नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 22 : अग्निभूति-वायुभूति का सम्यक्त्व ग्रहण
समवसरण में बलदेव के प्रश्न पर गणधर वरदत्त ने प्रद्युम्न के पूर्वभवों का वर्णन आरम्भ किया। मगध देश के शालिग्राम ग्राम में सोमदेव ब्राह्मण और उसकी पत्नी अनिला के अग्निभूति तथा वायुभूति नामक दो पुत्र थे। वे मिथ्यात्व से प्रेरित होकर मुनियों से वाद-विवाद करने पहुँचे, परन्तु सत्यक मुनि के तर्कपूर्ण स्याद्वाद उपदेश से पराजित हो गए। क्रोधवश उन्होंने मुनि की हत्या का प्रयास किया, किन्तु यक्ष ने उन्हें स्तम्भित कर दिया। भयभीत परिवार ने जैन धर्म स्वीकार करने का वचन दिया। यद्यपि माता-पिता ने बाद में धर्म त्यागने को कहा, फिर भी दोनों भाइयों ने सन्मार्ग नहीं छोड़ा और दृढ़ता से धर्म में स्थित रहे।
श्लोक 23 से 34 : माता-पिता की दुर्गति और पुत्रों की आध्यात्मिक उन्नति
माता-पिता ने धर्म का विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप वे मृत्यु के बाद अनेक दुर्गतियों में भटके। दूसरी ओर अग्निभूति और वायुभूति ने व्रतों का पालन कर स्वर्ग में देवत्व प्राप्त किया। वहाँ से च्युत होकर वे अयोध्या में अर्हद्दास सेठ के पुत्र पूर्णभद्र और मणिभद्र बने। महेन्द्र मुनि के उपदेश से राजा अरिंजय ने संयम धारण किया। पूर्णभद्र ने अपने पूर्वजन्म के माता-पिता का समाचार पूछा तो ज्ञात हुआ कि पिता चाण्डाल और माता कुतिया के रूप में जन्म ले चुके हैं। उनके उपदेश से दोनों ने वैराग्य ग्रहण किया, जिससे पिता कुबेर यक्ष बने और माता आगे चलकर सुप्रबुद्धा नामक राजकुमारी के रूप में जन्मी।
श्लोक 35 से 46: मधु-क्रीडव का जीवन और प्रद्युम्न के जन्म का कारण
सुप्रबुद्धा ने वैराग्य धारण कर आर्यिका दीक्षा ली और बाद में स्वर्ग में मणिचूला देवी बनी। पूर्णभद्र और मणिभद्र ने भी उत्कृष्ट श्रावक धर्म का पालन कर स्वर्ग प्राप्त किया। वहाँ से वे हस्तिनापुर में मधु और क्रीडव नामक राजकुमार बने। मधु ने कामवश कनकमाला को स्वीकार कर अनुचित आचरण किया, जिससे कनकरथ राजा को वैराग्य हुआ। बाद में मधु और क्रीडव ने अपने दोषों का प्रायश्चित्त कर संयम ग्रहण किया और महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। उसी पुण्य के प्रभाव से मधु का जीव आगे चलकर रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 47 से 61 : प्रद्युम्न का अपहरण और देवदत्त के रूप में पालन
पूर्वजन्म का वैर रखने वाला कनकरथ का जीव धूमकेतु ज्योतिषी देव बना। उसने प्रद्युम्न को पहचानकर शत्रुभाव से उसका अपहरण कर लिया और दूर वन में शिला के नीचे छोड़ दिया। उसी समय कालसंवर नामक विद्याधर राजा और उसकी पत्नी काञ्चनमाला वहाँ पहुँचे। उन्होंने बालक की अद्भुत आभा देखकर उसे अपनाया और युवराज घोषित कर दिया। उसका नाम देवदत्त रखा गया। राजा और रानी ने अत्यन्त स्नेहपूर्वक उसका पालन-पोषण किया और वह उनके परिवार का प्रिय पुत्र बन गया।
श्लोक 62 से 71 : कृष्ण-रुक्मिणी का शोक और नारद का आश्वासन
प्रद्युम्न के वियोग में रुक्मिणी अत्यन्त दुःखी रहने लगी और श्रीकृष्ण भी पुत्र-वियोग से शोकाकुल हो गए। तभी नारद मुनि वहाँ आए। कृष्ण ने उनसे पुत्र की खोज का अनुरोध किया। नारद ने बताया कि उन्होंने पूर्वविदेह क्षेत्र में स्वयंप्रभ तीर्थंकर से प्रद्युम्न का भविष्य जाना है। उन्होंने आश्वस्त किया कि बालक सुरक्षित है, महान् उन्नति प्राप्त करेगा और सोलह वर्ष बाद माता-पिता से पुनः मिल जाएगा। यह सुनकर कृष्ण और रुक्मिणी के हृदय में पुनः आशा और आनंद का संचार हुआ।
