नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 191 to 200
श्लोक ( Shlok ) 191 – 197
प्राहुर्नास्तीति यं केचित् केचिन्नित्यं क्षणस्थितिम् । केचित्केचिदणं चाणोः केचिच्छयामाकसम्मितम् ॥ १९१॥केचिदङ्गुष्ठमातव्यं योजनानां समुच्छ्रितम् । केचिच्छतानि पञ्चैव केचिद्गगनवद्विभुम् ॥ १९२ ॥केचिदेकं परेनाना परेऽज्ञमपरेऽन्यथा । तं जीवाख्यं प्रतिप्रायः सन्देहोऽस्तीत्यधीश्वरम् ॥ १९३ ॥पप्रच्छ सोऽपि नैतेषु कोऽपि विख्यस्य लक्षणम् । ध्रौव्योत्पादव्ययात्मासौ गुणी सूक्ष्मः स्वकृत्यभुक् ॥ १९४ज्ञाताशदेहसम्मेयः स्वसंवेद्यः सुखादिभिः । अनादिकर्मसम्बन्धः सरन् गतिचतुष्टये ॥ १९५ ॥कालादिलब्धिमासाद्य भव्यो नष्टाष्टकर्मकः । सम्यक्त्वाद्यष्टकं प्राप्य प्राग्देहपरिमाणधृत् ॥ १९६ ॥उर्ध्वव्रज्यास्वभावत्वाज्जगन्मूर्धनि तिष्ठति । इति जीवस्य सद्भावं जगाद जगतां गुरुः ॥ १९७ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णने कहा कि हे भगवन् ! कोई तो कहते हैं कि जीव नामका पदार्थ है ही नहीं, कोई उसे नित्य मानते हैं, कोई क्षणस्थायी मानते हैं, कोई अणुसे भी सूक्ष्म मानते हैं ? कोई श्यामाक नामक धान्यके बराबर मानते हैं, कोई एक अङ्गुष्ठ प्रमाण मानते हैं, कोई पाँचसौ योजन मानते हैं, कोई आकाशकी तरह व्यापक मानते हैं? कोई एक मानते हैं, कोई नाना मानते हैं, कोईअज्ञानी मानते हैं और कोई उसके विपरीत ज्ञानसम्पन्न मानते हैं। इसलिए हे भगवन्, मुझे जीवं तत्त्वके प्रति संदेह हो रहा है, इस प्रकार श्रीकृष्णने भगवान् से पूछा। भगवान् उत्तर देने लगे कि जीव तत्त्वके विषयमें अब तक आप लोगोंने जो विकल्प उठाये हैं उनमेंसे इस जीवका एक भी लक्षण नहीं है यह आप निश्चित समझिए। यह जीव उत्पाद व्यय तथा ध्रौव्यसे युक्त है, गुणवान् है, सूक्ष्म है, अपने किये हुए कर्मोंका फल भोगता है, ज्ञाता है, ग्रहण किये शरीरके बराबर है, सुख-दुःख आदिसे इसका संवेदन होता है, अनादि कालसे कर्मबद्ध होकर चारों योनियोंमें भ्रमण कर रहा है। यदि यह जीव भव्य होता है तो कालादि लब्धियोंका निमित्त पाकर ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंका क्षय हो जानेसे सम्यक्त्व आदि आठ गुण प्राप्त कर लेता है और मुक्त होकर चरम शरीरके बराबर हो जाता है। चूँकि इस जीवका स्वभाव ऊर्ध्वगमनका है इसलिए वह तीन लोकके ऊपर विद्यमान रहता है। इस प्रकार जगद्गुरु भगवान् नेमिनाथने जीवके सद्भावका निरूपण किया ॥ १९१-१९७ ।।
“Thereafter, Shri Krishna asked, ‘O Lord! Some say that an entity called the soul (Jiva) does not exist at all. Some consider it to be eternal (Nitya), while others view it as momentary (Kshanashthayi). Some believe it to be subtler than an atom, while others consider it to be the size of a grain of wild millet (Shyamaka). Some state it is of the measure of a thumb, some say it extends up to five hundred yojanas, and others believe it to be all-pervading like space (Akasha). Some hold that there is only one universal soul, while others believe there are many. Some consider it to be inherently ignorant, while others, contrary to that, view it as inherently possessed of absolute knowledge. Therefore, O Lord, I harbor deep doubts regarding the reality of the soul.’ Thus did Shri Krishna question the Lord.
The Lord began His reply: ‘You must know for certain that among all the alternative views you have raised regarding the nature of the soul, not a single one defines its true characteristic.
This soul is endowed with origination (Utpada), destruction (Vyaya), and permanence (Dhrauvya). It possesses attributes (Guna), is subtle (Sukshma), reaps the fruits of its own past actions (Karmas), and is the ultimate knower (Gnata). It contracts or expands to equal the measure of the body it occupies, and perceives through the sensations of pleasure, pain, and the like. Bound by karmas since time immemorial, it wanders through the four realms of existence (Gatis).
If this soul is capable of liberation (Bhavya), then upon attaining the right instrumental causes—such as the opportune time (Kala-labdhi)—and by destroying the eight types of karmas (including the knowledge-obscuring Jnanavaraniya karma), it attains the eight supreme attributes like right belief (Samyaktva). Thus liberated, it assumes a form slightly less than the size of its final physical body (Charama-sharira). Since the inherent nature of this soul is to move upward (Urdhvagamana), it resides eternally at the apex of the three worlds (the Siddhashila).’
In this manner, Lord Neminath, the Preceptor of the Universe, elucidated the true existence and nature of the soul. || 191-197 ||”
श्लोक ( Shlok ) 198 – 200
तन्निशम्यास्तिकाः सर्वे तथेति प्रतिपेदिरे । अभव्या दूरभव्याश्च मिथ्यात्वोदयदूषिताः ॥ १९८ ॥नामुञ्चन्केचनानादिवासनां भववर्धनीम् । देवकी च तथापृच्छद्वरदशगणेशिनम् ॥ १९९ ॥भगवन्मद्द्रुहं द्वौ द्वौ भूत्वा भिक्षार्थमागताः । बान्धवेष्विव षट्स्वेषु स्नेहः किमिति जातवान् ॥ २०० ॥
उसे सुन कर जो भव्य जीव थे, उन्होंने जैसा भगवान् ने कहा था वैसा ही मान लिया परन्तु जो अभव्य अथवा दूरभव्य थे वे मिध्यात्वके उदयसे दूषित होनेके कारण संसारको बढ़ानेवाली अपनी अनादि वासना नहीं छोड़ सके । तदनन्तर देवकीने वरदत्त गणधर से पूछा कि हे भगवन् ! मेरे घर पर दो दो करके छह मुनिराज भिक्षाके लिए आये थे उन छहोंमें मुझे कुटुम्बियों जैसा स्नेह उत्पन्न हुआ था सो उसका कारण क्या है ? ।। १९८-२०० ।।
“Upon hearing this discourse, the fortunate souls (Bhavya Jivas) accepted the reality precisely as the Lord had revealed it. However, those who were incapable of liberation (Abhavya) or far removed from it (Durbhavya), being corrupted by the rise of deluding karmas (Mithyatva), could not give up their beginningless worldly attachments that perpetuate the cycle of transmigration.
Thereafter, Queen Devaki questioned Chief Disciple Varadatta Ganadhara, ‘O Holy Sage! Six ascetics came to my home for alms, arriving in pairs of two. Upon seeing them, a profound familial affection arose within my heart for all six of them. What is the karmic cause behind this?’ || 198-200 ||”
श्लोक 201 से 213
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