नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 44 to 52
श्लोक ( Shlok ) 44
तत्समीपे समादाय संयमं त्वां विलोकितुम् । त्वयि जन्मान्तरस्नेहादिहागमनमावयोः ॥ ४४ ॥
यह सुनकर हम दोनोंने उन्हीं स्वयं-प्रभ भगवान्के समीप संयम धारण कर लिया और तुम्हें देखनेके लिए तुम्हारे जन्मान्तरके स्नेह से हम दोनों यहाँ आये हैं ।॥ ४४ ॥
“Upon hearing this, both of us embraced self-restraint (sanyam) right there in the presence of Lord Swayamprabha, and drawn by the affection of our past lives, both of us have come here today to see you.” [44]
श्लोक ( Shlok ) 45
पुण्योदयोदितान् भोगान् सर्वान् भूयोऽत्र भुक्तवान् । मासप्रमाणजीवी त्वं हितमद्य स्मराश्विति ॥४५॥
हे भाई ! अब तव तू पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त हुए समस्त भोगोंका उपभोग कर चुका है। अब तेरी आयु केवल एक माहकी शेष रह गई है इसलिए शीघ्र ही आत्म-कल्याणका विचार कर ॥ ४५ ॥
“O Brother! Now you have fully enjoyed all the pleasures obtained through the rise of your meritorious deeds (punya-karma). Only one month of your lifespan remains now; therefore, reflect upon the welfare of your soul without any delay.” [45]
श्लोक ( Shlok ) 46 – 50
श्रुत्वा तद्वचनं राजा वन्दित्वा तौ मुनीश्वरौ । युवां जन्मान्तरस्नेहान्निसङ्गत्वं गतावपि ॥ ४६ ॥उपकारं महान्तं मे कृतवन्तौ हितैषिणौ । इत्याख्यत्स ततः प्रीतौ तौ निजस्थानमीयतुः ॥ ४७ ॥तदैव स महीशोऽपि दत्त्वा राज्यं यथाविधि । प्रीतिङ्करकुमाराय कृत्वाष्टाह्निकपूजनम् ॥ ४८ ॥बन्धून् विसर्ज्य प्रायोपगमसंन्यासमुत्तमम् । विधाय षोडशे कल्पे द्वाविंशत्यब्धिजीवितः ॥ ४९ ॥’सातंकरे विमानेऽभूदच्युतेन्द्रो महर्दिकः । दिव्यभोगांश्चिरं भुक्त्वा ततः प्रच्युत्य पुण्यभाक् ॥ ५० ॥
राजा अपराजितने यह बात सुनकर दोनों मुनिराजोंकी बन्दना की और कहा कि आप यद्यपि निर्ग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हुए हैं तो भी जन्मान्तरके स्नेहसे आपने मेरा बड़ा उपकार किया है। यथार्थमें आप ही मेरे हितिच्छु हैं। तदनन्तर उधर उक्त दोनों मुनिराज प्रसन्न होते हुए अपने स्थान पर गये इधर राजा अपराजितने अपना राज्य विधिपूर्वक प्रीतिङ्कर कुमारके लिए दिया, आष्टाहिक पूजा की, भाइयोंको विदा किया और स्वयं प्रायोपगमन नामका उत्कृष्ट संन्यास धारण कर लिया। संन्यासके प्रभावसे वह सोलहवें स्वर्गके सातङ्कर नामक विमान में बाईस सागरकी आयुवाला बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंका धारक अच्युतेन्द्र हुआ। वह पुण्यात्मा वहाँ के दिव्य भोगोंका चिरकाल तक उपभोग कर वहाँ से च्युत हुआ ।। ४६-५० ॥
Upon hearing this, King Aparajit bowed to both the Munirajs and said, “Even though you have attained the possessionless Nirgrantha state, you have done me a great favor out of the affection of our past lives. In truth, you alone are my well-wishers.”
Thereafter, while the two Munirajs happily returned to their abode, King Aparajit formally handed over his kingdom to Prince Pritinkar, performed the Ashtahnika worship, bid farewell to his brothers, and himself embraced the supreme vow of Prayopagamana Sannyasa (fasting unto death without seeking any assistance).
By the virtue of this Sannyasa, he was reborn in the Satankar celestial vehicle of the sixteenth heaven as Achyutendra, possessing immense miraculous powers (riddhis) and a lifespan of twenty-two Sagara. That meritorious soul, after enjoying the divine pleasures of that realm for a very long time, eventually departed from there. [46-50]
श्लोक ( Shlok ) 51 – 52
द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे विषये कुरुजाङ्गले । हस्तिनाख्यपुर। धीशः श्रीचन्द्रस्य महीपते ॥ ५१ ॥श्रीमत्यां सुप्रतिष्ठाख्यः सुप्रतिष्ठः सुतोऽभवत् । आपूर्णयौवनस्यास्य सुनन्दासीत् सुखप्रदा ॥ ५२ ॥
भरतक्षेत्र सम्बन्धी कुरुजाङ्गल देशमें हस्तिनापुरके राजा श्रीचन्द्रकी श्रीमती नामकी रानीसे सुप्रतिष्ट नामका यशस्वी पुत्र हुआ। जब यह पूर्ण युवा हुआ तब सुनन्दा नामकी इसकी सुख देनेवाली स्त्री हुई ।। ५१-५२ ।।
“In the Kurujangal country belonging to the Bharatkshetra region, a glorious son named Supratishtha was born to Queen Shrimati, the consort of King Shrichandra of Hastinapur. When he attained full youth, a woman named Sunanda became his joy-giving wife.” [51-52]
श्लोक 53 से 61
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |