आचार्य पूज्यपादस्वामी द्वारा विरचित इष्टोपदेश पर मुनि श्री प्रणम्यसागरजी के प्रवचनों का संग्रह, अतिशयक्षेत्र बिजोलियाजी, 2016
इष्टोपदेश गाथा 2 (Gatha 2)
योम्योपादानयोगेन दृषदः स्वर्णता मता । द्रव्यादिस्वादिसंपत्तावात्मनो ऽप्यात्मता मता ॥2॥
Yo’myopādānayogena dṛṣadaḥ svarṇatā matā,
Dravyādisvādisampattāvātmano’pyātmatā matā. ॥2॥
English Translation of Adhyatm Yog ( Ishtopdesh ) Chapter 2
कल आपको बताया था कि भगवान कैसे होते हैं? और उन भगवान को हम नमस्कार करते हैं तो उसका क्या प्रयोजन होता है? संज्ञान स्वरूप, सम्पूर्ण ज्ञान स्वरूप भगवान को नमस्कार करके उन्हीं के जैसे उस ज्ञान स्वरूप की प्राप्ति के लिए उन्हें नमस्कार किया गया। यह भी कहा गया कि वह भगवान अब सभी कर्मों के अभाव से अपने स्वभाव को प्राप्त कर चुके है। भगवान को अपने स्वभाव की प्राप्ति हुई, वह भगवान स्वयं बने, यह भी आपको बताया था और जब भगवान स्वयं बनते हैं तो एक प्रश्न सामने आता है कि क्या कोई स्वयं भी भगवान बन सकता है? कुछ उदाहरण के माध्यम से जब तक हम किसी बात को नहीं समझते हैं तब तक वह बात हमारे जहन में बहुत भीतर तक नहीं जाती इसलिए आचार्य पूज्यपाद महाराज ने एक उदाहरण के माध्यम से हमको समझाने का प्रयास किया है कि ऐसा भी संभावित है कि कोई भी व्यक्ति भगवान स्वयं ही बन जाता है। एक उदाहरण महाराज यहाँ दे रहे हैं कि जिस तरह से ‘दृषद्’ कहते हैं एक स्वर्ण पाषाण को, जिसमें स्वर्ण छिपा रहता है और उसमें से स्वर्ण निकालने की एक प्रक्रिया होती है।
जो भी extra material होता है, उसको हटाकर उस स्वर्ण को जब बाहर निकाला जाता है, तो उसे कहा जाता है कि अब उसमें स्वर्णपना आ गया है, ‘दृषद स्वर्णता मता’ जो दृषद माने एक सामान्य स्वर्ण पाषाण है वह भी स्वर्णपने को प्राप्त हो जाता है और वह स्वर्ण जिस तरीके से बन जाता है, उसी प्रकार से हमारी आत्मा भी परमात्मा बन जाती है। आचार्यों ने कहा है भगवान की वाणी में कहा गया है कि जैसी हमारी आत्मा है वैसी ही भगवान की आत्मा है और अगर उसमें कोई अंतर है तो वह अंतर इतना ही समझना जैसे स्वर्ण और पाषाण में अंतर होता है। इसे हम इस ढंग से समझ नहीं सकते कि जो भगवान है वही मैं हूँ। God is myself & myself is God. अगर यह दोनों चीजें हमारे साथ में हैं तो यह किस तरह से हैं both are same like ore and gold यह दोनों चीजें एक जैसी हैं। जैसा भगवान वैसा मैं, जैसा मैं वैसा भगवान्। लेकिन किस तरह से एक स्वर्ण पाषाण जिसमें कुछ extra material उसके साथ में जुड़ा है और वह स्वर्ण जिसमें कुछ भी extra नहीं है pure है फिर भी अंतर क्यों पड़ जाता है, इसको भी समझने के लिए differentiate between their mode. Mode कहते हैं उनकी पर्यायों को। उनकी पर्यायों में अंतर दिखाई देता है।
अगर उस अंतर को कुछ और स्पष्ट करना है तो one is pure-other is impure. स्वर्ण पाषाण में स्वर्ण है। उस स्वर्ण पाषाण को ही हम स्वर्ण भी कह देते हैं कि भाई यह सोना है। जब कभी कोई उस पाषाण को लेकर स्वर्णकार के पास पहुँचता है तो वह यह नहीं कहता कि यह पत्थर है। वह कहेगा यह सोना है और इसमें से तुम्हें सोना निकालना है इसे स्वर्ण के रूप में प्रकट करना है। स्वर्ण ही स्वर्ण रह जाये, सोना ही सोना रह जाये बाकी इसमें कुछ ना बचे क्योंकि उसमें जब वो कह रहा है कि यह सोना ही है फिर उसमें सोना निकालना क्या? जैसे हमने आप से कहा कि आप ही भगवान हो तो फिर भगवान क्या है? जब हमने आप से कह दिया आप स्वयं में ही भगवान हैं, तो जब आप स्वयं में ही भगवान हैं तो फिर अब भगवत्ता को प्राप्त करना क्या? तो एक चीज ध्यान रखना one is pure & other is impure. एक अभी impure state में है और एक को pure state में पहुँचने पर सोना कहा जाता है। उस पाषाण को भी जो अभी सामने रखा है उसे हम सोना कह सकते हैं लेकिन यह एक व्यवहार है। अभी वस्तुतः वह सोना नहीं है। सोना प्राप्त करने की उसके अंदर शक्ति है, उसमें से स्वर्ण निकल सकता है। निकलेगा तो उसी में से निकलेगा किसी और में से नहीं निकलेगा। इसलिए यहाँ पर आचार्यों ने बहुत अच्छी बात कही कि’ योग्योपादानयोगेन’ योग्य उपादान के निमित्त से स्वर्ण पाषाण में जिस तरह से स्वर्णपने की प्राप्ति हो जाती है उसी तरह से द्रव्य आदि उचित निमित्त मिल जाने पर यह आत्मा भी परमात्मापने को प्राप्त हो जाती है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथन है यह ‘योग्य उपादान योगेन’। उपादान सब जानते हैं, उपादान का अर्थ होता है कि जिसमें कार्य रूप से परिणत होने की क्षमता रहती है। उस द्रव्य को, पदार्थ को उपादान कहा जाता है और वह उपादान योग्य होना चाहिए। योग्य कब होता है? जब वह उस कार्यरूप में परिणत होने को तैयार हो तब वह योग्य कहलायेगा और उससे पहले अयोग्य कहलायेगा।
(1) स्वर्ण पाषाण – योग्यता क्षमता – – निमित्त – – द्रव्य काल भाव – द्रव्य – प्राप्ति – पूर्णता स्वर्ण / कनक
(2) मानव – योग्यता (बज्रवृषभनाराचसहनन शरीर) भव्यता – निमित्त – सुद्रव्य सुकाल सुभाव – ध्यान – केवलज्ञान प्राप्ति – परमात्मा
भगवत्ता प्रकट करना
