आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर भी शिष्य का कहना है कि भगवन्! शरीर हमेशा अपाय वाला है। यदि धनादिक के द्वारा इस शरीर का उपकार नहीं हो सकता, तो आत्मा का उपकार तो केवल उपवास आदि तपश्चर्या से नहीं, बल्कि धनादि पदार्थों से भी हो जायेगा? आचार्य उत्तर देते हुए कहते हैं, नहीं, ऐसी बात नहीं है। कारण कि-
यज्जीवस्योपकाराय, तद्देहस्यापकारकम् यद्देहस्योपकाराय, तज्जीवस्यापकारकम् ॥19॥
अन्वयार्थ – (यत् जीवस्य) जो कार्य आत्मा के (उपकाराय) उपकार के लिए है (तत् देहस्य) वह शरीर का (अपकारकम्) अपकार करने वाला है तथा (यत्) जो (देहस्य उपकाराय) शरीर के उपकार के लिए है (तत्) वह (जीवस्य अपकारकम्) आत्मा का अपकार करने वाला है।
पद्यानुवाद
तन का जो उपकारक है वह, चेतन का अपकारक है,
चेतन का उपकारक है जो तन का वह अपकारक है।
सब शास्त्रों का सार यही है चेतन का उद्धार करो,
अपकारक से दूर रहो तुम, तन से कभी न प्यार करो ॥१९॥
Whatever action is beneficial to the soul is harmful to the body, and whatever action is beneficial to the body is harmful to the soul!
Note – The association of the soul and the body being the cause of the pain & misery appertaining to embodied existence, nirvana really only sig- nifies the destruction of the fleshy prison of the soul, when the latter, fully exalted and immortal in its own right, is installed in the Temple of Divinity as a God. by the mere process of emancipation from the bondage of matter. Hence, whatever tends to the fattening of the body is necessarily the source of continued affliction to the soul and vice versa.
विवेचना
जो जीव का उपकार करने वाला होता है वह शरीर का अपकार करने वाला होता है। जिस पदार्थ के द्वारा जीव का हित होता है उस पदार्थ के द्वारा देह का हित नहीं होता। यदि आप देह को पुष्ट बनाओगे तो आत्मा को दुबला-पतला बना दोगे और यदि आत्मा को पुष्ट बनाओगे तो देह दुबला-पतला हो भी जाये तो कोई चिन्ता की बात नहीं। जीव का उपकारक क्या है? तप है, संयम है, त्याग आदि जीव के उपकारक हैं। खाना, पीना, सोना, ओढ़ना, बिछाना, देखना, दिखाना आदि ये देह के पोषक हैं। आप क्या चाहते हैं। यदि दोनों चाहते हैं, तो यह सम्भव नहीं हो सकता। “शरीर पुष्ट होगा तो आत्मा पिष्ट होगी यदि आत्मा को पुष्ट बनाना चाहते हो तो शरीर पिष्ट होगा अर्थात् दुबला-पतला हो जायेगा। जो व्यक्ति आत्म स्वभाव से अनभिज्ञ है वह ही शरीर को पुष्ट बनाने का प्रयास करता रहता है।
तू नित पोखै यह सूखे ज्यों धोवै त्यों मैली। ६/१४। मंगतराय
