चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 322 to 330
श्लोक ( Shlok ) 322 – 324
तेनैवास्मदभिप्रेतकार्यसिद्धिर्भविष्यति । इत्यसौ चागमत्केषुचिद्दिनेषु तदन्तिकम् ॥ ३२२ ॥ततस्तुष्टः खगाधीशः कृतप्राघूणिकक्रियः । मित्र गन्धर्वदत्तायाः मत्सुतायाः स्वयंवरम् ॥ ३२३ ॥त्वत्पुरे कारयेत्येनमभ्यधादधिकादरः । जिनदत्तोऽपि तां नीत्वा सह राजपुरं खगैः ॥ ३२४ ॥
उसीसे हमारे इष्ट कार्यकी सिद्धि होगी । इस तरह कितने ही दिन बीत जानेपर वह जिनदत्त गरुड़वेगके पास आया। इससे गरुड़वेग बहुत ही सन्तुष्ट हुआ । उसने जिनदत्तका अच्छा सत्कार किया। तदनन्तर विद्याधरोंके राजा गरुड़वेगने बड़े आदरके साथ जिनदत्त से कहा कि हे मित्र ! आप अपनी नगरी में मेरी पुत्री गन्धर्वदत्ताका स्वयंवर करा दो । उसकी आज्ञानुसार जिनदत्त भी अनेक विद्याधरोंके साथ गन्धर्वदत्तको राजपुर नगर ले गया ।। ३२२-३२४ ॥
“‘Through him alone shall our desired objective be accomplished.’ In this manner, after several days had passed, that Jinadatta arrived before Garuda-vega. Garuda-vega was exceedingly pleased by this and received Jinadatta with great hospitality. Thereafter, with great respect, Garuda-vega, the king of the Vidyadharas, said to Jinadatta, ‘O friend! Please organize the bride-groom choice (Svayamvara) of my daughter Gandharvadatta in your own city.’ Following his command, Jinadatta took Gandharvadatta to the city of Rajapura, accompanied by numerous Vidyadharas. || 322-324 ||”
श्लोक ( Shlok ) 325
स्वयंवरं समुद्धोष्य मनोहरवनान्तरे । मनोहरं समुत्पाद्य स्वयंवरमहागृहम् ॥ ३२५ ॥
वहाँ जाकर उसने मनोहर नामके वनमें स्वयंवर होनेकी घोषणा कराई और एक बहुत सुन्दर बड़ा भारी स्वयंवर-गृह बनवाया ।। ३२५ ।।
“Arriving there, he had the proclamation of the bride-groom choice (Svayamvara) made in the charming forest named Manohara, and had an exceedingly beautiful and grand assembly hall constructed for the occasion. || 325 ||”
श्लोक ( Shlok ) 326
कलाविदग्धविधेश भूगोचरमहीशिषु । कुमारेषु प्रयातेषु जिनपूजां न्यवर्तयत् ॥ ३२६ ॥
जब अनेक कलाओंमें चतुर विद्याधर तथा भूमिगोचरी राजकुमार आ गये तथ उसने जिनेन्द्र भगवान्की पूजा कराई ॥ ३२६ ।।
“When the Vidyadharas and earth-dwelling (Bhumi-gochari) princes, all skilled in numerous arts, had arrived, he had the worship of Lord Jinendra performed. || 326 ||”
श्लोक ( Shlok ) 327
तदा गन्धर्वदत्तापि स्वयंवरसभागृहम् । प्रविश्य ‘वीणाञ्चादाय सुघोषाख्यां सुलक्षणाम् ॥ ३२७ ॥
उसी समय गन्धर्वदत्ताने भी सुघोषा नामकी उत्तम लक्षणों वाली वीणा लेकर स्वयंवरके सभागृहमें प्रवेश किया ॥ ३२७ ॥
“At that very moment, Gandharvadatta also entered the assembly hall of the bride-groom choice (Svayamvara), carrying the lute (Veena) named Sughosha, which possessed excellent auspicious marks. || 327 ||”
श्लोक ( Shlok ) 328 – 330
स्वरग्रामादिसद्वाचं शुद्धदेशजलक्षणम् । गीतमिश्र विधायैतानधरीकृत्य भूभुजः ॥ ३२८ ॥ स्थिता जीवन्धरस्तस्या वीणाविद्याकृतं मदम् । निराचिकीर्षुरागत्य स्वयंवरसभागृहम् ॥ ३२९ ॥अपक्षपतितान् प्राज्ञान् वीणाविद्याविशारदान् । गुणदोषपरीक्षायां नियोज्योभयसम्मतान् ॥ ३३० ॥
वहाँ आकर उसने गीतोंसे मिले हुए शुद्ध तथा देशज स्वरोंके समूहसे वीणा बजाई और सब राजाओंको नीचा दिखा दिया । तदनन्तर उसका वीणासम्बन्धी मद दूर करनेकी इच्छासे जीवन्धर कुमार स्वयंवर-सभाभवनमें आये । आते ही उन्होंने उन लोगोंको गुण और दोषकी परीक्षा करनेमें नियुक्त किया कि जो किसीके पक्षपाती नहीं थे, बुद्धिमान् थे, वीणाकी विद्यामें निपुण थे और दोनों पक्षके लोगोंको इष्ट थे ।। ३२८-३३० ॥
“Arriving there, she played the lute (Veena) with a blend of pure (Shuddha) and regional (Deshaja) musical notes accompanying the songs, thereby humbling all the assembled kings. Thereafter, with the intent of crushing her pride regarding her musical skill, Prince Jivandhara entered the assembly hall of the Svayamvara. Immediately upon arrival, he appointed judges to examine the virtues and flaws—individuals who were completely unbiased, highly intelligent, experts in the science of the lute, and respected by both sides. || 328-330 ||”
श्लोक 331से 350
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321
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