नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 182to 202
श्लोक ( Shlok ) 182 – 186
सर्वभाषास्वभावेन ध्वनिना निजगाद सः । जम्बूपलक्षिते द्वीपे विषये मङ्गलाह्वये ॥ १८२ ॥सर्वभाषास्वभावेन ध्वनिना निजगाद सः । जम्बूपलक्षिते द्वीपे विषये मङ्गलाह्वये ॥ १८२ ॥नृपो मेघरथो नान्ना पुरे मद्भिलनामनि । सुभद्रायां सुतस्तस्य रथान्तदृढसंज्ञकः ॥ १८३ ॥पट्टबन्धं स्वपुण्येन यौवराजस्य सोऽबिभः । तत्र नन्दयशोनाम्न्यां धनदत्तवणिक्पतेः ॥ १८४ ॥धनादिदेवपालाख्यौ देवपालौ जिनादिकौ । अर्हन्तौ दत्तदासान्तौ जिनदत्तश्र सप्तमः ॥ १८५ ॥प्रियमित्रोऽष्टमो धर्मरुचिश्चान्त्योऽभवत्सुतः । प्रियदर्शना ज्येष्ठा च जाते दुहितरौ ततः ॥ १८६ ॥
वे भगवान् भी सर्वभाषा रूप परिणमन करनेवाली अपनी दिव्य ध्वनिसे इस प्रकार कहने लगे – जम्बूद्वीपके मङ्गला देशमें एक भद्रिलपुर नामका नगर है। उसमें मेघरथ नामका राजा राज्य करता था। उसकी देवीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दृढ़रथ नामका पुत्र हुआ। अपने पुण्योदयसे उसने यौवराज्यका पट्ट धारण किया था। उसी भद्रिलपुर नगर में एक धनदत्त नामका सेठ रहता था, उसकी स्त्रीका नाम नन्दयशा था। उन दोनोंके धनपाल, देवपाल, जिनदेव, जिनपाल, अर्हद्दत्त, अर्हद्दास, सातवाँ जिनदत्त, आठवाँ प्रियमित्र और नौवाँ धर्मरुचि ये नौ पुत्र हुए थे। इनके सिवाय प्रियदर्शना और ज्येष्ठा ये दो पुत्रियाँ भी हुई थीं ।। १८२-१८६ ।।
“The Lord too, through his divine voice (Divya Dhwani) which automatically transforms into all languages, began to speak in this manner—In the Mangala country of Jambudvipa, there is a city named Bhadrilapura. A king named Megharatha used to rule there. His queen’s name was Subhadra. A son named Dridharatha was born to them. Due to the rise of his meritorious karma (punyodaya), he had received the crown of the heir-apparent (yauvarajya).
In that same city of Bhadrilapura, there lived a merchant named Dhanadatta; his wife’s name was Nandayasha. To them were born nine sons: Dhanapala, Devapala, Jinadeva, Jinapala, Arhaddatta, Arhaddasa, the seventh Jinadatta, the eighth Priyamitra, and the ninth Dharmaruchi. Apart from them, they also had two daughters named Priyadarshana and Jyeshtha.”182 – 186
श्लोक ( Shlok ) 187 – 198
नृपः सुदर्शनोद्याने मन्दिरस्थविरान्तिके । कदाचिद् वणिगीशश्च पुत्रादिपरिवारितौ ॥ १८७ ॥सक्रियं धर्ममाकर्ण्य निविंद्य स महीपतिः । दत्त्वा दृढरथायाभिषेकपूर्व स्वकं पदम् ॥ १८८ ॥आददे संयमं पश्चाच्छ्रेष्ठी च नवभिः सुतैः । ततो नन्दयशा पुत्रिकाद्वयेनागमत्तपः ॥ १८९ ॥सुदर्शनायिकाभ्यर्णे तूर्णनिर्णीतसंसृतिः । क्रमाद्वाराणसीवाह्यं केवलज्ञानिनोऽभवन् ॥ १९० ॥वने प्रियङ्गुखण्डाख्ये मनोहरतमब्रुमे । गुरुर्मेधरथो ध्यात्वा धनदत्तश्च ते त्रयः ॥ १९१ ॥धर्मामृतमयीं वृष्टिमुनिरन्तो निरन्तरम् । जीवितान्ते तले सिद्धशिलायाः सिद्धिमव्रजन् ॥ १९२ ॥पुरे राजगृहे पूज्यास्त्रिजगज्जननायकैः । धनदेवादिकास्तस्मिन्नेवान्येद्युः शिलातले ॥ १९३ ॥नवापि विधिना संन्यस्यन्तो वीक्ष्य सुतायुता । निदानमकरोन्नन्दयशा मे जन्मनीह वा ॥ १९४ ॥परत्राप्येवमेवैभिर्बन्धुत्वं भवतादिति । स्वयं च कृतसंन्यासा तैः सहानतकल्पजे ॥ १५५ ॥शातङ्करे समुत्पद्य विमाने भोगमन्वभूत् । विंशत्यम्भोधिमानायुस्ततः प्रच्युत्य सा तव ॥ १९६ ॥प्रियाजनि सुभद्राख्या धनदेवादयः सुताः । प्रख्यातपौरुषा जाताः समुद्रविजयादयः ॥ १९७ ॥प्रियदर्शना ज्येष्ठा च कुन्ती माद्रीति विश्रुते । अथापृच्छन्महीपालो वसुदेवभवावलीम् ॥ १९८ ॥
