आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर शिष्य का कहना है कि भगवन् ! सभी संसारी प्राणी तो विपत्ति वाले नहीं हैं, बहुत से सम्पत्ति वाले भी दीखने में आते हैं। इसके विषय में आचार्य कहते हैं-
दुरज्यॆनासुरक्ष्येण नश्वरेण धनादिना । स्वस्थंमन्यो जनः कोऽपि ज्वरवानिव सर्पिषा ॥13॥
अन्वयार्थ – (दुरज्यॆन) बड़ी कठिनाइयों से कमाये जाने वाले तथा (असुरक्ष्येण) सुरक्षित न रहने वाले (नश्वरेण) विनश्वर (धनादिना) धन, पुत्रादिकों के द्वारा (स्वस्थंमन्यः) अपने आपको स्वस्थ (सुखी) मानने वाला (कः अपि जनः) कोई भी मनुष्य (सर्पिषा) घी को खाकर (ज्वरवान् इव) ज्वर से पीड़ित मनुष्य की तरह मूर्ख होता है।
पद्यानुवाद
जिनका अर्जन बहुत कठिन है, स्वभाव जिनका मिटना ही है,
संरक्षण ना सम्भव है, ये धन-कंचन-वैभव हैं।
फिर भी निज को स्वस्थ मानते, धनपति धन पाकर वैसे,
ज्वर से पीड़ित होकर जो जन, घृत-मय भोजन कर जैसे ॥13॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 13
विवेचना
जिस तरह ज्वर से पीड़ित मनुष्य ज्वर की दाह मिटाने के लिए घृत का पान कर यदि अपने को स्वस्थ माने तो यह भ्रम है क्योंकि वास्तव में वह स्वस्थ नहीं है और न ही घृतपान करने से स्वस्थ हो सकता है। अपितु उल्टा दुःखी ही होता जाता है। उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य भी धनादि इष्ट वस्तुओं के समागम से अपने को सुखी मानता है पर वास्तव में वह सुखी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि धन के उपार्जन में बहुत कष्ट होता है। उससे अधिक कष्ट उसके संरक्षण में होता है। यहाँ आप लोगों की बात कही जा रही है। आप लोग स्वयं अनुभूत हैं इस बात से कि धन के अर्जन करने में कितनी अधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है? सुख-सुविधा से धनार्जन नहीं होता। रात-दिन पसीना-पसीना बहाकर के एक-एक पाई करके कैसे धन कमाते हैं, इसका स्मरण तो किया करो, क्योंकि जो धन अर्जित करता है उसी को यह ज्ञान रहता है कि कितनी कठिनाईयाँ आती हैं? थोड़ा भी धन आ गया तो अब उसकी सुरक्षा कठिन है। ताला लगाओ। ट्रेजरी में रखो इत्यादि। इन साधनों से धन की सुरक्षा फिर भी सम्भव है लेकिन धर्म की सुरक्षा ताला लगाने से नहीं होगी।
धन को पेटी में कितना भी सुरक्षित रखो, धन तो नष्ट होता ही है क्योंकि जब भाग्य पलट जाता है तो धन यूँ ही निकल जाता है। धन को हाथ का मल कहते हैं। धन नष्ट होने पर व्यक्ति हाथ मलता रह जाता है।
