नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 154 to 164
श्लोक ( Shlok ) 154 – 155
ततश्चौर्यादिदुष्कर्मसक्त’ तलवरो द्विजम् । श्येनकाख्यो भ्रमन् दृष्ट्वा रात्रौ त्वां हन्म्यहं नहि ॥ १५४ ॥द्विजाख्याधारिणं याहि नगराद् द्रक्ष्यसे यदि । पुनः कृतान्तवक्त्रं त्वं नेष्यसे दुष्क्रियो मया ॥ १५’५ ॥
तदनन्तर वह चोरी आदिमें आसक्त हो गया । श्येनक नामक कोतवालने उसे चोरी करते हुए एक रातमें देख लिया। देखकर कोतवालने कहा कि चूँकि तू ब्राह्मण नामको धारण करता है अतः मैं तुझे मारता नहीं हूं, तू इस नगरसे चला जा, यदि अब फिर कभी ऐसा दुष्कर्म करता हुआ दिखेगा तो अवश्य ही मेरे द्वारा यमराजके मुखमें भेज दिया जायगा – मारा जायगा ।। १५४-१५५ ।।
“Thereafter, he became addicted to theft and other crimes. One night, a police chief named Shyenaka caught him in the act of stealing. Upon seeing him, the police chief said, ‘Since you bear the name of a Brahmin, I will not kill you. Leave this city. If you are ever seen committing such a misdeed again, you will surely be sent to the jaws of Death (Yamraja) by my hands—you will be executed.'”154 – 155
श्लोक ( Shlok ) 156
‘इत्यत्यतर्जयस्सोऽपि कालकाख्येन पापिना । सममुल्कामुखीव्याधनिवासपतिनागमत् ॥ १५६ ॥
यह कहकर कोतवालने उसे डाँटा । रुद्रदत्त भी, वहाँ से निकल कर उल्कामुखी पर रहनेवाले भीलोंके स्वामी पापी कालकसे जा मिला ॥ १५६ ॥
“Saying this, the police chief reprimanded him. Rudradatta, leaving that place, went and joined the sinful Kalaka, the lord of the Bhils (tribal community) who resided on Mount Ulkamukhi.”156
श्लोक ( Shlok ) 157
कदाचिदयोध्यायां गोकुलापहृतौ द्विजः । श्येनकेन हतोऽयासीन्महापापादधोगतिम् ॥ १५७ ॥
वह रुद्रदत्त किसी समय अयोध्या नगरीमें गायोंके समूहका अपहरण करनेके लिए आया था उसी समय श्येनक कोतवालके द्वारा मारा जाकर वह महापापके कारण अधोगतिमें गया ।। १५७ ।।
“At one time, that Rudradatta returned to the city of Ayodhya to abduct a herd of cows. At that very moment, he was killed by the police chief Shyenaka, and due to his immense sins, he descended into hell (the lower world).”157
श्लोक ( Shlok ) 158 – 159
वहाँ से निकल कर महामच्छ हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर सिंह हुआ, फिर नरक गया, वहाँ से आकर दृष्टिविष नामका सर्प हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर शार्दूल हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर गरुड़ हुआ फिर नरक गया, वहाँ से आकर सर्प हुआ फिर नरक गया और वहाँ से आकर भील हुआ। इस प्रकार समस्त नरकों में जाकर वहाँ से बड़े कष्ट से निकला और त्रस स्थावर योनियोंमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहा ॥ १५८-१५९ ॥
“Emerging from there, he was reborn as a giant fish and then went to hell; returning from there, he became a lion and again went to hell; returning from there, he became a venomous serpent (Drishtivisha) and again went to hell; returning from there, he became a tiger (Shardula) and again went to hell; returning from there, he became a Garuda (mythical eagle) and again went to hell; returning from there, he became a serpent and again went to hell; and returning from there, he was born as a Bhil (tribesman). In this manner, having passed through all the hells, he emerged from them with great difficulty and continued to wander for a very long time through the various realms of mobile (trasa) and immobile (sthavara) living beings.”158 – 159
श्लोक ( Shlok ) 160 – 164
जम्बूपलक्षिते द्वीपे भरते कुरुजाङ्गले । हास्तिनाख्यं पुरं पाति घराधीशे धनञ्जये ॥ १६० ॥ सुतो गोतमपुत्रस्य सम्बभूव द्विजात्मजः । कपिष्ठलस्य निःश्रीकः सोऽनुन्धर्याश्च गोतमः ॥ १६१ ॥ तत्समुत्पत्तिमात्रेण तच्छेषमभवत्कुलम् । अलब्धान्नः कृशीभूतजठरः प्रकटास्थिकः ॥ १६२ ॥ सिरावनद्धदुष्कायो यूकाञ्चितशिरोरुहः । शयानश्चैव सर्वेश्च तर्जितो यत्र तत्र वा ॥ १६३ ॥ कराग्रकर्पूरेणोपलक्ष्यमाणोऽनपारिना । सुमित्रेणैव सर्वत्र शरीरस्थितिहेतुना ॥ १६४ ॥
अन्तमें इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी कुरुजांगल देशके हस्तिनापुर नगरमें जब राजा धनञ्जय राज्य करते थे तब गोतम गोत्री कपिष्टल नामक ब्राह्मणकी अनुन्धरी नामकी स्त्रीसे वह रुद्रदत्तका जीव गोतम नामका महादरिद्र पुत्र हुआ । उत्पन्न होते ही उसका समस्त कुल नष्ट हो गया। उसे खानेके लिए अन्न नहीं मिलता था, उसका पेट सूख गया था, हड्डियाँ निकल आई थीं, नसोंसे लिपटा हुआ उसका शरीर बहुत बुरा मालूम होता था, उसके बाल जुओंसे भरे थे, वह जहाँ कहीं सोता था वहीं लोग उसे फटकार बतलाते थे, वह अपने शरीरकी स्थितिके लिए कभी अलग नहीं होनेवाले श्रेष्ठ मित्रके समान अपने हाथके अग्रभागमें खप्पर लिये रहता था ।। १६०-१६४ ॥
“Finally, in the Hastinapur city of the Kurujangala region within the Bharata-kshetra of this very Jambudvipa, during the reign of King Dhananjaya, the soul of that Rudradatta was born as a highly destitute son named Gotama to Anundhari, the wife of a Brahmin named Kapishtala belonging to the Gotama gotra (lineage).
Immediately upon his birth, his entire family was ruined. He could not get any food to eat; his stomach was completely sunken, his bones protruded, and his body looked wretched, wrapped only in taut veins. His hair was infested with lice, and wherever he tried to sleep, people would drive him away with rebukes. To sustain his physical existence, he always carried a begging bowl (khappara) in the palm of his hand, like an inseparable and lifelong companion.”160 – 164
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