चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 455 to 472
श्लोक ( Shlok ) 455 – 460
कदाचिज्जलयात्रायामम्भोनिधिनदीमुखात् । निर्गमे विषमावर्ते गुणमित्रे मृतिङ्गते ॥ ४५५ ॥स्वयं चेत्वा प्रदेशं तं मृत्युमेषा समाश्रयत् । ततो राजपुरे गन्धोत्कट वैश्यसुधालये ॥ ४५६ ॥पतिः पवनवेगाख्यो रतिवेगेयमप्यभूत् । पारावतकुले द्वन्द्वं तद्बालाक्षरशिक्षणे ॥ ४५७ ॥ स्वयं चैत्याक्षराभ्यासं गृहिणोः श्रावकव्रतम् । तयोर्दृष्ट्वा प्रशान्तोपयोगं जन्मान्तरागतात् ॥ ४५८ ॥स्नेहादन्योन्यसंसक्तः सुखं तत्रावसच्चिरम् । सुवर्णतेजास्तद्धद्धवैरेण पुरुदंशताम् ॥ ४५९ ॥ मृत्वा सम्प्राप्य तद्द्वन्द्वं दृष्ट्वा कापि यदृच्छया । अग्रहीद्रतिवेगाख्यां राहुर्मूर्तिमिवैन्दवीम् ॥ ४६०॥
किसी एक समय गुणमित्र जलयात्राके लिए गया था अर्थात् जहाजमें बैठकर कहीं गया था परन्तु समुद्रमें नदीके मुँहानेसे जब निकल रहा था तब किसी बड़ी भँवर में पड़कर मर गया। उसकी स्त्री अनुपमाने जब यह खबर सुनी तब यह भी स्वयं उस स्थानपर जाकर डूब मरी। तदनन्तर उसी राजपुर नगरके गन्धोत्कट सेठके घर गुणमित्रका जीव पवनवेग नामका कबूतर हुआ और अनुपमा रतिवेगा नामकी कबूतरी हुई। गन्धोत्कटके घर उसके बालक अत्तराभ्यास करते थे उन्हें देखकर उन दोनों कबूतर-कबूतरीने भी अक्षर लिखना सीख लिया था। गन्धोत्कट और उसकी स्त्री, दोनों ही श्रावकके व्रत पालन करते थे इसलिए उन्हें देखकर कबूतर कबूतरीका भी उपयोग अत्यन्त शान्त हो गया था। इस प्रकार जन्मान्तरसे आये हुए स्नेहसे वे दोनों परस्पर मिलकर वहाँ बहुत समय तक सुखसे रहे आये । सुवर्णतेजको अनुपमा नहीं मिली थी इसलिए वह गुणमित्र और अनुपमासे बैर बाँधकर मरा तथा मरकर बिलाव हुआ। एक दिन वह कबूतरोंका जोड़ा कहीं इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहा था उसे देखकर उस बिलावने रतिवेगा नामकी कबूतरीको इस प्रकार पकड़ लिया जिस प्रकार कि राहु चन्द्रमाके बिम्ब को ग्रस लेता है ।॥ ४५५-४६० ॥
On one occasion, Guṇamitra set out on a sea voyage, embarking upon a ship for a distant land. However, as the vessel was passing out of the mouth of a river into the sea, it was caught in a mighty whirlpool, and Guṇamitra perished.When his wife, Anupamā, received the sorrowful news, she too went to that very place and drowned herself.Thereafter, in the house of the merchant Gandhotkaṭa, in the same city of Rājapura, Guṇamitra’s soul was reborn as a pigeon named Pavanavega, while Anupamā was reborn as a female pigeon named Rativegā.The children of Gandhotkaṭa’s household used to practise writing the alphabet. Observing them, the two pigeons also learned to form letters. Moreover, Gandhotkaṭa and his wife faithfully observed the vows of the Śrāvakas. By witnessing their virtuous conduct, the minds of the pigeon and the female pigeon likewise became exceedingly peaceful and serene.Thus, bound by the affection carried over from their former birth, the two remained together and lived happily for a long time.Since Suvarṇateja had been denied Anupamā, he died harbouring enmity toward Guṇamitra and Anupamā. After death, he was reborn as a cat.One day, while the pair of pigeons was sporting freely according to their pleasure, the cat caught the female pigeon, Rativegā, just as Rāhu is said to seize and swallow the radiant orb of the moon. ॥455–460॥
