राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 645 to 661
श्लोक ( Shlok ) 652
कटकं साङ्गदं चूलामणि मौलिविभूषणम् । ब्रैवेयकं ततश्चक्री कटीसूत्रं च लब्धवान् ॥ ६५२ ॥
उस देवसे लक्ष्मणने कटक, केयूर, मस्तकको सुशोभित करनेवाला चूडामणि, हार और कटिसूत्र प्राप्त किया ।। ६५२ ।।
“From that deity, Lakshmana received a bracelet, an armlet, a crest-jewel (chudamani) to adorn his head, a necklace, and a waist-band (girdle).”652
श्लोक ( Shlok ) 653
ततः प्रतीचीमागत्य सबलः सिन्धुगोपुरे । प्रविश्याब्धि प्रभासं च विनतीकृत्य पूर्ववत् ॥ ६५३ ॥
तदनन्तर रामचन्द्रजीके साथ ही साथ लक्ष्मण पश्चिम दिशाकी ओर गया और वहाँ सिन्धु नदीके गोपुर द्वारसे समुद्रमें प्रवेश कर उसने पूर्वकी ही भांति प्रभास नामके देवको वश किया ॥ ६५३ ॥
“Thereafter, along with Ramachandra, Lakshmana went towards the western direction. Entering the ocean through the gateway (gopura) of the Indus (Sindhu) river there, he subjugated the deity named Prabhasa, just as he had done before.”653
श्लोक ( Shlok ) 654
मालां सन्तानकाख्यानां मुक्ताजालप्रलम्बकम् । श्वेतच्छत्रं ततो भूषणान्यन्यान्यपि चाददौ ॥ ६५४ ॥
प्रभास देवसे लक्ष्मणने सन्तानक नामकी माला, जिस पर मोतियोंका जाल लटक रहा है ऐसा सफेद छत्र, और अन्य-अन्य आभूषण प्राप्त किये ॥ ६५४ ॥
“From the deity Prabhasa, Lakshmana received a garland named Santānaka, a white umbrella (canopy) from which a net of pearls hung, and various other ornaments.”654
श्लोक ( Shlok ) 655
ततः सिन्धोस्तटे गच्छन् प्रतीचीखण्डवासिनः । स्वकीयां श्रावयित्वाज्ञां सारवस्तूनि चाददत् ॥ ६५५॥
तत्पश्चात् सिन्धु नदीके किनारे-किनारे जाकर पश्चिम दिशाके म्लेच्छ खण्डमें रहनेवाले लोगोंको अपनी आज्ञा सुनाई और वहाँकी श्रेष्ठ वस्तुओंको ग्रहण किया ।। ६५५ ।।
“Thereafter, traveling along the banks of the Indus (Sindhu) river, he proclaimed his command to the people living in the Mlechchha region of the western direction and accepted their finest treasures.” 655
श्लोक ( Shlok ) 656 – 657
ऐन्द्रस्याभिमुखो भूत्वा विजयार्द्धनिवासिनः । विनमय्य गजाश्वास्त्रविद्याधरकुमारिकाः ॥६५६॥रत्नानि चात्मसात्कृत्य पूर्वखण्डनिवासिनः । विधाय करदान् म्लेच्छान् विजयी निर्गतस्ततः ॥ ६५७॥
फिर दोनों भाई पूर्व दिशाकी ओर सन्मुख होकर चले और विजयार्ध पर्वत पर रहनेवाले लोगोंको वश कर उसने हाथी, घोड़े, अस्त्र, विद्याधर कन्याएँ एवं अनेक रत्न प्राप्त किये, पूर्व खण्डमें रहनेवाले म्लेच्छोंको कर देनेवाला बनाया और तदनन्तर विजयी होकर वहाँ से बाहर प्रस्थान किया ।। ६५६-६५७ ॥
“Then, both brothers turned and marched towards the eastern direction. Having subjugated the people living on Mount Vijayardha, he (Lakshmana) acquired elephants, horses, weapons, Vidyadhara maidens, and numerous gems. He made the Mlechchhas living in the eastern region his tributaries (taxpayers) and, thereafter emerging victorious, departed from there.” 656 – 657
श्लोक ( Shlok ) 658 – 661
द्विगुणाष्टसहस्त्राणि ‘पट्टबन्धान् महीभुजः । दशोत्तरशताख्यातपुराधीशान् खगेशिनः ॥ ६५८ ॥ त्रिखण्डवासिदेवांश्च विधायाज्ञाविधायिनः । द्वाचत्वारिंशदब्दान्ते परिनिष्ठितदिग्जयः ॥ ६५९ ॥ कृताञ्जलिभिरासेव्यो देवखेचरभूचरैः । अग्रजाग्रेसरश्चक्री सचक्रः सर्वपूजितः ॥ ६६० ॥ कृतमङ्गलनेपथ्यां प्रार्थ्यमानसमागमाम् । कान्तामिव विनीतां तां शक्रवत्प्राविशत्पुरीम् ॥ ६६१ ॥
इस प्रकार लक्ष्मणने सोलह हजार पट्टबन्ध राजाओंको, एक सौ दश नगरियोंके स्वामी विद्याधरोंको और तीन खण्डके निवासी देवोंको आज्ञाकारी बनाया था। उसकी यह दिग्विजय व्यालीस वर्षमें पूर्ण हुई थी। देव, विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजा हाथ जोड़कर सेवा करते थे। इस तरह बड़े भाई रामचन्द्रजीके आगे-आगे चलने वाले चक्ररत्नके स्वामी एवं सबके द्वारा पूजित लक्ष्मणने, माङ्गलिक वेषभूषासे सुशोभित तथा समागमकी प्रार्थना करनेवाली कान्ताके समान उस आयोध्या नगरीमें इन्द्रके समान प्रवेश किया ।। ६५८-६६१ ।।
“In this manner, Lakshmana brought sixteen thousand crowned kings, the Vidyadharas who ruled over one hundred and ten cities, and the deities residing across the three realms (khandas) under his command. This conquest of the quarters (digvijaya) was completed in forty-two years. Deities, Vidyadharas, and earth-dwelling (Bhumigochari) kings served him with folded hands. Thus, walking right ahead of his elder brother Ramachandra, Lakshmana—the master of the Chakraratna (divine discus) who was worshiped by all—entered the city of Ayodhya like Indra himself, which was beautifully adorned in festive attire like a longing beloved praying for union.”658 – 661
श्लोक 662 से 672
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651
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