Summary of Uttar Puran Parv 68 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण के अड़सठवें पर्व में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और रावण के चरित्र का जैन परम्परा के अनुसार विस्तृत वर्णन किया गया है। विभीषण के राम की शरण में आने के बाद राम की सेना लंका पहुँचती है। हनुमान लंका में प्रवेश कर वन का विनाश करते हैं और रावण को युद्ध के लिए ललकारते हैं। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध आरम्भ होता है। रावण मायायुद्ध और छल का आश्रय लेता है, किन्तु राम और लक्ष्मण उसके सभी उपायों को विफल कर देते हैं।
युद्ध के निर्णायक चरण में लक्ष्मण चक्ररत्न के द्वारा रावण का वध करते हैं। रावण अपने पापकर्मों के कारण नरकगति को प्राप्त होता है। राम विभीषण को लंका का राजा बनाते हैं और सीता का सम्मानपूर्वक पुनर्मिलन होता है। इसके पश्चात् राम और लक्ष्मण का भव्य अभिषेक होता है तथा लक्ष्मण दिग्विजय कर तीन खण्डों के सम्राट के रूप में अपनी सार्वभौम सत्ता स्थापित करते हैं।
अयोध्या लौटकर दोनों भाई दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करते हैं। शिवगुप्त जिनेन्द्र के उपदेश से राम श्रावकधर्म ग्रहण करते हैं, जबकि भोगासक्ति और निदान के कारण लक्ष्मण सम्यग्दर्शन ग्रहण नहीं कर पाते और अशुभ कर्मों का बन्ध कर लेते हैं। आगे चलकर लक्ष्मण असाध्य रोग से मृत्यु को प्राप्त होकर चौथे नरक में जन्म लेते हैं।
लक्ष्मण की मृत्यु से राम के मन में गहन वैराग्य उत्पन्न होता है। वे राज्य उत्तराधिकारियों को सौंपकर सीता, हनुमान, सुग्रीव, विभीषण तथा अनेक राजाओं के साथ संयम धारण करते हैं। कठोर तप, ध्यान और आत्मसाधना के फलस्वरूप राम केवलज्ञान प्राप्त करते हैं तथा अंत में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त कर सिद्धपद को प्राप्त होते हैं। सीता सहित अनेक आर्यिकाएँ उच्च देवगति को प्राप्त होती हैं, जबकि लक्ष्मण भविष्य में नरक से निकलकर संयम धारण कर मोक्ष प्राप्त करने योग्य बनते हैं।
पर्व के अंतिम भाग में राम, लक्ष्मण, सीता और रावण के पूर्वभवों का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि जीव का भविष्य उसके कर्म, भाव और आन्तरिक प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। समान वैभव और पराक्रम प्राप्त होने पर भी राम सम्यक् श्रद्धा, संयम और वैराग्य के कारण मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जबकि लक्ष्मण भोगासक्ति और निदान के कारण नरकगति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार यह पर्व धर्म, अहिंसा, सम्यग्दर्शन, वैराग्य तथा कर्मफल की महत्ता का प्रभावशाली प्रतिपादन करता है और यह शिक्षा देता है कि भोगों की आकांक्षा (निदान) आध्यात्मिक पतन का कारण है, जबकि संयम और सम्यक् भाव ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
श्लोक 1–16 : रावण के पूर्वभव और सीता के जन्म का कारण
