पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 मरुभूति और कमठ का प्रारम्भिक वैर
आचार्य भगवान् पार्श्वनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए उनकी धर्मध्वनि और धर्मकथा की प्रशंसा करते हैं। दक्षिण भरत क्षेत्र के पोदनपुर नगर में राजा अरविन्द राज्य करते थे। वहीं विश्वभूति ब्राह्मण और उनकी पत्नी अनुन्धरी के दो पुत्र कमठ और मरुभूति थे। दोनों राजा के मन्त्री बने, परन्तु स्वभाव से एक-दूसरे के विपरीत थे। दुराचारी कमठ ने अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण सदाचारी मरुभूति की हत्या कर दी, जिससे दोनों जीवों के बीच जन्म-जन्मान्तर का वैर प्रारम्भ हुआ।
श्लोक 12 से 24 वज्रघोष हाथी का धर्मग्रहण और मृत्यु
मरुभूति का जीव वज्रघोष नामक हाथी और कमठ की पत्नी वरुणा हथिनी बनी। एक अवसर पर विरक्त होकर मुनि बने राजा अरविन्द उस वन में पहुँचे। वज्रघोष हाथी उन्हें मारने के लिए बढ़ा, किन्तु पूर्वजन्म के संबंध का स्मरण होते ही शांत हो गया और उनसे श्रावक धर्म ग्रहण कर लिया। वह तपस्वी जीवन व्यतीत करने लगा। अंततः कीचड़ में फँस जाने पर पूर्वजन्म का वैरी कमठ, जो कुक्कुट सर्प बना था, उसे डँसकर मार देता है। वज्रघोष का जीव सहस्त्रार स्वर्ग में देव बनकर जन्म लेता है।
श्लोक 25 से 32 रश्मिवेग मुनि और अजगर का उपसर्ग
स्वर्ग से च्युत होकर मरुभूति का जीव रश्मिवेग नामक राजकुमार बना। वैराग्य प्राप्त कर उसने दीक्षा धारण की और कठोर तप किया। एक दिन हिमगिरि की गुफा में ध्यानस्थ अवस्था में पूर्वजन्म का वही शत्रु, जो नरक से निकलकर अजगर बना था, उसे निगल गया। परिणामस्वरूप रश्मिवेग का जीव अच्युत स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से पुनः वज्रनाभि नामक राजकुमार के रूप में जन्मा।
श्लोक 33 से 43 वज्रनाभि का संयम और भील द्वारा उपसर्ग
वज्रनाभि ने चक्रवर्ती वैभव का उपभोग करने के बाद वैराग्य ग्रहण किया और क्षेमंकर मुनि से दीक्षा लेकर संयम धारण किया। दूसरी ओर कमठ का जीव नरक में दुःख भोगकर कुरंग नामक भील बना। एक दिन उसने तप में लीन वज्रनाभि मुनि पर अनेक भयंकर उपसर्ग किए। मुनि ने धर्मध्यानपूर्वक उन्हें सहन किया और देह त्यागकर सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव बने। बाद में वे अयोध्या में आनन्द नामक राजकुमार के रूप में जन्मे।
श्लोक 44 से 53 आनन्द का संशय और प्रतिमा-पूजा का महत्व
राजा आनन्द ने विपुलमति मुनि से धर्मश्रवण किया और पूछा कि अचेतन जिनप्रतिमा पूजा का फल कैसे दे सकती है। मुनि ने समझाया कि प्रतिमा स्वयं फल देने वाली नहीं है, किन्तु उसके दर्शन और पूजा से उत्पन्न होने वाले शुभ परिणाम पुण्यबन्ध का कारण बनते हैं। जिनेन्द्र की वीतराग प्रतिमा भव्य जीवों में श्रद्धा, भक्ति और शुभभाव उत्पन्न करती है, इसलिए वह पुण्य की प्रेरक बनती है।
श्लोक 54 से 66 सूर्य-विमान पूजा और सूर्योपासना की परम्परा
मुनि ने सूर्य-विमान स्थित जिनमन्दिर की अद्भुत विभूति का वर्णन किया। उसे सुनकर राजा आनन्द अत्यन्त श्रद्धावान् हो गया। उसने सूर्य-विमान का प्रतिरूप बनवाकर उसमें जिनमन्दिर स्थापित किया और विधिपूर्वक आष्टाह्निक तथा विविध पूजाएँ सम्पन्न कीं। उसके प्रभाव से प्रजा भी सूर्य-मण्डल स्थित जिनप्रतिमाओं की स्तुति करने लगी। बाद में सफेद बाल देखकर राजा को वैराग्य हुआ और उसने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की, सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन किया तथा तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया।
श्लोक 67 से 79 आनन्द मुनि की आराधना और देवगति
