अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायणके अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 42 to 52
श्लोक ( Shlok ) 42
रूपादिगुणसम्पत्तिस्तस्याः किं कथ्यते पृथक् । तस्य चेच्छक्रवच्छच्यां तस्यां प्रीतिरमानुषी ॥ ४२ ॥
जिस प्रकार इन्द्राणीमें इन्द्रकी लोकोत्तर प्रीति होती है उसी प्रकार उसमें ज्वलनजटीकी लोकोत्तर प्रीति थी फिर उसके रूपादि गुणोंका पृथक् पृथक् क्या वर्णन किया जावे ।। ४२ ।।
“Just as Indra possesses an extraordinary, transcendent love for Indrani, so too did Jwalanajati harbor an extraordinary love for her. Such being the case, what need is there to describe her beauty and other virtues individually?” ।। 42 ।।
श्लोक ( Shlok ) 43
दयावबोधयोमर्मोक्ष इव सूनुस्तयोरभूत् । अर्ककीर्तिः स्वकीर्त्यांभाप्रभासितजगत्त्रयः ॥ ४३ ॥
जिस प्रकार दया और सम्यग्ज्ञानके मोक्ष होता है उसी प्रकार उन दोनोंके अपनी कीर्तिकी प्रभासे तीनों लोकोंको प्रकाशित करने वाला अर्ककीर्ति नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ४३ ॥
“Just as Liberation (Moksha) is born from the union of Compassion (Daya) and Right Knowledge (Samyag-jnana), even so was a son named Arkakirti born to them—one who illuminated all the three worlds with the radiant splendor of his glory.” ।। 43 ।।
श्लोक ( Shlok ) 44
नीतिविक्रमयोर्लक्ष्मीरिव सर्वमनोहरा । स्वयम्प्रभाभिधानाऽऽसीत्प्रभेव विधुना सह ॥ ४४ ॥
जिस प्रकार नीति और पराक्रमके लक्ष्मी होती है उसी प्रकार उन दोनोंके सबका मन हरनेवाली स्वयंप्रभा नामकी पुत्री भी उत्पन्न हुई जो अर्ककीर्तिके साथ इस प्रकार बढ़ने लगी जिस प्रकार कि चन्द्रमाके साथ उसकी प्रभा बढ़ती है ॥ ४४ ॥
“Just as Prosperity (Lakshmi) arises from the union of Strategy (Niti) and Valor (Parakram), even so was a daughter named Swayamprabha born to them—one who captivated the minds of all. She began to grow alongside Arkakirti, just as the radiant light of the moon grows in tandem with the moon itself.” ।। 44 ।।
श्लोक ( Shlok ) 45
मुखेनाम्भोजमक्षिभ्यामुत्पलं मणिदर्पणम् । त्विषा कान्त्या विधुं जित्वा बभौ सा भ्रूपताकया ॥ ४५ ॥
वह मुख-से कमलको, नेत्रोंसे उत्पलको, आभासे मणिमय दर्पणको और कान्तिसे चन्द्रमाको जीतकर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो भौंहरूप पताका ही फहरा रही हो ॥ ४५ ॥
“By surpassing the lotus with her face, the blue water-lily with her eyes, a jeweled mirror with her radiant luster, and the moon with her brilliant splendor, she shone so magnificently as if she were a fluttering banner adorned with a swarm of bees.” ।। 45 ।।
श्लोक ( Shlok ) 46
उत्पन्नं यौवनं तस्यां लतिकायां प्रसूनवत् । खगकामिषु पुष्पेषुज्वरश्चोत्थापितस्तया ॥ ४६ ॥
लतामें फूलके समान ज्योंही उसके शरीरमें यौवन उत्पन्न हुआ त्योंही उसने कामी विद्याधरोंमें कामज्वर उत्पन्न कर दिया ।। ४६ ।।
“Just as a flower naturally blossoms upon a vine, the moment youth manifested in her body, she instantly aroused the fever of passion within the amorous Vidyadharas.” ।। 46 ।।
श्लोक ( Shlok ) 47
आपाण्डुगण्डभाभासिवक्त्रलोलविलोचना । मध्याङ्गकारर्यसम्भूतसम्भ्रान्त्येव स्वयम्प्रभा ॥ ४७ ॥
