आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य कहता है, कि यदि इस तरह का आत्मा है तो उसकी उपासना कैसे की जानी चाहिए? इस विषय में आचार्य कहते हैं-
संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वेन चेतस: आत्मानमात्मवान् ध्यायेदात्मनैवात्मनि स्थितम् ॥22॥
अन्वयार्थ – (आत्मवान्) आत्मा (करणग्राम) इन्द्रिय समूह को (संयम्य) संयमित कर [पंचेन्द्रिय के विषयों से रोककर (चेतसः) चित्त की (एकाग्रत्वेन) एकाग्रता से (आत्मनि) अपनी आत्मा में (स्थितम्) स्थित होकर (आत्मानं) अपने आत्मा को (आत्मना एव) अपने आत्मा द्वारा ही (ध्यायेत्) ध्यावे ।
पद्यानुवाद
चपल-स्वभावी सभी इन्द्रियाँ, इनको संयत प्रथम करो,
मनोयोग से मनमाना मन, को भी मंत्रित तुरत करो।
अपने में स्थित हो अपने को, अपनेपन से आप तथा,
ध्याओ अपने आप भला फिर, ताप मिटे संताप व्यथा ॥२२॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 22
विवेचना
आत्मतत्त्व है, जब ऐसा विश्वास हो चुका और मैं सुख प्राप्त कर सकता हूँ, मैं अजर-अमर बन सकता हूँ तो फिर क्या करना चाहिए? इस शंका का समाधान देते हुए आचार्य कहते हैं कि “संयम्य करणग्रामं” सर्वप्रथम अपने-अपने विषयों की ओर दौड़ती हुई इन्द्रियों को संयमित बनाना आवश्यक है। इन्द्रियों को संयमित करने का अर्थ यह नहीं है कि इन बाहर की आँखों को बन्द कर लो, नाक भौं सिकोड़ लो, मुख बन्द कर लो, कान में अंगुलियाँ डाल लो, किन्तु इन्द्रियों के माध्यम से जो इन्द्रिय विषयों को प्राप्त करने की इच्छायें हैं, उन इच्छाओं को नियंत्रित करने का अर्थ संयम है। इसी का नाम साधना है। इस साधना के बिना आज तक कोई भी आत्मतत्त्व को न पा सका है और न पा सकेगा।
भर्तृहरि को सम्बोधित करते हुए आचार्य शुभचन्द्र स्वामी जी ने ज्ञानार्णव ग्रन्थ में कहा है कि जो व्यक्ति इस प्रकार इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता, मन को एकाग्र नहीं कर सकता मात्र आत्म-ध्यान की बात करता है, कहता है कि मुझे आत्मा झलक रहा है वह व्यक्ति एक प्रकार से अपने आपको अपने ही सोच के द्वारा ठग रहा है। (४/१७) बिना संयम के आत्मानुभूति का प्रयास करना वैसे ही असंभव है, जैसे कोई व्यक्ति पहाड़ को तोड़ने के लिए अपने सिर का प्रयोग करता है अपने बल का प्रयोग करता है। आप स्वयं सोचिये कि पहाड़ टूटेगा या सिर! क्या टूटेगा ? सिर टूटेगा। उसी प्रकार ध्यान रखना कि जो व्यक्ति मात्र बाह्य साधना करके, उपरिल साधना करके आत्म-ध्यान करने का बहाना करे समझो वह अपने आपको धोखा दे रहा है।
अरे! इन्द्रियों को संयत बनाओ। इसके उपरान्त आचार्य कहते हैं “एकाग्रत्वेन चेतसः” चित्त को भी एकाग्र करो क्योंकि जब तक इन्द्रियों के विषयों को ग्रहण करने की लालसा नहीं घटेगी, ख्याति, लाभ, पूजा का भाव नहीं छूटेगा, तब तक मन अन्यत्र बाहर से भीतर आ ही नहीं सकता। मन बाहर कहीं भी जा रहा हो और अन्दर आत्म-ध्यान की बात भी चल रही हो यह तीन काल में संभव नहीं।
