मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 412 to 426
श्लोक ( Shlok ) 412
अस्तु वा नाहतव्यक्तिसृष्टिवादो विधीयते । इति श्रुत्वा वचस्तस्य सर्वे ते तं समस्तुवन् ॥४१२॥
इस प्रकार आपके सृष्टिवादमें यह व्यक्तिवाद आदर करनेके योग्य नहीं है। इस तरह नारद्के वचन सुनकर सब लोग उसकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४१२ ॥
“In this manner, this doctrine of creation (Srishtivada) and its theory of individualism (Vyaktivada) within your philosophy is not worthy of respect. Hearing these words of Narada, everyone present began to praise him. || 412 ||”
श्लोक ( Shlok ) 413
वसुना चेद् द्वयोर्वादे विच्छेदः सोऽभिगम्यताम् । इति ताभ्यां समं संसदगच्छत्स्वस्तिकावतीम् ॥ ४१३॥
सब कहने लगे कि यदि राजा वसुके द्वारा तुम दोनोंका विवाद विश्रान्त होता है तो उनके पास चला जावे। ऐसा कह सभाके सब लोग नारद और पर्वतके साथ स्वस्तिकावती नगर गये ॥ ४१३ ॥
“Everyone began to say that if the dispute between you two can be resolved (brought to rest) by King Vasu, then you should both go to him. Saying this, all the people of the assembly went to the city of Svastikavati along with Narada and Parvata. || 413 ||”
श्लोक ( Shlok ) 414 – 417
तत्सर्व पर्वतेनोक्तं ज्ञात्वा तज्जननी तदा । सह तेन वसुं दृष्ट्वा पर्वतस्त्वपरिग्रहः ॥४१४॥ तपोवनोन्मुखेनायं गुरुणापि तवार्पितः । नारदेन सहास्येह तवाध्यक्षे भविष्यति ॥४१५॥ ४विवादो यदि भङ्गोऽत्र भावी भावियमाननम् । विद्ध्यस्य शरणं नान्यदित्याख्यत्सोऽपि सादरम् ४१६ विधित्सुर्गुरुशुश्रूषामम्ब मास्मात्र शङ्कथाः । जयमस्य विधास्यामीत्यस्या भयमपाकरोत् ॥४१७॥
पर्वतके द्वारा कही हुई यह सब जब उसकी माताने जानी तब वह पर्वतको साथ लेकर राजा वसुके पास गई और राजा वसुके दर्शन कर कहने लगी कि यह निर्धन पर्वत तपोवनके लिए जाते समय तुम्हारे गुरुने तुम्हारे लिए सौंपा था। आज तुम्हारी अध्यक्षता में यहाँ नारदके साथ विवाद होगा। यदि कदाचित् उस वादमें इसकी पराजय हो गई तो फिर यमराजका मुख ही इसका शरण होगा अन्य कुछ नहीं, यह तुम निश्चित समझ लो, इस प्रकार पर्वतकी माताने राजा वसुसे कहा। राजा वसु गुरुकी सेवा करना चाहता था अतः बड़े आदरसे बोला कि हे माँ ! इस विषय में तुम कुछ भी शंका न करो। मैं पर्वतकी ही विजय कराऊँगा। इस तरह कहकर उसने पर्वतकी माका भय दूर कर दिया। ॥ ४१४-४१७ ॥
“When Parvata’s mother came to know about all that he had said, she took Parvata with her and went to King Vasu. Upon seeing King Vasu, she said, ‘When your Guru was leaving for the penance forest (Tapovan), he entrusted this poor Parvata to you. Today, under your presidency, a debate with Narada will take place here.
