अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172 – 176
तीक्ष्णदंष्ट्राकरालाननः कदाचिद्विभीषणः । कञ्चिन्मृगमवष्टभ्य भक्षयन् स समीक्षितः ॥ १७२ ॥अभ्रे ऽमितगुणेनामा गच्छतातिकृपालुना । अजितञ्जयनामाग्रचारणेन मुनीशिना ॥ १७३ ॥स मुनिस्तीर्थनाथोक्तमनुस्मृत्यानुकम्पया । अवतीर्य नभोमार्गात्समासाद्य मृगाधिपम् ॥ १७४ ॥शिलातले निविश्योच्चैर्धर्म्या वाचमुदाहरत् । उभो भो भव्यमृगाधीश त्वं त्रिपृष्ठभवे पुरा ॥ १७५ ॥परार्थ्यं पञ्चधा प्रोक्त मृदुशय्यातले चिरम् । स्वैरं कान्ताभिरिष्टाभिरभीष्टं सुखमन्वभूः ॥ १७६ ॥
जिसका मुख पैनी दांढ़ोंसे भयंकर है ऐसा भय उत्पन्न करनेवाला वह सिंह किसी समय किसी एक हरिणको पकड़कर खा रहा था। उसी समय अतिशय दयालु अजितंजयनामक चारण मुनि, अमितगुण नामक मुनिराजके साथ आकाशमें जा रहे थे। उन्होंने उस सिंहको देखा, देखते ही वे तीर्थंकरके वचनोंका स्मरण कर दयावश आकाशमार्गसे उतर कर उस सिंहके पास पहुँचे और शिलातलपर बैठकर जोर-जोरसे धर्ममय वचन कहने लगे । उन्होंने कहा कि हे भव्य मृगराज ! तूने पहले त्रिपृष्ठके भवमें पाँचों इन्द्रियोंके श्रेष्ठ विषयोंका अनुभव किया है। तूने कोमल शय्यातलपर मनोभिलाषित स्त्रियोंके साथ चिरकाल तक मनचाहा सुख स्वच्छन्दता पूर्वक भोगा है ॥ १७२-१७६ ।।
“At one time, that terrifying lion—whose countenance appeared fearsome due to its razor-sharp fangs—was actively devouring a deer it had captured. Precisely at that moment, an exceedingly compassionate sky-faring ascetic (Charana Muni) named Ajitanjaya, accompanied by the eminent sage Amitaguna, was traversing the upper skies. The moment they beheld the lion, they recalled the words of the Omniscient Tirthankara; moved by profound compassion, they descended from the aerial path, approached the lion, and seating themselves upon a flat boulder, began to forcefully deliver words steeped in Dharma. They addressed him: ‘O noble beast (Bhavya Mrigaraja)! In your previous existence as the Emperor Triprishta, you fully indulged in the finest objects of the five senses. Upon soft couches, in the company of desirable women who mirrored your heart’s wishes, you enjoyed unbridled pleasures at will for an exceptionally long duration.’ || 172-176 ||”
श्लोक ( Shlok ) 177
दिव्यं सर्वरसं भोज्यं रसनेन्द्रियतर्पणम् । स्पर्धमानमभुज्थाः प्राक्सुधामृतरसायनैः ॥ १७७ ॥
रसना इन्द्रियको तृप्त करनेवाले, सब रसोंसे परिपूर्ण तथा अमृतरसायनके साथ स्पर्धा करनेवाले दिव्य भोजनका उपभोग तूने किया है ॥ १७७ ॥
“You have thoroughly enjoyed divine repasts that fully gratified the organ of taste—meals replete with every exquisite flavor, rivaling even the celestial nectar of immortality (Amrita-Rasayana). || 177 ||”
श्लोक ( Shlok ) 178
धूपानुलेपनैर्माल्यैश्वर्णैर्वासैः सुगन्धिभिः । तोषितं सुचिरं तत्र त्वया घ्राणपुटद्वयम् ॥ १७८ ॥
उसी त्रिपृष्ठ के भवमें तूने सुगन्धित धूपके अनुलेपनोंसे, मालाओंसे, चूर्णोसे तथा अन्य सुवासोंसे चिरकाल तक अपनी नाकके दोनों पुट संतुष्ट किये हैं ॥ १७८ ॥
“In that very existence as Triprishta, you gratified both your nostrils for an exceptionally long duration with the applications of fragrant incense, exquisite garlands, aromatic powders, and various other sublime perfumes. || 178 ||”
श्लोक ( Shlok ) 179
रसभावसमाविष्टं विचित्रकरणोचितम् । नृत्तं निरीक्षितं चित्रमङ्गनाभिः प्रयोजितम् ॥ १७९ ॥
रस और भावसे युक्त, विविध करणोंसे संगत, स्त्रियोंके द्वारा किया हुआ अनेक प्रकारका नृत्य भी देखा है ॥ १७९ ॥
“In that same birth, you also witnessed diverse forms of dances performed by women—dances that were richly infused with aesthetic flavor (Rasa) and emotional expression (Bhava), and perfectly synchronized with various rhythmic movements and bodily postures (Karanas). || 179 ||”
श्लोक ( Shlok ) 180
शुद्धदेशजभेदं तत् षड्जादिस्वरसप्तकम् । चेतनेतरमिश्रोत्थं पूरितं कर्णयोर्द्वयोः ॥ १८० ॥
इसी प्रकार जिसके शुद्ध तथा देशज भेद हैं, और जो चेतन-अचेतन एवं दोनोंसे उत्पन्न होते हैं ऐसे षड्ज आदि सात स्वर तूने अपने दोनों कानोंमें भरे हैं ॥ १८० ॥
“In like manner, you saturated both your ears with the seven classical musical notes—beginning with Shadja—which are classified into pure (Shuddha) and regional (Deshaja) variations, and are produced by conscious beings (Chetana), unconscious instruments (Achetana), or a combination of both. || 180 ||”
श्लोक ( Shlok ) 181
श्रिखण्डमण्डिते क्षेत्रे जातं सर्व ममैव तत् । इत्याभिमानिकं सौख्यं मनसा चिरमन्वभूः ॥ १८१ ॥
तीन खण्डसे सुशोभित क्षेत्रमें जो कुछ उत्पन्न हुआ है वह सब मेरा ही है इस अभिमानसे उत्पन्न हुए मानसिक सुखका भी तूने चिरकाल तक अनुभव किया है ॥ १८१ ॥
“You have also, for an exceptionally long duration, experienced that supreme mental gratification born out of the immense pride that whispered: ‘Whatever luxury or wealth is produced within this entire realm adorned by the three segments (Tri-khanda) belongs entirely to me.’ || 181 ||”
श्लोक 182 से 192
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