नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 33 to 51
श्लोक ( Shlok ) 33 – 35
ततो वन्दिवचोयामभेरीध्वनिविबोधिता । कृतमङ्गल सुस्त्राना धृतपुण्यप्रसाधना ॥ ३३ ॥उपचारवदभ्येत्य नृपमर्धासने स्थिता । स्वदृष्टस्वप्नसाफल्य ‘मन्वयुक्त २ श्रुतागमम् ॥ ३४ ॥सङ्कलय्य नरेन्द्रोऽपि फलं तेषामभाषत । त्वद्गर्भे विश्वलोकेशोऽवतीर्ण इति सूक्ष्मधीः ॥ ३५ ॥
तदनन्तर – बन्दीजनोंके शब्द और प्रातःकालके समय बजनेवाली भेरियोंकी ध्वनि सुनकर जागी हुई रानी शिवदेवीने मङ्गलमय स्नान किया, पुण्य रूप वस्त्राभरण धारण किये और फिर बड़ी नम्रताले राजाके पास जाकर वह उनके अर्धासन पर बैठ गई। पश्ञ्चात् उसने अपने देखे हुए स्वप्नोंका फल पूछा। सूक्ष्म बुद्धिवाले राजा समुद्रविजयने भी सुने हुए आगमका विचार कर उन स्वप्नोंका फल कहा कि तुम्हारे गर्भमें तीन लोकके स्वामी तीर्थंकर अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३३-३५ ॥
Thereafter, awakened by the praises of the bards and the sounding of the morning drums, Queen Shivadevi took an auspicious bath and adorned herself with virtuous garments and ornaments. Then, approaching the King with great humility, she seated herself on half of his throne. Subsequently, she asked him about the fruits of the dreams she had seen. The sharp-witted King Samudravijaya, reflecting upon the scriptures (Agamas) he had studied, foretold the meaning of those dreams, saying, “The Lord of the Three Worlds, a Tirthankara, has descended into your womb.” (33-35)
श्लोक ( Shlok ) 36 – 37
श्रुत्वा तदैव तं लब्धवतीवातुषदप्यसौ । ज्ञात्वा स्वचिद्वैर्देवेन्द्राः सम्भूयागत्य संमदात् ॥ ३६ ॥स्वर्गावतारकल्याणमहोत्सवविधायिनः । ४स्वेषां पुण्यञ्च निर्वर्त्य स्वधाम समुपागमन् ॥ ३७ ॥
उस समय रानी शिवदेवी स्वप्नोंका फल सुनकर एसी सन्तुष्ट हुई मानो उसने तीर्थंकरको प्राप्त ही कर लिया हो। उसी समय इन्द्रोंने भी अपने-अपने चिह्नोंसे जान लिया। वे सब बड़े हर्षसे मिलकर आये और स्वर्गावतरण कल्याण (गर्भकल्याणक) का महोत्सव करने लगे। उत्सव द्वारा पुण्योपार्जन कर वे अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥ ३६-३७॥
At that moment, upon hearing the interpretation of her dreams, Queen Shivadevi felt as deeply satisfied as if she had already attained the Tirthankara himself. At that very time, the Indras also came to know of this event through their respective signs. Filling with immense joy, they all gathered together and began celebrating the grand festival of the Descent from Heaven (Garbha Kalyanak). Having earned spiritual merit (punya) through these celebrations, they returned to their respective abodes. (36-37)
श्लोक ( Shlok ) 38
स पुनः श्रावणे शुक्लपक्षे षष्ठीदिने जिनः । ज्ञानत्रितयभृत्त्वष्ट्योगे तुष्ठ्यामजायत ॥ ३८ ॥
फिर श्रावण शुक्ला षष्ठीके दिन चित्रा नक्षत्रमें ब्रह्मयोगके समय तीन ज्ञानके धारक भगवान्का जन्म हुआ ॥ ३८ ॥
