नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 283 to 292
श्लोक ( Shlok ) 283
पुरे श्वेतविकानाम्नि वासवस्य महीपतेः । वसुन्धाँ सुता नन्दयशाः समुदपाद्यसौ ॥ २८३ ॥
मरकर श्वेतविका नाम के नगर में वहाँ के राजा वासथके उसकी रानी वसुन्धरासे नन्दयशा नामकी पुत्री हुआ ।। २८३ ।।
After dying, it was reborn in Shvetavika city as a daughter named Nandayasha to King Vasath and his queen, Vasundhara.[ 283]
श्लोक ( Shlok ) 284
पुननिरनुकम्पश्च भ्रात्रा दुःखनिमित्तकम् । त्वयेदृशं न कर्तव्यमित्युक्तः शममागतः ॥ २८४ ॥
छोटे भाई सानुकम्पने निरनुकम्प नामक अपने बड़े भाईको फिर भी समझाया कि आपके लिए इस प्रकार दूसरोंको दुःख देनेवाला कार्य नहीं करना चाहिए’। इस प्रकार समझाये जानेपर वह शान्तिको प्राप्त हुआ ।। २८४॥
Even after the incident, the younger brother, Sanukampa, reasoned with his elder brother, Niranukampa, saying, “You should not engage in actions that bring such suffering to other living beings.” Upon being counseled in this manner, Niranukampa finally attained peace and calmed down.[ 284]
श्लोक ( Shlok ) 285 – 290
स्वायुरन्ते समुत्पन्नः सोऽयं निर्नामकाख्यया । ततः पूर्वभवोपात्तपापस्य परिपाकतः ॥ २८५ ॥जायते नन्दयशसः कोपो निर्नामकं प्रति । इति तस्य वचः श्रुत्वा ते निर्वेगपरायणाः ॥ २८६॥नरेन्द्रषट्सुता दीक्षां शङ्खो निर्नामकोऽप्ययुः । तथा नन्दयशा रेवतीनामादित संयमम् ॥ २८७ ॥सुव्रताख्यायिकाभ्याशे पुत्रस्नेहाहितेच्छया । अन्यजन्मनि चामीषामेव लाभे च वर्धने ॥ २८८॥ते निदानं विमूढत्वादुभे चाकुरुतां समम् । ततः सर्वे तपः कृत्वा समाराध्य यथोचितम् ॥२८९॥महाशुक्रे समुत्पन्नाः प्रान्ते सामानिकाः सुराः । षोडशाब्ध्युपमायुष्का दिव्यभोगवशीकृताः ॥ २९० ॥
वही निरनुकम्प आयुके अन्त में मरकर यह निर्नामक हुआ है। पूर्वभवमें उपार्जन किये हुए पापकर्मके उदयसे ही नन्दयशाका निर्नामकके प्रति क्रोध.. रहता है। राजा द्रुमसेनके यह वचन सुनकर राजाके छहों पुत्र, शङ्ख तथा निर्नामक सब विस्त हुए और सभीने दीक्षा धारण कर ली। इसी प्रकार पुत्रोंके स्नेहसे उत्पन्न हुई इच्छासे रानी नन्दयशा तथा रेवती धायने भी सुव्रता नामक आर्यिका के समीप संयम धारण कर लिया। किसी एक दिन उन दोंनों आर्यिकाओंने मूर्खतावश निदान किया। नन्दयशाने तो यह निदान किया कि ‘आगामी जन्ममें भी ये मेरे पुत्र हों’ और रेवतीने निदान किया कि ‘मैं इनका पालन करूँ’ । तदनन्तर तपश्चर्या कर और अपनी योग्यताके अनुसार आराधनाओंकी आराधनाकर आयुके अन्तमें वे सब महाशुक्र स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ सोलह सागरकी उनकी आयु थी और सब दिव्य भोगोंके वशीभूत रहते थे ।। २८५-२९० ।।
That same Niranukampa, upon dying at the end of his lifespan, has been reborn as this Nirnamak. It is solely due to the rise (udaya) of the sinful karma accumulated in her past life that Nandayasha harbors such anger toward Nirnamak.
Upon hearing these words from King (Muniraj) Drumasen, all six of the King’s sons, along with Shankha and Nirnamak, became detached from the world and accepted initiation into monkhood (diksha). Driven by the deep affection they felt for their sons, Queen Nandayasha and the wet nurse Revati also accepted the vows of self-restraint (samyama) under an Aryika (Jain nun) named Suvrata.
One day, out of ignorance, both Aryikas made a nidan (a binding ritual desire or vow for the fruits of penance in a future life). Nandayasha made a nidan wishing, “May these same boys be born as my sons in my next life as well,” while Revati made a nidan wishing, “May I be the one to nurture and raise them.”
Subsequently, after practicing rigorous penances and worshiping according to their capabilities, they all passed away at the end of their lifespans and were reborn as Samanika category celestial beings (devas) in the Mahashukra heaven. Their lifespan there was sixteen sagar, and they remained immersed in divine pleasures.[285-290]
श्लोक ( Shlok ) 291 – 292
ततः प्रच्युत्य शङ्खोऽभूद्धलदेवो हलायुधः । मृगावत्याख्यविषये दशार्णपुरभूपतेः ॥ २९१ ॥देवसेनस्य चोत्पन्ना धनदेव्याश्च देवकी । त्वं सा नन्दयशाः स्त्रीत्वमुपगम्य निदानतः ॥ २९२॥
वहाँसे च्युत होकर शङ्खका जीव हलका धारण करनेवाला बलदेव हुआ है और नन्दयशाका जीव मृगावती देशके दशार्णपुर नगरके राजा देवसेनके रानी धनदेवीसे देवकी नामकी पुत्री पैदा हुई है। निदान-बन्धके कारण ही तू स्त्रीपर्यायको प्राप्त हुई है ।। २९१-२९२ ॥
श्लोक 293 से 301
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