नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 52 to 64
श्लोक ( Shlok ) 52 – 56
गच्छत्येवं क्षणे वास्य काले बहुतरेऽन्यदा । आत्तवारिपथोद्योगा नष्टदिक्का वणिक्सुताः ॥ ५२ ॥प्राप्य द्वारावतीं केचित्पुण्यान्मगधवासिनः । राज्यलीलां विलोक्यात्र विभूतिञ्च सविस्मयाः ॥ ५३ ॥बहूनि रत्नान्यादाय सारभूतानि तत्पुरात् । गत्वा राजगृहं प्राप्तचक्ररत्नं महीपतिम् ॥ ५४ ॥रलान्युपायनीकृत्य पुरस्कृत्य वणिक्पतिम् । ददृशुः कृतसन्मानस्तान पृच्छत्प्रजेश्वरः ॥ ५५ ॥भो भवद्भिः कुतो लब्धमिदं रत्नकदम्बकम् । उदंशुभिरिवोन्मीलितेक्षणं कौतुकादिति ॥ ५६ ॥
इस तरह सुखोपभोग करते हुए उनका बहुत भारी समय एक क्षणके समान बीत गया । किसी एक दिन मगध देशके रहनेवाले ऐसे कितने ही वैश्य पुत्र, जो कि जलमार्ग से व्यापार करते थे, पुण्योदयसे मार्ग भूल कर द्वारावती नगरीमें आ पहुँचे। वहाँकी राजलीला और विभूति देखकर आश्चर्यमें पड़ गये। वहाँ जाकर उन्होंने बहुतसे श्रेष्ठ रत्न खरीदे । तदनन्तर राजगृह नगर जाकर उन वैश्य-पुत्रोंने अपने सेठको आगे किया और उन रत्नोंको भेंट देकर चक्ररत्नके धारक राजा जरासन्धके दर्शन किये । राजा जरासन्धने उन सबका सन्मान कर उनसे पूछा कि ‘अहो वैश्य-पुत्रो ! आप लोगोंने यह रत्नोंका समूह कहाँ से प्राप्त किया है ? यह अपनी उठती हुई किरणों से ऐसा जान पड़ता है मानो कौतुकवश इसने नेत्र ही खोल रक्खे हों’ ।। ५२-५६ ॥
While enjoying pleasures in this manner, a vast amount of time passed for Him as though it were a single moment. One day, a few sons of merchants residing in the Magadha region, who traded via waterways, lost their way due to the rise of their good fortune (punyodaya) and arrived in the city of Dwaravati. They were struck with wonder upon seeing the royal grandeur and splendor of the city. There, they purchased many excellent gems.
Thereafter, returning to the city of Rajagriha, those merchant sons placed their guild-chief (seth) at the forefront and presented those gems as an offering to meet King Jarasandha, the bearer of the wheel-ratna (Chakra-ratna). King Jarasandha honored them all and asked, “O sons of merchants! From where did you obtain this collection of gems? With its rising rays of light, it appears as though it has curiously opened its eyes.” (52-56)
श्लोक ( Shlok ) 57 – 64
शृणु देव महच्चित्रमेतदस्मद्विलोकितम् । पातालादेत्य वादृष्टपूर्वमुर्वीमुपस्थितम् ॥ ५७ ॥सङ्गुलीकृतसौधोरुभवनत्वादिवाम्बुधैः । फेनराशिस्तदाकारपरिणाममुपागतः ॥ ५८ ॥अलङ्ख्यत्वात्परैः पुण्यं वापरं भरतेशितुः । नेमिस्वामिसमुत्पत्तिहेतुत्वान्नगरोत्तमम् ॥ ५९ ॥असंहतम ‘नासेव्यमर्थिभिर्वीतगौरवम् । शरदब्दकुलं तिष्ठत्युपर्येतन्ममेति वा ॥ ६० ॥सौधाग्रान्दोलितालोलपताकाबहुबाहुभिः । निशचिकीर्षुः संङ्घर्षाद्दूरमभ्रपथोच्छ्रितम् ॥ ६१ ॥परार्ध्यभूरि रत्नत्वात्कृष्णतेजोविराजनात् । सदा गम्भीरशब्दत्वादम्भोधिजलसन्निभम् ॥ ६२ ॥नवयोजनविस्तारं दैर्घ्यद्वादशयोजनम् । पुरं द्वारावती नाम यादवानां पयोनिधेः ॥ ६३ ॥मध्ये प्रवर्तते तस्मादेतद्रनकदम्बकम् । लब्धमस्माभिरित्येवमब्रुवंस्तेऽपि भूपतिः ॥ ६४ ॥
उत्तरमें वे वैश्य-पुत्र कहने लगे कि हे राजन् ! सुनिये, हमलोगोंने एक बड़ा आश्चर्य देखा है और ऐसा आश्चर्य, जिसे कि पहले कभी नहीं देखा है। समुद्रके बीचमें एक द्वारावती नगरी है जो ऐसी जान पड़ती है मानो पातालसे ही निकल कर पृथिवी पर आई हो। वहाँ चूनासे पुते हुए बड़े-बड़े भवन सघनता से विद्यमान हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है मानो समुद्रके फेनका समूह ही नगरीके आकार परिणत हो गया हो। वह शत्रुओंके द्वारा अलङ्घनीय है अतः ऐसी जान पड़ती है मानो भरत चक्रवर्तीका दूसरा पुण्य ही हो । भगवान् नेमिनाथकी उत्पत्तिका कारण होनेसे वह नगरी सब नगरियोंमें उत्तम है, कोई भी उसका विघात नहीं कर सकता है, वह याचकोंसे रहित है, यह उसके महलों पर बहुत-सी पताकाएँ फहराती रहती हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है कि ‘यह गौरव रहित शरद् ऋतुके बादलोंका समूह मेरे ऊपर रहता है’ इस ईर्ष्या के कारण ही वह मानो महलोंके अग्रभाग पर फहराती हुई चञ्चल पताकाओं रूपी बहुत-सी भुजाओंसे आकाशमें ऊँचाई पर स्थित शरद् ऋतुके बादलोंको वहाँ से दूर हटा रही हो। वह नगरी ठीक समुद्रके जलके समान है क्योंकि जिस प्रकार समुद्रके जल में बहुतसे रत्न रहते हैं उसी प्रकार उस नगरी में भी बहुतसे रत्न विद्यमान हैं, जिस प्रकार समुद्रका जल कृष्ण तेज अर्थात् काले वर्णसे सुशोभित रहता है उसी प्रकार वह नगरी भी कृष्ण तेज अर्थात् वसुदेवके पुत्र श्री कृष्णके प्रतापसे सुशोभित है, और जिस प्रकार समुद्रके जलमें सदा गम्भीर शब्द होता रहता है उसी प्रकार उस नगरीमें भी सदा गम्भीर शब्द होता रहता है। वह नौ योजन चौड़ी तथा बारह योजन लम्बी है, समुद्रके बीचमें है तथा यादवोंकी नगरी कहलाती है। हम लोगोंने ये रत्न वहीं प्राप्त किये हैं’ ऐसा वैश्य-पुत्रोंने कहा ।। ५७-६४ ॥
In response, the sons of the merchants began to say, “O King! Please listen, we have witnessed a great wonder—a marvel such as we have never seen before. In the midst of the ocean lies the city of Dwaravati, which appears as if it has emerged from the netherworld (Patala) onto the earth. Massive, lime-whitewashed mansions stand closely packed together there, making it look as though a massive accumulation of ocean foam has transformed into the shape of a city. It is unassailable by enemies, appearing as if it were the personified secondary merit (punya) of Emperor Bharata himself. Because it is the birthplace of Lord Neminatha, that city is supreme among all cities. No one can destroy it, and it is entirely free of beggars.
Many flags flutter atop its palaces, creating an impression that out of jealousy—thinking, ‘How dare these ordinary autumn clouds hover above me?’—the city is using its numerous arms in the form of restless, fluttering banners on its rooftops to drive away the autumn clouds lingering high in the sky.
That city is exactly like the waters of the ocean; for just as the ocean depths hold countless gems, so too does that city abound in magnificent jewels. Just as the ocean water is adorned with a deep dark luster (Krishna-teja), so too is that city illuminated by the dark-hued glory (Krishna-teja) and majesty of Shri Krishna, the son of Vasudeva. And just as the ocean constantly resonates with a deep, roaring sound, so too does that city forever echo with profound sounds. It is nine yojanas wide and twelve yojanas long, situated right in the heart of the ocean, and is renowned as the city of the Yadavas. We obtained these gems right there,” so said the merchant sons. (57-64)
श्लोक 65 से 81
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