श्लोक 72 से 81 : प्रद्युम्न का पराक्रम और विद्या-सिद्धि
देवदत्त नाम से पले-बढ़े प्रद्युम्न ने युवावस्था में असाधारण पराक्रम दिखाया। उसने शत्रु राजा को पराजित कर अपने पिता कालसंवर की प्रतिष्ठा बढ़ाई। उसके शौर्य से प्रसन्न होकर राजा ने उसका विशेष सम्मान किया। प्रद्युम्न के तेज और सौन्दर्य से प्रभावित होकर काञ्चनमाला उसके प्रति आसक्त हो गई। उसने उसे प्रज्ञप्ति विद्या देने का बहाना बनाया, किन्तु प्रद्युम्न ने उसे माता के रूप में सम्मान दिया। विद्या-साधना हेतु वह सिद्धकूट चैत्यालय गया, मुनियों से धर्मोपदेश ग्रहण किया और संजयन्त मुनि की प्रतिमा के समक्ष साधना कर विद्या सिद्ध की। इसके पश्चात वह और भी तेजस्वी होकर लौटा।
श्लोक 82 से 91 : काञ्चनमाला का आरोप और कालसंवर का भ्रम
विद्या-सिद्धि के बाद प्रद्युम्न की शोभा और बढ़ गई, जिससे काञ्चनमाला की आसक्ति तीव्र हो गई। जब प्रद्युम्न ने उसके अनुचित प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया, तब उसने क्रोधवश कालसंवर से उसकी झूठी शिकायत कर दी। उसने प्रद्युम्न को दुराचारी और अकुलीन बताया। विवेकहीन कालसंवर ने बिना जाँच-पड़ताल के पत्नी की बात पर विश्वास कर लिया और अपने पाँच सौ पुत्रों को प्रद्युम्न की हत्या का आदेश दे दिया। इस प्रसंग के माध्यम से ग्रन्थकार ने दुष्ट प्रवृत्तियों और अविवेकपूर्ण निर्णयों के दुष्परिणामों का संकेत किया है।
श्लोक 92 से 101 : विचारपूर्वक निर्णय लेने की शिक्षा
इन श्लोकों में आचार्य ने किसी भी कथन या आरोप को बिना परीक्षण स्वीकार न करने की शिक्षा दी है। मनुष्य को वक्ता के आचरण, ज्ञान, उद्देश्य और परिस्थितियों की परीक्षा करनी चाहिए। यह समझना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति भय, लोभ, स्नेह, क्रोध, ईर्ष्या, अज्ञान अथवा अन्य किसी कारण से भी कथन कर सकता है। विवेकशील व्यक्ति प्रत्येक कथन की सत्यता और सम्भावना का परीक्षण करता है, इसलिए वह छल और भ्रम से बच जाता है। अंत में यह शिक्षा दी गई है कि उत्तम व्यक्ति भी कभी-कभी भूल कर सकते हैं, अतः केवल किसी के कथन के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि विचारपूर्वक सत्य का अन्वेषण करना चाहिए।
श्लोक 102 से 111 : प्रद्युम्न की अद्भुत वीरता और दिव्य उपहार
कालसंवर के पुत्र प्रद्युम्न को मारने के उद्देश्य से उसे अनेक संकटों में डालते रहे। उन्होंने उसे अग्निकुण्ड में कूदने के लिए प्रेरित किया, किन्तु वहाँ की देवी ने उसका सम्मान कर दिव्य वस्त्र और आभूषण प्रदान किए। इसके बाद दो पर्वतों के बीच फँसाने पर भी उसने अपने बल से उन्हें रोक दिया और देवी से दिव्य कुण्डल प्राप्त किए। वराह रूपी देव को वश में कर उसने विजयघोष शंख तथा महाजाल प्राप्त किया। आगे महाकाल राक्षस को जीतकर उसने वृषभ रथ और रत्नमय कवच प्राप्त किया। इस प्रकार प्रत्येक संकट उसके लिए नई उपलब्धियों का कारण बनता गया।
श्लोक 112 से 123 : विद्याओं और दिव्य आयुधों की प्राप्ति
प्रद्युम्न ने एक बन्धित विद्याधर को मुक्त कर उसके उपकारस्वरूप अनेक विद्याएँ प्राप्त कीं। नागकुमार के भवन में जाकर उसने ध्वजा, धनुष, खड्ग और कामरूपिणी अंगूठी प्राप्त की। विभिन्न देवताओं और दिव्य स्थलों से उसे पादुकाएँ, पाँच विशेष बाण, मुकुट, औषधिमाला, छत्र, चँवर तथा नागपाश प्राप्त हुए। जब विद्याधर कुमार उसे पातालमुखी बावड़ी में छलपूर्वक मारना चाहते थे, तब उसने अपनी प्रज्ञप्ति विद्या का उपयोग कर उनकी योजना विफल कर दी और स्वयं सुरक्षित रहा।
