अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 271 to 281
श्लोक ( Shlok ) 271 – 275
अवातरन्सुराः सर्वेऽप्युद्वास्यावासमात्मानः । मायाशिशुं पुरोधाय मातुः सौधर्मनायकः ॥ २७१ ॥ नागेन्द्रस्कन्धमारोप्य बालं भास्करभास्वरम् । तत्तेजसा दिशो विश्वाः काशयन्नमरावृतः ॥ २७२ ॥ सम्प्राप्य मेरुमारोप्य शिलायां सिंहविष्टरम् । अभिषिच्य ज्वलत्कुम्भैः क्षीरसागरवारिभिः २७३ ॥ विशुद्धपुद्गलारब्धदेहस्य विमलात्मनः । शुद्धिरेतस्य काम्भोभिर्दूष्यैरशुचिभिः स्वयम् ॥ २७४ ॥ चोदितास्तीर्थकृनाम्ना स्वाम्नायोऽयं समागतः । इति कैङ्कर्यमस्यैत्य कृताभिषवणा वयम् ॥ २७५ ॥
सब देव लोग अपने-अपने निवासस्थान को ऊजड़ बनाकर नीचे उतर आये थे। तदनन्तर, सौधर्मेन्द्रने मायामय बालकको माताके सामने रखकर सूर्यके समान देदीप्यमान उस बालकको ऐरावत हाथीके कन्धेपर विराजमान किया । बालक-के तेजसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करता और देवोंसे घिरा हुआ वह इन्द्र सुमेरु पर्वतपर पहुँचा। वहाँ उसने जिनबालकको पाण्डुकशिला पर विद्यमान सिंहासनपर विराजमान किया और क्षीरसागरके जलसे भरे हुए देदीप्यमान कलशोंसे उनका अभिषेककर निम्न्न प्रकार स्तुति की । वह कहने लगा कि हे भगवन् ! आपकी आत्मा अत्यन्त निर्मल है, तथा आपका यह शरीर विशुद्ध पुद्गल परमाणुओंसे बना हुआ है इसलिए स्वयं अपवित्र निन्दनीय जलके द्वारा इनकी शुद्धि कैसे हो सकती है ? हम लोगोंने जो अभिषेक किया है वह आपके तीर्थंकर नामकर्मके द्वारा प्रेरित होकर ही किया है अथवा यह एक आम्नाय है – तीर्थंकरके जन्मके समय होनेवाली एक विशिष्ट क्रिया ही है इसीलिए हम लोग आकर आपकी किङ्करताको प्राप्त हुए हैं ।॥ २७१-२७५ ।।
All the deities had left their respective abodes deserted and descended to the earth. Thereafter, Saudharmendra (the Lord of the Saudharma heaven) placed a magically created illusory infant beside the mother, and seated the real child—who was as radiant as the sun—upon the shoulder of the Airavata elephant. Illuminating all ten directions with the child’s brilliant aura and surrounded by the hosts of gods, the Indra arrived at Mount Sumeru. There, he seated the Jina-infant upon the throne situated on the Panduka rock and, performing His consecration (abhisheka) with radiant pitchers filled with the waters of the Milky Ocean (Ksheerasagara), prayed to Him in the following manner.
He began to pray: “O Lord! Your soul is exceedingly pure, and this body of Yours is composed of absolutely pristine matter-particles (pudgala-paramanus); therefore, how can its purification be achieved by this inherently impure and base water? The consecration we have performed is driven solely by the prompting of Your Tirthankara Nama-Karma (the karma that determines birth as a Tirthankara), or rather, it is an established lineage tradition—a specific ritual destined to take place at the time of a Tirthankara’s birth. It is for this reason alone that we have come here and attained the privilege of being Your humble servants.” || 271-275 ||
श्लोक ( Shlok ) 276
अलं तदिति तं भक्तया विभूष्योद्घविभूषणैः । वीरः श्रीवर्धमान श्चेत्यस्याख्याद्वितयं व्यधात् ॥ २७६॥
अधिक कहनेसे क्या ? इन्द्रने उन्हें भक्तिपूर्वक उत्तमोत्तम आभूषणोंसे विभूषितकर उनके वीर और श्रीवर्धमान इस प्रकार दो नाम रक्खे ॥ २७६ ।।
What is the need for saying more? With utmost devotion, Indra adorned Him with the most exquisite ornaments and bestowed upon Him two names: Veera (The Brave One) and Shrivardhamana (The Augmenter of Prosperity). || 276 ||
श्लोक ( Shlok ) 277 – 278
ततस्तं स समानीय सर्वामरसमन्वितः । मातुरङ्गे निवेश्योच्चैर्विहितानन्दनाटकः ॥ २७७ ॥ विभूष्य पितरौ चास्य तयोर्विहितसंमदः । श्रीवर्धमानमानम्य स्वं धाम समगात्सुरैः ॥ २७८ ॥
तदनन्तर सब देवोंसे घिरे हुए इन्द्रने, जिन-बालकको वापिस लाकर माताकी गोदमें विराजमान किया, बड़े उत्सवसे आनन्द नामका नाटक किया, माता पिताको आभूषण पहिनाये, उत्सव मनाया और यह सब कर चुकनेके बाद श्रीवर्धमान स्वामीको नमस्कार कर देवोंके साथ अपने स्थानपर चला गया ।। २७७-२७८ ।।
Subsequently, surrounded by all the deities, Indra brought the Jina-infant back and placed Him lovingly in the lap of His mother. He then performed the theatrical dance of joy called Ananda-nataka with great festivity, adorned the parents with divine ornaments, and celebrated the auspicious occasion. Having completed all these rituals, he bowed down in reverence to Lord Shrivardhamana and, along with the hosts of gods, returned to his heavenly abode. || 277-278 ||
श्लोक ( Shlok ) 279 – 281
पार्श्वेशतीर्थसन्ताने पञ्चाशद्विशताब्दके । तदभ्यन्तरवर्त्यायुर्महावीरोऽत्र जातवान् ॥ २७९ ॥द्वासप्ततिसमाः किञ्चिदूनास्तस्यायुषः स्थितिः । सप्तारनिमितोत्सेधः सर्वलक्षणभूषितः ॥ २८० ॥निःस्वेदत्वादिनिर्दिष्टदशात्मजगुणोदयः ॥ १भयसप्तकनिर्मुक्तः सर्वचेष्टाविराजितः ॥ २८१ ॥
श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकरके बाद दो सौ पचास वर्ष बीत जानेपर श्री महावीर स्वामी उत्पन्न हुए थे उनकी आयु भी इसीमें शामिल है। कुछ कम बहत्तर वर्षकी उनकी आयु थी, वे सात हाथ ऊँचे थे, सब लक्षणोंसे विभूषित थे, पसीना नहीं आना आदि दशगुण उनके जन्म से ही थे, वे सात भयोंसे रहित थे और सब तरहकी चेष्टाओंसे सुशोभित थे ।। २७९-२८१ ॥
Two hundred and fifty years after the time of Lord Parshvanatha Tirthankara, Lord Mahavira Swami was born (this duration includes his own lifespan as well). His lifespan was a little less than seventy-two years, his height was seven cubits (seven hands), and he was adorned with all auspicious bodily marks. The ten divine attributes, such as being free from perspiration, were present from his very birth; he was devoid of the seven types of fear and was beautifully adorned with all kinds of graceful activities. || 279-281 ||
श्लोक 282 से 293
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270
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