मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 391 to 401
श्लोक ( Shlok ) 391 – 394
तापसैरभ्यधायीति सर्वप्राणिहितैषिभिः । विश्वभूरिदमाकर्ण्य तापसा भोः कथं मया ॥३९१॥दृप्टं शक्यमपह्नोतुं साक्षात्स्वर्गस्य साधनम् । इति ब्रुवन् पुनर्नारदेनोक्तः पापभीरुणा ॥३९२॥अमात्योत्तम विद्वांस्त्वं किमिति स्वर्गसाधनम् । सगरं सपरीवारं निर्मूलयितुमिच्छता ॥३९३॥उपायोऽयं व्यधाय्येवं प्रत्यक्षफलदर्शनात् । केनचित्कुहुकज्ञेन मुग्धानां मोहकारणम् ॥ ३९४॥
सब प्राणियोंका हित चाहने वाले तपस्वियोंने इसप्रकार कहा परन्तु विश्वभू मन्त्रीने इसे सुनकर कहा कि हे तपस्वियो ! जो यज्ञ प्रत्यक्ष ही स्वर्गका साधन दिखाई दे रहा है उसका अपलाप किस प्रकार किया जा सकता है ? तदनन्तर इस प्रकार कहने वाले विश्वभू मंत्रीसे पापभीरु नारदने कहा कि हे उत्तम मंत्रिन् ! तू तो विद्वान् है, क्या यह सब स्वर्गका साधन है? अरे, राजा सगरको परिवार सहित निर्मूल नष्ट करनेकी इच्छा करने वाले किसी मायावी ने इस तरह प्रत्यक्ष फल दिखाकर यह उपाय रचा है, ग्रह उपाय केवल मूर्ख मनुष्योंको ही मोहित करनेका कारण है ॥ ३९१-३९४।।
The ascetics, who desired nothing but the welfare of all living beings, spoke in this manner. However, upon hearing their words, Minister Vishvabhū replied, “O ascetics! How can anyone deny or cover up the truth of a sacrifice that is visibly and directly manifest as a direct means to attain heaven?”
Thereafter, Narada, who possessed a deep dread of committing sin (Papa-bheeru), addressed the minister who spoke thus, saying, “O noble Minister! You are a learned scholar; can all of this truly be a means to attain heaven?
Listen carefully—some master of illusion (Mayavi), harboring a malicious desire to completely uproot and destroy King Sagara along with his entire family, has engineered this elaborate scheme by projecting these seemingly visible results. This deceptive strategy is merely a tool designed to bewilder and infatuate foolish men.” || 391-394 ||
श्लोक ( Shlok ) 395 – 400
ततः शीलोपवासादिविधिमार्षागमोदितम्। आचरेति स तं प्राह पर्वतं नारदोदितम् ॥३९५॥श्रुतं त्वयेत्यसौ शास्त्रेणासुरोक्तेन दुर्मतिः । मोहितो नारदेनापि प्रागिदं किं न वा श्रुतम् ॥३९६॥समास्य च गुरुर्नान्यो ‘मत्पितैवातिगर्वितः । समत्सरतयाप्येष मय्यद्य किमिवोच्यते ॥३९७॥सश्रुतो मद्गुरोर्धर्मभ्राता जगति विश्रुतः । स्थविरस्तेन च श्रौर्त रहस्यं प्रतिपादितम् ॥३९८॥वसुं प्रसिद्धं सत्येन, पृच्छेरित्यन्वभाषत । तच्छ्रुत्वा नारदोऽवादीत्को दोषः पृच्छयतामसौ ॥४००॥
इसलिए तू ऋषि प्रणीत आगममें कही हुई शील तथा उपवास आदि की विधिका आचरण कर। इस प्रकार नारदके वचन सुनकर विश्वभूने पर्वतसे कहा कि तुमने नारदका कहा सुना ? महाकाल असुरके द्वारा कहे शास्त्रले मोहित हुआ दुर्बुद्धि पर्वत कहने लगा कि यह शास्त्र क्या नारदने भी पहले कभी नहीं सुना। इसके और मेरे गुरु पृथक् नहीं थे, मेरे पिता ही तो दोनोंके गुरु थे फिर भी यह अधिक गर्व करता है। मुझ पर ईर्ष्या रखता है अतः आज चाहे जो कह बैठता है। विद्वान् स्थविर मेरे गुरुके धर्म भाई तथा जगत में प्रसिद्ध थे, उन्हींने मुझे यह श्रुतियोंका रहस्य बतलाया है। यज्ञमें मरनेसे जो फल होता है उसे मैंने भी आज प्रत्यक्ष दिखला दिया है फिर भी यदि तुझे विश्वास नहीं होता है तो समस्त वेदरूपी समुद्रके पारगामी राजा वसुसे जो कि सत्यके कारण प्रसिद्ध है, पूछ सकते हो। यह सुनकर नारदने कहा कि क्या दोष है वसुसे पूछ लिया जावे ॥३९५-४०० ॥
“Therefore, you should practice the codes of conduct (Shila), fasting (Upavasa), and other righteous vows as prescribed in the sacred scriptures (Agamas) composed by the true seers.”
Hearing these words of Narada, Vishvabhū turned to Parvata and asked, “Did you hear what Narada has said?”
Completely deluded by the false scriptures taught by the demon Mahakala, the wicked-minded Parvata replied, “Has Narada himself never heard these scriptures before? His master and mine were not different; my own father was the preceptor for both of us. Yet, he harbors excessive pride. He bears deep envy toward me, and that is why he says whatever he pleases today! The learned elder (Sthavira, Mahakala in disguise) was a spiritual brother to my father and is renowned throughout the world—it is he who revealed the hidden secrets of the Vedas to me. Furthermore, I have today visibly demonstrated the celestial fruit that is attained by dying in a sacrifice. Even after this, if you still do not believe it, you may ask King Vasu, who has crossed to the farther shore of the entire ocean of the Vedas and is universally famous for his absolute truthfulness.”
Hearing this, Narada responded, “What harm is there in that? Let us ask Vasu.” || 395-400 ||
श्लोक ( Shlok ) 401
तावद्विचारार्ह वधश्चेद्धर्मसाधनम् । अहिंसादानशीलादि भवेत्पापप्रसाधनम् ॥४०१॥
परन्तु यह बात विचार करनेके योग्य है कि यदि हिंसा, धर्मका साधन मानी जायगी तो अहिंसा दान शील आदि पापके कारण हो जावेंगे ॥ ४०१ ॥
“However, this matter is profoundly worthy of contemplation: if violence (Himsa) is accepted as a means to achieve righteousness (Dharma), then by that very logic, non-violence (Ahimsa), charity (Dana), and moral conduct (Shila) would inevitably become the causes of sin (Papa).” || 401 ||
श्लोक 402 से 411
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390
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