If by any chance he is defeated in this debate, then the face of Yamaraja (the God of Death) will be his only refuge and nothing else—know this for certain.’ Thus did Parvata’s mother speak to King Vasu. Because King Vasu wished to serve his Guru, he spoke with great respect, ‘O Mother! Do not have any doubt in this matter. I will ensure that Parvata emerges victorious.’ By speaking in this manner, he removed the fear of Parvata’s mother. || 414-417 ||”
श्लोक ( Shlok ) 418 – 419
अन्येद्युर्वसुमाकाशस्फटिकांड्रयुद्धतासनम् । सिंहाङ्कितं समारुह्य स्थितं समुपगम्यते ॥४१८॥ सम्पृच्छन्ति स्म सर्वेऽपि विश्वभूसचिवादयः । त्वत्तः प्रागप्यहिंसादिधर्मरक्षणतत्पराः ॥ ४१९ ॥
दूसरे दिन राजा वसु आकाश-स्फटिकके पायोंसे खड़े हुए, सिंहासनपर आरूढ़ होकर राज-सभामें विराजमान था उसी समय वे सब विश्वभू मन्त्री आदि राजसभामें पहुँच कर पूछने लगे कि आपसे पहले भी अहिंसा आदि धर्मकी रक्षा करनेमें तत्पर रहने वाले हिमगिरि, महागिरि, समगिरि और वसुगिरि नामके चार हरिवंशी राजा हो गये हैं ।॥ ४१८-४१९॥
“The next day, King Vasu was seated in the royal assembly, ascending a throne that stood upon pillars of sky-crystal (akasha-sphatika). At that very moment, the minister Vishvabhu and others arrived at the royal court and began to ask: ‘Even before you, there have been four kings of the Harivamsha lineage—named Himgiri, Mahagiri, Samagiri, and Vasugiri—who were deeply devoted to protecting righteousness (Dharma), including non-violence (Ahimsa). || 418-419 ||'”
श्लोक ( Shlok ) 420 – 426
चत्वारोऽत्र महीपाला भूता हिममहासम । वस्वादिगिरिपर्यन्तनामानो हरिवंशजाः ॥ ४२० ॥ पुरा चैषु व्यतीतेषु विश्वावसुमहामहीट् । अभूत्ततो भवांश्चासीदहिंसाधर्मरक्षकः ॥ ४२१ ॥ त्वमेव सत्यवादीति प्रघोषो भुवनत्रये । विषवह्नितुलादेश्यो वस्तुसन्देहसन्निधौ ॥ ४२२ ॥ त्वमेव प्रत्ययोत्पादी छिन्द्धि नः संशयं विभो । अहिंसालक्षणं धर्म नारदः प्रत्यपद्यत ॥ ४२३ ॥पर्वतस्तद्विपर्यासमुपाध्यायोपदेशूनम् । यादृक् ताइक् त्वया ‘वाच्यमित्यसौ चाथितः पुरा ॥ ४२४ ॥ गुरुपत्न्याप्तनिर्दिष्टं बुध्यमानोऽपि भूपतिः । महाकालमहामोहेनाहितो दुःषमावधेः ॥ ४२५ ॥ सामीप्याद्रक्षणानन्दरौद्रध्यानपरायणः । पर्वताभिहितं तत्त्वं दृष्टे काऽनुपपन्नता ॥ ४२६ ॥
इन सबके अतीत होने पर महाराज विश्वा-बसु हुए और उनके बाद अहिंसा धर्म की रक्षा करनेवाले आप हुए हैं। आप ही सत्यवादी हैं इस प्रकार तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। किसी भी दशामें संदेह होने पर आप विष अग्नि और तुलाके समान हैं। हे स्वामिन् ! आप ही विश्वास उत्पन्न करने वाले हैं अतः हम लोगोका संशय दूर कीजिये। नारदने अहिंसालक्षण धर्म बतलाया है और पर्वत इसमें विपरीत कहता है अर्थात् हिंसाको धर्म बतलाता है। अब उपाध्याय – गुरुमहाराजका जैसा उपदेश हो वैसा आप कहिये ।इस प्रकार सब लोगोंने राजा वसुसे कहा। राजा वसु यद्यपि आप्त भगवान्के द्वारा कहे हुए धर्मतत्त्वको जानता था तथापि गुरुपत्त्नी उससे पहले ही प्रार्थना कर चुकी थी, इसके सिवाय वह सहाकालके द्वारा उत्पादित महामोहसे युक्त था, दुःषमा नामक पञ्चम कालकी सीमा निकट थी, और वह स्वयं परिग्रहानन्द रूप रौद्र ध्यानमें तत्पर था अतः कहने लगा कि जो तत्त्व पर्वतने कहा है वही ठीक है। जो वस्तु प्रत्यक्ष दिख रही है उसमें बाधा हो ही कैसे सकती है ।। ४२०-४२६ ।।
“After all of them passed away, Maharaja Vishvabhu succeeded them, and after him, you have become the protector of the dharma of non-violence (Ahimsa). You alone are known throughout the three worlds as the speaker of truth (Satyavadi). In any situation where doubt arises, you are like poison, fire, and the scales of justice (impartial and definitive). O Master! You alone inspire absolute trust; therefore, please dispel our doubts.
Narada has described righteousness as having the characteristic of non-violence (Ahimsa-lakshana), whereas Parvata says the exact opposite—meaning, he proclaims violence (Himsa) to be dharma. Now, please tell us what the actual instruction of our Upadhyaya (Guru Maharaja) was.’ Thus spoke all the people to King Vasu.
Although King Vasu well knew the true essence of Dharma as proclaimed by the omniscient Lord (Aptabhagavan), his Guru’s wife had already entreated him beforehand. Furthermore, he was under the influence of deep cosmic delusion (Mahamoha) brought about by the cosmic cycle of time, the boundary of the fifth era called Dushama (the age of decline) was drawing near, and he himself was engrossed in fierce, worldly meditation centered on the pleasure of possessions (Parigrahananda Raudra Dhyana). Therefore, he declared, ‘The principle stated by Parvata is the correct one. How can there be any contradiction in something that is visibly evident?’ || 420-426 ||”
श्लोक 427 से 443
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411
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