नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 293 to 301
श्लोक ( Shlok ) 293
तदा विद्याधरा भूमिगोचराश्चार्य संहर । चरणौ स्त्रंसृतेर्हेतुं क्रोधं मा स्म कृथा वृथा ॥ २९३ ॥
उस समय विद्याधर और भूमिगोचरी सभी स्तुति कर मुनिराजसे कहने लगे कि हे प्रभो ! अपने चरणोंको संकोच लीजिए, वृथा ही संसारका कारणभूत क्रोध नहीं कीजिए ॥ २९३ ॥
At that moment, the sky-dwellers (Vidyadharas) and the earth-dwellers (Bhumigochari) alike began offering praises, pleading with the royal monk, “O Lord! Please withdraw your steps. Do not unnecessarily indulge in anger, which is the ultimate cause of worldly bondage (Samsara).” || 293 ||
श्लोक ( Shlok ) 294
इति सङ्गीतवीणादिमुखरा मुनिसत्तमम् । सद्यः प्रसादयामासुः सोप्यंत्री स्वौ समाहरत् ॥ २९४ ॥
इस प्रकार सङ्गीत और वीणा आदिसे मुखर हुए भूमिगोचरियों और विद्याधरों ने शीघ्र ही उन मुनिराजको प्रसन्न कर लिया और उन्होंने भी अपने दोनों चरण संकोच लिये ॥ २९४॥
In this manner, the earth-dwellers (Bhumigochari) and the sky-dwellers (Vidyadharas), whose voices resounded with music and the playing of the veena, soon pacified the royal monk, and he too withdrew both of his steps. || 294 ||
श्लोक ( Shlok ) 295 – 296
श्र त्वा लक्षणवत्तेषां तदा गीतं सुधाशिनः । तुष्ट्वा घोषसुघोषाख्ये महाघोषाञ्च सुस्वराम् ॥ २९५ ॥वीणां घोषावतीं चासु ददति स्म सुसङ्गताम् । विद्याधरेभ्यो द्वे द्वे च भूचरेभ्यो यथाक्रमम् ॥ २९६ ॥
उस समय उनका लक्षणसहित सङ्गीत सुनकर देव लोग बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंनेअच्छे स्वर वाली घोषा, सुघोषा, महाघोषा और घोषवती नामकी चार वीणाएँ दीं। उन वीणाओं मेंसे देवोंने यथाक्रमसे दो वीणाएँ तो विद्याधरोंकी दी थीं और दो वीणाएँ भूमिगोचरियोंको दी थीं ।॥ २९५-२९६ ॥
At that time, hearing their music performed according to the classical treatises, the deities were highly pleased and gifted four sweet-sounding veenas named Ghosha, Sughosha, Mahaghosha, and Ghoshavati. Out of those veenas, the deities, in due order, gave two to the sky-dwellers (Vidyadharas) and two to the earth-dwellers (Bhumigochari). || 295-296 ||
श्लोक ( Shlok ) 297 – 298
वृथा त्वं याचितो विप्रवेरणापि मयाऽधुना । नावकाशस्तृतीयस्य चरणस्येति सत्वरम् ॥ २९७॥बध्वा बलिनमुदृत्तं बली विष्णुमुनीश्वरः । दुःसहं तं निराकार्षीदुपसर्ग मुनीशिनाम् ॥ २९८ ॥
तदनन्तर उन मुनिराजने वलिसे कहा कि मुझ ब्राह्मणने तुझसे व्यर्थ ही याचना की क्योंकि तीसरा चरण रखनेके लिए अवकाश ही नहीं है। यह कहकर बलवान् विष्णुकुमार मुनिराजने उस दुराचारी वलिको शीघ्र ही बाँध लिया और अकम्पन आदि मुनियोंके उस दुःसइ उपसर्गंको दूर कर दिया ॥ २९७-२९८ ॥
Thereafter, the royal monk said to Bali, “I, a Brahmin, begged from you in vain, for there is no space left to place my third step.” Saying this, the powerful royal monk Vishnukumar swiftly bound that wicked Bali and completely removed that unbearable affliction inflicted upon Akampana and the other ascetics. || 297-298 ||
श्लोक ( Shlok ) 299 – 300
बद्धं बलिनमाहन्तुं समुद्युक्तं महीपतिम् । प्रतिषिध्य प्रसन्नात्मा सद्धर्म समजिग्रहत् ॥ २९९ ॥एवं महामुनिस्तत्र कृतधर्मप्रभावनः । पूज्यः पद्मरथेनास्मात्स्वस्थानमगमत्सुधीः ॥ ३०० ॥
बँधे हुए वलिको मारनेके लिए राजा पद्मरथ उद्यत हुए परन्तु मुनिराजने उसे मना कर दिया और प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने वलिको समीचीन धर्म ग्रहण कराया। इस प्रकार धर्मकी प्रभावना करनेवाले बुद्धिमान् मुहामुनिकी राजा पद्मरथने पूजा की। तदनन्तर वे अपने स्थान पर चले गये ।। २९९-३०० ॥
King Padmaratha was prepared to execution-strike the bound Bali, but the royal monk restrained him and, with a pleased mind, initiated Bali into the righteous path of true religion. In this manner, King Padmaratha worshipped the wise and great monk who had glorified the faith. Thereafter, the monk returned to his own abode. || 299-300 ||
श्लोक ( Shlok ) 301
तासु घोषावती नाम वीणा वंशेऽत्र सन्निधिम् । समागमद्भवद्भिस्तत्सा ममानीयतां शुभा ॥ ३०१ ॥
यह सब कथा कहनेके बाद कुमार वसुदेवने गन्धर्व-दत्तासे कहा कि देवोंके द्वारा दी हुई चार वीणाओंमें से घोषवती नामकी वीणा आपके इस वंशमें समागमको प्राप्त हुई थी अतः आप वही शुभ वीणा मेरे लिए मँगाइए ॥ ३०१ ॥
After narrating this entire story, Prince Vasudeva said to Gandharvadatta, “Out of the four veenas gifted by the deities, the one named Ghoshavati was inherited by your lineage. Therefore, please send for that very auspicious veena for me.” || 301 ||
श्लोक 302 से 311
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