मान लो उस स्वर्ण पाषाण में से स्वर्ण निकलने की योग्यता है लेकिन वह किसी खान में दबा हो तो वह अयोग्य है, जब तक उसको कोई खान से नहीं निकाल लेता है और निकालकर के उसको किसी उचित स्वर्णकार के हाथ में नहीं पहुँच
अयोग्य है, जब तक उसको कोई खान से नहीं निकाल लेता है और निकालकर के उसको किसी उचित स्वर्णकार के हाथ में नहीं पहुँचा देता है तब तक वह स्वर्ण पाषाण योग्य होते हुए भी अयोग्य कहलाता है। कोई भी जीव या आत्मा जो भव्यता शक्ति को धारण किये हुए है, भव्यपने की शक्ति उसके अंदर है, देखा जाये तो योग्य है लेकिन योग्य होते हुए भी वह तब तक अयोग्य है जब तक कि उसके अंदर उस रूप को परिणमन करने की योग्यता के योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव नहीं आ जाते हैं। इसलिए कहा गया है ‘द्रव्यादिस्वादिसम्पत्ता’ जो द्रव्य आदि हैं उनकी हमें प्राप्ति हो जाये, और इनकी हमारे अंदर पूर्णता हो जाये तो हमारा आत्मा परमात्मा बन जायेगा। योग्य उपादान के साथ में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव भी योग्य मिलने चाहिए। आत्मा के अंदर उपादान शक्ति योग्य होते हुए भी जब तक उचित द्रव्य, क्षेत्र आदि उसे नहीं मिलेगा तब तक उसके अंदर आत्मा से परमात्मा बनने की योग्यता प्रकट नहीं होगी। अब उसके लिए उचित द्रव्य क्या है? तो आचार्य कहते हैं कि आपकी आत्मा के अंदर आत्मा से परमात्मा बनने की योग्यता होने पर भी जब तक आपका शरीर (यह द्रव्य है) यह द्रव्य शरीर उचित नहीं मिलेगा तब तक आपके अंदर केवलज्ञान प्राप्त करने की योग्यता नहीं आयेगी और उस द्रव्य को प्राप्त किये बिना आपके अंदर वह ध्यान करने की योग्यता भी नहीं आयेगी जो ध्यान केवलज्ञान का कारण है इसलिए ‘वज्रवृषभनाराचसंहनन’ यह आवश्यक है। शरीर के उस संहनन के अभाव में आपको उस Quality का ध्यान नहीं हो सकता जो ध्यान आपके अंदर केवलज्ञान की प्राप्ति करा दे। यह द्रव्य है, यह द्रव्य भी आपको चाहिए। अन्तरंग में उपादान की योग्यता होने के साथ-साथ जब इस प्रकार से आपको द्रव्य की प्राप्ति हो जाये तो वह द्रव्य आपको आत्मा से परमात्मा बनाने में सहायक हो जायेगा। क्षेत्र भी योग्य होना चाहिए। मान लो आप इस क्षेत्र पर बैठे है, इस बिजौलिया क्षेत्र की बात नहीं कर रहा हूँ, वह क्षेत्र जहाँ से केवलज्ञानी निरंतर होते रहते हैं और जिस क्षेत्र में केवलज्ञान को भी उत्पन्न करने की योग्यता, क्षमता रहती है ऐसे वह क्षेत्र होते हैं। विदेह आदि क्षेत्र भी इसी प्रकार के क्षेत्र है जिन क्षेत्रों में रहने वाले साधु परमेष्ठी कभी भी केवलज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। उनके अंदर योग्यता होगी अगर उन्हें वज्रवृषभनाराचसंहनन मिला हुआ है, उपादान उनका योग्य है, भव्य है तो वह नियम से केवलज्ञान की प्राप्ति उस क्षेत्र से कर लेते हैं, इसलिए क्षेत्र का भी महत्व है। यह निमित्त है इन निमित्तों के माध्यम से भी परिणामों में योग्यता आ जाती है, परिणामों में विशुद्धि उत्पन्न होती है और उन्हीं से अपने अंदर योग्यता बढ़ती है तो आचार्य कहते हैं अच्छा क्षेत्र भी होना चाहिए सूखा माने अच्छा। अब जब तक वह विदेह क्षेत्र नहीं है, तब तक ऐसा ही विदेह क्षेत्र ठीक है, ऐसे क्षेत्र में पहुँचने के बाद आपके परिणामों में शांति आ जाती है। आपको याद आ जाये कि यहाँ पर भी कभी भगवान का आगमन हुआ था, इस बात को याद करने से आपके अंदर बहुत विशुद्धि बढ़ती है कि यहाँ पर कभी भगवान का आगमन हुआ है या भगवान ने कभी तपस्या की है। यह बड़ी शिलाएँ जो हमको दिखाई दे रही है यहाँ पर भी कभी बड़े योगी लोग बैठे हो और हम इसी स्थान पर थोड़ी देर बैठ जाये तो यह क्षेत्र भी आपके लिए बहुत कुछ सुख शांति का कारण बन जाता है। इसलिए भी लोग अपने घरों को छोड़ क्षेत्रों की तरफ दौड़ते हैं और हर इलाके में कही न कही एक क्षेत्र तो होना ही चाहिए जहाँ पर जैन लोग रहते हैं। हम तो यह कहते हैं कि जहाँ जैनों के बड़े गाँव बसे हों, वहाँ एक न एक क्षेत्र तो कहीं न कहीं होना चाहिए। जहाँ पर उन गाँवों को छोड़कर, क्षेत्रों पर जाकर वह धर्म ध्यान करेंगे। धर्म-ध्यान अपने गाँव में नहीं कर सकेंगे, यह जब तक उचित द्रव्य, क्षेत्र नहीं मिलेगा तब तक परमात्मा बनने की योग्यता प्रकट नहीं होगी।
क्षेत्र की विशुद्धि का प्रभाव होता है। क्षेत्र पर एकान्त एवं शान्त वातावरण होने से हमारे दिमाग में अपने आप ऊर्जा भर देते हैं वह अन्यत्र स्थानों पर नहीं हो पाता है। इसलिए आचार्यों ने मुनि महाराजों के लिए भी कहा है कि अगर तुम्हें कभी भी क्षेत्र व शहर इन दोनों में से कहीं रहने को मिले तो तुम सबसे पहले क्षेत्र पर रहने की सोचना क्योंकि वहाँ पर रहने से अपने आप विशुद्धि बढ़ती है। यहाँ तक कहा है कि अगर मुनि महाराज हैं, समाधि भी लेना है तो समाधि के लिए भी पहले स्थान देखना। हमें कहा जाता है समाधि कहाँ लेनी है यह भी देखा जाता है, समाधि लेने के लिए क्षेत्र चुना जाता है और उस क्षेत्र में अगर सिद्धक्षेत्र हो तो उस क्षेत्र की सबसे पहले प्राथमिकता है। सबसे पहली Choice सिद्धक्षेत्र की, अगर सिद्ध क्षेत्र न मिले तो अतिशय क्षेत्र ठीक, अगर अतिशय क्षेत्र न मिले तो अपनी पसंद का जहाँ आप रहना पसंद करते हो जैसा भी योग्य हो बस एकान्त होना चाहिए, साधना के अनुकूल होना चाहिए। कहा गया है कि आपको चुनना पड़े तो पहले अपनी साधना के लिए सिद्धक्षेत्र को चुनना इसलिए लोग सम्मेदशिखर, चम्पापुरी, पावापुरी, गिरनार इन क्षेत्रों की ओर सबसे पहले भागते हैं।