श्लोक ( Shlok ) 461
जातकोपः कपोतोऽमुं नखपक्षप्रताडनैः । तुण्डघातैश्च हत्वाशु निजभामाममुमुचत् ॥ ४६१ ॥
यह देख कबूतरको बड़ा क्रोध आया, उसने नख और पंखो की ताड़नासे तथा चोंचके आघातसे बिलावको मारकर अपनी स्त्री छुड़ा ली ॥ ४६१ ॥
Witnessing this, the male pigeon was filled with fierce anger. Striking the cat with his claws and wings and attacking it with repeated blows of his beak, he drove it away and rescued his mate. ॥461॥
श्लोक ( Shlok ) 462 – 463
कदाचित्तत्पुर प्रत्यासन्नभूभ्रबिलान्तरे । पाशे विरचिते पापैः कपोते पतिते सति ॥ ४६२ ॥स्वयं गृहं समागत्य रतिवेगात्मनो मृतिम् । पत्युस्तुण्डेन संलिख्य तान्सर्वानवबोधयत् ॥ ४६३ ॥
किसी एक समय उसी नगरके समीपवर्ती पहाड़की गुफाके समीप पापी लोगोंने एक जाल बनाया था, पवनवेग कबूतर उसमें फँसकर मर गया तब रतिवेगा कबूतरीने स्वयं घर आकर और चोंचसे लिखकर सब लोगोंको अपने पतिके मरनेकी खबर समझा दी ॥ ४६२-४६३ ॥
On one occasion, wicked men had set a net near a cave in a mountain close to that city. Pavanavega, the pigeon, became entangled in the net and died. Thereupon, Rativegā, the female pigeon, returned home and, by writing with her beak, conveyed to everyone the news of her husband’s death. ॥462–463॥
श्लोक ( Shlok ) 464
तद्वियोगमहादुःखपीडिता विगतासुका । श्रीचन्द्राख्याजनिष्टयमभीष्टा भवतोः सुता ॥ ४६४ ॥
तदनन्तर उसके वियोगरूपी भारी दुःखसे पीड़ित होकर वह कबूतरी भी मर गई और यह आप दोनोंकीप्यारी श्रीचन्द्रा नामकी पुत्री हुई ॥ ४६४ ॥
Thereafter, overwhelmed by the profound sorrow of separation from her beloved, the female pigeon too passed away and was reborn as your dearly cherished daughter, Śrīcandrā. ॥464॥
श्लोक ( Shlok ) 465
अद्य पारावतद्वन्द्वं वीक्ष्य अमान्तरस्मृतेः । १ व्यमुद्यन् नियमेनैतद्वयक्त’ सर्वे ममाब्रवीत् ॥ ४६५ ॥
आज कबूतरोंका युगल देखकर पूर्वभवका स्मरण हो आनेसे ही यह मूच्छित हुई थी, यह सब बात इसने मुझे साफ-साफ बतलाई है ।।४६५।।
“Today, upon seeing the pair of pigeons, the memory of her former birth suddenly arose within her, and it was this recollection that caused her to faint. She herself has explained the entire matter to me clearly and in full.” ॥465॥
श्लोक ( Shlok ) 466
“इत्यतोऽलकसुन्दर्या वचः श्रुत्वाकुलाकुलौ । सुता पतिसमन्वेषणेच्छया पितरौ तदा ॥ ४६६ ॥
इस प्रकार अलकसुन्दरीके वचन सुनकर माता-पिता अपनी पुत्रीके पतिकी तलाश करनेकी इच्छासे बहुत ही व्याकुल हुए ।। ४६६ ।।
Upon hearing Alakasundarī’s account, Śrīcandrā’s parents became deeply anxious and eager to seek out the husband destined for their daughter. ॥466॥
