आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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गाथा 7
उत्थानिका-आगे आचार्य कहते हैं कि मोह से ढका हुआ ज्ञान स्वभाव की प्राप्ति नहीं करा सकता। अर्थात् स्वभाव की प्राप्ति हेतु मोह से प्रभावित ज्ञान कार्यकारी नहीं होता –
मोहेन संवृतं ज्ञानं, स्वभावं लभते न हि मत्त: पुमान् पदार्थानां यथा मदन-कोद्रवै: ॥7॥
अन्वयार्थ – (मोहेन) मोह से (संवृतं ज्ञानं) ढका हुआ ज्ञान (स्वभावं) आत्म स्वभाव को (न हि लभते) नहीं जान पाता (यथा) जैसे (मदनकोद्रवैः) नशीले कोदों के खा लेने से (मत्तः पुमान्) मूर्च्छित/बेखबर मनुष्य (पदार्थानां) पदार्थों को ठीक तरह नहीं जान पाता।
पुरुष यहाँ उन्मत्त बना हो, जिसने मदिरापान किया,
निज-का पर-का हिताहितों का, उसे कहाँ? हो ज्ञान जिया।
मोह-भाव से घिरा हुआ यदि, जिसका भी वह ज्ञान रहा,
स्वभाव को फिर नहीं जानता, यथार्थ में अज्ञान रहा ॥७॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 7
विवेचना
जीव का ज्ञान मोह से ढका हुआ है, ऐसा कहने का मतलब यह नहीं है कि नीचे कोई पदार्थ है और ऊपर कोई दूसरा पदार्थ लाकर ढक दिया हो। ‘संवृत’ का अर्थ ढका हुआ तो होता है, पर वहाँ ऐसा अर्थ नहीं लेना, किन्तु यहाँ उसका अर्थ है कि मोह के द्वारा स्वभाव का विभाव रूप से परिवर्तित हो जाना। स्वभाव नीचे सुरक्षित है, ऊपर से मोह चादर की भाँति डला हो, ऐसा समझना ठीक नहीं है। मोह से संवृत ज्ञान का अर्थ है-ज्ञान का मलिन हो जाना, विकृत हो जाना, मिथ्या हो जाना। जैसे कोई व्यक्ति शराब पी लेता है तो उसकी बुद्धि उलट जाती है। वह डॉक्टर भी क्यों न हो, अपना कार्य करने में सफल नहीं हो पाता। एल० एल० बी० करने वाले भी अपना कार्य ठीक से नहीं कर पायेंगे, उस समय जबकि उनका ज्ञान शराब के नशे से प्रभावित है तब। शराब पीने के उपरान्त जैसे लौकिक ज्ञान की यह दशा हो जाती है उसी प्रकार मोह रूपी मदिरा पीने के उपरान्त ज्ञान विकृत हो जाता है फलतः स्व क्या है? पर क्या है? हित किसमें निहित है? अहित किसमें ? इसका उसे तिल मात्र भी ज्ञान नहीं होता। एक बार मदिरापान करने पर घण्टों तक उसका प्रभाव बना रहता है और यदि मदिरापान निरंतर करता चला जाये तो उसका प्रभाव कभी भी समाप्त नहीं होता। मोह की मदिरा एक बार भी पी लेता है तो सागरोपम काल तक भी उसका प्रभाव बना रहता है। ज्यों का त्यों बना रहता है। सोचने की बात है कि हम सुख चाहते हैं, आनन्द चाहते हैं, लेकिन यदि हम मोह मदिरा का सेवन करना नहीं छोड़ेंगे तो ऐसी दशा में हमारा ज्ञान केवलज्ञान को कैसे प्राप्त कर सकेगा ? तीन काल में भी संभव नहीं।
उदाहरण के तौर पर देखो! लक्ष्मण का अवसान हो चुका फिर भी मोह के कारण राम, लक्ष्मण को नहीं छोड़ पाये। लोगों ने बार-बार उपदेश को देकर समझाने का प्रयास किया फिर भी मोह के कारण लोगों को कैसे-कैसे उत्तर देकर हटाते रहे। जब मोह का नशा कम हो गया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वस्तुतः लक्ष्मण का तो अवसान हो चुका है। तब समझ में आया कि मोह की कैसी महिमा है। रामचन्द्र जी सोचे कि अच्छी-अच्छी नीति की बात करने वाले आये, मुझे सही बात समझाने के लिए, पर मैंने तो सभी को यद्वा तद्वा कुछ भी कहकर विदाकर दिया।