पुरोहित राजा दशरथ को रावण के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं। धातकीखण्ड द्वीप के सारसमुच्चय देश के राजा नरदेव वैराग्य लेकर तपस्या करते हैं, परन्तु निदान के कारण देवगति प्राप्त करते हैं। आगे वे सहस्रग्रीव के रूप में जन्म लेकर लंका के राजा बनते हैं और उनके वंश में पुलस्त्य तथा फिर रावण का जन्म होता है। एक दिन रावण विद्यासाधना में लीन मणिमती का अपमान कर उसकी विद्या नष्ट कर देता है। इससे क्रोधित मणिमती संकल्प करती है कि अगले जन्म में रावण की पुत्री बनकर उसी के विनाश का कारण बनेगी।
श्लोक 17–30 : सीता का परित्याग, जनक द्वारा पालन और राम को मिथिला भेजने का निर्णय
मणिमती रावण और मन्दोदरी के यहाँ कन्या रूप में जन्म लेती है। उसके जन्म के समय अशुभ निमित्त देखकर ज्योतिषी बताते हैं कि यही कन्या रावण के विनाश का कारण बनेगी। भयभीत रावण उसे त्यागने का आदेश देता है। मारीच उसे सन्दूक में रखकर मिथिला के समीप भूमि में गाड़ देता है। राजा जनक उसे प्राप्त कर उसका नाम सीता रखते हैं और रानी वसुधा के संरक्षण में उसका पालन-पोषण कराते हैं। पुरोहित बताते हैं कि रावण को सीता अथवा जनक के यज्ञ की जानकारी नहीं है, इसलिए वह वहाँ नहीं आएगा। यह सुनकर राजा दशरथ राम और लक्ष्मण को सेना सहित मिथिला भेज देते हैं।
श्लोक 31 से 42 : राम-सीता विवाह, अयोध्या आगमन और वसन्त ऋतु का वर्णन
राजा जनक आदरपूर्वक राम और लक्ष्मण का स्वागत करते हैं। यज्ञ सम्पन्न होने पर वे सीता का विवाह राम से कर देते हैं। कुछ समय मिथिला में रहने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटते हैं, जहाँ उनका भव्य स्वागत होता है। राम माता-पिता का आशीर्वाद लेकर सुखपूर्वक रहने लगते हैं। इसी समय वसन्त ऋतु का आगमन होता है, जो प्रकृति की शोभा बढ़ाकर प्रेमियों को आनन्द और विरहियों को अधिक व्याकुल करने वाला बताया गया है।
श्लोक 43 से 50 : वसन्त की शोभा और राम-लक्ष्मण के अन्य विवाह
वसन्त के प्रभाव से वनस्पतियाँ अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हो उठती हैं। चन्द्रमा की शीतल चाँदनी और सुगन्धित दक्षिण पवन सम्पूर्ण वातावरण को मनोहर बना देते हैं। इसी शुभ समय में राजा दशरथ जिनेन्द्र पूजा के उपरान्त राम का सात अन्य राजकुमारियों तथा लक्ष्मण का सोलह राजकुमारियों के साथ विवाह कराते हैं। दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ पुण्यफलस्वरूप प्राप्त सुख का उपभोग करते हुए एक अवसर पर काशी के शासन की इच्छा प्रकट करते हैं।
श्लोक 51 से 61 : दशरथ का उत्तर और राज्यनीति में शक्ति का विवेचन
दशरथ पहले राम और लक्ष्मण को अयोध्या छोड़कर जाने से रोकते हैं, किन्तु दोनों राजधर्म और पुरुषार्थ का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जब तक उत्साह और पुण्य साथ हों, तब तक पुरुष को उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसके बाद बुद्धि के दो प्रकार तथा शक्ति के तीन प्रकार—मन्त्रशक्ति, उत्साहशक्ति और प्रभुत्वशक्ति—का विवेचन किया जाता है। साथ ही शासन में उचित योजना, सहयोग, समय, स्थान और साधनों के महत्व को स्पष्ट किया गया है।
श्लोक 62 से 71 : चार उपाय, षाड्गुण्य नीति और राजकीय आचरण
नीतिशास्त्र के अनुसार राज्य संचालन के चार उपाय—साम, दान, भेद और दण्ड—का विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके माध्यम से राजा अपने उद्देश्यों की सिद्धि करता है। आगे सन्धि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय और द्वैधीभाव नामक छह राजकीय नीतियों का स्वरूप एवं उपयोग समझाया गया है। इन नीतियों को राज्य की समृद्धि और विजय का आधार बताया गया है।
श्लोक 72–83 : राज्य के सात अंग, पुरुषार्थ का महत्व और राम का वाराणसी प्रस्थान
राज्य के सात प्रमुख अंग—स्वामी, मन्त्री, देश, कोश, सेना, दुर्ग और मित्र—का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राज्य की स्थिरता इन पर निर्भर करती है। उद्योग और उत्साह को सफलता का मूल कारण बताया गया है तथा आलस्य को लक्ष्मी का शत्रु कहा गया है। दशरथ राम को राज्याभिषेक योग्य मुकुट और लक्ष्मण को युवराज पद देकर वाराणसी भेजते हैं। वहाँ दोनों भाई न्याय, दान, मर्यादा और प्रजावत्सलता से आदर्श शासन स्थापित करते हैं।
श्लोक 84–92 : रावण का वैभव और नारद का आगमन
उधर रावण त्रिखण्ड भरतक्षेत्र का स्वामी होने के अहंकार में डूबा अपने राजवैभव का प्रदर्शन कर रहा था। सामन्तों से घिरा वह सिंहासन पर अत्यन्त प्रभावशाली दिखाई देता था। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचते हैं। रावण उनका सम्मानपूर्वक स्वागत कर उनके आगमन का उद्देश्य पूछता है, तब नारद उससे महत्वपूर्ण समाचार कहने के लिए तैयार होते हैं।
श्लोक 93–104 : नारद द्वारा सीता का वर्णन और रावण में कामासक्ति का उदय
नारद रावण को बताते हैं कि अयोध्या के राजकुमार राम ने मिथिला में राजा जनक की अनुपम सुन्दरी पुत्री सीता से विवाह किया है। वे सीता के अद्वितीय सौन्दर्य, गुण और आकर्षण का ऐसा वर्णन करते हैं कि रावण के मन में तीव्र कामासक्ति उत्पन्न हो जाती है। अहंकार और वासना से अन्धा होकर रावण यह निश्चय करता है कि वह बलपूर्वक सीता का हरण कर उसे अपनी पत्नी बनाएगा। यही संकल्प आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनता है।
श्लोक 105 से 123 रावण की कुटिल योजना और मारीच का परामर्श
कामासक्ति से अंधा रावण सीता-हरण का निश्चय करता है। नारद उसके अहंकार और क्रोध को भड़काते हुए राम-लक्ष्मण की बढ़ती प्रतिष्ठा का वर्णन करते हैं। रावण बल प्रयोग के स्थान पर उपाय से कार्य सिद्ध करने का विचार करता है और मंत्रियों से सलाह मांगता है। मारीच परस्त्री-हरण को महापाप, अपकीर्तिकर तथा कुलविनाशक बताकर रावण को रोकने का प्रयास करता है, परन्तु रावण उसकी बात नहीं मानता। अंततः मारीच पहले दूतिका भेजकर सीता के मन का परीक्षण करने की सलाह देता है, जिसे रावण स्वीकार कर शूर्पणखा को भेजता है।
श्लोक 124 से 132 शूर्पणखा का प्रस्थान और राम-सीता का वन-विहार
रावण की आज्ञा पाकर शूर्पणखा सीता को रावण के प्रति अनुरक्त करने के उद्देश्य से बनारस के समीप चित्रकूट वन पहुँचती है। उस समय राम और सीता वसंत ऋतु की रमणीयता का आनंद ले रहे होते हैं। एक पुष्पित लता को देखकर सीता के मन में हल्का मान उत्पन्न होता है। तब राम मधुर वचनों और प्रेमपूर्ण व्यवहार से उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं तथा पुष्पों से एक-दूसरे का श्रृंगार करने की बात कहते हैं।
श्लोक 133 से 141 राम द्वारा सीता का मान-भंग
राम अत्यंत चातुर्य और प्रेम से सीता की प्रत्येक इन्द्रिय की तृप्ति का वर्णन करते हुए उसे क्रोध त्यागने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके मधुर वचनों से सीता प्रसन्न हो जाती है और दोनों पुनः प्रेमपूर्वक विहार करते हैं। लक्ष्मण भी अपनी पत्नियों के साथ आनंदपूर्वक समय बिताते हैं। कुछ समय बाद राम प्रकृति के विविध दृश्य दिखाकर सीता का मनोरंजन करते हैं और वन-विहार का सुख बढ़ाते हैं।
श्लोक 142 से 151 जल-विहार और शूर्पणखा का आकर्षण
राम वन और सरोवर में सीता के साथ प्रेमपूर्वक जल-विहार करते हैं। भ्रमरों के सीता के मुख पर मंडराने जैसे मनोरम प्रसंगों से उनका प्रेम और प्रगाढ़ होता है। इसी समय शूर्पणखा वहाँ पहुँचकर राम और लक्ष्मण के अनुपम रूप पर मोहित हो जाती है। अशोक वृक्ष के नीचे सखियों से घिरी सीता को देखकर वह समझ जाती है कि रावण का उसके प्रति आकर्षण स्वाभाविक है।
श्लोक 152 से 163 शूर्पणखा का छल और सीता की करुणा
रूप-परिवर्तन विद्या से शूर्पणखा वृद्धा का वेश धारण कर रानियों के बीच पहुँचती है। वह उनके सौभाग्य का कारण पूछकर उनके मन की परीक्षा लेना चाहती है। रानियाँ उसकी बातों पर हँसी करती हैं, पर सीता करुणा दिखाते हुए उसे समझाती है कि स्त्री-जीवन केवल भोग का साधन नहीं है। वह उसे सांसारिक आसक्ति छोड़कर अपने वास्तविक हित पर विचार करने की प्रेरणा देती है।
श्लोक 164 से 174 सीता द्वारा स्त्रीजीवन की कठिनाइयों का विवेचन
सीता स्त्रीजीवन में आने वाले अनेक दुःखों—कुल-मर्यादा का भार, पुत्रहीनता, विधवापन, सपत्नी-दुःख, पराधीनता, गर्भ एवं प्रसूति की पीड़ा तथा सामाजिक बंधनों—का विस्तार से वर्णन करती है। वह बताती है कि स्त्रीपर्याय अनेक कष्टों से युक्त है और केवल विषय-सुख की कामना करना उचित नहीं। अंत में वह शूर्पणखा को अपने भावी कल्याण का विचार करने की प्रेरणा देती है।
श्लोक 175 से 184 सतीत्व की महिमा और शूर्पणखा की असफलता
सीता सतीत्व को स्त्री का सर्वोच्च धर्म बताते हुए कहती है कि सच्ची पतिव्रता अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की इच्छा नहीं करती। सतीत्व की शक्ति से वह बड़े से बड़े प्रलोभन और बल का भी सामना कर सकती है। इन दृढ़ वचनों से शूर्पणखा समझ जाती है कि सीता को विचलित करना असंभव है। वह रावण के पास लौटकर अपनी असफलता और सीता के अटल शील का वर्णन करती है, किन्तु रावण उसकी बातों पर विश्वास नहीं करता।
श्लोक 185 से 193 रावण का हठ और मारीच के साथ प्रस्थान
रावण शूर्पणखा को डाँटते हुए उसकी असफलता का कारण उसकी अयोग्यता बताता है। शूर्पणखा स्पष्ट करती है कि राम के वैभव, शौर्य, गुण और सीता के अटल शील के सामने किसी उपाय की सफलता संभव नहीं थी। वह कहती है कि शीलवती स्त्री का मन काम से विचलित नहीं किया जा सकता। फिर भी पापकर्म के उदय से प्रेरित रावण मारीच के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर स्वयं सीता-हरण के लिए प्रस्थान करता है।
श्लोक 194 से 203 – मायामृग की योजना और राम का वनगमन
पुष्पक विमान से चित्रकूट पहुँचकर रावण की आज्ञा से मारीच रत्नों से बने अद्भुत हरिण का मायावी रूप धारण करता है। उस विलक्षण हरिण को देखकर सीता उसे लाने की इच्छा प्रकट करती है। सीता की इच्छा पूर्ण करने के लिए राम उसके पीछे चल पड़ते हैं। मायामृग कभी निकट आता, कभी दूर भागता और अंत में आकाश में उड़ जाता है। तब राम समझ जाते हैं कि यह मायावी मृग था, किन्तु तब तक वे सीता से दूर जा चुके होते हैं और आश्चर्य तथा असहाय भाव से वहीं ठहर जाते हैं।
