आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य पूछता है कि स्वामिन् ! माना कि मोक्ष में जीव सुखी रहता है, किन्तु संसार में भी यदि जीव सुखी रहे तो क्या हानि है? कारण कि संसार के सभी प्राणी सुख को ही प्राप्त करना चाहते हैं। संसार में ऐसी क्या खराबी है? जिससे कि संत पुरुष उसके नाश करने के लिए प्रयत्न किया करते हैं? इस विषय में आचार्य कहते हैं- हे वत्स सुनो |
विपद्भवपदावर्ते पदिकेवातिवाह्यते । यावत्तावद्भवन्त्यन्याः प्रचुराः विपदः पुरः ॥12॥
पद्यानुवाद
भरे रीतते कुछ भरते घट, तब तक यह क्रम चलता है,
घटी-यन्त्र का परिभ्रमण वह, जब तक रहता चलता है।
इसी भाँति भवसागर में भी, एक आपदा टलती है,
कई आपदायें आ सन्मुख, मोही जन को छलती हैं ॥12॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 12
विवेचना
घटीयंत्र जिसे रहट बोलते हैं, उसमें डिब्बे होते हैं। उनकी एक माला बनी रहती है, जिसे बैलों से, मशीन से या नौकरों से चलाया जाता है। वह जब घूमता है तो घूमने से डिब्बे भरते जाते हैं और खाली होते जाते हैं। इसी प्रकार संसारी प्राणी एक विपत्ति को लाँघता है तो पाँच सौ विपत्तियाँ आकर के खड़ी हो जाती हैं। गर्मी गई, कि सर्दी आ गई, गर्मी में स्वेटर अंदर रख दी जाती है, ठंड में वे ही बाहर आ जाती हैं। ठंड में कूलर, पंखा का प्रयोग बन्द हो जाता है। उकावली चालू हो जाती है, ऐसे ही जीवन में साता जाती है, तो असाता आ जाती है और असाता जाती है तो साता आ जाती है। जिंदगी ऐसे ही निकलती जा रही है-
सूरज चाँद छिपे, निकले ऋतु फिर-फिर कर आवे। प्यारी आयु ऐसी बीते, पता नहीं पावै ॥ १/४ ॥
(मंगतराय कृत बारह भावना)
छह ऋतुयें में तीन मौसम आते हैं और वर्ष निकल जाता है। दूसरे वर्ष में भी इसी प्रकार से मौसम आ जाते हैं। जीवन के आदि से लेकर अन्त तक वे सभी मौसम बने रहते हैं। वर्ष रहेंगे, अयन रहेंगे, ऋतुयें रहेंगी, मास रहेंगे, पक्ष रहेंगे, वार रहेंगे, सोलह तिथियाँ रहेंगी, रात-दिन रहेंगे, बस इसी में जीवन समाप्त हो जायेगा। आपत्तियाँ टलती नहीं, रात-दिन आदि मौसम के समान कोई न कोई आपत्तियाँ बनी ही रहती हैं। उनको टालने टालने के प्रयास में ही यह संसारी प्राणी जिन्दगी के अथ से इति की ओर पहुँच जाता है। एक दिन राम नाम सत्य हो जाता है, अब क्या होगा ? यहाँ से कहीं दूसरे स्थान पर जाना होगा, वहाँ पहुँचने पर उसका संसार पुनः प्रारम्भ हो जाता है और वहाँ पर पुनः हाय-तौबा होना प्रारम्भ हो जाता है। कुछ दिन के लिए वहाँ पर रोना-धोना चलता है, फिर सब भूल जाते हैं। तुम्हारे रोने से उस पर कोई असर नहीं होता, फिर भी लोगों को कुछ समझ नहीं आता। किसी के शरीर पर एक बूँद शहद की मिल जाती तो पाँच सौ मक्खियाँ उसे काट लेती हैं। वह मूच्छित हो जाता है। उस व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाता है। फिर क्षणिक जीवन को अमरता प्रदान करने का प्रयास करता है। यह उसका सम्यक् प्रयास नहीं है।
राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति हमेशा बहुत आनन्द व शान्ति से रहते होंगे, ऐसा एकान्त नहीं है। किन्तु सबसे ज्यादा आपत्तियाँ उनके साथ होती हैं। आप लोग तो आठ घण्टे काम करके मुक्त हो जाते हैं, लेकिन वे तो चौबीस घंटे व्यस्त रहते हैं। फोन पर फोन आते रहते हैं। रात के बारह बजे या दिन के दो बजे भी समाचार आते रहते हैं, समस्या के रूप में समाचार आते रहते हैं। उनको सुलझाने में वे हमेशा व्यस्त रहते हैं। ऊपर से सुख शान्ति दिखती है। जैसे ऊपर से तो पंखा चल रहा हो और इधर से लू आ रही है तो पंखे की ठण्डी हवा भी लू में परिवर्तित हो जाती है। कभी- कभी आप लोग ही कहते हैं कि अभी पंखा मत चलाओ, पंखा बन्द कर दो। क्यों? क्या बात हो गई ? तो कहते हैं कि पंखा चलाने से क्या लाभ, हवा तो गर्म आ रही है। यह तो बाहर की प्रकृति प्रदत्त गर्मी या लू की बात है, लेकिन जब मस्तिष्क में गर्मी आ जाती है तो कहना ही क्या ? बाहर से ठण्डा ठण्डा बर्फ भी लगा दो तो वह भी गर्म हो जाता है, वह भी पिघल जाता है, लेकिन भीतरी गर्मी शान्त नहीं होती।
आत्मा में जब तक संकल्प-विकल्प या उत्तेजक विचार चलते रहते हैं तो बाहर में कितने भी शीतोपचार कर दो तो भी कुछ नहीं होता। उसको अच्छे वचन सुनाओ, अच्छा ठण्डा ठण्डा पानी पिलाओ, ठण्डाई पिलाओ, आइसक्रीम खिलाओ, शीत उपचार, वैय्यावृत्ति आदि कुछ भी करो, कुछ नहीं होगा क्योंकि उसके मन में संकल्प-विकल्पों की गर्मी है। इसलिए वह तपता ही रहता है। हवादार भवन में भी उसे पीड़ा का अनुभव होता है, उसका उपयोग पीड़ा की ओर ही जाता है, भवन, शीत-उपचार या सुख सुविधा की ओर नहीं। इसी प्रकार आत्मा में ज्ञान है, सुख है, शान्ति है, सब कुछ है लेकिन उसे न जानकर अन्य वस्तुओं को ही जानने में, परखने में लगा रहता है। अन्यत्र सुख या दुःख के क्षेत्र में जब मन लगा रहता है तो सुख-दुःख को उत्पन्न करने वाले कर्म भी बन्धते रहते हैं, जिनका फल भी कभी सुख रूप होता है तो कभी दुःख रूप होता है। ऐसी स्थिति में इसी क्षेत्र में कर्ता, कर्म, क्रिया का व्यवहार चलता रहता है। भीतरी आत्मतत्त्व में/अध्यात्म के क्षेत्र में उपयोग का व्यापार नहीं चलता क्योंकि भीतरी आत्मतत्त्व में पञ्चेन्द्रिय के विषय नहीं मिलते इसलिए ज्ञान के माध्यम से बाहरी तत्त्व का अवलोकन करता रहता है। फिर उसमें राग-द्वेष भी करता रहता है, यही अज्ञान है। इसी अज्ञान के कारण जब तक एक विपत्ति टलती है, तब तक सामने अनेक विपत्तियाँ उपस्थित हो जाती हैं। ऐसा कभी नहीं समझना कि यहाँ एक न एक दिन कभी तो शांति के साथ विपत्ति रहित जीवन का अनुभव कर पायेंगे।
आज कौन सा काल चल रहा है? पंचम काल जिसका नाम दुःखमा काल है, फिर कलिकाल तो है ही। संस्कृत में कलि का अर्थ-झगड़ा, संघर्ष, कलह होता है। जब काल ही दुःखमा है तो सुख कैसे मिलेगा ? अर्थात् इस काल में दुःखों की कष्टों की क्षति या पूर्ण रूप से अभाव कैसे हो सकेगा ? दुःखमा काल में शारीरिक या मानसिक कोई भी दुःख कष्ट होता है वह सहन करने योग्य होता है, लेकिन जिस दिन से असहनीय दुःख मिलना प्रारम्भ हो जायेंगे तो समझो उस दिन से दुःखमा काल की समाप्ति हो जायेगी, फिर दुःखमादुःखमा काल आ जायेगा। जैसे नरकों में हमेशा दुःख ही दुःख मिलते हैं वैसे ही दुःखमा-दुःखमा काल में भी यहाँ पर असहनीय दुःख मिलता है। उस समय मनुष्यों की संख्या बहुत कम रह जाती है। यहाँ तक कि बहत्तर जोड़ों को सुरक्षित रखा जाता है। जो तिर्यञ्च होते हैं वे भी दुःख ही दुःख का अनुभव करते हैं। प्रायः नीचे नरक से आते हैं और नीचे नरक में ही चले जाते हैं।
दुःखमा काल संध्याकाल के समान है। संध्याकाल में तो कुछ दिखता है किन्तु रात्रि को कुछ दिखता नहीं है। दुःखमा-दुःखमा काल रात्रि के समान है जिसमें धर्म नाम की कोई वस्तु नहीं दिखती। अतः इस पञ्चम काल में हम थोड़े दुःख से बच सकते हैं। आज नारकी जीवों जैसा दुःख तो नहीं है क्योंकि जब तक असि-मसि कृषि आदि आजीविका के साधन रहते हैं, तब तक यहाँ सुख की सामग्री मिलती रहती है, लेकिन छठवें काल में असि, मसि आदि षट्कर्म समाप्त हो जाते हैं। विद्या, शिल्प आदि सब समाप्त हो जाते हैं। मकान आदि समाप्त हो जाते हैं, तब व्यक्ति वृक्षों के ऊपर रहेंगे या बिलों में घुसकर रहेंगे। रात में मिट्टी खायेंगे और लड़-भिड़कर मरेंगे और दूसरों को मारेंगे। मांस-भक्षण करेंगे। इस काल में हमेशा-हमेशा अति दुःख ही दुःख रहता है। अभी इस काल की बहुत गनीमत है अर्थात् इस काल का बड़ा उपकार है आप लोगों पर, कि अभी इतना दुःख नहीं है। छठवें काल में तो हँसने का भी समय नहीं मिलेगा। हमें तो ऐसा लगता है कि उस काल में हंसने वाली कोई मुद्रा ही नहीं दिखेगी। अभी तो हंसने वाले बहुत लोग मिल जाते हैं, उस समय साता का उदय बहुत कम रहेगा। उस समय यहाँ धर्म-कर्म कुछ भी नहीं रहेगा। आज इतना रोना नहीं है जितना उस काल में रहेगा। इसलिए अभी थोड़ा रो करके शान्ति रख करके सुख प्राप्ति का प्रयास करना चाहिए। कम से कम इस काल में सुख प्राप्ति के साधन तो उपलब्ध हैं। भले ही पूर्ण सुख की प्राप्ति न हो फिर भी एक प्रकार से पञ्चम काल अपने लिए अच्छा है। अभी यहाँ दुःख से थोड़ा बचकर सुख सम्पादन के साधन तो जुटाये जा सकते हैं। यह बात अलग है कि पूर्ण सुख का सम्पादन नहीं किया जा सकता। आत्मिक सुख प्राप्ति का भी आंशिक सम्पादन किया जा सकता है। इसलिए दुःखमा-दुःखमा काल आने के पहले ही ‘अरिहन्त सिद्ध’ भजो, भले ही रोते-रोते भजो, कोई बात नहीं। अब आगे ऐसा काल आने वाला नहीं है कि जिसमें हम शांति के साथ बैठ सकें और ‘अरिहंत-सिद्ध’ करके आत्महित कर सकें। पुण्य कमा सकें। अतः इस काल में अभी अरिहंत-सिद्ध करके कुछ पुण्य कमा लो, जिससे छठवें काल में यहाँ न रहना पड़े। तब तक अन्य किसी क्षेत्र में रहकर समय पास करके, बाद में यहाँ आकर रत्नत्रय की आराधना कर सकते हैं। एक सौ सत्तर कर्म भूमियाँ हैं। पाँच भरत, पाँच ऐरावत इन दस क्षेत्रों में यह पंचम काल स्थित है शेष एक सौ साठ भूमियों में हमेशा दुःखमा सुखमा काल चलता है, ये सभी भूमियाँ सुरक्षित हैं। इन भूमियों में यहाँ जैसा विपदाओं का चक्र नहीं होता।
