नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 422 to 431
श्लोक ( Shlok ) 422 – 423
तच्चंक्रमणवेलायां तालस्याकृतिमास्थिता । एका फलानि तन्मूर्हिन प्रपातयितुमुद्यता ॥४२२॥रासभीरूपमापाद्य तं दष्टुमपरागता । चरणे रासभी विष्णुर्गृहीत्वाहन्स तं द्रुमम् ॥४२३॥
किसी दिन कोई एक देवी ताड़का वृक्ष बन गई । बालक श्रीकृष्ण चलते-चलते जब उसके नीचे पहुंचा तो दूसरी देवी उसके मस्तक पर फल गिरानेकी तैयारी करने लगी और कोई एक देवी गधीका रूप रखकर उसे काटनेके लिए उद्यत हुई । श्रीकृष्णने उस गधीके पैर पकड़ कर उसे ताड़ वृक्षसे दे मारा जिससे वे तीनों ही देवियाँ नष्ट हो गई ॥ ४२२-४२३ ॥
“One day, a certain goddess turned into a palmyra (Tad) tree. As the child Shri Krishna reached beneath it while walking, another goddess prepared to drop a fruit onto his head, and yet another goddess took the form of a female donkey, ready to bite him. Shri Krishna caught the female donkey by her legs and dashed her against the palmyra tree, resulting in the destruction of all three goddesses. ॥ 422-423 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 424 – 425
अन्येद्युर्देवताव्यापि विकृत्य तुरगाकृतिम् । तं हन्तुं प्रस्थिता तस्य सोऽदलद्वदनं रुषा ॥४२४॥ आहन्तुमसमर्थाः स्म इत्युक्त्वा सप्तदेवताः । कंसाभ्याशं समागत्य विलीना इव विद्युतः ॥ ४२५॥
किसी दूसरे दिन कोई देवी घोड़ेका रूप बनाकर कृष्णको मारनेके लिए चली परन्तु कृष्णने क्रोधवश उसका मुँह ही तोड़ दिया। इस प्रकार सातों देवियों कंसके समीप जाकर बोलीं कि ‘हमलोग आपके शत्रुको मारने में असमर्थ हैं’ इतना कहकर वे बिजली के समान विलीन हो गई ॥४२४-४२५॥
“On another day, a certain goddess took the form of a horse and went to kill Krishna, but out of anger, Krishna broke her mouth. In this manner, all seven goddesses went to Kamsa and said, ‘We are unable to kill your enemy.’ Saying this much, they vanished like a flash of lightning. ॥ 424-425 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 426
शक्तयो देवतानाञ्च निस्साराः पुण्यवज्जने । आयुधानामिवेन्द्रास्त्रे परस्मिन्दृष्टकर्मणाम् ॥४२६॥
अन्य लोगों पर अपना कार्य दिखानेवाले शस्त्र जिस प्रकार इन्द्रके वज्रायुध पर निःसार हो जाते हैं उसी प्रकार अन्यत्र अपना काम दिखानेवाली देवोंकी शक्तियाँ भी पुण्यात्मा पुरुषके विषयमें निःसार हो जाती हैं ।॥ ४२६ ॥
“Just as weapons that show their power on ordinary people become useless against Indra’s thunderbolt (Vajrayudha), similarly, the powers of the gods—which are effective elsewhere—become entirely useless when directed against a virtuous person (Punyatma Purusha). ॥ 426 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 427 – 428
अरिष्टाख्यसुरोऽन्येद्युर्वीक्षितुं तत्पराक्रमम् । आयात्कृष्णं वृषाकारस्तद्ग्रीवाभञ्जनोद्यतम् ॥४२७॥ तस्य माताभितज्यैनं विरमाफलचेष्टितात् । पुत्रैवमादिनः क्लेशान्तरसम्पादकादिति ॥४२८॥
किसी एक दिन अरिष्ट नामका असुर श्रीकृष्णका बल देखनेके लिए काले बैलका रूप रखकर आया परन्तु श्रीकृष्ण उसकीगर्दन ही तोड़नेके लिए तैयार हो गया। अन्तमें माताने उसे ललकार कर और हे पुत्र ! दूसरे प्राणियोंको क्लेश पहुँचानेवाली इन व्यर्थकी चेष्टाओंसे दूर रह’ इत्यादि कहकर उसे रोका ॥ ४२७-४२८ ॥
“One day, a demon named Arishta took the form of a black bull and came to test Shri Krishna’s strength, but Shri Krishna prepared to break his neck. Ultimately, His mother challenged (called out to) Him and stopped Him, saying, ‘O son! Stay away from these useless actions that cause distress to other living beings,’ and so on. ॥ 427-428 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 429
निवारयामास तथाप्येतन्मदोधुरः । सोऽन्वतिष्ठन्निवार्यन्ते नापदाने महौजसः ॥४२९॥
यद्यपि माता यशोदा उसे इन कार्योंसे बार-बार रोकती थी पर तो भी मदसे उद्धत हुआ बालक कृष्ण इन कार्योंको करने लगता था सो ठीक ही है क्योंकि महाप्रतापी पुरुष साहसके कार्यमें रोके नहीं जा सकते ॥ ४२९ ॥
“Although Mother Yashoda repeatedly restrained Him from these activities, the young child Krishna, arrogant with His own might, would still engage in them. And that is only fitting, for highly glorious and powerful souls can never be held back from acts of courage. ॥ 429 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 430 – 431
श्रुत्वा तत्पौरुषं ख्यातं जनजल्पैः समुत्सुकौ । गोलुखीनामधेयोपवासव्याजमुपागतौ ॥४३०॥ देवकी वसुदेवश्च विभूत्या सह सीरिणा । ब्रजं गोधावनं यातौ परिवारपरिष्कृतौ ॥४३१॥
देवकी और वसुदेवने लोगोंके कहनेसे श्रीकृष्णके पराक्रमकी बात सुनी तो वे उसे देखनेके लिए उत्सुक हो उठे। निदान एक दिन वे गोमुखी नामक उपवासके बहाने बलभद्र तथा अन्य परिवारके लोगोंके साथ वैभव प्रदर्शन करते हुए व्रजके गोधा वनमें गये ॥ ४३०-४३१ ॥
“When Devaki and Vasudeva heard about Shri Krishna’s heroic exploits from the local people, they became eager to see Him. Consequently, one day, under the pretext of observing a fast known as Gomukhi, they traveled along with Balabhadra (Balarama) and other family members to the Godha forest of Vraja, displaying great splendor. ॥ 430-431 ॥”
श्लोक 432 से 441
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