आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर भावना करने वाला सोचता है कि पुद्गल शरीरादिकरूपी मूर्तद्रव्य के साथ जीव का सम्बन्ध है। उस सम्बन्ध के कारण ही जीव का मरण व रोगादिक होते हैं तथा मरणादि सम्बन्धी बाधाएँ भी होती हैं। तब इन्हें कैसे व किस भावना से हटाया जावे ? वह भावना करने वाला स्वयं ही समाधान कर लेता है कि-
न मे मृत्यु: कुतो भीतिर्न मे व्याधि: कुतो व्यथा नाहं बालो न वृद्धोऽहं, न युवैतानि पुद्गले ॥29॥
अन्वयार्थ (मे) मेरी (मृत्युः न) मृत्यु नहीं होती [इस कारण] (भीतिः) भय (कुतः) किससे (हो सकता है?) (मे) मुझे (व्याधिः न) कोई रोग नहीं होता [इसलिए] (कुतः व्यथा) दुःख किससे (हो सकता है?) (अहम्) मैं (बालः न) बालक नहीं हूँ (वृद्धः न) बूढ़ा नहीं हूँ (युवा न) युवा नहीं हूँ (एतानि) ये सब बातें (स्थितियाँ) (पुद्गले) पौगलिक शरीर में होती हैं।
पद्यानुवाद
जवान नहीं हूँ (एतानि) ये सब अवस्थायें (पुद्गले) पौद्गलिक शरीर में होती हैं।
मरण नहीं है मेरा मुझको, कहाँ भीति हो? किससे हो?
व्याधि नहीं है मुझमें, मुझको, वृथा व्यथा फिर किससे हो?
बाल नहीं हूँ, युवा नहीं हूँ, वृद्ध नहीं हूँ ज्ञात-रहे, ये पुद्गल की रहीं दशायें, चेतन मेरा साथ रहे ॥२९॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 29
विवेचना
जन्म, मृत्यु, रोग, बुढ़ापा आदि जितनी भी परिस्थितियाँ हैं, वे सभी पुद्गल की हैं, पुद्गल में हैं, पुद्गल की वजह से हैं। क्या कहा है? “न मे मृत्यु” मेरा मरण नहीं है, इसमें श्रद्धा रखना चाहिए। मैं मर जाऊँगा तो क्या होगा? आचार्य कहते हैं ऐसे ही जीते रहोगे तो भी क्या होगा? जीने की क्या करामात कर रहे हो? कहाँ जी रहे थे? कैसे जीना चाहिए और कैसे जी रहे हो ? अतः मेरा मरण नहीं है, ऐसा भाव प्रत्येक धर्मात्मा के मन में हमेशा उद्भुत रहना चाहिए। फिर किसका मरण होता है? ऐसा प्रश्न आये तो विचार करना कि जिसका मरण होता है उससे मुझे किसी बात का दुःख नहीं और भय भी नहीं। लेकिन मोही संसारी प्राणी को सबसे बड़ा यदि भय है तो मृत्यु का है। जिसको कोई रोग नहीं, कोई समस्या नहीं, कोई तनाव नहीं, सम्पदा आदि भी सब कुछ है उसे यदि यह बता दिया जाये कि तुम्हारा मरण निकट है तो निकट का नाम सुनते ही बड़ी विकट समस्या खड़ी हो जाती है और उस समस्या की उलझन में एकदम या अकाल में मृत्यु की गोद में चला जाता है। मरण की कारणभूत वस्तुओं के समागम से ही वह डरने लगता है, कांपने लगता है। जैसे आप यहाँ सुरक्षित बैठे हैं और मान लीजिए कोई यहाँ भयानक सर्प के आने की बात कर दे तो आपका विचार आगे पहुँच जाता है कि सर्प काट देता है तो मृत्यु हो जाती है, मृत्यु हो या न हो लेकिन सर्प काट जायेगा तो मृत्यु निश्चित है, ऐसी जो धारणा बनी हुई है वह भयभीत कर देती है।
