आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य का कहना है कि धन, जिससे पुण्य का उपार्जन किया जाता है, वह निंद्य-निंदा के योग्य क्यों है? पात्रों को दान देना, देव की पूजा करना आदि क्रियायें पुण्य के कारण हैं, वे सब धन के बिना हो नहीं सकतीं। इसलिए पुण्य का साधन रूप धन निंद्य क्यों? वह तो प्रशंसनीय ही है इसलिए जैसे बने वैसे धन को कमाकर पात्रादिकों में देकर सुख के लिए पुण्यसंचय करना चाहिए। इस विषय में आचार्य कहते हैं-
त्यागाय श्रेयसे वित्तमवित्तः सञ्चिनोति यः । स्वशरीरं स पङ्केन स्नास्यामीति विलिम्पति ॥16॥
अन्वयार्थ – (त्यागाय) दान करने के लिए तथा (श्रेयसे) अपने सुख प्राप्त करने के लिए (यः अवित्तः) जो निर्धन मनुष्य (वित्तं सञ्चिनोति) धन को संग्रहीत करता है (सः) वह (मनुष्य) (स्नास्यामि) मैं स्नान करूँगा (इति) इस विचार से (स्वशरीरं) अपने शरीर को (पङ्केन विलिम्पति) कीचड़ से लिप्त करता है।
पद्यानुवाद
निर्धन धन अर्जित करता है, दान हेतु यदि वह नाना,
दान कर्म का ध्येय बनाया, कर्म खपाना शिव पाना।
कार्य रहा यह ऐसा जैसा, अपने तन पर करता है-
लेप पंक का कोई मानव, “स्नान करूँगा कहता है” ॥16॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 16
विवेचना
संसार के अधिकांश भोले प्राणियों की यह धारणा होती है कि धन प्राप्ति के लिए नीच से नीच कार्य भी करना पड़े तो भी उसे करके धन सञ्चय तो कर ही लेना चाहिए। जो व्यक्ति यह सोचकर कि धन प्राप्ति से जो पापास्त्रव होगा उसे पात्र दान, देवपूजा, गुरुभक्ति, सेवा, परोपकार आदि सत्कार्यों में लगाकर पुण्य प्राप्त कर लेंगे तो पाप धुल जायेगा, लेकिन ऐसी धारणा उचित नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मानो किसी मनुष्य का शरीर साफ-सुथरा था, बाद में वह यह समझकर कि मैं नहा लूँगा पुनः साफ-सुथरा हो जाऊँगा। इस आशय से अपने शरीर में कीचड़ लपेटता है तो उसका ऐसा करना उचित नहीं है। उसी प्रकार पाप करके धन सज्वय करके मनुष्य यह विचार करे कि अपने धन को दानादिक कार्यों में खर्च कर दूँगा ऐसा सोचकर जिस किसी भी कलुषित, अन्यायमार्ग से धनार्जन करता है तो वह अज्ञानी माना जाता है क्योंकि इस प्रकार के कार्यों से मनुष्य की इष्ट सिद्धि नहीं हो सकती।
यदि कदाचित् भाग्यवश धन मिल भी जाता है तो अच्छे कार्यों में लगने की बहुत कम संभावना रहती है। धन का उपार्जन शुद्ध साधनों से हो ही नहीं सकता। जैसे कहा जाता है कि स्वच्छ व निर्मल जल से नदियाँ नहीं भरती किन्तु गन्दले व मलिन जल से ही परिपूर्ण होती हैं। उसी तरह सज्जनों की संपदा शुद्ध न्याय मार्ग से कमाये हुए धन से नहीं बढ़ती। धन सम्पदा में निन्दित मार्ग का आश्रय लेना ही पडता है। अतः विवेकी जनों का कर्तव्य है कि जहाँ तक बने वे नीति- मार्ग से ही धनोपार्जन करें। ज्ञानी तो इसी प्रकार का विचार करता है।
