शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 372 to 381
श्लोक ( Shlok ) 372
मदनोद्दीपनद्रव्यैनिसर्गप्रेमतो गुणैः । कान्त्यादिभिश्च दम्पत्योः प्रीतिस्तत्र निरन्तरम् ॥ ३७२ ॥
वहाँ कामको उद्दीपित करनेवाले पदार्थ, स्वाभाविक प्रेम, तथा कान्ति आदि गुणोंसे स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर प्रीति बनी रहती थी ।॥ ३७२ ।।
There, through the influence of passion-inducing elements, natural affection, and radiant grace, an enduring love and deep affection was continuously maintained between men and women. || 372 ||
श्लोक ( Shlok ) 373
अहिंसालक्षणो धर्मो यतयो विगतस्पृहाः । देवोऽर्हचैव निर्दोषस्तत्सर्वेऽप्यत्र धार्मिकाः ॥ ३७३ ॥
वहाँ धर्म अहिंसा रूप माना जाता था, मुनि इच्छारहित थे, और देव रागादि दोषोंसे रहित अर्हन्त ही माने जाते थे इसलिए वहाँ के सभी मनुष्य धर्मात्मा थे ॥ ३७३ ।।
There, righteousness was considered to be the practice of non-violence, the ascetics were entirely free from desires, and only the Arhats—who are completely devoid of attachment and other flaws—were revered as gods; consequently, all the human beings of that place were naturally righteous and deeply pious. || 373 ||
श्लोक ( Shlok ) 374
यत्किञ्चित् सञ्चितं पापं पञ्चसूनादिवृत्तिभिः । पात्रदानादिभिः सद्यस्तद्धिलम्पन्त्युपासकाः ॥ ३७४ ॥
वहाँ के श्रावक, चक्की चूला आदि पाँच कार्योंसे जो थोड़ा-सा पाप संचित करते थे उसे पात्रदान आदिके द्वारा शीघ्र ही नष्ट कर डालते थे ।। ३७४ ।।
The lay Jains (Shravakas) of that place quickly destroyed whatever small amount of sin they accumulated through the five inevitable household activities—such as operating the grinding stone and the cooking hearth—by promptly engaging in acts of charity, such as offering pure food to worthy ascetics. || 374 ||
श्लोक ( Shlok ) 375
न्याय्यो नृपः प्रजा धर्मा निर्जन्तु क्षेत्रमन्वहम् । स्वाध्यायस्तत्पुरं तस्मान्न त्यजन्ति यतीश्वराः ॥ ३७५॥
वहाँका राजा न्यायी था, प्रजा धर्मात्मा थी, क्षेत्र जीवरहित-प्रासुक था, और प्रतिदिन स्वाध्याय होता रहता था इसलिए मुनिराज उस नगरको कभी नहीं छोड़ते थे ।। ३७५ ॥
The king of that place was perfectly just, the subjects were deeply righteous, the ground was un-inflicted and purified of microscopic life, and spiritual study took place every single day; for these reasons, the revered ascetics never wished to leave that city. || 375 ||
श्लोक ( Shlok ) 376
नानापुष्प “फलानम्रमहीजैर्नन्दनैर्वनैः । नन्दनं च विजीयेत तत्पुरोपान्तवर्तिभिः ॥ ३७६ ॥
जिनके वृक्ष अनेक पुष्प और फलोंसे नम्र हो रहे हैं तथा जो सबको आनन्द देनेवाले हैं ऐसे उस नगरके समीपवर्ती वनोंसे इन्द्रका नन्दनवन भी जीता जाता था ।॥ ३७६ ॥
With their trees bending low under the weight of abundant fruits and flowers, and bringing pure joy to everyone, the woodlands surrounding that city even surpassed the splendor of Indra’s celestial garden, Nandanvana. || 376 ||
श्लोक ( Shlok ) 377 – 378