सर्प से इतना भय कि नाम सुनते ही आप चिन्तित एवं भयभीत हो जाते हैं। लेकिन ” मोह को आज तक किसी ने सर्प नहीं माना जबकि वह प्रत्येक समय जीव को काट रहा है।” राग-द्वेष को, क्रोध, मान आदि कषाय को किसी ने सर्प माना ही नहीं। जिसने उन्हें सर्प माना वे उनसे बच गये और भवसागर से तर गये। ऐसा विचार करना चाहिए कि सर्प भी हम और आप जैसा ही एक जीव है उससे क्या डरना। ध्यान रखो। जब तक मृत्यु से भीति होती है तब तक मृत्यु से मुक्ति नहीं मिल सकती। मृत्यु से डरने मात्र से मृत्यु छूट जाये और चाहने मात्र से मोक्ष मिल जाये यह तीन काल में संभव नहीं। जैसा कि आचार्य समन्तभद्र स्वामी जी ने सुपार्श्वनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए स्वयंभूस्तोत्र में कहा है-
बिभेति मृत्योर्न ततोऽस्ति मोक्षो। नित्यं शिवं वांछति नास्य लाभः ॥७/३४॥
रहस्य समझो, कि मृत्यु से डरने मात्र से मुक्ति नहीं मिल सकती और चाहने मात्र से सुख या शिव नहीं मिल सकता।
यह जन्म-मरण-जरा अर्थात् बुढ़ापा आना, मर जाना, फिर उत्पन्न होना, ये शरीर के परिवर्तन हैं। इनके होने में सुव्यवस्थित कर्म का उदय रहता है। उसके द्वारा ही सब कार्यक्रम होता रहता है, किन्तु यह होता ही रहेगा ऐसा नहीं। इसे समाप्त भी किया जा सकता है। इस जीव को आज तक एक समय के लिए भी आयु कर्म का अभाव नहीं हुआ। जिस समय आयुकर्म का अभाव हो जायेगा तो मुक्ति निश्चित है क्योंकि आयु कर्म के पूर्णतः अभाव होने पर ही मुक्ति होती है। आयु भी एक प्राण है दस प्राणों में से, पाँच इन्द्रिय प्राण छूट गये, तीन बल प्राण छूट गये, श्वासोच्छ्वास भी छूट गया, चौदहवें गुणस्थान में मात्र एक आयु प्राण रह जाता है, उसका अभाव होते ही मुक्ति होती है। जिसको जिस भव में मुक्ति मिलना है उसके उस भव में एक भुज्यमान आयु के अतिरिक्त सत्ता में कोई दूसरी आयु का अस्तित्व नहीं रहता। आप लोगों की भव से भवान्तर की यात्रा पूर्ण प्रबन्ध के साथ चलती है। गाड़ी आगे ले जाने वाले पेट्रोल का प्रबन्ध करके ही चलते हैं और उस प्रबन्ध के करने को आप कितने सावधान रहते हैं? चाहे चींटी हो, हाथी हो, नारकी हो, देव हो, मनुष्य हो कोई भी हो यहाँ तक कि निगोदिया जीव को भी मरण करना है तो वह भी आयुकर्म का प्रबन्ध करके चलता है। तीन सौ तैंतालीस राजू प्रमाण तीनों लोक क्षेत्र में पेट्रोल टैंक खुले हैं, जो हमेशा चौबीसों घण्टे खुले रहते हैं। जिस समय जहाँ पर रहकर जो भी इस पेट्रोल का प्रबन्ध करना चाहे, वहीं पर कर सकते हैं और अपनी जीवन रूपी गाड़ी को आगे बढ़ाकर ले जा सकते हैं। इस प्रकार निगोदिया जीव से लेकर सप्तम गुणस्थानवर्ती मुनि महाराजों तक के लिए प्रबन्ध मिल सकता है। इसके आगे के गुणस्थानों में आयुकर्म बन्धरूपी पेट्रोल लेने की आवश्यकता नहीं होती। उपशम श्रेणी वालों को आवश्यकता होती है तो उनको या तो पेट्रोल पहले से प्रबंधित रहता है अथवा नीचे छटवें-सातवें गुणस्थान में आकर या और नीचे आकर पेट्रोल की व्यवस्था करते हैं। यदि वे तद्भव मोक्षगामी होते हैं, तो क्षपक श्रेणी चढ़कर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। अतः नवीन पेट्रोल के प्रबन्ध की आवश्यकता ही नहीं होती।