दूसरी ओर देखें, युग के आदि में, तो उस समय भी भरत चक्रवर्ती और बाहुबली दोनों ही तद्भव मोक्षगामी थे। दोनों सर्वार्थसिद्धि से अवतरित हुए। दोनों आपस में सगे भाई। तीर्थंकर जैसे महापुरुष जिनके पिता। दोनों के ऊपर राज्य सत्ता का भार था। जनता भी अपनी सुख शांति हेतु उनकी सेवा में संलग्न थी। फिर भी ऐसी घटना घटी। यदि आज के युग में वैसी घटना घट जाये तो सारा का सारा युग ही क्षुब्ध हो जाये क्योंकि भरत तो चक्रवर्ती माने जाते थे, उन्हें “मैं चक्रवर्ती हूँ मेरी सभी लोग बात मानते हैं” ऐसा मोह था, अहंकार था। लेकिन मेरा भाई बाहुबली मेरे कहे अनुसार बात क्यों नहीं मानता ? कैसा है मेरा छोटा भाई? यह छोटा होकर भी मेरे साथ लड़ना चाहता है। अब इसके साथ और कोई चारा भी नहीं है। युद्ध करने बैंक को तैयार हो जाता है। समझदार लोग उन्हें देखकर कहते हैं कि यह सब क्या हो रहा है? ये भाई-भाई क्या रहे हैं? ये युद्ध लड़ेंगे तो दोनों के बीच विजयी कौन होगा ? दोनों के बीच युद्ध की तैयारी होने लगी युद्ध में दोनों का तो कुछ नहीं होगा, लेकिन सेना लड़ेगी तो सेना का तो निश्चित विनाश होगा। अतः उन दोनों के बीच समझदार लोगों ने सलाह दी कि तुम दोनों धर्मयुद्ध करो। व्यर्थ में सेना विनाश के कारणभूत युद्ध को मत करो। दोनों ने सलाह को स्वीकार किया कि बिलकुल ठीक है, हमें मंजूर है आप लोगों की बात। धर्मयुद्ध नियुक्त किये गये। दोनों पक्ष तैयार हुए। युद्ध चालू हो गया। तीन प्रकार के युद्ध निश्चित किये गये। तीनों युद्धों में भरत चक्रवर्ती हार जाते हैं। अब क्या! कोई रास्ता नहीं रहा ? चक्रवर्ती के क्रोध का पारा चढ़ गया। “छोटे भाई से मैं हार गया” मैं तो चक्रवर्ती, छहखण्ड जीतकर आया और अपने भाई से हार गया, लोग क्या कहेंगे ? यह मेरे लिए शोभा की बात नहीं है। जब तक भाई को नहीं जीतूंगा, तब तक चक्रवर्ती नहीं कहलाऊँगा। ऐसा सोचते हैं कि आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है, भाई नहीं मान रहा है तो उस पर चक्ररत्न चलाऊँगा। अव चक्ररत्न से भी क्या होगा उसने ऐसा कुछ भी विचार नहीं किया। युग के आदि में सीमा का उल्लंघन किया और बाहुबली ने भी सामना करने की ठान ली। यह सब मोह के कारण हुआ। चक्र चलाया गया, चक्र बाहुबली के पास तक आया और परिक्र मा देकर पुनः चक्रवर्ती की ओर चला गया। अब चक्रवर्ती को लगा कि यह मेरी चौथी बार हार हो गई। यह हुण्डावसर्पिणी काल की देन है। इस काल में ऐसे कार्य होते हुए देखने में आते हैं, जिनके बारे में कल्पना भी नहीं होती है। अब क्या करें ? दोनों के पास अवधिज्ञान था, उसका प्रयोग दोनों में से किसी ने भी नहीं किया। यदि लक्ष्मण को नहीं छोड़ पाये। लोगों ने बार-बार उपदेश को देकर समझाने का प्रयास किया फिर भी मोह के कारण लोगों को कैसे-कैसे उत्तर देकर हटाते रहे। जब मोह का नशा कम हो गया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वस्तुतः लक्ष्मण का तो अवसान हो चुका है। तब समझ में आया कि मोह की कैसी महिमा है। रामचन्द्र जी सोचे कि अच्छी-अच्छी नीति की बात करने वाले आये, मुझे सही बात समझाने के लिए, पर मैंने तो सभी को यद्वा तद्वा कुछ भी कहकर विदाकर दिया।
