राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 93 to 104
श्लोक ( Shlok ) 93
दृप्त दुर्जय भूपोग्रकरिकण्ठीरवायित । एतन्मनः समाधाय दशास्य श्रोतुमर्हसि ॥ ९३ ॥
अहङ्कारी तथा दुर्जय राजारूपी क्रुद्ध हस्तियोंको नष्ट करनेमें सिंहके समान हे दशानन ! जो मैं कह रहा हूं उसे तू चित्त स्थिर कर सुन ॥ ९३ ॥
“O Ten-Headed One (Dashanana)! You who are like a lion in destroying the furious, arrogant, and invincible elephants in the form of kings—listen with a calm and focused mind to what I am about to say.” || 93 ||
श्लोक ( Shlok ) 94 – 99
वाराणसीपुरादद्य ममात्रागमनं विभो । तत्पुरीपतिरिक्ष्वाकुवंशाम्बरदिवाकरः ॥ ९४ ॥सुतो दशरथाख्यस्य रामनामातिविश्रुतः । कुलरूपवयोज्ञानशौर्यसत्यादिभिर्गुणैः ॥ ९५ ॥ अनणीयान् स्वपुण्येन स सम्प्रत्युदयोन्मुखः । तस्यै यज्ञापदेशेन स्वयमाहूय कन्यकाम् ॥ ९६ ॥स्वनामश्रवणादेयगर्विकामुकचेतसम् । पर्याप्तस्त्रीगुणैकध्यवृत्तिसम्पत्कृताकृतिम् ॥ ९७ नेत्रगोचरमात्राखिलानङ्गसुखदायिनीम् । जेतु’ सम्भोगरत्यन्ते शक्तां मुक्तिवधूमपि ॥ ९८ ॥ स्वामनादृत्य योग्यां’ ते त्रिखण्डाखण्डसम्पदम् । स्त्रीरनं स्वात्मजां लक्ष्मीमिवादान्मिथिलाधिपः ॥९९॥
हे राजन् ! आज मेरा बनारस से यहाँ आना हुआ है। उस नगरीका स्वामी इक्ष्वाकुवंशरूपी आकाशका सूर्य राजा दशरथका अतिशय प्रसिद्ध पुत्र राम है। वह कुल, रूप, वय, ज्ञान, शूरवीरता तथा सत्य आदि गुणोंसे महान् है और अपने पुण्योदय से इस समय अभ्युदय ऐश्वर्यके सन्मुख है। मिथिलाके राजा जनकने यज्ञ के बहाने उसे स्वयं बुलाकर साक्षात् लक्ष्मीके समान अपनी सीता नामकी पुत्री प्रदान की है। वह इतनी सुन्दरी है कि अपना नाम सुनने मात्रसे ही बड़े-बड़े अहङ्कारी कामियोंके चित्तको ग्रहण कर लेती है- वश कर लेती है, संसारकी सब स्त्रियोंके गुणोंको इकट्ठा करके उनकीसम्पदा से ही मानो उसका शरीर बनाया गया है, वह नेत्रों के सामने आते ही सब जीवोंको काम सुख प्रदान करती है और सम्भोगसे होनेवाली तृप्तिके बाद तो मुक्तिरूपी स्त्रीको भी जीतनेमें समर्थ है। वह स्त्रीरूपी रत्न सर्वथा तुम्हारे योग्य था परन्तु मिथिलापतिने तीन खण्डकी अखण्ड सम्पदाको धारण करनेवाले तुम्हारा अनादर कर रामचन्द्र के लिए प्रदान किया है ॥ ९४-९९ ॥
“O King! Today I have arrived here from Varanasi. The lord of that city is Rama, the highly renowned son of King Dasharatha, who shines like the sun in the sky of the Ikshvaku dynasty. He is magnificent, endowed with the supreme virtues of lineage, beauty, youth, knowledge, valor, and truth; by the rise of his merits (punyodaya), he is currently facing immense prosperity and glory.
King Janaka of Mithila, inviting him on the pretext of a sacrificial ritual (yajna), has handed over his daughter named Sita, who is like Goddess Lakshmi personified. She is so exquisite that merely hearing her name captivates—and subjugates—the minds of the most arrogant of lovers. It is as though her body was sculpted by gathering the finest qualities of all the women in the universe.
The moment she appears before one’s eyes, she grants the bliss of love to all living beings, and the satisfaction derived from her company is capable of outshining even the bliss of ultimate liberation (mukti). That jewel among women was entirely worthy of you; yet, the Lord of Mithila, disregarding you—the master of the uninterrupted wealth of the three realms—has instead bestowed her upon Ramachandra.” || 94-99 ||
श्लोक ( Shlok ) 101 – 104
इह प्रेम्णागतोऽस्मीति नारदोक्त्या खगेशिना । इच्छा पश्यति नो चक्षुः कामिनामित्युदीरितम् ॥१०१॥ सत्यं प्रकुर्वता सद्यः सीतासम्बन्धवाश्रुतेः । अनङ्गशरसम्पाताज्जर्जरीकृतचेतसा ॥ १०२ ॥ धन्यान्यत्र न सा स्थातु’ योग्या भाग्यविहीनके । मन्दाकिन्याः स्थितिः क्व स्यात्प्रविहत्य महाम्बुधिम् ॥ १०३॥ * बलात्कारेण तां तस्मादपहृत्यातिदुर्बलात् । रनमालामिवालोलां करिष्यामि ममोरसि ॥ १०४ ॥
भोगोपभोगमें निमग्न रहनेवाले तथा विपुल लक्ष्मीके धारक रामके पास रह कर मैं आया हूँ। मैं उसे सहन नहीं कर सका इसलिए आपके दर्शन करनेके लिए प्रेमवश यहाँ आया हूँ। नारदजीकी बात सुनकर विद्याधरोंके राजा रावणने ‘कामी मनुष्योंकी इच्छा ही देखती है नेत्र नहीं देखते हैं’ इस लोकोक्तिको सिद्ध करते हुए कहा। उस समय सीता सम्बन्धी वचन सुननेसे रावणका चित्त कामदेवके वाणोंकी वर्षासे जर्जर हो रहा था। रावणने कहा कि वह भाग्यशालिनी मेरे सिवाय अन्य भाग्यहीनके पास रहनेके योग्य नहीं है। महासागरको छोड़कर गङ्गाकी स्थिति क्या कहीं अन्यत्र भी होती है ? मैं अत्यन्त दुर्बल रामचन्द्रसे सीताको जबर्दस्ती छीन लाऊँगा और स्थायी कान्तिको धारण करनेवाली रत्नमालाके समान उसे अपने वक्षःस्थल पर धारण करूँगा ।। १००-१०४ ॥
“I have come directly from Rama, who remains immersed in worldly pleasures and possesses immense wealth. I could not bear to witness it, and thus, out of affection for you, I have come here to see you.
Upon hearing Narada’s words, Ravana, the King of the Vidyadharas, proved the proverb: ‘Lustful men see only through their desires, not through their eyes.’ At that moment, Ravana’s heart was being torn apart by a rain of arrows from Kamadeva (the God of Love) just by hearing descriptions of Sita.
Ravana declared, ‘That fortunate woman is not fit to remain with any luckless man other than me. Does the River Ganges ever find her destination anywhere except in the Great Ocean? I shall forcibly seize Sita from that utterly weak Ramachandra and wear her upon my chest like a radiant, everlasting garland of jewels.'” || 100-104 ||
श्लोक 105 से 123
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92
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