क्षेत्रों पर जहाँ से पहले भगवान मोक्ष गये है वहाँ से अनेक अनेक मुनिराज भी मोक्ष गये हैं। आप जब भी पढ़ते होगे सम्मेदशिखर की जयमाला को तो एक-एक टोंक से करोड़ों-करोड़ों महाराज मोक्ष गये। आपको लगता होगा की यह सब मुनि महाराज यहाँ पर आकर क्यों बैठ जाते हैं, जहाँ से तीर्थंकर निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। उनके उस शरीर की वर्गणाएँ वहाँ फैली रहती है और उस स्थान पर पहुँचने के बाद आपके चित्त की शांति व विशुद्धि बढ़ जाती है। इसलिए उस सम्मेदशिखरजी से करोड़ों करोड़ों मुनिराज एक-एक टोंक से मोक्ष जाते रहे हैं चतुर्थ काल में, इसी कारण से सम्मेदशिखरजी सिद्धक्षेत्र, अतिशय क्षेत्र पवित्र कहलाते हैं। उन क्षेत्रों की विशुद्धि होती है इसलिए आचार्य कहते हैं कि अपने परिणामों को अच्छा रखना है तो अच्छे क्षेत्र की व्यवस्था करना। क्षेत्र पर व्यवस्था तुम्हें बनानी हो तो पहले से ही प्रबंध कर लेना।
उपादान की योग्यता :
कुछ क्षेत्र ऐसे भी होते हैं जहाँ गृहस्थ लोग पहले से अपनी व्यवस्था बना लेते हैं कि हम अपने जीवन का अंतिम समय ऐसे ही क्षेत्रों पर आकर गुजारना चाहेंगे। अतः हमें अपनी पूँजी से वहाँ एक कमरा लेना पड़े तो अपने नाम से बनवा लें ताकि एक कमरा हमें उस क्षेत्र पर रहने के लिए मिल जाये। ऐसे भी विचार इसलिए रखे जाते हैं क्योंकि उससे अपने उपादान में योग्यता बढ़ती है, इसलिए यहाँ कहा गया है ‘द्रव्यादिस्वादिसम्पत्ता’ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव जब यह अनुकूल हमारे लिए मिल जाते हैं। सुआदि माने होता है सु जिसके प्रारंभ में लगा हो जैसे सुद्रव्य, सुक्षेत्र, सुकाल। काल भी अच्छा होना चाहिए। अब पंचमकाल चल रहा है तो पंचमकाल में चतुर्थ काल तो आ नहीं सकता लेकिन मुक्ति की प्राप्ति करने के लिए, केवलज्ञान की प्राप्ति करने के लिए चतुर्थकाल ही चाहिए तभी अपने अंदर वह योग्यता आती है और केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। जब तक चतुर्थकाल नहीं है पंचमकाल चल रहा है तो उस पंचमकाल में भी उचित समय देखा जाता है। इस काल में भी हम अपनी साधना करें। हम अपने उपादान को योग्य बनायें तो उसमें भी चाहे कोई भी मौसम हो। मौसम तो यही रहेंगे सर्दी, गर्मी, बरसात, इन्हीं मौसमों में, इन्हीं ऋतुओं में आपको रह करके अपने अन्दर ऐसे परिणाम संजोना कि हर काल में हमारे अंदर धर्म की भावना बनी रहे और हमारे अंदर धर्म प्राप्त करने की योग्यता बढ़ती रहे। इस काल में भी और काल आ जाते हैं जिसे हम बोलते हैं संधिकाल सुबह का, संधिकाल दोपहर का, संधिकाल शाम का। संधिकाल इन कालों में भी विशेष रूप से आप अपने संकल्पों विकल्पों को छोड़कर बैठेंगे तो इन समयों में भी आपका मन लगेगा। आपके चित्त के परिणाम शान्त हो जायेंगे। यह काल का प्रभाव है आप देखेंगे की सुबह-सुबह उठकर के जब भोर हुई तो 5:30 बजे से 6 बजे का समय रहता है, जब उजाला होने वाला होता है उस समय आप सामायिक करने बैठेंगे, ध्यान करने बैठेंगे तो आपका मन अच्छा लगेगा। वह समय जब निकल जायेगा तो आप दोपहर या शाम को बैठेंगे तो इतना मन नहीं लगेगा। आपका मन अनेक कारणों से दिनभर के संकल्पों-विकल्पों से थका हुआ रहेगा। वही मन सुबह- सुबह आप बैठोगे शान्ति के साथ में तब आपको अच्छा लगेगा कि अरे इतनी जल्दी सुबह पूरी हो गई, ऐसा लगेगा अभी तो हम और बैठते हैं और बैठने की इच्छा आपके अन्दर आ जायेगी। यह भी उस काल का प्रभाव रहता है। इसलिए आचार्य पूज्यपाद महाराज ने जो लिखा है कि अपने उपादान की योग्यता बनाये रखने के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव इनकी संयोजना करो कि किस समय हमारे परिणाम अच्छे होते हैं, किस क्षेत्र में हमारे परिणाम अच्छे बनते हैं, किस द्रव्य के संयोजन से हमारे परिणाम अच्छे होते हैं यह सब संयोजना बनाकर रखो। भावों की योग्यता जब बन जायेगी तो आपके उपादान की योग्यता पूरी हो जायेगी, जब तक यह योग्यता पूरी नहीं होती तब तक अधूरे में भी काम चलाना पड़ेगा। उस योग्यता को गिराना नहीं है, जितनी योग्यता आप ने प्राप्त कर ली वह भी बनी रहे, यह भी बहुत बड़ी बात है और वह योग्यता और भी बढ़ती चली जाये तो और भी अच्छी बात है लेकिन वह योग्यता जितनी मिली है उससे आप गिरे नहीं। उस अपूर्ण योग्यता के साथ आप को जितना हो सके उतना करना है, यह सोचकर नहीं बैठना है कि अभी तो पंचमकाल चल रहा है, अभी इसमें न केवलज्ञान होता है न मोक्ष होता है, न आत्मा का ध्यान होता है, कुछ नहीं होता है, इसलिए खाओ, पियो और मौज करो।