दूसरी ओर देखें, युग के आदि में, तो उस समय भी भरत चक्रवर्ती और बाहुबली दोनों ही तद्भव मोक्षगामी थे। दोनों सर्वार्थसिद्धि से अवतरित हुए। दोनों आपस में सगे भाई। तीर्थंकर जैसे महापुरुष जिनके पिता। दोनों के ऊपर राज्य सत्ता का भार था। जनता भी अपनी सुख शांति हेतु उनकी सेवा में संलग्न थी। फिर भी ऐसी घटना घटी। यदि आज के युग में वैसी घटना घट जाये तो सारा का सारा युग ही क्षुब्ध हो जाये क्योंकि भरत तो चक्रवर्ती माने जाते थे, उन्हें “मैं चक्रवर्ती हूँ मेरी सभी लोग बात मानते हैं” ऐसा मोह था, अहंकार था। लेकिन मेरा भाई बाहुबली मेरे कहे अनुसार बात क्यों नहीं मानता ? कैसा है मेरा छोटा भाई? यह छोटा होकर भी मेरे साथ लड़ना चाहता है। अब इसके साथ और कोई चारा भी नहीं है। युद्ध करने बैंक को तैयार हो जाता है। समझदार लोग उन्हें देखकर कहते हैं कि यह सब क्या हो रहा है? ये भाई-भाई क्या रहे हैं? ये युद्ध लड़ेंगे तो दोनों के बीच विजयी कौन होगा ? दोनों के बीच युद्ध की तैयारी होने लगी युद्ध में दोनों का तो कुछ नहीं होगा, लेकिन सेना लड़ेगी तो सेना का तो निश्चित विनाश होगा। अतः उन दोनों के बीच समझदार लोगों ने सलाह दी कि तुम दोनों धर्मयुद्ध करो। व्यर्थ में सेना विनाश के कारणभूत युद्ध को मत करो। दोनों ने सलाह को स्वीकार किया कि बिलकुल ठीक है, हमें मंजूर है आप लोगों की बात। धर्मयुद्ध नियुक्त किये गये। दोनों पक्ष तैयार हुए। युद्ध चालू हो गया। तीन प्रकार के युद्ध निश्चित किये गये। तीनों युद्धों में भरत चक्रवर्ती हार जाते हैं। अब क्या! कोई रास्ता नहीं रहा ? चक्रवर्ती के क्रोध का पारा चढ़ गया। “छोटे भाई से मैं हार गया” मैं तो चक्रवर्ती, छहखण्ड जीतकर आया और अपने भाई से हार गया, लोग क्या कहेंगे ? यह मेरे लिए शोभा की बात नहीं है। जब तक भाई को नहीं जीतूंगा, तब तक चक्रवर्ती नहीं कहलाऊँगा। ऐसा सोचते हैं कि आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है, भाई नहीं मान रहा है तो उस पर चक्ररत्न चलाऊँगा। अव चक्ररत्न से भी क्या होगा उसने ऐसा कुछ भी विचार नहीं किया। युग के आदि में सीमा का उल्लंघन किया और बाहुबली ने भी सामना करने की ठान ली। यह सब मोह के कारण हुआ। चक्र चलाया गया, चक्र बाहुबली के पास तक आया और परिक्र मा देकर पुनः चक्रवर्ती की ओर चला गया। अब चक्रवर्ती को लगा कि यह मेरी चौथी बार हार हो गई। यह हुण्डावसर्पिणी काल की देन है। इस काल में ऐसे कार्य होते हुए देखने में आते हैं, जिनके बारे में कल्पना भी नहीं होती है। अब क्या करें ? दोनों के पास अवधिज्ञान था, उसका प्रयोग दोनों में से किसी ने भी नहीं किया। यदि
अवधिज्ञान का प्रयोग करते तो भी हो सकता है कि वे यह जान नहीं पाते, क्योंकि जब ज्ञान मोह से संवृत होता है, प्रभावित होता है तब ज्ञान भी जानने में सफल नहीं हो पाता। साधक का मोह जब उपशमित होता है, तब ज्ञान कार्य कर सकता है। क्रोध का पारा उतरना आवश्यक होता है, तभी कार्य की निष्पत्ति हो सकती है, यह सिद्धान्त है। मोह के कारण चक्रवर्ती के दिमाग में भी यह बात नहीं आयी, कि युद्ध होगा तो हार किसकी होगी? बाहुबली पर चक्र का प्रभाव नहीं पड़ेगा, वंश के ऊपर नहीं पड़ता, वंश पर चक्र अपना प्रभाव नहीं डाल सकता।
कोई प्रश्न करे कि दोनों का ज्ञान काम क्यों नहीं कर पाया ? इसका एक ही समाधान है ‘मोहेन संवृतं’। मोह से आवृत होने के कारण ज्ञान वास्तविक तथ्य को नहीं जान पाता। जब तीव्र कषाय का उदय होता है तो क्षायिक सम्यग्दृष्टि भी क्यों न हो, महापुरुष भी हो, अवधिज्ञानी हो तो भी उनका ज्ञान व्यर्थ हो जाता है, फिर हम और आप तो किस खेत की मूली हैं? चक्रवर्ती ने मर्यादा का उल्लंघन किया। तीन-तीन युद्धों में हारने के बाद भी भाई पर चक्र चलाया। उन्हें सोचना तो चाहिए था कि जो व्यक्ति मुझे तीन युद्धों में हरा चुका, उस पर यह मेरा चक्र कैसे प्रभाव दिखायेगा? मेरा पुण्य