किसी एक समय सुदर्शन नामके बनमें मन्दिर-स्थविर नामके मुनिराज पधारे। राजा मेघरथ और सेठ धनदत्त दोनों ही अपने पुत्र-पौत्रादिसे परिवृत होकर उनके पास गये। राजा मेघरथ क्रिया सहित धर्मका स्वरूप सुनकर विरक्त हो गया अतः अभिषेक पूर्वक दृढरथ नामक पुत्रके लिए अपना पद देकर उसने संयम धारण कर लिया । तदनन्तर धनदत्त सेठने भी अपने नौ पुत्रोंके साथ संयम ग्रहण कर लिया। नन्दद्ययशा सेठानी भी अपनी दोनों पुत्रियोंके साथ सुदर्शना नामकी आर्यिकाके पास गई और शीघ्र ही संसारके स्वरूपका निर्णय कर उसने भी तप धारण कर लिया – क्रम क्रमसे विहार करते हुए वे सब बनारस पहुँचे और वहाँ बाहर अत्यन्त सुन्दर वृक्षोंसे युक्त प्रियंगुखण्ड नामके वनमें जा विराजमान हुए। वहाँ सबके गुरु मन्दिरस्थविर, मेघरथ राजा और धनदत्त सेठ तीनों ही मुनि ध्यान कर केवलज्ञानी हो गये । तदनन्तर निरन्तर धर्मामृतकी वर्षा करते हुए वे तीनों, तीनों लोकोंके इन्द्रोंके द्वारा पूज्य होकर आयु के अन्तमें राजगृह नगरके समीप सिद्ध शिलासे सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए। किसी दूसरे दिन धन-देव आदि नौ भाई, दोनों बहिनों और नन्दद्यशाने उसी शिलातलपर विधिपूर्वक संन्यास धारण किया । पुत्र-पुत्रियोंसे युक्त नन्दयशाने उन्हें देखकर निदान किया कि ‘जिस प्रकार ये सब इस जन्ममें मेरे पुत्र-पुत्रियाँ हुई हैं उसी प्रकार परजन्ममें भी मेरे ही पुत्र-पुत्रियाँ हों और इन सबके साथ मेरा सम्बन्ध इस जन्मकी तरह पर-जन्ममें भी बना रहें। ऐसा निदान कर उसने स्वयंसंन्यास धारण कर लिया और मर कर उन सबके साथ आनत स्वर्ग के शातङ्कर नामक विमानमें उत्पन्न हो वहाँ के भोग भोगने लगी। वहाँ उसकी बीस सागरकी आयु थी। आयुपूर्ण होनेपर वहाँ से च्युत होकर वह तुम्हारी सुभद्रा नामकी रानी हुई है, धनदेव आदि प्रसिद्ध पौरुषके धारक समुद्र-विजय आदि पुत्र हुए हैं तथा प्रियदर्शना और ज्येष्ठा नामक पुत्रियोंके जीव अतिशय प्रसिद्ध कुन्ती माद्री हुए हैं। यह सब सुननेके बाद राजा अन्धकवृष्टिने अब सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्रसे वसुदेवकी भवावली पूछी ।। १८७-१९८ ॥
“Once upon a time, an ascetic named Muniraj Mandira-sthavira arrived in the Sudarshana forest. King Megharatha and the merchant Dhanadatta, both accompanied by their sons, grandsons, and families, went to visit him. Upon hearing the true nature of Dharma along with its practical duties, King Megharatha became detached from the world; therefore, after ritually consecrating his son Dridharatha onto the throne, he embraced ascetic restraint (sanyama). Thereafter, the merchant Dhanadatta also accepted sanyama along with his nine sons. The merchant’s wife, Nandayasha, along with her two daughters, went to a nun named Aryika Sudarshana, and having quickly realized the transient nature of the world, she too took up ascetic penance.