जैसे प्रथम कक्षा में बहुत सरल शिक्षण रहता है, दूसरी कक्षा में पहुँचता है तो किताबें बढ़ जाती हैं, विषय भी बढ़ जाते हैं। शिक्षक के कहने पर गृह कार्य अर्थात् घर में शिक्षण का अभ्यास बढ़ाकर विद्यार्थी आगे-आगे की कक्षा में बढ़ते जाते हैं तो पीछे-पीछे की कक्षा सरल लगती है। प्रतिभासम्पन्न विद्यार्थी से कहा जाता है कि इतना अध्ययन करने की क्या आवश्यकता है? तुम तो अपने आप ही पास हो जाओगे। तुम्हारे पास बहुत प्रतिभा है। लेकिन विषय इतने अधिक बढ़ते जा रहे हैं कि विद्यार्थी यदि 365 दिन भी अध्ययन करे तो भी समय कम पड़ता है। फिर भी कुछ विद्यार्थी अपना समय सोते सोते निकाल देते हैं, लेकिन जब परीक्षा सामने आती है तो उनको लगता है कि प्रश्न पत्र में जो आया है वह तो कोर्स में था ही नहीं, फिर परीक्षा में कैसे आ गया ? साथ ही मास्टर के प्रति सोचते हैं कि तुम पास करवा दो, नहीं तो आपकी छुट्टी करवा देंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसे-जैसे विषय बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे दुःख कष्ट का अनुभव भी बढ़ता जाता है। उसी प्रकार जैसे-जैसे पञ्चेन्द्रियों के विषय बढ़ते जाते हैं तो उनका संवर्द्धन, संरक्षण आदि भी बढ़ता जाता है, उसमें तत्सम्बन्धी विपत्तियों का भी संवर्द्धन होता जाता है और उनका सामना करने हेतु दुःख की भी वृद्धि होती चली जाती है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 12
इष्टोपदेश गाथा 12 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (भव-पदावर्ते) संसार रूपी पैर से चलने वाले घटीयंत्र में (पदिका इव) रहट के डण्डे के समान (यावत्) जब तक (विपद्) एक विपत्ति (अतिवाह्यते) समाप्त की जाती है (तावत्) तब तक (अन्यः प्रचुराः) दूसरी बहुत सी (विपदः) विपत्तियाँ (पुरः भवन्ति) सामने आ खड़ी हो जाती हैं।
भावार्थ – संसार रूपी घटीयंत्र में (कुँए से पानी निकालने का, रहट में) पैर से चलाने वाले घटीयंत्र के डंड़े के समान, जबतक शारीरिक, मानसिक और आगन्तुक रूप किसी एक विपत्ति को समाप्त किया जाता है-तब तक दूसरी प्रचुर विपत्तियाँ सामने आ जाती हैं अर्थात् रहट द्वारा कुँए से पानी निकालते समय पैर से डण्डे को दबाकर एक बर्तन रिक्त (खाली) किया जाता है, उतने में अनेक दूसरे पानी से भरे बर्तन सामने आ जाते हैं। उसी प्रकार संसाररूपी कुँए से एक दुष्कर्म का फल रूप विपत्ति का भोग किया जाता है, इतने में अनेक भूख, प्यास आदि विपत्तियाँ सामने (कर्म का उदय ) आ जाती हैं। संसार विपत्तियों तथा आकुलताओं का भण्डार है।
उत्थानिका – फिर शिष्य का कहना है भगवन्! सभी संसारी तो विपत्ति वाले नहीं हैं। बहुत से सम्पत्ति वाले भी देखने में आते हैं। इसके विषय में आचार्य कहते हैं- गाथा 13
स्वाध्याय गाथा सं 11 & 12
स्वाध्याय गाथा सं 12 & 13
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 12
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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