नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 302 to 315
श्लोक ( Shlok ) 302
सोऽपि व्यापारयामास तदभीष्टनिवेदने । न हेतुः कृतकृत्यानामस्त्यन्योऽनुग्रहाद्विना ॥ ३०२ ॥
तब गणधर भगवान् भी उसका अभीष्ट कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि कृतकृत्य मनुष्योंका अनुग्रहको छोड़कर और दूसरा कार्य नहीं रहता है ।। ३०२ ।।
Thereupon, Ganadhar Bhagavan began to reveal her desired history. This is only fitting, for accomplished souls (kritakritya men) have no purpose left in life other than to bestow grace upon others.[ 302]
श्लोक ( Shlok ) 303 – 308
शीतलाख्यजिनाधीशतीर्थे धर्मे विनक्ष्यति । भद्रिलाख्यपुराधीशो नाम्ना मेघरथो नृपः ॥ ३०३॥ प्रेयसी तस्य नन्दाख्या भूतिशर्मा द्विजाग्रणीः । तस्यासीत्कमला पत्नी मुण्डशालायनस्तयोः ॥ ३०४ ॥तनुजो वेदवेदाङ्गपारगो भोगसक्तधीः । वृथा तपःपरिक्लेशो मूखैरेष प्रकल्पितः ॥ ३०५ ॥ निर्धनैः परलोकार्थं स्वयं साहसशालिभिः । भूसुवर्णादिदानेन सुखमिष्टमवाप्यते ॥ ३०६॥ इतीत्यादिकुदृ ष्टान्त कुहेतु निपुणैर्नृपम् । कायक्लेशासहं वाक्यैरयथार्थमबूबुधत् ॥ ३०७ ॥ तथा परांश्च दुर्बुद्धीन् बोधयन् जीवितावधौ । भूत्वा सप्तस्वधोभूमिष्वतस्तिर्यक्षु च क्रमात् ॥ ३०८ ॥
वे कहने लगे कि शीतलनाथ भगवान्के तीर्थमें जव धर्मका विच्छेद हुआ तब भद्रिलपुर नगर में राजा मेघरथ राज्य करता था, उसकी रानीका नाम नन्दा था। उसी समय उस नगरमें भूतिशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, उसकी कमला नामकी स्त्री थी और उन दोनोंके मुण्डशा लायन नामका पुत्र था । मुण्डशालायन यद्यपि वेदवेदाङ्गका पारगामी था परन्तु साथ ही उसकी बुद्धि हमेशा भोगों आसक्त रहती थी इसलिए वह कहा करता था कि तपका क्लेश उठाना व्यर्थ है, जिनके पास धन नहीं है ऐसे साहसी मूर्ख मनुष्योंने ही परलोकके लिए इस तपके क्लेशकी कल्पना की है। वास्तवमें पृथिवी-दान, सुवर्ण-दान आदिसे ही इष्ट सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार उसने अनेक कुदृष्टान्त और कुहेतुओंके बतलानेमें निपुण वाक्योंके द्वारा कायक्लंशके सहनेमें असमर्थ राजाको झूठमूठ उपदेश दिया। राजाको ही नहीं, अन्य दुर्बुद्धि मनुष्योंके लिए भी वह अपने जीवन भर ऐसा ही उपदेश देता रहा । अन्तमें मर कर वह सातवें नरक गया। वहाँसे निकल कर तिर्यश्च हुआ। इस तरह नरक और तिर्यश्च गतिमें घूमता रहा ॥ ३०३-३०८ ॥
He began to speak:”During the era of Lord Shitalnath, when the true religion suffered a decline, King Megharath ruled in the city of Bhadrilpur. His queen was named Nanda. At that same time, there lived a prominent Brahmin named Bhutisharma in that city; his wife was named Kamala, and the two had a son named Mundashalayan.
Although Mundashalayan was highly proficient in the Vedas and Vedangas, his mind was always deeply attached to sensual pleasures. Consequently, he used to say, ‘Enduring the hardships of penance is completely futile. It is only those foolish, desperate men who possess no wealth who have invented the hardships of penance for the sake of the next life. In reality, desired happiness is achieved solely through acts like donating land and gold.’
In this manner, by using arguments filled with false examples and flawed logic, he skillfully gave deceptive advice to the King, who was already incapable of enduring bodily mortification. Not just to the King, but he continued to give similar misleading teachings to other weak-minded people throughout his entire life.