श्लोक 124 से 141 : शत्रुओं की पराजय और द्वारका की ओर प्रस्थान
प्रद्युम्न ने षड्यंत्र का पता लगने पर विद्युदंष्ट्र आदि राजकुमारों को नागपाश से बाँधकर बावड़ी में लटका दिया तथा ज्योतिप्रभ को समाचार देने भेज दिया। तभी नारद मुनि वहाँ पहुँचे और प्रद्युम्न को उसके वास्तविक जीवन का परिचय दिया। इसके पश्चात् कालसंवर की सेना से युद्ध हुआ, जिसमें प्रद्युम्न विजयी रहा। उसने सबको मुक्त कर सत्य परिस्थिति बताई और कालसंवर की अनुमति लेकर नारद के साथ द्वारका की ओर चल पड़ा। मार्ग में उसने विभिन्न स्थानों पर अपनी विद्या और विनोदपूर्ण चातुर्य का परिचय देते हुए लोगों को आश्चर्यचकित किया।
श्लोक 142 से 153 : रुक्मिणी से पुनर्मिलन
द्वारका पहुँचकर प्रद्युम्न ने विभिन्न रूप धारण कर अनेक हास्यपूर्ण लीलाएँ कीं। अंततः वह क्षुल्लक का वेश धारण कर अपनी माता रुक्मिणी के महल पहुँचा और भोजन माँगा। रुक्मिणी ने उसका सत्कार किया। उसी समय प्रकृति में असामान्य शुभ संकेत दिखाई दिए, जिससे रुक्मिणी को अपने पुत्र के आगमन का आभास हुआ। जब उसने पूछा कि क्या वह उसका पुत्र है, तब प्रद्युम्न ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिया। माता-पुत्र का यह मिलन अत्यन्त भावपूर्ण था और प्रद्युम्न ने अपने जीवन का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाकर रुक्मिणी को अपार आनन्द प्रदान किया।
श्लोक 154 से 161 : सत्यभामा की शर्त और प्रद्युम्न की चतुरता
एक नाई ने आकर रुक्मिणी को सत्यभामा के साथ हुई पुरानी शर्त का स्मरण कराया, जिसके अनुसार बड़े पुत्र की माता दूसरी के केश कटवाएगी। रुक्मिणी से वास्तविक स्थिति जानकर प्रद्युम्न ने नाई तथा उसके साथियों को दण्डित किया और उन्हें उपहास का पात्र बना दिया। उसने विभिन्न रूप धारण कर नगरवासियों और सेवकों को चकित किया तथा अपनी चतुराई और अद्भुत सामर्थ्य का परिचय दिया।
श्लोक 162 से 171 : पिता से मिलन और विवाह
प्रद्युम्न ने रुक्मिणी के समान रूप बनाकर उसे विमान में बैठाया और कृष्ण तथा बलराम को चुनौती दी कि यदि सामर्थ्य हो तो उसे छुड़ा लें। अपनी विद्याओं के प्रभाव से उसने दोनों को पराजित कर दिया। तभी नारद ने उसका परिचय प्रकट किया। प्रद्युम्न ने अपना वास्तविक रूप दिखाकर कृष्ण और बलराम को प्रणाम किया। कृष्ण ने अत्यन्त स्नेह से उसका आलिंगन किया और उसका भव्य स्वागत किया। बाद में प्रद्युम्न का विवाह उन कन्याओं से सम्पन्न हुआ जो भानुकुमार के लिए आई थीं। इसी समय यह भविष्यवाणी भी हुई कि उसका पूर्वजन्म का भाई आगे चलकर कृष्ण के पुत्र रूप में जन्म लेगा।
श्लोक 172 से 183 : शम्भव का जन्म और नेमिनाथ की भविष्यवाणी
रुक्मिणी के अनुरोध पर प्रद्युम्न ने जाम्बवती को कामरूपिणी अंगूठी दी। उसके प्रभाव से जाम्बवती को शम्भव नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जबकि सत्यभामा को सुभानु नामक पुत्र हुआ। दोनों में प्रतिस्पर्धा हुई, परन्तु शम्भव विजयी रहा। इसके बाद रुक्मिणी और सत्यभामा के बीच की ईर्ष्या समाप्त हो गई। आगे बलदेव ने भगवान् नेमिनाथ से श्रीकृष्ण के राज्य का भविष्य पूछा। नेमिनाथ ने भविष्यवाणी की कि बारह वर्ष बाद द्वारका का विनाश होगा, कृष्ण का देहावसान होगा और आगे चलकर वे तीर्थंकर नामकर्म के कारण महान आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेंगे। बलदेव के भविष्य का भी वर्णन किया गया।
श्लोक 184 से 191 : वैराग्य, दीक्षा और मोक्ष