इस शरीर का जितना भी पोषण करो, यह अपने गुणधर्म को कभी नहीं छोड़ता। यह शरीर जब तक है तब तक इससे धर्मध्यान करो। जो इस शरीर को धर्मध्यान में लगाता है वह ज्ञानी माना जाता है। शेष सारी की सारी अज्ञान की ही बातें हैं। पर्याय बुद्धि के कारण संसारी प्राणी क्या-क्या करता आया है? वर्तमान में भी क्या-क्या करता जा रहा है? जिसका फल भी क्या-क्या भोगता रहता है? इसकी कोई सीमा नहीं है। इस सभी का कारण है अज्ञान और मोह। संसार में भटकन का भी यही कारण है अन्य कुछ नहीं। ज्ञान के माध्यम से वह अपने हित को जान सकता है और अहित को भी जान सकता है। दोनों को जानकर ज्ञान के ही माध्यम से हित को अपना सकता है और अहित से दूर रह सकता है। कषायें अज्ञान की सपोर्टर है कषायों के प्रभाव में आकर आत्मा जो कुछ भी करता है उसके फलस्वरूप आत्मा को ही पिटना पड़ता है।
“पाप आप करो फल दूसरा भोगे” ऐसा कभी नहीं होता, बल्कि जो जैसा करता है वही उसका वैसा ही फल भोगता है। शरीर को अपना मानना, उसमें पर्याय बुद्धि रखना, यह सबसे निकृष्ट कार्य है। ऐसा करना सबसे बड़ी भूल है। यह संसारी जीव के लिए अभिशाप है। इसीलिए संसार है। यदि भेद विज्ञान आ जाये तो पर्याय बुद्धि हट सकती है। अतः इन शरीरादि पर पदार्थों से भिन्न हूँ, पृथक् हूँ, प्रत्येक क्षण में ऐसा भाव करना चाहिए। ऐसा ही बार-बार चिन्तन करना चाहिए। यही एकमात्र निर्जरा का साधन है। राग-द्वेषादि भाव हो भी जायें तो उन्हें भी पृथक् समझो और विचार करो कि यह भाव मेरा स्वभाव नहीं है। कर्मों के उदय से यह मेरे भीतर वैभाविक शक्ति काम कर रही है, लेकिन यह मेरा स्वभाव नहीं है। मेरा स्वभाव तो इन सब विभाव-भावों से पृथक् है। मेरा स्वभाव तो ज्ञाता दृष्टा है। कषाय करना मेरा स्वभाव नहीं। अज्ञान के पीछे लग जाना मेरा स्वभाव नहीं, ऐसा समझकर ज्ञानी हमेशा अच्छे कार्य ही करता है।
आप लोग (साधुओं की ओर संकेत) मुझे बताओ कि रत्नत्रय कैसा लग रहा है? वीतराग विज्ञान सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन-
“आतमहित हेतु विराग ज्ञान तै लखै आपको कष्टदान ॥ २/६ । छहढाला
आत्मा के हितकारक रत्नत्रय या वीतराग विज्ञान को ज्ञानी जीव कभी कष्ट दायक नहीं समझता। वीतराग विज्ञान रत्नत्रय का फलीभूत पदार्थ है। आत्म-हित के लिए वह नवनीत है। रत्नत्रय के बिना वीतराग विज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। संयम धारण किये बिना आत्मा का अनुभव नहीं हो सकता। जो संयम धारण करेगा उसके विषय कषायों का निश्चित रूप से त्याग हो जायेगा। ऐसी स्थिति में शरीर शुष्क होगा और आत्मा पुष्ट होगी। आत्मा पुष्ट होगी तो बहुत सारी समस्यायें अपने आप टलती चली जायेंगी एवं आत्मा हमेशा-हमेशा बलवान होता रहेगा।
जिस देश में सेना तंदुरुस्त रहती है, उसकी आवाज सुनते ही सारे के सारे अन्य दल कांपने लगते हैं। वह देश बलवान माना जाता है जिसमें बलवान सैन्यदल होता है। अन्यथा देश पर कोई भी कभी भी आक्रमण कर सकता है। इसी प्रकार जिसका आत्म-वल मजबूत रहता है, उसको तीनों लोक एवं तीनों कालों में कोई दबा नहीं सकता। राग-द्वेष के कारण ही यह जीव सर्वत्र दवता आया है। लेकिन जब रत्नत्रय धारण कर लेता है तो उसको दबाने वाले राग-द्वेष समाप्त हो जाते हैं और उस समय वह शान्ति से बैठकर रत्नत्रय की साधना को बढाता चला जाता है।
संसारी प्राणी अनन्त की संख्या में हैं और रत्नत्रय के धारक बहुत कम हैं। अंगुली पर गिनने लायक अर्थात् विरले ही होते हैं। पूरे विश्व में क्या ? पूरे ढाईद्वीप में ही अधिकतम मात्र तीन कम नौ करोड़ रत्नत्रय के धारक मुनिराज होते हैं। बाकी अनन्त संख्या वाले सभी सिद्ध होते हैं या असंयमी होते हैं। एकेन्द्रिय से लेकर असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय तक सभी जीव असंयमी ही रहते हैं, क्योंकि उनमें संयमी बनने की क्षमता या योग्यता ही नहीं होती। संज्ञी पञ्चेन्द्रियों में भी सभी जीव संयम धारण नहीं करते हैं। तीन गतियों को छोड़कर मात्र मनुष्य गति में ही पूर्ण संयम धारण किया जा सकता है। तिर्यन्वों में असंख्यात तिर्यञ्च पूर्ण संयम को नहीं किन्तु देशसंयम को धारण कर सकते हैं। मनुष्यों में पूर्ण संयम धारण कर सकने की क्षमता तो है परन्तु सभी मनुष्य धारण नहीं कर सकते।
जो जीव के लिए अपकारक होता है वह देह के लिए उपकारक होता है अतः ज्ञानी जीव देह को पुष्ट नहीं करता है, क्योंकि देह के उपकार से देह के पुष्ट होने से जीव का अपकार होता है। “संयम पालन हेतु स्वस्थ शरीर की आवश्यकता तो होती है पर पुष्ट शरीर की आवश्यकता नहीं।” साधक देह को पुष्ट नहीं करता किन्तु देह को वेतन देकर उससे काम कराता है। यह शरीर काम करता है तो वेतन देता है और यदि काम करने को तैयार नहीं रहता तो सीधे उसी दिन कह देता है कि अब तुझे वेतन नहीं मिलेगा। इतने दिन तक वेतन दे दिया अभी भी थोड़ा-बहुत काम करोगे तो ही थोड़ा बहुत वेतन मिलेगा अधिक नहीं। यदि शरीर का ख्याल रखकर कोई उसके पक्ष में तर्क रखे, कि शासन रिटायर्डमेंट होने के उपरान्त भी आधा वेतन देता है। भले ही वह व्यक्ति काम करने लायक न भी हो, अतः शरीर भी यदि मांग करता है कि भले ही मैं काम के लायक नहीं रहा फिर भी आधं वेतन तो आपको देना चाहिए? इसके समाधान में आचार्य कहते हैं कि नहीं, शासन के समान हम दया नहीं कर सकते। हमने तो पहले ही शर्त रखी थी कि जब तक काम करोगे तब तक ही हम वेतन देंगे। जिस दिन से कार्य बन्द कर दोगे तो एक बूँद भी नहीं मिलेगी तुम्हें। क्यों, ऐसा क्यों ? जब सरकार भी वेतन देती है तो आपको भी देना चाहिए। नहीं, क्योंकि सरकार की प्रक्रिया भिन्न है। यह तो ‘प्राइवेट कंपनी’ है। सरकार में सब चलता है, सरकारी कानून यहाँ पर भी लागू होना चाहिए ऐसा नहीं है। सरकार की नीति में धर्म-नीति न होने के कारण धन की अवनति, देश की अवनति, संस्कृति की अवनति, धर्म की अवनति होती है।
रत्नत्रय का धारक सुपात्र कहलाता है। रत्नत्रय जिसके पास नहीं है वह अपात्र है। सुपात्र को दान देने से भोगभूमि प्राप्त होती है। दान देने वाला स्वर्ग भी जा सकता है, लेकिन अपात्र को दान देने से कुभोगभूमि मिलती है, जहाँ पर सम्यग्दर्शन प्राप्त करने की भी पात्रता नहीं होती। वहाँ पर मनुष्यों के शरीर की कैसी संरचना होती है। इस विषय में तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि ग्रन्थों में बताया है कि एक हाथ है, तो एक टांग है। कान मिले तो सूप जैसे उन्हीं को बिछाओ उन्हीं को ओढ़ लो। गधे, घोड़े, उल्लू, सूकर, दर्पण आदि के समान मुख मिलते हैं। रत्नत्रय का