नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72 – 73
क्रमेण कृतपुण्योऽसौ तत्र सम्पूर्णयौवनः । कदाचिदाज्ञया राज्ञः प्रद्युन्नः सबलो बली ॥ ७२ ॥गत्वा द्विषोऽग्निराजस्य विक्रमादुपरि स्वयम् । निष्प्रतापं विधायैनं युद्धे जित्वार्पयत्पितुः ॥ ७३ ॥
उधर पुण्यात्मा देवदत्त (प्रद्युम्न) क्रम-क्रमसे नवयौवनको प्राप्त हुआ। किसी एक समय अतिशय बलवान् प्रद्युम्न पिताकी आज्ञासे सेना साथ लेकर अपने पराक्रमसे स्वयं ही अभिराज शत्रुके ऊपर जा चढ़ा और उसे युद्धमें प्रताप रहित बना जीतकर ले आया तथा पिताको सौंप दिया ।। ७२-७३ ।।
Meanwhile, the virtuous Devadatta (Pradyumna) gradually attained his youth. At one time, the exceedingly powerful Pradyumna, taking an army along with him by his father’s command, marched out on his own prowess against the enemy King Abhiraja. Having stripped him of his glory and defeating him in battle, he brought him back and presented him to his father. ॥ 72-73 ॥
श्लोक ( Shlok ) 74
तदा दृष्टापदानस्य प्रद्युन्नस्य खगाधिपः । परार्थ्यवस्तुदानेन महती माननां व्यधात् ॥७४ ॥
उस समय राजा कालसंवरने, जिसका पराक्रम देख लिया है ऐसे प्रद्युम्नका श्रेष्ठ वस्तुएँ देकर बहुत भारी सन्मान किया ।॥ ७४ ॥
At that time, King Kalasamvara, having witnessed his prowess, greatly honored Pradyumna by presenting him with the finest gifts and excellent things. ॥ 74 ॥
श्लोक ( Shlok ) 75 – 80
अवतीर्णमिव स्वर्गाद्यौवनैकविभूषणम् । भुवं कदाचित्तद्रूपमाहार्यैश्चातिभास्वरम् ॥ ७५ ॥अवलोक्य स्मराकान्तबुद्धया काञ्चनमालया । जन्मान्तरागतस्नेहकृतानेक’ विकारया ॥ ७६ ॥प्रकाशयन्त्या स्वान्तस्थं भावं पापपरीतया। कुमार तुभ्यं मद्देयां गृहाण विधिपूर्वकम् ॥ ७७ ॥ प्रज्ञप्तिविद्यामित्युक्तस्तया मायामयेहया । सोऽपि मातस्तथैवाहं करिष्यामीति सम्मदात् ॥ ७८ ॥आदाय धीमांस्तां विद्यां सिद्धकूटमुपागमत् । कृत्वा तत्र नमस्कारं चारणौ मुनिपुङ्गवौ ॥ ७९ ॥श्रित्वा श्रुत्वा ततो धर्म ज्ञात्वा विद्याप्रसाधने । हेतुं तदुपदेशेन सञ्जयन्तं समाश्रयत् ॥ ८० ॥
यौवन ही जिसका आभूषण है, जो स्वर्गसे पृथिवीपर अवतीर्ण हुएके समान जान पड़ता है, और जो आभूषणोंसे अत्यन्त देदीप्यमान है ऐसे प्रद्यम्नको देखकर किसी समय राजा कालसंवरकी रानी काञ्चनमालाकी बुद्धि कामसे आक्रान्त हो गइ, वह पूर्वजन्मसे आये हुए स्नेहके कारण अनेक विकार करने लगी, तथा पापसे युक्त हो अपने मनका भाव प्रकट करती हुई कुमारसे कहने लगी कि ‘हे कुमार’ मैं तेरे लिए प्रज्ञप्ति नामकी बिद्या देना चाहती हूँ उसे तू विधि पूर्वक ग्रहण कर’। इस प्रकार माया पूर्व चेष्टासे युक्त रानीने कहा । बुद्धिमान् प्रद्युम्न्नने भी ‘हे माता ! मैं वैसा ही करूँगा’ यह कहकर बड़े हर्षले उससे वह विद्या लेली और उसे सिद्ध करनेके लिए सिद्धकूट चैत्यालयकी ओर गमन किया। वहाँ जाकर उसने चारण-ऋद्धि धारी मुनियोंको नमस्कार किया, उनसे धर्मोपदेश सुना और तदनन्तर उनके कहे अनुसार विद्या सिद्ध करनेके लिए सञ्जयन्त मुनिकी प्रतिमाका आश्रय लिया ॥ ७५-८० ।।
Seeing Pradyumna—whose youth was his very ornament, who appeared as if he had descended to earth from heaven, and who shone brilliantly with celestial decorations—the mind of King Kalasamvara’s queen, Kanchanamala, became overwhelmed with lust at one time. Driven by the affection carried over from a past life, she began to display various passionate gestures. Utterly consumed by sinful intent, she revealed the desire of her heart to the prince, saying, “O Prince! I wish to bestow upon you the lore named Prajnapti; receive it from me in accordance with the prescribed rituals.” Thus spoke the queen, full of deceptive and amorous advances.
The wise Pradyumna, however, replied, “O Mother! I shall do exactly as you say.” Expressing great joy, he received the lore from her and set out towards the Siddhakuta temple to master and perfect it. Upon arriving there, he bowed before the ascetics who possessed Charana-riddhi (the supernatural power of astral travel), listened to their discourse on Dharma, and subsequently, following their guidance, took refuge before the statue of Sage Sanjayanta to perfect the lore. ॥ 75-80 ॥
श्लोक ( Shlok ) 81
आकर्ण्य तत्पुराणञ्च तदर्चापादसंश्रयात् । विद्यां सम्पाद्य सञ्जातसम्मदः पुरमागमत् ॥ ८१ ॥
उसने संजयन्त मुनिका पुराण सुना, उनकी प्रतिमाके चरणोंके आश्रयसे विद्या सिद्ध की और तदनन्तर हर्षित होता हुआ वह अपने नगरको लौट आया ।। ८१ ।।
He listened to the ancient legend (Purana) of Sage Sanjayanta, perfected the lore under the refuge of the feet of his statue, and subsequently returned to his city filled with joy. ॥ 81 ॥
श्लोक 82 से 91
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71
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