नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 69- shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22 – 24
तस्य राज्ये रवावेव तापः कोपोऽपि कामिषु । विग्रहाख्या तनुष्वेव मुनिष्वेव विरागता ॥ २२ ॥परार्थग्रहणं नाम कुकविष्वेव बन्धनम् । काव्येष्वेव विवादश्च विद्वत्स्वेव जयार्थिषु ॥ २३ ॥ शरव्याप्तिः सरित्स्वेव ज्योतिःष्वेवानवस्थितिः । क्रौर्य क्रूरग्रहेष्वेव देवेष्वेव पिशाचता ॥ २४ ॥
उस राजाके राज्यमें यदि ताप-उष्णत्व था तो सूर्यमें ही था अन्यत्र ताप-दुःख नहीं था, क्रोध था तो सिर्फ कामी मनुष्योंमें ही था वहाँ के अन्य मनुष्योंमें नहीं था, विग्रह नाम था तो शरीरोंमें ही था अन्यत्र नहीं, विरागता-वीतरागता यदि थी तो मुनियोंमें ही थी वहाँ के अन्य मनुष्योंमें विरागता-स्नेहका अभाव नहीं था। परार्थ ग्रहण- अन्य कवियोंके द्वारा प्रतिपादित अर्थका ग्रहण करना कुकवियोंमें ही था अन्य मनुष्यों में परार्थग्रहण-दूसरेके धनका ग्रहण करना नहीं था। बन्धन – हरबन्ध, छत्रबन्ध आदिकी रचना काव्योंमें ही थी वहाँ के अन्य मनुष्योंमें बन्धन-पाश आदिसे बाँधा जाना नहीं था। विवाद – शास्त्रार्थ यदि था तो विजयकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंमें ही था वहाँ के अन्य मनुष्योंमें विवाद – कलह नहीं था । शरव्याप्ति-एक प्रकारके तृणका विस्तार नदियोंमें ही था वहाँ के मनुष्यों में शरव्याप्ति-वाणों का विस्तार नहीं था। अनवस्थिति – अस्थिरता यदि थी तो ज्यौतिष्क देवोंमें ही थी-वे ही निरन्तर गमन करते रहते थे वहाँ के मनुष्यों में अनवस्थिति- अस्थिरता नहीं थी। क्रूरता यदि थी तो दुष्ट ग्रहोंमें ही थी वहाँ के मनुष्योंमें करता – दुष्टता – निर्देयता नहीं थी और पिशाचता-पिशाच जाति यदि थी तो देवोंमें ही थी वहाँ के मनुष्यों में पिशाचता – नीचता नहीं थी ॥ २२-२४ ॥
In that king’s reign, if heat (tapa) existed, it was only in the sun; elsewhere, there was no suffering (tapa). If anger (krodha) existed, it was only within lustful individuals; it did not exist among the other subjects. If division (vigraha) had a name, it was only in the physical forms of bodies; elsewhere, there was no discord (vigraha). If detachment (viragata) existed, it was only among the ascetics; among the other subjects, there was no lack of affection (viragata).
The taking of another’s meaning (parartha-grahana)—that is, adopting the poetic themes of other writers—was found only among bad poets; among the other citizens, there was no taking of another’s wealth (parartha-grahana). Entanglement (bandhana)—such as the Hara-bandha or Chhatra-bandha structural patterns—existed only within poetry; among the other subjects, there was no binding or imprisonment (bandhana) by ropes or chains.
Debate (vivada)—in the form of scriptural discussions—existed only among scholars desirous of victory; among the other subjects, there was no dispute or quarreling (vivada). The spread of shara (a type of reed/grass) was confined only to the rivers; among the people, there was no penetration or strike of arrows (shara-vyapti).
Instability (anavasthiti) existed only among the celestial astral bodies, for they alone were in constant motion; among the citizens, there was no instability or fickleness of character (anavasthiti). If cruelty (krurata) existed, it was only in malevolent planets; among the human subjects, there was no wickedness or mercilessness (krurata). And if a ghostly nature (pishachata) existed, it was only among the Pishacha class of demigods; among the people of that kingdom, there was no baseness or vile behavior (pishachata). || 22-24 ||
श्लोक ( Shlok ) 25 – 26
वप्पिला तन्महादेवी वसुधारादिपूजिता । श्रीह्रीधृत्यादिभिः सेव्या सुखसुप्तानिशावधौ ॥ २५ ॥’शरदादिद्वितीयायां नक्षत्रेष्वादिमे सति । स्वर्गावतरणे भर्तुर्हष्वा स्वप्नान् पुरोदितान् ॥ २६ ॥
विजय-महाराजकी महादेवीका नाम वप्पिला था, देवोंने रत्नवृष्टि आदिसे उसकी पूजा की थी, श्री, ही, धृति आदि देवियाँ उसकी सेवा करती थीं। शरद् ऋतुकी प्रथम द्वितीया अर्थात् आश्विन कृष्ण द्वितीयाके दिन अश्विनी नक्षत्र और रात्रिके पिछले पहर जब कि भगवान्का स्वर्गावतरण हो रहा था तब सुखसे सोई हुई महारानीने पहले कहे हुए सोलह स्वप्न देखे ।। २५-२६ ॥
The name of King Vijaya’s chief queen (Mahadevi) was Vappila. The deities had worshipped her with a shower of gems (ratna-vrishti) and other offerings, and goddesses like Shri, Hri, and Dhriti attended to her and served her.
