अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
हयग्रीवोऽपि जन्मान्तरानुबद्धोरुवैरतः । आच्छादयदतिक्रुद्धः शरवर्षैर्विरोधिनम् ॥ १४२ ॥
जन्मान्तरसे बँधे हुए भारी वैरके कारण अश्वग्रीव बहुत क्रुद्ध था अतः उसने बाण-वर्षाके द्वारा शत्रुको आच्छादित कर लिया ।। १४२ ।।
“Enraged by the heavy enmity bound across past lifetimes, Ashvagriva grew furious and completely covered his enemy with a torrential rain of arrows.”142
श्लोक ( Shlok ) 143
द्वन्द्वयुद्धेन तौ जेतुमक्षमावितरेतरम् । मायायुद्धं समारब्धौ महाविद्याबलोद्धतौ ॥ १४३ ॥
जब वे दोनों द्वन्द्व युद्धसे एक दूसरेको जीतनेके लिए समर्थ न हो सके तब महा-विद्याओंके बलसे उद्धत हुए दोनों मायायुद्ध करनेके लिए तैयार हो गये ॥ १४३ ॥
“When neither of them could overpower the other through a duel, both—arrogant in the power of their supreme mystical sciences (Mahavidyas)—prepared to engage in a war of illusions (Mayayuddha).”143
श्लोक ( Shlok ) 144
युद्ध्वा चिरं हयग्रीवश्चक्रं न्यक्षिपदभ्यरिम् । तदैवादाय तद्मीवामच्छिदत् केशवः कुधा ॥ १४४ ॥
अश्वग्रीवने चिरकाल तक युद्धकर शत्रुके सन्मुख चक्र फेंका और नारायण त्रिपृष्ठने वही चक्र लेकर क्रोधसे उसकी गर्दन छेद डाली ।। १४४ ॥
“After fighting for a long time, Ashvagriva hurled his Chakra (divine discus) directly at his enemy; but Narayana Triprishta caught that very same Chakra and, in a fit of rage, severed his neck with it.”144
श्लोक ( Shlok ) 145
तावर्कविधुसकाशौ त्रिपृष्ठविजयौ विभू । भरतार्द्धाधिपत्येन भातः स्म ध्वस्तविद्विषौ ॥१४५॥
शत्रुओंके नष्ट करने वाले त्रिपृष्ठ और विजय आधे भरत क्षेत्रका आधिपत्य पाकर सूर्य और चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १४५ ॥
“Having attained sovereignty over half of the Bharata region, Triprishta—the destroyer of his enemies—and Vijaya shone with magnificent splendor, resembling the sun and the moon.”145
श्लोक ( Shlok ) 146
नृपेन्द्रैः खेचराधीशैर्व्यन्तरैर्मागधादिभिः । कृताभिषेकः सम्प्राप त्रिपृष्ठः पृष्ठतां क्षितेः ॥ १४६ ॥
भूमिगोचरी राजाओं, विद्याधर राजाओं और मागधादि देवोंके द्वारा जिनका अभिषेक किया गया था ऐसे त्रिपृष्ठ नारायण पृथिवीमें श्रेष्ठताको प्राप्त हुए ।। १४६ ।।
“Consecrated by the terrestrial kings, the Vidyadhara (celestial) kings, and the Magadha deities, Triprishta Narayana attained the pinnacle of supremacy upon the earth.”146
श्लोक ( Shlok ) 147
आधिपत्यं द्वयोः श्रेण्योर्विततारादिकेशवः । हृष्टः स्वयम्प्रभापित्रे न स्यात्किं श्रीमदाश्रयात् ॥१४७॥
प्रथम नारायण त्रिपृष्ठने हर्षित होकर स्वयंप्रभाके पिताके लिए दोनों श्रेणियोंका आधिपत्य प्रदान किया सो ठीक ही है क्योंकि श्रीमानोंके आश्रयसे क्या नहीं होता है ? ।। १४७ ।।
“Joyfully, the first Narayana, Triprishta, bestowed the sovereignty of both the Shrenis (mountain ranges) upon the father of Svayamprabha. And this is only fitting, for what cannot be achieved through the shelter and patronage of the illustrious?”147
श्लोक ( Shlok ) 148
असिः शङ्खो धनुश्चक्रं शक्तिर्दण्डो गदाभवन् । रत्नानि सप्त चक्रेशो रक्षितानि मरुङ्गणैः ॥ १४८ ॥
असि, शङ्ख, धनुष, चक्र, शक्ति, दण्ड और गदा ये सात नारायणके रत्न थे। देवोंके समूह इनकी रक्षा करते थे ।। १४८ ।।
“The sword (Asi), the conch (Shankha), the bow (Dhanush), the discus (Chakra), the spear (Shakti), the staff (Danda), and the mace (Gada)—these seven were the divine jewels of Narayana. Multitudes of deities continuously guarded them.”148
श्लोक ( Shlok ) 149
रत्नमाला हलं भास्वद्रामस्य सुशलं गदा । महारत्नानि चत्वारि बभूवुर्भाविनिर्वृतेः ॥ १४९ ॥
रत्नमाला, देदीप्यमान हल, मुसल और गदा ये चार मोक्ष प्राप्त करने वाले बलभद्रके महारत्न थे ।। १४९ ।।
“The jeweled necklace (Ratnamala), the radiant plow (Hala), the pestle (Musala), and the mace (Gada)—these four were the great divine treasures of Balabhadra, who ultimately attained liberation (Moksha).”149
श्लोक ( Shlok ) 150
देव्यः स्वयंप्रभामुख्याः सहस्त्राण्यस्य षोडश । बलस्याष्टसहस्त्राणि कुलरूपगुणान्विताः ॥ १५० ॥
नारायणकी स्वयंप्रभाको आदि लेकर सोलह हजार स्त्रियाँ थीं और बलभद्रकी कुलरूप तथा गुणोंसे युक्त आठ हजार रानियाँ थीं ।॥ १५० ॥
“Narayana possessed sixteen thousand wives, headed by Svayamprabha; while Balabhadra possessed eight thousand queens, all endowed with noble lineage and virtuous qualities.”150
श्लोक ( Shlok ) 151
अर्ककीर्तेः कुमारस्य ज्योतिर्मालां खगाधिपः । प्राजापत्यविवाहेन महत्या सम्पदाग्रहीत् ॥ १५१ ॥
ज्वलनजटी विद्याधरने कुमार अर्ककीर्तिके लिए ज्योतिर्माला नामकी कन्या बड़ी विभूतिके साथ प्राजापत्य विवाहसे स्वीकृत की ।। १५१ ।।
“With great opulence, the Vidyadhara Jvalanajati bestowed the maiden named Jyotirmala upon Prince Arkakirti through the sacred rite of the Prajapatya marriage.”151
श्लोक 152 से 161
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