श्लोक ( Shlok ) 467 – 468
तद्भवान्तरवृत्तान्तं पट्टके लिखितं स्फुटम् । रङ्गतेजोभिधानस्य नटवर्गे पटीयसः ॥ ४६७ ॥मदनादिलतायाश्च दानसम्मानपूर्वकम् । तत्कर्तव्यं समाख्याय यत्नेनाकुरुतां करे ॥ ४६८ ॥
अपनी पुत्रीके पूर्वभवका वृत्तान्त एक पटियेपर साफ-साफ लिखवाया और नटोंमें अत्यन्त चतुर रङ्गतेज नामका नट तथा उसकी स्त्री मदनलताको बुलाया, दान देकर उनका योग्य सन्मान किया, करने योग्य कार्य समझाया और ‘यत्नसे यह कार्य करना’ ऐसा कहकर वह चित्रपट उनके हाथमें दे दिया ॥ ४६७-४६८ ॥
They caused the account of their daughter’s former birth to be written clearly upon a tablet. Then they summoned a highly accomplished actor named Raṅgateja, who was foremost among performers, together with his wife, Madanalatā. After honouring them suitably and presenting them with generous gifts, they explained the task that was to be undertaken and said:“Carry out this work with the utmost care and diligence.”Having thus instructed them, they entrusted the written tablet to their hands. ॥467–468॥
श्लोक ( Shlok ) 469
पुष्पकाख्ये वने तौ च कृतपट्टप्रसारणौ । स्वयं नटितुमारब्धौ नानाजनसमाकुलम् ॥ ४६९ ॥
वे नट और नटी भी चित्रपट लेकर पुष्पक वनमें गये और उसे वहीं फैलाकर सब लोगोंके सामने नृत्य करने लगे ।। ४६९ ॥
The actor and his wife took the illustrated scroll and proceeded to the Puṣpaka forest. There, they spread it out and began to perform before the assembled people. ॥469॥
श्लोक ( Shlok ) 470 – 472
पितास्यास्तद्वने रन्तुं गतस्तत्र मुनीश्वरम् । समाधिगुप्तमालोक्य परीत्य कृतवन्दनः ॥ ४७० ॥धर्मसद्भावमाकर्ण्य पप्रच्छ तदनन्तरम् । पूज्य मत्पुत्रिकापूर्वभवभर्ता व वर्तते ॥ ४७१ ॥कथ्यतामिति दिव्यावधीक्षणः सोऽप्यथावदत् । स हेमाभपुरे वैश्यतनयोऽद्याप्तयौवनः ॥ ४७२ ॥
इधर श्रीचन्द्राका पिता भी उसी वनमें क्रीड़ा करनेके लिए गया था वहाँ उसने समाधिगुप्त मुनिराजको देखकर प्रदक्षिणाएँ दीं, नमस्कार किया, धर्मका स्वरूप सुना और तदनन्तर पूछा कि हे पूज्य ! मेरी पुत्रीका पूर्वभवका पति कहाँ है ? सो कहिये । मुनिराज अवधिज्ञानरूपी दिव्य नेत्रके धारक थे इसलिए कहने लगे कि वह आज हेमाभनगर में है तथा पूर्ण यौवनको प्राप्त है ।। ४७०-४७२ ॥
Meanwhile, Śrīcandrā’s father had also gone to that very forest for recreation. There he beheld the venerable monk Samādhigupta. He reverently circumambulated him, offered his salutations, and listened to his exposition of the true nature of religion. Thereafter, he asked:“O venerable one, kindly tell me: where is the husband of my daughter from her former birth?”The monk possessed the divine vision of avadhi-jñāna (clairvoyant knowledge). Therefore, he replied:“He is presently in the city of Hemābha and has now attained the full bloom of youth.” ॥470–472॥
श्लोक 473 से 492
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