आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
गाथा 1 | गाथा 2 | गाथा 3 | गाथा 4 | गाथा 5 | गाथा 6 | गाथा 7 | गाथा 8 | गाथा 9 | गाथा 10 | गाथा 11 | गाथा 12 | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15 | गाथा 16 | गाथा 17 | गाथा 18 | गाथा 19 | गाथा 20 | गाथा 21 | गाथा 22 | गाथा 23 | गाथा 24 | गाथा 25 | गाथा 26 | गाथा 27 | गाथा 28 | गाथा 29 | गाथा 30 | गाथा 31 | गाथा 32
उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य कहता है-किस उपाय से और स्व और पर में विशेषता (भेद) जानी जाती है और उसके जानने वाले को क्या होगा ? किस फल की प्राप्ति होगी? आचार्य कहते हैं-
गुरूपदेशादभ्यासात्संवित्ते: स्वपरान्तरम् जानाति य: स जानाति, मोक्षसौख्यं निरन्तरम् ॥33॥
अन्वयार्थ – (यः) जो मनुष्य (गुरूपदेशात्) गुरु के उपदेश से (अभ्यासात्) अभ्यास से तथा (संवित्तेः) आत्म-ज्ञान से (स्वपरान्तरम्) स्व और पर पदार्थों के अन्तर को (जानाति) जानता है (सः) वह (निरन्तरम्) सतत् (मोक्ष-सौख्यं) मोक्ष के सुख को (जानाति) जानता है।
पद्यानुवाद
गुरु का उपदेशामृत निज को, सर्वप्रथम तो पिला दिया,
तदनुसार अभ्यास बढ़ाया, प्रयोग करता चला गया।
निजानुभव से निज-पर अन्तर, तभी निरन्तर जान रहा,
जान रहा वह मोक्ष सौख्य भी, अब तक जो अनजान रहा ॥३३॥
He who has acquired the discrimination between the Self and the notself, through the teachings of the preceptor, by repeated meditation on the nature of things, or by direct inner Self-perception, that great soul en- joys the happiness appertaining to salvation constantly!
Note – Salvation and the happiness appertaining to it are obtained by self-contemplation, when the karmas are destroyed and the soul is left as a pure Spirit, omniscient, and blissful and immortal in its own nature.
विवेचना
अनादिकाल से पर को अपना मानने वाला, मोह के विभ्रम में रहने वाला जीव स्व और पर का सम्यक् या वास्तविक ज्ञान किस माध्यम से प्राप्त कर सकता है। इस जिज्ञासा के समाधान स्वरूप इस कारिका में आचार्य उपदेशित कर रहे हैं कि स्व-पर भेदविज्ञान प्राप्त करना चाहते हो तो गुरु के उपदेश से अभ्यास करना आवश्यक होता है। हितैषी भव्य प्राणी यदि स्व-पर विवेक ज्ञान पाना चाहता है तो उसे वह ज्ञान दुनिया के किसी भी स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी में खोजने पर भी नहीं मिल सकेगा। उसे तो गुरु की प्रयोगशाला में जाना होगा, गुरु स्व पर वास्तविक भेदविज्ञान का सम्यक् उपदेश देंगे, उस पिपासु को उपदेशामृत का पान करायेंगे। तद्नुसार उसे उस उपदेश का अभ्यास करना होगा, उस भेद विज्ञान का प्रयोग करना होगा, तब निजानुभव से निज और पर का स्वरूप ज्ञान हो जायेगा। फलस्वरूप उसी स्व पर भेदविज्ञान के बल पर साधना करता हुआ मोक्ष सुख को पा सकेगा। आज तक स्व पर भेदविज्ञान के अभाव में मोक्ष सुख का ज्ञान भी नहीं हो पाया। उस पर श्रद्धान भी जागृत नहीं हो पाया। फलतः इस मोही अज्ञानी प्राणी ने पर को अपना मानकर पर के उपकार में ही अपना जीवन व्यतीत किया है। स्वात्महित का विचार ही नहीं किया।
गुरु की शरण में समर्पण के साथ गुरु के निर्देशन में अभ्यास करने पर स्वसंवित्ति से ज्ञान और वैराग्य वृद्धिंगत होता है। जिससे जीवन में प्रत्येक पल, प्रत्येक परिस्थिति में घटित होती हुई घटनाओं में आध्यात्मिक भेदविज्ञान के बल पर शिष्य का मन सहनशील होता जाता है और परीषह, उपसर्गों में समता भाव का प्रयोग करते हुए कर्म निर्जरा करता है। निर्जरा करते-करते एक समय ऐसा आता है कि कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर मोक्ष सुख का अनुभव होता है।
