नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 316 to 324
श्लोक ( Shlok ) 316
रुग्मिण्याथ महादेव्या प्रणम्य स्वभवान्तरम् । परिपृष्टः परार्थे हो व्याजहारेति तद्भवान् ॥ ३१६ ॥
अथानन्तर – महादेवी रुक्मिणीने नमस्कार कर अपने भवान्तर पूछे और जिनकी समस्त चेष्टाएँ परोपकारके लिए ही थीं ऐसे गणधर भगवान् कहने लगे ॥ ३१६ ॥
Thereupon, Chief Queen Rukmini bowed reverently and inquired about her own past births. And Ganadhar Bhagavan, whose every action and effort was dedicated solely to the welfare of others, began to speak:[ 316]
श्लोक ( Shlok ) 317 – 319
द्वीपेऽस्मिन्भारते क्षेत्रे मगधान्तरवत्तिनि । लक्ष्मीग्रामे द्विजः सोमोऽस्याभूल्लक्ष्मीमतिः प्रिया ॥ ३१७ ॥प्रसाधिताङ्गी सान्येद्युर्दर्पणालोकनोद्यता । समाधिगुप्तमालोक्य मुनिं भिक्षार्थमागतम् ॥ ३१८ ॥प्रस्वेदमलदिग्धाङ्गो दुर्गन्धोऽयमिति क्रुधा । विचिकित्सापरा साधिक्षेपात्युद्भारिणी तदा ॥ ३१९ ॥
कि भरत क्षेत्र सम्बन्धी मगध देशके अन्तर्गत एक लक्ष्मीग्राम नामका ग्राम है। उसमें सोम नामका एक ‘ब्राह्मण रहता था, उसकी स्त्रीका नाम लक्ष्मीमति था। किसी एक दिन लक्ष्मीमति ब्राह्मणी, आभूषणादि पहिन कर दर्पण देखनेके लिए उद्यत हुई ही थी कि इतनेमें समाधिगुप्त नामके मुनि भिक्षाके लिए आ पहुँचे । ‘इसका शरीर पसीना तथा मैलसे लिप्त है और यह दुर्गन्ध दे रहा है’ इस प्रकार क्रोध करती हुई लक्ष्मीमतिने घृणासे युक्त होकर निन्दाके वचन कहे ॥ ३१७-३१९ ॥
He began to speak:
“In the Magadha country of Bharat Kshetra, there is a village named Lakshmigram. A Brahmin named Soma lived there, and his wife’s name was Lakshmimati. One day, just as the Brahmin woman Lakshmimati had adorned herself with ornaments and jewelry and was about to look into a mirror, a monk named Samadhigupta arrived at her doorstep to seek alms (bhiksha).
‘His body is covered in sweat and dirt, and he smells foul,’ she thought. Growing furious and filled with deep disgust, Lakshmimati uttered harsh words of condemnation and ridicule toward him.”[ 317-319]
श्लोक ( Shlok ) 320
सहसोदुम्बराख्येन कुष्ठेन व्याप्तदेहिका । शुनीव तर्ज्यमाना सा जनैः परुषभाषितैः ॥ ३२०॥
मुनि-निन्दाके पापसे उसका समस्त शरीर उदुम्बर नामक कुष्ठसे व्याप्त हो गया इसलिए वह जहाँ जाती थी वहीं पर लोग उसे कठोर शब्द कह कर कुत्तीके समान ललकार कर भगा देते थे ॥ ३२० ॥
Due to the sin of criticizing and insulting the monk, her entire body became afflicted with a severe type of leprosy known as Udumbar. Consequently, wherever she went, people would hurl harsh words at her, shout at her as if she were a stray dog, and drive her away.[ 320]
श्लोक ( Shlok ) 321
शून्यगेहेऽतिदुःखेन मृत्वा स्नेहाहिताशया । गेहेऽस्यैव द्विजस्याभूद् दुर्गन्धश्चित्कराखुकः ॥ ३२१ ॥
वह सूने मकानमें पड़ी रहती थी, अन्तमें हृदय में पतिका स्नेह रख बड़े दुःखसे मरी और उसी ब्राह्मणके घर दुर्गन्ध युक्त छछूंदर हुई ।। ३२१ ।।
She used to lie abandoned in a deserted house. Ultimately, keeping the affection for her husband in her heart, she died in immense misery and was reborn as a foul-smelling muskrat (chachundar) right in that same Brahmin’s house.[ 321]
श्लोक ( Shlok ) 322
तस्योपरि मुहुर्धाचंस्तेन कोपवता बहिः । गृहीत्वा निष्ठुरं क्षिप्तो मृतान्धाऽहिरजायत ॥३२२ ॥
वह पूर्व पर्यायके स्नेहके कारण बार-बार पतिके ऊपर दौड़ती थी इसलिए उसने क्रोधित होकर उसे पकड़ा और बाहर ले जाकर बड़ी दुष्टतासे दे पटका जिससे मर कर उसी ब्राह्मणके घर साँप हुई ॥ ३२२ ॥
Driven by the affection from her previous life, she would repeatedly run toward her husband. Furious at this behavior, the husband caught her, took her outside, and viciously slammed her to the ground. Dying from the impact, she was reborn as a snake in that very same Brahmin’s house.[ 322]
श्लोक ( Shlok ) 323 – 324
तत्रैवासौ पुनर्मृत्वा गर्दभोऽभूत्स्वपापतः । मुहुर्मुहुर्मुहं गच्छंस्तदैव कुपितैर्द्विजैः ॥ ३२३ ॥हतो लकुटपाषाणैर्भग्नपादः क्रिमिव्रणैः । आकुलः पतितः कूपे दुःखितो मृतिमागतः ॥ ३२४ ॥
फिर मरकर अपने पापकर्म के उदय से वहीं गधा हुई, वह बार-बार ब्राह्मणके घर आता था इसलिए ब्राह्मणोंने कुपित होकर उसे लाठी तथा पत्थर आदिसे ऐसा मारा कि उसका पैर टूट गया, घावोंमें कीड़े पड़ गये जिनसे व्याकुल होकर वह कुएँ में पड़ गया और दुःखी होकर मर गया ।॥ ३२३-३२४ ॥
Thereafter, upon dying and by the rise of her sinful karmas, she was reborn right there as a donkey. Because the donkey would repeatedly return to the Brahmin’s house, the Brahmins grew furious and beat it so severely with sticks and stones that its leg broke. Worms infested its wounds, and driven to frenzy by the agony, it fell into a well and died a miserable death.[323-324]
श्लोक 325 से 341
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315
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