आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-फिर शिष्य कहता है कि हे भगवन् ! धन के कमाने में यदि ज्यादातर पाप होता है और दुःख का कारण होने से धन निंद्य है, तो धन के बिना भोग और उपभोग भी तो नहीं हो सकते। इसलिए उनके लिए धन होना ही चाहिए और इस तरह धन प्रशंसनीय माना जाना चाहिए। इस विषय में आचार्य कहते हैं कि “यह बात भी नहीं हैं”, अर्थात् ” पुण्य का कारण होने से धन प्रशंसनीय है” यह जो तुमने कहा था, सो वैसा ख्याल कर धन कमाना उचित नहीं है, यह पहले ही बताया जा चुका है। “भोग और उपभोग के लिए धन साधन है” यह जो तुम कह रहे हो, सो भी बात नहीं है, यदि कहो क्यों ? तो उसके लिए कहते हैं-
आरम्भे तापकान् प्राप्तावतृप्तिप्रतिपादकान् । अन्ते सुदुस्त्यजान् कामान् कामं कः सेवते सुधीः ॥17॥
अन्वयार्थ – (आरम्भे) प्रारम्भ में (तापकान्) सन्ताप देने वाले (प्राप्तौ) प्राप्त हो जाने पर (अतृप्ति-प्रतिपादकान्) तृष्णा को बढ़ाने वाले तथा (अन्ते) अन्त में (सुदुस्त्यजान्) बहुत कठिनाई से छूटने योग्य (कामान्) विषय भोगों को (कः सुधीः) कौन बुद्धिमान् पुरुष (काम) बड़ी रुचि से (सेवते) सेवन करता है।
पद्यानुवाद
प्राप्त नहीं हो जब तक, तब तक, महा ताप कर काम-सभी,
किन्तु प्राप्त हो जाने पर तो, कभी तृप्ति का नाम नहीं।
अन्त-अन्त में तो क्या कहना? जिनका तजना सरल नहीं,
सुधी रचे फिर काम-भोग में? जिनका मन हो तरल कहीं ॥१७॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 17
विवेचना
जीवन की आदि, मध्य और अन्त इन तीनों अवस्थाओं में से यदि एक भी अवस्था में भोग-सामग्री के द्वारा सुख मिल जाये तो भोगों को अच्छा माना जा सकता है किन्तु भोग-सामग्री में तो लेश मात्र भी सुख नहीं है क्योंकि भोग के विषय आरंभ, कृषि आदि षट्कर्मों से सम्पादित होते हैं। इन कार्यों के करते समय शरीर, इन्द्रिय व मन को अत्यन्त कष्ट होता है। श्रम के फलस्वरूप जब इनकी प्राप्ति हो जाती है तो भी तृष्णा नागिन अपनी चपलता से जगत को अशान्त करती रहती है। इनका हमेशा-हमेशा भोग करने पर भी कभी तृप्ति नहीं होती, बल्कि अतृप्ति ही बनी रहती है। अतृप्ति में खेद व व्यग्रता होती है। अग्नि में कितना भी तृण-काष्ठ क्यों न डाला जाये लेकिन अग्नि कभी तृप्त नहीं होती। नदियों का कितना भी जल समुद्र में डाला जाये तो भी समुद्र कभी तृप्त नहीं होता। अग्नि और समुद्र कदाचित् ईन्धन और जल से तृप्त हो भी जायें परन्तु संसारी मोही प्राणी भोगों से कभी तृप्त नहीं हो सकता। भर्तृहरि ने ‘नीतिशतक’ में कहा भी है कि “भोगो न भुक्त्वा वयमेव भोक्ता”। ज्ञानी भी भोगों का सेवन करता है लेकिन आसक्ति के साथ नहीं करता। कदाचित् दाल में नमक ज्यादा हो जाता है तो अज्ञानी तो उसको खारी बताता है। खारी क्यों हुई ? इसका विकल्प भी करता है लेकिन ज्ञानी दाल के खारेपन का स्वाद बतलाता है, दाल को खारी नहीं बतलाता।
“जो संसार विषै सुख होता तीर्थकर क्यों त्यागैं ॥८॥” वैराग्यभावना
उदाहरण के लिए पञ्चवालयति तीर्थंकरों ने कुमारावस्था में ही भोगों को भोगे बिना छोड़ दिया और आत्म-साधना में लीन हो गये। ‘आत्मानुशासन’ ग्रन्थ में आचार्य गुणभद्रस्वामी जी ने कहा है कि किन्हीं मनुष्यों ने तो विषय सामग्री अर्थात् भोगों को तृण के समान समझकर त्याग दिया और उसे अन्य अर्थीजनों को दे दिया, उसका स्वयं ही परित्याग कर दिया, कुछ ऐसे भी मनुष्य हुए हैं जिन्होंने भोगों को दुःख रूप समझकर ग्रहण ही नहीं किया। ये तीनों प्रकार के त्यागी उत्तम हैं, परन्तु इनमें सर्वोत्तम वह माना जाता है जिसने वैभव को, भोग-सामग्री को ग्रहण ही नहीं किया।
वज्रदन्त चक्रवर्ती के पुत्रों ने पिता जी के वैरागी होने पर स्वयं भी उसी मार्ग का अनुसरण किया क्योंकि उन्होंने विचार किया कि दूसरों के द्वारा भोगी सम्पदा को पुनः भोगना उचित नहीं है। वे पिता के साथ दीक्षित हो जाते हैं। भरत चक्रवर्ती तो भोग भोगते हुए भी अन्तरंग से उदासीन रहे। राज्य कार्य करते हुए भी भावों की विशुद्धि में कोई अन्तर नहीं आने दिया। यही कारण है कि भरत चक्रवर्ती दीक्षा लेते ही केवलज्ञान के पात्र बने। अज्ञानी जीव ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसका भोगों के प्रति तीव्र राग होता है।
भोग और उपभोग तो अशुभ कर्म के कारण हैं और धन भोग सामग्री का उत्पादक है अतः धन को प्रशस्त कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि वह भी अशुभ कर्म और संक्लेश परिणामों का जनक होता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 17
इष्टोपदेश गाथा 17 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (आरम्भे) प्रारम्भ में (तापकान्) सन्ताप देने वाले (प्राप्तौ) प्राप्त हो जाने पर (अतृप्तिप्रतिपादकान्) तृष्णा बढ़ाने वाले तथा (अन्ते) अन्त में (सुदुस्त्यजान्) बड़ी कठिनाई से छूटने योग्य (कामान्) विषय भोगों को (कः सुधीः) कौन बुद्धिमान् पुरुष (काम) रुचि से (सेवते) सेवन करता है।
भावार्थ – प्रारम्भ में भोजन, वस्त्र, स्त्री आदि विषय भोगों की सामग्री को प्राप्त करने में खेती-बाड़ी, व्यापार, चाकरी आदि के रूप में बहुत परिश्रम करने का दुःख उठाना पड़ता है। जब इन्द्रियों के विषय भोगों की सामग्री मिल जाती है तो उसका भोग उपभोग करने पर भोगने की तृष्णा शान्त नहीं होती, उनके भोगने की लालसा और बढ़ जाती है। इस कारण अन्त में उन विषय भोगों से छुटकारा पाना बहुत कठिन हो जाता है। इसीलिए आत्मदर्शी बुद्धिमान् पुरुष विषय भोगों को उदासीनता से (मना होकर) भोगता है, उनमें तन्मय नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि अग्नि में ईंधन डालने से अग्नि शान्त नहीं होती, उसी तरह विषय भोगों के भोगने से लालसा भी शान्त नहीं होती, वह तो विषय भोगों के त्याग कर देने पर ही शान्त होती है।
उत्थानिका – आचार्य फिर और भी कहते हैं कि जिस काय के लिए सब कुछ (भोगोपभोगादि) किया जाता है वह (काय) तो महा अपवित्र है, जैसा कि आगे बताया जाता है – गाथा 18
स्वाध्याय गाथा सं 13 to 17
स्वाध्याय गाथा सं 17 to 19
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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