भगवान् नेमिनाथ की वाणी सुनकर द्वीपायन ने तत्काल संयम ग्रहण कर लिया। श्रीकृष्ण ने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर तीर्थंकर प्रकृति के कारणभूत सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन किया। उन्होंने घोषणा की कि जो लोग संयम धारण करना चाहें, उन्हें कोई रोक नहीं है। यह सुनकर प्रद्युम्न, रुक्मिणी तथा अनेक राजकुमारों और रानियों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। आगे शम्भव, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न मुनि गिरनार पर्वत पर प्रतिमायोग में स्थित हुए, शुक्लध्यान द्वारा घातिया कर्मों का नाश किया, केवलज्ञान प्राप्त किया और अन्ततः मोक्ष को प्राप्त हुए।
श्लोक 192 से 201 : नेमिनाथ का विहार और द्रौपदी प्रसंग का आरम्भ
भगवान् नेमिनाथ दिव्य प्रभावों और प्रातिहार्यों से विभूषित होकर विभिन्न देशों में धर्मोपदेश देते हुए विहार करने लगे। देव, विद्याधर और शिष्यगण उनकी सेवा करते हुए साथ चल रहे थे। अनेक प्रदेशों में धर्मामृत की वर्षा करते हुए वे पल्लव देश पहुँचे। इसके बाद आचार्य गुणभद्र ने पाण्डवों के चरित्र का संक्षिप्त वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि कम्पिला नगरी के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी गुण, सौन्दर्य और सदाचार से सम्पन्न थी। उसके विवाह के विषय में विचार करते समय मन्त्रियों ने पाण्डवों को सर्वश्रेष्ठ पात्र बताया और दुर्योधन द्वारा पाण्डवों के विरुद्ध रचे गए लाक्षागृह षड्यंत्र का उल्लेख करते हुए उनकी महानता का वर्णन आरम्भ किया।
श्लोक 202 से 211 : द्रौपदी का स्वयंवर और अर्जुन का वरण
राजा द्रुपद ने मंत्रियों की सलाह पर द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित किया। अनेक राजाओं के साथ पाण्डव भी वहाँ पहुँचे और अपने-अपने पराक्रम से पहचाने गए। स्वयंवर मण्डप में प्रवेश करने के बाद द्रौपदी ने पुरोहित द्वारा परिचित कराए गए सभी राजाओं को देखा, परन्तु अंततः उसने अपनी वरमाला अर्जुन के गले में डालकर उनका वरण किया। इस प्रकार अर्जुन को योग्य वर मानकर द्रौपदी ने अपना जीवनसाथी चुना।
श्लोक 212 से 222 : पाण्डवों का राज्यसुख और नेमिनाथ की भविष्यवाणी की सिद्धि
द्रौपदी के अर्जुन को वरण करने पर उपस्थित राजाओं ने इस सम्बन्ध को उचित और अनुकूल माना। पाण्डव अपने नगर लौटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। अर्जुन से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। आगे अनेक प्रसिद्ध घटनाएँ—जुए का प्रसंग, कीचक-वध, विराट-निवास और कुरुक्षेत्र युद्ध—घटित हुईं। युद्ध में युधिष्ठिर ने विजय प्राप्त कर राज्य संभाला। इसी काल में भगवान नेमिनाथ द्वारा द्वारका के विनाश, कृष्ण की मृत्यु और बलदेव के संयम ग्रहण की जो भविष्यवाणी की गई थी, वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई।
श्लोक 223 से 234 : पाण्डवों द्वारा पूर्वभव का प्रश्न और नागश्री का पाप
द्वारका-विनाश और श्रीकृष्ण के वियोग का समाचार सुनकर पाण्डव वैराग्य को प्राप्त हुए। वे भगवान नेमिनाथ के पास जाकर अपने पूर्वभवों के विषय में पूछने लगे। भगवान ने बताया कि अंगदेश की चम्पापुरी में सोमदेव ब्राह्मण के तीन पुत्र—सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति—थे। इनका विवाह धनश्री, मित्रश्री और नागश्री से हुआ था। एक दिन धर्मरुचि मुनि को भिक्षा देने के लिए भेजी गई नागश्री ने क्रोधवश विषमिश्रित आहार दे दिया। मुनि ने समता सहित आराधना कर उच्च देवगति प्राप्त की, किन्तु नागश्री ने घोर पाप बाँध लिया।