पात्र शरीर है। रत्नत्रय आत्मा में है लेकिन फिर भी रत्नत्रय के द्वारा शरीर में पात्रता आती है। इसलिए ही शरीर को वेतन दिया जाता है लेकिन उसे पुष्ट नहीं बनाया जाता। जैसे-लैम्प, कैण्डिल, गैसबत्ती के लिए पेट्रोल या तेल दिया जाता है तेल देना उनका वेतन है वैसे आहार देना शरीर का वेतन है। उन सभी को वेतन कब देते हैं, जब तक घर में है तब तक? नहीं, जब तक वे प्रकाश देते हैं तब तक । अर्थात् जब तक वे प्रकाश देते हैं तब तक उन्हें प्रकाश की सामग्री दी जाती है। प्रकाश देने के योग्य जब नहीं रहते तो उन्हें कचरे में डाल दिया जाता है। इसी प्रकार शरीर की भी स्थिति है।
देह के माध्यम से विषयों का सेवन होता है तो उसी के माध्यम से संयम का पालन भी होता है। तीनों लोकों की सम्पदा भी मिल जाये तो भी सम्यग्दृष्टि जीव कहता है कि मुझे इस सम्पदा से कोई प्रयोजन नहीं है। मुझे तो आत्म-सम्पदा प्राप्त करना है उसके लिए असंख्यातगुणी कर्म-निर्जरा करना आवश्यक है। कर्म-निर्जरा के लिए संयम पालन करना आवश्यक है। संयम पालने में देह कारण है। अन्य तीन गति सम्बन्धी शरीर मुक्ति का साक्षात् कारण, असंख्यातगुणी निर्जरा में कारण नहीं होता। लेकिन इस मानव देह से कर्म निर्जरा करने का यह शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। कर्म काटने का अवसर मिला है। कर्म काटने में यह देह कारण है। इसलिए इसे साधक वेतन दे सकते हैं, देते ही हैं अन्यथा नहीं। देवों से भी बढ़कर आप लोगों का यह शरीर है, कितना महत्त्वपूर्ण है? अन्य सभी शरीर काँच के समान हैं तो मानव शरीर हीरे के समान है क्योंकि इसके माध्यम से संयम का पालन किया जा सकता है। पूर्णरूपेण धर्म का पालन इसी शरीर के द्वारा होता है। इसी दृष्टि से यह मानव देह कथंचित् जीव का उपकारक भी बनता है। इसी के द्वारा रत्नत्रय का पालन होता है। अतः अच्छे ढंग से इसकी व्यवस्था कर देना चाहिए और कर्म-निर्जरा में अपने आपको व्यस्त कर लेना चाहिए। यही एक मात्र बुद्धिमत्ता है। अन्यथा तो “तदर्थं प्रार्थना वृथा” अर्थात् एक क्षण भी शरीर के लिए कुछ भी प्रार्थना करना व्यर्थ है।
मानलो, किसी डॉक्टर का एक माह में साठ हजार रुपये वेतन है। इसमें हिसाब लगाइये कि, जब वह एक माह में साठ हजार कमा रहा है तो पन्द्रह दिन में तीस हजार। सात-आठ दिनों में पन्द्रह हजार। चार दिनों में सात हजार, तो दो दिनों में साढे तीन हजार। एक दिन में लगभग पौने दो हजार, तो एक घण्टे में बासठ रुपये। एक मिनट में लगभग डेढ़ रुपये और एक सेकण्ड में लगभग दो पैसे कमाता है। क्या कम्प्यूटर दिमाग है आपका ? यह तो मामूली सी चीज का हिसाब- किताब हो गया। लेकिन मनुष्य जीवन में जो रत्नत्रय धारण करता है, उसका पालन करता है तो उसने कितना वेतन कमाया ? ऐसा यदि हिसाब लगाना चाहते हो तो आचार्य कहते हैं कि एक सेकेण्ड में भी असंख्यात समय होते हैं, एक-एक समय में अनन्त अनन्त सम्पदा को कमा सकता है।
