नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 131 to 141
श्लोक ( Shlok ) 131–136
तत्र नेमीशितुः सत्यभामायाश्चाम्बुसेचनात् । सल्लापोऽभवदित्युच्चैश्चतुरोक्तया मनोहरः ॥ १३१ ॥ तत्प्रियावत्कुतो रन्ता मयि त्वं किं ममाप्रिया । “प्रियास्मि चेत्तव भ्राता यातु कां कामदायिनीम् ॥ १३२॥
कासौ किं तां न वेत्सि त्वं सम्यक्सा वेदयिष्यति । वदन्ति त्वामृजुं सर्वे कुटिलस्त्वं तथापि च ॥ १३३॥ पुनः स्नानविनोदावसाने तामेवमब्रवीत् । स्नानवस्त्रं त्वया ग्राह्यं नीलोत्पलविलोचने ॥ १३४ ॥ तस्य मे किं करोम्येतत्प्रक्षालय हरिर्भवान् । यो नागशय्यामास्थाय दिव्यं शार्ङ्गशरासनम् ॥ १३५ ॥ हेलयारोपयद्यश्च प्रपूरितदिगन्तरम् । शङ्खमापूरयत्किं तत्साहसं नो भवेत्त्वया ॥ १३६ ॥
सत्यभामाने कहा कि आप मेरे साथ अपनी प्रियाके समान क्रीड़ा क्यों करते हैं? इसके उत्तर में नेमिराजने कहा कि क्या तुम मेरी प्रिया (इष्ट) नहीं हो ? सत्यभामाने कहा कि यदि मैं आपकी प्रिया (स्त्री) हूं तो फिर आपके भाई (कृष्ण) किसके पास जावेंगे ? नेमिनाथने उत्तर दिया कि वे कामिनीके पास जावेंगे ? सत्यभामाने कहा कि सुनूँ तो सही वह कामिनी कौन सी है ? उत्तर में नेमिनाथने कहा कि क्या तुम नहीं जानती ? अच्छा अब जान जाओगी। सत्यभामाने कहा किसब लोग आपको सीधा कहते हैं पर आप तो बड़े कुटिल हैं। इस प्रकार जब विनोद करते-करते स्नान समाप्त हुआ तब नेमिनाथने सत्यभामासे कहा कि हे नीलकमलके समान नेत्रों वाली ! तू मेरा यह स्नानका वस्त्र ले। सत्यभामाने कहा कि मैं इसका क्या करूँ ? नेमिनाथने कहा कि इसे धो डाल । तब सत्यभामा कहने लगी कि क्या आप श्रीकृष्ण हैं ? वह श्रीकृष्ण, जिन्होंने कि नागशय्या पर चढ़कर शार्ङ्ग नामका दिव्य धनुष अनायास ही चढ़ा दिया था और दिगदिगन्तको पूर्ण करने-वाला शङ्ख पूरा था ? क्या आपमें वह साहस है, यदि नहीं है तो आप मुझसे वस्त्र धोनेकी बात कहते हैं ? ।। १३१-१३६ ।।
“Satyabhama said, ‘Why do you sport with me as if I were your beloved?’ In response, Nemiraja (Lord Neminatha) said, ‘Are you not my beloved (dear one)?’
Satyabhama countered, ‘If I am your beloved (wife), then to whom will your brother (Krishna) go?’
Neminatha replied, ‘He will go to his passionate lady (kamini).’
Satyabhama said, ‘Let me hear then, who is that kamini?’
In response, Neminatha said, ‘Do you not know? Well, you will find out now.’
Satyabhama said, ‘Everyone calls you straightforward, but you are actually very clever and crooked.’
When their bathing concluded amidst this playful banter, Neminatha said to Satyabhama, ‘O you with eyes like blue lotuses! Take this bathing garment of mine.’
Satyabhama asked, ‘What shall I do with it?’
Neminatha replied, ‘Wash it.’
Then Satyabhama said, ‘Are you Shri Krishna? Are you that Shri Krishna who effortlessly stepped onto the serpent-bed (Nagasayya), strung the divine bow named Sharnga, and blew the conch shell that filled all corners of the earth? Do you possess that same courage? If not, how can you ask me to wash your clothes?’ || 131-136 ||”
श्लोक ( Shlok ) 137 – 139
साधु करिष्यामीत्युक्त्वा गर्वप्रचोदितः । ततः पुरं समभ्येत्य विधातु कर्म सोऽद्भुतम् ॥ १३७ ॥सम्प्रविश्यायुधागारं नागशय्यामधिष्ठितः । स्वां शय्यामिव नागेन्द्रमहामणिविभास्वराम् ॥ १३८ ॥भूयो विफालनोन्नादज्यालतं च शरासनम् । आरोपयत्पयोजञ्च’ दन्मौ रुद्धदिगन्तरम् ॥ १३९ ॥
नेमिनाथने कहा कि ‘मैं यह कार्य अच्छी तरह कर दूंगा’ इतना कहकर वे गर्वसे प्रेरित हो नगरकी ओर चल पड़े और वह आश्चर्यपूर्ण कार्य करनेके लिए आयुधशालामें जा घुसे । वहाँ वे नागराजके महामणियोंसे सुशोभित नागशय्यापर अपनी ही शय्याके समान चढ़ गये, बार बार स्फालन करनेसे जिसकी डोरी रूपी लता बड़ा शब्द कर रही है ऐसा धनुष उन्होंने चढ़ा दिया और दिशाओंके अन्तरालको रोकनेवाला शङ्ख फूंक दिया ।। १३७-१३९ ।।
“Neminatha said, ‘I shall perform this task effortlessly.’ Saying this, propelled by pride, He set out toward the city and entered the armory to accomplish that wondrous feat. There, He climbed upon the serpent-bed (Nagasayya)—which was resplendent with the great gems of the serpent king—as if it were His own bed. He then strung the bow, making its vine-like string produce a thunderous sound through repeated twanging, and blew the conch shell, completely filling the space between all directions. || 137-139 ||”
श्लोक ( Shlok ) 140
तदा संभावयामास स्वं समाविष्कृतोन्नतिम् । रागाहङ्कारयोर्लेशोऽप्यवश्यं विकृतिं नयेत् ॥ १४० ॥
उस समय उन्होंने अपने आपको महान् उन्नत समझा सो ठीक ही है क्योंकि राग और अहंकारका लेशमात्र भी प्राणीको अवश्य ही विकृत बना देता है ॥ १४० ॥
“At that time, He considered Himself grandly superior; and rightly so, because even a trace of attachment (raga) and ego (ahankara) bound to a living being inevitably alters their natural composure. || 140 ||”
श्लोक ( Shlok ) 141
सहसेत्यद्भुतं कर्म श्रुत्वाध्यास्य सभावनिम् । हरिः कुसुमचित्राख्यामाकुलाकुलमानसः ॥ १४१ ॥
जिस समय आयुधशालामें यह सब हुआ था उस समय श्रीकृष्ण कुसुमचित्रा नामकी सभाभूमिमें विराजमान थे। वे सहसा ही यह आश्चर्यपूर्ण काम सुन कर व्यग्र हो उठे, उनका मन अत्यन्न व्याकुल हो गया ।॥ १४१ ॥
“At the moment when all this occurred in the armory, Shri Krishna was seated in the assembly hall named Kusumachitra. Upon suddenly hearing of this wondrous feat, He became anxious, and His mind grew exceedingly perturbed. || 141 ||”
श्लोक 142 से 151
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