श्लोक 235 से 248 : दीक्षा, पुण्यफल और सुकुमारी का दुःखमय जीवन
नागश्री के अपराध का पता चलने पर तीनों भाइयों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। नागश्री को छोड़कर अन्य दोनों स्त्रियों ने भी आर्यिका दीक्षा धारण कर ली और सभी ने उत्कृष्ट आराधना द्वारा स्वर्गगति प्राप्त की। नागश्री अपने पाप के कारण नरक, तिर्यंच और अन्य दुर्गतियों में भटकती रही। बाद में वह चम्पापुर में सुकुमारी नामक कन्या के रूप में जन्मी, किन्तु उसके शरीर से दुर्गन्ध आती थी। इसी कारण उसका वैवाहिक जीवन दुःखमय रहा। उसका पति जिनदत्त उससे विरक्त रहा और सुकुमारी निरन्तर अपने दुर्भाग्य पर खेद करती रही।
श्लोक 249 से 259 : सुकुमारी का वैराग्य और द्रौपदी के रूप में जन्म
सुकुमारी ने आर्यिकाओं से उनके वैराग्यपूर्ण जीवन की कथा सुनी और स्वयं भी संसार से विरक्त हो गई। उसने दीक्षा ग्रहण कर ली, परन्तु बाद में वसन्तसेना वेश्या को देखकर उसके मन में भोग-सौभाग्य की इच्छा उत्पन्न हो गई। इस निदान के प्रभाव से वह अगले जन्म में एक देवांगना बनी। भगवान नेमिनाथ ने बताया कि वही जीव आगे चलकर राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के रूप में जन्मा। इस प्रकार द्रौपदी का जन्म उसके पूर्व संस्कारों और कर्मों का परिणाम था।
श्लोक 260 से 271 : पाण्डवों का संयम और अन्तिम साधना
भगवान नेमिनाथ से अपने पूर्वभव सुनकर पाण्डवों ने अनेक लोगों के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। कुन्ती, सुभद्रा और द्रौपदी ने भी राजिमती गणिनी के पास आर्यिका दीक्षा ली। पाण्डव दीर्घकाल तक नेमिनाथ के साथ विहार करते रहे। अन्ततः वे शत्रुञ्जय पर्वत पर कठोर तप में स्थित हुए। वहाँ दुर्योधन के भानजे कुर्यवर ने उन पर भयंकर उपसर्ग किया, किन्तु उन्होंने समता नहीं छोड़ी। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन शुक्लध्यान द्वारा कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त कर गए, जबकि नकुल और सहदेव सर्वार्थसिद्धि विमान में देव हुए।
श्लोक 272 से 281 : भगवान नेमिनाथ का निर्वाण और महान व्यक्तियों के पूर्वभव
भगवान नेमिनाथ ने दीर्घकाल तक धर्मप्रभावना करने के पश्चात गिरनार पर्वत पर योगनिरोध धारण किया और आषाढ़ शुक्ल सप्तमी के दिन मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रादि देवों ने उनके निर्वाण महोत्सव का आयोजन किया। इसके उपरान्त आचार्य ने नेमिनाथ, बलदेव और कृष्ण के अनेक पूर्वभवों का वर्णन किया। नेमिनाथ के जीव ने अनेक श्रेष्ठ जन्मों के बाद तीर्थंकरत्व प्राप्त किया। बलदेव के जीव का भी क्रमशः उत्कर्ष होता हुआ भविष्य में तीर्थंकर बनने का संकेत दिया गया। कृष्ण के जीव ने भी अनेक उतार-चढ़ाव भोगे और अंततः भविष्य में तीर्थंकर बनने की योग्यता अर्जित की।
श्लोक 282 से 288 : कर्मफल का उपदेश और पर्व का उपसंहार
आचार्य गुणभद्र ने समझाया कि मुनियों के प्रति द्रोह का फल अत्यन्त भयंकर होता है। कृष्ण जैसा विश्वविजयी और अपार वैभव का स्वामी पुरुष भी अपने कर्मों के प्रभाव से दुःख और पतन का भागी बना। संसार में वैभव, शक्ति और विजय स्थायी नहीं हैं; प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को सदैव शुभ कर्मों और सम्यक् आचरण का आश्रय लेना चाहिए। अंत में नेमिनाथ तीर्थंकर, बलभद्र, कृष्ण, जरासन्ध और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के चरित्रों का वर्णन पूर्ण कर बहत्तरवें पर्व का समापन किया गया।
