अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 443 to 451
श्लोक ( Shlok ) 443
प्रेरितस्तेन सपापेन यमेन वा । दमितारिः समासन्नमरणः श्रवणं ददौ ॥ ४४३ ॥
इस प्रकार यमराजके समान पापी नारदने जिसे प्रेरणा दी है तथा जिसका मरण अत्यन्त निकट है ऐसा दमितारि नारदकी बात में आ गया ॥ ४४३॥
“Thus influenced by the sinful Nārada—who acted just like Yamarāja (the God of Death)—and with his own demise drawing exceedingly near, King Damitarī fell completely into Nārada’s trap.”443
श्लोक ( Shlok ) 444 – 447
नर्तकीवार्ताश्रुतिव्यामुग्धचेतनः । दूतं सोपायनं प्रस्तुतार्थसम्बन्धवेदिनम् ॥ ४४४ ॥प्राहिणोद्वत्सकावत्याः महीशौ शौर्यशालिनौ । प्रति सोऽपि नृपादेशादन्तरेऽहान्यहापयन् ॥ ४४५ ॥गत्वा जिनगृहे प्रोषधोपवाससमन्वितम् । अपराजितराजं च युवराजं च सुस्थितम् ॥ ४४६ ॥दृष्ट्वाऽमात्यमुखादूतो निवेदितनिजागमः । यथोचितं प्रदायाभ्यां स्वानीतोपायनं सुधीः ॥ ४४७॥
नृत्यकारिणीकी बात सुनते ही उसका चित्त मुग्ध हो गया। उसने उसी समय वत्सकावती देशके पराक्रमी राजा अपराजित और अनन्तवीर्यके पास प्रकृत अर्थको निवेदन करनेवाला दूत भेंटके साथ भेजा। तह दूत भी राजाकी आज्ञासे बीचमें दिन नहीं बिताता हुआ – शीघ्र ही प्रभाकरीपुरी पहुँचा। उस समय दोनों ही भाई प्रोषधोपवासका व्रत लेकर जिनमंदिरमें बैठे हुए थे। उन्हें देखकर बुद्धिमान् दूतने मन्त्रीके मुखसे अपने आनेका समाचार भेजा और अपने साथ लाई हुई भेंट दोनों भाइयोंके लिए यथायोग्य समर्पण की ।। ४४४-४४७ ।।
“The moment he heard about the female dancers, his mind became completely captivated. Right then, he dispatched a messenger carrying gifts to the powerful rulers of the Vatsakāvatī country—King Aparājita and Anantavīrya—to formally state his demand. Commanded by the king, the messenger did not waste a single day on his journey and quickly arrived at the city of Prabhākarīpurī.
At that moment, both brothers were sitting in the Jinendra temple (Jin-mandir), having taken the vow of holy fasting (Proṣadhopavāsa). Upon seeing them, the intelligent messenger sent word of his arrival through the prime minister and properly presented the gifts he had brought for both brothers.”444 – 447
श्लोक ( Shlok ) 448
ज्वलल्यस्य प्रतापाग्निदिव्यायस्पिण्डभास्वरः । कृतदोषान् व्यलीकाभिमानिनो दहति द्रुतम् ॥४४८॥
वह कहने लगा कि दिव्य लोहे के पिण्डके समान दैदीप्यमान राजा दमितारिकी प्रतापरूपी अग्नि निरन्तर जलती रहती है, वह अपराधी तथा झूठमूठके अभिमानी मनुष्योंको शीघ्र ही जला डालती है ।। ४४८ ॥
“He began to speak: ‘The fire of the majesty of King Damitarī—glowing brilliantly like a mass of celestial, incandescent iron—blazes incessantly. It swiftly consumes all wrongdoers and those who harbor false pride.'” 448
श्लोक ( Shlok ) 449
तस्य नाम्नैव निभिन्नहृद्याः प्राकृतद्विषः । वमन्ति वैरमस्त्रं वा विनम्रा भयविह्नलाः ॥ ४४९ ॥
उसका नाम लेते ही स्वभावसे बैरी मनुष्योंका हृदय फट जाता है। वे भयसे इतने विह्वल हो जाते हैं कि विनम्र होकर शीघ्र ही वैर तथा अस्त्र दोनों ही छोड़ देते हैं ।। ४४९ ॥
“The moment his name is uttered, the hearts of his natural-born enemies burst with terror. They become so overwhelmed by fear that they humbly surrender, casting aside both their hostility and their weapons at once.”449
श्लोक ( Shlok ) 450
न सन्ति सहजास्तस्य शत्रवः शुद्धचेतसः । विभज्यान्वयजैविंश्वैस्तद्राज्यं भुज्यते यतः ॥ ४५० ॥
उसका चित्त बड़ा निर्मल है, वह अपने वंशके सब लोगोंके साथ विभाग कर राज्यका उपभोग करता है इसलिए परिवारमें उत्पन्न हुए शत्रु उसके हैं ही नहीं ।। ४५० ।।
“His mind is exceedingly pure; he enjoys his kingdom by sharing its wealth and administration with all the members of his clan. Consequently, he has no enemies born out of internal family rivalries.”450
श्लोक ( Shlok ) 451
कृत्रिमाः केन जायन्ते रिपवस्तस्य भूभुजः । मालेवाज्ञा हतावज्ञैरुह्यते यदि मूर्द्धभिः ॥ ४५१ ॥
जब तिरस्कारको न चाहनेवाले लोग उसकी आज्ञाको मालाके समान अपने मस्तक पर धारण करते हैं तब उस राजाके कृत्रिम शत्रु तो हो ही कैसे सकते हैं ? ।। ४५१ ॥
“When people who wish to avoid humiliation wear his command upon their heads like a garland, how can that king possibly have any artificial or self-made enemies?” 451
श्लोक 452 से 462
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