नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
यादवाश्च तदायानमाकर्ण्यगामिवेदिनः । जहुः शौर्यपुरं हास्तिनाह्वयं मधुरामपि ॥ १२ ॥
कालयवनकी आज्ञा सुनकर अग्रशोची यादवोंने शौर्यपुर, हस्तिनापुर और मथुरा तीनों ही स्थान छोड़ दिये ।। १२ ।।
“Hearing of Kalayavana’s command, the far-sighted Yadavas abandoned all three places: Shouryapura, Hastinapur, and Mathura. || 12 ||”
श्लोक ( Shlok ) 13 – 15
मार्गे स्थितां सदा यादवेशिनां कुलदेवताम् । विविधेन्धनसंवृद्धज्वालमुत्थाप्य पावकम् ॥ १३ ॥धृतवृद्धाकृतिं वीक्ष्य तां कालयवनो युवा । किमेतदिति पप्रच्छ साप्याह शृणु भूपते ॥ १४ ॥अस्मिज्वालाकरालाग्नौ सर्वेऽपि मम सूनवः । भयेन भवतोऽभूवन् व्यसवो यादवैः सह ॥ १५ ॥
कालयवन उनका पीछा कर रहा था, तब यादवोंकी कुल-देवता बहुत-सा ईन्धन इकट्ठा कर तथा ऊँची लौवाली अग्नि जलाकर और स्वयं एक बुढ़ियाका रूप बना कर मार्गमें बैठ गई। उसे देख कर युवा कालयवनने उससे पूछा कि यहक्या है ? उत्तर में बुढ़िया कहने लगी कि हे राजन् ! सुन, आपके भयसे मेरे सब पुत्र यादवोंके साथ-साथ इस ज्वालाओंसे भयंकर अग्निमें गिरकर मर गये हैं ।। १३-१५ ।।
“As Kalayavana was pursuing them, the guardian deity (Kuladevi) of the Yadavas gathered a vast amount of firewood, lit a fire with high, leaping flames, and took the form of an old woman, sitting down by the wayside.
Upon seeing her, the young Kalayavana asked, ‘What is this?’ In response, the old woman said, ‘O King, listen! Out of fear of you, all my sons, along with the Yadavas, have cast themselves into this fiercely blazing fire and perished.’ || 13-15 ||”
श्लोक ( Shlok ) 16
इति तद्वचनात्सोऽपि मद्भयात्किल शत्रवः । प्राविशन्मत्प्रतापाशुशुक्षणि वाशुशुक्षणिम् ॥ १६ ॥
बुढ़ियाके वचन सुनकर काल-यवन कहने लगा कि अहो, मेरे भयसे समस्त शत्रु मेरी प्रतापाग्निके समान इस अग्निमें प्रविष्ट हो गये हैं ।॥ १६ ॥
“Hearing the words of the old woman, Kalayavana said, ‘Ah! Out of fear of me, all my enemies have entered this fire, which is just like the blazing fire of my own majesty.’ || 16 ||”
श्लोक ( Shlok ) 17
इति प्रतिनिवृत्त्याशु मिथ्यागर्व समुद्वहन् । जगाम पितुरभ्याशं धिगनीक्षितचेष्टितम् ॥ १७ ॥
ऐसा विचार कर वह शीघ्र ही लौट पड़ा और झूठा अहंकार धारण करता हुआ पिताके पास पहुँच गया। आचार्य कहते हैं कि इस बिना विचारी चेष्टाको धिक्कार है ॥ १७ ।।
“Thinking thus, he turned back immediately and returned to his father, harboring a false sense of pride. The Acharya (the sage/teacher) says: Fie upon such thoughtless and unreflective actions! || 17 ||”
श्लोक ( Shlok ) 18
‘इतो जलनिधेस्तीरे बले यादवभूभुजाम् । निविष्टवति निर्मापयितुं स्थानीयमात्मनः ॥ १८ ॥
इधर चलते-चलते यादवोंकी सेना अपना स्थान बनानेके लिए समुद्रके किनारे ठहर गई ।॥ १८ ॥
“Meanwhile, after marching for a long time, the army of the Yadavas halted at the shore of the ocean to establish their new domain. || 18 ||”
श्लोक ( Shlok ) 19 – 21
अष्टोपवासमादाय विधिमन्त्रपुरस्सरम् । कंसारिः शुद्धभावेन दर्भशय्यातलं गतः ॥ १९ ॥अश्वाकृतिधरं देवं मामारुह्य पयोनिधेः । गच्छतस्ते भवेन्मध्ये पुरं द्वादशयोजनम् ॥ २० ॥इत्युक्तो नैगमाख्येन सुरेण मधुसूदनः । चक्रे तथैव निश्चित्य सति पुण्ये न कः सखा ॥ २१ ॥
वहाँ कृष्णने शुद्ध भावोंसे दर्भके आसन पर बैठकर विधि-पूर्वक मन्त्रका जाप करते हुए अष्टोपवास का नियम लिया। उसी समय नैगम नामके देवने कहा कि मैं घोड़ाका रूप रखकर आऊँगा सो मुझपर सवार होकर तुम समुद्रके भीतर बारह योजन तक चले जाना । वहाँ तुम्हारे लिए नगर बन जायगा । नैगम देवकी बात सुन कर श्रीकृष्णने निश्चयानुसार वैसा ही किया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके रहते हुए कौन मित्र नहीं हो जाता ? ॥ १९ -२१ ॥
“There, with pure intentions, Shri Krishna sat upon a seat of darbha grass and, while systematically chanting the sacred mantras, took a vow of an eight-meal fast (Ashtopavasa). At that very moment, a deity named Naigama appeared and said, ‘I shall manifest in the form of a horse; riding upon me, you must venture twelve yojanas into the ocean. There, a magnificent city will be created for you.’ Hearing the words of the deity Naigama, Shri Krishna did exactly as planned. And rightly so—for as long as one’s store of spiritual merit (punya) remains intact, who does not become a friend? || 19 -21 ||”
श्लोक 22 से 32
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