यह सोचकर बैठोगे तो कुछ होने वाला नहीं है। आचार्य कहते हैं इस योग्यता में भी आप बहुत कुछ कर सकते हो। जिस समय जिस जीव को जो निमित्त मिल जाये वह उसी से अपनी योग्यता को बढ़ा सकता है। आप तो बहुत योग्य हैं। ऐसे भी व्यक्ति हैं जिनमें इतनी भी योग्यता न हो कि वह सभा में आकर बैठ सके तो वह भी अपनी योग्यता को बढ़ा सकता है। ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें धर्म का ज्ञान नहीं होता, जिन्हें पता नहीं होता धर्म क्या होता है? लेकिन फिर भी वह कभी ऐसे निमित्त प्राप्त कर लेते हैं तो उनके अन्दर ऐसी योग्यता आ जाती है कि वह आपसे पहले योग्य बन सकता है। आप कल्पना करो कि एक व्यक्ति कोई आपके सामने ऐसा बैठा हो, जो निम्न जाति का हो, उसके अंदर कोई ज्ञान नहीं हो, उसके अंदर किसी भी प्रकार की कोई शुद्धियाँ नहीं हो और वह व्यक्ति कभी किसी मुनि महाराज के पास आकर उनसे कोई भी संकल्प लेकर अपने अंदर धर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न कर ले और चुपचाप यहाँ से चला जाये। वह केवल उस एक संकल्प के माध्यम से अपना जीवन गुजार लें तो वह उस संकल्प के माध्यम से स्वर्ग में चला जायेगा। उस स्वर्ग से आने के बाद ऐसा मनुष्य बन जायेगा कि उसी भव से केवलज्ञान प्राप्त करने की योग्यता उसके अन्दर आ जायेगी और हो सकता है कि आप अटक जायें। आप इन सब निमित्तों के बाद भी इतनी श्रद्धा उत्पन्न नहीं कर पाये जितनी श्रद्धा एक अयोग्य व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
राजा श्रेणिक का नाम आपने सुना है यह उनके पूर्व भव की कहानी है। उनके पूर्व भव की जो घटना है वह इसी अयोग्यता से शुरू होती है। अपने दो भव पहले वह एक भील की पर्याय में था और भील की पर्याय में रहकर वह सब प्रकार की हिंसा करता था, व्यसन करता था और सब प्रकार के पाप करता था। उस पर्याय में उसे जंगल में एक मुनि महाराज मिल गये और वह उनके पास बैठ गया। मुनि महाराज ने उसे देखकर कहा ‘तुझे धर्म लाभ हो’। अब वह भील आदमी ठहरा उसे यह ही नहीं पता कि धर्म क्या है? धर्म का लाभ क्या है? कहने लगा महाराज हमें तो यह ही नहीं पता कि धर्म क्या होता है और धर्म से क्या लाभ होता है? हम तो जो कर रहे हैं उसी को धर्म समझते हैं। महाराज ने उससे कहा कि तेरे लिये धर्म यह है कि तू किसी भी प्रकार का माँस मदिरा खाना-पीना छोड़ दे। इसी से तुझे धर्म की, पुण्य की प्राप्ति होगी और इसी धर्म के माध्यम से तुझे धर्म लाभ होगा उससे तुझे स्वर्ग आदि की प्राप्ति होगी, उससे बाद में तेरे कल्याण का मार्ग बन जायेगा। जब उसने यह सुना महाराज ने कहा है कि माँस खाना छोड़ दो, मदिरा सेवन करना छोड़ दो। वह कहने लगा महाराज इस भील की पर्याय में तो माँस व मदिरा छूट ही नहीं सकता। अब महाराज सोचते हैं भव्य दिख रहा है, कम से कम बैठकर बात कर रहा है। जंगली होकर के भी कुछ योग्यता तो है और इसी योग्यता को परख कर महाराज ने उससे कहा कि कोई बात नहीं तू जीवन भर के लिए माँस व मदिरा नहीं छोड़ सकता तो बता तूने कभी कौवे का माँस खाया क्या? पूछा उससे तो वह बोला उसकी तो कभी भी जरूरत नहीं पड़ी और इसको तो मैंने कभी नहीं खाया है और आप कहो तो कभी नहीं खाऊँगा। महाराज ने कहा तू यही एक संकल्प ले ले कि मैं अपने जीवन में कभी कौवे का माँस नहीं खाऊँगा और उसने सहजता से स्वीकार कर लिया। उसने वह नियम ले लिया। महाराज से कहा- बिल्कुल पक्की बात अगर इतने से हमारा कल्याण हो जाये, हमें धर्म की प्राप्ति हो जाये तो हम तैयार हैं। सबकी योग्यता अलग-अलग होती है आप यह मत सोचना कि उस भील के लिए जो यह कहा जा रहा है यह तुम्हारे लिए भी हो जाये। तुम्हारी योग्यता अलग है और उस भील की योग्यता अलग है। वह जिस कुल, जिस जाति में पैदा हुआ है वहाँ उसके लिए वह चीज बहुत बड़ी है और तुम जिस कुल में पैदा हुए हो तो वह चीज तुम्हें निम्नता की ओर ले जाती है और उस चीज से आपको मुक्ति मिल गई तो वह कोई बड़ी बात नहीं है।
आप का आचरण वह होना चाहिए कि जो है उससे और अधिक होना और वह भील भी वही कर रहा है। उसने कभी माँस का त्याग नहीं किया था लेकिन मुनि महाराज के कहने पर उसने कौवे का माँस छोड़ दिया। जब योग्यता हो जाती है तो योग्य होने पर कक्षा में बैठा जाता है और जब बैठा जाता है तो उस कक्षा की परीक्षा आपको देनी पड़ती है। जैसे किसी भी क्लास में प्रवेश पाने के लिए एक योग्यता देखी जाती है, इससे पहले की मार्कशीट क्या थी, योग्यता क्या थी। इससे पहले आपकी Qualification क्या थी, तब जाकर नया admission आपको कहीं मिलता है तो उस कक्षा में बैठ गये तो आपकी परीक्षा भी होती है आपको पढ़ाया भी जाता है। इसी तरह जब कोई व्रती व्रत या संकल्प लेता है तो उसके लिए भी परीक्षा की कोई घड़ी आ जाती है, और उस भील के जीवन में भी ऐसा ही एक योग बन गया। वह बीमार पड़ गया और जब उसे देखने के लिए कोई वैद्य आया तो उस वैद्य ने उसके लिए कहा कि यह कौवे का माँस खाने से ठीक होगा। अब वह भील सोचता है कि यह कौन सी बात हो गई, यह कौन सा रोग है जो उसी से ठीक होगा। वह कहता है कि मैं कौवे का माँस नहीं खाऊँगा। अब उसके घर-परिवार के लोग उसे समझाते हैं और यहाँ तक कि उसका बहनोई उसको दूसरे गाँव यह समझाने के लिए आता है कि मेरा साला बीमार पड़ा है और वह इतनी सी जिद पर अड़ा पड़ा है कि मैं कौवे का माँस नहीं खाऊँगा। अगर दवाई के रूप में खा ले तो क्या बिगड़ जायेगा, कम से कम जिन्दगी बच जायेगी। यह काम है हमारे रिश्तेदारों के जब भी आप कोई व्रत या संकल्प लेते हो या थोड़ा सा धर्म करते हो तो