नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202 – 211
हन्तुं तत्चेऽपि विज्ञाय स्वपुण्यपरिचोदिताः । प्रद्रुताः पयसि क्ष्माजस्याधस्तात्किल्विषं स्वयम् ॥ २०२ ॥अपहृत्य ‘सुरङ्गापातेन देशान्तरं गताः । स्वसम्बन्धादिदुःखस्य वेदनायाश्च पाण्डवाः ॥ २०३ ॥पोदनाख्यपुरे चन्द्रदशनाममहीपतेः । देविलायाश्च ‘पुत्रन्ते कलागुणविशारदम् ॥ २०४ ॥विधाय निहतस्थूणगन्धा राज्यं व्यतारिषुः । अथेन्द्रवर्मणे प्रीत्येत्येषा वार्ता श्रुता चरात् ॥ २०५ ॥इहाप्यवश्यमेष्यन्ति विधेयस्तत्स्वयंवरः । न केनचिद्विरोधोऽयमिति तद्वचनश्रुतेः ॥ २०६ ॥वसन्तेऽचीकरद्राजा स स्वयंवरमण्डपम् । तत्र सर्वमहीपालाः सम्प्रापन् पाण्डवेषु च ॥ २०७ ॥भीमस्य भोजनान्गन्धगजस्य करतर्जनात् । पार्थस्य मत्स्यनिर्भेदाच्चापरोहणसाहसात् ॥ २०८ ॥नारदागमनाच्चापि लक्ष्यमाणेषु निश्चितम् । समागतेषु सत्स्वर्हन्महापूजापुरस्सरम् ॥ २०९ ॥प्रविश्य भूषिता रत्नैः सा स्वयंवरमण्डपम् । भूमिपान् कुलरूपादिगुणैः सिद्धार्थनामनि ॥ २१० ॥पुरोधसि क्रमात्सर्वान् कथयत्यतिलङ्घय तान् । कन्या सम्भावयामास मालयोज्ज्वलयाऽर्जुनम् ॥ २११ ॥
परन्तु अपने पुण्यके उदय से प्रेरित हुए ये लोग दुर्योधनकी यह चालाकी जान गये इसलिए जलमें खड़े हुए किसी वृक्षके नीचे रहनेवाले पिशाचको स्वयं हटाकर भाग गये और अपने कुटुम्बी जनोंसेप्राप्त दुःखका अनुभव करनेके लिए देशान्तरको चले गये हैं। इधर गुप्तचरके मुखसे इनके विषयकी यह बात सुनी गई है कि पोदनपुरके राजा चन्द्रदत्त और उनकी रानी देविलाके इन्द्रवर्मा नामक पुत्रको पाण्डवोंने समस्त कलाओं और गुणोंमें निपुण बनाया है तथा उसकी प्रतिद्वन्द्वी स्थूण-गन्धको नष्टकर उसके लिए राज्य प्रदान किया है। सो वे पाण्डव यहाँ भी अवश्य ही आवेंगे । अतः अपने लिए द्रौपदीका स्वयंवर करना चाहिए क्योंकि ऐसा करनेसे किसीके साथ विरोध नहीं होगा । मन्त्रियोंके उक्त वचन सुनकर राजाने बसन्त ऋतुमें स्वयंवर-मण्डप बनवाया जिसमें सब राजा लोग आये । पाण्डव भी आये, उनमें भीम तो भोजन बनाने तथा मदोन्मत्त हाथीको हाथसे ताड़ित करनेसे प्रकट हुआ, अर्जुन मत्स्यभेद तथा धनुष चढ़ानेके साहससे प्रसिद्ध हुआ एवं अन्य लोग नारदके आगमनसे प्रकट हुए। जब सब लोग निश्चित रूपसे स्वयंवर-मण्डपमें आकर विराज-मान हो गये तब अर्हन्त भगवान्की महा पूजाकर रत्नोंसे सजी हुई द्रौपदी स्वयंवर-मंडपमें प्रविष्ट हुई । सिद्धार्थ नामक पुरोहित कुल-रूप आदि गुणोंका वर्णन करता हुआ समस्त राजाओंका अनुक्रमसे परिचय दे रहा था। क्रम-क्रमसे द्रौपदी समस्त राजाओंको उल्लंघन करती हुई आगे बढ़ती गई। अन्तमें उसने अपनी निर्मल मालाके द्वारा अर्जुनको सन्मानित किया ।। २०२-२११ ।।
“However, impelled by the rise of their own past meritorious deeds (Punya), they uncovered Duryodhana’s trickery. Consequently, they removed a fiend (Pishacha) dwelling under a tree submerged in water, managed to escape, and traveled to foreign lands, bearing the sorrows inflicted upon them by their own kinsmen. Meanwhile, it has been learned through a spy that the Pandavas have thoroughly trained Indravarma—the son of King Chandradatta and Queen Devila of Podanapura—in all arts and virtues, destroyed his rival Sthuna-gandha, and secured the kingdom for him.
Therefore, those Pandavas will surely come here as well. Thus, you should organize a Svayamvara (marriage choice assembly) for Draupadi, as doing so will not cause enmity with anyone.’ Hearing these words of the ministers, the King had a Svayamvara pavilion constructed during the spring season, where all the kings arrived. The Pandavas came too: Bhima revealed himself by preparing food and striking an intoxicated elephant with his bare hands; Arjuna became famous through the feat of piercing the fish target (Matsyabheda) and stringing the heavy bow; and the others were revealed upon the arrival of Sage Narada.
When everyone was definitively seated in the Svayamvara pavilion, Draupadi—adorned with precious jewels—entered the arena after performing a grand worship of the Arhant Lords. The priest named Siddhartha introduced all the kings in sequence, describing their lineage, beauty, and virtues. Moving step by step, Draupadi passed by all the other kings. Ultimately, she honored Arjuna by placing her spotless garland around him.”— 202–211
श्लोक 212 से 222
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 |
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