क्षीण हो गया। उसका पुण्य इतना तीव्र है कि चक्र भी वापस आ गया। यह बात उनके दिमाग में क्यों नहीं आई? इसका एक ही कारण है मोह का तीव्र उदय, कषाय की उत्तेजित अवस्था का होना। उत्तेजित कषाय को शान्त करने का और कोई रास्ता नहीं है। उसके लिए सिर्फ शांति और संयम से बैठना पड़ता है। मोह की बाढ़ आती है तो बड़े-बड़े व्यक्तियों के दिमाग की बिजली गुम हो जाती है। तथा जब मोह शान्त हो जाता है तो छोटे-छोटे व्यक्ति भी बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं। इसका छोटे और बड़े व्यक्तियों से कोई मतलब नहीं है, किन्तु मतलब तो ज्ञान से है। किसी भी कार्य में असावधानी होना, यह मोह से, प्रमाद से प्रभावित ज्ञान का परिणाम होता है और कोई भी कार्य सावधानी से हो रहा है तो यह प्रमादरहित ज्ञान का परिणाम मानना चाहिए। उदाहरण के तौर पर समझ सकते हैं कि-
लड़के को भूख लगी है तो वह माँ से कहता है-माँ! मुझे बहुत तेजी से भूख लगी है। माँ कहती है-बेटा! खीर बन गई है। बेटा कहता है-तो मुझे जल्दी परोस दो। माँ कहती है-बेटा! अभी थोड़ी देर बैठ जाओ, हाथ-मुँह धोकर के आओ। हाथ-पैर को धोकर ही आया हूँ, आप तो जल्दी- जल्दी परोस दो। माँ खीर परोस देती है, पर माँ कहती है-बेटा अभी रुको, जल्दी-जल्दी मत खाओ, अभी नहीं। बेटा कहता है-माँ! मना क्यों कर रही हो? खाने के लिए ही तो खीर बनाई है ना! हाँ बेटा, खाने के लिए ही बनाई है। तो फिर मना क्यों करती हो ? गुस्सा होकर कहता है-हमें नहीं खाना, लो तुम्हीं खा लेना। फिर भी माँ की ममता कहती है-बेटा! खीर खाने को मना नहीं कर रही हूँ, थोड़ी देर से खाना। थोड़ी ठण्डी होने पर खाना। बेटे को बात समझ में आती है वह सावधानी से किनारे-किनारे से खीर ठण्डी करके खाना प्रारम्भ करता है, क्योंकि यदि गरम-गरम खीर खाता तो अतिक्रमण स्वरूप हाथ-मुँह जल जाता और दुःखी हो जाता। अतः माँ जैसा कहती है वैसा मानकर बेटा खीर का सेवन करके खुश हो जाता है।
इसी प्रकार संसारी प्राणी का ज्ञान जब तीव्र मोह से प्रभावित होता है तो वह जिनवाणी माँ का सम्बोधन सुनना भी पसंद नहीं करता। बल्कि वह जिनवचनामृत को भी कड़वी घूँट कहकर पीने से निषेध करता है, क्योंकि मोह से संवृत ज्ञान होने के कारण उसे हित समझ में नहीं आता। जब तक प्राणी मोह कर्म से बंधा है और उदय से जीवन प्रभावित रहता है, तब तक उसे अपना हित समझ में आ ही नहीं सकता, लेकिन जब ज्ञान तीव्र मोह से प्रभावित नहीं होता या मोह का प्रभाव कम होता है तब उसे इतना समझ में आता है कि मेरा हित मेरी ही गलतियों के कारण नहीं हो पाया। जो कुछ भी दुःख, कष्ट, अशांति हो रही है, यह सब मेरी ही असावधानी का परिणाम है। उसी का प्रतिफल मुझे भोगना पड़ रहा है। इस प्रकार कड़वी घूँट को भी पीना स्वीकार करता है, जिसके परिणाम स्वरूप भीतर की तीव्र कषाय का ज्वर बाहर निकल आता है।
मोहावृत बुद्धि के सैकड़ों उदाहरण देखने को मिलते हैं। मोह के कारण बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। बड़े-बड़े व्यक्तियों के द्वारा भी अनर्थ हो जाते हैं। चूँकि मोह का प्रभाव रहता है। इस स्थिति में क्या करें, जिससे मोह का प्रभाव कम हो सके? आचार्य कहते हैं कि केवल संयम रखना आवश्यक है। मोह के कारण सीतारानी, राम, पाण्डव आदि के सामने समस्या आयी। मोह के कारण भरत चक्रवर्ती को समस्या का समाधान समझ में नहीं आया। पर बाहुबली को समझ में आ गया। ‘ओ…हो’ राज्य के लिए ऐसी घटना घटित हो सकती