अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 241 to 252
श्लोक ( Shlok ) 241 – 246
द्वीपेऽस्मिन् दक्षिणश्रेण्यां भरते खचराचले । ज्योतिः प्रभुधराधीशः सम्भिन्नोऽहं मम प्रिया ॥ २४१ ॥ संज्ञया सर्वकल्याणी सूनुर्दीपशिखाह्वयः । एष मे स्वामिना गत्वा रथनूपुरभूभुजा ॥ २४२ ॥ विहत्तुं विपुलोद्याने नलान्तशिखरश्रुते । ततो निवर्तमानः सन् स्वयानकविमानगाम् ॥ २४३ ॥ क्क मे श्रीविजयः स्वामी रथनूपुरभूपते । क मां पाहीति साक्रोशस्वनितां करणस्वनम् ॥ २४४ ॥ श्रत्याहं तत्र गत्वाऽऽख्यं कस्त्वं कां वा हरस्यमुम् । इत्यसौ चाह सक्रोधं चञ्चान्तचमराधिपः ॥२४५॥ खगेशोऽशनिघोषाख्यो हठादेनां नयाम्यहम् । भवतो यदि सामर्थ्यमस्स्येोहीति मोचय ॥२४६ ॥
इस जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक ज्योतिःप्रभ नामका नगर है। मैं वहाँका राजा संभिन्न हूँ, यह सर्वकल्याणी नामकी मेरी स्त्री है और यह दीपशिख नामका मेरा पुत्र है। मैं अपने स्वामी रथनूपुर नगरके राजा अमिततेजके साथ शिखरनल नामसे प्रसिद्ध विशाल उद्यानमें विहार करनेके लिए गया था। वहाँ से लौटते समय मैंने मार्गमें सुना कि एक स्त्री अपने विमान पर बैठी हुई रो रही है और कह रही है कि ‘मेरे स्वामी श्रीविजय कहाँ हैं ? हे रथनूपुरके नाथ ! कहाँ हो ? मेरी रक्षा करो।’ इस प्रकार उसके करुण शब्द सुनकर मैं वहाँ गया और बोला कि तू कौन है ? तथा किसे हरण कर ले जा रहा है? मेरी बात सुन कर वह बोला कि मैं चमरचन नगरका राजा अशनिघोष नामका विद्याधर हूँ। इसे जबर्दस्ती लिए जा रहा हूँ, यदि आप में शक्ति है तो आओ और इसे छुड़ाओ ।॥ २४१-२४६ ॥
In the southern range of the Vijayardha Mountain within this Bharat Kshetra of Jambudvipa, there is a city named Jyotihprabha. I am Sambhinna, the king of that city; this is my wife, named Sarvakalyani, and this is my son, named Dipashikha.
I had gone to amuse myself in the vast and famous garden named Shikharanal, along with my lord Amitateja, the king of Rathanupur city. While returning from there, I heard a woman weeping on the way. Sitting in her aerial chariot (Vimana), she was crying out, ‘Where is my lord Shrivijaya? O Lord of Rathanupur, where are you? Save me!’
Hearing her pitiful cries, I went there and demanded, ‘Who are you, and who is this that you are forcibly abducting?’
Hearing my words, he replied, ‘I am a Vidyadhara named Ashanighosha, the king of Chamarachana city. I am taking her away by force. If you have the strength, come forward and rescue her!’ [241-246]
श्लोक ( Shlok ) 247 – 252
तच्छ्रुत्वा मत्प्रभोरेषा नीयते तेन सानुजा । सामान्यवस्कथं यामि हन्म्येनमिति निश्वयात् ॥२४७॥योढुं प्रक्रममाणं मां निवार्यानेन मा कृथाः । बृथेति युद्धं निर्बन्धात्पोदनाख्यपुराधिपः ॥ २४८ ॥ ज्योतिर्वने वियोगेन मम शोकानलाहतः । वर्तते तत्र गत्वा तं मदवस्थां निवेदय ॥ २४९ ॥इति स्वत्कान्तया राजन् प्रेषितोऽहमिहागतः । इयं त्वद्वैरिनिर्दिष्टदेवतेत्यादराद्धितः ॥ २५० ॥श्रुत्वा तत्पोदनाधीशो सत्कृतं कथ्यतामिदम् । वृत्तान्तं सत्वरं गत्वा सन्मित्रेण त्वयाऽधुना ॥ २५१ ॥मज्जनन्यनुजादीनामित्युक्तोऽसौ नभश्वरः । सुतं द्वीपशिखं सद्यः प्राहिणोत्पोदनं प्रति ॥ २५२ ॥
यह सुनकर मैंने निश्चय किया कि यह तो मेरे स्वामी अमिततेजकी छोटी बहिनको ले जा रहा है। मैं साधारण मनुष्यकी तरह कैसे चला जाऊँ ? इसे अभी मारता हूँ। ऐसा निश्चय कर मैं उसके साथ युद्ध करनेके लिए तत्पर हुआ ही था कि उस स्त्रीने मुझे रोककर कहा कि आग्रह वश वृथा युद्ध मत करो, पोदनपुरके राजा ज्योतिर्वनमें मेरे वियोगके कारण शोकाग्निसे पीड़ित हो रहे हैं तुम वहाँ जाकर उनसे मेरी दशा कह दो । इस प्रकार हे राजन्, मैं तुम्हारी स्त्रीके द्वारा भेजा हुआ यहाँ आया हूँ। यह तुम्हारे वैरीकी आज्ञा-कारिणी वैताली देवी है। ऐसा उस हितकारी विद्याधरने बड़े आदरसे कहा। इस प्रकार संभिन्न विद्याधरके द्वारा कही हुई बातको पोदनपुरके राजाने बड़े आदरसे सुना और कहा कि आपने यह बहुत अच्छा किया । आप मेरे सन्मित्र हैं अतः इस समय आप शीघ्र ही जाकर यह समाचार मेरी माता तथा छोटे भाई आदिसे कह दीजिये। ऐसा कहनेपर उस विद्याधरने अपने दीपशिख नामक पुत्रको शीघ्र ही पोदनपुरकी ओर भेज दिया ॥ २४७-२५२ ॥
Hearing this, I realized, “He is carrying away the younger sister of my lord Amitateja! How can I just walk away like an ordinary man? I shall slay him right now.” Having made up my mind, I was just preparing to wage war against him when that woman stopped me and said, “Do not fight in vain out of sheer stubbornness. The King of Podanpur is suffering from the fire of grief in the Jyotirvana forest due to separation from me; go there and inform him of my plight.”
“Therefore, O King, I have come here sent by your wife. And this is the goddess Vaitali, who obeys the commands of your enemy.”
Thus spoke that well-wishing Vidyadhara with great respect.
The King of Podanpur listened to the words spoken by Sambhinna Vidyadhara with profound respect and said, “You have done a great deed. You are my true friend; therefore, go quickly at this moment and convey this news to my mother and younger brother.”
Upon being requested thus, that Vidyadhara immediately dispatched his son named Dipashikha toward Podanpur. [247-252]
श्लोक 253 से 261
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