पूर्वजन्म का वैरी कमठ नरक से निकलकर सिंह बना और उसने ध्यानस्थ आनन्द मुनि का कण्ठ पकड़ लिया। मुनि ने समभावपूर्वक उपसर्ग सहन किया और चारों आराधनाओं की सिद्धि के साथ देह त्याग दिया। वे अच्युत स्वर्ग के प्राणत विमान में इन्द्र बने। वहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया और आयु पूर्ण होने पर आगामी भव में तीर्थंकर बनने के लिए अवतरण का समय निकट आया।
श्लोक 80 से 92 पार्श्वनाथ के गर्भकल्याणक की पूर्वपीठिका
भरत क्षेत्र के काशी देश में राजा विश्वसेन और रानी ब्राह्मी के यहाँ तीर्थंकर जीव का गर्भावतरण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न और मुख में प्रवेश करता हुआ हाथी देखा। राजा विश्वसेन ने उनके फल बताते हुए कहा कि यह पुत्र असाधारण महापुरुष और लोकनायक होगा। देवों ने माता-पिता का कल्याणाभिषेक किया। समय आने पर पौष कृष्ण एकादशी को भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर जन्मकल्याणक सम्पन्न कर उनका नाम “पार्श्वनाथ” रखा।
श्लोक 93 से 105 युवराज पार्श्वनाथ और मिथ्यातप का खण्डन
यौवन प्राप्त करने पर भगवान् पार्श्वनाथ एक दिन विहार करते हुए एक आश्रम पहुँचे, जहाँ उनके नाना महीपाल पंचाग्नि तप कर रहे थे। भगवान् ने एक लकड़ी में जीव होने की सूचना देकर उसे न काटने का उपदेश दिया, परन्तु तपस्वी ने अहंकारवश लकड़ी काट दी। उसमें निवास करने वाले सर्प और सर्पिणी घायल होकर मरने लगे। यह देखकर देवकुमार ने उस तपस्वी को समझाया कि अहिंसा-विहीन तप वास्तविक तप नहीं है और ऐसा अज्ञानपूर्ण तप इस लोक तथा परलोक दोनों में दुःख का कारण बनता है। किन्तु अहंकारी तपस्वी इस उपदेश से और अधिक क्रोधित हो गया।
श्लोक 106 से 114 मिथ्यातप का खण्डन और सुभौमकुमार का उपदेश
तपस्वी ने अपने कठोर शरीर-पीड़क तप का गर्वपूर्वक वर्णन करते हुए उसे सर्वोच्च साधना बताया। इसके उत्तर में सुभौमकुमार ने स्पष्ट किया कि आप्त पुरुषों और आगम के विपरीत चलकर, हिंसा तथा कषायों में प्रवृत्त होकर किया गया तप मोक्ष का साधन नहीं बन सकता। ऐसा मिथ्यातप धान के छिलकों को कूटकर चावल प्राप्त करने या जल को मथकर घी निकालने के समान निष्फल है। उन्होंने कहा कि ज्ञानविहीन कायक्लेश भविष्य के दुःखों का कारण बनता है और सच्चा तप सम्यग्दर्शन एवं अहिंसा से युक्त होना चाहिए।
श्लोक 115 से 124 कमठ का देवगति में जन्म और पार्श्वनाथ का वैराग्य
सुभौमकुमार के उपदेश को तपस्वी ने समझ तो लिया, किन्तु पूर्वजन्म के वैर और अपने मत के मोह के कारण उसे स्वीकार नहीं किया। क्रोधपूर्वक जीवन समाप्त कर वह शम्बर नामक ज्योतिषी देव बना, जबकि सर्प और सर्पिणी शांत भाव से मृत्यु पाकर धरणेन्द्र और पद्मावती बने। उधर तीस वर्ष की आयु में भगवान् पार्श्वनाथ के पास अयोध्या के राजा जयसेन का दूत आया। दूत द्वारा भगवान् ऋषभदेव की महिमा और अयोध्या की विभूति सुनकर पार्श्वनाथ के मन में वैराग्य जागा और उन्होंने अपने पूर्वभवों का साक्षात्कार कर लिया।
श्लोक 125 से 133 दीक्षा-कल्याणक और प्रथम आहार
ज्ञानावरण कर्म के विशेष क्षयोपशम से भगवान् को आत्मबोध हुआ और लौकान्तिक देवों ने उन्हें दीक्षा के लिए प्रेरित किया। इन्द्रादि देवों ने दीक्षा-कल्याणक का महोत्सव सम्पन्न किया। भगवान् पार्श्वनाथ ने पौष कृष्ण एकादशी के दिन अश्ववन में तीन सौ राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के पश्चात् उन्होंने सामायिक चारित्र और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। पारणा के दिन गुल्मखेट नगर में राजा धन्य ने उन्हें अष्टमंगल द्रव्यों सहित शुद्ध आहार अर्पित कर महान पुण्य अर्जित किया।
श्लोक 134 से 141 शम्बर का उपसर्ग और भगवान् की अचल साधना