आप लोग कहते हैं कि महाराज! ऐसा कोई मंत्र दे दो, ऐसा कोई साधन बता दो ताकि हमारा चंचल मन स्थिर हो सके। मैं आप लोगों से कहना चाहता हूँ कि मुझे ये बताओ, आपका मन कहाँ चला जाता है? कहाँ-कहाँ दूर-दूर तक भटकता रहता है? आप जहाँ जाना नहीं चाहते वहाँ आपका मन क्यों चला जाता है? क्यों भटकता रहता है? महाराज इसका जबाव हम नहीं दे सकते। आश्चर्य होता है सुनकर कि तुम्हारे मन की बात तुम्हें ही नहीं पता, तो हम कैसे बतायें! पहले आप मुझे बताओ जैसे-वैद्य जी पूछते हैं कि सिर में दर्द हो रहा है तो क्यों? क्या खाया था ? कुछ भी नहीं खाया ! कुछ नहीं खाया तो सिर में दर्द क्यों हो गया? कारण तो होना चाहिए, बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता।
इसी प्रकार मैं आपसे पूछता हूँ कि आपका ही मन कहीं पर क्यों जा रहा है, दूसरे का क्यों नहीं जा रहा ? आप कह सकते हैं कि यह तो स्वभाव है। और स्वभाव को कोई मिटा नहीं सकता। तो फिर मैं भी मंत्र नहीं दे सकता, क्योंकि स्वभाव तो मंत्र से भी समाप्त नहीं हो सकता। नहीं-नहीं, महाराज ! आप भी तो बैठे हैं, आपका मन तो स्थिर रहता है, वह कैसे स्थिर रहता है? सही है, चलो कम से कम इतना दिमाग तो चलाया आपने कि मन का चंचल होना अगर मेरा स्वभाव है तो आपका स्थिर कैसे रहता है? बस, यही पूछना बड़ा आवश्यक था, पूछ लिया बहुत अच्छा, धन्यवाद ।
सुनिये, तुम्हें जब तक जिस कार्य में रस आयेगा तब तक तुम्हारा मन वहाँ पर जायेगा। चाहे कितना भी प्रयास कर लो। जैसे-बेटे से माँ कहती है कि यह चीज खा लो, बेटा! तो वह नहीं खायेगा, क्योंकि उसका खाने का मन नहीं है। अच्छी चीज है तो भी नहीं खायेगा। लेकिन उसे जो अच्छी लगती है भले ही माँ की दृष्टि में अच्छी न हो फिर भी खा लेगा। उसकी रुचि के अनुरूप देंगे तो खा लेगा। इसी प्रकार अगर आपकी अभिरुचि इन्द्रिय विषयों की ओर है तो उन्हीं को ग्रहण करने में मन लगेगा। इस परिस्थिति में अगर कोई मन्त्र के माध्यम से ध्यान का रास्ता खोजना चाहोगे तो यह संभव नहीं है। मन को विषयों की ओर से हटाओगे तो ही मन एकाग्र हो सकता है और आत्म-ध्यान की भूमिका भी बन सकती है। भगवान् भी अपनी शक्ति लगायें तो भी तुम्हारे मन को एक अंश भी इधर का उधर नहीं कर सकते। वैसे भगवान् अपनी शक्ति का प्रयोग करते नहीं हैं, फिर दूसरा आपके मन को एकाग्र कैसे कर सकता है? आप स्वयं चाहोगे तो ही एकाग्र कर सकते हो, यह बताने के लिए ऐसा कथन किया है कि दूसरा कोई तो क्या भगवान् भी कुछ नहीं कर सकते। एक अंश का कोण जानते हो कितना होता है? ३६० अंश होते हैं, उसका एक भाग अर्थात् भगवान् भी प्रयास करें तो भी आपका थोड़ा-सा भी उपादान नहीं बदल सकते, क्योंकि आपको उसी में रस आ रहा है, इसलिए तो मन जहाँ पर रुचि वाला होता है वही बार-बार जाता है। अपने आप मन कहीं नहीं जाता, किन्तु मन में जिस विषय के प्रति रुचि होती है वहीं वहीं अपने आप जाता है।
मन क्या है? वस्तुतः मन ज्ञान की ही परिणति है। आपको जिस वस्तु के प्रति यह विश्वास होता है कि यह आनन्ददायी है तभी मन वहाँ पर जाता है किन्तु जब वहाँ से विश्वास हट जाता है, तो मन वहाँ पर जाना बन्द कर देता है, क्योंकि वहाँ जाने पर फिर उसे कोई आनन्द नहीं आता। सारे के सारे लोग ध्यान से भोजन कर रहे हैं, ध्यान से सुन रहे हैं, ध्यान से ही गा रहे हैं, ध्यान से ही जा रहे हैं, ध्यान से ही आ रहे हैं, ध्यान के बिना कोई भी कार्य नहीं किया जा रहा। इसलिए संसार में ध्यान सीखो नहीं, सिखाओ नहीं वरन् यह सीखा हुआ ध्यान छोड़ दो। यह किसने सिखाया ? सिखाया तो किसी ने नहीं, बल्कि अनन्तकाल से सीख करके ही आया था। आज लड़का जन्म लेता है और अपनी चेष्टा से माँ को कहता है अम्मा ! मुझे भोजन दे दो, रोता है। क्यों रोता है? वह रोने की क्रिया से यह संकेत करता है कि मुझे खाना दे दो। जन्म लेते ही भोजन मांगना या भोजन करना किसने सिखाया। पूर्वभवों से खाता ही आया है, अतः खाने की क्रिया को क्या सिखाना या खाने को क्या सीखना ? वह तो जन्मतः सीखा हुआ ही है।
