अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 105 to 117
श्लोक ( Shlok ) 105 – 106
इत्यस्या धेनुमादाय हठात्कारेण गच्छतः । अवस्थितं पुरस्तात्तं जमदग्निं महीपतिः ॥ १०५ ॥हत्वा स्वमार्गमुल्लक्ष्य कुमार्गोऽभूत्पुरोन्मुखः । रुदन्तीं रेणुकीं भर्तृमरणात् प्रहतोदरीम् ॥ १०६ ॥
ऐसा कह कर वह कामधेनुको जबरदस्ती लेकर जाने लगा तब जमदग्नि ऋषि रोकनेके लिए उसके सामने खड़े हो गये। कुमार्गगामी राजा कृतवीर जमदग्निको मारकर तथा अपना मार्ग उल्लंघकर नगरकी ओर चला गया। इधर कृशोदरी रेणुकी पतिकी मृत्युसे रोने लगी । तदनन्तर उसके दोनों पुत्र जब फूल, कन्द, मूल तथा फल आदि लेकर वनसे लौटे तो यह सब देख आश्चर्यसे पूछने लगे कि यह क्या है ? ॥ १०५-१०६ ।।
Saying this, he began to forcefully take Kamadhenu away, at which point Sage Jamadagni stood before him to stop him. The wicked King Kritavirya, after killing Jamadagni and crossing his path, departed toward his city. Meanwhile, the lean-bellied Renuka began to weep over her husband’s death. Sometime later, when her two sons returned from the forest carrying flowers, tubers, roots, and fruits, they were filled with astonishment upon seeing all this and began to ask, “What is this?” (105-106)
श्लोक ( Shlok ) 107 – 110
अथ पुत्रौ वनात्पुष्पकन्दमूलफलादिकम् । आदायालोक्य सम्प्राप्तौ किमेतदिति विस्मयात् ॥ १०७ ॥’पृष्ट्वा विज्ञाय तत्सर्व सकोपौ शोकनिर्भराम् । निर्वाप्य युक्तिमद्वाग्भिस्तौ नैसर्गिकविक्रमौ ॥ १०८ ॥ध्वजीकृतनिशातोग्रपरशू यमसन्निभौ । गोग्रहे मरणं पुण्यहेतुरित्यविगानतः ॥ १०९ ॥श्रूयते तत्तथैवास्तां कः सहेत पितुर्वधम् । इत्युक्त्वानुगताशेषस्निह्यन्मुनिकुमारकौ ॥ ११० ॥
सब बातको ठीक-ठीक समझ कर उन्हें क्रोध आ गया । स्वाभाविक पराक्रमको धारण करनेवाले दोनों भाइयोंने पहले तो शोकसे भरी हुई माताको युक्तिपूर्ण वचनोंसे संतुष्ट किया फिर तीक्ष्ण फरशा को ध्वजा बनानेवाले, यमतुल्य दोनों भाइयोंने परस्पर कहा कि गायके ग्रहणमें यदि मरण भी हो जाय तो वह पुण्यका कारण है ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है अथवा यह बात रहने दो, पिताके मरणको कौन सह लेगा ? ऐसा कहकर दोनों ही भाई चल पड़े । स्नेहसे भरे हुए समस्त मुनिकुमार उनके साथ गये ।। १०७-११० ।।
Understanding everything exactly as it happened, they were overcome with anger. The two brothers, possessing natural valor, first comforted their grief-stricken mother with wise and reasoning words. Then, the two brothers—who were like Yama (the God of Death) himself and made a sharp axe their banner—said to each other, “It is heard in the scriptures that if death occurs while protecting a cow, it becomes a source of religious merit. But let that matter aside, who can tolerate the death of their father?” Saying this, both brothers set forth. Out of deep affection, all the sons of the sages accompanied them. (107-110)
श्लोक ( Shlok ) 111 – 117
