चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 114 to 122
श्लोक ( Shlok ) 114 – 117
प्रविश्य तत्पुरं तत्र कन्यामेकाकिनीं स्थिताम् । एकत्रालोक्य तामाह वदैतश्नगरं कुतः ॥ ११४ ॥जातमीदृक्स्वयं का वेत्यादरात्साब्रवीदलम् । प्रागेतन्नगरेशस्य दायादः कोऽपि कोपतः ॥ ११५ ॥सिद्धराक्षसविद्यत्वात्सम्प्राप्तो राक्षसाभिधाम् । पुरं पुराधिनाथञ्च स निर्मूलं व्यनीनशत् ॥ ११६ ॥तद्वंशजेन केनापि समन्त्रं साधितासिना । कृतरक्षं तदैवैतत्स्थापितं नगरं पुनः ॥ ११७ ॥
नगरके भीतर प्रवेशकर उसने एक जगह अकेली बैठी हुई एक कन्याको देखा और उससे पूछा कि यह नगर ऐसा क्यों हो गया है ? तथा तू स्वयं कौन है ? सो कह। इसके उत्तर में वह कन्या आदरके साथ कहने लगी कि ‘पहले इस नगरके स्वामीका कोई भागीदार था जो अत्यन्त क्रोधी था और राक्षस विद्या सिद्ध होनेके कारण ‘राक्षस’ इस नामको ही प्राप्त हो गया था। उसीने क्रोधवश नगरको और नगरके राजाको समूल नष्ट कर दिया था। तदनन्तर उसके वंशमें होने वाले किसी पुरुषने मन्त्र-पूर्वक तलवार सिद्ध की थी और उसी तलवारके प्रभावसे उसने इस नगरको सुरक्षित कर फिरसेबसाया है ।। ११४-११७ ।।
Upon entering the city, he saw a maiden sitting all alone in a certain place and asked her, “Tell me, why has this city become like this? And who are you yourself?”
In response, the maiden respectfully began to speak, “Long ago, there was a partner of the ruler of this city who was extremely wrathful. Because he had mastered the occult lore of demons (Rakshasa-vidya), he came to be known by the very name ‘Rakshasa’. In a fit of rage, he completely destroyed this city along with its king. Subsequently, a man born into his lineage mastered a sword through the power of sacred mantras, and by the influence of that very sword, he secured this city and repopulated it.” [114-117]
श्लोक ( Shlok ) 118
पतिर्महाबलोऽद्यास्य काञ्चनादिलता प्रिया । तस्यै तयोरहं पद्मलताऽभूवं सुताख्यया ॥११८ ॥
इस समय इस नगरका राजा महाबल है और उसकी रानीका नाम काश्चनलता है। मैं इन्हीं दोनोंकी पद्मलता नामकी पुत्री हुई थी ॥ ११८ ॥
“At present, the king of this city is Mahabala, and his queen’s name is Kanchanalata. I was born to these two as their daughter, named Padmalata.” [118]
श्लोक ( Shlok ) 119 – 122
कदाचिम्मत्पिता मन्त्रसाधितं खड्गमात्मनः । प्रमादान करोति स्म करे तद्रन्ध्रवीक्षणात् ॥ ११९ ॥राक्षसेन इतस्तस्मात्पुरं शून्यमभूदित्रम् । मस्सुता निर्विशेषेति मां मत्वामारयन् गतः ॥ १२० ॥भगन्तासौ पुनर्नेतुमिति तद्वचनश्रुतेः । वैश्यः खड्गं तमादाय गोपुरान्तहितः खगम् ॥ १२१ ॥आयान्तमवधीत्सोपि पठन् पञ्चनमस्कृतिम् । न्यपतन्मेदिनीभागे समाहितमतिस्तदा ॥ १२२ ॥
मेरा पिता उस मंत्र-साधित तलवारको कभी भी अपने हाथसे अलग नहीं करता था परन्तु प्रमादसे एक बार उसे अलग रख दिया और छिद्र देखकर राक्षसने उसे मार डाला जिससे यह नगर फिरसे सूना हो गया है। उसने मुझे अपनी पुत्रीके समान माना अतः वह मुझे बिना मारे ही चला गया। अब वह मुझे लेनेके लिए फिर आवेगा’। कन्याकी बात सुनकर वह वैश्य उस तलवारको लेकर नगरके गोपुर (मुख्य द्वार) में जा छिपा और जब वह विद्याधर आया तब उसे मार दिया। वह विद्याधर भी उसी समय पञ्चनमस्कार मन्त्रका पाठ करता हुआ चित्त स्थिरकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ११९-१२२ ।।
“My father would never part with that mantra-charged sword, but once, out of negligence, he set it aside. Seizing the vulnerability, the Rakshasa killed him, due to which this city has become desolate once again. However, he regarded me like his own daughter, so he left without killing me. Now, he will return to claim me.”
Hearing the maiden’s words, that merchant took the sword and hid himself in the gopuram (the main gate) of the city. When the Vidyadhara arrived, the merchant struck him down. Reading the Pancha-Namaskara mantra at that very moment, the Vidyadhara composed his mind and collapsed onto the earth. [119-122]
श्लोक 123 से 135
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113
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