चार माह की छद्मस्थ अवस्था के बाद भगवान् उसी वन में देवदारु वृक्ष के नीचे सात दिन के गहन ध्यान में स्थित हुए। उसी समय शम्बर देव ने पूर्वभव का वैर स्मरण कर उन पर भयंकर उपसर्ग आरम्भ किया। उसने प्रचण्ड वर्षा, गर्जना तथा पर्वतों के प्रहार जैसे अनेक कष्ट पहुँचाए। भगवान् पूर्ण समता और अचलता के साथ ध्यानस्थ रहे। यह उनकी असाधारण क्षमाशीलता और आत्मबल का परिचायक था।
श्लोक 142 से 152 धरणेन्द्र-पद्मावती की सेवा और केवलज्ञान की प्राप्ति
भगवान् पर हो रहे उपसर्ग को जानकर धरणेन्द्र और पद्मावती प्रकट हुए। धरणेन्द्र ने अपने फणों का विशाल मंडप बनाकर भगवान् की रक्षा की तथा पद्मावती ने उनके ऊपर दिव्य छत्र धारण किया। भगवान् के ध्यान के प्रभाव से मोहनीय कर्म का क्षय हो गया और शम्बर का उपसर्ग स्वतः समाप्त हो गया। चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को भगवान् पार्श्वनाथ ने शेष घातिया कर्मों का विनाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में दस गणधर, सोलह हजार मुनि तथा अनेक ज्ञान-ऋद्धि सम्पन्न साधु उपस्थित हुए।
श्लोक 153 से 161 धर्मतीर्थ की स्थापना और निर्वाण
भगवान् पार्श्वनाथ के तीर्थ में छत्तीस हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ तथा असंख्य देव-देवियाँ सम्मिलित थे। उन्होंने लगभग सत्तर वर्ष तक धर्म का उपदेश देकर असंख्य जीवों का कल्याण किया। आयु के अंतिम चरण में वे छत्तीस मुनियों सहित सम्मेद शिखर पर स्थित हुए। श्रावण शुक्ल सप्तमी को शुक्लध्यान के माध्यम से समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके निर्वाण कल्याणक का उत्सव मनाया। आचार्य उनकी क्षमाशीलता, गम्भीरता और शम्बर जैसे वैरी को भी कल्याणमार्ग पर लाने वाली करुणा की विशेष प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 162 से 170 पार्श्वनाथ की महिमा और पूर्वभवों का सार
आचार्य भगवान् पार्श्वनाथ की स्तुति करते हुए कहते हैं कि उनकी शान्ति, धैर्य और क्षमा समुद्र तथा सुमेरु से भी श्रेष्ठ हैं। कमठ के वैर के कारण ही उनके अद्भुत गुण संसार में अधिक प्रसिद्ध हुए। शम्बर देव भी अन्ततः उनके उपदेश से मिथ्यात्व छोड़कर सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सका। इसके पश्चात् पार्श्वनाथ के जीव के पूर्वभवों की श्रृंखला बताई गई—मरुभूति मन्त्री से लेकर देव, विद्याधर, चक्रवर्ती, अहमिन्द्र, आनन्द राजा और इन्द्र होकर अंततः वे तीर्थंकर पार्श्वनाथ बने। इसी प्रकार कमठ का जीव अनेक दुःखद योनियों और नरकों में भटकता हुआ अंततः शम्बर देव बना। इस प्रकार पार्श्वनाथ चरित्र का वर्णन पूर्ण होता है और आचार्य गुणभद्र उनके चरणों में श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हैं।
पर्व 72 – श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 288
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
‘स पातु पार्श्वनाथोऽस्मान् यन्महिम्नैव भूधरः । न्यषेधि केवलं भक्तिभांगिनीछत्रधारणम् ॥ १ ॥
अथानन्तर-धरणेन्द्र और भक्तिवश पद्मावती के द्वारा किया हुआ छत्रधारण-इन दोनों का निषेध जिनकी केवल महिमासे ही हुआ था वे पाश्र्वनाथ स्वामी हम सबकी रक्षा करें। भावार्थ – तपञ्चरणके समय भगवान् पाश्र्वनाथके ऊपर कमठ के जीवने जो उप-सर्ग किया था उसका निवारण घरणेन्द्र और पद्मावतीने किया था परन्तु इसी उपसर्गके बीच उन्हें केवलज्ञान हो गया उसके प्रभावले उनका सब उपसर्ग दूर गया और उनकी लोकोत्तर महिमा बढ़ गई । केवलज्ञान के समय होनेवाले माहात्म्यसे धरणेन्द्र और पद्मावतीका कार्य अपने आप समाप्त हो गया था ।। १ ।।
May Lord Parshvanath protect us all, he whose transcendent glory alone rendered unnecessary (obsolete) both the umbrella-holding by Dharanendra and the devotion-driven service of Padmavati.
