आचार्य जिनसेन विरचित आदिपुराण पर्व 1 Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्लोक 1: अर्हंतदेव को नमस्कार
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त जिन्होंने केवलज्ञानरूपी साम्राज्य प्राप्त किया, जो धर्मचक्र धारक, लोकत्रय के अधिपति, और संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं, ऐसे श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है।
श्लोक 2 से 15 जिनेंद्र की महिमा
जिनेंद्रदेव को सूर्य के समान प्रकाशक और नमस्कार योग्य बताया गया। उनकी महिमा अजेय है, वे मिथ्यादृष्टि का खंडन करते हैं। भगवान वृषभदेव ने साम्राज्य को तुच्छ मानकर मुनिदीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने दीक्षा ली। कच्छ आदि राजाओं ने वल्कल पहने, तप सहे, और कर्मनिर्जरा की। उनकी जटाएँ ध्यानाग्नि से शोभायमान थीं। सुर-असुर उन्हें चलते मेरु पर्वत मानते थे। श्रेयांस के दान से रत्नवर्षा हुई। केवलज्ञान से वे सभा में सूर्य समान हुए और समीचीन धर्म का उपदेश दिया।
श्लोक 16 से 25 तीर्थंकर और पुराण का संकल्प
अजितनाथ से महावीर तक 23 तीर्थंकरों और गणधरों को नमस्कार। श्रुतस्कंधरूपी वृक्ष की उपासना की प्रेरणा। त्रेसठ शलाकापुरुषों (तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण आदि) के पुराण का संग्रह करने का संकल्प। यह ग्रंथ प्राचीन, महान्, और कल्याणकारी है, इसलिए महापुराण कहलाता है। यह आर्ष, सूक्त, और इतिहास रूप है।
श्लोक 26 से 35 ग्रंथकार का विनय
गणधरदेव द्वारा रचित महापुराण को अल्पज्ञानी कवि भक्ति से कहने का प्रयत्न करता है। यह गंभीर समुद्र है, जिसमें वह तैरने की हास्यास्पद कोशिश करता है। प्राचीन कवियों ने मार्ग सुगम बनाया, जैसे सिंह के बाद हिरण, हाथी के बाद बच्चे चलते हैं। वह उनकी सहायता से इस समुद्र को पार करना चाहता है।
श्लोक 36 to 45 कवियों की प्रशंसा
यदि प्रमाद से भूल हो तो विद्वान् क्षमा करें। सज्जन गुण ग्रहण करें, जैसे समुद्र से रत्न लेते हैं। सिद्धसेन आदि कवियों की समानता कांच और मणि जैसी। समंतभद्र, श्रीदत्त आदि महाकवियों को नमस्कार, जो मिथ्यामत को नष्ट करते हैं और यशस्वी हैं।
श्लोक 46 से 55 महाकवियों का सम्मान
यशोभद्र, प्रभाचंद्र, शिवकोटि, जटासिंहनंदि, काणभिक्षु, देवाचार्य आदि कवियों की स्तुति। ये विद्वानों में श्रेष्ठ, तपोलक्ष्मी से युक्त, और काव्य के मर्मज्ञ हैं। उनके वचन शास्त्रों को प्रकाशित करते हैं। भट्टाकलंक, वादिसिंह आदि के गुण मणिमाला समान हैं।
श्लोक 56 से 65 वीरसेन और कविता की महत्ता
वीरसेन, जयसेन आदि गुरुओं की प्रशंसा, जो धवलाटीका रचते हैं और शास्त्रज्ञ हैं। कविता धर्म से संबंधित होनी चाहिए, अन्यथा पाप का कारण बनती है। मिथ्यादृष्टि काव्य सज्जनों को संतुष्ट नहीं करता। कुछ कवि हास्यास्पद प्रयास करते हैं।
श्लोक 66 से 75 कवियों की कमियाँ
अयोग्य कवि दूसरों की नकल करते हैं या अधूरी रचना करते हैं। कुछ शब्दों से सुंदर, पर अर्थहीन काव्य रचते हैं। शास्त्रज्ञान बिना काव्य करना साहस है। बुद्धिमानों को धर्मोपदेशी काव्य करना चाहिए। उत्तम कवि दोषों से नहीं डरता, जैसे सूर्य उलूक से।
श्लोक 76 से 85 सज्जन-दुर्जन का स्वभाव
कवि को अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए, सबको संतुष्ट करना असंभव। लोग शब्द, अर्थ, समास आदि में भिन्न रुचि रखते हैं। सज्जन गुण, दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। दुर्जन निर्दोष कथा को दूषित करते हैं, सज्जन दोषयुक्त को निर्दोष बनाते हैं।
श्लोक 86 से 95 काव्य का स्वरूप