On the first second-day of the autumn season—that is, on the Ashvina Krishna Dvitiya (the second day of the dark fortnight of the Ashvina month)—under the Ashwini constellation and during the final watch of the night, at the very moment the Lord was descending from heaven, the Queen, who was sleeping peacefully, saw the sixteen dreams described earlier. || 25-26 ||
श्लोक ( Shlok ) 27
स्ववक्राब्जप्रविष्टेभमप्यालोक्य विनिद्रिका । प्रभातपटहध्वान श्रवणाविष्कृतोत्सवा ॥ २७ ॥
उसी समय उसने अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। देखते ही उसकी निद्रा दूर हो गई और प्रातः-कालके बाजोंका शब्द सुननेसे उसके हर्षका ठिकाना नहीं रहा ॥ २७ ॥
At that very moment, she saw an elephant entering her mouth. The moment she witnessed this, her sleep vanished, and upon hearing the sound of the early morning musical instruments, her joy knew no bounds. || 27 ||
श्लोक ( Shlok ) 28
अपृच्छत् फलमेतेषां नृपं देशावधीक्षणम् । सोऽप्यवादीद्भवद्गर्भे भावितीर्थकृदित्यदः ॥ २८ ॥
उसने देशावधि ज्ञानरूपी नेत्रको धररण करनेवाले राजासे इन स्वप्नोंका फल पूछा और राजाने भी कहा कि तुम्हारे गर्भमें भावी तीर्थंकरने अवतार लिया है ॥ २८ ॥
She asked the King—who possessed the eye of Deshavadhi Jnana (a type of clairvoyant knowledge)—about the fruit of these dreams, and the King replied, “The future Tirthankara has taken descent within your womb.” || 28 ||
श्लोक ( Shlok ) 29
तदैवागत्य देवेन्द्राः स्वर्गावतरणोत्सवम् । विधाय स्वनियोगेन निजधामागमत्समम् ॥ २९ ॥
उसी समय इन्द्रोंने आकर अपने नियोगके अनुसार भगवान्का स्वर्गावतरण महोत्सव-गर्भकल्याणकका उत्सव किया और तदनन्तर सब साथ ही साथ अपने अपने स्थानपर चले गये ।। २९ ।।
At that very moment, the Indras (celestial rulers) arrived and, in accordance with their divine duties, celebrated the Lord’s Svargavatarana Mahotsava—the grand festival of His descent from heaven, known as the Garbha Kalyanaka. Afterward, they all departed together, each returning to their respective abodes. || 29 ||
श्लोक ( Shlok ) 30
आषाढे स्वातियोगे तं कृष्णपक्षे महौजसम् । दशम्यां विश्वलोकेशमसूत तनुजोत्तमम् ॥ ३० ॥
वप्पिला महादेवीने आषाढ़ कृष्ण दशमीके दिन स्वाति नक्षत्रके योगमें समस्त लोकके स्वामी महाप्रतापी जेष्ठपुत्रको उत्पन्न किया ॥ ३० ॥
On the tenth day of the dark fortnight of the month of Ashadha, under the auspicious conjunction of the Swati constellation, Queen Vappila gave birth to her highly glorious eldest son, the Lord of the entire universe. || 30 ||
श्लोक ( Shlok ) 31
देवा द्वितीयकल्याणमप्यभ्येत्य तदा व्यधुः । नमिनामानमप्येनं व्याहरन् मोहभेदिनम् ॥ ३१ ॥
देवोंने उसी समय आकर जन्मकल्याणकका उत्सव किया और मोह शत्रुको भेदन करनेवाले जिन-बालकका नमिनाथ नाम रक्खा ।। ३१ ।।
At that very moment, the deities arrived and celebrated the grand festival of His birth (Janma Kalyanaka). They named the divine child, who was destined to destroy the enemy that is delusion (moha), Naminatha. || 31 ||
श्लोक 32 से 41
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