पर्व 71 – श्लोक 442 से 459 | श्लोक 460 से 462
अग्निभूति-वायुभूति का सम्यक्त्व ग्रहण
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 1 to 22
श्लोक ( Shlok ) 1 – 2
अथ ‘स्वज्ञातपूर्वश्ञ्च जगत्त्रयसभावनौ । प्रकाशयितुकामेन बलदेवेन धीमता ॥ १ ॥प्रद्युत्रशम्भवोत्पत्तिसम्बन्धः पृच्छयते स्म सः । नरदत्तगणेन्द्रोनु रुन्द्रबुद्धयेत्थमब्रवीत् ॥ २ ॥
अथानन्तर- तीनों जगत्की सभाभूमि अर्थात् समवसरणमें अपने पूर्वभव जानकर बुद्धिमान् बलदेवने सबको प्रकट करनेके लिए प्रद्युम्नकी उत्पत्तिका सम्बन्ध पूछा सो वरदत्त गणधर अनुग्रहकी बुद्धिसे इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२ ॥
“Thereafter, in the Samavasarana (the divine assembly hall) of the three worlds, the wise Baladeva, having attained knowledge of his previous births, asked about the sequence of events regarding Pradyumna’s birth in order to reveal it to everyone. Thereupon, the Ganadhara Varadatta, out of a spirit of benevolence and grace, began to speak as follows. ॥ 1-2 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 3
द्वीपेऽस्मिन्मगधे देशे शालिग्रामनिवासिनः । द्विजस्य सोमदेवस्य भार्याऽभूदग्निलाख्यया ॥ ३ ॥
इसी जम्बूद्वीपके मगधदेश सम्बन्धी शालिग्राम में रहनेवाले सोमदेव ब्राह्मणकी एक अग्निला नामकी स्त्री थी ॥ ३ ॥
“In Shaligram, a village belonging to the Magadha region of this very Jambu-dvipa, there lived a Brahmin named Somadeva, who had a wife named Agnila. ॥ 3 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 4 – 5
अग्निभूतिर भूत्सू नुर्वायुभूतिस्तयोरनु । तावन्येधुः पुरे नन्दिवर्धनाख्ये मनोहरे ॥ ४ ॥ नन्दने नन्दिद्घोषाख्ये वने मुनिमपश्यताम् । नन्दिवर्धननामानं “मुनिसङ्घविभूषणम् ॥ ५ ॥
उन दोनोंके अग्निभूति और वायुभूति नामके दो पुत्र थे, किसी एक दिन वे दोनों पुत्र नन्दिवर्धन नामके दूसरे सुन्दर गाँवमें गये । वहाँ उन्होंने नन्दिघोष नामके वनमें, मुनि संघके आभूषणस्वरूप नन्दिद्वर्धन नामक मुनिराजके दर्शन किये ।। ४-५ ॥
“The two of them had two sons named Agnibhuti and Vayubhuti. One day, these two sons went to another beautiful village named Nandivardhana. There, in a forest called Nandighosha, they beheld the great ascetic Muniraj Nandivardhana, who was like a jewel decorating the community of monks. ॥ 4-5 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 6 – 7
दुष्टाबुपागतौ दृष्ट्वा तौ मुनीन्द्रोऽब्रवीन्मुनीन् । विसंवदितुमायातावेतौ मिथ्यात्वदूषितौ ॥ ६ ॥भवद्भिः कैश्चिदप्याभ्यां न’कार्या सह सङ्कथा । एतन्निबन्धनो भूयानुपसर्गो भविष्यति ॥ ७ ॥
उन दोनों दुष्टोंको आया हुआ देख, मुनिराजने संघके अन्य मुनियोंसे कहा कि ‘ये दोनों मिथ्यात्वसे दूषित हैं और विसंवाद करनेके लिए आये हैं अतः आप लोगोंमेंसे कोई भी इनके साथ बातचीत न करें। अन्यथा इस निमित्तसे भारी उपसर्ग होगा’ ।॥ ६-७ ॥
“Seeing those two wicked individuals approaching, the Muniraj (chief monk) said to the other monks of the congregation, ‘These two are tainted by false belief (mithyatva) and have come to argue and create discord. Therefore, let none of you engage in conversation with them. Otherwise, a severe calamity (upasarga) will arise from this cause.’ ॥ 6-7 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 9 – 17