दुर्जन धर्मकथा से दुखी, सज्जन प्रसन्न होते हैं। मिथ्यादृष्टि को ओषधि अरुचिकर लगती है। दुर्जन स्वभाव से टेढ़े, सज्जन जगत को सज्जन नहीं बना पाते। सज्जनता-दुर्जनता का स्वभाव बताया। कवि सज्जनों के आश्रय से काव्य समुद्र पार करना चाहता है।
श्लोक 96 से 105 महाकाव्य की परिभाषा
काव्य अलंकार, रस, और मौलिक होना चाहिए। रीति, लालित्य, रसहीन काव्य ग्रामीण भाषा है। महाकवि प्राचीन इतिहास और धर्म रचते हैं। शब्द, रस, छंद सुलभ होने से कविता में दरिद्रता नहीं। कवि को महाकवियों की छाया लेनी चाहिए। प्रतिभा और गुणों से काव्य यश देता है।
श्लोक 106 से 116 काव्य और धर्मकथा की महिमा
धर्मकथा यश और पुण्य का मूलधन है। यह कथा धर्मशास्त्र से संबंधित है। इसमें ऋषभनाथ जैसे महापुरुषों का चरित्र है। यह कल्पलता-सी फलदायी, सरोवर-सी गंभीर, आकाशगंगा-सी पवित्र, और दर्पण-सी प्रतिबिंबित है। यह मिथ्यामत नष्ट करती और वैराग्य बढ़ाती है। इसे सज्जन सुनें।
श्लोक 117 से 126 कथा और वक्ता के लक्षण
कथा में धर्म, अर्थ, काम का वर्णन होता है। धर्मयुक्त सत्कथा है। अधर्मकथा पाप का कारण है। सद्धर्मकथा स्वर्ग-मोक्ष देती है। इसके सात अंग हैं। द्रव्य, क्षेत्र, तीर्थ, काल, भाव, फल, और प्रकृत इनका विस्तार होगा।
श्लोक 127 से 136 वक्ता की योग्यताएँ
वक्ता सदाचारी, स्थिरबुद्धि, और इंद्रिय-नियंत्रक हो। उसकी वाणी स्पष्ट, निर्मल, और प्रिय हो। वह उदाहरणों और भाषाओं में निपुण हो। वक्ता अंग न हिलाए, न हँसे, और हितकारी वचन बोले। वह चार प्रकार की कथाएँ कहे।
श्लोक 137 से 146 श्रोता के लक्षण
श्रोता धर्म सुनने में तत्पर हो। चौदह प्रकार के श्रोता हैं। गाय और हंस जैसे उत्तम, मिट्टी और तोता जैसे मध्यम, अन्य अधम हैं। श्रोता गुण-दोष बताए। उसे सांसारिक फल न चाहें। शुश्रूषा आदि आठ गुण श्रोताओं में हों।
श्लोक 147 से 156 कथावतार का प्रारंभ
कथा से पुण्य, स्वर्ग, और मोक्ष मिलता है। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने उनकी पूजा की। केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इंद्र ने समवसरण बनाया। भरत ने भगवान को नमस्कार कर स्तुति की। सभा संतुष्ट हुई।
श्लोक 157 से 166 भरत की प्रशंसा
सभा भगवान से प्रबोध पाकर शोभित हुई। उनकी वाणी अज्ञान नष्ट करती है। भरत उनके दर्शन और वचन से कृतार्थ हुए। धर्मोपदेश मेघवर्षा-सा है। भगवान सब तत्त्व बताते हैं। भरत और प्रश्न पूछना चाहते हैं।
श्लोक 167 से 171 भरत का प्रश्न
भक्ति से भरत भगवान से पूछते हैं। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, बलभद्र, और प्रतिनारायणों का चरित्र सुनना चाहते हैं। उनके नाम, गोत्र, लक्षण, और संख्या जानना चाहते हैं।
श्लोक 172 से 180 प्रश्न का विस्तार
भरत युगों, मनुओं, लोक, काल, और वंशों का स्वरूप जानना चाहते हैं। वे संशय नष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। सभा ने प्रश्न की प्रशंसा की। देवों ने भरत पर पुष्पवृष्टि की।
श्लोक 181 से 190 भगवान का उपदेश
इंद्र ने भरत को धन्य कहा। भगवान प्रश्न समझकर वाणी से पुराण कहने लगे। उनकी ध्वनि आश्चर्यकारी थी। यह एकरूप होकर भी अनेकरूप हुई। उनकी वाणी सभा को संतुष्ट करती है। भरत के प्रश्नों का क्रमशः उत्तर दिया।
श्लोक 191 से 200 पुराण की परंपरा
भगवान ने शलाकापुरुषों का चरित्र कहा। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। यह अजितनाथ से महावीर तक प्रकाशित हुआ। चतुर्थ काल में महावीर विपुलाचल पर आए। श्रेणिक ने पूछा। गौतम ने वर्णन किया। गौतम, सुधर्म, जंबू ने परंपरा चलाई।
श्लोक 201 से 210
महावीर मूलकर्ता और गौतम उत्तरकर्ता हैं। यह पुराण प्रमाणभूत और कल्याणकारी है। इसका अध्ययन से शांति, आरोग्य, कर्मनिर्जरा होती है। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता वृषभसेन के मार्ग पर चलता है। यह पुराण सूर्य-सा मिथ्यामत नष्ट कर मोक्षमार्ग प्रकाशित करता है।
श्लोक ( Shlok ) 1
श्रीमते सकलज्ञानसाम्राज्यपद्मीयुषे । धर्मचक्रभृते भत्रै नमः संसारभीमुपे ॥ १ ॥
जो अनंतचतुष्टयरूप अंतरंग और अष्टप्रातिहार्यरूप बहिरंग लक्ष्मी से सहित है जिन्होंने समस्त पदार्थों को जानने वाले केवलज्ञानरूपी साम्राज्य का पद प्राप्त कर लिया है, जो धर्मचक्र के धारक हैं, लोकत्रय के अधिपति हैं और पंच परावर्तनरूप संसार का भय नष्ट करने वाले हैं, ऐसे श्री अर्हंतदेव को हमारा नमस्कार है ।
English translation of Ādi purāṇa parv 1
“One who is endowed with the inner wealth of infinite fourfold qualities (ananta-chatushtya) and the outer wealth of eight miraculous attributes (ashta-pratiharya), who has attained the throne of omniscient knowledge (kevala-jñāna), who is the bearer of the wheel of Dharma, the lord of the three worlds, and the destroyer of the fear arising from the fivefold cycle of worldly existence (panch-paravartan-rupa-samsara). To such revered Lord Arhat, we offer our salutations.
विशेष―इस श्लोक में सब विशेषण ही विशेषण हैं, विशेष्य नहीं है । इससे यह बात सिद्ध होती है कि उक्त विशेषण जिसमें पाये जायें वही वंदनीय है । उक्त विशेषण अर्हंत देव में पाये जाते हैं अत: यहाँ उन्हीं को नमस्कार किया गया है । अथवा ‘श्रीमते’ पद विशेष्य―वाचक है । श्री ऋषभदेव के एक हजार आठ नामों में एक श्रीमत् नाम भी है जैसा कि आगे इसी ग्रंथ में कहा जावेगा―‘श्रीमान स्वयंभूर्वृषभः’ आदि । अत: यहाँ कथानायक श्री भगवान् ऋषभदेव को नमस्कार किया गया है । टिप्पणीकार ने इस श्लोक का व्याख्यान विविध प्रकार से किया है जिसमें उन्होंने अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, भरत चक्रवर्ती, बाहुबली, वृषभसेन गणधर तथा पार्श्वनाथ तीर्थकर आदि को भी नमस्कार किया गया प्रकट किया है । अत: उनके अभिप्राय के अनुसार कुछ विशेष व्याख्यान यहाँ भी किया जाता है । भगवान् वृषभदेव के पक्ष का व्याख्यान ऊपर किया जा चुका है ।
अरहंत परमेष्ठी के पक्ष में ‘श्रीमते’ शब्द का अर्थ अरहंत परमेष्ठी लिया जाता है; क्योंकि वह अंतरंग बहिरंग लक्ष्मी से सहित होते हैं । सिद्ध परमेष्ठी के पक्ष में ‘सकलज्ञानसाम्राज्यपदमीयुषे’ पद का अर्थ सिद्ध परमेष्ठी किया जाता है; क्योंकि वह संपूर्ण ज्ञानियों के साम्राज्य के पद को-लोकाग्रनिवास को प्राप्त हो चुके हैं । आचार्य परमेष्ठी के पक्ष में ‘धर्मचक्रभृते’ पद का अर्थ आचार्य लिया जाता है; क्योंकि वह उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों के चक्र अर्थात् समूह को धारण करते हैं । उपाध्याय परमेष्ठी के पक्ष में भत्रें पद का अर्थ उपाध्याय किया जाता है; क्योंकि वह अज्ञानांधकार से दूर हटाकर सम्यग्ज्ञानरूपी सुधा के द्वारा सब जीवों का भरण-पोषण करते हैं और साधु परमेष्ठी के पक्ष में ‘संसारभीमुषे’ शब्द का अर्थ साधु लिया जाता है क्योंकि वह अपनी सिंहवृत्ति से संसार-संबंधी भय को नष्ट करने वाले है ।
