मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 65 to 83
श्लोक ( Shlok ) 65
समायुतमितात्मायुः “कनकच्छूरसच्छविः । धनुविंशतिमानाङ्गः ‘क्रमेणापूर्णयौवनः ॥ ६५ ॥
दशहजार वर्षकी उसकी आयु थी, देदीप्यमान कच्छूरसके समान उसकी कान्ति थी, चौबीस धनुष ऊंचा शरीर था और क्रम-क्रमसे उसे पूर्ण यौवन प्राप्त हुआ था ॥ ६५ ॥
“His lifespan was ten thousand years, his complexion was radiant like the brilliant juice of saffron, his body was twenty-four dhanushas (bow-lengths) tall, and he had gradually attained full youthfulness.”65
श्लोक ( Shlok ) 66 – 67
कदाचित्तेन गत्वाऽमा पद्मनाभमहीपतिः । जिनं मनोहरोद्यानेऽनन्तवीर्याभिधानकम् ॥ ६६ ॥अभिवन्द्य ततः श्रुत्वा तत्त्वं संसारमोक्षयोः । सन्त्यज्य ‘राजसीं वृत्ति शमे स्थातु’ समुत्सुकः ॥६७॥
किसी एक दिन राजा पद्मनाभ हरिषेणके साथ-साथ मनोहर नामक उद्यान में गये हुए थे वहाँ अनन्तवीर्य नामक जिनेन्द्र की वन्दना कर उन्होंने उनसे संसार और मोक्षका स्वरूप सुना जिससे वे राजसी वृत्तिको छोड़ कर शान्त वृत्तिमें स्थित होनेके लिए उत्सुक हो गये ।। ६६-६७ ॥
“One day, King Padmanabha, along with Harishena, went to the beautiful garden named Manohara. There, after bowing down in reverence to the Jinendra named Anantavirya, they listened to him discourse on the true nature of worldly existence (samsara) and liberation (moksha). Hearing this, the King became deeply eager to abandon his royal lifestyle and transition into a state of spiritual peace.”66 – 67
श्लोक ( Shlok ) 68
राज्यभारं समारोप्य सुते भूपतिभिः समम् । बहुभिः संयमं प्रापत्प्रपित्सुः परमं पदम् ॥६८॥
परमपद मोक्ष प्राप्त करनेके इच्छुक राजा पद्मनाभने राज्यका भार पुत्रके लिए सौंपा और बहुतसे राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ॥ ६८ ॥
“Desirous of attaining Paramapada (the supreme state of liberation/moksha), King Padmanabha handed over the responsibilities of the kingdom to his son and, along with many other kings, embraced spiritual self-restraint (sanyama).”68
श्लोक ( Shlok ) 69
हरिषेणोऽप्युपादाय श्रावकव्रतमुत्तमम् । मुक्तेद्वितीयसोपानमिति मत्वाऽविशत्पुरम् ॥ ६९ ॥
‘यह मोक्ष महल की दूसरी सीढ़ी है’ ऐसा मानकर हरिषेणने भी श्रावकके उत्तम व्रत धारण कर नगर में प्रवेश किया ॥ ६९ ॥
“Considering it to be the ‘second step to the palace of liberation (moksha)’, Harishena also embraced the excellent vows of a Shravaka (a Jain lay follower) and re-entered the city.”69
श्लोक ( Shlok ) 70
तपस्यतश्चिरं घोरं पद्मनाभमहामुनेः । दीक्षावनेऽभूत्कैवल्यं प्रतिमायोगधारिणः ॥ ७० ॥
इधर चिर कालतक घोर तपश्चरण करते हुए पद्मनाभ मुनिराजने दीक्षावनमें ही प्रतिमायोग धारण किया और वहीं उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥ ७० ॥
“Meanwhile, after performing severe austerities for a long time, the sage Padmanabha assumed the pratima-yoga (a motionless, meditative posture) right there in the initiation forest (diksha-vana), and attained kevalajnana (omniscience/supreme knowledge) on that very spot.”70
श्लोक ( Shlok ) 71- 75