कुछ कुछ पीले और सफेद कपोलोंकी कान्तिसे सुशोभित मुखमण्डल पर उसके नेत्र बड़े चञ्चल हो रहे थे जिनसे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कमरको पतली देख उसके टूट जानेके भयसे ही नेत्रोंको चञ्चल कर रही हो ॥ ४७ ॥
“Upon her face, which was beautifully adorned with the pale-golden and fair luster of her cheeks, her large eyes darted about with great restlessness—making her appear as though she were casting anxious, fluttering glances out of sheer fear that her exceedingly slender waist might snap.” ।। 47 ।।
श्लोक ( Shlok ) 48
तन्ब्या रोमावली तन्वी हरिनीलरुचिर्य्यभात् । आरुरुक्षुरिवोद्धत्या तुङ्गपीनघनस्तनौ ॥ ४८ ॥
उस दुबली पतली स्वयम्प्रभाकी इन्द्रनील मणि के समान कान्तिवाली पतली रोमावली ऐसी जान पड़ती थी मानो उछलकर ऊँचे स्थूल और निविड़ स्तनों पर चढ़ना ही चाहती हो ।॥ ४८ ॥
“The slender line of fine hair upon the delicate body of that graceful Swayamprabha, possessing the deep, dark luster of a sapphire, appeared as if it were leaping upward—longing to scale the heights of her high, full, and closely set breasts.” ।। 48 ।।
श्लोक ( Shlok ) 49
अनालीढमनोजापि व्यक्ततद्विक्रियेव सा । सम्पन्नयौवनेनैव जनानामगमद्दशम् ॥ ४९ ॥
यद्यपि कामदेवने उसका स्पर्श नहीं किया था तथापि प्राप्त हुए यौवनसे ही वह कामदेवके विकारको प्रकट करती हुई-सी मनुष्योंके दृष्टिगोचर हो रही थी ॥ ४९ ॥
“Even though the god of love (Kamadeva) had not yet physically touched her, merely by virtue of her newly attained youth, she appeared to the eyes of men as the very embodiment of the ecstatic stirrings of love.” ।। 49 ।।
श्लोक ( Shlok ) 50 – 52
अथान्येद्युर्जगन्नन्दनाभिनन्दनचारणौ । स्थितौ मनोहरोद्याने ज्ञात्वा पतिनिवेदकात् ॥ ५० ॥चतुरङ्गबलोपेतः सपुत्रोऽन्तःपुरावृतः । गत्वाभिवन्द्य सद्धर्मश्रवणानन्तरं परम् ॥ ५१ ॥सम्यग्दर्शनमादाय दानशीलादि वादरात् । प्रणम्य चारणौ भक्त्या प्रत्येत्य प्राविशत्पुरम् ॥ ५२ ॥
अथानन्तर किसी एक दिन जगन्नन्दन और नाभिनन्दन नामके दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज मनोहर नामक उद्यानमें आकर विराजमान हुए। उनके आगमनकी खबर देनेवाले वनपालसे यह समाचार जानकर राजा चतुरङ्ग सेना, पुत्र तथा अन्तःपुरके साथ उनके समीप गया। वहाँ वन्दना कर उसने श्रेष्ठ धर्मका स्वरूप सुना, बड़े आदरसे सम्यग्दर्शन तथा दान शील आदि व्रत ग्रहण किये, तदनन्तर भक्तिपूर्वक उन चारणऋद्धिधारी मुनियोंको प्रणाम कर वह नगरमें वापिस आ गया ॥ ५०-५२ ।।
“Thereafter, on a certain day, two ascetics endowed with supernatural powers of flight (charan-riddhi), named Jagannandan and Nabhinandan, arrived and graced the Manohar garden with their presence. Upon learning this news from the forest-keeper who brought tidings of their arrival, the King—accompanied by his fourfold army (chaturanga-sena), his son, and the ladies of the inner palace—approached them. Having offered his reverent salutations there, he listened to the discourse on the nature of supreme righteousness (dharma). With deep devotion, he accepted the vows of right faith (samyag-darshan), charity (daan), and moral conduct (sheel). Then, bowing faithfully once more to those miraculously gifted sages, he returned to the city.” ।। 50-52 ।।
श्लोक 53 से 61
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