अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51
English translation of Uttar Puran parv 60- shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
मलयाधीश्वरो नाम्ना कदाचिच्चण्डशासनः । आजगामं नृपं द्रष्टुं तत्पुरं मित्रतां गतः ॥ ५२ ॥
मलय देशका राजा चण्डशासन, राजा वसुषेणका मित्र था इसलिए वह किसी समय उसके दर्शन करनेके लिए पोदनपुर आया ।। ५२ ।।
“Chandashasana, the king of the Malaya country, was a friend of King Vasushena; therefore, at one time, he came to Podanpura to visit him. || 52 ||”
श्लोक ( Shlok ) 53
नन्दासन्दर्शनेनासौ मोहितः पापपाकवान् । आहृत्य तामुपायेन स्वदेशमगमत्कुधीः ॥ ५३ ॥
पापके उदय से प्रेरित हुआ चण्डशासन नन्दाको देखनेसे उसपर मोहित हो गया अतः वह दुर्बुद्धि किसी उपाय से उसे हरकर अपने देश ले गया ॥ ५३ ॥
“Impelled by the rise of his past sins, Chandashasana became infatuated with Nanda upon seeing her; therefore, that evil-minded king somehow abducted her and took her away to his own country. || 53 ||”
श्लोक ( Shlok ) 54 – 56
वसुषेणोऽप्यशक्तत्वात्तत्पराभवदुःखितः । चिन्तान्तकसमाकृष्यमाणप्राणः स्मृतेर्बलात् ॥ ५४ ॥श्रेयोगणधरं प्राप्य प्रव्रज्यां प्रतिपद्य सः । सिंहनिः क्रीडितायुग्रं तपस्तप्त्वा महाबलः ॥ ५५ ॥यदि विद्येत चर्यायाः फलमन्यत्र जन्मनि । अलक्ष्यशासनः कान्तो भवामीत्यकरोन्मतिम् ॥ ५६ ॥
राजा वसुषेण असमर्थ था अतः उस पराभवसे बहुत दुःखी हुआ, चिन्ता रूपी यमराज उसके प्राण खींच रहा था परन्तु उसे शास्त्रज्ञानका बल था अतः वह शान्त होकर श्रय नामक गणधरके पास जाकर दीक्षित हो गया। उस महाबलवान् ने सिंहनिष्क्रीडित आदि कठिन तपकर यह-निदान किया कि यदि मेरी इस तपश्चर्या का कुछ फल हो तो मैं अन्य जन्ममें ऐसा राजा होऊँ कि जिसकी आज्ञाका कोई भी उल्लंघन न कर सके ॥ ५४-५६ ।।
“King Vasushena was powerless and thus became deeply aggrieved by that humiliation. Anxiety, like Yama (the God of Death), was pulling at his life-force; however, possessing the strength of scriptural knowledge, he became peaceful, approached the Ganadhara named Shraya, and was initiated (into asceticism). That exceedingly powerful man performed arduous penances like Simhanishkridita and made this resolution (Nidana): ‘If there be any fruit to this penance of mine, may I be born in another life as such a king whose command no one can ever transgress.’ || 54-56 ||”
श्लोक ( Shlok ) 57
ततो विहितसंन्यासः सहस्त्रारं जगाम सः । अष्टादशसमुद्रायुद्वादशं कल्पमुत्तमम् ॥ ५७ ॥
तदनन्तर संन्यासमरणकर वह सहस्त्रार नामक बारहवें स्वर्ग गया। वहाँ अठारह सागरकी उसकी आयु थी ।। ५७ ।।
“Thereafter, having met his death through holy fasting (Sanyasa-marana), he went to the twelfth heaven named Sahasrara. There, his lifespan was eighteen Sagaras (a celestial unit of cosmic time). || 57 ||”
श्लोक ( Shlok ) 58 – 59
अथ जम्बूमति द्वीपे प्राग्विदेहे महद्धिके । नन्दनाख्ये पुरे प्राभून्नराधीशो महाबलः ॥ ५८ ॥प्रजानां पालको भोक्ता सुखानामतिधार्मिकः । श्रीमान् दिक्प्रान्तविश्रान्तकीर्तिरार्तिहरोऽर्थिनाम् ॥५९॥
अथानन्तर-जम्बूद्वीपके पूर्वविदेह क्षेत्रमें एक सम्पत्तिसम्पन्न नन्दन नामका नगर है। उसमें महाबल नामका राजा राज्य करता था। वह प्रजाकी रक्षा करता हुआ सुखोंका उपभोग करता था, अत्यन्त धर्मात्मा था, श्रीमान् था, उसकी कीर्ति दिशाओंके अन्त तक फैली थी, और वह याचकों-की पीड़ा दूर करनेवाला था- बहुत दानी था ।। ५८-५९ ॥
“Thereafter, in the Purvavideha region of Jambudvipa, there was a prosperous city named Nandana. A king named Mahabala ruled over it. While protecting his subjects, he enjoyed all pleasures; he was exceedingly righteous, majestic, his fame was spread to the ends of all directions, and he was highly charitable—always removing the afflictions of beggars and seekers. || 58-59 ||”
श्लोक ( Shlok ) 60
स कदाचिच्छरीरादियाथात्म्यावगमोदयात् । विरक्तस्तेषु निर्वाणपदवीप्रापणोत्सुकः ॥ ६० ॥
एक दिन उसे शरीरादि वस्तुओंके यथार्थ स्वरूपका बोध हो गया जिससे वह उनसे विरक्त होकर मोक्ष प्राप्त करनेके लिए उत्सुक हो गया ।। ६० ।।
“One day, he attained the true knowledge of the real nature of the body and other worldly objects, due to which he became detached from them and grew eager to attain liberation (Moksha). || 60 ||”
श्लोक ( Shlok ) 61
दत्वा राज्यं स्वपुत्राय प्रजापालार्हदन्तिके । गृहीतसंयमः सिंहनिःक्रीडिततपः श्रितः ॥ ६१ ॥
उसने अपने पुत्रके लिए राज्य दिया और प्रजापाल नामक अर्हन्तके समीप संयम धारण कर सिंहनिष्कीडित नामका तप किया ॥ ६१ ॥
“He handed over the kingdom to his son and, adopting self-restraint (Sanyama) in the presence of the Arhat named Prajapala, performed the arduous penance known as Simhanishkridita. || 61 ||”
श्लोक 62 से 71
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