लोभ करना कषाय है, इसको छोड़ने का प्रयास करो। यही एकमात्र जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। अन्यथा जीवन जैसा मिला वैसा ही चला जायेगा। अतः निमित्त के ऊपर क्षुब्ध नहीं होना चाहिए। संसारी प्राणी और मनुष्य की यह सबसे बड़ी कमी है। विशेष रूप से मनुष्य को ही यह बात समझने की आवश्यकता है। जब मनुष्य के पुण्य का उदय होता है तो वह प्रशंसा का पात्र बनता है अन्यथा आलोचना का पात्र बन जाता है। अपने कर्म का उदय ही अपने को दण्डित करता है और अपने कर्म का उदय ही अपने को निन्दित करता है। कर्म का फल नोकर्म के सहयोग से मिलता है। तो कर्म क्या है? जैसे पर्दा या कपड़े में फिल्म नहीं होती किन्तु फिल्म का रिफलेक्शन पर्दे पर पड़ता है वैसे ही नोकर्म में फल देने की शाक्ति नहीं होती किन्तु नोकर्म के बिना कर्म अपना फल देने में समर्थ नहीं होता। चूँकि नोकर्म द्वारा कर्मफल अनुभूत होता है इसलिए आप लोग नोकर्म पर टूट पड़ते हैं। यह आपका अज्ञान है। यह नोकर्म तो सफेद वस्त्र के समान है जिस पर रील का रिफलेक्शन आ जाता है। रील समाप्त हो जाती है तो रिफलेक्शन भी समाप्त हो जाता है, फिर कोरा सफेद पर्दा मात्र रह जाता है, उस कोरे पर्दे, को कोई देखना नहीं चाहता क्योंकि पर्दे पर कुछ रहता ही नहीं। कर्म रील के समान है जबकि नोकर्म पर्दे के समान है, जिस पर कर्म की फल रूपी फिल्म दिखाई देती है। लेकिन मोह के कारण अज्ञानी मोही प्राणी कर्म की ओर दृष्टि न करके नोकर्म को ही देखने का प्रयास करता है। कर्मों को पकड़ो, उन पर विश्वास करो तो कर्मों को समाप्त करने के साधन भी आपको मिलेंगे। कर्मों को पकडने का मतलब यह है कि कर्मों के बारे में विचार करो कि ये कर्म कैसे आये, क्यों आये? कब आये? कब तक जायेंगे? कैसे जायेंगे? क्या-क्या इन कर्मों के प्रभाव हैं? यह जानोगे तो निश्चित रूप से इनसे मुक्त हो सकोगे। कर्मों को समाप्त करने की प्रक्रिया को स्वीकार करने का नाम ही मोक्षमार्ग है। नोकर्म शरीर भी है, इसको जो प्राप्त करता है, उससे जो ममत्व भाव रखता है, वह शुचितम पदार्थों के बीच भी अशुचिता का अनुभव करने लगता है।
“आत्मा तो शुद्धनिश्चयनय की विवक्षा से शुद्ध बुद्ध निरञ्जन स्वभाव वाला है फिर भी कर्मोदय के कारण शरीर का योग पाकर अशुद्ध हो जाता है। फलतः समीचीनता को जानना छोड़ देता है, जिससे शुद्धत्व की पहचान नहीं कर पाता, इसलिए केवलज्ञान को भी प्राप्त नहीं कर पाता। अर्थात् जो अपने को नहीं जान पाता वह सबको नहीं जान सकता। आचार्यों ने कहा ही है कि “जो एगं जाणदि सो सव्वं जाणदि” जो एक आत्मतत्त्व को जानता है वही सबको जान सकता है।
स्वभाव नैमित्तिक नहीं होता। अतः वह अन्तरहित रूप होता है, किन्तु विभाव पर कृत होता है, नैमित्तिक होता है, अतः तात्कालिक होता है, त्रैकालिक नहीं हो सकता। जब तक यह जीव संसार दशा में रहता है तब तक वह अनन्ततत्त्व का पूर्ण का ज्ञाता हो ही नहीं सकता। अपूर्ण को ही जानता रहता है। आचार्य कुन्दकुन्द महाराज ने भी इसी बात का समर्थन करते हुए ‘श्रीसमयसारजी’ ग्रन्थ में लिखा है कि-
सो सव्वणाणदरिसी, कम्मरएण णियेण वच्छण्णो। संसारसमावण्णो, णवि जाणदि सव्वदो सव्वं ॥ १६०॥
अर्थात् वह ज्ञाता द्रष्टा स्वभाव वाला जीव भी अपने कर्मों से ऐसा बँधा हुआ है, जिससे वह संसार दशा को प्राप्त है, फलस्वरूप वह जीव सबको सर्वदा नहीं जान सकता। यह कर्मोदय की दशा की बात है।