धनिक जन धन की अतृप्ति वश दुःखी होते हैं और धनार्थी धन की अप्राप्ति में दुःखी है, केवल आकिञ्चन मुनि ही सुखी है। ऐसी स्थिति में आप लोगों को विचार करना चाहिए कि धन की प्राप्ति उपादेय कैसे हो सकती है? यदि तू निर्धन है तो धन-संग्रह की आकांक्षा मत कर, क्योंकि जिस धन को तू उपादेय पुण्योत्पादक मानकर धन प्राप्त करने की इच्छा करता है उसी धन को राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार अतृप्तिकारक मानकर, मोहवर्धक, पापबन्धक मानकर छोड़ देते हैं और वीतराग अकिञ्चन कृति रूप मुनि लिंग को धारण कर लेते हैं। जो आत्म-वैभव एवं आत्म- स्वभाव की प्राप्ति का प्रधान कारण है।
यदि आप भी अष्टम वसुधा सम्बन्धी मोक्ष सुख को प्राप्त करने की भावना करते हो, तो अपनी विवेक बुद्धि के द्वारा पर पदार्थों में इष्ट अनिष्ट बुद्धि का परित्याग करके अपने स्वरूप को पहचानने का प्रयत्न करो।
इष्टोपदेश गाथा 16 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (यः अवित्तः) जो निर्धन मनुष्य (त्यागाय) पात्र, दान, पूजादि के लिये (श्रेयसे) अपूर्व पुण्य के लिये (वित्तं सञ्चिनोति) धन को संग्रहित करता है (सः) वह (मनुष्य) (स्नास्यामि) मैं स्नान करूँगा (इति) इस विचार से (स्वशरीरं) अपने शरीर को (पङ्केन विलिम्पति) कीचड़ से लिप्त करता है।
भावार्थ-बहिरात्मा मनुष्य धर्म साधन में रुचि न रखकर केवल धन संचय में लगा रहता है, वह सोचता है कि मैं बहुत सा धन इकट्ठा करके फिर खूब दान करूँगा, अच्छा मकान बनाऊंगा, सुख पाने के लिए विषय भोगों की सामग्री जुटाऊंगा। परन्तु आत्मा को सुखी, शान्त, सन्तुष्ट करने के लिए, निज आत्मा का रसास्वादन करने की ओर तथा आत्मा की निधि ज्ञान, चारित्र को बढ़ाने की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। वह ऐसी ही मूर्खता करता है जैसे कोई मूढ़ मनुष्य स्नान करूंगा ऐसा विचार करके स्वच्छ शरीर पर कीचड़ लगाता है। क्योंकि सज्जनों की सम्पदा शुद्ध धन से नहीं बढ़ती है जैसे शुद्ध जल से नदियाँ कभी भी पूर्ण नहीं होती हैं इसलिए दान, पूजा आदि के उद्देश्य से भी धनोपार्जन करना कल्याणकारी नहीं है।
उत्थानिका –फिर शिष्य कहता है कि भगवन् धन के कमाने में यदि ज्यादातर पाप होता है और दुःख का कारण होने से धन निंद्य है तो धन के बिना भोग और उपभोग भी नहीं हो सकते, इसलिए उनके लिए धन होना ही चाहिए तथा इस तरह धन प्रशंसनीय माना जाना चाहिए। इस विषय में आचार्य कहते हैं कि यह बात भी नहीं है अर्थात् पुण्य का कारण होने से धन प्रशंसनीय है यह जो तुमने कहा था, सो वैसा ख्याल कर धन कमाना उचित नहीं, यह पहले ही बताया जा चुका है। भोग और उपभोग के लिए धन साधन है, यह जो तुम कह रहे हो सो भी बात नहीं है, यदि कहो क्यों ? तो उसके लिए आचार्य कहते हैं – गाथा 17
स्वाध्याय गाथा सं 13 to 17
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 16
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