आसंश्चक्रातपन्नासिदण्डरत्नानि तद्दिने । हरिषेणमहीशस्य तदैवायुधवेश्मनि ॥ ७१ ॥श्रीगृहे काकिणीचर्ममणिरत्नानि चाभवन् । युगपत्सुष्टचित्तोऽसौ नत्वा तद्द्वयशंसिने ॥ ७२ ॥दत्वा तुष्टिधनं प्रायाजिनपूजाविधित्सया । पूजयित्वाभिवन्द्यैनं जिनं प्रति निवर्त्य सः ॥ ७३ ॥पुरं प्रविश्य चक्रस्य कृतपूजाविधिदिशः । जेतुं समुद्यतस्तस्य तदानीमभवत्पुरे ॥ ७४ ॥पुरोहितो गृहपतिः स्थपतिश्च चमूपतिः । हस्त्यश्वकन्यारत्नानि खगाद्रेरानयन्खगाः ॥ ७५ ॥
उसी दिन राजा हरिषेणकी आयुधशालामें चक्र, छत्र, खङ्ग, और दण्ड ये चार रत्न प्रकट हुए तथा श्रीगृह में काकिणी, चर्म, और मणि ये तीन प्रकट हुए। समाचार देने वालोंने दोनों समाचार एक साथ सुनाये इसलिए हरिषेणका चित्त बहुत ही संतुष्ट हुआ। वह समाचार सुनानेवालोंके लिए बहुत-सा पुरस्कार देकर जिन-पूजा करनेकी इच्छासे निकला और जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना कर वहाँ से वापिस लौट नगरमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ चक्ररत्नकी पूजा कर वह दिग्विजय करनेके लिए उद्यत हुआ ही था कि उसी समय उसी नगर में पुरोहित, गृहपति स्थपति, और सेनापति ये चार रत्न प्रकट हुए तथा विद्याधर लोग विजयार्ध पर्वतसे हाथी घोड़ा और कन्या रत्न ले आये ॥७१-७५।।
“On that very day, four jewels—the discus (Chakra), the umbrella (Chhatra), the sword (Kharga), and the staff (Danda)—manifested in King Harishena’s armory, while three jewels—the cowrie (Kakini), the divine hide (Charma), and the gem (Mani)—manifested in his treasury (Shri-griha).
Because the messengers delivered both pieces of news simultaneously [the news of the jewels and likely the news of Padmanabha attaining omniscience], Harishena’s heart was deeply gratified. Bestowing grand rewards upon the messengers, he set out with the desire to perform Jina-puja (worship of the Lord). After bowing in reverence to the Jinendra, he returned and re-entered the city. There, after worshiping the discus jewel (Chakra-ratna), he was just preparing to embark on his military conquest of the world (digvijaya), when at that very moment, four more human jewels—the Priest (Purohita), the Householder (Grihapati), the Architect/Architect-carpenter (Sthapati), and the Commander-in-chief (Senapati)—manifested in that same city. Furthermore, the Vidyadharas (celestial/supernatural beings) arrived from Mount Vijayardha, bringing with them the elephant, the horse, and the maiden jewels.”71- 75
श्लोक ( Shlok ) 76
नदीमुखेषु सम्भूतान्नवापि महतो निधीन् । आनिन्यिरे ‘स्वर्य भक्त्या गणबद्धाभिधाः सुराः ॥७६॥
गणबद्धनाम के देव नदीमुखों-नदियोंके गिरनेके स्थानोंमें उत्पन्न हुई नौ बड़ी बड़ी निधियाँ भक्ति पूर्वक स्वयं ले आये ।। ७६ ॥
“The celestial beings (Devas) named Ganabaddha devotedly and voluntarily brought the nine great treasures (nidhis) that had originated at the mouths of the rivers—the places where rivers empty into the sea.”76
श्लोक ( Shlok ) 77 – 78
स तैः श्लाघ्यषडङ्गेन बलेन प्रस्थितो दिशः । जित्वा तत्साररणानि स्वीकृत्य विजिताखिलः ॥ ७७ ॥स्वराजधान्यां संसेव्यः सुरभूपखगाधिपैः । दशाङ्गभोगाग्निर्व्यग्रं निविंशन् सुचिरं स्थितः ॥ ७८ ॥
उसने छह प्रकार की प्रशंसनीय सेनाके साथ प्रस्थान किया, दिशाओं को जीतकर उनके सारभूत रत्न ग्रहण किये, सब पर विजय प्राप्त की और अन्तमें देव, मनुष्य तथा विद्याधर राजाओंके द्वारा सेवित होते हुए उसने अपनी राजधानीमें प्रवेश किया। वहाँ वह दश प्रकारके भोगों का निराकुलतासे उपभोग करता हुआ चिरकाल तक स्थित रहा ।। ७७-७८ ।।