इस श्लोक में जो ‘श्रीमते’ आदि पद हैं उनमें जातिवाचक होने से एकवचन का प्रत्यय लगाया गया है अत: भूत भविष्यत् वर्तमान कालसंबंधी समस्त तीर्थंकरों को भी इसी श्लोक से नमस्कार सिद्ध हो जाता है । भरत चक्रवर्ती के पक्ष में इस प्रकार व्याख्यान है―जो नवनिधि और चौदह रत्नरूप लक्ष्मी का अधिपति है, जो सकलज्ञानवान् जीवों के संरक्षणरूप साम्राज्य-पद को प्राप्त है, (सकलाश्च ये ज्ञाश्च सकलज्ञाः, सकलज्ञानाम् असं जीवनं यस्मिस्तत् तथाभूतं यत्साम्राज्यपदं तत᳭ ईयुषे) जो पूर्व जन्म में किये हुए धर्म के फलस्वरूप चक्ररत्न को धारण करता है, (धर्मेण-पुराकृतसुकृतेन प्राप्तं यच्चक्रं तद् विभर्तीति तस्मै) जो, षट्खंड भरतक्षेत्र की रक्षा करने वाला है और जिसने संसार के जीवों का भय नष्ट किया है अथवा षट्खंड भरत-क्षेत्र में सब ओर भ्रमण करने में जिसे किसी प्रकार का भय नहीं हुआ है (समंतात् सरणं भ्रमणं संसारस्तस्मिन् भियं मुष्णातीति तस्मै) अथवा जो समीचीन चक्र के द्वारा सबका भय नष्ट करने वाला है (अरै: सहितं सारं चक्ररत्नमित्यर्थ:, सम्यक् च तत् सारंच संसारं तेन भियं मुष्णातीति तस्मै) ऐसे तद्भवमोक्षगामी चक्रधर भरत को नमस्कार है ।
बाहुबली के पक्ष में निम्न प्रकार व्याख्यान है―जो भरत चक्रधर को त्रिविध युद्ध में परास्त कर अद्भुत शौर्यलक्ष्मी से युक्त हुए हैं जो धर्म के द्वारा अथवा धर्म के लिए चक्ररत्न को धारण करने वाले भरत के स्तवन आदि से केवलज्ञानरूप साम्राज्य के पद को प्राप्त हुए हैं । एक वर्ष के कठिन कायोत्सर्ग के बाद भरत-द्वारा स्तवन आदि किये जाने पर ही बाहुबली स्वामी ने निःशल्य हो शुक्लध्यान धारण कर केवलज्ञान प्राप्त किया था । जो इभर्त्रे―(इश्चासौ भर्ता च तस्मै) कामदेव और राजा दोनों हैं अथवा इभर्त्रे (या भर्ता तस्मै)―लक्ष्मी के अधिपति हैं और कर्मबंधन को नष्ट कर संसार का भय अपहरण करने वाले हैं ऐसे श्री बाहुबली स्वामी को नमस्कार हो ।
इस पक्ष में श्लोक का अन्वय इस प्रकार करना चाहिए―श्रीमते, धर्मचक्रभृता, सकलज्ञानसाम्राज्यपदमीयुषे, संसारभीमुषे, इभर्त्रे, नमः ।
वृषभसेन गणधर के पक्ष में व्याख्यान इस प्रकार है । श्रीमते यह पद चतुर्थ्यंत न होकर सप्तम्यंत है―(श्रिया-स्याद्वादलक्ष्म्या उपलक्षितं मतं जिनशासनं तस्मिन्) अतएव जो स्याद्वादलक्ष्मी से उपलक्षित जिनशासन―अर्थात् श्रुतज्ञान के विषय में परोक्ष रूप से समस्त पदार्थों को जानने वाले ज्ञान के साम्राज्य को प्राप्त हैं, जो धर्मचक्र अर्थात् धर्मों के समूह को धारण करने वाले हैं―पदार्थों के अनंत स्वभावों को जानने वाले हैं, मुनिसंघ के अधिपति हैं और अपने सदुपदेशों के द्वारा संसार का भय नष्ट करने वाले हैं ऐसे वृषभसेन गणधर को नमस्कार हो ।
‘‘भुवं धरतीति धर्मो धरणींद्रस्तं चक्राकारेण बलयाकारेण समीपे बिभर्तीति धर्म-चक्रभृत् पार्श्वतीर्थंकर: तस्मै’’ । उक्त व्युत्पत्ति के अनुसार ‘धर्मचक्रभृते’ शब्द का अर्थ पार्श्वनाथ भी होता है अत: इस श्लोक में भगवान् पार्श्वनाथ को भी नमस्कार किया गया है । इसी प्रकार जयकुमार, नारायण, बलभद्र आदि अन्य कथानायकों को भी नमस्कार किया गया है । विशेष व्याख्यान संस्कृत टिप्पण से जानना चाहिए । इस श्लोक के चारों चरणों के प्रथम अक्षरों से इस ग्रंथ का प्रयोजन भी ग्रंथकर्ता ने व्यक्त किया है―‘श्रीसाधन’ अर्थात् कैवल्यलक्ष्मी को प्राप्त करना ही इस ग्रंथ के निर्माण का प्रयोजन है ।।1।।
Special Note: This verse is composed entirely of attributes without explicitly stating the subject (viṣeya). This implies that whoever embodies these attributes is worthy of veneration. These attributes are found in Lord Arihant, and thus, the verse offers salutations to him. Alternatively, the term “Śrīmate” is interpreted as referring to a specific subject. Among the 1,008 names of Lord Ṛṣabhanātha mentioned later in this text, one is Śrīmat (as cited in the verse “Śrīmān Svayambhūvṛṣabhaḥ”). Hence, the verse salutes Lord Ṛṣabhanātha, the protagonist of this scripture.
