नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 322 to 331
श्लोक ( Shlok ) 322 – 325
॥ इतः प्रकृतमन्यत्तु वृत्तकं तन्निगद्यते । गङ्गागन्धावतीनद्योः सङ्गमे सफलद्रुमे ॥ ३२२ ॥तापसानामभूत्पल्ली नान्ना जठरकौशिकः ३ । ४वशिष्ठो नायकस्तत्र पञ्चाभिव्रतमाचरन् ॥ ३२३ ॥भद्रान्तगुणवीराभ्यां चारणाभ्यामिदं तपः । अज्ञानकृतमित्युक्तमाकर्ष्यापृच्छदज्ञता ॥ ३२४ ॥कुतो ममेति सक्रोधं कुधीः स्थित्वा तयोः पुरः । आद्योऽत्र वक्तुमुद्युक्तः सन्तो हि हितभाषिणः ॥३२५॥
अब इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली दूसरी कथा कही जाती है जो इस प्रकार है। जहाँ गङ्गा और गन्धावती नदियाँ मिलती हैं वहाँ बहुतसे फले फूले वृक्ष थे। उन्हीं वृक्षोंके बीच में जठरकौशिक नामकी तपसियोंकी एक बस्ती थी। उस बस्तीका नायक वशिष्ठ तपसी था वह पञ्चाग्नि तप तपा करता था । एक दिन वहाँ गुणभद्र और वीरभद्र नामके दो चारण मुनि आये। उन्होंने उसके तपको- अज्ञान तप बताया। यह सुनकर वह दुर्बुद्धि तापस क्रोध करता हुआ उनके सामने खड़ा होकर पूछने लगा कि मेरा अज्ञान क्या है? उन दोनों मुनियोंमें जो प्रथम थे ऐसे गुणभद्र मुनि कहनेके लिए तत्पर हुए सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुष हितका ही उपदेश देते हैं ।। ३२२-३२५ ।।
Now, another story related to this very context is narrated, which is as follows: At the confluence where the rivers Ganga and Gandhavati meet, there stood a dense grove of fully blossoming and fruit-bearing trees. In the midst of those trees lay a settlement of ascetics known as Jathara-Kaushika. The leader of that settlement was an ascetic named Vashishta, who regularly practiced the penance of five fires (Panchagni Tapa).
One day, two sky-faring monks (Charana Munis) named Gunabhadra and Virabhadra arrived there. They characterized his penance as a “penance of ignorance” (Agyana Tapa). Hearing this, that evil-minded ascetic became furious and, standing directly before them, demanded to know, “What is my ignorance?” The first among those two sages, Muni Gunabhadra, prepared himself to explain—which is indeed fitting, for holy men impart only that advice which brings true well-being. || 322-325 ||
श्लोक ( Shlok ) 326 – 327
जटाकलापसम्भूतलिक्षायूकाभिघट्टनम् । सन्ततस्नानसंलग्नजटान्तर्भूतमीनकान् ॥ ३२६ ॥ दह्यभानेन्धनान्तःस्थस्फुरद्विविधकीटकान् । सन्दर्भेदं तवाज्ञानमिति तं समबोधयत् ॥ ३२७ ॥
उन्होंने जटाओंके समूहमें उत्पन्न होनेवाली लीखों तथा जुओंके सङ्घटनको; निरन्तर स्नानके समय लगकर जटाओंके भीतर मरी हुई छोटी छोटी मछलियोंको और जलते हुए इन्धनके भीतर रहकर छटपटाने वाले अनेक कीड़ोंको दिखाकर समझाया कि देखो यह तुम्हारा अज्ञान है ॥ ३२६-३२७ ।।
Pointing them out, the monk explained by showing him the swarms of lice and nits breeding within the matted locks of his hair; the tiny fish that had perished inside those matted locks after getting trapped during his continuous ritual baths; and the numerous insects squirming and writhing in agony inside the burning firewood. He said, “Look, this is your ignorance.” || 326-327 ||
श्लोक ( Shlok ) 328
काललब्धि समाश्रित्य वशिष्टोऽपि विशिष्टधीः । दीक्षित्वाऽऽतपयोगस्थः सोपवासं तपो व्यधात् ॥ ३२८॥
काल-लब्धिका आश्रय मिलनेसे विशिष्ट बुद्धिका धारक वह वशिष्ठ तापस दीक्षा लेकर आतापन योगमें स्थित हो गया और उपवास सहित तप करने लगा ॥ ३२८ ॥
Upon attaining the favorable assistance of the right maturity of time (Kala-Labdhi), that ascetic Vashishta, now a possessor of refined and distinguished intellect, took the vows of Jain initiation (Deeksha). He established himself in the arduous Atapan yoga (the practice of meditating under the scorching heat of the sun) and began performing rigorous austerities alongside fasting. || 328 ||
श्लोक ( Shlok ) 329
तपोमाहात्म्यतस्तस्य सप्तव्यन्तरदेवताः । मुनीश ब्रूहि सन्देशमिष्टमित्यग्रतः स्थिताः ॥ ३२९ ॥
उसके तपके प्रभावसे सात व्यन्तर देवियाँ आयीं और आगे खडी होकर कहने लगीं हे मुनिराज ! अपना इष्ट सन्देश कहिये, हमलोग करनेके लिए तैयार हैं ।॥ ३२९ ॥
By the power of his intense penance, seven Vyantara goddesses (celestial maidens) arrived, and standing before him, they said, “O King among ascetics! Please command us with your desired wish; we are ready to fulfill it.” || 329 ||
श्लोक ( Shlok ) 330
दृष्ट्वा ताः स मुनिः प्राह भवतीभिः प्रयोजनम् । नास्त्यत्रागच्छतान्यस्मिन् यूयं जन्मनि मामिति ॥३३०॥
उन्हें देखकर वशिष्ठ मुनिने कहा कि मुझे आप लोगोंसे इस जन्ममें कुछ प्रयोजन नहीं है अन्य जन्ममें मेरे पास आना ॥ ३३० ॥
Upon seeing them, Muni Vashishta said, “I have no need or purpose for you all in this lifetime; come to me in another birth.” || 330 ||
श्लोक ( Shlok ) 331
क्रमेणैवं तपः कुर्वन्नागमन्मथुरापुरीम् । तत्र मासोपवासी सन्नातपं योगमाचरन् ॥ ३३१ ॥
इस प्रकार तप करते हुए वे अनुक्रमसे मथुरापुरी आये वहाँ एक महीनेके उपवासका नियम लेकर उन्होंने आतापन योग धारण किया ।। ३३१ ।।
Performing austerities in this manner, he eventually arrived at the city of Mathurapuri. There, taking a vow of a month-long fast, he established himself once again in the Atapan yoga (meditation under the scorching heat of the sun). || 331 ||
श्लोक 332 से 341
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