अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 92 to 102
श्लोक ( Shlok ) 92 – 95
अथान्यदा कुमारोऽसौ विश्वनन्दी मनोहरे । निजोद्याने समं स्वाभिर्देवीभिः क्रीडया स्थितः ॥ ९२ ॥विशाखनन्दस्तं दृष्ट्वा तदुद्यानं मनोहरम् । स्वीकर्तुं मतिमादाय गत्वा स्वपितृसन्निधिम् ॥ ९३ ॥मह्यं मनोहरोद्यानं दीयतां भवतान्यथा । कुर्या देशपरित्यागमहमित्यभ्यधादसौ ॥ ९४ ॥सत्सु सत्स्वपि भोगेषु विरुद्धविषयप्रियः । भवेद्भाविभवे भूयो भविष्यद्दुःखभारधृत् ॥ ९५ ॥
तदनन्तर किसी दिन विश्वनन्दी कुमार अपने मनोहर नामके उद्यानमें अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था। उसे देख, विशाखनन्द उस मनोहर नामक उद्यानको अपने आधीन करनेकी इच्छासे पिताके पास जाकर कहने लगा कि मनोहर नामका उद्यान मेरे लिए दिया जाय अन्यथा मैं देश परित्याग कर दूंगा – आपका राज्य छोड़कर अन्यत्र चला जाऊंगा। आचार्य कहते हैं कि जो उत्तम भोगोंके रहते हुए भी विरुद्ध विषयोंमें प्रेम करता है वह आगामीभवमें होने-वाले दुःखोंका भार ही धारण करता है ।। ९२-९५ ।।
“Thereafter, on a certain day, Prince Vishvanandi was sporting with his wives in the beautiful garden named Manohara. Seeing him, Vishakhananda, desiring to bring that beautiful Manohara garden under his own control, went to his father and said, ‘Let the Manohara garden be given to me, otherwise I shall renounce the country—leaving your kingdom, I will depart elsewhere.’ The Acharya says that he who, despite having access to excellent enjoyments, fosters a desire for conflicting or forbidden pleasures, merely bears the burden of miseries to come in future lifetimes. || 92-95 ||”
श्लोक ( Shlok ) 96 – 99
श्रुत्वा तद्वचनं चित्चे निधाय स्नेहनिर्भरः । “कियत्तत्ते ददामीति सन्तोष्य तनुजं निजम् ॥ ९६ ॥विश्वनन्दिनमाहूय राज्यभारस्त्वयाधुना । गृह्यतामहमाक्रम्य प्रत्यन्तप्रतिभूभृतः ॥ ९७ ॥कृत्वा तज्जनितक्षोभप्रशातिं गणितैर्दिनैः । प्रत्येष्यामीति सोऽवोचच्छ्रुत्वा तत्प्रत्युवाच तम् ॥ ९८ ॥पूज्यपाद त्वयात्रैव निश्चिन्तमुपविश्यताम् । गत्वाहमेव तं प्रैषं करोमीति सुतोत्तमः ॥ ९९ ॥
पुत्रके वचन सुनकर तथा हृदयमें धारणकर स्नेहसे भरे हुए पिताने कहा कि ‘वह वन कितनी-सी वस्तु है, मैं तुझे अभी देता हूँ’ इस प्रकार अपने पुत्रको सन्तुष्टकर उसने विश्वनन्दीको बुलाया और कहा कि ‘इस समय यह राज्यका भार तुम ग्रहण करो, मैं समीपवर्ती विरुद्ध राजाओंपर आक्रमणकर उनके द्वारा किये हुए क्षोभको शान्तकर कुछ ही दिनों में वापिस आ जाऊ ंगा’ । राजाके वचन सुनकर श्रेष्ठपुत्र विश्वनन्दीने उत्तर दिया कि ‘हे पूज्यपाद ! आप यहीं निश्चिन्त होकर रहिये, मैं ही जाकर उन राजाओंको दासबनाये लाता हूँ’ ।। ९६-९९ ।।
“Hearing his son’s words and taking them to heart, the father, filled with affection, said, ‘How small a matter is that forest? I shall give it to you right now.’ Having thus pacified his son, he summoned Vishvanandi and said, ‘For the time being, you assume the burden of this kingdom. I shall march against the neighboring hostile kings, quell the disturbance caused by them, and return in just a few days.’ Upon hearing the king’s words, the noble prince Vishvanandi replied, ‘O venerable father! You remain here free from worry; I myself shall go and bring those kings back as your servants.’ || 96-99 ||”
श्लोक ( Shlok ) 100
राज्यमस्यैव मे नेहाव् भ्रात्राऽदायीत्यतर्कयन् । वनार्थमतिसन्धित्सुरभूप्तं धिग्दुराशयम् ॥ १०० ॥
आचार्य कहते हैं कि देखो राजाने यह विचार नहीं किया कि राज्य तो इसीका है, भाईने स्नेह वश ही मुझे दिया है। केवल बनके लिए ही वह उस श्रेष्ठ पुत्रको ठगनेके लिए उद्यत हो गया सो ऐसे दुष्ट अभिप्रायको धिक्कार है ।। १०० ।।
“The Acharya says, ‘Look, the king did not even consider that the kingdom actually belongs to Vishvanandi alone, who out of pure brotherly affection handed it over to me. For the sake of a mere forest, he became ready to deceive that noble son; fie upon such a wicked intention!’ || 100 ||”
श्लोक ( Shlok ) 101 – 102
ततः स्वानुमते तस्मिन् स्वबलेन सभं रिपून् । निर्जेतुं विहितोद्योगं गते विक्रमशालिनि ॥ १०१ ॥वनं विशाखनन्दाय स्नेहादन्यायकांक्षिणे । विशाखभूतिरुल्लक्ष्य क्रमं गतमतिर्ददौ ॥ १०२ ॥
तदनन्तर पराक्रमसे सुशोभित विश्वनन्दी जब काकाकी अनुमति ले, शत्रुओंको जीतनेके लिए अपनी सेनाके साथ उद्यम करता हुआ चला गया तब बुद्धिहीन विशाखभूतिने क्रमका उल्लंघनकर वह वन अन्यायकी इच्छा रखनेवाले विशाखनन्दके लिए दे दिया ।। १०१-१०२ ।।
“Thereafter, when the valor-adorned Vishvanandi, having taken permission from his uncle, set out with his army to conquer the enemies, the foolish Vishakhbhuti violated the proper order and gave away that forest to Vishakhananda, who harbored unjust desires. || 101-102 ||”
श्लोक 103 से 111
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