नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 392 to 403
श्लोक ( Shlok ) 392 – 395
सा कदाचिद्वने रन्तुं गत्वा वर्षभयाद् गुहाम् । प्रविष्टाऽजगरागीर्णा हरिवर्षे तनुं श्रिता ॥ ३९२ ॥निर्विश्य तद्द्वतान् भोगान् नागी जाता ततश्च्युता । च्युता ततो विदेहेऽस्मिन् पुष्फलावत्युदीरिते ॥ ३९३॥विषये पुण्डरीकिण्यामशोकाख्यमहीपतेः । सोमश्रियश्च श्रीकान्ता सुता भूत्वा कदाचन ॥३९४॥जिनदत्तार्थिकोपान्ते दीक्षामादाय सुव्रता । तपस्यन्ती चिरं घोरमुपोष्य कनकावलीम् ॥३९५॥
यत्तदेवी किसी दिन क्रीड़ा करनेके लिए बनमें गई थी। वहाँ अचानक बड़ी वर्षा हुई। उसके भयसे वह एक गुफामें चली गई। वहाँ एक अजगरने उसे निगल लिया जिससे हरिवर्ष नामक भोग-भूभिमें उत्पन्न हुई। वहाँ के भोग भोगकर नागकुमारी हुई। फिर वहाँसे चय कर विदेह क्षेत्रके पुष्कलावती देश-सम्बन्धी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा अशोक और सोमश्री रानीके श्रीकान्ता नामकी पुत्री हुई। किसी एक दिन उसने जिनदत्ता आर्यिका के पास दीक्षा लेकर अच्छे-अच्छे व्रतों-का पालन किया, चिरकाल तक तपस्या की और कनकावली नामका घोर उपवास किया ।। ३९२-३९५ ।।
Once upon a time, Yattadevi went to the forest to play. Suddenly, a heavy downpour of rain began there. Out of fear, she entered a cave, where a python swallowed her. As a result of this, she was reborn in the land of enjoyment (Bhogabhumi) named Harivarsha.
After experiencing the pleasures there, she was reborn as a Naga princess (Nagakumari). Passing away from that life, she was born in Pundarikini city within the Pushkalavati region of Videha Kshetra, as Shrikanta, the daughter of King Ashoka and Queen Somashri.
One day, she took initiation (Diksha) under the female ascetic (Aryika) Jinadatta, strictly observed excellent vows, practiced penance for a very long time, and performed a rigorous fast known as Kanakavali. || 392-395 ||
श्लोक ( Shlok ) 396 – 397
दिविजीभूत्वा भुक्त्वा भोगान्दिवौकसाम् । आयुरन्ते ततश्च्युत्वा सुज्येष्ठायां सुताऽभवः॥ ३९६॥सुराष्ट्रवर्धनाख्यस्य नृपस्य त्वं सुलक्षणा । हरेर्दैवी प्रमोदेन वर्धसे वल्लभा सती ॥३९७॥
इन सबके प्रभावसे वह माहेन्द्र ध्वर्गमें देवी हुई, वहाँ देवोंके भोग भोगकर आयुके अन्त में वहाँ से च्युत हुई और सुराष्ट्रवर्धन राजाकी रानी सुज्येष्ठाके अच्छे लक्षणोंवाली तू पुत्री हुई है और श्रीकृष्णकी पट्टरानी होकर आनन्दसे बढ़ रही है ।। ३९६-३९७ ॥
By the influence of all these [virtuous actions and fasts], she was reborn as a goddess in the Mahendra heaven. After enjoying the celestial pleasures there, at the end of her lifespan, she departed from that realm and was born as you—the daughter endowed with auspicious qualities—to Queen Sujyeshtha and King Surashtravardhana. Now, having become the chief queen (Pattrani) of Shri Krishna, you are thriving in supreme bliss. || 396-397 ||
श्लोक ( Shlok ) 398
स्वभवान्तरसम्बन्धमाकण्र्यैषाप संमदम् । को न गच्छति सन्तोषमुत्तरोत्तरवृद्धितः ॥३९८॥
इस प्रकार अपने भवान्तरोंका सम्बन्ध सुनकर सुसीमा रानी हर्षको प्राप्त हुई सो ठीक ही है क्योंकि अपनी उत्तरोत्तर वृद्धिको सुन कर कौन संतोषको प्राप्त नहीं होता ? ॥ ३९८ ॥
Hearing this account of her past lives, Queen Susima was filled with joy. And this is only natural—for who would not feel immense satisfaction upon hearing about their own progressive spiritual advancement? || 398 ||
श्लोक ( Shlok ) 399 – 403
लक्ष्मणापि मुनिं नत्वा शुश्रूषुः स्वभवानभूत् । अभाषतैवमेतस्याश्चिकीर्षुः सोऽप्यनुग्रहम् ॥३९९॥इह पूर्वविदेहेऽस्ति विषयः पुष्कलावती । तत्रारिष्टपुराधीशो नासवस्य महीपतेः ॥४००॥वसुमत्यामभूत्सूनुः सुषेणाख्यो गुणाकरः । केनचिज्जातनिर्वेगो वासवो निकटेऽग्रहीत् ॥४०१॥दीक्षां सागरसेनस्य तत्प्रिया सुतमोहिता । गेहवासं परित्यक्तुमसमर्था कुचेष्टया ॥४०२॥मृत्वा पुलिन्दी सञ्जाता सान्येद्युर्नन्दिवर्धनम् । मुनिं चारणमाश्रित्य गृहीतोपासकव्रता ॥४०३॥
अथानन्तर – महारानी लक्ष्मणा भी मुनिराजको नमस्कार कर अपने भव सुननेकी इच्छाकरने लगी और इसका अनुग्रह करनेकी इच्छा रखनेवाले मुनिराज भी इस प्रकार कहने लगे। इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें एक पुष्कलावती नामका देश है। उसके अरिष्ट्रपुर नगरमें राजा वासव राज्य करता था। उसकी वसुमती नामकी रानी थी और उन दोनोंके समस्त गुणोंकी खान स्वरूप सुषेण नामका पुत्र था। किसी कारणसे राजा वासवने विरक्त होकर सागरसेन मुनिराजके समीप दीक्षा ले ली परन्तु रानी वसुमती पुत्रके प्रेमसे मोहित होनेके कारण गृहवास छोड़नेके लिए समर्थ नहीं हो सकी इसलिए कुचेष्टासे मरकर भीलनी हुई। एक दिन उसने नन्दिवर्धन नामक चारण मुनिके पास जाकर श्रावकके व्रत ग्रहण किये ॥३९९ -४०३॥
Thereafter, Queen Lakshmana also bowed to the revered monk (Muniraj) and expressed her desire to hear about her own past lives. Desiring to bestow his grace upon her, the revered monk began to speak as follows:
In the Eastern Videha region of this very Jambudvipa, there is a land named Pushkalavati. In its city of Arishtapura, King Vasava used to rule. He had a queen named Vasumati, and the two had a son named Sushena, who was a treasure trove of all virtuous qualities.
For some reason, King Vasava became detached from worldly life and took initiation (Diksha) under the revered monk Sagarasen. However, Queen Vasumati, being deeply infatuated with love for her son, was unable to leave her household life. Consequently, dying in a state of delusion and unwholesome thoughts, she was reborn as a Bhil woman (a forest-dwelling tribal woman).
One day, she approached a roaming monk (Charan Muni) named Nandivardhana and accepted the vows of a lay follower (Shravaka). || 399-403 ||
श्लोक 404 से 413
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391
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