है? मोह के कारण संसारी प्राणी पंचेन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करता चला जाता है। भाई-भाई के बीच में ही नहीं, पिता-पुत्र के बीच में भी संघर्ष हो जाते हैं। ऐसा क्यों? ऐसा ही होता है मोह के कारण। न भाई दिखता है, न पिता दिखता है, अंधा हो जाता है, आँखों से कुछ भी नहीं दिखता। बस वही वस्तु दिखाती है जो चाहिए अन्य सभी वस्तुयें दिखती ही नहीं हैं, क्योंकि उसे उनसे कोई मतलब नहीं रहा। वास्तविक तथ्य को भी वह नहीं समझ पाता। इसीलिए “मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि” कहा है।
अपने आपको भुलाने वाला मोह ही है, दूसरा कोई नहीं। मोह रूपी मदिरा के नशे के कारण यह भूल हो रही है। अब पुनः भूल न हो, इसीलिए शांति के साथ संयम धारण करना चाहिए। पञ्चेन्द्रिय के विषयों की कभी पूर्ति नहीं हो सकती। उसके द्वारा हमारी तृष्णा कभी समाप्त नहीं हो सकती, किन्तु तृष्णा दुगुनी ही होती जाती है। ” खारा पानी पीने से कभी प्यास बुझती ही नहीं” यह कहावत है। लवण मिश्रित पानी से पेट तो भर जायेगा, प्यास भी बुझी जैसी लगेगी, लेकिन पाँच मिनट बाद पुनः तीव्र वेदना होना प्रारम्भ हो जाती है, कण्ठ सूखने लगता है। उसी प्रकार आप पंचेन्द्रिय के विषयों से तृष्णा की लालसा को समाप्त करना चाहोगे तो वह तीन काल में संभव नहीं। वह तो अग्नि को बुझाने के लिए तेल, घी और ईंधन के समान है। जिससे अग्नि बुझती नहीं, किन्तु और अधिक भभकती है। “सागर में कितनी भी नदियाँ मिल जायें लेकिन वह कभी तृप्ति का अनुभव नहीं करता, एक इंच भी नहीं बढ़ता। बढ़ भी जाये यह संभव है, ईंधन से अग्नि बुझ जाये यह भी संभव है, लेकिन पंचेन्द्रिय के विषयों द्वारा मोह का गर्त, तृष्णा का गर्त कभी भरा नहीं जा सकता।” कहा भी है-पूजन में भी आप पढ़ते हैं कि-
“तृष्णा की खाई खूब भरी पर रिक्त रही वह रिक्त रही।” युगल
तृष्णा की खाई भरने की दिन रात बहुत चेष्टा की पर रिक्त रही वह रिक्त रही। तीन लोक की सम्पदा से भी वह भर नहीं सकती। पंचेन्द्रिय के विषयों की यह कथा है, इसकी कोई सीमा नहीं। इन विषयों की कथा अनन्त काल की है, आज भी है, आगे भी रहेगी। जो व्यक्ति इस मोह को समाप्त करना चाहता है उसे हाथ में संयम की खड्ग लेना अनिवार्य है उसके बिना मोह जाने वाला नहीं है और मोह के नष्ट हुए बिना साधक कैवल्य की प्राप्ति नहीं कर सकता। यही सार है कि मोह को समाप्त करो, अन्यथा विषयों की लालसा से कभी तृप्ति होने वाली नहीं है। इसे गाँठ बाँधकर रख लीजिए। सब लोग विषय सामग्री को इकट्ठा कर रहे हैं, इसलिए हमको करना पड़ रहा है। नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे कि देखो यह कैसा पागल है? पैसा मिल रहा है, मिल सकता है फिर भी ले नहीं रहा है, यह तो पागल हो गया है। क्योंकि कहते हैं कि दो ही व्यक्ति पैसा नहीं लेते- “एक भगवान् और एक पागल”।
जितने भी पुराणपुरुष हुए हैं उनको भी अनाप-शनाप बहुत वैभव मिला। जिसका कोई पार नहीं रहा। कहाँ तक उनकी धरती है? समुद्र को भी पार कर गई, ऐसे चक्रवर्ती जो षट्खण्डाधिपति, त्रिलोकाधिपति-तीर्थंकर आदि भी इन विषय भोगों से संतुष्ट नहीं हुए। फिर हमारी और आपकी तृप्ति तो त्रिकाल संभव है ही नहीं।
जो संसारविषै सुख हो तो तीर्थंकर क्यों त्यागै ॥ ८॥ वैराग्यभावना