तीन लोक में आप कहीं भी चले जाओ कर्मबन्ध की व्यवस्था एक समय के लिए भी नहीं रुकती, लेकिन यदि आप वीतरागता को अपनाओगे तो संभवतः कर्म काँप सकता है, कर्म को पसीना आ सकता है अर्थात् कर्मबन्ध की प्रक्रिया रुक सकती है। जैसे-जैसे आपकी वीतरागता बढ़ती जायेगी वैसे-वैसे कर्म भी पसीजते जायेंगे और एक दिन निश्चित ही कर्मों से मुक्ति मिल जायेगी।
जिस प्रकार रोगी के रोग को देखकर परिवार के लोग डर जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, उसकी सेवा वैय्यावृत्ति में लग जाते हैं। यदि स्वयं असमर्थ हों तो हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया जाता है, डॉ. सा. देखते हैं। वे भी चिन्तित हो जाते हैं और कह देते हैं कि बस अब यह एक घण्टे का मेहमान है, ऐसा सुनते ही आपकी आँखों में पानी आ जाता है। किन्तु आपकी आँखों में आँसू मात्र आ जाने से रोगी को बचाया नहीं जा सकता। उसी प्रकार कर्म के क्षेत्र में सोचो कि रोने मात्र से कर्म बन्ध रुकने वाला नहीं है। बल्कि कर्म क्या है? यह कौन-सा कर्म है? क्यों बंधा है? कैसे बंधा है? बन्ध का कारण क्या है? इससे दूर होने के कारण क्या हैं? यह कर्म दूर हो सकता है या नहीं? इन सभी प्रश्नों के बारे में अगर हम गहनता से विचार करें तो पायेंगे कि मृत्यु आयु कर्म के समाप्त होने की प्रक्रिया मात्र है। इसलिए मृत्यु कोई भयकारी चीज नहीं है, यह श्रद्धान करके मुमुक्षु कहता है कि-
“न मे मृत्युः कुतो भीतिः ” जब मैं मर नहीं सकता तो डर किस बात का ? “न मे व्याधिः कुतो व्यथा” अर्थात् मेरे पास कोई रोग नहीं है फिर व्यथा या दुःख किस बात का ? प्रत्येक प्राणी सोचता है कि मैं अपनी व्यथा किसको सुनाऊँ? कोई सुनने वाला भी नहीं है। केवली भगवान् भी यदि सुनें तो इतनी अधिक व्यथा को सुनते-सुनते वे थक जायेंगे। जबकि केवली भगवान् को सुनने की आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि उन्हें तो सब देखने जानने में आ रहा है कि अंउपको कितनी व्यथा है? आपकी दृष्टि में तो कुछ भी नहीं आता। अपने जन्म को भी आप नहीं देख पाते क्योंकि जन्म के समय आँखें बन्द रहती हैं और अपने मरण को भी नहीं देख पाते क्योंकि मरण के पहले ही आँखें बन्द हो जाती हैं, फिर भी कहते हो कि क्या करें? हमारी व्यथा को कौन सुनने वाला है? भगवान् को सुनाने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि आप तो अपना एक ही जीवन का परिचय बता रहे हैं। लेकिन भगवान् के पास तो आपकी अनन्तकाल की पर्ची है। शरीर में व्याधि होना यह शरीर की दशा का परिवर्तन मात्र है। प्रत्येक पदार्थ परिणमनशील है। उसको जानो, देखो, समझो, तो निष्कर्ष यह होगा कि यह कोई व्याधि नहीं है। शरीर में व्याधि होना शरीर का परिवर्तन है आत्मा में कोई व्याधि नहीं होती। आत्मा में यदि कोई व्याधि है तो वह है राग, द्वेष, मोह। इनसे आत्म- स्वरूप को पृथक् जानो देखो। राग, द्वेष, मोह भी कर्मोदयजन्य अवस्था है आत्मा का स्वरूप नहीं है, यह वास्तविकता समझ में आयेगी। फलतः मृत्यु, व्याधि या जन्म के कष्ट का अनुभव नहीं होगा वरन् उनमें समता बनी रहेगी।
