अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 441 to 453
श्लोक ( Shlok ) 441 – 448
सर्वज्ञाज्ञानिमिचेन षड्द्रव्यादिषु या रुचिः । साज्ञा निस्सङ्गनिश्चेलपाणिपात्रत्वलक्षणः ॥ ४४१ ॥ मोक्षमार्ग इति श्रुत्वा या रुचिर्मागंजा त्वसौ । त्रिषष्टिपुरुषादीनां या पुराणप्ररूपणात् ॥ ४४२ ॥श्रद्धा सद्यः समुत्पन्ना सोपदेशसमुङ्गता’ । आचाराख्यादिमाङ्गोक्ततपोभेदश्रुतेद्रुतम् ॥ ४४३ ॥ प्रादुर्भूता रुचिस्तज्ज्ञैः सूत्रजेति निरूप्यते । या तु बीजपदादान पूर्वसूक्ष्मार्थजा रुचिः ॥ ४४४ ॥ बीजजासौ पदार्थानां सक्षेपोक्तया समुद्भता । या सा साङ्क्षेपजा यान्या तस्या विस्तारजा तु सा ॥४४५, प्रमाणनयनिक्षेपाद्युपायैरतिविस्तृतैः । अवगाह्य परिज्ञानात्तत्त्वस्याङ्गादिभाषितम् ॥ ४४६ ॥ वाग्विस्तर परित्यागादुपदेष्टुर्महामतेः । अर्थमात्र समादानसमुत्था रुचिरर्थजा ॥ ४४७ ॥ अङ्गाङ्गबाह्यसद्भावभावनातः समुद्भता । क्षीणमोहस्य या श्रद्धा सावगाढेति कथ्यते ॥ ४४८ ॥
सर्वज्ञ देवकी आज्ञाके निमित्तसे जो छह द्रव्य आदिमें श्रद्धा होती है उसे आज्ञा सम्य-क्त्व कहते हैं। मोक्षमार्ग परिग्रह रहित है, वस्त्र रहित है और पाणिपात्रतारूप है इस प्रकार मोक्षमार्गका स्वरूप सुनकर जो श्रद्धान होता है वह मार्गज सम्यक्त्व है। तिरसेठ शलाका पुरुषोंकापुराण सुननेसे जो शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है वह उपदेशोत्थ सम्यग्दर्शन है। आचाराङ्ग आदि शास्त्रोंमें कहे हुए तपके भेद सुननेसे जो शीघ्र ही श्रद्धा उत्पन्न होती है वह सूत्रज सम्यग्दर्शन कहलाता है। बीजपदोंके ग्रहण पूर्वक सूक्ष्मपदार्थांसे जो श्रद्धा होती है उसे बीजज सम्यग्दर्शन कहते हैं। पदार्थोंके संक्षेप कथनसे जो श्रद्धा होती है वह संक्षेपज सम्यग्दर्शन है, जो विस्तारसे कहे हुए प्रमाण नय विक्षेप आदि उपायोंके द्वारा अवगाहनकर अङ्ग पूर्व आदिमें कहे हुए तत्त्वोंकी श्रद्धा होती है वह विस्तारज सम्यग्दर्शन कहलाता है। वचनोंका विस्तार छोड़कर महाबुद्धिमान् उपदेशकसे जो केवल अर्थमात्रका ग्रहण होनेसे श्रद्धा उत्पन्न होती है वह अर्थज सम्यग्दर्शन है । जिसका मोहनीय कर्म क्षीण हो गया है ऐसे मनुष्यको अङ्ग तथा अङ्गबाह्य ग्रन्थोंकी भावनासे जो श्रद्धा उत्पन्न होती है वह अवगाढ़ सम्यग्दर्शन कहलाता है ।। ४४१-४४८ ॥
“The faith that arises in the six substances (Dravyas) and other principles, conditioned purely by accepting the commandment of the Omniscient Lord (Sarvajna Deva), is called Agya-samyaktva.
The faith that arises upon hearing the true nature of the path to liberation—that it is devoid of worldly possessions (Parigraha-rahit), free of clothing (Vastra-rahit), and characterized by using only the hollow of one’s palms as an alms-bowl (Panipatratarupa)—is Margaja-samyaktva.
The faith that is quickly awakened by listening to the Puranas (epics) of the sixty-three illustrious personalities (Shalaka Purushas) is Upadeshottha-samyagdarshana.
The faith that quickly manifests upon hearing the various classifications of austerities (Tapa) described in sacred scriptures like the Acharanga is known as Sutraja-samyagdarshana.
The faith that arises regarding subtle, profound realities by grasping foundational keywords or seed-syllables (Beeja-pada) is called Beejaja-samyagdarshana.
The faith that is generated by a brief or concise explanation of the realities is Sankshepaja-samyagdarshana.
The faith that arises by comprehensively delving into the principles taught in the Angas and Purvas (ancient canonical texts) through extensive analytical tools like valid cognition (Pramana), standpoints (Naya), and aspects of presentation (Nikshepa), is called Vistaraja-samyagdarshana.
Leaving aside the elaborate extension of words, the faith that is awakened by grasping only the absolute essence or meaning (Artha) from a highly intelligent preacher is Arthaja-samyagdarshana.
The faith that arises in a soul whose deluding karma (Mohaniya Karma) has been completely destroyed, through continuous contemplation on the Anga (limbs of canon) and Angabahya (subsidiary texts) scriptures, is called Avagadha-samyagdarshana.” [441-448]
श्लोक ( Shlok ) 449
केवलावगमालोकिताखिलार्थगता रुचिः । परमाद्यवगाढाऽसौ श्रद्धेति परमर्षिभिः ॥ ४४९ ॥
केवल-ज्ञानके द्वारा देखे हुए समस्त पदार्थोंकी जो श्रद्धा होती है उसे परमावगाढ सम्यग्दर्शन कहते हैं ऐसा परमर्षियोंने कहा है ॥ ४४९ ॥
“The great sages have declared that the faith which arises regarding all realities exactly as perceived through Omniscience (Kevala-jnana) is called Paramavagadha-samyagdarshana.” [449]
श्लोक ( Shlok ) 450 – 453
एतास्वपि महाभाग तव सन्त्यद्य काश्चन । दर्शनाद्यागमप्रोक्तशुद्धषोडशकारणैः ॥ ४५० ॥ भव्यो व्यस्तैः समस्तैश्च नामात्मीकुरुतेऽन्तिमम् । तेषु श्रद्धादिभिः कैश्चिद्धध्वा तन्नामकारणैः ॥४५१॥ रत्नप्रभां प्रविष्टः सन् तत्फलं मध्यमायुषा । भुक्त्वा निर्गत्य भव्यास्मिन् महापद्माख्यतीर्थकृत् ॥४५२॥ आगाम्युत्सर्पिणीकालस्यादिमः क्षेमकृत्सताम् । तस्मादासन्नभव्योऽसि मा भैषीः संसृतेरिति ॥४५३॥
हे महाभाग ! इन श्रद्धाओंमेंसे आज तेरे कितनी ही श्रद्धाएँ – सम्यग्दर्शन विद्यमान हैं। इनके सिवाय आगममें जिन दर्शन-विशुद्धि आदि शुद्ध सोलह कारण भावनाओंका वर्णन किया गया है उन सभीसे अथवा यथा सम्भव प्राप्त हुई पृथक् पृथक् कुछ भावनाओंसे भव्य जीव तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध करता है। उनमेंसे दर्शनविशुद्धि आदि कितने ही कारणों से तू तीर्थंकर नामकर्मका बन्धकर रत्नप्रभा नामक पहिली पृथिवीमें प्रवेश करेगा, मध्यम आयुसे वहाँका फल भोगकर निकलेगा और तदनन्तर हे भव्य ! तू इसी भरत क्षेत्रमें आगामी उत्सर्पिणी कालमें सज्जनोंका कल्याण करनेवाला महापद्म नामका पहला तीर्थंकर होगा । तू निकट भव्य है अतः संसारसे भय मत कर ॥ ४५०-४५३ ॥
“O noble soul! Out of these forms of faith, several types of Samyagdarshana are present within you today.
Furthermore, a fortunate soul (Bhavya Jiva) binds the Tirthankara Nama-karma (the karma that determines one becoming a Tirthankara) either by meditating upon all the sixteen pure causal contemplations (Solah Karana Bhavanas)—such as Darshana-vishuddhi (purity of right faith)—as described in the scriptures, or by practicing as many of these distinct contemplations as possible.
Through the influence of several of these causes, including Darshana-vishuddhi, you will bind the Tirthankara Nama-karma and then enter Ratnaprabha, the first hellish earth. After experiencing the fruits of that realm for a medium lifespan, you will emerge from there.
Thereafter, O noble soul, during the upcoming Utsarpini (ascending cosmic age) in this very Bharata Kshetra (region), you will become the first Tirthankara, named Mahapadma, bestowing absolute well-being upon all virtuous beings. You are a Nikata-bhavya (a soul very close to ultimate liberation); therefore, do not fear this cycle of worldly existence (Samsara).” [450-453]
श्लोक 454 से 463
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440
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