सबसे ज्यादा पीड़ा उन्हें होगी जिनसे तुम्हें काम नहीं पड़ता है। उन्हें कभी पता भी पड़ गया कि आप किसी धर्म मार्ग पर जाने वाले हो या किसी महाराज से व्रत लेने वाले हो तो सबसे पहले वही रोकने के लिये सामने आ जायेंगे। इसलिए आचार्य कहते हैं कि परमार्थ से अपने सारे सगे सम्बन्धी दुश्मन हैं। व्यवहार से तो ये सब सगे सम्बन्धी हैं लेकिन परमार्थ से मतलब अगर हम वास्तव में देखें, निश्चय से देखें, आत्म कल्याण की दृष्टि से देखें, तो यह सब हमारे लिए दुश्मन हैं। वह बहनोई उसका उस गाँव से चलता है तो रास्ते में उसे वृक्ष के नीचे खड़ी हुई एक स्त्री मिलती है। वह स्त्री रो रही होती है तो वह बहनोई उससे पूछता है कि आप क्यों रो रही हो? वह स्त्री कहती है कि मैं इस वन की यक्षिणी देवी हूँ और तुम जिस व्यक्ति को माँस खिलाने के लिये जा रहे हो और वह व्यक्ति माँस नहीं खायेगा तो उस पुण्य व धर्म के कारण से मेरा पति हो जायेगा क्योंकि वह यक्ष देव बन जायेगा।
यह मैंने अपने ज्ञान से जाना है कि वह मेरा पति बनने वाला है, मेरा देव होगा लेकिन तुम उसको माँस खिलाने जा रहे हो और अगर उसने माँस खा लिया तो वह नियम से तिर्यंच गति को प्राप्त होगा। इसलिए मैं रो रही हूँ कि तुम मेरे होने वाले पति से मेरा विछोह कराने के लिए जा रहे हो। उस यक्षिणी की बात सुनकर बहनोई ने सोचा अब घर से निकल तो गये हैं चलते हैं, देखते हैं क्या होता है? वह अपने साले के पास में पहुँचा। उस भील के पास पहुँचा जिसका नाम था ‘खादिरशाह’ (भील का नाम)। उस भील के पास पहुँच कर कहता है क्यों भाई क्यों इतनी जिद कर रहे हो, अपना स्वास्थ्य संभालो, बीमार पड़े हो, वैद्य ने कहा है कि माँस खाना है थोड़ा सा उस माँस को खाने से अगर तुम्हारा जीवन बच जाये तो क्या फर्क पड़ता है? लेकिन वह भील कहता है कि मैं मर जाऊँगा पर माँस नहीं खाऊँगा क्योंकि मैंने मुनिमहाराज से नियम लिया है। मैंने अपने जीवन में कोई धर्म किया ही नहीं मुझे मालूम नहीं धर्म क्या होता है? लेकिन महाराज ने कहा यही तेरे लिए धर्म है तो अगर यह धर्म भी छूट गया तो मेरे पास कुछ भी धर्म नहीं रहेगा इसलिए मैं यह माँस नहीं खाऊँगा। जब उसका बहनोई यह देख लेता है कि यह अपनी बात पर दृढ़ है तो वह उसे यह घटना सुनाता है। देखो ! बहुत अच्छी बात है, आप ऐसा नहीं कर रहे हो और इसके पुण्य से जो आपको सगति मिलेगी, वह हमें पहले से ही मालूम है। जब हम रास्ते से आ रहे थे तो हमें एक यक्षिणी देवी मिली और उस देवी ने मुझसे कहा की इस माँस के त्याग के कारण से वह भील मेरा पति होने वाला है। तुम जाकर के उस देवी के देव बनोगे यह निश्चित हो चुका है, इसलिए तुमने बहुत अच्छा सोचा है। धर्म के फल से सद्गति की प्राप्ति होती है। जब उसने यह सुन लिया तो वह सोचता है कि एक कौवे के माँस का त्याग करने से हम किसी यक्ष के रूप में देव बन सकते हैं यक्ष देव बन सकते हैं तो हमसे पहले मुनि महाराज ने कहा था कि तू माँस का त्याग कर दे किसी प्रकार का माँस न खाना, किसी भी प्रकार की शराब मत पीना और उस समय हमने अपनी अयोग्यता व्यक्त कर दी तो महाराज ने उस समय हमारे लिए एक छोटा सा नियम दिला दिया। उसके मन में विचार आता है मर तो रहा हूँ, मरना तो निश्चित है ही तो मरने से पहले महाराज की बात भी पूरी हो जाये कि अब माँस व मदिरा जीवन में नहीं लेना और उसने अपने मन में ही संकल्प ले लिया। अब मैं कभी भी मांस व मदिरा नहीं खाऊँगा जितना जीवन बचा है उसमें मेरा सबका त्याग। उसने सब प्रकार के मांस व शराब का त्याग कर दिया और जब वह इस संकल्प के साथ मरण को प्राप्त हुआ तो सौधर्म स्वर्ग में जाकर देव बना, वह स्वर्ग के देवों में भवनत्रिक देवों से भी ऊपर का देव बन गया। यह यक्ष-यक्षिणी तो व्यंतर देवों में होते हैं।
चार प्रकार के देवो में जो व्यंतर देव होते हैं उनके भेदों में यक्ष-यक्षिणी होते हैं। वह सौधर्म स्वर्ग में जाकर अच्छा वाला देव बन गया। इधर जब उसका मरण हो गया और उसकी सब क्रिया- करम करके बहनोई उसी रास्ते से जाता है तो वही स्त्री उसे फिर मिल जाती है, यक्षिणी और वह रो रही होती है। अब वह बहनोई पूछता है क्यों तुम्हारा पति वह यक्ष के रूप में बनना था बन गया। वह यक्षिणी कहती है वह यक्ष बनता तो मेरा पति बनता लेकिन तुमने जाकर उसको समझाया और उसकी समझ में आ गया तो उसने अपने लिए और बढ़कर के त्याग कर दिया और वह सौधर्म स्वर्ग में जाकर देव बन गया। इसे कहते हैं त्याग व संकल्प की महिमा और इसे कहते हैं अयोग्य से योग्य बनने की प्रक्रिया।
एक भील अगली पर्याय में सौधर्म स्वर्ग का देव बन गया। जब उसकी 1-2 सागर की आयु पूरी हो गई थी तो वह यहाँ आकर राजा श्रेणिक के रूप में भगवान महावीर स्वामी का शिष्य बनता है। एक भील अगले जन्म में राजा श्रेणिक बन गया व इस पर्याय में वह भगवान महावीर के समक्ष रहा। मुख्य श्रोता के रूप में रहा और वहाँ पर उसको जो सम्यग्दर्शन आदि की प्राप्ति हुई उसी काल में उसी क्षेत्र से उसी भगवान के समक्ष उसको क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त हो गया।
