मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 223 to 231
श्लोक ( Shlok ) 223 – 225
तद्विदित्वाऽतिथिर्युक्तिमद्वचोभिः प्रदूष्य तम् । सुरम्यविषये पोदनाधीङ् बाहुबलीशिनः ॥ २२३ ॥ कुले महीभुजां ज्येष्ठो माता, तृणपिङ्गलः । तस्य सर्वयशा देवी तयोस्तुग्मधुपिङ्गलः ॥ २२४ ॥ सर्वैर्वरगुणैर्गण्यो नवे वयसि वर्तते । स त्वया मालया माननीयोऽद्य मदपेक्षया ॥ २२५॥
जब सुलसाकी माता अत्तिथिको इस बातका पता चला तब उसने युक्तिपूर्ण वचनोंसे राजा सगरकी बहुत निन्दा की और कहा कि सुरम्यदेशके पोदनपुर नगरका राजा बाहुबलीके वंशमें होनेवाले राजाओंमें श्रेष्ठ तृणपिङ्गल नामका मेरा भाई है । उसकी रानीका नाम सर्वयशा है, उन दोनोंके मधुपिङ्गल नामका पुत्र है जो वरके योग्य समस्त गुणोंसे गणनीय हैं- प्रशंसनीय हैं और नई अवस्थामें विद्यमान है। आज तुझे मेरी अपेक्षासे ही उसे वरमाला डालकर सन्मानित करना चाहिये ।। २२३-२२५ ।।
“When Sulasā’s mother, Queen Atithi, discovered this development (that her daughter had fallen for Sagara), she used highly manipulative and artful words to bitterly criticize and disparage King Sagara.
She then said to Sulasā, ‘In the city of Podanapura within the beautiful Suramya country, lives my brother named Tṛṇapiṅgala, who is the finest among the kings descended from the glorious lineage of Bāhubali. His queen’s name is Sarvayaśā, and they have a son named Madhupiṅgala. He is exceptionally praiseworthy, possesses every single virtue required in an ideal groom, and is in the prime of his youth. Today, out of respect and regard for my wishes, you must place the wedding garland (Varamālā) around his neck and honor him as your husband.'” ॥ 223-225 ॥
श्लोक ( Shlok ) 226
साकेतपतिना किं ते सपत्निदुःखदायिना । इत्याहैतद्वचः सापि ‘सोपरोधाऽभ्युपागमत् ॥ २२६ ॥
सौतका दुःख देनेवाले अयोध्या पति-राजा सगरसे तुझे क्या प्रयोजन है ? माता अतिथिने यह वचन कहे जिन्हें सुलसाने भी उसके आग्रहवश स्वीकृत कर लिया ।। २२६ ॥
“‘What business do you have with the King of Ayodhyā, Sagara? He will only bring you the immense grief of dealing with co-wives (Sauta).’
Mother Atithi spoke these bitter words, and because of her absolute, unyielding insistence (Āgrahavaśa), Sulasā finally yielded and accepted her mother’s demand.” ॥ 226 ॥
श्लोक ( Shlok ) 227
तदा प्रभृति कन्यायाः समीपगमनादिकम् । उपायेनातिथिर्देवी मन्दोदर्या न्यवारयत् ॥ २२७ ॥
उसी समयसे अतिथि देवीने किसी उपायसे कन्याके समीप् मन्दोदरीका आना जाना आदि बिलकुल रोक दिया ॥ २२७ ॥
“From that very moment, Queen Atithi used various clever means and ploys to completely ban and block Mandodarī (Sagara’s foster-mother) from coming near or interacting with the princess.” ॥ 227 ॥
श्लोक ( Shlok ) 228 – 231
भात्री च प्रस्तुतार्थस्य विघातमवदद्विभोः । नृपोऽपि मन्त्रिणं प्राह यदस्माभिरभीप्सितम् ॥ २२८ ॥ साकेतपतिना किं ते सपत्निदुःखदायिना । इत्याहैतद्वचः सापि ‘सोपरोधाऽभ्युपागमत् ॥ २२६ ॥ तत्त्वया सर्वथा साध्यमिति सोऽप्यभ्युपेत्य तत् । वरस्य लक्षणं शस्तमप्रशस्तं प्व वर्ण्यते ॥ २२९ ॥ येन तादृग्विधं ग्रन्थं समुत्पाद्य विचक्षणः । स्वयंवरविधानाख्यं विधायारोप्य पुस्तके ॥ २३० ॥ * मञ्जूषायां विनिक्षिप्य तदुद्यानवनान्तरे । धरातिरोहितं कृत्वा न्यधादविदितं परैः ॥ २३१ ॥
मन्दोदरीने अपने प्रकृत कार्यकी रुकावट राजा सगरसे कही और राजा सगरने अपने मन्त्रीसे कहा कि हमारा जो मनोरथ है वह तुम्हें सब प्रकारसे सिद्ध करना चाहिये । बुद्धिमान् मन्त्रीने राजाकी बात स्वीकार कर स्वयंवर विधान नामका एक ऐसा ग्रन्थ बनवाया कि जिसमें वरके अच्छे और बुरे लक्षण बताये गये थे। उसने वह ग्रन्थ पुस्तकके रूपमें निवद्धकर एक सन्दूकचीमें रक्खा और वह सन्दूकची उसी नगर सम्बन्धी उद्यानके किसी वनमें जमीनमें छिपाकर रख दी। यह कार्य इतनी सावधानीसे किया कि किसीको इसका पता भी नहीं चला ।। २२८-२३१ ॥
“Mandodarī informed King Sagara about the sudden obstruction in her ongoing mission (being blocked from seeing the princess). Upon hearing this, King Sagara turned to his minister and said, ‘You must fulfill our objective by any means necessary.’
The highly intelligent minister accepted the King’s command and secretly authored a text titled Svayaṃvara-Vidhāna (The Rules and Rituals of Self-Choice Marriage), in which he meticulously detailed the highly auspicious and inauspicious physical traits (Lakṣaṇa) of a prospective groom.
He bound this text into the form of a holy book, placed it inside a small casket, and buried that casket underground in a secluded forest area within the city’s royal garden. He executed this entire operation with such extreme caution and secrecy that absolutely no one got a single hint of it.” ॥ 228-231 ॥
श्लोक 232 से 242
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181| श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222
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