राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 51 to 61
श्लोक ( Shlok ) 51 – 56
काशिदेशे क्रमायातमस्मत्पुरवरं पुरा । वाराणसी तदद्याभूदनधिष्ठितनायकम् ॥ ५१ ॥आज्ञा यद्यस्ति देवस्य तदावामुदितोदितम् । विधास्याव इति श्रुत्वा नरेन्द्रस्तदुदीरितम् ॥ ५२ ॥“वियोगमेतयोः सोढुमक्षमा भरतादयः । अस्मद्वंश्या महीनाथाः स्थित्वात्रैव पुरे पुरा ॥ ५३ ॥षट्खण्डमण्डितां पृथ्वीं बहवोऽपालयंश्चिरम् । एकदेशस्थयोरेव सूर्याचन्द्रमसोरिव ॥ ५४ ॥विभासि भवतोस्तेजो व्याप्नोति महिमण्डलम् । ततः किं तत्प्रयाणेन मा यातमिति सोऽब्रवीत् ॥५५॥निषिद्धावपि तौ तेन पुनश्चैवमवोचताम् । आवयोरेव देवस्य स्नेहो याननिषेधनम् ॥ ५६ ॥
कि काशीदेशमें वाराणसी (बनारस) नामका उत्तम नगर हमारे पूर्वजोंकी परम्परासे ही हमारे आधीन चल रहा है परन्तु वह इस समय स्वामि रहित हो रहा है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हम दोनों उसे बढ़ते हुए वैभवसे युक्त कर दें। उनका कहा सुनकर राजा दशरथने कहा कि भरत आदि तुम दोनोंका वियोग सहन करनेमें असमर्थ हैं। पूर्व-कालमें हमारे वंशज राजा इसी अयोध्या नगरी में रहकर ही चिरकाल तक पृथिवीका पालन करते रहे हैं। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा यद्यपि एक स्थानमें रहते हैं तो भी उनका तेज सर्वत्र व्याप्त हो जाता है उसी प्रकार आप दोनोंका तेज एक स्थानमें स्थित होने पर भी समस्त पृथिवी-मण्डल में व्याप्त हो रहा है इसलिए वहाँ जानेकी क्या आवश्यकता है ? मत जाओ ? यद्यपि महाराज दशरथने उन्हें बनारस जानेसे रोक दिया था तो भी वे पुनः इस प्रकार कहने लगे कि महाराजका हम दोनों पर जो महान् प्रेम है वही हम दोनोंके जानेमें बाधा कर रहा है ॥ ५१-५६ ।।
“Kashi country’s excellent city named Varanasi (Banaras) has been under the control of our ancestors by tradition, but at this time, it is left without a master. If it is your command, both of us shall enrich it with growing prosperity.”
Hearing their words, King Dasharatha said, “Bharat and the others are unable to bear the separation from both of you. In ancient times, the kings of our lineage ruled over the Earth for a very long time while residing right here in this city of Ayodhya. Just as the Sun and the Moon, even though they remain in one place, spread their brilliance everywhere, similarly, the brilliance of both of you, despite being situated in one place, is pervading the entire circle of the Earth. Therefore, what is the need to go there? Do not go.”
Although Maharaja Dasharatha had forbidden them from going to Banaras, they still began to speak again in this manner: “The great love that Maharaja has for both of us is the very thing creating an obstacle to our departure.” || 51-56 ||
श्लोक ( Shlok ) 57
शौर्यस्य सम्भवो यावद्यावत्पुण्यस्य च स्थितिः । तावदुत्साहसन्नाहं न मुञ्चन्स्युदयार्थिनः ॥ ५७ ॥
जब तक शूरवीरताका होना सम्भव है और जब तक पुण्यकी स्थिति बाकी रहती है तब तक अभ्युदयके इच्छुक पुरुष उत्साहकी तत्परताको नहीं छोड़ते हैं ।। ५७ ।।
“As long as the existence of heroism is possible and as long as the remnants of one’s virtues (merits) remain, men who desire progress and prosperity do not abandon their readiness for enthusiasm.” || 57 ||
श्लोक ( Shlok ) 58 – 59
बुद्धिं शक्तिमुपायं च जयं गुणविकल्पनम् । सम्यक्प्रकृतिभेदांश्च विदित्वा राजसूनुना ॥ ५८ ॥महोद्योगो विधातव्यो विरुद्धान्विजिगीषुणा । स्वभावविनयोद्भूता द्विधा बुद्धिनिगद्यते ॥ ५९ ॥
जो राजपुत्र विरुद्ध-शत्रुओंको जीतना चाहते हैं उन्हें बुद्धि, शक्ति, उपाय, विजय, गुणोंका विकल्प और प्रजा अथवा मन्त्री आदि प्रकृतिके भेदोंको अच्छी तरह जानकर महान् उद्योग करना चाहिये । उनमेंसे बुद्धि दो प्रकारकी कही जाती है एक स्वभावसे उत्पन्न हुई और दूसरी विनयसे उत्पन्न हुई ॥ ५८-५९ ॥
“Those princes who wish to conquer opposing enemies must undertake great efforts, after thoroughly understanding intellect, power, strategic means, victory, the classification of qualities, and the different components of the state (such as the subjects or ministers). Among these, intellect is said to be of two kinds: one that is innate (born of nature) and the other that is acquired through discipline and humility.” || 58-59 ||
श्लोक ( Shlok ) 60
मन्त्रोत्साहप्रभूक्ता च त्रिधा शक्तिरुदाहृता । ‘पञ्चाङ्ग मन्त्रनिर्णीतिर्मन्त्रशक्तिर्मतागमे ॥ ६० ॥
शक्ति तीन प्रकारकी कही गई है एक मन्त्रशक्ति, दूसरी उत्साह-शक्ति और तीसरी प्रभुत्व-शक्ति । सहायक, साधनके उपाय, देश-विभाग, काल-विभाग और बाधक कारणोंका प्रतिकार इन पाँच अङ्गों के द्वारा मन्त्रका निर्णय करना आगममें मन्त्रशक्ति बतलाई गई है ।॥ ६० ॥
“Power is said to be of three types: first, Mantra-shakti (the power of counsel and diplomacy); second, Utsaha-shakti (the power of energy and drive); and third, Prabhuvta-shakti (the power of sovereignty and resources). In the scriptures, the determination of counsel through five components—allies, the means of achievement, division of territory, division of time, and the counteraction of obstacles—is described as Mantra-shakti.” || 60 ||
श्लोक ( Shlok ) 61
शौयोंर्जितत्वादुत्साहशक्तिः शक्तिज्ञसम्मता । प्रभुशक्तिर्महीभर्तुराधिक्यं कोशदण्डयोः ॥ ६१॥
शक्तिके जाननेवाले शूर-वीरतासे उत्पन्न हुए उत्साह को उत्साह-शक्ति मानते हैं। राजाके पास कोश (खजाना) और दण्ड (सेना) की जो अधिकता होती है उसे प्रभुत्व-शक्ति कहते हैं ॥ ६१ ॥
“Those who understand the nature of power consider the drive born of heroism to be Utsaha-shakti (the power of energy). The abundance of the treasury (wealth) and the army (force) possessed by a King is called Prabhutva-shakti (the power of sovereignty).” || 61 ||
श्लोक 62 से 71
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50
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