जैसे वह बालक खाने से संस्कारित है उसी प्रकार ध्यान से भी संस्कारित है। ध्यान तो हमेशा होता ही रहता है, इन्द्रियों के विषयों में आनन्द भी आता ही रहता है, लेकिन जिस दिन से विषयों में सुख नहीं है ऐसा विश्वास जागृत हो जायेगा तो उस दिन से विषयों की ओर से मन का हटना भी प्रारम्भ हो जायेगा और आर्त रौद्र ध्यान भी कम होना प्रारम्भ हो जायेगा।
पञ्चेन्द्रियों के विषयों से जो अपने आपको संयत बना लेता है वह अपने आप एकाग्र हो जाता है। पूर्ण रूप से एकाग्र तो नहीं हो पाता परन्तु जब कभी चाहे तभी एकाग्र होने में देर नहीं लगती। फिर उस एकाग्रता से आत्म-चिन्तन प्रारम्भ करने में भी व्यवधान नहीं आता। एकाग्रता का अर्थ है एक वस्तु पर अग्र होना अर्थात् एक वस्तु को प्रधान करके उपयोग को स्थिर करना। आप तो पञ्चेन्द्रिय के विषयों पर टिकना चाहते हैं, तो आत्मा पर उपयोग कैसे टिकेगा। मन नहीं टिकेगा तो रस भी नहीं आयेगा क्योंकि उस समय अन्यत्र से रस मिल रहा है। अगर में पूछें कि कौन-सा रस चाहिए ? तो आप कहेंगे कि महाराज! हमें तो आत्म-ध्यान रूपी रस चाहिए। लेकिन ध्यान रखो, यदि आपको विषयों के प्रति रुचि है और आप आत्म चिन्तन का रस चाहते हैं तो यह संभव नहीं हो सकता। जैसे भोजन के समय यदि आपका मन मोवाइल के समाचार में लगा है तो उस समय मीठे-मीठे रसगुल्ले का भी रसास्वाद नहीं आ सकता। वैसे ही आत्म-चिन्तन के समय यदि मन बाह्य इन्द्रिय विषयों की ओर जायेगा तो आत्मानुभूति का रसास्वाद नहीं आ सकता।
बहुत कम लोग यह बात जान पाते हैं या महसूस कर पाते हैं कि हमारी आत्म-तत्त्व के प्रति कितने प्रतिशत रुचि है? और रुचि के अनुरूप कितने प्रतिशत हमारा पुरुषार्थ चल रहा है? हम एकाग्रता लाने का कितना प्रयास कर पा रहे हैं? कर भी पा रहे हैं या नहीं? आप ही विचार कीजिए कि यदि इस प्रकार का प्रयास चालू नहीं है तो उपलब्धि कैसे होगी। अतः हमें हमेशा यही प्रयास करना चाहिए कि जिन वस्तुओं में सुख है, शान्ति है उसका ही अनुभव करें और जिन साधनों से सुख-शान्ति का अनुभव कर सकें, उन साधनों को ही अपनायें। अन्यथा कभी भी आत्म-तत्त्व अनुभव में नहीं आ सकता।
योगियों ने, सन्तों ने, ऋषियों ने जिस आत्म-तत्त्व का अनुभव किया है उसी को ग्रन्थों में लिखा है। ग्रन्थों को पढ़कर आपके मन में यह जिज्ञासा होती है कि हम भी आत्म-तत्त्व को देखना- जानना चाहते हैं तो वे आचार्य सन्त हमें उसके बारे में बतलाते हैं, उसकी अनुभूति के साधनों का ज्ञान कराते हैं। वस्तुतः ऋषियों के द्वारा निर्देशित साधनों को हम क्यों नहीं अपना पाते? क्योंकि हम बोलते ज्यादा हैं, कहते ज्यादा हैं, चाहते बहुत कम हैं। अपनी इस मनोवृत्ति को मंजूर करना भी कठिन होता है। कहते-कहते भी हमारा उपादान इसको स्वीकार नहीं कर पाता है। मन बहुत चंचल है इसलिए इसको चंचल विषयों में ही आनन्द आ रहा है। जिसको हमेशा विषयों में रस आता है वह कितना भी प्रयास करे उसे आत्म-तत्त्व का अनुभव नहीं हो सकता।