शरीर में व्याधि, दुःख, पीड़ा जो भी होते हैं, उस समय भेदविज्ञान का प्रयोग करना चाहिए। भेदविज्ञान क्या है? आचार्य कहते हैं सम्यग्ज्ञान का नाम भेदविज्ञान है। पर को पर के रूप में स्व को स्व के रूप में स्वीकार करने का नाम भी भेदविज्ञान है। शरीर एवं शरीरजन्य व्याधियों से भिन्न अपने चैतन्य आत्मतत्त्व को देखने का नाम भी भेदविज्ञान है। जब भेदविज्ञान होता है उस समय मुमुक्षु को वस्तु स्थिति का सम्यक् परिचय प्राप्त होता है फलतः आनन्द की अनुभूति भी होती है। उसे भेदविज्ञान के बल पर यह ज्ञात होता है कि अरे! मैं तो अपने रोगों से इतना अधिक परेशान था, दुःखी था, पीड़ित था लेकिन जब मैंने यह समझा कि मैं तो एक स्वस्थ आत्मतत्त्व हूँ। रोग, व्याधि आदि तो शरीर जन्य परिवर्तन हैं। तब से मैंने सोच लिया कि रोग होने पर व्यथा मानने की आवश्यकता ही नहीं है। अतः मुमुक्षु को हमेशा शरीर और आत्मा पृथक् पृथक् देखने व अनुभव करने का अभ्यास करना चाहिए। इस भेदविज्ञान का अभ्यास होने के उपरान्त मुमुक्षु को देह में व्याधि होने पर पीड़ा अनुभूत नहीं होती, देह की क्षीणता होने पर दुःख नहीं होता।
प्रारंभिक अवस्था में साधक को भेदविज्ञान का अभ्यास कराया जाता है कि मैं बालक नहीं हूँ, वृद्ध नहीं हूँ, मैं तो ज्ञाता-दृष्टा स्वभाव वाला चैतन्य शक्ति युक्त आत्म-तत्त्व हूँ। जिसका यह अभ्यास मजबूत हो जाता है, दृढ़ हो जाता है फिर उसे समझाने की या अभ्यास कराने की आवश्यकता नहीं होती। जैसे कि जिसकी जठराग्नि मन्द होती है तो उसे कहना पड़ता है कि यह खाओ, वह खाओ, नपा-तुला खाओ, पथ्य का सेवन करो, तला हुआ मत खाओ आदि। लेकिन जिसकी जठराग्नि तीव्र होती है उसे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं होती। क्षमता के अनुसार, शक्ति के अनुसार विवेक का ध्यान रखते हुए कार्य किया जाता है तो सफलता प्राप्त होती है। भेदविज्ञान के अभ्यास में भी क्षमता, शक्ति एवं विवेक का ख्याल रखना आवश्यक होता है।
अभ्यास को दृढ़ बनाने के लिए बार-बार भावनाओं की जरूरत होती है। जैसे विद्यार्थी को शुरूआत में स्कूल प्रवेश के समय उसके हाथ में एक स्लेट पेन्सिल, पुस्तक और कलम आदि रखने को एक बस्ता दिया जाता है। अध्यापक विद्यार्थी को पहले पुस्तक से ‘अ-आ’ पढ़ाता है। जिससे उसके मस्तिष्क में ‘अ-आ’ के पहचान का संस्कार बनता है। फिर इसके उपरान्त ‘अ-आ’ हाथ में भी आ जाये अर्थात् पढ़ने के साथ-साथ लिखने में भी आ जाये तो उसे स्लेट पर ‘अ-आ’ लिखने का अभ्यास कराता है। जैसा शिक्षक ने स्लेट पर लिखकर दिया उसी पर विद्यार्थी को बार- बार लिखवाया जाता है। इसके उपरान्त उससे अलग से ‘अ-आ’ अनेक बार लिखने को कहा जाता है, जब वह स्वयं बिना देखे स्लेट को पूरी लिखकर भर देता है तब उसके हाथ में भी ‘अ-आ’ आ जाता है। इसे अभ्यास कहते हैं। लेकिन यह अभ्यास तभी तक