एक बार सम्यक्त्व की प्राप्ति होना अर्थात् अनंत संसार को तोड़ देना और नियम से उस आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होगी। अयोग्य तो अनादिकाल से रहा लेकिन योग्य बनने के लिए एक निमित्त काम आ गया। वह निमित्त कौन सा, गुरु महाराज, मुनि महाराज का। उसके लिए एक निमित्त इतना बड़ा काम आ गया कि उसकी सारी अयोग्यता छूट गई और वह दूसरे भव में सौधर्म स्वर्ग में देव बन गया और तीसरे भव में राजा श्रेणिक बन गया और श्रेणिक की पर्याय में उसे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो गई। शास्त्रों में लिखा है वह क्षायिक सम्यग्दृष्टि बन चुका था। लेकिन उस श्रेणिक की पर्याय में उसे जब तक भगवान महावीर न मिले तब तक उससे पहले उसने अनेक प्रकार के पाप किये क्योंकि वह पुण्य के उदय से राजा बन गया था लेकिन धर्म तो उसको पता ही नहीं था। जब तक उसे भगवान महावीर न मिले तब तक उससे वह पाप हो गया, उस पाप से उसे नरक आयु का बंध हो गया और उस नरक आयु के कारण से वह आज वर्तमान में पहले नरक में रह रहा है और वह सम्यग्दृष्टि जीव है, वहाँ पर भी क्षायिक सम्यग्दृष्टि है। भगवान महावीर स्वामी के समवशरण में इतनी विशुद्धि उसने बढ़ा ली कि तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया। अभी अवसर्पिणी काल चल रहा है जब उत्सर्पिणी काल शुरू होगा जिसमें तीर्थंकर बनना शुरू होंगे। सबसे पहला तीर्थंकर बनने का सौभाग्य भी उस श्रेणिक के जीव को ही मिलेगा। पहले से सब निश्चित है। वह महापद्म नाम के पहले तीर्थंकर बनेंगे। वह योग्यता उसके अन्दर इस ढंग से आ गई कि उसने अपने जीवन को इन 3-4 भवों में ही तीर्थंकर बनने के योग्य बना लिया। इसे कहते हैं ‘योग्योपादानयोगेन’ ऐसा योग्य उपादान, उपादान अर्थात् अपनी आत्मा की शक्ति ऐसी बन जायें। जितने भी हमें अच्छे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव मिल रहे हैं उसे कम मत समझो। एक भील का उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि एक भील जंगल में रहकर भी अपने उपादान में इतनी योग्यता ला सकता है। आप तो बहुत बड़े-बड़े काम कर रहे हो और उन बड़े कामों से आपकी श्रद्धा बढ़ती रहनी चाहिए। सम्यग्दर्शन के प्राप्त करने के भाव निरन्तर बने रहने चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि यह तो हमारा कुल धर्म है इसलिए हम ऐसा कर रहे हैं करना है ऐसा नहीं। उस धर्म को करने से हमारे अन्दर धर्म की श्रद्धा बढती रहेगी और श्रद्धा ही वह तत्त्व है जो हमारे अंदर की योग्यता एकदम से बढा देगा और अयोग्य को भी योग्य बना देता है। आपमें श्रद्धा पैदा हो जाये, सब कुछ करने के बाद भी श्रद्धा हो जाये जरूरी नहीं है और इसीलिए यह अयोग्यता बनी रहती है। योग्यता के लिए केवल एक चीज है तो वह है श्रद्धान पैदा हो जाना कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति का मार्ग यही है। आत्मा के कल्याण का मार्ग यही है। ऐसी श्रद्धा आपको किसी भी रूप में प्राप्त हो सकती है।
सम्यग्दर्शन प्राप्ति के उपाय :
आचार्यों ने कहा है कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के दस तरीके है। दस तरीके से सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति हो सकती है। सबसे पहला तरीका आज्ञा सम्यक्त्व। आज्ञा सम्यक्त्व का मतलब है कि जो भगवान ने कहा है, जिनवाणी में जो लिखा है भले ही वह हमें समझ नहीं आ रहा है, दिखाई नहीं दे रहा है फिर भी हमने उसे स्वीकार कर लिया है कि भगवन् आपने जो कहा है वह अन्यथा नहीं है। मान लो भगवान ने कहा है कि छः द्रव्य होते हैं, आप छः द्रव्य पर श्रद्धा रख लेना, आप कहोगे कि हम श्रद्धा कैसे कर ले हमें छः द्रव्य दिखाई तो नहीं देते। ना हमें जीव, ना धर्म ना अधर्म, ना काल, ना आकाश द्रव्य दिखाई दे रहा है, सब अदृश्य द्रव्य है, इनके गुण हैं, पर्याय हैं, इनके परिणमन होते हैं। धर्म द्रव्य हमारे लिए गति में सहायक हो रहा है। अधर्म द्रव्य हमारे लिए ठहरने में सहायक हो रहा है कुछ समझ में तो आया नहीं। हमारी इच्छा होती है कि हम चले तो हम चलने लग जाते हैं धर्म द्रव्य कहाँ हमारे लिए सहायक हो रहा है लेकिन अगर जिनवाणी में लिखा है तो धर्म द्रव्य हमारे लिए चलने में सहायक है, अगर हमारा पैर भी हिल रहा है तो उसमें धर्म द्रव्य सहायक बन रहा है। हम यहाँ बैठे है तो अधर्म द्रव्य सहायक है हमारे बैठने में। क्योंकि यह ऐसे द्रव्य है जो हमारे लिए प्रेरित नहीं करते हैं उदासीन द्रव्य के रूप में कहे गये हैं लेकिन इनके बिना भी जीव पुद्गलों की स्थिति नहीं बनती है। यह श्रद्धा का विषय बन गया है तो आचार्य कहते हैं आपके अंदर सम्यग्दर्शन केवल इतनी सी आज्ञा को स्वीकार करने से आ जायेगा। कुछ नहीं आता है तो केवल भगवान की बात मान लो आज्ञा स्वीकार कर लो।
आचार्य महाराज इसे कहते हैं कि बुदेलखंड में एक शब्द चलता है ‘हओ’। जो कुछ कहा महाराज सुन लिया। ‘हओ’। हओ कहना सीख लो। आचार्य महाराज भी जब हम शिष्यों को पढ़ाते थे तो कहते थे कुछ समझ में ना आये तो हओ कहना सीख लो। ज्यादा तर्क-वितर्क मत करो जब कभी हम उनसे ज्यादा पूछ लेते थे या बोलने लग जाते थे या गुरु महाराज से प्रश्न करते थे तो कहते थे हाथ जोड़कर हओ कहना सीख लो-जिनवाणी।
