शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
लब्धबोधिः समाश्रित्य ‘सुरामरगुरुं यमम् । सुगुप्तिसमितीः सम्यगादाय चिरमाचरन् ॥ ३२ ॥
जिससे उसे आत्मज्ञान हो गया। उसने सुरामरगुरु नामक मुनिराजके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली तथा उत्तम गुप्तियों और समितियोंको लेकर चिर कालतक उनका आचरण करता रहा ॥ ३२ ॥
As a result, he attained self-realization (Atma-jnana). He then approached a sage named Suramaraguru, received initiation (Diksha), and faithfully practiced the supreme Guptis (mental, vocal, and physical restraints) and Samitis (regulations of conduct) for a very long time. || 32 ||
श्लोक ( Shlok ) 33 – 34
अन्येधुर्नन्दाना ख्याद्रौ प्रतिमायोगमागमत् । अश्वग्रीवानुजो भ्रान्त्वा सुकण्ठाख्यो भवार्णवे ॥३३॥असुरत्वं समासाद्य दृष्ट्चैनं मुनिसत्तमम् । विधाय बहुधा क्रोधादुपसर्गानवारयन् ॥ ३४ ॥
किसी एक दिन यही मुनिराज नन्दन नामक पर्वतपर प्रतिमा योग धारण कर विराजमान थे । अश्वग्रीव का छोटा भाई सुकण्ठ संसार रूपी समुद्रमें चिर काल तक भ्रमणकर असुर अवस्था को प्राप्त हुआ था। वह वहाँ से निकला और इन श्रेष्ठ मुनिराजको देखकर क्रोध के वश अनेक प्रकारके उपसर्ग करता रहा ।।३३-३४ ।।
One day, while this very sage was seated on a mountain named Nandana, deeply absorbed in Pratima-yoga (a meditative posture of complete stillness), Ashvagriva’s younger brother, Sukantha—who had been wandering in the ocean of worldly existence (Samsara) for a long time and had taken birth as an Asura (demonic celestial being)—arrived there. Emerging from that realm and seeing the noble sage, he fell under the control of immense anger and began inflicting various kinds of afflictions (Upasargas) upon him. || 33-34 ||
श्लोक ( Shlok ) 35
महायोगात्प्रतिज्ञातात् स्थिरं चालयितुं खलः । “लज्जातिरस्करिण्येव सोऽन्तर्धानमुपागतः ॥३५॥
परन्तु वह दुष्ट उन दृढ़प्रतिज्ञ मुनिराजको ग्रहण किये हुए व्रतसे रंच मात्र भी विचलित करनेमें जब समर्थ नहीं हो सका तब लज्जारूपी परदाके द्वारा ही मानो अन्तर्धानको प्राप्त हो गया-छिप गया ॥ ३५ ॥
However, when that wicked being failed to sway the firmly-vowed sage even a fraction from his meditation, he vanished from sight—as if disappearing behind a veil of utter shame. || 35 ||
श्लोक ( Shlok ) 36
मुनिः संन्यस्य कालान्ते सोऽच्युतेऽगात्प्रतीन्द्रताम् । इन्द्रेण सह सम्प्रीत्या सप्रवीचारभोगभाक् ॥३६॥
वे मुनिराज संन्यासमरणकर आयुके अन्त में अच्युतस्वर्गके प्रतीन्द्र हुए और इन्द्रके साथ उत्तम प्रीति रखकर प्रवीचार सुखका अनुभव करने लगे ॥ ३६ ॥
Having embraced Sanyasamaran (a ritual peaceful death while meditating) at the end of his lifespan, that noble sage was reborn as a Pratindra (a high-ranking celestial authority just below Indra) in the Achyuta Heaven. There, sharing a profound bond of affection with the Indra, he experienced supreme heavenly pleasures. || 36 ||
श्लोक ( Shlok ) 37 – 39
प्रामच्युत्याच्युताधीशो द्वीपेऽस्मिन् प्राग्विदेहके । विषये मङ्गलावत्यां स्थानीये रत्नसञ्चये ॥ ३७ ॥राज्ञः क्षेमकराख्यस्य कृतपुण्योऽभवत्सुतः । श्रीमान् कनकचित्रायां भासो वा मेघविद्युतोः ॥ ३८ ॥आधानप्रीतिसुप्रीतिष्टतिमोदप्रियोद्भव । प्रभृत्युक्तक्रियोपेतो धीमान् वज्रायुधारूयः ॥ ३९ ॥
अपराजित का जीव जो इन्द्र हुआ था वह पहले च्युत हुआ और इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी पूर्वविदेह क्षेत्रके रत्नसंचय नामक नगर में राजा क्षेमंकरकी कनकचित्रा नामकी रानीसे मेघकी बिजलीसे प्रकाशके समान पुण्यात्मा श्रीमान् तथा बुद्धिमान् वज्रायुध नामका पुत्र हुआ। जब यह उत्पन्न हुआ था तब आधान प्रीति सुप्रीति धृति-मोह प्रियोद्भव आदि क्रियाएं की गई थीं ॥ ३७-३९ ॥
The soul of Aparajita, who had become the Indra, was the first to depart from the heavenly realm. He was reborn in the Ratnasanchaya city of the Purva-Videha region within this very Jambu-dvipa. He was born as a glorious, virtuous, and wise son named Vajrayudha to Queen Kanakachitra and King Kshemankara, illuminating the world like a flash of lightning from a cloud. Upon his birth, all the sacred rituals—such as Aadhan, Priti, Supriti, Dhriti, Moha, and Priyodbhava—were duly performed. || 37-39 ||
श्लोक ( Shlok ) 40
तन्मातरीव तज्जन्मतोषः सर्वेष्वभूव् बहुः । भवेच्छचीशदिश्येव किं प्रकाशोऽशुमालिनः ॥ ४० ॥
उसके जन्मसे उसकी माताके ही समान सबको बहुत भारी संतोष हुआ था सो ठीक ही है क्योंकि सूर्यका प्रकाश क्या केवल पूर्व दिशा में ही होता है भावार्थ – जिस प्रकार सूर्य पूर्व दिशासे उत्पन्न होता है परन्तु उसका प्रकाश सब दिशाओंमें फैल जाता है उसी प्रकार पुत्रकी उत्पत्ति यद्यपि रानी कनकचित्राके ही हुई थी परन्तु उससे हर्ष सभीको हुआ था ॥ ४० ॥
Everyone experienced immense satisfaction upon his birth, just as his mother did. And this is only fitting, for does the light of the sun spread only in the eastern direction?
Explanatory Note (Bhavartha): Just as the sun rises in the east but its light spreads across all directions, similarly, although the prince was born only to Queen Kanakachitra, his birth brought immense joy and happiness to everyone. || 40 ||
श्लोक ( Shlok ) 41
अवर्धिष्ट वपुस्तस्य सार्द्ध रूपादिसम्पदा । भूषितोऽ निमिषो वासौ भूषणैः सहजैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
रूप आदि सम्पदाके साथ उसका शरीर बढ़ने लगा और जिस प्रकार स्वाभाविक आभूषणोंसे देव सुशोभित होता है उसी प्रकार स्वाभाविक गुणोंसे वह सुशोभित होने लगा ॥ ४१ ॥
His body began to grow along with the wealth of beauty and form; and just as a celestial being (Deva) is adorned with natural ornaments, he began to be adorned with innate virtues. || 41 ||
श्लोक 42 से 51
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation
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