कराया जाता है जब तक कि वह अभ्यस्त न हो जाये। उसका प्रत्यय अर्थात् ज्ञान जब मजबूत हो जाता है तो अभ्यास की कोई आवश्यकता नहीं रहती। जिस समय अभ्यास करवाया जाता है उस समय यदि विद्यार्थी यह सोच ले कि इसमें क्या रक्खा है? क्या होता है ‘अ-आ’ सीखने का अभ्यास करने से ? बडे हो जायेंगे तो अपने आप सीख जायेंगे। बड़े होने पर बड़ी-बड़ी पुस्तकें स्वतः ही पढ़ लेंगे जैसे पिता जी पढ़ लेते हैं। लेकिन उसका ऐसा सोचना उचित नहीं है। बल्कि उसे यह बताना चाहिए कि तुम्हारे पिता जी ने भी, जब वे छोटे थे तब ऐसे ही अक्षरों को सीखने का अभ्यास किया था। इससे उसका सीखने का, पढ़ने का, लिखने का अभ्यास उत्साहपूर्वक बढ़ सकता है।
अभ्यास के प्रयोग ऐसे ही होते हैं। इसी प्रकार भेदविज्ञान के अभ्यास के प्रयोग को भी मजबूत बनाओ। जिसका भेदविज्ञान मजबूत होता है उसका ध्यान का अभ्यास भी दृढ़ होता चला जाता है। बिना भेदविज्ञान के ध्यान में एकाग्रता नहीं आती और एकाग्रता नहीं होने से ध्यान में बैठते ही घड़ी की ओर ध्यान जाता है। लगता है कि कब का बैठा हूँ ध्यान में, सामायिक में अभी तक स्वाध्याय की घण्टी नहीं लग रही है, क्या बात हो गई अभी तीन नहीं बजे क्या? इस प्रकार की विकल्पात्मक मनः स्थिति रहती है, लेकिन भेदविज्ञान के बल पर जो ध्यान में अभ्यस्त हो जाता है उसे इस प्रकार के विकल्प ही नहीं आते कि कितने बज गये, घण्टी लगी या नहीं, स्वाध्याय का समय हुआ या नहीं इत्यादि। जिसका ध्यान में मन नहीं लगता वह जितनी भी देर बैठता है केवल समय काटता है, लेकिन जिसका मन ध्यान में अच्छा लगता है वह जितनी भी देर ध्यान करता है कर्म काटता है अर्थात् कर्म निर्जरा करता है।
ध्यान की बात भेदविज्ञान के अभ्यास से सीख लेना चाहिए। अपने जीवन के आदि से लेकर अन्त तक कितना भी शब्द-ज्ञान करो उसमें उतना आनन्द नहीं आता जितना एक बार भेदविज्ञान होने पर आता है क्योंकि भेदविज्ञान प्रयोगात्मक है जबकि ज्ञान सैद्धांतिक है। भेदविज्ञान के प्रयोग से एक दिन में जितना आनन्द आता है उतना आनन्द जीवन भर पढ़ते-पढ़ते भी नहीं आ पाता। एक अक्षर का भी ज्ञान न हो लेकिन भेदविज्ञान मजबूत है तो केवलज्ञान हो सकता है। इसलिए भेदविज्ञान को मजबूत बनाओ और विचार करो कि “नाहं बालो न वृद्धोऽहं” अर्थात् मैं बालक नहीं हूँ, मैं वृद्ध नहीं हूँ “न युवैतानि पुद्गले” न मैं युवक हूँ किन्तु ये सभी पुद्गलात्मक शरीर की दशायें हैं। क्या आपने कभी सोचा कि मैं बालक नहीं हूँ, वृद्ध नहीं हूँ ये तो सब शरीर में होने वाली अवस्थायें हैं। शरीर नोकर्म रूप है। इसका परिणमन शरीरनामकर्म एवं गतिनामकर्म के उदयानुसार होता है। गतिनामकर्म जीवविपाकी कर्म है। वेदकर्म भी जीवविपाकी कर्म है। इनके उदय में जीव अपने आपको पुरुष या स्त्री रूप में महसूस करता है। जीवविपाकी कर्म जब उदय में आते हैं तो तन्मयता के साथ उनका अनुभव होता है। मनुष्य, तिर्यंच, देव और नरकगतिनामकर्म के उदय में जीव अपने आपको मनुष्य, तिर्यंच, देव