The commentator has interpreted the verse in various ways, extending salutations to Arihant, Siddha, Ācārya, Upādhyāya, Sādhu, Bharata Chakravarti, Bahubali, Ṛṣabhasena Gaṇadhara, and Pārśvanātha Tīrthaṅkara. According to their perspective, a broader interpretation is presented here.
Salutation to Ṛṣabhanātha:
The explanation for Lord Ṛṣabhanātha has already been provided above.
In Context of Arihant Paramesthi:
The term “Śrīmate” refers to Arihant Paramesthi, as they possess both inner and outer wealth.
In Context of Siddha Paramesthi:
The phrase “Sakalajñānasāmrājyapadamīyuṣe” refers to Siddha Paramesthi, as they have attained the supreme abode of knowledge (Lokāgra).
In Context of Ācārya Paramesthi:
The term “Dharmacakrabhṛte” refers to Ācārya, as they uphold the ten supreme virtues (daśa dharma) symbolized by the Dharma wheel.
In Context of Upādhyāya Paramesthi:
The term “Bhartre” refers to Upādhyāya, as they nourish living beings by dispelling the darkness of ignorance and imparting knowledge.
In Context of Sādhu Paramesthi:
The phrase “Saṃsārabhīmūṣe” refers to Sādhu, as they destroy the fear of worldly existence with their lion-like demeanor.
Universal Salutations:
Since the terms like “Śrīmate” are generic, the verse can be interpreted as a salutation to all Tīrthaṅkaras across past, present, and future.
Salutations to Bharata Chakravarti:
For Bharata Chakravarti, the interpretation goes:
- He is the lord of the nine treasures and fourteen jewels.
- He has attained the position of protecting all beings with supreme knowledge.
- As a result of past virtuous deeds, he bears the divine wheel (Cakraratna).
- He protects the six parts of Bharata Kṣetra and eliminates fear from beings in the world.
Salutations to Bahubali:
For Bahubali, the explanation is:
- He defeated Bharata Chakravarti in threefold battles and achieved supreme valor.
- Through Bharata’s praises, he attained the position of omniscient knowledge after a year of rigorous penance.
- Bahubali is a conqueror of karmic bondage and a remover of worldly fears.
Salutations to Ṛṣabhasena Gaṇadhara:
For Ṛṣabhasena Gaṇadhara, the interpretation is:
- “Śrīmate” implies association with the wealth of Jain doctrine.
- He upholds the essence of Dharma and eliminates fear through spiritual guidance.
Salutations to Pārśvanātha Tīrthaṅkara:
The term “Dharmacakrabhṛte” also applies to Pārśvanātha, as he is the upholder of Dharma in its purest form.
Purpose of the Verse:
The initial letters of each quarter of the verse form the phrase “Śrī-sādhana”, indicating that the purpose of this text is to achieve the ultimate goal of liberation (Kevalya Lakṣmī).
श्लोक 2 से 15
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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