विश्वास की बात है, जब लक्ष्य निश्चित हो जाता है कि पञ्चेन्द्रियों के विषयों में सुख नहीं है तो निश्चित रूप से उसका मन पञ्चेन्द्रियों के विषयों की ओर नहीं जा सकता। सामान्यतः ये आँखें कहीं नहीं जातीं। लेकिन मन जल्दी-जल्दी यहाँ-वहाँ चला जाता है। यदि मन नियंत्रित हो जाये तो संसार की कितनी भी वस्तुयें लाकर रख दो तो भी वह उसको देखेगा भी नहीं। यदि देखता भी है तो कैसे ? “पश्यन्नपि न पश्यति” देखता हुआ भी नहीं देखता, इसी प्रकार “खादन्नपि न खादति” खाते हुए भी नहीं खाता, “गच्छन्नपि न गच्छति” जाते हुए भी नहीं जाता “ब्रुवन्नपि न ब्रूते” बोलते हुए भी नहीं बोलता। यह सब मोक्ष-पुरुषार्थ स्वरूप मन की एकाग्रता है। इसके अलावा मोक्ष पुरुषार्थ और कोई चीज नहीं है।
प्रयोग का प्रभाव ऐसा होता है कि बरसों की दशा एक दिन में अथवा साधना के एक बार के प्रयोग में भी परिवर्तित हो सकती है, लेकिन पूर्व के विषयों का अभ्यास होने के कारण बार-बार भी प्रयोग करने की आवश्यकता होती है। यह अभ्यास एकदम दूर नहीं किया जा सकता। जैसे कि-दीवाल में चूना पोतते हैं, यदि बरसात में पोतते हैं तो वर्षा के कारण चूने के साथ-साथ दीवाल भी धुल जाती है। पानी के कारण दीवाल पर कई (काई) जम जाती है, तो फिर उस दीवाल पर एक बार चूना पोतने से सफेदी आती है क्या? कितने हाथ लगाना पड़ते हैं। पहले दीवार में जो काई की खाई है उसे निकाला जाता है, फिर चूना पोता जाता है, फिर दूसरी तीसरी बार भी पोता जाता है, तब सही सफेदी आती है और दीवाल साफ हो जाती है। कोई-कोई लोग जिनकी गुंजाइश नहीं होती वे एक बार ही चूना लगाकर छोड़ देते हैं, तो दूसरे ही दिन दीवाल भट्टी सी लगने लगती है। इसी प्रकार एक बार प्रयोग करके देखो कि हम ठीक हो गये, साफ सुथरे हो गये क्या! नहीं। बार- बार प्रयोग करो, तब कहीं जाकर के मन संस्कारित होता है और पुराने संस्कारों की काई धुलकर साफ हो जाती है।
आप प्रयोग कीजिये, लेकिन प्रयोग के समय इधर-उधर मत देखिए। वह कैसे कर रहा है, यह कैसे कर रहा है? यह मत देखो, लेकिन मैं कैसे कर रहा हूँ, पहले इस पर ध्यान दो। एक ही दिन में अवश्य अन्तर आयेगा, लेकिन प्रयोग सही-सही होना चाहिए। उसने विश्वास जगाया था, तभी दवाई दी गई। दवाई खाना मेरा कर्तव्य है ऐसा विश्वास जागा, तब दवाई दी गई। इसी प्रकार इन्द्रिय-विषयों के प्रति यदि मन राग-द्वेष नहीं करता तो समझो वह मन पर सही-सही प्रयोग कर रहा है और मन की चंचलता को कम करके मन को स्थिर करने का प्रयास कर रहा है। बाद में उसे कितने भी विषयों के ढेर के बीच में रखो तो भी मन विचलित नहीं होगा। नियंत्रित, संकल्पित मन से यदि कोई व्रत, उपवास आदि करता है तो उसे घर में भी मंदिर की बात याद आती है। और यदि कोई विचलित मन से देखा-देखी में व्रत-उपवास करता है तो मंदिर में भी घर की बात याद आती है।