इसमें अपनी बुद्धि ज्यादा चलाने से कोई श्रद्धा नहीं बढ़ जायेगी। बुद्धि उतनी चलेगी जितनी हमारे अंदर बुद्धि चलाने की क्षमता होगी। यह तो उससे ऊपर की चीजें हैं, शास्त्रों में जो यह अदृश्य बातें लिखी हैं यह द्रव्य, गुण, पर्याय यह कहाँ हमको दिखते लेकिन जब हम थोड़ा सा अनुमान ज्ञान से सोचेंगे तो हमें सब मिलेगा। श्रद्धा की भावना से देखेंगे तो हमें सब समझ आयेगा। इसलिए हमें कहना पड़ता है जो आपने कहा वो सच है।
Judgement इसी रूप में दिये जाते हैं। जब किसी अदालत में किसी को खड़ा किया जाता है तो वह यही बात करता है इस गीता पर या पुराण पर हाथ रखकर कह रहा हूँ जो बोलूँगा सच बोलूँगा, सच के सिवाय कुछ नहीं बोलूँगा लेकिन उसका सच कहना उस जज के लिए हो रहा है। व्यक्ति जानता है कि इस कटघरे में हमको खड़ा करके जज सच कहलवाना चाह रहे हैं। इस सच को हम कहेंगे तब ही लोग हमारा विश्वास करेंगे। इसलिए वह वहाँ पर कसम खाता है सच बोलने की लेकिन वह वहाँ पर सच बोले जरूरी तो नहीं क्योंकि उसके अंदर अपराध की प्रवृत्ति बैठी है। आचार्य कहते हैं कि यहाँ पर जो भी कहा जा रहा है उसे स्वीकार कर अब तुझे और कुछ मानने की जरूरत नहीं है बस तू इतना सा स्वीकार कर ले।
जो हमारे सामने कहा जा रहा है या सुनने में आ रहा है वह भी सभी समझते हैं कि जो बोलेगा सच बोलेगा। लेकिन जब आपके सामने जिनवाणी कह रही है कि जो कुछ इसमें लिखा है सच है लेकिन आप नहीं मानते हैं तो आपके सम्यग्दर्शन प्रारम्भ होगा ही नहीं। इसे आचार्य ने सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का मार्ग बताया ‘आज्ञासम्यग्दर्शन’। आज्ञा से आ जाओ आज्ञा स्वीकार कर लो। जो आज्ञा में आ जाये उसके लिए ‘हओ’ बोल दो बस। गुरु महाराज ने कुछ कहा हओ स्वीकार कर लिया, अगर नहीं भी स्वीकार हो रहा है तो उनसे कह दो कि हमारे लिए यह दिक्कत है हम उस चीज को यूँ स्वीकार नहीं कर पायेंगे। लेकिन अगर वे कह दे नहीं तुम्हें स्वीकार करना ही है तो आपको स्वीकार करना ही पड़ेगा चाहे उसके लिए आपको अपनी जान भी क्यों न देनी पड़े लेकिन वह स्वीकार करना है इसी का नाम है ‘आज्ञासम्यग्दर्शन’। यह आज्ञा है और इसी से सम्यग्दर्शन होता है। छहढाला को कभी पढ़ो तो एक नई छहढाला बनी है उसमें जब भावलिंगी मुनि का स्वरूप आता है तो “गुरु आगम आज्ञा का प्रबन्ध समकित जानो मत बनो अंध”। सम्यग्दर्शन किसे कहते हैं? गुरु की आज्ञा से जो बँधा हुआ है, वह साधु सम्यग्दृष्टि है और जिसके अंदर सम्यग्दर्शन है वह भावलिंगी है। और कोई भावलिंगी पहचान नहीं है साधु की और कोई सम्यग्दर्शन की पहचान नहीं है। सबसे बड़ी चीज है गुरु की आज्ञा में बंधा होना चाहिए और आगम की आज्ञा में बंधा होना चाहिए। आगम में जैसा लिखा है वैसा ही करने वाला होना चाहिए। आगम में बहुत सी चीजें ऐसी हैं। प्रश्न-उत्तर सामने आ जाते हैं ऐसा क्यों? इससे क्या होगा? कुछ हो या ना हो… तुझे करना तो वही है जो आगम में लिखा है। इतना अगर तेरा मन मान जाये तो इस मार्ग पर चलना। इन कक्षाओं में भर्ती होने के लिए प्रवेश form भरना, किसी गुरुके पास जाना और तेरी इतनी योग्यता ना बने तो दूर-दूर रहना। नमोस्तु कर लेना इसी से तेरा काम हो जायेगा लेकिन तूने ऐसा कर लिया उस क्लास में योग्यता प्राप्त कर ली। साधू बन गया, साधू बनने के बाद जो जिनवाणी में लिखा है वह ही समझ में नहीं आ रहा है तो तेरा सम्यग्दर्शन वहीं पर छूट जायेगा। एक अक्षर की भी अरुचि हो जाने पर सम्यग्दर्शन छूट जाता है। शास्त्र के जिनवाणी के एक अक्षर पर भी अश्रद्धान हो गया, श्रद्धान नहीं रहा तो आचार्य कहते हैं तेरा सम्यग्दर्शन छूट गया इतनी, बड़ी चीज है।
इसलिए जो आगम व गुरु की आज्ञा से बढ़ गया और उसी से अपने जीवन को चला रहा है तो उस जीव के लिए आचार्य कहते हैं यही सम्यग्दर्शन का सबसे बड़ा लक्षण है, आगम अनुसार चलो। आगम में लिखा है 28 मूलगुणों का पालन करना तो करना चाहे गर्मी हो, सर्दी हो, बरसात हो। एक ही समय भोजन और पान तो वही करना है उसमें तर्क लगाने की जरूरत नहीं है कि महाराज पहले तो बड़े-बड़े संहनन वाले जीव होते थे।
चतुर्थ काल में तो बड़े-बड़े संहनन वाले जीव होते थे। आज के 100 बरस पहले भी आचार्य शान्तिसागर जैसे आचार्य हुए तो वह भी बड़े-बड़े संहनन के धारी हो गये। कितने महान उपवास करते रहे, हम तो आजकल के लोभी, भोगी, विलासी लोग हैं। तुम अपने आप को पहचान लो, अपनी परीक्षा कर लो इतनी क्षमता हो तो form भरना और नहीं है तो दूर से नमोस्तु करना लेकिन इस मार्ग पर आने के बाद और कोई ढील, मिलावट होने वाली नहीं है। चाहे वह चतुर्थ काल हो या पंचम काल 28 मूलगूण तो यही रहेंगे, चाहे हीन संहनन वाला हो इन 28 मूलगूणों में कोई कमी आने वाली नहीं है।