प्रश्न उठता है कि संसारी प्राणी को यह कर्म की दशा कैसे प्राप्त हुई? तो इसके समाधान में आचार्य कहते हैं कि शरीर के योग से ही सब कुछ होता है। शरीर के बिना आत्मा की यह दशा बन नहीं सकती। जिस शरीर के बारे में आप लोग बार-बार सोचते हैं कि मुझे अच्छा शरीर मिल जाये, अच्छा वैभव मिल जाये। लेकिन आचार्य कहते हैं कि ये सारी की सारी वस्तुयें, ये सभी वैभव मात्र संसारी प्राणी के लिए हैं वही इन चीजों को प्राप्त करने की इच्छा रखता है। इच्छाओं की पूर्ति होने से प्राप्त हुए शरीर, धन-वैभव और अन्य वस्तुओं से ममत्व बढ़ता जाता है, फलतः कर्म बन्धन भी दृढ़ होता जाता है। इसलिए इसकी प्रार्थना वृथा है ‘तदर्थं प्रार्थना वृथा’ ऐसा कहा भी है, क्योंकि इसी के कारण संसारी प्राणी को अशुभता का अनुभव करना पड़ रहा है। पावन होते हुए भी अशुचिता का अनुभव करना पड़ता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 13
इष्टोपदेश गाथा 13 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (दुरज्यॆन) बड़ी कठिनाइयों से कमाये जाने वाले तथा (असुरक्ष्येण) सुरक्षित न रहने वाले (नश्वरेण) विनश्वर (धनादिना ) धन पुत्रादिकों के द्वारा (स्वस्थंमन्यः) अपने आप को स्वस्थ (सुखी) मानने वाला (कः अपि जनः) कोई भी (ज्वरवान् इव) शीत ज्वर से पीड़ित मनुष्य की तरह (सर्पिषा) घी में अपने को सुखी मानता है मूर्ख होता है।
भावार्थ – पहले तो धन बड़ी कठिनाई, परिश्रम और कष्ट से कमाया जाता है। और थोड़ा-थोड़ा करके एकत्रित किया जाता है, यदि किसी तरह कुछ धन इकट्ठा भी हो जाये तो उसे चोर, डाकू, राजा, भाई, पुत्र, स्त्री, मित्र, अग्नि आदि से सुरक्षित (बचाये) रखना बहुत कठिन है। किसी तरह धन सुरक्षित भी रहे तो वह सदा बना नहीं रहता, परिवार के पालन-पोषण में सन्तान के पढ़ाने लिखाने में, विवाह कार्य में, रोग की चिकित्सा करने में, खाने, पीने, ओढ़ने में वह नष्ट होता ही है। ऐसे धन के द्वारा कोई मनुष्य अपने आपको सुखी माने तो वह वैसा ही मूर्ख है जैसे कि ज्वर से पीड़ित (बुखार वाला) मनुष्य घी पीकर के अपने को सुखी (बलवान्) समझे। यानी शांत ज्वर के समय घी पी लेने से जैसे ज्वर बढ़ता है, उसी तरह ज्यों-ज्यों मनुष्य के पास धन बढ़ता है त्यों-त्यों उसे चिन्ता, भय, व्याकुलता भी बढ़ती जाती है, शान्ति, सुख, सन्तोष तो धन छोड़ने से मिलता है ।
उत्थानिका – फिर भी शिष्य पूछता है कि बड़े आश्चर्य की बात है कि जब धनादि सम्पत्ति का अर्जन एवं रक्षण इतना दुःखकारी है, तब ऐसी सम्पत्ति को लोग छोड़ क्यों नहीं देते ? आचार्य उत्तर देते हैं –गाथा 14
स्वाध्याय गाथा सं 12 & 13
स्वाध्याय गाथा सं 13 to 17
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 13
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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