मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 322 to 332
श्लोक ( Shlok ) 322 – 325
स कदाचिदुपाध्यायः सर्वसङ्गान् परित्यजन् । पर्वतस्तस्य माता च मन्दबुद्धी तथापि तौ ॥३२२॥ पालनीयौ त्वया भद्र मत्परोक्षेऽपि सर्वथा । इत्यवोचत्वसुं सोऽपि प्रीतोऽस्मि त्वदनुग्रहात् ॥३२३॥ अनुक्तसिद्धमेतत्तु वक्तव्यं किमिदं मम । ‘विधेयः संशयो नात्र पूज्यपाद यथोचितम् ॥ ३२४॥ परलोकमनुष्ठातुमर्हसीति द्विजोत्तमम् । मनोहरकथाम्लानमालयाभ्यर्चयन्नृपः ॥३२५॥
किसी एक दिन क्षीरकदम्बक ने समस्त परिग्रहोंके त्याग करनेका विचार किया इसलिए उसने राजा वसुसे कहा कि यह पर्वत और उसकी माता यद्यपि मन्दबुद्धि हैं तथापि हे भद्र ! मेरे पीछे भी तुम्हें इनका सब प्रकारसे पालन करना चाहिये । उत्तरमें राजा वसुने कहा कि मैं आपके अनुग्रहसे प्रसन्न हूं । यह कार्य तो बिना कहे ही करने योग्य है इसके लिए आप क्यों कहते हैं ? हे पूज्यपाद ! इसमें थोड़ा भी संशय नहीं कीजिये, आप यथायोग्य परलोकका साधन कीजिये । इस प्रकार मनोहर कथा रूपी अम्लान मालाके द्वारा राजा वसुने उस उत्तम ब्राह्मणका खूब ही सत्कार किया ।। ३२२-३२५ ।।
One day, Kshirakadamba resolved to renounce all worldly possessions and attachments (Parigraha). Therefore, he said to King Vasu, “O gentle one! Although this Parvata and his mother are dull-witted, you must care for and protect them in every way after I am gone.”
In response, King Vasu replied, “I am blessed by your favor. This is a duty worth performing even without being asked; why must you even request it? O revered master (Poojyapaada)! Do not harbor even the slightest doubt regarding this. Please pursue the path toward the next world as is fitting.”
In this manner, through the unfading garland of delightful and pleasant speech, King Vasu greatly honored that noble Brahmin. || 322-325 ||
श्लोक ( Shlok ) 326
क्षीरकदम्बे च सम्यक् सम्प्राप्य संयमम् । प्रान्ते संन्यस्य सम्प्राप्ते नाकिनां लोकमुत्तमम् ॥३२६॥
तदनन्तर क्षीरकदम्बकने उत्तम संयम धारण कर लिया और अन्तमें संन्यासमरण कर उत्तम स्वर्ग लोकमें जन्म प्राप्त किया ।। ३२६ ।।
Thereafter, Kshirakadamba adopted the highest state of self-restraint (Samyama), and ultimately, passing away in the practice of holy ascetic meditation (Sanyasamaran), attained birth in the highest celestial realm (Swarga Loka). || 326 ||
श्लोक ( Shlok ) 327
पर्वतोऽपि पितृस्थानमध्यास्याशेषशास्त्रवित् । शिक्षाणां विश्वदिक्कानां व्याख्यातुं रतिमातनोत् ॥३२७॥
इधर समस्त शास्त्रोंका जाननेवाला पर्वत भी पिताके स्थान पर बैठकर सब प्रकारकी शिक्षाओंकी व्याख्या करनेमें प्रेम करने लगा ॥ ३२७ ॥
Meanwhile, Parvata, assuming he knew all the scriptures, seated himself in his father’s place and took delight in expounding upon all kinds of teachings. || 327 ||
श्लोक ( Shlok ) 328
तस्मिन्नेव पुरे नारदोऽपि विद्वज्जनान्वितः । सूक्ष्मधीविहितस्थानो बभार व्याख्यया यशः ॥३२८॥
उसी नगरमें सूक्ष्म बुद्धिवाला नारद भी अनेक विद्वानोंके साथ निवास करता था और शास्त्रोंकी व्याख्या के द्वारा यश प्राप्त करता था ।।३२८।।
In that very same city, Narada, possessed of a subtle and sharp intellect, also resided among numerous scholars, earning widespread renown through his brilliant expositions of the scriptures. || 328 ||
श्लोक ( Shlok ) 329 – 332
गच्छत्येवं तयोः काले कदाचित्साधुसंसदि । अजैर्होतव्यमित्यस्य वाक्यस्यार्थप्ररूपणे ॥३२९॥विवादोऽभून्महांस्तत्र विगताङ्कुरशक्तिकम् । यवबीजं त्रिवर्षस्थमजमित्यभिधीयते ॥३३०॥ तद्विकारेण सप्तार्चिर्मुखे देवार्चनं विदः । वदन्ति यज्ञमित्याख्यदनुपद्धति नारदः ॥३३१॥ पर्वतोप्यजशब्देन पशुभेदः प्रकीर्त्तितः । यज्ञोऽग्नौ तद्विकारेण होत्रमित्यवदद्विधीः ॥३३२॥
इस प्रकार उन दोनोंका समय बीत रहा था। किसी एक दिन साधुओंकी सभामें ‘अजैर्होतव्यम्’ इस वाक्यका अर्थ निरूपण करनेमें बड़ा भारी विवाद चल पड़ा । नारद कहता था कि जिसमें अङ्कुर उत्पन्न करनेकी शक्ति नष्ट हो गई है ऐसा तीन वर्षका पुराना जौ अज कहलाता है और उससे बनी हुई वस्तुओंके द्वारा अग्निके मुखमें देवताकी पूजा करना करना-आहुति – आहुति देना यज्ञ कहलाता है। नारदका यह व्याख्यान यद्यपि गुरुपद्धतिके अनुसार था परन्तु निर्बुद्धि पर्वत कहता था कि अज शब्द एक पशु विशेषका वाचक है अतः उससे बनी हुई वस्तुओंके द्वारा अग्निमें होम करना यज्ञ कहलाता है ।। ३२९-३३२ ।।
In this manner, time was passing for both of them. One day, in an assembly of sages, a massive dispute broke out over the interpretation of the scriptural phrase “Ajair Hotavyam” (अजैर्होतव्यम्).
Narada argued that ‘Aja’ refers to three-year-old grain (such as barley) that has lost its capacity to germinate, and performing rituals by offering preparations made from such grain into the mouth of the fire to worship the deities constitutes a true sacrifice (Yajna). Although Narada’s exposition strictly followed the traditional lineage of their Guru, the foolish Parvata insisted that the word ‘Aja’ designates a specific animal (a goat), and therefore, offering oblations into the fire using items derived from it constitutes a sacrifice. || 329-332 ||
श्लोक 333 से 343
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321
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