धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
कृष्णाचार्य समासाद्य श्रुत्वा धर्म यथोदितम् । प्रवब्राजातिनिविण्णस्तद्धि योग्यं मनस्विनाम् ॥ ६२ ॥
निर्वेद भरा हुआ राजा सुमित्र कृष्णाचार्य के पास पहुँचा और उनके द्वारा कहे हुए धर्मोपदेशको सुनकर दीक्षित हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मनस्वी मनुष्योंको यही योग्य है ॥ ६२ ॥
“Filled with profound detachment (Nirveda), King Sumitra approached Sage Krishnacharya. Upon listening to the religious discourse delivered by him, the king accepted initiation into the ascetic life—which is indeed appropriate, for this alone is fitting for noble, self-respecting minds.” || 62 ||
श्लोक ( Shlok ) 63 – 64
क्रमेणोघ्रं तपः कुर्वन् सिंहनिः क्रीडितादिकम् । स्वपराजयसंक्लेशादिति प्रान्ते व्यचिन्तयत् ॥ ६३ ॥फलं चेदस्ति चर्यायास्तया सोऽन्यत्र जन्मनि । मम स्तां विद्विषो जेतुं महाबलपराक्रमौ ॥ ६४ ॥
यद्यपि उसने क्रम-क्रमसे सिंहनिष्क्रीडित आदि कठिन तप किये तो भो उसके हृदयमें अपने पराजयका संक्लेश बना रहा अतः अन्तमें उसने ऐसा विचार किया कि यदि मेरी इस तपश्चर्याका फल अन्य जन्ममें प्राप्त हो तो मुझे ऐसा महान् बल और पराक्रम प्राप्त होवे जिससे मैं शत्रुओंको जीत सकूँ ॥ ६३-६४ ॥
“Although he gradually performed severe austerities such as the Simhanishkridita penance, the agonizing distress of his defeat still lingered in his heart. Consequently, at the very end, he harbored this desire: ‘If the fruit of this penance of mine is to be obtained in another birth, may I be endowed with such immense strength and prowess that I can effortlessly conquer all my enemies.'” || 63-64 ||
श्लोक ( Shlok ) 65
तथैव संन्यस्याभूच माहेन्द्रे सप्तसागर । स्थितिर्देवश्विरं भोगान् भुआनः सुखमास्थितः ॥ ६५ ॥
ऐसा निदान कर वह संन्याससे मरा और माहेन्द्र स्वर्गमें सात सागरकी स्थिति वाला देव हुआ। वह वहाँ भोगोंको भोगता हुआ चिरकाल तक सुखसे स्थित रहा ।॥ ६५ ॥
“Having formed such a binding desire (Nidana), he died practicing the vow of Sannyasa (the ritual termination of life) and was reborn as a deity in the Mahendra heaven with a life span of seven Sagaras. There, enjoying celestial pleasures, he lived happily for a very long time.” || 65 ||
श्लोक ( Shlok ) 66 – 67
द्वीपेऽस्मिन् मन्दरप्राचि “वीतशोकापुरीपतिः । नरादिवृषभो राजाऽजनि जातमहोदयः ॥ ६६ ॥भुक्त्वा कोपद्वयापेतं राज्यमूर्जितसौख्यभाक् । सयः सञ्जतनिर्वेदोऽत्यजइमवरान्तिके ॥ ६७ ॥
तदनन्तर इसी जम्बूद्वीपमें मेरुपर्वतके पूर्वकी ओर वीतशोकापुरी नामकी नगरी है उसमें ऐश्वर्यशाली नरवृषभ नामका राजा राज्य करता था। उसने बाह्याभ्यन्तर प्रकृतिके कोपसे रहित राज्य भोगा, बहुत भारी सुख भोगे और अन्तमें विरक्त होकर समस्त राज्य त्याग दिया और दमवर मुनिराजके पास दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली ॥ ६६-६७ ॥
“Thereafter, within this very Jambudvipa, to the east of Mount Meru, lies a city named Veetashokapuri. There ruled a magnificent and powerful king named Naravrishabha. He enjoyed a reign free from any external or internal rebellions (or natural upheavals), experienced immense worldly pleasures, and eventually, becoming detached, renounced his entire kingdom. He then accepted the Digambara initiation (ascetic vows) under the holy saint Damavara Muniraja.” || 66-67 ||
श्लोक ( Shlok ) 68
स घोरतपसा दीर्घ गमयित्वाऽऽयुरात्मनः । सहस्त्रारं जगामाष्टदशसागरसंस्थितिः ॥ ६८ ॥
अपनी विशाल आयु कठिन तपसे बिताकर वह सहस्त्रार स्वर्गमें अठारह सागरकी स्थितिवाला देव हुआ ।॥ ६८ ॥
“Having spent his exceptionally long lifespan in severe austerities, he passed away and was reborn as a deity in the Sahasrara heaven, with a life span of eighteen Sagaras.” || 68 ||
श्लोक ( Shlok ) 69 – 70
फळं स्वानिमिषत्वस्य प्राप्यानारतलोकनात् । प्राणप्रियाणां पर्यन्ते शान्तचेता निजायुषः ॥ ६९ ॥अस्मिन् खगपुराधीशसिंहसेनमहीपतेः । इक्ष्वाकोविजयायाश्च तनूजोऽभूत्सुदर्शनः ॥ ७० ॥
प्राणप्रिय देवाङ्गनाओंको निरन्तर देखनेसे उसने अपने टिपकार रहित नेत्रोंका फल प्राप्त कियाऔर आयुके अन्तमें शान्तचित्त होकर इसी जम्बूद्वीपके खगपुर नगरके इक्ष्वाकुवंशी राजा सिंहसेन-की विजया रानीसे सुदर्शन नामका पुत्र हुआ ॥ ६९-७० ॥
“By continuously gazing upon his dearly beloved celestial nymphs (Devanganas), he truly realized the purpose of his unblinking eyes. Then, at the end of his celestial lifespan, with a serene and peaceful mind, he departed that realm and was reborn in this very Jambudvipa, in the city of Khagapura, as a son named Sudarshana to Queen Vijaya, the consort of King Simhasena of the Ikshvaku lineage.” || 69-70 ||
श्लोक ( Shlok ) 71
अम्विकायां सुतोऽस्यैव सुमित्रः केशवोऽभवत् । पञ्चाब्धिधनुरुत्सेधौ दशलक्षासमायुषौ ॥ ७१ ॥
इसी राजाकी अम्बिका नामकी दूसरी रानीके सुमित्रका जीव नारायण हुआ। वे दोनों भाई पैंतालीस धनुष ऊँचे थे और दश लाख वर्ष-की आयुके धारक थे ।।॥ ७१ ॥
“The soul of King Sumitra was reborn as Narayana to Ambika, the second queen of this very same king (King Simhasena). Both brothers grew to a height of forty-five Dhanushas and possessed a lifespan of ten lakh (one million) years.” || 71 ||
श्लोक 72 से 81
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