Then, on the sixth day of the bright half of the month of Shravana (Shravana Shukla Shashthi), under the Chitra constellation (Nakshatra) and during the Brahma Yoga, the Lord—who possesses three types of cosmic knowledge (Avadhi, Shruta, and Mati Jnana)—was born. (38)
श्लोक ( Shlok ) 39 – 48
अथ स्वविष्टराकम्पसमुत्पन्नावधीक्षणाः । बुद्ध्वा भगवदुत्पत्ति सौधर्मेन्द्रपुरस्सराः ॥ ३९ ॥सञ्जातसम्मदाः प्राप्य परिवेष्ठ्य पुरं स्थिताः । ऐरावतगजस्कन्धमारोप्य भुवनप्रभुम् ॥ ४० ॥सौधर्माधिपतिर्भक्तया नीलाम्भोजदलद्युतिम् । ईशमीशानकल्पेशष्टतातपनिवारणम् ॥ ४१ ॥नमध्चमरवैरोचनोद्धूतचमरीरुहम् । धनेशनिर्मितश्रेधामणिसोपानमार्गगः ॥ ४२ ॥नीत्वा पयोदमार्गेण गिरीशेशानदिग्गते । पाण्डुका ख्यशिलाप्रस्थमणिसिंहधृतासने ॥ ४३ ॥अनादिनिधने बालमारोप्यात्यर्कतेजसम् । क्षीराम्भोधिपयः पूर्णसुवर्णकलशोत्तमैः ॥ ४४ ॥अष्टाधिकसहस्त्रेण प्रमितैरमितप्रभैः । हस्ताद्धस्तं क्रमेणामराधिनाथसमर्पितैः ॥ ४५ ॥अभिषिच्य यथाकाममलङ्कृत्य यथोचितम् । नेमि सद्धर्मचक्रस्य नेमिनाम्ना तमभ्यधात् ॥ ४६ ॥तस्मादानीय मौलीन्द्रमाननीयमहोदयम् । मातापित्रोः पुनर्दत्वा विधायानन्दनाटकम् ॥ ४७ ॥विकृत्य विविधान्बाहून् रसभावनिरन्तरम् । स्वावासमगमत्सर्वैरादिमेन्द्रः सहामरैः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर अपने आसन कम्पित होनेसे जिन्हें अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे सौधर्म आदि इन्द्र हर्षित होकर आये और नगरीको घेर कर खड़े हो गये । तदनन्तर जो नील कमलके समान कान्तिके धारक हैं, ईशानेन्द्रने जिनपर छत्र लगाया है, तथा नमस्कार करते हुए चमर और वैरोचन नामके इन्द्र जिनपर चमर ढोर रहे हैं ऐसे जिनेन्द्र बालकको सौधर्मेन्द्रने बड़ी भक्तिसे उठाया और कुबेर-निर्मित तीन प्रकारकी मणिमय सीढ़ियोंके मार्गसे चलकर उन्हें ऐरावत हाथीके स्कन्ध पर विराजमान किया । अब इन्द्र आकाश-मार्गसे चलकर सुमेरु पर पहुँचा वहाँ उसने सुमेरु पर्वतकी ईशान दिशा में पाण्डुक शिलाके अग्रभाग पर जो अनादि-निधन मणिमय सिंहासन रक्खा है उसपर सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी जिन-बालकको विराजमान कर दिया। वहीं उसने अनुक्रमसे हाथों हाथ लाकर इन्द्रोंके द्वारासौंपे हुए एवं और सागरके जलसे भरे, सुवर्णमय एक हजार आठ देदीप्यमान कलशोंके द्वारा उनका अभिषेक किया, उन्हें इच्छानुसार यथायोग्य आभूषणे पहिनाये और ये समीचीन धर्मरूपी चक्रकी नेमि हैं – चक्रधारा हैं’ इसलिए उन्हें नेमि नामसे सम्बोधित किया। फिर सौधर्मेन्द्रने मुकुट-बद्ध इन्द्रोंके द्वारा माननीय महाभ्युदयके धारक भगवान्को सुमेरु पर्वतसे लाकर माता-पिताको सौंपा, विक्रिया द्वारा अनेक भुजाएँ बनाकर रस और भावसे भरा हुआ आनन्द नामका नाटक किया और यह सब करनेके बाद वह समस्त देवोंके साथ अपने स्थान पर चला गया ॥ ३९ -४८ ॥
Thereafter, their thrones trembling, Saudharma and the other Indras attained Avadhijnana (clairvoyance). Filled with immense joy, they arrived and stood surrounding the city.