इस प्रकार का वेतन तीन लोक में अन्यत्र कहीं न मिला, न मिल सकता है। आप सोचिये, विचार कीजिये, कि जब हम भगवान् महावीर स्वामी के डिपार्टमेण्ट में भर्ती हो जाते हैं तो एक- एक समय में कितना वेतन मिलता है? आपके लिए भी इतना ही मिल सकता है, बस इतनी शर्त है कि दुनिया की तरफ से अपने मन को मोड़ लो और इतना वेतन ले लो। हम पूछते हैं भगवान् महावीर स्वामी से कि और कोई कमीशन भी मिल जायेगा क्या आप लोगों को तो मैं बता दूंगा। इतनी अधिक सम्पदा आपके हाथ में है अब और कमीशन या वेतन की क्या बात करते हो ? जो कुछ भी सम्पति है वह सब तुम्हारी ही है।
दुनिया की सारी की सारी कम्पनियाँ फेल हो सकती हैं, लेकिन भगवान् महावीर स्वामी की कम्पनी ऐसी है कि वहाँ कोई ग्राहक आए तो ठीक, न आये तो भी ठीक, ऐसे कमीशन तो वहाँ मिलते ही रहते हैं। हम तो कमीशन एजेण्ट हैं। कोई ले लो तो ठीक, न ले तो भी ठीक, यहाँ कोई व्यापार नहीं है। अतः सम्यग्दृष्टि जीव इस मानव जीवन या मानव शरीर को कैसा मानता है? दुर्लभ मानता है। बारह भावना में आप पढ़ते हैं कि-
“नरकाया को सुरपति तरसै, सो दुर्लभ प्राणी। ११/२४ ॥”-मंगतराय
स्वर्गों में रहने वाले इन्द्र भी इसके लिए तरस रहे हैं क्योंकि इसी के माध्यम से मुक्ति का सम्पादन होता है। मुक्ति क्या है? शुद्ध-तत्त्व की, शुद्ध आत्मा की अथवा शुद्धज्ञान की अनुभूति होने का नाम ही तो मुक्ति है। इसकी प्राप्ति मनुष्य जीवन में रत्नत्रय के द्वारा होती है। धन्य है उनका जीवन जिन्होंने इस शरीर को रत्नत्रय की प्राप्ति में सहयोगी बनाया। वे देव भी धन्य हैं जो संयम से तो विमुख रहते हैं, परन्तु शरीर में रहकर भी शरीरातीत आत्मा की बात तो करते हैं। प्रतिक्षण होने वाली इस घटना को या तो वे ही जानते हैं अथवा भगवान् जानते हैं। संसारी प्राणी को ये ज्ञात नहीं हो सकता।” आत्मा की चर्चा मात्र करने वालों के उत्साह उल्लास को भी जब हम शब्दों से नहीं कह सकते तो आत्मानुभूति करने वालों के उत्साह को तो हम बुद्धि द्वारा सोच भी नहीं सकते।”
आचार्य कुन्दकुन्दस्वामी जी कहते हैं- “णवरि ण सुलहो विहत्तस्स ।“- (समयसार ४),
“अज्जवि तियरणसुद्धो” (पंचास्तिकाय टीका में उद्धृत) आज भी साधक रत्नत्रय का पालन करके स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त करके अथवा लौकान्तिक देव बनकर रत्नत्रय की आराधना का फल प्राप्त कर सकते हैं उसके पश्चात् वहाँ से च्युत होकर मनुष्य जन्म पाकर मुक्ति प्राप्ति के भाजक बन सकते हैं। ऐसी भूमिका मनुष्य जीवन द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। अतः जीव का उपकारक यह रत्नत्रय धारक शरीर भी हो सकता है। और यदि इस शरीर के द्वारा विषयों में रमण होगा तो यही आत्मा का अपकारक हो जाता है। फलतः यह आत्मा इस शरीर रूपी कावड़िया को लेकर घूमता रहता है। कावड़िया को जानते हो ? कन्धे के ऊपर रखी जाती है, एक तरफ दो घड़े और दूसरी ओर भी दो घड़े भरकर रख लेते हैं, फिर उसे कंधे के ऊपर रखकर चले जाते हैं। उसी प्रकार यह संसारी प्राणी शरीर रूपी कावड़िया में कर्म रूपी घड़े को रखकर घूमता रहता है।
