नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 414 to 421
श्लोक ( Shlok ) 414
तेनापि पट्टबन्धेन त्वमेवमसि मानिता । इति श्रुत्वात्मजन्मान्तरावलि साऽगमन्मुदम् ॥४१४॥
कृष्णने भी महादेवीका पट्ट बाँधकर तुझे इस प्रकार सन्मानित किया है। इस तरह अपने भवान्तर सुनकर लक्ष्मणा बहुत ही प्रसन्न हुई ।। ४१४ ।।
Krishna, too, honored you greatly by crowning you as his chief queen (Mahadevi). Hearing this account of her past lives, Lakshmana was filled with immense joy. || 414 ||
श्लोक ( Shlok ) 415
गान्धारीगौरीपद्मावतीनां जन्मान्तरावलिम् । गणीन्द्रो वासुदेवेन पृष्टोऽसावित्यभाषत ॥४१५॥
तदनन्तर- श्रीकृष्णने गान्धारी, गौरी और पद्मावतीके भवान्तर पूछे । तब गणधरदेव इसप्रकार कहने लगे ।।४१५।।
Thereafter, Shri Krishna asked about the past lives of Gandhari, Gauri, and Padmavati. The chief disciple (Ganadharadeva) then began to speak as follows. || 415 ||
श्लोक ( Shlok ) 416 – 421
इह जम्बूमति द्वीपे विषयोऽस्ति सुकौशलः । तत्रायोध्यापुराधीशो रुद्रनाम्नो मनोरमा ॥४१६॥विनयश्रीरिति ख्याता सिद्धार्थाख्यवनेऽन्यदा । बुद्धार्थमुनये दत्तदाना स्वायुः परिक्षये ॥४१७॥उदक्कुरुषु निर्विष्टभोगा तस्मात्परिच्युता । इन्दोश्चन्द्रवती देवी भूत्वाऽतोऽप्यायुषोवधौ ॥४१८॥द्वीपेऽत्र खगभूभतुरपाक्छ्रेण्यां खगेशिनः । विद्युद्वेगस्य सद्दीप्तेः पुरे गगनवल्लभे ॥४१९॥ सुरूपाख्यसुता विद्युद्वेगायामजनिष्ट सा । नित्यालोकपुराधीशे विद्याविक्रमशालिने ॥४२०॥ महेन्द्रविक्रमायैषा दत्तान्येद्यर्मरुद्भिरिम् । तौ गतौ चैत्यगेहेषु जिनपूजार्थमुत्सुकौ ॥४२१॥
इसी जम्बूद्वीपमें एक सुकोशल नामका देश है। उसकी अयोध्या नगरीमें रुद्र नामका राजा राज्य करता था और उसकी विनयश्री नामकी मनोहर रानी थी। किसी एक दिन उस रानीने सिद्धार्थ नामक वनमें बुद्धार्थ नामक मुनिराजके लिए आहार दान दिया जिससे अपनी आयु पूरी होनेपर उत्तरकुरु नामक उत्तम भोगभूमिमें उत्पन्न हुई। वहाँ के भोग भोगकर च्युत हुई तो चन्द्रमाकी चन्द्रवती नामकी देवी हुई। आयु समाप्त होनेपर वहांसे च्युत होकर इसी जम्बूद्वीपके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीपर गगनवल्लभ नगर में विद्याधरोंके कान्तिमान् राजा विद्यद्वेगकी रानी विद्युद्वेगाके सुरूपा नामकी पुत्री हुई। वह विद्या और पराक्रमसे सुशोभित, नित्यालोक पुरके स्वामी राजा महेन्द्रविक्रमके लिए दी गई। किसी एक दिन वे दोनों दम्पति चैत्यालयोंमें जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए उत्सुक होकर सुमेरु पर्वतपर गये ।। ४१६-४२१ ।।
In this very Jambudvipa, there is a country named Sukoshaala. In its city of Ayodhya, a king named Rudra used to rule, and his charming queen was named Vinayashri. One day, in a forest named Siddhartha, the queen offered food (Ahaar-daan) to a revered monk (Muniraj) named Buddhartha. As a result of this merit, upon completing her lifespan, she was reborn in the supreme land of enjoyment (Bhogabhumi) named Uttarakuru.
After experiencing the pleasures there, she departed from that realm and became a goddess named Chandravati, associated with the Moon. At the end of her lifespan, she departed from there and was born on the southern ridge of Mount Vijayardha in this same Jambudvipa, in the city of Gaganavallabha. She was born as Surupa, the beautiful daughter of Queen Vidyudvega and the radiant King Vidyudvega of the Vidyadharas.
Adorned with knowledge and prowess, she was given in marriage to King Mahendra-vikrama, the ruler of Nityaloka city. One day, the couple, eager to worship Lord Jinendra in the celestial temples (Chaityalayas), went to Mount Sumeru. || 416-421 ||
श्लोक 422 से 431
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
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