मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 333 to 343
श्लोक ( Shlok ) 333 – 334
“द्वयोर्वचनमाकर्ण्य द्विजप्रमुखसाधवः । मात्सर्यान्नारदेनैष धर्मः प्राणवधादिति ॥ ३३३॥प्रतिष्ठापयितुं धात्र्यां दुरात्मा पर्वतोऽब्रवीत् । ‘पतितोऽयमयोग्योऽतः सह सम्भाषणादिभिः ॥ ३३४॥
उन दोनोंके वचन सुनकर उत्तम प्रकृति वाले साधु पुरुष कहने लगे कि इस दुष्ट पर्वतकी नारदके साथ ईर्ष्या है इसीलिए यह प्राणवधसे धर्म होता है यह बात पृथिवी पर प्रतिष्ठा-पित करनेके लिए कह रहा है। यह पर्वत बड़ा ही दुष्ट है, पतित है अतः हम सब लोगोंके साथ वार्तालाप आदि करनेमें अयोग्य है ।॥ ३३३-३३४ ॥
Hearing the statements of both, the noble-natured sages said, “This wicked Parvata harbors deep envy toward Narada. It is for this reason alone that he is asserting that righteousness (Dharma) can be derived from the killing of living beings, in an attempt to establish this false notion upon the earth. This Parvata is exceedingly wicked and fallen; therefore, he is entirely unfit to engage in conversation or interact with us.” || 333-334 ||
श्लोक ( Shlok ) 335
इति हस्ततलास्फालनेन निर्भयै तं क्रुधा । घोषयामासुरत्रैव दुर्बुद्धेरीदृशं फलम् ॥३३५॥
इस प्रकार सबने क्रोधवश हाथकी हथेलियोंके ताड़नसे उस पर्वतका तिरस्कार किया और घोषणा की कि दुर्बुद्धिका ऐसा फल इसी लोकमें मिल जाता है ।। ३३५ ।।
In this manner, out of sheer indignation, everyone scorned and rejected Parvata by clapping their hands at him, declaring, “Such is the fruit of a wicked intellect, received in this very world!” || 335 ||
श्लोक ( Shlok ) 336 – 343
कृतः सर्वैर्मानभङ्गादगाद्वनम् । तत्र ब्राह्मणवेषेण वयसा परिणामिना ॥ ३३६॥’ कृतान्तारोहणासन्नसोपानपदवीरिव । वलीरुद्वहता भूयः स्खलतेवान्धचक्षुषा ॥३३७॥विरलेन शिरोजेन सितेन दधता ततम् । राजतं वा शिरस्त्राणमन्तिकान्तकजाजयात् ॥३३८॥ जराङ्गनासमासङ्ग सुखाद्वामीलचक्षुषा । चलच्छिन्नकरेणेव करिणा कुपिताहिना ॥३३९॥ हृवोर्ध्वश्वासिना राजवल्लभेनेव नाग्रतः । प्रस्फुटं पश्यता भग्नष्पृष्ठेनापटुभाषिणा ॥३४०॥राज्ञेव योग्यदण्डेन शमेनेव तनूभृता । विश्वभूनृपकन्यासु बद्धक्रोधमिवात्मनः ॥३४१॥ वक्तुं धारयता यज्ञोपवीतं त्रिगुणीकृतम् । तेन स्वाभिमतारम्भसिद्धिहेतुगवेषिणा ॥३४२॥ महाकालेन दृष्टः सन् पर्वतः पर्वते भ्रमन् । प्रतिगम्य तमानम्य सोऽभ्यधादभिवादनम् ॥३४३॥
इसप्रकार सबके द्वारा बाहर निकाला हुआ पर्वत मान-भङ्ग होनेसे बनमें चला गया। वहाँ महाकाल नामका असुर ब्राह्मणका वेष रखकर भ्रमण कर रहा था। उस समय वह वृद्ध अवस्थाके रूपमें था, वह बहुत-सी बलि अर्थात् शरीरकी सिकुड़नोंको धारण कर रहा था वे सिकुड़नें ऐसी जान पड़ती थीं मानो यमराजके चढ़नेके लिए सीदियोंका मार्ग ही हो। अन्धेकी तरह वह बार-बार लड़खड़ाकर गिर पड़ता था, उसके शिर पर विरले विरले सफेद बाल थे, वह एक सफेद रङ्गकी पगड़ी धारण कर रहा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो यमराजके भयसे उसने चाँदीका टोप ही लगा रक्खा हो, उसके नेत्र कुछ-कुछ बन्द थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वृद्धावस्था रूपी स्त्रीके समागमसे उत्पन्न हुए सुखसे ही उसके नेत्र बन्द हो रहे थे, उसकी गति सूँड़ कटे हुए हाथीके समान थी, वह क्रुद्ध साँपके समान लम्बी-लम्बी श्वास भर रहा था, राजाके प्यारे मनुष्यके समान वह मदसे आगे नहीं देखता था, उसकी पीठ टूटी हुई थी। वह स्पष्ट नहीं बोल सकता था, जिस प्रकार राजा योग्य दण्डसे सहित होता है अर्थात् सबके लिए योग्य दण्ड सजा देता है उसी प्रकार वह भी योग्य दण्डसे सहित था – अर्थात् अपने अनुकूल दण्ड-लाठी लिये हुए था, ऊपरसे इतना शान्त दिखता था मानो शरीरधारी शम-शान्ति ही हो, विश्वभू मन्त्री, सगर राजा और सुलसा कन्याके ऊपर हमारा बैर बँधा हुआ है यह कहनेके लिए ही मानो वह तीन लड़ का यज्ञोपवीत धारण कर रहा था, वह अपना अभिप्राय सिद्ध करनेके लिए योग्य कारण खोज रहा था। ऐसे महाकालने पर्वत पर घूमते हुए क्षीरकदम्बकके पुत्र पर्वतको देखा । ब्राह्मण वेषधारी महाकालने पर्वतके सम्मुख जाकर उसे नमस्कार किया और पर्वतने भी उसका अभिवादन किया ।। ३३६-३४३ ।।
Ostracized by everyone in this manner, his pride completely shattered, Parvata went away into the forest.
There, a demon named Mahakala was wandering about, disguised in the form of an old Brahmin. He was advanced in age and his body was covered in countless wrinkles, which appeared as though they were a flight of stairs constructed for Yamaraja (the God of Death) to ascend. Like a blind man, he would repeatedly stumble and fall. Sparse white hairs clung to his head, and he wore a white turban which made it look as if he had put on a silver helmet out of fear of Yamaraja. His eyes were half-closed, appearing as though they had shut from the sheer bliss of his union with the lady called Old Age.
His gait resembled that of an elephant whose trunk had been severed. He was breathing heavily like an enraged serpent. Much like a favored courtier of a king blinded by arrogance, he could not see what lay ahead of him, and his back was bent and broken. He could not speak clearly. Furthermore, just as a king is possessed of the authority to mete out proper justice (Danda), he too was possessed of a proper staff (Danda) suited to support his body. On the outside, he appeared so serene as if he were tranquillity (Shama) itself personified in human form. It seemed as though he was wearing a three-stranded sacred thread (Yajnopaveeta) precisely to proclaim, “My enmity is firmly sworn against Minister Vishvabhū, King Sagara, and the maiden Sulasa.”
This Mahakala was searching for an opportune moment to fulfill his sinister motives. While wandering through the hills, he spotted Parvata, the son of Kshirakadamba. Approaching Parvata, Mahakala, disguised as a Brahmin, bowed to him, and Parvata returned the salutation. || 336-343 ||
श्लोक 344 से 353
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332
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