अनन्त काल से इसी प्रकार की यात्रा हो रही है, अतः सोचो विचार करो कि तीन लोक में अपने ऊपर उपकार करने वाला कौन है? रत्नत्रय उपकारक है और उसका सहायक रत्नत्रय धारक यह शरीर भी उपकारक सिद्ध हो जाता है। इसी दृष्टि से आगम में इसको पवित्र, पूज्य और उपकारक कहा है। आचार्य समन्तभद्रस्वामी ने रत्नकण्डक श्रावकाचार ग्रन्थ में लिया है-
स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रिते। १३।
मोक्षमार्ग में उपकरणों का कथन करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने जिनलिंग को भी उपकरण कहा है, जो यथाजात रूप है। इसे प्रथम उपकरण माना है। फिर ‘गुरुवयणं’ गुरु के वचनों को, उनकी आज्ञा को भी उपकरण कहा है। “विणयं और सुत्तज्झयणं” को भी उपकरण कहा है। विनय को मोक्ष का द्वार भी कहा है। श्रुत का अध्ययन भी उपकरण है, ये सभी जीव के उपकारक हैं। भले ही देह के अपकारक हों। सम्यग्दृष्टि जीव शरीर का नहीं किन्तु जीव का उपकार करना चाहता है। अतः जीव के उपकारक जो पदार्थ हैं उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करता रहता है। तभी मंजिल को प्राप्त कर पाता है। अतः यही शरीर जीव का उपकारक और अपकारक सिद्ध हो सकता है। हमें इस शरीर को जीव का उपकारक बनाने का ही प्रयास करना चाहिए।
इष्टोपदेश गाथा 19 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (यत् जीवस्य) जो कार्य आत्मा का (उपकाराय) उपकार करने वाला है (तत् देहस्य) वह शरीर का (अपकारकम् ) अपकार करने वाला है, तथा (यत्) जो (देहस्य उपकाराय) शरीर का उपकार करने वाला है (तत्) वह (जीवस्य अपकारकम्) आत्मा का अपकार करने वाला है।
भावार्थ – शरीर जड़ है, मूर्तिक है, विनश्वर है और आत्मा ज्ञान दर्शनमय चेतन है, अमूर्तिक है, अविनाशी है इस तरह दोनों परस्पर में एक दूसरे के विरोधी हैं, तदनुसार जिस बात से शरीर का भला होता है, उससे आत्मा का बुरा होता है और जिस कार्य से आत्मा का कल्याण होता है उससे शरीर की हानि होती है, शरीर को खूब खिलाने पिलाने, विषय भोगों में रमाने से सुख, शान्ति, पुष्टि होती है। किन्तु आत्मा को इससे नरक आदि दुर्गति में जाना पड़ता है। आत्मा को सामायिक, स्वाध्याय, व्रत, तप, संयम द्वारा कर्मक्षय करने पर केवलज्ञान, अनन्त सुख आदि मिलता है। परन्तु व्रत, संयम आदि करने से शरीर निर्बल, क्षीण होता है ।
उत्थानिका – जो इस लोक सम्बन्धी फल है या जो कुछ परलोक सम्बन्धी फल है, उन दोनों ही फलों का प्रधान कारण ध्यान ही है। मतलब यह है कि ‘झाणस्स ण दुल्लहं किंपि’ ध्यान से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, ध्यान से सब कुछ मिल सकता है। इस विषय में आचार्य निषेध करते हैं, कि ध्यान के द्वारा काय के उपकार का चिन्तन नहीं करना चाहिए।
स्वाध्याय गाथा सं 17 to 19
स्वाध्याय गाथा सं 19 & 20
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 | गाथा 11 | गाथा 12 | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15 | गाथा 16 | गाथा 17 | गाथा 18 | गाथा 19 | गाथा 20 | गाथा 21
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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