और नारकी के रूप में अनुभव करता है, क्योंकि इनका फल जीव में मिलता है। वैसे तो सभी कर्मों का फल जीव को ही मिलता है, लेकिन किन्हीं कर्मों के फल में क्षेत्र निमित्त बनता है, किन्हीं में पुद्गल निमित्त बनता है, किन्हीं में भव निमित्त बनता है। सभी घातिया कर्म जीव विपाकी हैं। इन सभी में भी मोहनीय कर्म से हटकर जब आत्म-तत्त्व का चिन्तन करते हैं तो जीव का समीचीन स्वरूप समझ में आता है कि जीव न मनुष्य रूप है, न तिर्यंच, न देव रूप है, न नारकी स्वरूप, जीव तो ज्ञाता दृष्टा स्वभाव वाला है।
सनातन शाश्वत जो द्रव्य है उसकी ओर दृष्टि नहीं रहने से यह जीव पर्यायों में मूढ़दृष्टि को प्राप्त होता है। बालक, प्रौढ, वृद्ध ये तीनों अवस्थायें जीव द्रव्य की पर्यायें हैं, जो शाश्वत नहीं होती किन्तु विनश्वर होती हैं। अपने आपको बालक, युवा, वृद्ध स्वरूप समझना द्रव्यदृष्टि नहीं है किन्तु पर्यायबुद्धि है। मोहनीय कर्म से प्रभावित होकर जीव इन पर्यायों में ही घुल-मिल कर रहता है और मकड़ी की भाँति स्वयं अपने कर्मबन्धन का जाल बुनता है और उसी में फँस जाता है। बारहसिंघा तिर्यंचगति का जीव है, उसके बारह सींग होते हैं। जब वह झाड़ियों के बीच में घास-फूस खाने चला जाता है और वहाँ से कुछ पत्ते खाने को जब अपना मुख झाड़ियों के अंदर करता है तब उसमें एक सींग फँस जाता है। उसे निकालने का प्रयास करते-करते उसके शेष सींग झाड़ी में फँसते चले जाते हैं। अन्त में वहीं पर उसकी मृत्यु भी हो जाती है। चूँकि उसके सींग टेड़े-मेड़े रहते हैं, इसलिए जल्दी फँस जाते हैं, सीधे हों तो फँसने की संभावना नहीं रहती। इसी प्रकार पहले पति-पत्नि फिर धीरे-धीरे चौपाये, छैपाये फिर अष्टापद फिर बारहसिंगा इत्यादि अवस्थायें होती रहती हैं। इनमें यह जीव ऐसा फँस जाता है कि निकलना चाहे और प्रयास करे तो भी निकल नहीं पाता बल्कि उसी में फंसता जाता है। जैसे-जैसे परिवार में सदस्यों की संख्या बढ़ती जाती है वैसे-वैसे वह परिषद् जैसी बन जाती है। फिर वह परिषद् परीषह जैसे कष्ट देने लग जाती है। इसलिए आचार्य कहते हैं कि- ऐसे जाल क्यों बुनते हो, जिसमें हमें स्वयं को ही फंसना पड़ता है। इससे यदि मुक्ति चाहते हो तो, भेदविज्ञान की बात को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
जिसके पास भेदविज्ञान होता है वह व्यक्ति पर द्रव्य के साथ कर्तृत्व, भोक्तृत्व और स्वामित्व बुद्धि नहीं रखता फलतः वह पर द्रव्य का कर्ता, भोक्ता, स्वामी कुछ भी नहीं होता। जैसे कि-नाती का आनन्द दादा जी को नहीं आ सकता, दादाजी का आनन्द नाती को नहीं आ सकता। पिता का आनन्द पुत्र को नहीं और पुत्र का आनन्द पिता को नहीं आ सकता। क्यों नहीं आ सकता? क्योंकि यह सिद्धान्त है कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का स्वामी नहीं होता है तथा एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता- भोक्ता भी नहीं होता।
