अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 482 to 491
श्लोक ( Shlok ) 482
अभ्येत्यानेकधा युद्ध्वा विद्याबलमदोद्धतम् । विमदीकृत्य निस्पन्दं व्यधादधिकविक्रमः ॥ ४८२ ॥
अधिक पराक्रमी अनन्तवीर्यने उसके साथ अनेक प्रकारका युद्ध किया, तथा विद्या और बलके मदसे उद्धत उस दमितारिको मद रहित कर निश्चेष्ट बना दिया था ।। ४८२ ॥
“The exceedingly valiant Anantavīrya engaged him in various forms of combat, and completely shattering the pride of that Damitarī—who was otherwise arrogant due to his mystical powers (vidyā) and physical might—rendered him utterly motionless and helpless.”482
श्लोक ( Shlok ) 483
खगेशश्चक्रमादाय क्षिपति स्माभिभूभुजम् । दक्षिणाग्रकराभ्यर्णे तस्थिवत्तत्परीत्य तम् ॥ ४८३ ॥
अबकी बार विद्याधरों के राजा दमितारिने चक्र लेकर राजा अनन्तवीर्यके सामने फेंका परन्तु वह चक्र उनकी प्रदक्षिणा देकर उनके दाहिने कन्धेके समीप ठहर गया ।। ४८३ ।।
“This time, Damitarī, the king of the Vidyādharas, raised his divine Discus (Cakra) and hurled it directly at King Anantavīrya. However, instead of striking him, the Discus reverently circumambulated (pradakṣiṇā) Anantavīrya and came to a halt near his right shoulder.”483
श्लोक ( Shlok ) 484
मृत्युं वा धर्मचक्रेण योगी तं ‘खेचराधिपम् । अहँस्तेनैव चक्रेण विक्रमी भाविकेशवः ॥ ४८४ ॥
जिस प्रकार योगिराज धर्मचक्रके द्वारा मृत्युको नष्ट करते हैं उसी प्रकार पराक्रमी भावी नारायणने उसी चक्रके द्वारा दमितारिको नष्ट कर दिया- मार डाला ॥ ४८४ ॥
“Just as a sovereign Yogi (Yogirāja) destroys death itself through the wheel of righteousness (Dharma-cakra), even so did the valiant future Nārāyaṇa completely destroy—slay—Damitarī using that very same Discus (Cakra).”484
श्लोक ( Shlok ) 485
इति युद्धान्तमासाद्य गगने गच्छतोस्तयोः । पू३ग्रातिक्रमभीत्येव विमाने सहसा स्थिते ॥ ४८५ ॥
इस तरह युद्ध समाप्त कर दोनों भाई आकाशमें जा रहे थे कि पूज्य पुरुषोंका कहीं उल्लंघन न हो जावे इस भयसे ही मानो उनका विमान सहसा रुक गया ॥ ४८५ ॥
“Having thus concluded the war, as the two brothers were traveling through the sky, their celestial chariot (Vimāna) suddenly came to a complete halt—as if frozen by the sheer fear of inadvertently disrespecting or passing over any venerable holy sages (Pūjya Puruṣa).”485
श्लोक ( Shlok ) 486
केनचित् कीलितो वेतो न यातः केन हेतुना । इति तौ परितो वीक्ष्य सदो दिव्यं व्यलोक्यत ॥ ४८६ ॥
यह विमान किसीने कील दिया है अथवा किसी अन्य कारणसे आगे नहीं जा रहा है ऐसा सोचकर वे दोनों भाई चारों ओर देखने लगे। देखते ही उन्हें दिखाई दिया ।। ४८६ ।।
“Thinking, ‘Has someone magically pinned (kīlita) our chariot in place, or is it unable to move forward due to some other mysterious reason?’, both brothers began scanning the sky and the earth in all directions. And the moment they looked, they beheld it.”486
श्लोक ( Shlok ) 487 – 491
मानस्तम्भा सरांस्येतान्येतद्वनचतुष्टयम् । मध्येगन्धकुटी नूनं जिनेन्द्रः कोऽपि तिष्ठति ॥ ४८७ ॥इति तत्रावतीर्येष शिवमन्दिरनायकः । सुतः कनकपुङ्खस्य जयदेव्याश्च निश्चितः ॥ ४८८ ॥दमितारेः पिता कीर्तिधरो नाम्ना विरक्तवान् । प्राप्य शान्तिकराभ्यासे प्रव्रज्यां पारमेश्वरीम् ॥ ४८९ ॥’संवत्सरं समादाय प्रतिमायोगमागमन् । केवलावगमं भक्त्या सुनासीरादिपूजितः ॥ ४९० ॥इत्युक्त्वैव परीत्य त्रिः प्रप्रणम्य जिनेश्वरम् । श्रुतधर्मकथौ तत्र तस्थतुर्ध्वस्तकल्मषौ ॥ ४९१ ॥
‘ये मानस्तम्भ हैं, ये सरोवर हैं, ये चार वन हैं और ये गन्धकुटीके बीचमें कोई जिनराज विराजमान हैं’ ऐसा कहते हुए अनन्तवीर्य और उनके भाई बलदेव वहाँ उतरे । उतरते ही उन्हें मालूम हुआ कि ये जिनराज, शिवमन्द्रिनगरके स्वामी हैं, राजा कनकपुद्ध और रानी जयदेवीके पुत्र हैं, दमितारिके पिता हैं और कीर्तिधर इनका नाम है। इन्होंने विरक्त होकर शान्तिकर मुनिराजके समीप पारमेश्वरी दीक्षा धारण की थी। एक वर्षका प्रतिमायोग धारण कर जब इन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ तब इन्द्र आदि देवोंने बड़ी भक्तिसे इनकी पूजा की थी। ऐसा कह कर उन दोनों भाइयोंने जिनराजकी तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, बार बार नमस्कार किया, धर्मकथाएँ सुनीं और अपने पापोंको नष्ट कर दोनों ही भाई वहाँ पर बैठ गये ॥ ४८७-४९१ ॥
“Exclaiming, ‘These are the Mānastambhas (honor-pillars), these are the sacred lakes, these are the four celestial forests, and there, seated in the center of the Gandhakuṭī (fragrant chamber), resides a glorious Lord of Jinas (Jinarāja)!’, Anantavīrya and his brother Baladeva descended at that holy spot.
Upon descending, they instantly came to know the identity of the Jinarāja: He was the former sovereign of Śivamandira city, the son of King Kanakapudra and Queen Jayadevī, the father of the slain King Damitarī, and His name was Kīrtidhara. Having developed profound detachment toward the material world, He had accepted the supreme divine initiation (Pārameśvarī Dīkṣā) under the holy sage Śāntikara Munirāja. While He was observing a strict one-year silent meditative vow (Pratimā-yoga), He attained omniscience (Kevalajñāna), whereupon Indra and the other celestial deities worshiped Him with immense devotion.
Confounded by this revelation, both brothers reverently performed three circumambulations (Pradakṣiṇā) around the Lord of Jinas, bowed down to Him repeatedly, listened to His sacred discourses on Dharma, and having purified their sins through His divine presence, they both sat down peacefully there.”487 – 491
श्लोक 492 से 501
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धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481
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