नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 47 to 61
श्लोक ( Shlok ) 47 – 50
द्वितीयेऽहनि तद्वालसञ्चितोग्राधसन्निभः । देवो ज्योतिर्गणे जातो धूमकेतुसमाह्वयः ॥ ४७ ॥गच्छन्यदृच्छया व्योम्नि विहतु वातरंहसा । विमाने स्वे धृते वान्यैः प्रद्युन्नस्योपरिस्थिते ॥ ४८ ॥चरमाङ्गस्य केनेदं कृतमित्युपयुक्तवान् । विभङ्गादात्मनः शत्रु ज्ञात्वा प्राक्तनजन्मनि ॥ ४९ ॥रथान्तकनकस्यायं दर्पाहारान्ममाहरत् । तत्फलं प्रापयाम्येनमिति वैराग्निनाः ज्वलन् ॥५०॥
इधर राजा कनकरथका जीव तपश्चरणकर धूमकेतु नामका ज्योतिषी देव हुआ था। वह बालक प्रद्युम्नके पूर्वभवमें संचित किये हुए तीव्र पापके समान जान पड़ता था। किसी दूसरे दिन वह इच्छानुसार विहार करनेके लिए आकाशमें वायुके समान वेगसे जा रहा था कि जब उसका विमान चरमशरीरी प्रद्युम्नके ऊपर पहुँचा तब वह ऐसा रुक गया मानो किन्हीं दूसरोंने उसे पकड़-कर रोक लिया हो। यह कार्य किसने किया है ? यह जाननेके लिए जब उसने उपयोग लगाया तब विभङ्गावधि ज्ञानसे उसे मालूम हुआ कि यह हमारा पूर्वजन्मका शत्रु है। जब मैं राजा कनकरथ था तब इसने दर्पवश मेरी स्त्रीका अपहरण किया था। अब इसे उसका फल अवश्य ही चखाता हूँ। ऐसा विचारकर वह वैर रूपी अग्निसे प्रज्वलित हो उठा ।। ४७-५० ।।
Meanwhile, the soul of King Kanakaratha, through his severe austerities, had been reborn as a celestial being of the stellar class (Jyotishi Deva) named Dhumaketu. He appeared just like the intense, accumulated past sins of the child Pradyumna.
On another day, as he was traveling through the sky with the speed of the wind according to his own desire, his celestial vehicle (Vimana) abruptly stopped right above Pradyumna—who was a Charama-shariri (a soul in its final incarnation before liberation)—as if someone else had seized and halted it.
“Who has done this?” To find out, he focused his consciousness and, through his Vibhangavadhi-jnana (distorted clairvoyance), discovered: “This is my enemy from a previous birth. When I was King Kanakaratha, he arrogantly abducted my wife. Now, I will certainly make him taste the fruit of that action.” Reflecting thus, he flared up, burning with the fire of deep-seated enmity. ॥ 47-50 ॥
श्लोक ( Shlok ) 51 – 53
विधाय स महानिद्रामन्तः पुरनिवासिनाम् । तमुद्ध त्याब्दमार्गेण दूरं नीत्वा यथाचिरम् ॥ ५१ ॥अनुभूय महादुःखं कुर्यात्प्राणविमोचनम् । करिष्यामि तथेत्यस्य पुण्येनैवं प्रचोदितः ॥ ५२ ॥ अवरुह्य नभोभागाद्वने खदिरनामनि । शिलायास्तक्षकाख्यायाः क्षिप्त्वाधस्तादमुं गतः ॥ ५३ ॥
वह अन्तःपुर में रहनेवाले लोगोंको महानिद्रासे अचेतकर बालक प्रद्युम्नको उठा लाया और आकाशमार्गसे बहुत दूर ले जाकर सोचने लगा कि मैं इसकी ऐसी दशा करूँगा कि जिससे चिरकाल तक महादुःख भोगकर प्राण छोड़ दे-मर जावे । ऐसा विचारकर वह बालकके पुण्यसे प्रेरित हुआ आकाशसे नीचे उतरा और खदिर नामकी अटवीमें तक्षक शिलाके नीचे बालकको रखकर चला गया ।। ५१-५३ ।।
Rendered helpless by throwing the inhabitants of the inner palace into a profound sleep, he abducted the child Pradyumna and carried him far away through the sky. He began to think, “I will reduce him to such a plight that, after suffering immense agony for a long time, he will lose his life and die.” Thinking thus, and guided unconsciously by the child’s own merit (Punya), he descended from the sky. He placed the child beneath a stone slab (Takshaka Shila) in a forest named Khadira, and departed. ॥ 51-53 ॥
श्लोक ( Shlok ) 54 – 55
तदैव विजयार्धाद्रिदक्षिणश्रेणिभूषणे । विषयेऽमृतवत्याख्ये मेघकूटपुराधिपः ॥ ५४ ॥कालसंवरविद्याधरेशः काञ्चनमालया । सह जैनीश्वरीरर्चाः प्रियया प्राचितुं प्रयान् ॥ ५५ ॥