दृष्ट्वा तावेत्य सर्वेषां मूकीभूय व्यवस्थितिम् । कृतापहासौ स्वं ग्रामं गच्छन्तावशितु गतम् ॥ ९ ॥ग्रामान्तरात्समायातं मुनिमालोक्य सत्यकम् । तत्समीपमहङ्कारप्रेरितावुपगम्य तम् ॥ १० ॥नास्त्याप्तो नागमो नैव पदार्थो नग्न केवलम् । किं क्लिश्नासि वृथोन्मार्गे मूढो दृष्टविनाशिनि ॥११॥इत्यध्यक्षिपतां सोऽपि जिनवक्त्रविनिर्गतम् । विवक्षितेतरानेकस्वरूपान्तसमाश्रयम् ॥ १२ ॥”द्रव्यतत्त्वं यथादृष्टं कथयन्तं ‘सहेतुकम् । स्याद्वादमवलम्ब्योच्चै स्तत्प्रणेतृप्रमाणताम् ॥ १३ ॥प्रसाध्यादृष्टभागेऽपि तदुक्तागम सुस्थितिम् । निरूप्य वादकण्डूतिमपनीय दुरात्मनोः ॥ १४ ॥तयोर्जयध्वजं प्रापद्विद्वज्जनसमर्पितम् । तौ मानभङ्गसम्भूतक्रोधौ निशि शितायुधौ ॥ १५ ॥परेद्यः पापकर्माणौ विजने शुद्धचेतसम् । प्रतिमायोगमापन्नं सत्यकं मुनिपुङ्गवम् ॥ १६ ॥शस्त्रे गाहन्तुमुद्युक्तावन्यायोऽयमिति कुधा । द्विजौ’ सुवर्णयक्षेण स्तम्भितौ कीलिताविव ॥ १७ ॥
वे दोनों ब्राह्मण सब मुनियोंको मौनी देखकर उनकी हँसी करते हुए अपने गाँवको जा रहे थे कि उन मुनियों-मेंसे एक सत्यक नाम के मुनि आहार करनेके लिए दूसरे गाँवमें गये थे और लौटकर उस समय आ रहे थे। अहंकारसे प्रेरित हुए दोनों ब्राह्मण उन सत्यक मुनिको देख उनके पास जा पहुँचे और कहने लगे कि ‘अरे नंगे ! न तो कोई आप्त है, न आगम है, और न कोई पदार्थ ही है फिर क्यों मूर्ख बनकर प्रत्यक्षको नष्ट करनेवाले इस उन्मार्गमें व्यर्थ ही क्लेश उठा रहा है’। इस प्रकार उन दोनोंने उक्त मुनिका बहुत ही तिरस्कार किया। मुनिने भी, जिनेन्द्र भगवान के मुखकमलसे निकले विवक्षित तथा अविवक्षित रूपसे अनेक धर्मोंका निरूपण करनेवाले, एवं प्रत्यक्ष सिद्ध द्रव्य तत्त्वका हेतु सहित कथन करनेवाले अतिशय उत्कृष्ट स्याद्वादका अवलम्बन लेकर उसका उपदेश देनेवाले आप्तकी प्रामाणिकता सिद्ध कर दिखाई तथा परोक्ष तत्त्वके विषयमें भी उन्हीं आप्तके द्वारा कथित आगमकी समीचीन स्थितिका निरूपण कर उन दुष्ट ब्राह्मणोंकी वाद करनेकी खुजली दूर की एवं विद्वज्जनोंकेद्वारा समर्पण की हुई उनकी विजय-पताका छीन ली। मान भंग होनेसे जिन्हें क्रोध उत्पन्न हुआ है ऐसे दोनों ही पापी ब्राह्मण’ तीक्ष्ण शस्त्र लेकर दूसरे दिन रात्रिके समय निकले। उस समय शुद्ध चित्तके धारक वही सत्यक मुनि, एकान्त स्थानमें प्रतिमा योग धारण कर विराजमान थे सो वे पापी ब्राह्मण उन्हें शस्त्रसे मारनेके लिए उद्यत हो गये। यह देखकर और यह अन्याय हो रहा है ऐसा विचारकर सुवर्णयाने क्रोधमें आकर उन दोनों ब्राह्मणोंको कीलित हुएके समान स्तम्भित कर दिया -ज्योंका त्यों रोक दिया।।९-१७।।
“Seeing all the monks observing silence, the two Brahmins began to mock them. As they were returning to their village, they crossed paths with a monk named Satyaka from that same congregation. He had gone to another village to accept alms (aahar) and was just returning. Driven by sheer arrogance, the two Brahmins approached Sage Satyaka and said, ‘Hey, naked one! There is no such thing as an Omniscient Teacher (Apta), no Sacred Scripture (Agama), and no ultimate reality. Why then, like a fool, are you needlessly enduring hardships in this misguided path that denies the evidence of the senses?’ In this manner, they deeply insulted the monk.