जिसका मन विश्वस्त होता है, उसके सामने कितना कुछ भी कहो अथवा करो लेकिन उसका मन विचलित नहीं होता। जैसे-रेवती से कहा कि पच्चीसवें तीर्थंकर आये हैं, उनका समवशरण लगा है, चलो दर्शन के लिए। तब वह कहती है, कौन से पच्चीसवें तीर्थंकर? तीर्थंकर तो चौबीस ही होते हैं। इस समय चौबीसों तीर्थंकर सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं। अब कोई तीर्थंकर अवतरित हो ही नहीं सकते फिर कहाँ से आ गये पच्चीसवें तीर्थंकर? यदि आये हैं तो वे तीर्थंकर नहीं हो सकते, भगवान् नहीं हो सकते। आचार्य समन्तभद्र स्वामी जी ने आठ अंगों में से चौथे अमूढ़दृष्टि अंग में रेवती का नाम लिया है- “तुरीये रेवती मता” (२० क० श्रा० १९)। चौथे अंग में उसको नियुक्त कर दिया। रेवती के समान बल, विश्वास और दृढ़ता आवश्यक है तब कहीं जाकर मोक्षमार्ग बनता है। कहा भी है-खरबूजे के रंग को देखकर खरबूजे का रंग बदलता है लेकिन यह एकान्त नहीं है। ऊपर ऊपर भले ही बदल जाये। सोना, सोना होता है पारे के योग से भले ही वह ऊपर ऊपर सफेद हो जाये तो भी भीतर से सफेद नहीं होता, उसकी क्षमता कम नहीं होती। पूरा थोड़े ही बदलता है। पूरा बदल जाये तो पारा-पारा ही दिखने लग जाये। अनुपात से ही बदलता है। अतः सामने वाले का प्रभाव हमारे ऊपर पूरा पड़े, यह एकान्त नियम नहीं है।
आत्मा के द्वारा, आत्मा में, आत्मा को, आत्मा देखता है वही निश्चित रूप से साध्यभूत वस्तु को प्राप्त कर सकता है, यही एक मात्र रास्ता है। चाहे आप आज करिये। चाहे कल, चाहे परसों करिये किसी भी समय कीजिए आपको यदि आत्म-तत्त्व प्राप्त करना है तो निश्चित रूप से यही कार्य करना होगा। जब करोगे तभी उसका फल भी अनुभूत होगा। बिना किये अनुभव संभव नहीं। कैसे करें ? ऐसी जिज्ञासा यदि आपके मन में है तो जो कर रहे हैं उनके पास रहिये, आपको ज्ञात हो जायेगा।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 22
इष्टोपदेश गाथा 22 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (आत्मवान्) आत्मा (करणग्रामं) इन्द्रिय समूह को (संयम्य) संयमित कर [विषयों से रोककर (चेतसः) चित्त की (एकाग्रत्वेन) एकाग्रता से (आत्मनि) अपने आत्मा में (स्थितम्) स्थित होकर (आत्मना एव) अपने आत्मा द्वारा ही (आत्मानं) अपने आत्मा का (ध्यायेत्) चिन्तन करे।
भावार्थ – एक समय में एक ही पदार्थ पर उपयोग ठहरता है, इस कारण जिस समय इन्द्रियां बाहरी पदार्थों को जानती हैं, उस समय आत्मा अपने आपका ध्यान नहीं कर सकता, इस कारण अपना चिन्तन करने के लिए इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अपने मन को आत्मा में ठहराकर अपने आत्म द्रव्य का या आत्मा की शुद्ध पर्याय का चिन्तन करना चाहिए। उस एकाग्र आत्म-चिन्तन से आत्मा का अनुभव होता है। राग-द्वेष आदि कषायभाव के अभाव से कर्म बन्ध होना रुक जाता है। कर्मों का संवर और निर्जरा होती है इस तरह आत्मध्यान द्वारा कर्म नष्ट हो जाते हैं। इसलिए अपनी आत्मा का अपनी आत्मा के द्वारा, अपनी आत्मा में ध्यान करना चाहिए।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य का कहना है भगवन् ! आत्मा से अथवा आत्मा की उपासना करने से क्या मतलब सधेगा अर्थात् क्या फल मिलेगा ? क्योंकि विचारवानों की प्रवृत्ति तो फलज्ञान पूर्वक हुआ करती है, इस प्रकार पूछे जाने पर आचार्य जबाब देते हैं – गाथा 23
स्वाध्याय गाथा सं 21 & 22
स्वाध्याय गाथा सं 22 & 23
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15 | गाथा 16 | गाथा 17 | गाथा 18 | गाथा 19 | गाथा 20 | गाथा 21 | गाथा 22 | गाथा 23 | गाथा 25 | गाथा 26 | गाथा 27
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