नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 403 to 411
श्लोक ( Shlok ) 403 – 404
इति सन्तुष्य तत्सर्वमववोध्य प्रवृत्तकम् । तदपत्यं समादाय दत्वा तस्मै स्वमर्भक्रम् ॥४०३॥भाविचक्रधरं विद्धि बालमित्यभिधाय च । अनन्यविदितौ गूढं तौ तदाविशतां पुरम् ॥४०४॥
इस प्रकार सन्तुष्ट होकर उन्होंने नन्द गोपके लिए सब समाचार सुना दिये, उसकी लड़की ले ली और अपना पुत्र उसे दे दिया। साथ ही यह भी कह दिया कि तुम इसे होनहार चक्रवर्ती समझो । यह सब काम कर वे दोनों किसी दूसरेको मालूम हुए बिना ही गुप्त रूपसे नगरमें वापिस आ गये ॥ ४०३-४०४ ।।
“Being thus satisfied, they narrated the entire matter to Nandagopa, took his baby girl, and gave him their own son. At the same time, they told him, ‘Know this child to be a future Sovereign Emperor (Chakravartin).’ Having accomplished all this, both of them secretly returned to the city without anyone else finding out.” (403–404)
श्लोक ( Shlok ) 405 – 407
नन्दगोपोऽपि तं बालमादाय गृहमागतः । तुभ्यं सुतं महापुण्यं प्रसन्ना देवता ददुः ॥४०५॥इत्युदीर्यार्पयायास स्वप्रियायै श्रियः पतिम् । कंसोऽपि देवकी स्त्रीत्ववदपत्यमसूयत ॥४०६॥इति श्रुत्वा समागत्य तां व्यधाद् ‘भुग्ननासिकाम् । भूमिगेहे प्रयत्नेन मात्रा (साध्वभिवधिता ॥४०७॥
इधर नन्दगोप भी वह बालक लेकर घर आया और ‘लो, प्रसन्न होकर उन देवताओंने तुम्हारे लिए यह महापुण्यवान् पुत्र दिया है’ यह कहकर अपनी प्रियाके लिए उसने वह होनहार चक्रवर्ती सौंप दिया। यहाँ, कंसने जब सुना कि देवकीने कन्या पैदा की है तो वह सुनते ही उसके घर गया और जाते ही उसने पहले तो कन्याकी नाक चपटी कर दी और तदनन्तर उसे धाय के द्वारा एक तलघटमें रखकर बड़े प्रयत्नसे बढ़ाया ॥ ४०५-४०७ ॥
“Meanwhile, Nandagopa also returned home with the baby boy. Saying, ‘Look! Those deities, being pleased with you, have given you this exceptionally meritorious (mahāpuṇyavān) son,’ he handed over the future Sovereign Emperor (Chakravartin) to his beloved wife.
Over here, as soon as Kansa heard that Devaki had given birth to a daughter, he went to her house. Upon arriving, he first flattened the baby girl’s nose, and thereafter, placing her in the care of a wet nurse in an underground cellar (talaghara), raised her with great care and effort.” (405–407)
श्लोक ( Shlok ) 408
सा सुव्रतायिकाभ्यर्णे शोकात्स्वविकृताकृतेः । गृहीतदीक्षा विन्ध्याद्रौ स्थानयोगमुपाश्रिता ॥४०८॥
बड़ी होनेपर उसने अपनी विकृत आकृतिको देखकर शोकसे सुव्रता आर्यिका के पास दीक्षा धारण कर ली और विन्ध्याचल पर्वत पर रहने लगी ।॥ ४०८ ॥
“Upon growing up, seeing her own disfigured appearance, she was filled with sorrow and took initiation (diksha) from the Arya (nun) Suvrata, and began residing on the Vindhyachal mountain.” (408)
श्लोक ( Shlok ) 409 – 411
देवतेति समभ्यर्च्य गतेषु वनवासिषु । व्याघेण भक्षिता मंक्षु स्वर्गलोकमुपागमत् ॥४०९॥अपरस्मिन्दिने व्याधैर्दृष्ट्वा हस्तांगुलित्रयम् । तस्याः क्षीराङ्गरागादिपूजितं देशवासिनः ॥४१०॥मूढात्मानः स्वयं चैतदार्यासौ विन्ध्यवासिनी। देवतेति समभ्यर्च्य तदारभ्याप्रमाणयन् ॥४११॥
एक दिन वनमें रहनेवाले भील लोग उसे देवता समझ उसकी पूजा करके कहीं गये थे कि इतनेमें व्याघ्रने उसे शीघ्र ही खा लिया। वह मरकर स्वर्ग चली गई। दूसरे दिन जब भील लोग वापिस आये तो उन्हें वहाँ उसकी सिर्फ तीन अङ्गुलियाँ दिखीं। वहाँ के रहनेवाले मूर्ख लोगोंने उन अँगुलियोंकी दूध तथा अङ्गराग आदिसे पूजा की। उसी समयसे ‘यह आर्या ही विन्ध्य-वासिनी देवी है’ ऐसा समझ कर लोग उसकी मान्यता करने लगे ।। ४०९-४११ ।।
“One day, the tribal hunters (bhils) living in the forest, considering her a deity, worshipped her and went away. Shortly after, a tiger attacked and swiftly devoured her. Upon her death, she ascended to heaven.
When the hunters returned the following day, they found only three of her fingers remaining there. The ignorant locals began to worship those remaining fingers with offerings of milk, fragrant ointments, and cosmetic pastes. From that very time onward, people began to revere her, believing that ‘this very nun (āryā) is the goddess Vindhya-vasini (the resident goddess of the Vindhyas).'” (409–411)
श्लोक 412 से 421
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402
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