi Deva) instantly shed his illusionary disguise, revealed his magnificent true form, and began to chant the king’s praises. He declared, ‘O Great King! You are truly an incomparable master who thoroughly understands the deepest divisions of righteousness, and you are indeed a valorous champion of charity (Dana-veera)!’ Having honored and worshiped the king with immense reverence, the deity then departed back to his celestial realm.” [276-277]
श्लोक ( Shlok ) 278
द्विजद्वयमपि ज्ञात्वा तदुक्तं त्यक्तदेहकम् । अरण्ये देवरमणे स्तां सुरूपातिरूपकौ ॥ २७८ ॥
उन गीध और कबूतर दोनों पक्षियोंने भी मेघरथकी कही सब बातें समझीं और अन्तमें शरीर छोड़कर वे दोनों देवरमण नामक वनमें सुरूप तथा अतिरूप नामके दो व्यन्तर देव हुए ।। २७८ ।।
“Both those birds, the vulture and the pigeon, also understood everything said by Megharatha. Ultimately, leaving their mortal bodies, they both became two Vyantara gods named Surupa and Atirupa in the forest called Devaramana.” [278]
श्लोक ( Shlok ) 279
देवौ मेवरथं पश्चात्त्वत्प्रसादात्कुयोनितः । निरगाव नृपेत्युक्त्वा पूज्यं सम्पूज्य जग्मतुः ॥२७९॥
तदनन्तर राजा मेघरथके पास आकर वे देव इस प्रकार स्तुति करने लगे कि हे राजन् ! आपके प्रसादसे ही हम दोनों कुयोनिसे निकल सके हैं। ऐसा कहकर तथा पूज्य मेघरथकी पूजाकर वे दोनों देव यथास्थान चले गये ।। २७९ ।।
“Thereafter, approaching King Megharatha, those gods began to praise him, saying, ‘O King! It is solely by your grace that we both have been delivered from an inferior birth (animal state).’ Having said this and having worshipped the venerable Megharatha, both the gods departed to their respective abodes.”[279]
श्लोक ( Shlok ) 280
कदाचित्स नृपो दानं दत्त्वा दमवरेशिने । चारणाय परिप्राप्तपञ्चाश्चर्यविधिः सुधीः ॥२८०॥
किसी समय उस बुद्धिमान् राजाने चारण ऋद्धिधारी दमवर स्वामीके लिए दान दैकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ २८० ॥
“At one time, that wise king, by offering alms to the sage Damavara—who possessed the Charana Riddhi (the supernatural power of astral travel)—attained the five wonders (Panchashcharya).”[280]
श्लोक ( Shlok ) 281
नन्दीश्वरे” महापूजां विधायोपोषितं श्रितः । निशायां प्रतिमायोगे ध्यायन्नस्थादिवाद्रिराय् ॥२८१॥
किसी दूसरे दिन राजा मेघरथ नन्दीश्वर पर्वमें महापूजा कर और उपवास धारण कर रात्रिके समय प्रतिमायोग द्वारा ध्यान करता हुआ सुमेरु पर्वतके समान विराज-मान था ।। २८१ ।।
“On another day, after performing a grand worship during the Nandishvara festival and observing a fast, King Megharatha stood resplendent like Mount Sumeru, meditating in the Pratima-yoga posture during the night.” [281]
श्लोक 282 से 293
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