“He set forth with his sixfold praiseworthy army, conquered all the directions, and seized their finest and most essential treasures. Having attained victory over everyone, he finally re-entered his capital city while being served by deities (Devas), humans, and Vidyadhara kings. There, completely free from anxieties (nirakulata), he remained for a very long time, thoroughly enjoying the ten types of pleasures (bhogas).”77 – 78
श्लोक ( Shlok ) 79 – 80
कदाचित्कार्त्तिके मासे नन्दीश्वरदिनेष्वयम् । कृत्वाऽष्टसु महापूजां सोपवासोऽन्तिमे दिने ॥ ७९ ॥हर्म्यपृष्ठे सभामध्ये शारदेन्दुरिवाम्बरे । भासमानः समालोक्य राहुग्रासीकृतं विधुम् ॥ ८० ॥
किसी एक समय कार्तिक मासके नन्दीश्वर पर्व सम्बन्धी आठ दिनोंमें उसने महा पूजा की और अन्तिम दिन उपवासका नियम ले कर वह महलकी छतपर सभाके बीचमें बैठा था और ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो आकाशमें शरद ऋतुका चन्द्रमा सुशोभित हो। वहीं बैठे-बैठे उसने देखा कि चन्द्रमाको राहुने ग्रस लिया है ॥ ७९-८० ॥
“Once, during the eight days of the Nandishwara Parva festival in the month of Kartika, he performed a grand worship (Maha-puja). On the final day, having taken a vow of fasting, he sat amidst his assembly on the rooftop of his palace, looking as radiant as the autumn moon in the clear sky. Right there, as he sat watching, he observed that Rahu had eclipsed the moon.”79 – 80
श्लोक ( Shlok ) 81 – 83
धिगस्तु संसृतेर्भावं ज्योतिर्लोकैकनायकः । ग्रस्तस्तारापतिः कष्टं पूर्णः स्वैर्वेष्टितोऽप्ययम् II ८१IIअत्र का गतिरन्येषां प्राप्ते कालेऽविलङ्घिनि । विधौ विलसतीत्यात्तनिर्वेदो भरताधिपः ॥ ८२ ॥ अनुप्रेक्षास्वरूपाख्या मुखेन स्वसभास्थितान् । धर्मसारं निरूप्याशु कृत्वा तत्त्वार्थवेदिनः ॥ ८३ ॥
यह देख वह विचार करने लगा कि संसार की इस अवस्थाको धिक्कार हो। देखो, यह चन्द्रमा ज्योतिर्लोकका मुख्य नायक है, पूर्ण है और अपने परिवारसे घिरा हुआ है फिर भी राहुने इसे ग्रस लिया। जब इसकी यह दशा है तब जिसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ऐसा समय आनेपर दूसरोंकी क्या दशा होती होगी। इस प्रकार चन्द्रग्रहण देखकर चक्रवर्ती हरिषेणको वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसने अनुप्रेक्षाओंके स्वरूप का वर्णन करते हुए अपनी सभामें स्थित लोगोंको श्रेष्ठ धर्मका स्वरूप बतलाया और शीघ्र ही उन्हें तत्त्वार्थका ज्ञाता बना दिया ॥ ८१-८३ ॥
“Witnessing this, he began to reflect: ‘Fie upon this state of the worldly existence (samsara)! Look, this moon is the chief leader of the astral world (jyotirloka), it is completely whole, and it is surrounded by its celestial family—yet Rahu has still eclipsed it. When such is the plight of the moon, what must be the fate of others when an unyielding, inescapable time arrives?’
Witnessing the lunar eclipse in this manner, the Chakravartin Harishena was struck with deep spiritual detachment (vairagya). Expounding upon the true nature of the twelve reflections (anuprekshas), he explained the essence of the supreme religion (dharma) to the members of his assembly, instantly awakening their understanding of the ultimate realities (tattvartha).”81 – 83
श्लोक 84 से 92
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