The infant Jinendra possessed a radiant complexion like that of a blue lotus. Ishanendra held an umbrella over Him, while the Indras named Namaskara, Chamara, and Vairochana waved fly-whisks (chamara) over Him. With deep devotion, Saudharmendra gently lifted the divine child, and walking along the path of three types of gem-studded steps crafted by Kubera, seated Him upon the shoulders of the Airavata elephant.
The Indra then traveled through the skyways and reached Mount Sumeru. There, on the Panduka rock in the northeast direction of Mount Sumeru, upon an eternal, gem-encrusted throne, he seated the divine child, who was more radiant than the sun itself. Right there, utilizing one thousand and eight dazzling golden pitchers filled with the waters of the ocean—passed hand to hand in sequence and handed over by the Indras—he performed His anointment (Abhisheka). He then adorned Him with appropriate ornaments as desired. Proclaiming, “He is the rim (nemi) of the wheel of true righteousness (Dharma-Chakra),” he named Him Nemi.
Afterward, Saudharmendra brought the Lord—who is possessed of supreme glory and is worshiped by the crown-wearing Indras—down from Mount Sumeru and presented Him to His parents. Creating multiple arms through his supernatural powers (Vikriya), he performed a grand dance filled with emotion and aesthetic delight called the Ananda Nataka. Having completed all this, he returned to his abode along with all the celestial beings (devas). (39-48)
श्लोक ( Shlok ) 49 – 51
नमेर्भगवतस्तीर्थसन्तानसमयस्थितेः । ‘पञ्चलक्षसमाप्रान्ते तदन्तर्गतजीवितः ॥ ४९ ॥जिनो नेमिः समुत्पन्नः सहस्त्राब्दायुरन्वितः । दशचापसमुत्सेधः शस्तसंस्थानसंहतिः ॥ ५० ॥त्रिलोकनायकाभ्यर्च्यः स्वभ्यर्णीकृतनिर्वृतिः । तस्थौ सुखानि दिव्यानि तस्मिन्ननुभवंश्चिरम् ॥ ५१ ॥
भगवान् नमिनाथकी तीर्थपरम्पराके बाद पाँच लाख वर्ष बीत जानेपर नेमि जिनेन्द्र उत्पन्न हुए थे, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी, उनकी आयु एक हजार वर्षकी थी, शरीर दश धनुष ऊँचा था, उनके संस्थान और संहनन उत्तम थे, तीनों लोकोंके इन्द्र उनकी पूजा करते थे, और मोक्ष उनके समीप था। इस प्रकार वे दिव्य मुखोंका अनुभव करते हुए चिरकाल तक द्वारावतीमें रहे ।। ४९ -५१ ॥
Five hundred thousand (five lakh) years after the spiritual lineage (Teertha-parampara) of Lord Naminatha, Jinendra Nemi was born; His own lifespan was also included within this intervening period. His lifespan was one thousand years, and His body stood ten dhanushas (bow-lengths) tall. His bodily structure (Sansthana) and skeletal constitution (Samhanana) were of the supreme order. The Indras of all the three worlds worshiped Him, and His liberation (Moksha) was near. In this manner, experiencing divine bliss, He resided in Dwaravati (Dwaraka) for a long period of time. (49-51)
श्लोक 52 से 64
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32
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