इस भेदविज्ञान के बल पर ही शरीर की रुग्ण अवस्था में भी अपने आपको रुग्ण नहीं मानने की मनोवृत्ति पैदा होती है, उस मनोवृत्ति के होने पर रोग की तीव्रता की पीड़ा में भी मन आकुल- व्याकुल नहीं होता। किसी के द्वारा कटु, कठोर वचन अथवा अपशब्दों के प्रयोग करने पर भी रोष में नहीं आता। किसी के प्रति मन में राग-द्वेष करना व्यर्थ समझकर आत्म-ज्ञान एवं वैराग्य को बढ़ाता चला जाता है। गुरु के उपदेश से वह समझ लेता है कि यह सभी अवस्थायें जीव के स्वभाव रूप नहीं हैं, जीव की अपनी नहीं हैं किन्तु ये तो कर्म सापेक्ष हैं, हमेशा रहने वाली नहीं हैं। ये भी चली जायेंगी, जो भी स्थिति आयेगी, वह भी चली जायेगी ऐसा दृढविश्वास करता हुआ, उन घटनाओं में हर्ष-विषाद या शोक नहीं करता।
अत्यधिक पुण्य संयोग से सच्चे गुरु की शरण प्राप्त होती है, इस दुर्लभता को ध्यान में रखते हुए गुरु के प्रति समर्पित होकर उनके उपदेशामृत के अभ्यास से इस भेदविज्ञान की जो कि मोक्ष सुख की साधनभूत है ऐसी महान् उपलब्धि के बारे में सोचो, विचार करो। एक बार नहीं इसको तो बार-बार विचार और अभ्यास में लाओ। जैसे अन्यत्व भावना में बार-बार पढ़ते हैं-
तू चेतन अरु देह अचेतन यह जड़ तू ज्ञानी।
मिलै अनादि यतन तैं बिछुड़ै ज्यों पय अरु पानी
रूप तुम्हारा सबसे न्यारा, भेदज्ञान करना,
जौ लों पौरुष थकें न तौलों उद्यम सों चरना ॥
बारहभावनाओं का चिन्तन करने से भेदविज्ञान मजबूत होता है अतः जिस प्रकार शरीर को भोजन अति आवश्यक होता है वैसे ही वैराग्य बढ़ाने हेतु भावनाओं का चिन्तन आवश्यक होता है। आचार्य महाराज (ज्ञानसागरजी) से किसी जिज्ञासु ने एक बार प्रश्न किया था कि महाराज! इन बारह भावनाओं का प्रतिदिन चिन्तन क्यों करना आवश्यक है? क्या होता है प्रतिदिन बारह भावना पढ़ने से ? तब आचार्य महाराज ने यही उत्तर दिया था कि जैसे शरीर को प्रतिदिन भोजन करना आवश्यक होता है वैसे ही भेदविज्ञानी साधक को प्रतिदिन भावनाओं का चिन्तन रूपी भोजन करना भी अति आवश्यक होता है। शरीर का भोजन पूरा हो या न हो, अन्तराय हो जाय या उपवास कर लें, लेकिन उस समय में भी बारह भावना रूपी भोजन करना आवश्यक रहता है। तभी साधक के कदम साधना पथ पर अबाधगति से बढ़ते जाते हैं और अन्त में अपने लक्ष्य मोक्ष सुख को पा जाते हैं। भेदविज्ञान होने पर आत्मा को अनुपम संतोष जनक आनन्द प्राप्त होता है। उसके फलस्वरूप ही मोक्ष सुख पर विश्वास करते-करते एक दिन मोक्ष सुख को पा लेता है।
इष्टोपदेश गाथा 33 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ (यः) जो मनुष्य (गुरूपदेशात्) गुरु के उपदेश से (अभ्यासात्) अभ्यास से तथा (संवित्तेः) आत्म-ज्ञान से (स्वपरान्तरम् ) स्व और पर पदार्थों के अन्तर को (जानाति) जानता है (स निरन्तरम् ) वह सदा (मोक्ष-सौख्यं) मोक्ष के सुख को (जानाति) जानता है।
भावार्थ – आत्मा ज्ञान, दर्शन, सुखमय चैतन्य पदार्थ है और शरीर जड़ पदार्थ है, आत्मा जड़ नहीं है और शरीर चेतन नहीं है, इस तत्त्व को आत्मज्ञानी निर्ग्रन्थ गुरु से समझना चाहिए। ऐसा करने से आत्मा और शरीर का भेदज्ञान मालूम होता है, भेदज्ञान हो जाने पर जो आत्मा को अनुपम सन्तोषजनक आनन्द आता है वैसा आनन्द ही मोक्ष जाने का होता है। उस आत्म सुख को पाने के लिए किसी खाने पीने आदि इन्द्रिय सम्बन्धी विषय भोगों की आवश्यकता नहीं होती, न कोई आकुलता तृष्णा होती है, वह सुख आत्मा के आधीन होता है।
उत्थानिका-आगे शिष्य पूछता है कि मोक्ष-सुख के अनुभव के विषय में कौन गुरु होता है ?
स्वाध्याय गाथा सं 31 to 33
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 ( Gatha 13 )| गाथा 14 ( Gatha 14 )| गाथा 15 ( Gatha 15 ) | गाथा 16 ( Gatha 16 )| गाथा 17 ( Gatha 17 )| गाथा 18 ( Gatha 18 )| गाथा 19 ( Gatha 19 )| गाथा 20 ( Gatha 20 )| गाथा 21 ( Gatha 21)| गाथा 22 ( Gatha 22 )| गाथा 23 ( Gatha 23 )| गाथा 24 ( Gatha 24 )| गाथा 25 ( Gatha 25 ) | गाथा 26 ( Gatha 26 )| गाथा 27 | गाथा 28 | गाथा 29 | गाथा 30 | गाथा 31 | गाथा 32
Download PDF
इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
उपरोक्त PDF डाउनलोड करने के लिए सबसे पहले आपको जैन समुदाय FD फोरम का सदस्य बनना होगा
To download above pdf first you have to become member of Jain community FD forum