तद्गतं मार्गमन्वेत्य साकेतनगरान्तिकम् । सम्प्राप्य कृतसंग्रामौ कृतवीरेण भूपतिम् ॥ १११ ॥सहस्त्रबाहुमाहत्य सायाद्धेऽविक्षतां पुरम् । हालाहलोपमान्याशु अघोरांहःस्फूर्जितान्यलम् ॥ ११२ ॥फलन्त्यकार्यचर्याणां दुःसहां दुःखसन्ततिम् । सहस्त्रबाहुसन्ताननिःशेषीकरणोत्सुकम् ॥ ११३ ॥ज्ञात्वा परशुरामीयमभिप्रायं महीपतिः । भूपालचरदेवेन निदानविषदूषितात् ॥ ११४ ॥समुद्भूतेन तपसो महाशुक्रेऽत्र जन्मिना । राज्ञीं सगर्भा चित्रमतीं तां शाण्डिल्यतापसः ॥ ११५ ॥तदग्रजः समादाय गत्वा विज्ञातचर्यया । स सुबन्ध्वाख्यनिर्ग्रन्थमुनेरावेद्यवृत्तकम् ॥ ११६ ॥ तत्समीपे निधायार्य मठे मे नास्ति कश्चन । तत्र गत्वा समीक्ष्यागमिष्याम्येषाऽत्र तिष्ठतु ॥ ११७ ॥
राजा सहस्र-बाहु और कृतवीर जिस मार्गसे गये थे उसी मार्गपर चलकर वे अयोध्यानगरके समीप पहुँच गये। वहाँ कृतवीरके साथ संग्रामकर उन्होंने राजा सहस्त्रबाहुको मार डाला और सायंकालके समय नगर-में प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि जो अकार्यमें प्रवृत्ति करते हैं उनके लिए हलाहल विषके समान भयंकर पापोंके परिपाक असह्य दुःखोंकी परम्परा रूप फल शीघ्र ही प्रदान करते हैं। इधर रानी चित्रमतीके बड़े भाई शाण्डिल्य नामक तापसको इस बातका पता चला कि परशुराम, सहस्त्रबाहु-की समस्त सन्तानको नष्ट करनेके लिए उत्सुक है और रानी चित्रमती, निदानरूपी विषसे दूर्षित तपके कारण महाशुक्र स्वर्गमें उत्पन्न हुए राजा भूपालके जीव स्वरूप देवके द्वारा गर्भवती हुई है अर्थात् उक्त देव रानी चित्रमतीके गर्भमें आया है। ज्यों ही शाण्डिल्यको इस बातका पता चला त्यों ही वह बहिन चित्रमतीको लेकर अज्ञात रूपसे चल पड़ा और सुबन्धु नामक निर्मन्थ मुनिके पास जाकर उसने सब समाचार कह सुनाये । ‘हे आर्य ! मेरे मठमें कोई नहीं है इसलिए मैं वहाँ जाकर वापिस आऊंगा। जब तक मैं वापिस आऊं तब तक यह देवी यहाँ रहेगी’ यह कहकर वह चित्रमती-को सुबन्धु मुनिके पास छोड़कर अन्यत्र चला गया ।। १११-११७।।
Following the very path taken by King Sahasrabahu and Kritavirya, they arrived near the city of Ayodhya. There, after waging war against Kritavirya, they slew King Sahasrabahu and entered the city in the evening. And this is indeed fitting, because for those who indulge in evil deeds, the ripening of their terrible sins, like deadly Halahala poison, swiftly yields a continuous succession of unbearable miseries.
Meanwhile, Queen Chitramati’s elder brother, an ascetic named Shandilya, learned that Parashurama was eager to destroy all the offspring of Sahasrabahu. He also learned that Queen Chitramati had become pregnant by the soul-deity of King Bhupala (who, due to austerities tainted by a desire for worldly reward, had been reborn as a celestial being in the Mahashukra heaven)—meaning that the said deity had entered Queen Chitramati’s womb. As soon as Shandilya found this out, he took his sister Chitramati and departed secretly.
Approaching a Nirgrantha (possessionless) monk named Subandhu, he narrated the entire news and said, “O Noble One! There is no one at my hermitage, so I shall go there and return. Until I come back, this lady will remain here.” Saying this, he left Chitramati in the care of the sage Subandhu and went elsewhere. (111-117)
श्लोक 118 से 131
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