अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 383 to 390
श्लोक ( Shlok ) 383
भवे भाव्यत्र नवमे पञ्चमश्चक्रवर्तिनाम् । ‘तीर्थेशां पोडशः शान्तिर्भवान् शान्तिप्रदः सताम् ॥ ३८३॥
तेरा जीव आगे होनेवाले नौवें भव में सज्जनोंको शान्ति देनेवाला पाँचवाँ चक्रवर्ती और शान्तिनाथ नामका सोलहवाँ तीर्थंकर होगा ॥ ३८३ ॥
“In your upcoming ninth birth from now, your soul will become the Fifth Chakravarti (universal monarch), bringing peace to the righteous, and the Sixteenth Tirthankara, named Shantinath. (383)”
श्लोक ( Shlok ) 384
इति तज्जिनशीतांशुवाग्ज्योत्स्नाप्रसरप्रभा । प्रसङ्गाद्व्यकसत्खेचरेन्द्रहृत्कुमुदाकरः ॥ ३८४ ॥
इस प्रकार जिनेन्द्ररूपी चन्द्रमाकी फैली हुई वचनरूपी चाँदनीकी प्रभाके सम्बन्धसे विद्याधरोंके इन्द्र अमिततेजका हृदयरूपी कुमुदोंसे भरा सरोवर खिल उठा ।। ३८४ ।।
“In this manner, by coming into contact with the radiating moonlight of the words flowing from the Jinendra-like moon, the lake of the heart—filled with water-lily buds—belonging to Amitateja, the king of the Vidyadharas, blossomed into full bloom. (384)”
श्लोक ( Shlok ) 385
तदैवाशनिघोषाख्यो माता चास्य स्वयम्प्रभा । सुतारा च परे “वापग्निविण्णाः संयमं परम् ॥ ३८५ ॥
उसी समय अशनिघोष, उसकी माता स्वयम्प्रभा, सुतारा तथा अन्य कितने ही लोगोंने विरक्त होकर श्रेष्ठ संयम धारण किया ।। ३८५ ।।
“At that very moment, Ashanighosha, his mother Swayamprabha, Sutara, and many other people became detached from worldly life and embraced the path of supreme self-restraint (Sanyama). (385)”
श्लोक ( Shlok ) 386
अभिनन्द्य जिनं सर्वे त्रिःपरीत्य यथोचितम् । जग्मुश्चक्रितनूजाद्यास्ते सहामिततेजसा ॥ ३८६ ॥
चक्रवर्ती के पुत्रको आदि लेकर बाकीके सब लोग जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति कर तथा तीन प्रदक्षिणाएँ देकर अमिततेज के साथ यथायोग्य स्थान पर चले गये ।। ३८६ ।।
“Beginning with the son of the Chakravarti, all the remaining people offered prayers of praise (Stuti) to Lord Jinendra, circumambulated Him three times (Pradakshina), and then departed along with Amitateja to their respective appropriate places. (386)”
श्लोक ( Shlok ) 387 – 389
अर्ककीर्तिसुतः कुर्वन्नभुक्तिं सर्वपर्वसु । स्थितिभेदे च तद्योग्यं प्रायश्चित्तं समाचरन् ॥ ३८७ ॥महापूजां सदा कुर्वन् पात्रदानादि चादरात् । ददद्धर्मकथां शृण्वन् भव्यान् धर्म प्रबोधयन् ॥ ३८८ ॥निःशङ्कादिगुणांस्तन्वन्दृष्टिमोहान पोहयन् । ३ इनो वाऽमिततेजाः सन् सुखप्रेक्ष्योऽमृतांशुवत् ॥३८९॥
इधर अर्ककीर्तिका पुत्र अमिततेज समस्त पर्वोंमें उपवास करता था, यदि कदाचित् ग्रहण किये हुए व्रतकी मर्यादाका भंग होता था तो उसके योग्य प्रायश्चित्त लेता था, सदा महापूजा करता था, आदरसे पात्रदानादि करता था, धर्म-कथा सुनता था, भव्योंको धर्मोपदेश देता था, निःशङ्कित आदि गुणोंका विस्तार करता था, दर्शनमोहको नष्ट करता था, सूर्यके समान अपरिमित तेजका धारक था और चन्द्रमाके समान सुखसे देखने योग्य था ।। ३८७-३८९ ॥
“Meanwhile, Amitateja—the son of Arkakeerti—would fast on all the auspicious holy days (Parva days). If, by chance, the bounds of his adopted vows were ever breached, he would undertake the appropriate atonement (Prayashchitta). He constantly performed grand worship rituals (Maha-puja), offered food and gifts to worthy ascetics (Patra-dana) with deep respect, listened to spiritual discourses (Dharma-katha), and gave religious teachings to the liberating souls (Bhavya souls). He expanded within himself virtues like freedom from doubt (Nishankita), completely destroyed the faith-deluding karma (Darshana-moha), possessed immense and boundless radiance like the sun, and was as pleasing to look upon as the moon. (387–389)”
श्लोक ( Shlok ) 390
संयमीव शमं यातः पालकः पितृवत्प्रजाः । लोकद्वयहितं धर्म्य कर्म प्रावर्तयत्सदा ॥ ३९० ॥
वह संयमीके समान शान्त था, पिताकी तरह प्रजाका पालन करता था और दोनों लोकोंके हित करनेवाले धार्मिक कार्योंकी निरन्तर प्रवृत्ति रखता था ॥ ३९० ॥
“He was as serene as a self-restrained ascetic (Sanyami), protected and nurtured his subjects like a father, and constantly engaged in righteous activities that brought welfare to both this world and the next. (390)”
श्लोक 391 से 401
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धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382
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