मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 293 to 304
श्लोक ( Shlok ) 293 – 297
स्नानाग्निहोत्रादि भुक्त्वा स्वब्राह्मणे स्थिते । अब्रवीत् पर्वतप्रोक्तं तन्निशम्य विदां वरः ॥२९३॥निविंशेषोपदेशोऽहं सर्वेषां पुरुषं प्रति । विभिन्ना बुद्धयस्तस्मान्नारदः कुशलोऽभवत् ॥२९४॥प्रकृत्या त्वत्सुतो मन्दो नासूयास्मिन् विधीयताम् । इति तत्प्रत्ययं कर्तुं नारदं सुतसन्निधौ ॥२९५॥वद केन वने भ्राम्यन्पर्वतस्योदयादयः । विस्मयं बह्निति प्राह सोऽपि सप्रश्रयोऽभ्यधात् ॥२९६॥बनेऽहं पर्वतेनामा गच्छन्नर्मकथारतः । शिखिनां पीतवारीणां सद्यो नद्या निवर्तने ॥२९७॥
जब ब्राह्मण क्षीरकदम्ब स्नान; अग्नि होत्र तथा भोजन करके बैठा तब ब्राह्मणीने पर्वतके द्वारा कही हुई सब बात कह सुनाई। उसे सुनकर ज्ञानियोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मण कहने लगा कि मैं तो सबको एकसा-उपदेश देता हूं परन्तु प्रत्येक पुरुषकी बुद्धि भिन्न भिन्न हुआ करती है यही कारण है कि नारद कुशल हो गया है। तुम्हारा पुत्र स्वभावसे ही मन्द है, इसलिए नारदपर व्यर्थ ही ईर्ष्या न करो। यह कहकर उसने विश्वास दिलानेके लिए पुत्रके समीप ही नारदसे कहा कि कहो, आज वनमें घूमते हुए तुमने पर्वतका क्या उपद्रव किया था ? गुरुकी बात सुनकर वह कहने लगा कि बड़ा आश्चर्य है ? यह कहते हुए उसने बड़ी विनयसे कहा कि मैं पर्वतके साथ विनोद-वार्ता करता हुआ वनमें जा रहा था। वहाँ मैंने देखा कि कुछ मयूर पानी पीकर नदीसे अभी हाल लौट रहे हैं ॥ २९३-२९७ ॥
When the Brahmin Kshirakadamba sat down after bathing, performing the fire ritual (Agnihotra), and having his meal, the Brahmin woman related everything that Parvata had said. Hearing this, the Brahmin, who was the finest among the wise, said, “I impart the exact same teachings to everyone, but the intellect of each individual happens to be different. This is the reason why Narada has become proficient. Your son is dull-witted by nature, so do not envy Narada in vain.”
Saying this, and in order to reassure her, he called Narada close to his son and asked, “Tell me, what mischief did you play on Parvata while wandering in the forest today?”
Hearing his guru’s words, Narada expressed great surprise. Speaking with utmost humility, he said, “I was walking into the forest, engaging in lighthearted conversation with Parvata. There, I noticed that some peacocks had just returned from the river after drinking water.” || 293-297 ||
श्लोक ( Shlok ) 298 -304
स्वचन्द्रककलापाम्भोमध्यमज्जनगौरवात् । भीत्वा व्यावृत्य विमुखं कृतपश्चात्पदस्थित्तिः ॥२९८॥कलापी गतवानेकः शेषाश्च तज्जलार्दिताः ३ । पत्रभागं विधूयागुस्तं दृष्ट्वा समभाषिषि ॥२९९॥पुमानेकः स्त्रियश्चान्या इति मत्वानुमानतः । ततो वनान्तरात्किञ्चिदागत्य पुरसन्निधौ ॥३००॥तथा करिण्याः पादाभ्यां पश्चिमाभ्यां प्रयाणके । स्वमूत्रघट्टनाद्भागे दक्षिणे तरुवीरुधाम् ॥३०१॥भङ्गेन मार्गात्प्रच्युत्य श्रमादारूढयोषितः । शीतच्छायाभिलाषेण सुप्तायाः पुलिनस्थले ॥३०२॥उदरस्पर्शमार्गेण दशया गुल्मशक्तया । करिणीश्रितगेहाग्रसितोद्यत्केतनेन च ॥३०३॥मया तदुक्तमित्येतद्वचनाद् द्विजसत्तमः । निजापराधभावस्याभावमाविरभावयत् ॥ ३०४॥
उनमें जो मयूर था वह अपनी पूँछके चन्द्रक पानीमें भीगकर भारी हो जानेके भयसे अपने पैर पीछेकी ओर रख फिर मुँह फिराकर लौटा था और बाकी जलसे भीगे हुए अपने पद्ध फटकारकर जा रहे थे। यह देख मैंने अनुमान द्वारा पर्वतसे कहा था कि इनमें एक पुरुष है और बाकी स्त्रियाँ हैं। इसके बाद बनके मध्यसे चलकर किसी नगरके समीप देखा कि चलते समय किसी हस्तिनीके पिछले पैर उसीके मूत्रसे भीगे हुए हैं इससे मैंने जाना कि यह हस्तिनी है। उसके दाहिनी ओरके वृक्ष और लताएँ टूटी हुई थीं इससे जाना कि यह हथिनी बाँई आँखसे कानी है। उसपर बैठी हुई स्त्री मार्गकी थकावटसे उतरकर शीतल छायाकी इच्छासे नदीके किनारे सोई थी वहाँ उसके उदरके स्पर्शसे जो चिह्न बन गये थे उन्हें देखकर मैंने जानता था कि यह स्त्री गर्भिणी है। उसकी साड़ीका एक छोड़ किसी झाड़ी में उलझकर लग गया था इससे जाना था कि वह सफेद साड़ी पहने थी। जहाँ हस्तिनी ठहरी थी उस घरके अग्रभागपर सफेद ध्वजा फहरा रही थी इससे अनुमान किया था कि इसके पुत्र होगा। इसप्रकार अनुमानसे मैंने ऊपरकी सब बातें कही थीं। नारदकी ये सब बातें सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ब्राह्मणीके समक्ष प्रकट कर दिया कि इसमें मेरा अपराध कुछ भी नहीं है- मैंने दोनोंको एक समान उपदेश दिया है ।। २९८-३०४ ॥
“Among them, the male peacock was stepping backward and then turning around to return, out of fear that the eyes (eyespots) on his tail-feathers would become heavy if soaked in water, while the rest were shaking off their water-drenched feathers as they walked. Seeing this, I deduced and told Parvata that one of them was a male and the remaining were females.
Afterward, passing through the middle of the forest near a city, I noticed that as a certain elephant walked, its hind legs were wet with its own urine; from this, I knew it was a female elephant. The trees and creepers on its right side were broken, from which I deduced that this female elephant was blind in her left eye.
A woman riding upon her, exhausted from the journey, had dismounted and slept on the riverbank seeking cool shade; by looking at the impressions left there by the touch of her abdomen, I knew that the woman was pregnant. One end of her saree had caught and torn off in a bush, from which I knew she was wearing a white saree. Furthermore, a white flag was fluttering at the front of the house where the female elephant had stopped, from which I inferred that she would give birth to a son. It was through such deductions that I stated all of the above matters.”
Hearing all these explanations from Narada, that noble Brahmin demonstrated to his wife, “I bear absolutely no fault in this—I have imparted the exact same teachings to both of them.” || 298-304 ||
श्लोक 305 से 321
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292
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