अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 342 to 351
श्लोक ( Shlok ) 342
पापस्वपतिना सत्यभामा सान्वयमानिनी । सहवासमनिच्छन्ती भूपतिं शरणं गता ॥ ३४२ ॥
सत्यभामाको अपने वंशका अभिमान था अतः वह अपने पापी पतिके साथ सहवासकी इच्छा न रखती हुई राजाकी शरण गई ॥ ३४२ ।।
Satyabhama possessed great pride in her lineage; therefore, having no desire to cohabit with her sinful husband, she sought refuge with the king. || 342 ||
श्लोक ( Shlok ) 343 -345
कापिलर्क शोकान्मस्तकन्यस्तहस्तकम् । स्वोपान्तोपेतमन्यायघोषणं कृतकद्विजम् ॥ ३४३ ॥ वीक्ष्य अविज्ञातवृत्तान्तं स श्रीषेणमहीपतिः । पापिष्ठानां विजातीनां नाकार्य नाम किञ्चन ॥ ३४४ ॥ एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् । आदिमध्यावसानेषु न ते यास्यन्ति विक्रियाम् ॥ ३४५ ॥
उस समय अन्यायकी घोषणा करने वाला वह बनावटी ब्राह्मण कपिल राजाके पास ही बैठा था, शोकके कारण उसने अपना हाथ अपने मस्तक पर लगा रक्खा था, उसे देखकर और उसका सब हाल जानकर श्रीषेण राजाने विचार किया कि पापी विजातीय मनुष्योंको संसारमें न करने योग्य कुछ भी कार्य नहीं है। इसीलिए राजा लोग ऐसे कुलीन मनुष्योंका संग्रह करते हैं जो आदि मध्य और अन्तमें कभी भी विकारको प्राप्त नहीं होते ।। ३४३-३४५ ।।
At that time, Kapil—the deceitful Brahmin who had declared the injustice—was sitting right next to the king, resting his hand on his forehead out of grief. Seeing him and learning about his entire situation, King Shrishena thought to himself, “There is absolutely no forbidden act in this world that sinful, outcaste men will not commit. It is for this very reason that kings surround themselves with men of noble birth—those whose integrity remains unaltered at the beginning, middle, and end.” || 343-345 ||
श्लोक ( Shlok ) 346
स्वयंरक्तो विरक्तायां योऽनुरागं प्रयच्छति । हरिनीलमणौ वासौ तेजः काङ्क्षन्ति लोहितम् ॥ ३४६ ॥
जो स्वयं अनुरक्त हुआ पुरुष विरक्त स्त्रीमें अनुरागकी इच्छा करता है वह इन्द्रनील मणिमें लाल तेजकी इच्छा करता है ।। ३४६ ।।
A man who, being captivated himself, desires affection from an indifferent woman is like one who wishes for a red brilliance within a sapphire. || 346 ||
श्लोक ( Shlok ) 347
इत्यादि चिन्तयन् सद्यस्तं दुराचारमात्मनः । देशान्निराकरोद्धर्त्या न सहन्ते स्थितिक्षतिम् ॥ ३४७ ॥
इत्यादि विचार करते हुए राजाने उस दुरा-चारीको शीघ्र ही अपने देशसे निकाल दिया सो ठीक ही है क्योंकि धर्मात्मा पुरुष मर्यादाकी हानि-को सहन नहीं करते ॥ ३४७ ॥
Reflecting upon these thoughts, the king swiftly banished that wicked-natured man from his country. This is only right, for righteous men do not tolerate the violation of moral boundaries. || 347 ||
श्लोक ( Shlok ) 348 – 350
कदाचिच्च महीपालः चारणद्वन्द्वमागतम् । प्रतीक्ष्यादित्यगत्याख्यमरिब्जयमपि स्वयम् ॥ ३४८ ॥दत्वान्नदान मेताभ्यामवाप्याश्चर्यपञ्चकम् । उदक्कुर्वायुरग्रन्थात् दशाङ्गतरुभागदम् ॥ ३४९॥देव्यौ दानानुमोदेन सत्यभामा च सत्क्रिया । तदेवायुरवापुस्ताः किं न स्यात्साधुसङ्गमात् ॥ ३५० ॥
किसी एक दिन राजाने घर पर आये हुए आदित्यगति और अरिञ्जय नामके दो चारण मुनियोंको पडिगाह कर स्वयं आहार दान दिया, पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये और दश प्रकारके कल्पवृक्षोंके भोग प्रदान करने वाली उत्तरकुरुकी आयु बांधी। राजाकी दोनों रानियोंने तथा उत्तम कार्य करनेवाली सत्यभामाने भी दानकी नुमोदनासे उसी उत्तरकुरुकी आयुका बन्ध किया सो ठीक ही है क्योंकि साधुओंके समागमसे क्या नहीं होता ? ॥ ३४८-३५० ॥
One day, the king reverently welcomed (padigah) two Charana monks named Adityagati and Arinjaya who had come to his palace. He personally offered them food as charity (aahar daan), witnessed the five divine wonders (panchashcharya), and bound his karma to be reborn in Uttarākuru, a realm that grants the enjoyments of the ten types of wish-fulfilling trees (kalpavrikshas).
Both of the king’s queens, as well as Satyabhama—who always performed noble deeds—also bound their karma for rebirth in that same realm of Uttarākuru by rejoicing in his act of charity. This is only natural, for what cannot be achieved through the association of holy men? || 348-350 ||
श्लोक ( Shlok ) 351
अथ कौशाम्ब्यधीशस्य महाबलमहीपतेः । श्रीमत्याश्च सुता नान्ना श्रीकान्ता कान्ततावधिः ॥३५१ ॥
अथानन्तर कौशाम्बी नगरी में राजा महाबल राज्य करते थे, उनकी श्रीमती नामकी रानी थी और उन दोनोंके श्रीकान्ता नामकी पुत्री थी। वह श्रीकान्ता मानो सुन्दरताकी सीमा ही थी ॥ ३५१ ।।
Thereafter, King Mahabala ruled over the city of Kaushambi. He had a queen named Shrimati, and they had a daughter named Shrikanta. That Shrikanta was, as it were, the very ultimate boundary of beauty. || 351 ||
श्लोक 352 से 363
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