नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोश्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 214 to 221
श्लोक ( Shlok ) 214
दष्टा वसन्तकालोग्रविषेण विषभर्तृणा । विषव्याप्त शरीरत्वादस्पन्दाभूदसौं तदा ॥ २१४ ॥
वसन्त ऋतुके तीव्र विषवाले साँपने उस मंगीको हाथ डालते ही काट खाया जिससे उसके समस्त शरीरमें विष फैल गया और वह उसी समय निश्चेष्ट हो गई ।। २१४ ॥
“The moment Mangi reached her hand in, the snake—bearing the highly potent venom of the spring season—bit her. Consequently, the poison rapidly spread throughout her entire body, and she instantly fell unconscious and motionless. || 214 ||”
श्लोक ( Shlok ) 215 – 216
पलालवर्त्या सावेष्ट्ठ्य स्रुषां प्रेतवनेऽत्यजत् । वज्रमुष्टिर्वनक्रीडाविरामेऽभ्येत्य पृष्टवान् ॥ २१५ ॥मङ्गी केत्याकुलो माताप्यसद्वार्ता न्यवेदयत् । सशोकः ससमुत्खातनिशातकरवालधृत् ॥ २१६ ॥
वपश्री, बहूको पयालसे लपेट कर श्मशानमें छोड़ आई। जब वज्रमुष्टि वनक्रीड़ा समाप्त होनेपर लौट कर आया तो उसने आकुल होकर अपनी माँसे पूछा कि मंगी कहाँ है ? माताने झूठमूठ कुछ उत्तर दिया परन्तु उससे वह संतुष्ट नहीं हुआ। मंगीके नहीं मिलनेसे वह बहुत दुःखी हुआ और नंगी तीक्ष्ण तलवार लेकर ढूँढ़नेके लिए रात्रिमें ही चल पड़ा ।। २१५-२१६ ॥
“Wrapping her daughter-in-law in straw, Vaprashri abandoned her in the cremation ground. When Vajramushti returned after finishing his sports in the forest, he anxiously asked his mother, ‘Where is Mangi?’ His mother gave a deceptive reply, but he was not satisfied with it. Greatly distressed by Mangi’s absence, he took a sharp, unsheathed sword and set out into the night to search for her. || 215-216 ||”
श्लोक ( Shlok ) 217 – 219
तामन्वेष्टुं व्रजश्रात्रौ श्मशाने योगमास्थितम् । वरधर्ममुनिं दृष्ट्वा नमद्भक्त्या कृताञ्जलिः ॥ २१७ ॥यदि पूज्य प्रियां प्रेक्षे सहस्त्रदलवारिजैः । त्वां समभ्यर्चयिष्यामीत्याशास्य गतवांस्तदा ॥ २१८ ॥वीक्षते स्म प्रियामीषच्चेतनां विषदूषिताम् । पलालवर्ति मुक्त्वाशु समानीयान्तिकं मुनेः ॥ २१९ ॥
उस समय श्मशानमें वरधर्म नामके मुनिराज योग धारण कर विराजमान थे । वज्रमुष्टिने भक्तिसे हाथ जोड़ कर उनके दर्शन किये और कहा कि हे पूज्य ! यदि मैं अपनी प्रियाको देख सकूंगा तो सहस्त्रदल वाले कमलोंसे आपकी पूजा करूँगा । ऐसी प्रतिज्ञा कर वज्रमुष्टि आगे गया। आगे चलकर उसने जिसे कुछ थोड़ी सी चेतना बाकी थी, ऐसी विषसे दूषित अपनी प्रिया देखी। वह शीघ्र ही पयाल हटाकर उसे मु निराजके समीप ले आया।।२१७-२१९ ।।
“At that moment, an ascetic named Muniraj Vardharma was seated in the cremation ground, deeply absorbed in meditation. With devotion, Vajramushti folded his hands, paid his respects to him, and said, ‘O Holy Sage! If I am able to see my beloved, I shall worship you with thousands of petaled lotuses.’ Having made this vow, Vajramushti moved forward. Proceeding ahead, he discovered his poison-afflicted beloved, who still had a faint glimmer of consciousness remaining. He swiftly removed the straw and brought her near the presence of the Muniraj. || 217-219 ||”
श्लोक ( Shlok ) 220
तेन तत्पादसंपर्शभेषजेनाविषीकृता । सापि सद्यः समुत्थाय प्रियस्य प्रीतिमातनोत् ॥ २२० ॥
और मुनिराज के चरण-कमलोंके स्पर्श रूपी ओषधिसे उसने उसे विषरहित कर लिया । मंगीने भी उठकर अपने पतिका आनन्द बढ़ाया ।। २२० ॥
“And through the remedy of touching the lotus-feet of the Muniraj, he freed her from the venom. Arising, Mangi too brought great joy to her husband. || 220 ||”
श्लोक ( Shlok ) 221
गुरुप्रीतमनस्यस्मिन्नम्भोजार्थ गते सति । शूरसेनस्तदा सर्वं तत्कर्मान्तर्हितो द्रुमैः ॥ २२१ ॥
तदनन्तर गुरुदेवके ऊपर जिसका मन अत्यन्त प्रसन्न है ऐसा वज्रमुष्टि इधर सहस्त्रदल कमल लानेके लिए चला गया। उधर वृक्षोंसे छिपा हुआ शूरसेन यह सब काम देख रहा था ।। २२१ ।।
“Thereafter, with a heart overflowing with immense gratitude toward the Gurudeva, Vajramushti departed to fetch the thousand-petaled lotuses. Meanwhile, Shurasena, who was hidden behind the trees, had been watching this entire event unfold. || 221 ||”
श्लोक 222 से 231
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213
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