उसी समय विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीके आभूषण स्वरूप मृतवती नामक देशके काल-कूट नगरका स्वामी कालसंवर नामका विद्याधर राजा अपनी काञ्चनमाला नामकी स्त्रीके साथ जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाओंकी पूजा करनेके लिए जा रहा था ।। ५४-५५ ।।
At that very moment, the Vidyadhara King named Kalasamvara—the ruler of Kalakuta city in the country of Mritavati, which was the crowning ornament of the southern range of Mount Vijayardha—was traveling along with his wife Kanchanamala to worship the idols of Lord Jinendra. ॥ 54-55 ॥
श्लोक ( Shlok ) 56 – 59
महाशिलाखिलाङ्गातिचलनं वीक्ष्य विस्मयात् । समन्ताद्वीक्षमाणोऽसौ दृष्ट्वा बालं ज्वलत्प्रभम् ॥ ५६ ॥प्राकृतोऽयं न केनापि कोपात्प्राग्जन्मवैरिणा । निक्षिप्तः पापिनाऽमुष्मिन् पश्य बालार्कभास्वरः ॥ ५७ ॥तस्मात्तवास्तु पुत्रोऽयं गृहाणामुं मनोरमे । इत्याहोवाच साप्यस्मै यौवराज्यं ददासि चेत् ॥ ५८ ॥ग्रहीष्यामीति तेनापि प्रतिपद्य तथास्त्विति । तत्कर्णगतसौवर्णपत्रेणारचि पट्टकः ॥ ५९ ॥
वह उस बड़ी भारी शिलाके समस्त अङ्गोंको जोरसे हिलता देख आश्चर्य में पड़ गया। सब ओर देखनेपर उसे देदीप्यमान कान्तिका धारक बालक दिखाई दिया। देखते ही उसने निश्चय कर लिया कि ‘यह सामान्य बालक नहीं है, कोई पूर्वजन्मका वैरी पापी जीव क्रोधवश इसे यहाँ रख गया है। हे प्रिये ! देख, यह कैसा बालसूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा है। इसलिए हे सुन्दरी ! यह तेरा ही पुत्र हो, तू इसे ले ले’। इस प्रकार बालकको उठाकर विद्याधरने अपनी स्त्रीसे कहा। विद्याधरीने उत्तर दिया कि ‘यदि आप इसे युवराजपद देते हैं तो ले लूँगी’ । राजाने उसकी बात स्वीकार कर ली और रानीके कानमें पड़े हुए सुवर्णके पत्रसे ही उसका पट्टबंध कर दिया ॥ ५६-५९ ॥
Seeing that massive stone slab shaking violently in all its parts, he was struck with wonder. Looking all around, he discovered a child radiating a brilliant, glowing luster. The moment he saw him, he concluded, “This is no ordinary child; some sinful being, an enemy from a past life, has left him here out of anger. O beloved! Look, how he shines like the rising sun! Therefore, O beautiful one, let this be your own son; take him.”
Lifting the child, the Vidyadhara spoke thus to his wife. The Vidyadhari replied, “I will accept him only if you bestow upon him the status of crown prince (Yuvaraja).” The king accepted her condition and instantly performed the coronation ritual (Pattabandha) using the golden leaf ornament from the queen’s own ear. ॥ 56-59 ॥
श्लोक ( Shlok ) 60 – 61
तौ तं बालं समादाय पुरमाविष्कृतोत्सवम् । प्रविश्य देवदत्ताख्यां व्यधातां विधिपूर्वकम् ॥ ६० ॥तद्वाललालनालीलाविलासैर्हष्टचेतसोः । तयोर्गच्छति निर्व्याजं काले सुसुखभोगिनोः ॥ ६१ ॥
इस प्रकार राजा कालसंवर और रानी काञ्चनमालाने उस बालकको लेकर अनेक उत्सवोंसे भरे हुए अपने नगर में प्रवेश किया और बालकका विधिपूर्वक देवदत्त नाम रक्खा ।। ६० ।। उस बालकके लालन-पालन तथा लीलाके विलासोंसे जिनका चित्त प्रसन्न हो रहा है और जो सदा उत्तमोत्तम सुखोंका अनुभव करते रहे हैं ऐसे राजा-रानीका समय बिना किसी छलसे व्यतीत होने लगो ॥ ६१ ॥
In this manner, King Kalasamvara and Queen Kanchanamala took the child and entered their city, which was filled with festive celebrations, and formally named him Devadatta in accordance with prescribed rituals. ॥ 60 ॥
With their minds filled with joy by the nurturing and playful activities of the child, the King and Queen—who continually experienced the highest pleasures—began to spend their time smoothly, free from any deceit or trouble. ॥ 61 ॥
श्लोक 62 से 71
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46
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