Wandering from place to place in due course, they all reached Varanasi and stayed in the highly beautiful Priyangukhanda forest outside the city, which was filled with magnificent trees. There, their guru Mandira-sthavira, the royal ascetic Megharatha, and the merchant-ascetic Dhanadatta, all three attained omniscience (Kevalajnana) through deep meditation. Thereafter, continuously showering the nectar of Dharma and being revered by the Indras of all three worlds, they attained the state of liberation (Siddha) from the Siddhashila near the city of Rajgriha at the end of their lifespans.
On another day, the nine brothers led by Dhanadeva, the two sisters, and Nandayasha ritually embraced the vow of ultimate renunciation (Sannyasa) on that very same rocky platform. Looking at her sons and daughters, Nandayasha made a deep inner wish (Nidana): ‘Just as all of them became my sons and daughters in this birth, let them be born as my sons and daughters in the next birth as well, and let my connection with all of them remain just as it is in this life.’ Making such a nidana, she embraced sannyasa, died, and was reborn along with all of them in the celestial vehicle (vimana) named Shatankara in the Anata heaven, where she began enjoying celestial pleasures. Her lifespan there was twenty Sagar.
Upon the completion of her lifespan, she departed from that heaven and has now become your queen named Subhadra; the sons like Dhanadeva who possessed acclaimed valor have become your sons Samudra-vijaya and others; and the souls of the two daughters, Priyadarshana and Jyeshtha, have become the highly renowned Kunti and Madri. Having heard all this, King Andhakavrishni then asked the venerable Jinendra Supratishtha about the lineage of past lives (Bhavaavali) of Vasudeva.”187 – 198
श्लोक ( Shlok ) 199
जिनेन्द्रोऽप्यब्रवीदित्थं शुभं गम्भीरभाषया । प्रकृतिस्तादृशी तेषां यथा भव्येष्वनुग्रहः ॥ १९९ ॥
जिनराज भी वसुदेवकी शुभ भवावली अपनी गम्भीर भाषा द्वारा इस प्रकार कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि उनका स्वभाव ही ऐसा है कि जिससे भव्य जीवोंका सदा अनुग्रह होता है ॥ १९९ ॥
“The Lord of the Jinas (Jinaraaja) too began to narrate the auspicious lineage of past lives (Bhavaavali) of Vasudeva in his profound voice. And this is only fitting, for his very nature is such that it always bestows grace and welfare upon the liberation-bound souls (Bhavya).”199
श्लोक ( Shlok ) 200 – 202
ग्रामे पलाशकूटाख्ये विषये कुरुनामनि । दुर्गतः सोमशर्माख्यो द्विजस्तस्य सुतोऽभवत् ॥ २०० ॥नाम्ना नन्दीत्यसौ देवशर्मणः सततानुगः । मातुलस्याभिलाषेण तत्सुतासु विपुण्यकः ॥ २०१ ॥पुत्रिकास्तस्य सप्तासन् सोऽदादन्येभ्य एव ताः । तदलाभात्स नन्दी च महादुःखवशीकृतः ॥ २०२ ॥
वे कहने लगे कि कुरुदेशके पलाशकूट नामक गाँवमें एक सोमशर्मा नामका ब्राह्मण रहता था । वह जन्मसे ही दरिद्र था। उसके नन्दी नामका एक लड़का था। नन्दीके मामाका नाम देवशर्मा था। उसके सात पुत्रियाँ थीं। नन्दी अपने मामाकी पुत्रियाँ प्राप्त करना चाहता था इसलिए सदा उसके साथ लगा रहता था परन्तु पुण्यहीन होनेके कारण देवशर्माने वे पुत्रियाँ उसके लिए न देकर किसी दूसरेके लिए दे दीं। पुत्रियोंके न मिलनेसे नन्दी बहुत दुःखी हुआ ।। २००-२०२ ।।
“He began to say—In a village named Palashakuta in the Kuru region, there lived a Brahmin named Somasharma. He was destitute from birth. He had a son named Nandi. Nandi’s maternal uncle was named Devasharma, who had seven daughters. Nandi desired to marry his uncle’s daughters and therefore always stayed close to him. However, because Nandi was devoid of meritorious karma (punya), Devasharma did not give his daughters to him, but instead married them off to someone else. Deeply aggrieved by not getting the daughters, Nandi became intensely miserable.”200 – 202
श्लोक 203 से 211
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