शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 405 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 451
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 452 to 462
श्लोक ( Shlok ) 452
कुलरूपवयः शीलकलाकान्त्यादिभूषणाः । कन्यकास्तत्पिता तेनायोजयतिदायिनीः ॥ ४५२ ॥
उनके पिताने कुल, रूप, अवस्था, शील, कला, कान्ति आदिसे विभूषित सुख देनेवाली अनेक कन्याओंका उनके साथ समागम कराया था- अनेक कन्याओंके साथ उनका विवाह कराया था ।। ४५२ ॥
“His father united Him in marriage with numerous pleasing maidens, who were beautifully adorned with noble lineage, exquisite beauty, youth, virtuous conduct, mastery of arts, and radiant charm.”452
श्लोक ( Shlok ) 453
कामिनीनीलनीरेजदलोज्ज्वलविलोचनैः । प्रेमामृताम्बुसंसिक्तैर्मुहुराह्लादिताशयः ॥ ४५३ ॥
प्रेमामृतरूपी जलसे सींचे हुए स्त्रियोंके नीलकमलदलके समान नेत्रोंसे वे अपना हृदय बार-बार प्रसन्न करते थे ।। ४५३ ।।
“He repeatedly delighted His heart through the gazes of women, whose eyes—resembling the petals of blue lotuses—were continuously nourished by the nectar-like water of love.”453
श्लोक ( Shlok ) 454
वल्लभावलितालोललीलालसविलोकनैः । स्वमनोधनलुण्टाकैरखण्डं स शमेयिवान् ॥ ४५४ ॥
अपने मनरूपी धनको लूटनेवाली स्त्रियोंकी तिरछी चञ्चल लीलापूर्वक और आलसभरी चितवनोंसे वे पूर्ण सुखको प्राप्त होते थे ॥ ४५४ ॥
“He attained absolute bliss through the playful, fleeting, sidelong, and languid glances of the women, who completely captivated and stole away the wealth of His mind.”454
श्लोक ( Shlok ) 455 – 457
पञ्चवर्गसहस्राब्दकाले गतवतीशितुः । कौमारेण सुखैरेव दिव्यमानुषगोचरैः ॥ ४५५ ॥ततोऽनु तत्प्रमाणेन विश्वसेनसमर्पिते । राज्येऽप्यच्छिन्नभोगस्य काले विगलिते तदा ॥ ४५६ ॥साम्राज्यसन्धनान्यस्य चक्रादीनि चतुर्दश । रत्नानि निधयोऽभूवन्नव चाविष्कृतौजसः ॥ ४५७ ॥
इस तरह देव और मनुष्योंके सुख भोगते हुए भगवान्के जब कुमारकालके पञ्च्चीस हजार वर्ष बीत गये तब महाराज विश्वसेनने उन्हें अपना राज्य समर्पण कर दिया । क्रम-क्रमसे अखण्ड भोग भोगते हुए जब उनके पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गये तब तेजको प्रकट करनेवाले भगवान्के साम्राज्यके साधन चक्र आदि चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुई ॥ ४५५-४५७ ।।
“In this manner, while the Lord was enjoying the pleasures of both gods and men, twenty-five thousand years of His youth (kumar-kala) passed by. It was then that King Vishvasena surrendered the kingdom to Him.
Subsequently, as another twenty-five thousand years elapsed while He continuously enjoyed uninterrupted royal pleasures, the fourteen jewels—including the Chakra (divine discus)—and the nine treasures (Nidhis), which serve as the instruments of supreme imperial power, manifested before the radiant Lord.”455 – 457
श्लोक ( Shlok ) 458 – 459
तेषु चक्रातपत्रासिदण्डाः शस्त्रगृहेऽभवन् । काकिणी चर्मचूलादिमणिश्च श्रीनिकेतने ॥ ४५८ ॥ पुरोधाः स्थपतिः सेनापतिगृहपतिश्च ते । हास्तिनाख्यपुरे कन्यागजाश्वाः खगभूधरे ॥ ४५९ ॥
उन चौदह रत्नोंमेंसे चक्र, छत्र, तलवार और दण्ड, ये आयुधशालामें उत्पन्न हुए थे, काकिणी, चर्म और चूड़ामणि श्रीगृहमें प्रकट हुए थे, पुरोहित, स्थपति, सेनापति और गृहपति हस्तिनापुरमें मिले थे और कन्या गज तथा अश्व विजयार्ध पर्वत पर प्राप्त हुए थे ॥ ४५८-४५९ ।।
“Among those fourteen gems, the Chakra (divine discus), Chhatra (imperial umbrella), Talwar (sword), and Danda (scepter) manifested in the armory.
The Kakini (divine rod/luminescent gem), Charma (magic hide), and Chudamani (crest-jewel) appeared in the royal treasury (Shri-griha).
The Purohita (priest), Sthapati (architect/master builder), Senapati (commander-in-chief), and Grihapati (steward/treasurer) were acquired in Hastinapur.
And the Kanya (empress/maiden), Gaja (imperial elephant), and Ashva (imperial horse) were obtained at Mount Vijayardha.”458 – 459
श्लोक ( Shlok ) 460
नवापि निधयः पूज्या नदीसागरसङ्गमे । तदानीमेव देवेशैरानीताः पुण्यचोदितैः ॥ ४६० ॥
पूजनीय नौ निधियाँ भी पुण्यसे प्रेरित हुए इन्द्रोंके द्वारा नदी और सागरके समागम पर लाकर दी गई थीं ।। ४६० ॥
“The nine worshipful treasures (Nidhis) were also brought and presented at the confluence of the river and the ocean by the Indras, who were prompted and urged by the power of His supreme merit (Punya).”460
श्लोक ( Shlok ) 461 – 462
इत्याधिपत्यमासाद्य दशभोगाङ्गसङ्गतः । तावत्येव गते काले स्वालङ्कारालयान्तरे ॥ ४६१ ॥अलङ्कुर्वन्निजच्छायाद्वयमालोक्य दर्पणे । साश्चर्य चिन्तयन्नेतत्किमित्यन्तर्गतं कृती ॥ ४६२ ॥
इस प्रकार चक्रवर्तीका साम्राज्य पाकर दश प्रकारके भोगोंका उपभोग करते हुए जब उनके पच्चीस हजार वर्ष और व्यतीत हो गये तब एक दिन वे अपने अलंकार-गृहके भीतर अलंकार धारण कर रहे थे उसी समय उन्हें दर्पणमें अपने दो प्रतिबिम्ब दिखे । वे बुद्धिमान् भगवान् आश्चर्यके साथ अपने मनमें विचार करने लगे कि यह क्या है ? ॥ ४६१-४६२ ॥
“Having thus attained the sovereignty of a Chakravarti (universal monarch) and enjoying the ten types of imperial pleasures, another twenty-five thousand years passed by.
Then, one day, while He was putting on His ornaments inside the dressing chamber, He suddenly saw two reflections of Himself in the mirror. The wise Lord, filled with wonder, began to ponder in His mind, ‘What is the meaning of this?'”461 – 462
श्लोक 463 से 475
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