In response, the sage took refuge in the supreme doctrine of Syadvada (the philosophy of conditional predication), which emanated from the lotus-like mouth of Lord Jinendra, which describes the multifaceted nature of reality through both expressed and implied perspectives, and which explains the self-evident principles of substance (dravya) with sound logic. By delivering this discourse, the monk successfully proved the authority and authenticity of the Apta. Furthermore, regarding transcendental realities beyond sensory perception, he demonstrated the validity of the Agama revealed by that same Apta. In doing so, he thoroughly cured those wicked Brahmins of their itch for disputation and stripped away the banner of victory that had been bestowed upon them by the learned.
Enraged by the shattering of their pride, both the sinful Brahmins took up sharp weapons and set out the following night. At that time, Sage Satyaka, possessing a pure consciousness, was seated in a secluded spot, observing the Pratima-yoga (a meditative posture of absolute stillness). The sinful Brahmins prepared to strike him with their weapons. Seeing this injustice unfold, the deity Suvarnaya grew angry and instantly paralyzed both Brahmins as if they were transfixed, freezing them right where they stood. ॥ 9-17 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 18 – 19
तदा शरणमायातास्तन्मातृपितृबान्धवाः । मुनीनामाकुलीभूय यक्षस्तानवदत्सुधीः ॥ १८ ॥हिंसाधर्म परित्यज्य यदि जैनेश्वरं मतम् । भवन्तः स्वीकरिष्यन्ति भवेन्मोक्षोऽनयोरिति ॥ १९ ॥
यह देखकर उनके माता, पिता, भाई आदि सब व्याकुल होकर मुनियोंकी शरणमें आये । तब बुद्धिमान् यक्षने कहा कि ‘यदि तुम लोग हिंसाधर्मको छोड़कर जैनधर्म स्वीकृत करोगे तो इन दोनोंका छुटकारा हो सकता है’ ।। १८-१९ ।।
“Seeing this, their mother, father, brothers, and all others became deeply distressed and sought refuge with the monks. Then the wise Yaksha (guardian deity) said, ‘If you renounce the religion of violence and accept Jainism, only then can these two be released.’ ॥ 18-19 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 20 – 22
तेऽपि भीतास्तथा बाढं करिष्याम इति द्रुतम् । मुनिं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥ २० ॥मिथ्यैव प्रत्यपद्यन्त धर्म श्रावकपालितम् । ततस्तत्स्तम्भनापाये सति तैस्तावुदीरितौ ॥ २१ ॥विरन्तव्यमितो धर्मादस्माद्धेतोरुपासितात् । इति नात्मात्तसन्मार्गाच्चेलतुः काललब्धितः ॥ २२ ॥
यक्षकी बात सुनकर सब डर गये और कहने लगे कि हम लोग शीघ्र ही ऐसा करेंगे अर्थात् जैनधर्म धारण करेंगे। इतना कहकर उन लोगोंने मुनिराजकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम किया और झूठमूठ ही श्रावक धर्म स्वीकृत कर लिया । तदनन्तर दोनों पुत्र जब कीलित होनेसे छूट आये तब उनके माता-पिता आदिने उनसे कहा कि अब यह धर्म छोड़ देना चाहिये क्योंकि कारण वश ही इसे धारण कर लिया था। उन पुत्रोंकी काललब्धि अनुकूल थी अतः वे अपने द्वारा ग्रहण किये हुए सन्मार्गसे विचलित नहीं हुए ॥ २०-२२ ।।
“Hearing the words of the Yaksha, everyone grew terrified and said, ‘We will do so immediately; we will adopt the Jain faith.’ Saying this, they circumambulated the Muniraj (chief monk) in reverence, bowed to him according to the prescribed rituals, and insincerely accepted the vows of a lay devotee (Shravaka Dharma). Subsequently, when the two sons were released from their paralysis, their parents and relatives told them that they should now abandon this faith, as it had only been adopted out of sheer necessity. However, because the opportune time for spiritual awakening (Kala-labdhi) had arrived for those two sons, they did not waver from the righteous path they had embraced. ॥ 20-22 ॥”
श्लोक 23 से 34
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |