मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 93 to 101
श्लोक ( Shlok ) 93 – 95
अन्येयुस्तत्पुरे गौतमा-वैश्रवणसम्भव । श्रीदत्ताख्याय मुख्याय कुबेरेणात्मजां सतीम् ॥ ९३ ॥ दीयमानां समालोक्य पाण्यग्भः सेकपूर्वकम् । कुबेरदत्तां केनाऽपि महापापविधायिना ॥ ९४ ॥तस्याः स्वानुचरेणोक्तां श्रुत्वा रूपादिसम्पदम् । कुमारे तां स्वसात्कर्तु सह मित्रे समुद्यते ॥ ९५ ॥
किसी एक दिन उसी नगरमें रहनेवाला कुबेर सेठ, उसी नगरमें रहने वाले वैश्रवण सेठकी गोतमा स्त्रीसे उत्पन्न श्रीदत्त नामक श्रेष्ठ पुत्रके लिए हाथमें जलधारा छोड़ता हुआ अपनी कुबेरदत्ता नामकीपुत्री दे रहा था। उसी समय महापापके करने वाले किसी अनुचरने राजकुमार चन्द्रचूलसे कुबेर-दृत्तकै रूप आदिकी प्रशंसा की। उसे सुनकर वह अपने मित्र विजयके साथ उस कन्याको बलपूर्वक अपने आधीन करनेके लिए तत्पर हो गया ॥ ९३-९५ ॥
“One day, in that very city, a wealthy merchant named Kubera was giving away his daughter, Kuberadatta, in marriage to Shridatta—the excellent son born to the lady Gotama and the merchant Vaishravana of the same city—by ceremonially pouring a stream of water into his hand.
At that very moment, a certain wicked attendant, who was a perpetrator of great sins, praised the extraordinary beauty of Kuberadatta in front of Prince Chandrachula. Hearing this praise, the Prince, along with his friend Vijaya, instantly resolved to seize the maiden by brute force and bring her under his control.”93 – 95
श्लोक ( Shlok ) 96 – 97
वणिक्सङ्घसमाक्रोशध्वनिमाकर्ण्य भूपतिः । स्वतनूजदुराचारदारूद्यत्को पपावकः ॥ ९६ ॥पुररक्षकमाहूय दुरात्मानं कुमारकम् । लोकान्तरातिथिं सद्यो विधेहीति समादिशन् ॥ ९७ ॥
यह देख, वैश्योंका समूह चिल्लाता हुआ महाराज के पास गया। उसके रोने-चिल्लानेका शब्द सुनते ही महाराजकी क्रोधाग्नि अपने पुत्रके दुराचाररूपी ईन्धनसे अत्यन्त भड़क उठी। उन्होंने नगरके रक्षकको बुलाकर आज्ञा दी कि इस दुराचारी कुमारको शीघ्र ही लोकान्तरका अतिथि बना दो- मार डालो ॥ ९६-९७ ॥
“Witnessing this, the entire community of merchants (Vaishyas) went rushing to the King, crying out for justice. The moment the King heard the sound of their weeping and wailing, the fire of his wrath blazed furiously, fueled by the wicked misdeeds of his own son. Summoning the city’s chief guardian, he ordered, ‘Make this wicked prince a guest of the other world without delay—put him to death!'”96 – 97
श्लोक ( Shlok ) 98
तदैव सोऽपि राजाज्ञाचोदितस्तुमुलाह्वये । जीवग्राहं गृहीत्वैनमानयन्निकटं विभोः ॥ ९८ ॥
उसी समय राजाज्ञासे प्रेरित हुआ नगररक्षक बहुत भारी भीड़मेंसे इस राजकुमारको जीवित पकड़कर महाराजके समीप ले आया ।। ९८ ॥
“At that very moment, driven by the King’s royal command, the chief guardian of the city captured the prince alive from the midst of a massive crowd and brought him before the King.”98
श्लोक ( Shlok ) 99
तदालोक्य किमित्येष पापीहानीयते द्रुतम् । निशातशूलमारोप्य श्मशाने स्थाप्यतामिति ॥ ९९ ॥
यह देख राजाने विचार किया कि इस पापीको शीघ्र ही किसप्रकार मारा जाय ? कुछ देर तक विचार करनेके बाद उन्होंने नगररक्षकको आदेश दिया कि इसे श्मशानमें ले जाकर पेनी शूलीपर चढ़ा दो ॥ ९९ ॥
“Seeing this, the King began to deliberate: ‘How should this sinner be put to death immediately?’ After reflecting for a few moments, he ordered the city warden, ‘Take him to the cremation ground and impale him upon a sharp spike!'”99
श्लोक ( Shlok ) 100
राज्ञोक्ते प्रस्थितो हन्तुं कुमारं पुररक्षकः । न्यायानुवर्तिनां युक्तं न हि स्नेहानुवर्तनम् ॥ १०० ॥
राजाके कहते ही नगररक्षक कुमारको मारनेके लिए चल दिया । सो ठीक ही है क्योंकि न्यायके अनुसार चलने वाले पुरुषोंको स्नेहका अनुसरण करना उचित नहीं है ।। १०० ।।
“The moment the King spoke, the city warden set off to execute the prince. And this is indeed proper; for those who walk the path of strict justice, it is not fitting to be swayed by personal affection.” 100
श्लोक ( Shlok ) 101
तदामात्योत्तमः पौरान्पुरस्कृत्य महीपतिम् । व्यजिज्ञपदिति व्यक्तमुत्क्षिप्तकरकुड्मलः ॥ १०१ ॥
इधर यह हाल देख प्रधान मन्त्री नगरवासियोंको आगे कर राजाके समीप गया और हस्तरूपी कमल ऊपर उठाकर इस प्रकार निवेदन करने लगा ॥ १०१ ॥
“Meanwhile, witnessing this turn of events, the prime minister placed himself at the head of the citizens and approached the King. Raising his lotus-like hands in reverence, he submitted the following plea:”101
श्लोक 102 से 112
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92
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