आप कौन से तीर्थंकर हैं बताओ? कुछ नहीं। वस्तुतः हमारा मोह से संवृतज्ञान ही हमें सता रहा है। उन समस्त महापुरुषों ने सोचा, समझा, चिन्तन किया। ज्ञान से मोह के प्रभाव को दूर किया और विचार किया कि इस धरती के अनन्त मालिक हो चुके हैं। तीर्थंकर भी अनन्त हो चुके, चक्रवर्ती भी अनन्त हो चुके, उन सभी ने सोचा कि जो कुछ है सब कुछ मायामय है, इन्द्रजाल है। इन्द्रियसुख भी मृग मरीचिकामय हैं, इनके ऊपर हमारा अधिकार नहीं हो सकता। ऐसा दृढ़ निश्चय कर सब कुछ छोड़कर चले गये और संसार से मुख मोड़ लिया। शांति का अनुभव किया, संयम की साधना की, फलतः ज्ञात हुआ कि यह सब पर द्रव्य है, मेरा नहीं हो सकता। अध्यात्म तो यहाँ तक कहता है कि जब आत्मा इनको ग्रहण नहीं कर सकता, तो छोड़ने की कोई बात ही नहीं है। लेकिन मोह के प्रभाव से यह अध्यात्म समझ में नहीं आ पाता। सब कुछ छोड़ने वालों के पास आकर कई लोग पूछते हैं कि आपने सारा का सारा छोड़ दिया, अब कैसा अनुभव हो रहा है? सुख का या दुःख का ? समाधान मिलता है कि दुःख का अनुभव नहीं हो रहा है। हम तो बस इतना ही जानते हैं और आपको भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि दुःख उत्पादक सामग्री से मुख मोड़ लो, यही सुख का मार्ग है। यही मोक्ष का मार्ग है अन्य कोई मार्ग नहीं। अपने यहाँ मोक्ष का मार्ग मुड़ने रूप है, केवल ग्रहण करने या छोड़ने रूप नहीं है। कहाँ-कहाँ से मुड़ना है? जहाँ-जहाँ से जुड़े थे वहाँ-वहाँ से मुड़ना है। जिसको ग्रहण करने के भाव किये थे, उनसे दृष्टि को फेर लेना। यही मोक्षमार्ग है मात्र आँख मींचने से हम मोक्षमार्ग में स्थित हो गये, ऐसा नहीं समझना और आँख खोलने मात्र से हम संसार में घुस गये ऐसा भी नहीं समझना। आँख को खोलना और बन्द करना यह तो शरीर की क्रिया है, इस क्रिया मात्र से संसार में प्रवेश या मोक्षमार्ग में प्रवेश हो गया ऐसा नहीं सोचना चाहिए। ऐसी धारणा भी नहीं बनाना चाहिए बल्कि यह सोचना चाहिए कि इन विषयों को मैं कैसे ग्रहण कर सकता हूँ ? ये मेरे हैं ही नहीं। मुझे इनसे सुख मिलेगा नहीं, मिल सकता नहीं तो मैं इनको ग्रहण क्यों करूँ। इनके माध्यम से तो संकल्प-विकल्प होते हैं, इनसे कर्मों का बन्ध होता है, यह सब मोह के द्वारा ही होता है।
मोह के चक्कर से छूटने के लिए बहुत पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। पुरुषार्थ में भी कोई पहलवानी की आवश्यकता नहीं। यहाँ तो केवल बुद्धि का प्रयोग करना है। मोह से रहित और पंचेन्द्रिय-विषयों से दूर होने का नाम मोक्षमार्ग है। फिर क्या ग्रहण करना? आप पूछेंगे तो आचार्य कहते हैं कि-ग्रहण कुछ भी नहीं करना। संसार में कुछ ऐसा है ही नहीं जिसे ग्रहण करने का मन बनाया जाये। फिर भी अनन्तकाल से मोह से प्रभावित होने के कारण विषयों को ग्रहण किया और उनमें सुख माना है। अनन्तकाल से इस एक ही कार्य को करने का प्रयास किया है, लेकिन वह भी पूर्ण नहीं हुआ। भोजन करने के उपरान्त लगता है, कि अब हमने भूख पर विजय प्राप्त कर ली। अब भूख नहीं लगेगी लेकिन २-४ घंटे बाद ही फिर भूख का अहसास होने लगता है। सुबह भोजन किया तो शाम को पुनः भोजन की आवश्यकता होती है। इस प्रकार करते-करते अनन्तकाल व्यतीत हो गया पर तृप्ति का कोई ठिकाना नहीं।
“मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि” यदि स्वभाव की प्राप्ति करना चाहते हो तो संयम का आश्रय लेना होगा। पर की ओर देखने की जो इच्छा है उसे नियंत्रित करना होगा। दूसरा अपने आपको देखने का प्रयास नहीं कर रहा है, इसलिए हम भी क्यों करें? ऐसा सोचना उचित नहीं है। मोह से संवृत ज्ञान अपने आपको देखने का स्वयं प्रयास नहीं करता। यदि दूसरा कोई प्रयास करता भी है तो उसे धन्यवाद भी नहीं दे पाता। मोह के कारण निर्मोहपने का अनुभव नहीं हो पाता। संयम की महिमा से संवृत ज्ञान का आवरण हट सकता है, अन्य किसी प्रकार संभव नहीं, अतः संयम धारण करो।
