राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 43 to 50
श्लोक ( Shlok ) 43 – 44
तदागमनमात्रेण सद्वनस्पतिजातयः । काश्चिदनुरिताः काश्चित्सानुरागाः सपल्लवैः ॥ ४३ ॥काश्चित्कोरकिताः काश्चित्सहासाः कुसुमोत्करैः । स्वावध्यायातचित्तेशाः कान्ता इव निरन्तरम् ॥ ४४ ॥
वसन्त ऋतुके आते ही वनमें जो उत्तम वनस्पतियोंकी जातियाँ थीं उनमेंसे कितनी ही अङ्कुरित हो उठीं और कितनी ही अपने पल्लवों से सानुराग हो गईं, कितनी – ही वनस्पतियों पर कलियाँ आ गई थीं, और कितनी ही वनस्पतियाँ, जिनके प्राणवल्लभ अपनी अवधिके भीतर आ गये हैं ऐसी स्त्रियोंके समान फूलोंके समूहसे निरन्तर हँसने लगीं ॥ ४३-४४ ॥
“With the arrival of the spring season, among the finest species of flora in the forest, several sprouted with new shoots, while many others became filled with passion through their tender, blushing leaves. Some plants were laden with fresh buds, and many others—like women whose beloveds had returned safely within the promised time—began to laugh continuously with vibrant clusters of blossoming flowers.”43 – 44
श्लोक ( Shlok ) 45
हिमानीपटलोन्मुक्तं सुव्यक्तं चन्द्रमण्डलम् । ज्योत्स्नां प्रसारयामास दिक्षु लक्ष्मीविधायिनीम् ॥ ४५ ॥
उस समय चन्द्रमाका मण्डल बर्फ के पटलसे उन्मुक्त होनेके कारण अत्यन्त स्पष्ट दिखाई देता था और सब दिशाओंमें शोभा बढ़ानेवाली अपनी चाँदनी फैला रहा था ।। ४५ ।।
“At that time, having been completely liberated from the veil of winter frost, the orb of the moon appeared exceedingly clear and vivid, spreading its direction-illuminating moonlight everywhere.”45
श्लोक ( Shlok ) 46
सारमामोदमादाय विकिरन्पुष्पजं रजः । सरोवारिकणैः सार्द्धमपाच्य पवनो ववौ ॥ ४६ ॥
दक्षिण दिशाका वायु श्रेष्ठ सुगन्धिको लेकर फूलोंसे उत्पन्न हुई परागको बिखेरता हुआ सरोवरके जलके कणोंके साथ बह रहा था ।। ४६ ।।
“The breeze from the southern direction, carrying a sublime fragrance and scattering the pollen born from blossoms, was flowing gently, laden with the fine droplets of the lake’s waters.”46
श्लोक ( Shlok ) 47 – 48
तदान्याभिश्च रामस्य रामाभिः सप्तभिर्नृपः । प्रेक्ष्याभिर्लक्ष्मणस्यापि पृथिवीदेविकादिभिः ॥ ४७ ॥प्रीत्या षोडशमानाभिजिनपूजापुरस्सरम् । तनूजाभिर्नरेन्द्राणां विवाहमकरोत्कृती ॥ ४८ ॥
उसी समय अतिशय कुशल राजा दशरथने श्रीजिनेन्द्रदेवकी पूजापूर्वक अन्य सात सुन्दर कन्याओंके साथ रामचन्द्रका तथा पृथिवी देवी आदि सोलह राजकन्याओंके साथ लक्ष्मणका विवाह किया था ।। ४७-४८ ।।
“At that very time, the exceedingly skillful King Dasharatha—after first performing the ritual worship of Sri Jinendradeva (the Lord Jina)—celebrated the marriage of Ramachandra with seven other beautiful maidens, and of Lakshmana with sixteen royal princesses, including Prithivi Devi.”47 – 48
श्लोक ( Shlok ) 49
ततः सर्वर्तुषु प्रेम्णा ताभिस्तौ सुखमीयतुः । ताश्च ताभ्यामयो यस्माद्वाह्यहेतोः सुखप्रदः ॥ ४९ ॥
तदनन्तर राम और लक्ष्मण दोनों भाई समस्त ऋतुओंमें उन स्त्रियोंके साथ प्रेमपूर्वक सुख प्राप्त करने लगे और वे स्त्रियाँ उन दोनोंके साथ प्रेमपूर्वक सुखका उपभोग करने लगी सो ठीक ही है क्योंकि पुण्य बाह्य हेतुओंसे ही सुखका देनेवाला होता है ॥ ४९ ॥
“Thereafter, both brothers, Rama and Lakshmana, began to affectionately experience happiness with those wives throughout all the seasons, and those women likewise lovingly enjoyed bliss in their company. And this is only fitting, for spiritual merit (punya) bestows happiness precisely through such external instruments.” 49
श्लोक ( Shlok ) 50
एवं स्वपुण्यपाकात्प्रसुखानुभवतत्परौ । तौ लब्ध्वावसरावित्थं कदाचित्प्रोच्चतुर्नृपम् ॥ ५० ॥
इस प्रकार पुण्योदयसे श्रेष्ठ सुखका अनुभव करनेमें तत्पर रहनेवाले दोनों भाई किसी समय अवसर पाकर राजा दशरथसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ५० ॥
“In this manner, the two brothers, who were entirely absorbed in experiencing the magnificent happiness born from the rise of their spiritual merits (punya), found a suitable opportunity on one occasion and addressed King Dasharatha as follows.”50
श्लोक 51 से 61
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42
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