Upon his death, he fell into the seventh hell. Emerging from there, he was reborn in the animal realm (tiryancha). In this way, he kept wandering through the hellish and animal states of existence.”[ 303-308]
श्लोक ( Shlok ) 309 – 315
गन्धमादनकुभ्रोत्थ महागन्धवतीनदी । समीपगतभ लङ्कीनामपल्ल्यां स्वपापतः ॥ ३०९ ॥ जातो वनेचरः कालसन्ज्ञः स तु कदाचन । वरधर्मयतिं प्राप्य मध्वादिविनिवृत्तितः ॥ ३१० ॥विजयार्थेऽलकापुर्याः पत्युः पुरुबलस्य च । ज्योतिर्मालाभिधायाश्च सुतो हरिबलोऽभवत् ॥ ३११॥अनन्तवीर्ययत्यन्ते गृहीत्वा द्रव्यसंयमम् । सौधर्मकल्पे सम्भूय कालान्ते प्रच्युतस्ततः ॥ ३१२ ॥ सुकेतोर्विजयार्धाद्रौ रथनूपुरभूपतेः । सुता स्वयंप्रभायाश्च सत्यभामा त्वमित्यभूः ॥ ३१३ ॥पित्रा ते मेऽन्यदा कस्य सुता पत्नी भविष्यति । इत्युक्तोऽनुनिमित्चादिकुशलाख्योऽर्धचक्रिणः ॥३१४ ॥भविष्यति महादेवीत्याख्यन्नैमित्तिकोत्तमः । इत्युदीरितमाकर्ण्य सत्यभामाऽतुक्त्तराम् ॥ ३१५ ॥
अनुक्रमसे वह गन्धमादन पर्वतसे निकली हुई गन्धवती नदीके समीपवर्ती भल्लंकी नामकी पल्ली में अपने पापकर्मके उदयसे काल नामका भील हुआ । उस भीलने किसी समय वरधर्म नामक मुनिराजके पास जाकर मधु आदि तीन मकारोंका त्याग किया था । उसके फलस्वरूप वह विजयार्ध पर्वत पर अलकानगरीके राजा पुरबल और उनकी रानी ज्योतिर्माला के हरिबल नामका पुत्र हुआ। उसने अनन्तवीर्य नामके मुनिराजके पासद्रव्य-संयम धारण कर लिया जिसके प्रभावसे वह मरकर सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ, वहाँ से च्युत होकर उसी विजयार्ध पर्वत पर रथनूपुर नगरके राजा सुकेतुके उनकी स्वयंप्रभा रानीसे तू सत्यभामा नामकी पुत्री हुई। एक दिन तेरे पिताने निमित्त आदिके जाननेमें कुशल किसी निमित्तज्ञानीसे पूछा कि मेरी यह पुत्री किसकी पत्नी होगी ? इसके उत्तर में उस श्रेष्ठ निमित्तज्ञानीने कहा था कि यह अर्धचक्रवर्तीकी महादेवी होगी। इस प्रकार गणधरके द्वारा कहे हुए अपने भव सुनकर सत्यभामा बहुत सन्तुष्ट हुई ।। ३०९ -३१५ ॥
In due course, by the rise of his sinful karmas, he was reborn as a Bhil (tribal hunter) named Kaal in a settlement named Bhallanki, situated near the Gandhavati River that originates from Mount Gandhamadan. At one point, that Bhil approached a Muniraj named Vardharma and renounced the three makars (the three vices starting with the letter ‘M’, typically meat, wine, and honey).
As a result of this merit, he was reborn on Mount Vijayardha in the city of Alkanagari as a son named Haribal to King Purabal and his queen, Jyotirmala. Haribal accepted dravya-samyama (the physical vows of restraint) from a Muniraj named Anantavirya. Due to the spiritual influence of this restraint, he passed away and was reborn as a celestial being (deva) in the Saudharma heaven.
Descending from that celestial realm, you were reborn on that same Mount Vijayardha in the city of Rathnupur as a daughter named Satyabhama to King Suketu and his queen, Swayamprabha.
One day, your father asked an astrologer (a seer skilled in reading omens and signs), “Whose wife will this daughter of mine become?” In response, that eminent astrologer declared, “She will become the chief queen (Mahadevi) of an Ardhachakravarti (a semi-emperor / Narayana).”
Hearing the account of her past births as narrated by the Ganadhar, Satyabhama felt deeply satisfied and pleased.[309-315]
श्लोक 316 से 324
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301
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