वह ज्ञान धन्य है। वह घड़ी धन्य है! वह ज्ञानी धन्य है। जिसका ज्ञान भी दर्पण के समान निरीह और निर्विकार बना रहता है। ज्ञान के द्वारा वस्तु को मात्र जानता है, उसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता। वस्तु के वियोग में दुःख का अनुभव नहीं करता। धन्य है वह ज्ञान ! धन्य है वह ज्ञानी ! जिसने अपने आपको पा लिया और संसार को पाने की इच्छा को छोड़ दिया।
संसारी जीव को संसार के दुःखों का अनुभव अनन्तकाल से होता आया है यह महा-मोह का परिणाम है। मोह ने जीव के ज्ञान को नशे में कर रखा है। फलतः वह परद्रव्य को अपना मानता है। वह माँ को बहिन और बहिन को माँ कहता है, कभी-कभी माँ को माँ और बहिन को वहिन भी कहता है, लेकिन उसे निर्णय नहीं रहता कि किसको क्या कह रहा है। उसे भेदविज्ञान नहीं रहता। जैसे कोई शराब के नशे में डूबा शराबी। मोह के कारण ही हम अपने आपको अपना नहीं पा रहे हैं और जो अपना नहीं है उसे दिन-रात अपनाते चले जा रहे हैं। दादा को चिन्ता है नाती की। पिता को चिन्ता है पुत्र की। माँ को चिन्ता है बेटी की। सबको एक दूसरे की चिन्ता है, अपनी चिन्ता किसी को भी नहीं है।
महाराज ! अपनी चिन्ता क्यों करें? आचार्य उमास्वामी महाराज ने स्वयं तत्त्वार्थसूत्र में सूत्र लिखा है-
“परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ ५/२१ ॥”
इसका अर्थ मोही प्राणी ऐसा करता है कि एक-दूसरे की चिंता करो। हाँ नाती का उपकार करो, नाती आपका उपकार करे। यह तो कहा है लेकिन उसी की चिंता में, करोड़ों रुपये एकत्रित करने में दिन-रात लगे रहने को नहीं कहा है। मैं चला जाऊँगा तो नाती का क्या होगा ? यही चिंता सताती रहती है। अड़ोसी-पड़ोसी नाती की ओर देखते तक नहीं। उसका कोई ख्याल नहीं करते। इसलिए जब तक मैं हूँ इसको हरा-भरा बनाये रखूँ। इसके उपरान्त कौन क्या करेगा, क्या पता ? सौ साल के वृद्ध होने पर भी नाती की चिन्ता करते हैं, अपनी चिन्ता नहीं करते।
धन्य हैं, वे जो संसार के रहस्य को जान गये और वे भी धन्य हैं जो जानने के प्रयास में जागृत हो गये। मोही प्राणी तो मोह की नींद में सोया रहता है। उसे जगाना बड़ा कठिन है। सोने वाले को फिर भी जगा सकते हैं लेकिन जो सोने का बहाना करके सोया है, उसे जगाना अत्यन्त कठिन है। जगे को जगाने की कोई आवश्यकता ही नहीं। तीर्थंकर जब दीक्षित होते हैं तब वे स्वयं दीक्षित होते हैं। उनके साथ हजारों राजा-महाराजा दीक्षित हो जाते हैं, लेकिन तीर्थंकर उनकी तरफ देखते तक नहीं। ऐसा क्यों? वे अपना कार्य करते हैं, दूसरों की चिन्ता नहीं करते। हाँ कोई उन्हें देखकर अपना कार्य कर ले यह अलग बात है। पूर्व में लोक-कल्याण की भावना करते ही हैं, उसी के फलस्वरूप तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। तीर्थंकर लोककल्याण की भावना भाते हैं और आप चिन्ता करते हैं। आपमें और तीर्थंकर में यही बड़ा अन्तर है।