यह संसार एक जाल है, आखिर ! कब तक इसमें फंसे रहोगे? यहाँ तो भोजन के पहले भी आकुलता, भोजन के बाद भी आकुलता, निर्धन या धनी हो गया तो भी आकुलता, बच्चे नहीं थे, बच्चे हो गये, मकान नहीं था मकान भी बन गया आबाद हो गये। वास्तव में आबाद हुए या वाद-विवाद में फँस गये।
अंतिम चरण में आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी कहते हैं-“न युवैतानि पुद्गले” अर्थात् बाल, वृद्ध, युवा यह सभी जीवत्व या जीव का स्वरूप नहीं है किन्तु ये सभी पुद्गल की अवस्थायें हैं। यही भेदविज्ञान हमेशा बनाए रखना हमारा पुरुषार्थ है इसी आत्म-पुरुषार्थ को करते रहना चाहिए।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 29
इष्टोपदेश गाथा 29 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ (मे) मेरी (मृत्युः न) मृत्यु नहीं होती (इस कारण) (कुतः भीतिः) भय कहाँ से हो सकता है ? (मे) मुझे (व्याधिः न) कोई रोग नहीं होता (इसलिए) (कुतः व्यथा) दुःख कहाँ से हो सकता है? (अहम्) में (बालः न) न बालक (वृद्धः न) न बूढ़ा (युवा न) न जवान (एतानि) ये सब बातें (स्थितियाँ) (पुद्गले) पौद्गलिक शरीर में होती हैं।
भावार्थ – चैतन्य शक्ति लक्षण भाव प्राणों के त्याग का अभाव होने से, निश्चय नय से, मेरा मरण नहीं है, इसलिए मुझे मृत्यु का या मृत्यु के कारण सर्पादि का भय नहीं है वा कैसे हो सकता है।
मूर्तिक शरीर के सम्बन्ध से होने वाली वात पित्त कफ जन्य व्याधि मेरी अमूर्तिक आत्मा में नहीं है, अतः मुझे व्याधि जन्य व्यथा (पीड़ा) कैसे हो सकती है।
पौद्गलिक शरीर के परिवर्तन से होने वाले बालपन, वृद्धापन और युवावस्था रूप भी मैं नहीं हूँ-क्योंकि मृत्यु व्याधि, बालपन, युवापन, वृद्धापन आदि सारी पर्यायें पुद्गल में हैं। अमूर्तिक चैतन्य स्वरूप मेरी आत्या में नहीं हैं। मैं इन सबसे रहित हूँ।
उत्थानिका – फिर भी भावना करने वाला खुद जिज्ञासा करता है कि यदि कहां हुए नीति के अनुसार मुझे भय आदि न होवे न सही, परन्तु जो जन्म से लगाकर अपनायी गयी थी और भले ही जिन्हें मैंने भेद भावना के बल से छोड़ दिया है, ऐसी देहादिक वस्तुएँ, चिरकाल के अभ्यस्त अभेद संस्कार के वश से पश्चाताप करने वाली हो सकती हैं कि अपनी इन चीजों को मैंने क्यों छोड़ दिया ? भावना करने वाला स्वयं ही प्रतिबुद्ध हो सोचता है कि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता है, कारण कि
स्वाध्याय गाथा सं 26 to 29
स्वाध्याय गाथा सं 29
स्वाध्याय गाथा सं 29 & 30
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 ( Gatha 13 )| गाथा 14 ( Gatha 14 )| गाथा 15 ( Gatha 15 ) | गाथा 16 ( Gatha 16 )| गाथा 17 ( Gatha 17 )| गाथा 18 ( Gatha 18 )| गाथा 19 ( Gatha 19 )| गाथा 20 ( Gatha 20 )| गाथा 21 | गाथा 22 | गाथा 23 | गाथा 24 | गाथा 25 | गाथा 26 | गाथा 27 | गाथा 28
English Translation of Ishtopadesh Gatha 29
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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