तुम इसमें कमी करने का भाव भी मत करना, चाहे सर्दी, गर्मी व बरसात हो हमेशा जो नियम बने है उन्हीं नियम में ढल कर चलना और पंचम काल के अंत तक यही नियम रहेंगे। आज जो संहनन है अगले 10 सालों में और कमी आयेगी लेकिन फिर भी साधू बनेंगे और इन्हीं संहननों के साथ 28 मूलगुणों का पालन करेंगे। आचार्य परमेष्ठी कहते हैं अगर वह आगम की इसी श्रद्धा के साथ करेंगे तो वह सम्यग्दृष्टि नियम से अगली पर्याय में स्वर्ग जाने के बाद अगले भव में फिर मोक्ष की प्राप्ति कर लेंगे। यह कहलाता है ‘योग्योपादानयोगेन’। अपने उपादान को योग्य बनाते चलो और इसका योग बिठाओ। योग्य उपादान का योग बिठा लेना का मतलब जानते हो। जैसे हम बोलते हैं कोई संयोग बिठा लेना। जैसे आप अपने बेटे-बेटियों की कुंडली मिलाते हो योग बिठाते हो। योग बनाते हो। ऐसे अपने योग बनाओ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव योग। किन कारणों से हमारा उपादान योग्य बनता है या बनता चला जाये और इसमें भी हम दुनियाँ में कितना कुछ देख लें। ऐसे भी साधू दिख जाये जिनको देखकर आपकी श्रद्धा बिगड़ जाये वह भी देखना अनेक प्रकार के अपवाद देखना, वह भी दिख जाये और अनेक प्रकार के अपवाद देखने सुनने को मिल जाये तो भी अपनी श्रद्धा मत बिगाड़ना क्योंकि वह तुम्हारी योग्यता है, तुम क्या कर रहे हो? वह उनकी योग्यता है वह क्या कर रहे हैं? लेकिन तुम्हारी योग्यता क्या है? तुम अपने उपादान को योग्य बनाने के लिए ध्यान रखना कि इस पंचमकाल में भी हमें ऐसा कुछ दिख रहा है तो चतुर्थ काल में भी ऐसा होता था। लेकिन हमें कभी भी अपनी श्रद्धा को नहीं छोड़ना है और वह श्रद्धा जो समीचीन वीतराग देव, शास्त्र, गुरु के प्रति होनी चाहिए। वह हमारी श्रद्धा बनी रहेगी तो हमारे अंदर योग्यता बनी रहेगी। उस योग्यता से ही उपादान की योग्यता बढ़ती चली जायेगी और वह आत्मा समर्थ बनता चला जायेगा। अपने अंदर ऐसी शक्ति भी आती है कि अनेक प्रकार की बीमारियों, परेशानियों व अनेक प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लोग णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं करते-करते प्राण छोड़ देते हैं।
ऐसे गृहस्थों को भी देखना जो कुछ भी नहीं जानते लेकिन इतनी श्रद्धा रखते हैं कि मरते- मरते भी उनकी णमोकार मंत्र की श्रद्धा छूटती नहीं है। उनके परिणामों में वह चलता रहता है णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं। कुछ उनको इस तरह की भावना सुनने की इच्छा बनी रहती है और इसी प्रकार की इच्छा के परिणाम के साथ उनका मरण होता है तब वे नियम से ऐसे योग्य उपादान को प्राप्त कर लेते हैं। यह मत सोचना कि हमने रात्रि में भोजन करना छोड़ दिया तो बहुत बड़ा काम कर लिया। यह उपादान की कोई बहुत बड़ी योग्यता नहीं है और अगर रात्रि में भोजन कर रहे हो तो योग्यता और गिर गई है क्योंकि यह तो अपने जैन धर्म में जन्म लेने से ही था। यह कोई अलग से नियम देने की बात नहीं है कि रात्रि में भोजन नहीं करना बहुत बड़ा धर्म है। लेकिन आजकल तो यह भी बहुत बड़ी बात है। अगर आप का अभी भी रात्रि में भोजन हो रहा है तो सोचना आप अपने उपादान का क्या कर रहे हो। अयोग्य बना रहे हो। उसके मूल्य को गिरा रहे हो, उसके मूल्य को बढ़ाना है।
जो हमारे कुल के योग्य था उससे और बढ़कर के करना है। तब हमारे उपादान की योग्यता बढ़ेगी। हम जो खायें उस पर विचार करें? कब खायें उस पर भी विचार करें? और यह सब विचार आपके अंदर रहेंगे तो आपकी योग्यता बढ़ेगी।
ध्यान रखना एक भील के लिए जो एक संकल्प दिया गया वह आपके लिए किसी काम का नहीं है। अगर तुम चाहो कि महाराज आज से हम माँस व मदिरा का त्याग कर दें, हम भी ऐसे स्वर्ग में जायें, उसके बाद राजा बन जायें। उससे तुम्हें ऐसा कुछ नहीं मिलने वाला है। तुम्हें तो कुछ वह करना पड़ेगा जो तुम्हारी योग्यता में पहले से कुछ नहीं हो रहा हो उससे अच्छे से भी अच्छा करने की योग्यता तुम्हारे अंदर आयेगी तब तुम्हारे कल्याण का मार्ग बनेगा। इसलिए इस सूत्र को याद रखो।
योग्योपादानयोगेन, दृषदः स्वर्णता मता।
द्रव्यादिस्वादिसंपत्ता, वात्मनोऽप्यात्मता मता ॥
आत्मा भी परमात्मा इसी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के योग से बन जाता है।
- जैसा भगवान वैसा मैं, जैसा मैं वैसा भगवान्।
- स्वर्ण पाषाण में से स्वर्ण निकालना यानि स्वयं में भगवत्ता को प्रकट करना।
- क्षेत्र की विशुद्धि का प्रभाव हमारे मन पर होता है।
- अपने उपादान की योग्यता बनाये रखने के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव संयोजना करो।
- धर्म के प्रति श्रद्धा एवं एक छोटा संकल्प भी स्वर्ग तक पहुँचा सकता है।
- परमार्थ से अपने सारे सगे सम्बन्ध दुश्मन हैं।
- धर्म के फल से सद्गति की प्राप्ति होती है।
- एक बार सम्यक्त्व की प्राप्ति होने का अर्थ है अनंत संसार को तोड़ देना।
- आत्मा के कल्याण का मार्ग है सम्यग्दर्शन।
- श्रद्धा की भावना से देखेंगे तो हमें सब समझ आयेगा।
- गुरु की आज्ञा से जो बँधा हुआ है, वह साधु सम्यग्दृष्टि है।
- हमारी श्रद्धा बनी रहेगी तो हमारे अंदर योग्यता बनी रहेगी।
- जब उपादान की योग्यता बढ़ेगी तभी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।
English Translation of Adhyatm Yog ( Ishtopdesh ) Chapter 2
Adhyatm Yog Chapter 1 | Chapter 2 |
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अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) मुनि श्री प्रणम्यसागरजी
अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) स्वाध्याय
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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