मोह के कारण माँ-पिता सोचते हैं कि यह मेरा बेटा, जल्दी-जल्दी बड़ा हो जाये, दस से बीस साल का हो जाये। माँ पिता की सोच पर बेटा कहता है कि माँ मैं दस साल के भीतर बीस साल का कैसे हो जाऊँगा ? फिर भी माँ सोचती है कि नहीं, मेरा बेटा तो जल्दी-जल्दी बड़ा हो जायेगा। मेरा बेटा होशियार हो जाये नादान है इसे ज्ञान प्राप्त हो जाये। आपका सोचना बिल्कुल ठीक है परन्तु ज्ञान कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि एक डिबिया से निकालकर दूसरी डिबिया में रख दी जाये। एक का ज्ञान दूसरे में फिट कर दिया जाये। आजकल जैसे ऑपरेशन होता है-एक की आँख दूसरे के लिए फिट कर दी जाती है। आँख का दान तो फिर भी संभव है लेकिन ज्ञान का इस प्रकार लेन-देन नहीं हो सकता। मोह के कारण ऐसा सोचा जाता है। सभी लोग इस प्रकार एक दूसरे के उपकार के प्रति भावना करें, करना ही चाहिए; लेकिन वह भी एक सीमा तक रहना चाहिए। अन्यथा हम एक-दूसरे के अहित का अपराध भी कर सकते हैं। मोह के कारण सब कुछ संभव है। मोही व्यक्ति, शराबी व्यक्ति के समान वस्तु स्थिति को पहचान नहीं पाता। दुनिया में कितना भी महान् पुरुषार्थ किया जाये लेकिन यदि मोह से प्रभावित पुरुषार्थ है तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। दुनिया को जानना कोई जानना नहीं माना जाता किन्तु अपने आपको जानना सही जानना माना जाता है। दुनिया में किसी को भी अपना सही परिचय नहीं है। सब एक-दूसरे का परिचय पाने में लगे हैं। सबको सबका पता है लेकिन अपने आपके क्षेत्र में लापता हैं। आप कौन हो? कहाँ से आये हो ? क्या गुण-धर्म है? आपको कुछ नहीं पता। दूसरों के बारे में कुछ पूछो तो खूब लम्बी तालिका बनाकर दे देते हैं। इसमें तो सभी स्पेशलिस्ट हैं लेकिन ये सभी अज्ञानी हैं, मोही हैं और मोह के द्वारा अपने स्वभाव को नहीं जानते। इसीलिए तो आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी ने कहा है कि-
“मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते न हि।”
मोह से आच्छादित हुआ ज्ञान स्वभाव को प्राप्त नहीं कर सकता।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 7
इष्टोपदेश गाथा 7 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (मोहेन) मोह से (संवृतं ज्ञानं) ढका हुआ ज्ञान (स्वभावं) स्वभाव को (न हि लभते) नहीं जान पाता (यथा) जैसे (मदनकोद्रवैः) नशीले कोदों के खा लेने से (मत्तः पुमान्) मूर्च्छित अर्थात् बेखबर मनुष्य (पदार्थानां) पदार्थों को ठीक तरह नहीं जान पाता ।
भावार्थ – जिस तरह शराब, भांग, कोदों को पीकर या खाकर मनुष्य नशे में चूर होकर उन्मत्त हो जाता है, उस नशे में वह अपनी स्त्री को बहिन या पुत्री समझ बैठता है और बहिन या पुत्री आदि को अपनी स्त्री समझ करके उनके साथ व्यभिचार करने को तैयार हो जाता है, उसे अपने आपका तथा शरीर का भी ठीक विचार नहीं रहता है। इसी तरह निश्चय से मोहनीय कर्म के उदय से वस्तु के यथात्म्य प्रकाशन में असमर्थ हुआ ज्ञान स्वकीय असाधारण भाव को प्राप्त नहीं कराता। ज्ञान धर्म है, आत्मा धर्मी है। धर्म और धर्मी में तादात्म्य सम्बन्ध है। अतः धर्म के ग्रहण से धर्मी का ग्रहण होता है इसलिए ये यहाँ पर ज्ञान शब्द से आत्म जानना चाहिए। अनादिकाल से मोह से आच्छादित हुआ आत्मा अपने स्वभाव को नहीं जानता है।
उत्थानिका – शरीर आदिकों के स्वरूप को न समझता हुआ आत्मा शरीरादिकों को किसी दूसरे रूप में ही मान बैठा है। इसी अर्थ को आचार्य आगे विवेचित करते हैं – गाथा 8
स्वाध्याय गाथा सं 6 & 7
स्वाध्याय गाथा सं 7 & 8
इष्टोपदेश स्वाध्याय
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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