Explanatory Meaning (Bhavartha): During his ascetic penance (Tapasya), Lord Parshvanath was subjected to severe afflictions (Upsarga) by the soul of Kamatha. Dharanendra and Padmavati intervened to protect him from these obstacles. However, amidst this very affliction, the Lord attained Omniscience (Kevalajnana). By the supreme influence of this supreme knowledge, all afflictions vanished on their own, and his extraordinary, otherworldly glory magnified. Due to the divine grandeur that manifests at the moment of attaining Omniscience, the protective efforts of Dharanendra and Padmavati became naturally redundant and concluded. || 1 ||
श्लोक ( Shlok ) 2
धर्मश्वेतातपत्रं ते सूते विश्वविसर्पिणीम् । छायां पापातपप्लुष्टास्तथापि किल केचन ॥ २ ॥
हे भगवन् ! यद्यपि आपका धर्मरूपी श्वेत छत्र समस्त संसारमें फैलनेवाली छायाको उत्पन्न करता है तो भी आश्चर्य है कि कितने ही लोग पाप रूपी घामसे संतप्त रहते हैं ।॥ २ ।।
O Lord! Although the white umbrella of your righteousness (Dharma) casts a cooling, protective shade over the entire universe, it is an astonishing paradox that many people still remain severely scorched by the blazing heat of their own sins. || 2 ||
श्लोक ( Shlok ) 3
सर्वभाषां भवद्भाषां सत्यां सर्वोपकारिणीम् । सन्तः शृण्वन्ति सन्तुष्टाः खलास्ताञ्च न जातुचित् ॥ ३ ॥
सर्व भाषा रूप परिणमन करनेवाली, सत्य तथा सबका उपकार करनेवाली आपकी दिव्यध्वनिको संतुष्ट हुए सज्जन लोग ही सुनते हैं- दुर्जन लोग उसे कभी नहीं सुनते ॥ ३ ।।
O Lord! Your divine discourse (Divyadhvani), which spontaneously translates into all languages, embodies ultimate truth, and bestows benevolence upon all living beings, is heard and cherished only by the virtuous souls who are filled with spiritual contentment—the wicked never listen to it. || 3 ||
श्लोक ( Shlok ) 4
अनभिव्यक्तमाहात्म्या देव तीर्थकराः परे । त्वमेव व्यक्तमाहात्म्यो वाच्या ते साधु तत्कथा ॥ ४ ॥
हे देव ! अन्य तीर्थंकरोंका माहात्म्य प्रकट नहीं है परन्तु आपका माहात्म्य अतिशय प्रकट है इसलिए आपकी कथा अच्छी तरह कहनेके योग्य है ।। ४ ।।
O Lord! While the divine grandeur of other Tirthankaras may not be as visibly prominent [in the present age], your supreme glory and miracles are profoundly manifest. For this very reason, your divine story is most worthy of being narrated and celebrated in detail. || 4 ||
श्लोक ( Shlok ) 5
कुमार्गवारिणी यस्माद्यस्मात्सन्मार्गधारिणी । तत्ते धर्मों कथां वक्ष्ये भव्यानां मोक्षगामिनाम् ॥ ५ ॥
आचार्य कहते हैं कि हे प्रभो ! चूंकि आपकी धर्मयुक्त कथा कुमार्गका निवारण और सन्मार्गका प्रसारण करनेवाली है अतः मोक्षगामी भव्य जीवोंके लिए उसे अवश्य कहूँगा ।। ५ ।।
The Acharya (spiritual master) says: O Lord! Because the narration of your righteous life and teachings dismantles the path of wickedness and illuminates the true path of liberation, I shall certainly narrate it for the benefit of the fortunate souls (Bhavya Jivas) who are destined for salvation. || 5 ||