निष्पन्नसारवस्तूनां निःशेषाणां निजोद्भव- । स्थानेष्वनुपभोग्यत्वात्तदेवायान्ति सर्वतः ॥ ३७७ ॥तत्रस्यैरेव भुज्यन्ते तानि दानेन चेद्वहिः । निर्यान्ति यान्तु तत्तादृक् त्यागिभोगिजनैश्चितम् ॥ ३७८ ॥
संसारमें जितनी श्रेष्ठ वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं उन सबका अपनी उत्पत्तिके स्थानमें उपभोग करना अनुचित है इसलिए सब जगहकी श्रेष्ठ वस्तुएँ उसी नगरमें आती थीं और वहाँ के रहनेवाले ही उनका उपभोग करते थे। यदि कोई पदार्थ वहाँ से बाहर जाते थे तो दानसे ही बाहर जा सकते थे इस तरह वह नगर पूर्वोक्त त्यागी तथा भोगी जनोंसे व्याप्त था ।। ३७७-३७८ ॥
It is considered unbefitting for the finest goods produced in the world to be consumed merely at their place of origin; therefore, the most excellent items from all corners of the earth gravitated toward that city, and it was its inhabitants alone who enjoyed them. If any wealth or material ever left the city, it did so solely through the act of charity. In this manner, that city was densely populated by the aforementioned people—who were both ultimate enjoyers of prosperity and supreme practitioners of renunciation. || 377-378 ||
श्लोक ( Shlok ) 379
तत्र तादात्विकाः सर्वे तन्न दोषाय कल्पते । तत्पण्यात् सर्ववस्तूनि वर्द्धन्ते प्रत्यहं यतः ॥ ३७९ ॥
उस नगरके सब लोग तादात्विक थे – सिर्फ वर्तमानकी ओर दृष्टि रखकर जो भी कमाते थे उसे खर्च कर देते थे। उनकी यह प्रवृत्ति दोषाधायक नहीं थी क्योंकि उनके पुण्यसे सभी वस्तुएँ प्रतिदिन बढ़ती रहती थीं ।॥ ३७९ ॥
All the people of that city were Tadatvika—meaning they focused entirely on the present moment, spending whatever they earned. This tendency of theirs did not result in any fault or financial ruin, because through the power of their accumulated spiritual merit, all their wealth and resources naturally multiplied day after day. || 379 ||
श्लोक ( Shlok ) 380
ब्रह्मस्थानोत्तरे भागे भुवोऽभूद्राजमन्दिरम् । महामेरुनिभं भास्वद्भङ्गशालादिभूषितम् ॥ ३८० ॥
उस नगर में ब्रह्मस्थानके उत्तरी भूभागमें राजमन्दिर था जो कि देदीप्यमान भद्रशाल – उत्तमकोट आदिसे विभूषित था और भद्रशाल आदि वनोंसे सुशोभित महामेरुके समान जान पड़ता था ॥ ३८० ॥
In the northern region of the city’s central square (Brahmasthana), stood the royal palace. Adorned with a radiant, magnificent wall and excellent ramparts, it resembled the mighty Mount Meru itself, which is beautifully surrounded by the sacred Bhadrashala and other celestial forests. || 380 ||
श्लोक ( Shlok ) 381
यथास्थाननिवेशेन परितो राजमन्दिरम् । उडूनि वो ज्वलद्म्यहर्म्याण्यन्यानि वा बभुः ॥ ३८१ ॥
उस राजमन्दिके चारों ओर यथा-योग्य स्थानों पर जो अन्य देदीप्यमान सुन्दर महल बने हुए थे वे मेरुके चारों ओर स्थित नक्षत्रोंकै समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३८१ ॥
The other radiant and beautiful palaces built at perfectly appropriate locations all around that royal mansion shone brilliantly, resembling the luminous constellations clustered around the sacred Mount Meru. || 381 ||
श्लोक 382 से 393
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