चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122 – 128
असौ मनोहरोद्याने गुणप्रभजिनेश्वरम् । परेद्युः प्राप्य तत्प्रोक्तं धर्मसारं रसायनम् ॥ १२२ ॥पीत्वा *स्वभवसम्बन्धश्रुतिबन्धुप्रचोदितः । सद्यो निविंद्य साम्राज्यं वितीर्य जितशत्रवे ॥ १२३ ॥ त्रैलोक्यजयिनं जेतु’ मोहराजं कृतोद्यमः । राजभिर्बहुभिः सार्द्धं गृहीत्वा साधनं तपः ॥ १२४ ॥ चरित्वा निरतीचारं तनुं त्यक्त्वायुषोऽवधौ । नभस्तिलकगिर्यमे शान्तकारविमानगः ॥ १२५ ॥ अच्युतेन्द्रोऽजनिष्टाप्तवाद्धिद्वाविंशतिस्थितिः । हस्तत्रयप्रमाणात्त निर्धातुतनुभास्करः ॥ १२६ ॥ शुक्ललेश्यः श्वसन्मासैरेकादशभिराहरन् । द्वाविंशतिसहस्त्राब्दैर्मनसाऽऽहारमामरम् ॥ १२७ ॥ तमःप्रभावधिव्याप्तदेशावधिविलोचनः । तत्क्षेत्रव्यापिस त्तेजोबलोत्तरशरीरभाक् ॥ १२८ ॥
दूसरे दिन वह राजा, गुप्तप्रभ जिनेन्द्रकी वन्दना करनेके लिए मनोहर नामक उद्यानमें गया। वहाँ उसने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए श्रेष्ठ धर्म रूपी रसायनका पान किया, अपने पूर्व भवके सम्बन्ध सुने, जिनसे भाईके समान प्रेरित हो शीघ्र ही वैराग्य प्राप्त कर लिया। वह जितशत्रु नामक पुत्रके लिए राज्य देकर त्रैलोक्यविजयी मोह राजाको जीतनेके लिए तत्पर हो गया तथा बहुतसे राजाओंके साथ उसने तप धारण कर लिया। इस प्रकार निरतिचार तप तप कर आयुके अन्तमें वह नभस्तिलक नामक पर्वतके अग्रभाग पर शरीर छोड़ सोलहवें स्वर्गके शान्तकार विमानमें अच्युतेन्द्र हुआ । वहाँ उसकी बाईस सागरकी आयु थी, तीन हाथ ऊँचा तथा धातु-उपधातुओंसे रहित देदीप्यमान शरीर था, शुक्ललेश्या थी, वह ग्यारह माहमें एक बार श्वास लेता था, बाईस हजार वर्ष बाद एक बार अमृतमयी मानसिक आहार लेता था, उसके देशावधिज्ञान-रूपी नेत्र छठवीं पृथिवी तकके पदार्थों तकको देखते थे, उसका समीचीन तेज, बल तथा वैक्रियिक शरीर भी छठवीं पृथिवी तक व्याप्त हो सकता था ।। १२२-१२८ ।।
The following day, the King went to the Manohara Garden to offer his salutations to Guptaprabha Jinendra. There, he imbibed the elixir of the supreme Dharma as preached by the Lord Jinendra. Upon hearing the accounts of his previous births—which acted as a fraternal nudge—he was swiftly moved by a sense of detachment (Vairagya).
He abdicated the throne in favor of his son, named Jitashatru, and prepared himself to conquer the King of Delusion (Moha), the victor of the three worlds. Accompanied by many other kings, he embraced a life of penance.
Having practiced rigorous and flawless austerities, he eventually abandoned his mortal coil atop the summit of Nabhastilaka Mountain. He was reborn as Achyutendra in the Shantakara celestial vehicle (Vimana) of the sixteenth heaven.122 – 128
श्लोक ( Shlok ) 129
दिष्यभोगांश्चिरं भुक्त्वा स्वायुरन्ते विशुद्धदृक् । “प्राग्भागधातकीखण्डे सीतादक्षिणकूलगे ॥ १२९ ॥
इस प्रकार निर्मल सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाला वह अच्युतेन्द्र चिरकाल तक स्वर्गके सुख भोग आयुके अन्त में कहाँ उत्पन्न हुआ यह कहते हैं ।॥ १२९ ॥
Now, the text describes where that Achyutendra, who possessed such pure Samyagdarshana (Right Belief), was reborn after enjoying the celestial pleasures of heaven for a long duration until the end of his lifespan.129
श्लोक ( Shlok ) 130 – 131
विषये मङ्गलावत्यां रत्नसञ्चय पूःपतिः । देव्यां कनकमालायां वल्लभः कनकप्रभः ॥ १३० ॥पद्मनाभः सुतो जातस्तयोः सुस्वप्न पूर्वकम् । बालानुकूलपर्युष्टिविशेषैः सोऽभ्यवर्द्धत ॥ १३१ ॥
पूर्व धातकीखण्ड द्वीपमें सीता नदीके दाहिने तट पर एक मङ्गलावती नामका देश था । उसके रत्नसंचय नगरमें कनकप्रभ राजा राज्य करते थे। उनकी कनकमाला नामकी रानी थी। वह अहमिन्द्र उन दोनों दम्पतियोंके शुभ स्वप्नों द्वारा अपनी सूचना देता हुआ पद्मनाभ नामका पुत्र उत्पन्न हुआ । पद्मनाभ, बालकोचित सेवा-विशेषके द्वारा निरन्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता था ।। १३०-१३१ ।।
In the eastern Dhatakikhanda continent, on the right bank of the Sita River, there was a province named Mangalavati. In its city of Ratnasanchaya, King Kanakaprabha ruled. He had a queen named Kanakamala.
That Ahamindra (the soul from the sixteenth heaven), signaling his arrival through auspicious dreams seen by the couple, was born as their son, named Padmanabha. Young Padmanabha grew steadily, attended by exceptional services befitting a royal child.130 – 131
श्लोक 132 से 141
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