श्लोक ( Shlok ) 6
जम्बूविशेषणे द्वीपे भरते दक्षिणे महान् । सुरम्यो विषयस्तत्र विस्तीर्ण पोदनं पुरम् ॥ ६ ॥
इसी जम्बूद्वीपके दक्षिण भरत क्षेत्रमें एक सुरम्य नामका बड़ा भारी देश है और उसमें बड़ा विस्तृत पोदनपुर नगर है ।। ६ ।।
Within the southern Bharata Kshetra (region) of this very Jambudvipa (island-continent), there lies a vast and beautiful country named Suramya. Situated within it is the highly expansive city of Podanpur. || 6 ||
श्लोक ( Shlok ) 7 – 8
रक्षितास्यारविन्दाख्यो विख्यातो विक्रमादिभिः । पिप्रियुस्तं समाश्रित्य प्रजापतिमिव प्रजाः ॥ ७ ॥तत्रैव विश्वभूत्याख्यो ब्राह्मणः श्रुतिशास्त्रवित् । ब्राह्मण्यनुन्धरी तस्य प्रीत्यै श्रुतिरिवापरा ॥ ८ ॥
उस नगरमें पराक्रम आदिसे प्रसिद्ध अरविन्द नामका राजा राज्य करता था उसे पाकर प्रजा ऐसी सन्तुष्ट थी जैसी कि प्रजापति भगवान् आदिनाथको पाकर संतुष्ट थी। उसी नगरमें वेद-शास्त्रको जाननेवाला एक विश्वभूति नामका ब्राह्मण रहता था उसे प्रसन्न करनेवाली दूसरी श्रुतिके समान अनुन्धरी नामकी उसकी ब्राह्मणी थी ॥ ७-८ ॥
श्लोक ( Shlok ) 9
अभूतामेतयोः पुत्रौ विषामृतकृतोपमौ । कमठो मरुभूतिश्च पापधर्माविवापरौ ॥ ९ ॥
उन दोनोंके कमठ और मरुभूति नामके दो पुत्र थे जो विष और अमृतसे बनाये हुएके समान थे अथवा दूसरे पाप और धर्मके समान जान पड़ते थे ॥ ९ ॥
The couple had two sons, named Kamatha and Marubhuti. The two brothers were so radically opposite that they seemed to be crafted out of poison and nectar, respectively; or rather, they appeared to be the very personifications of Sin (Papa) and Righteousness (Dharma). || 9 ||
श्लोक ( Shlok ) 10
वरुणा ज्यायसो भार्या द्वितीयस्य वसुन्धरी । मन्त्रिणौ तौ महीपस्य कनीयान्नीतिवित्तयोः ॥ १० ॥
कमठकी स्त्रीका नाम वरुणा था और मरुभूतिकी स्त्रीका नाम वसुन्धरी था। ये दोनों राजाके मन्त्री थे और इनमें छोटा मरुभूति नीतिका अच्छा जानकारथा ॥ १० ॥
Kamatha’s wife was named Varuna, and Marubhuti’s wife was named Vasundhari. Both brothers served as ministers to the king, and among them, the younger brother, Marubhuti, was exceptionally well-versed in ethics and statecraft (Neeti). || 10 ||
श्लोक ( Shlok ) 11
वसुन्धरानिमितेन सदाचारं सतां मतम् । मरुभूति दुराचारो जघान कमठोऽधमः ॥ ११ ॥
नीच तथा दुराचारी कमठने वसुन्धरीके निमित्तसे सदाचारी एवं सज्जनोंके प्रिय मरु-भूतिको मार डाला ।। ११ ।।
The vile and wicked Kamatha, fueled by his illicit desire for Vasundhari, murdered his own younger brother Marubhuti, who was otherwise deeply righteous and beloved by all virtuous people. || 11 ||
श्लोक 12 से 24
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 234 | श्लोक 235 से 248 | श्लोक 249 से 259 | श्लोक 260 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 288
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