श्लोक 204 से 211 : रावण द्वारा मायापूर्वक सीता का हरण और लंका आगमन
रावण ने राम का रूप धारण कर सीता को यह विश्वास दिलाया कि स्वर्णमृग पकड़ लिया गया है और संध्या होने से अब नगर लौटना उचित है। उसने पुष्पक विमान को पालकी का रूप देकर छलपूर्वक सीता को उसमें बैठा लिया और लंका ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया, जिससे सीता भय, लज्जा और राम-विरह के कारण मूर्छित हो गई।
श्लोक 212 से 221 : सीता का अटल सतीत्व और रावण का अस्वीकार
रावण ने शीलवती सीता का स्वयं स्पर्श न कर विद्याधरियों से उनकी सेवा कराई। विद्याधरियों ने सीता को रावण की पत्नी बनने के लिए प्रेरित किया, परन्तु सीता ने स्पष्ट कहा कि शील और सद्गुण प्राणों से भी अधिक मूल्यवान हैं। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में रावण को स्वीकार करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया।
श्लोक 222 से 235 : सीता का व्रत, अशुभ उत्पात और रावण का अहंकार
सीता ने संकल्प किया कि जब तक राम की कुशल का समाचार नहीं मिलेगा, तब तक वे न बोलेंगी और न भोजन करेंगी। लंका में अनेक अशुभ उत्पात होने लगे तथा चक्ररत्न प्रकट हुआ। मंत्रियों ने रावण को सीता लौटाने और अनर्थ से बचने की सलाह दी, किन्तु रावण ने इसे अपने सौभाग्य का संकेत मानकर उनका हितकारी परामर्श अस्वीकार कर दिया।
श्लोक 236 से 252 : राम का शोक और दशरथ का संदेश
मायामृग का पीछा करते हुए राम मार्ग भूल गए और लौटने पर सीता को न पाकर अत्यन्त शोकाकुल हो गए। खोज के दौरान सीता के वस्त्र का एक अंश मिला, जिससे अपहरण का संकेत मिला। तभी दशरथ का दूत आया और स्वप्न तथा पुरोहित के कथन के आधार पर सीता-हरण का समाचार तथा राजा का पत्र राम को सौंपा।
श्लोक 253 से 262 : दशरथ का परामर्श और राम का क्रोध
दशरथ ने पत्र में लंका, रावण के स्वभाव तथा नारद द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों का वर्णन करते हुए पहले दूत भेजकर सीता को धैर्य देने की सलाह दी। पत्र पढ़कर राम का शोक संयमित हुआ, परन्तु वे रावण के छल और अपराध पर अत्यन्त क्रोधित हो उठे तथा उसके विनाश का निश्चय किया।
श्लोक 263 से 276 : सहयोगियों का आगमन और सुग्रीव–हनुमान का परिचय
लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और जनक ने राम को धैर्य बँधाते हुए सीता की खोज का उपाय करने के लिए प्रेरित किया। उसी समय विद्याधर कुमार सुग्रीव और अणुमान (हनुमान) उपस्थित हुए। सुग्रीव ने अपने राज्य से निष्कासन का वृत्तांत तथा अणुमान के असाधारण पराक्रम और विद्या का परिचय दिया।
श्लोक 277 से 291 : नारद की भविष्यवाणी और हनुमान का दूत बनना
सुग्रीव ने बताया कि सम्मेदशिखर पर नारद ने भविष्यवाणी की थी कि राम और लक्ष्मण महान् ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे तथा उनके कार्य में सहयोग देने से उनका मनोरथ भी पूर्ण होगा। इस प्रेरणा से दोनों राम के पास आए। हनुमान ने स्वयं सीता की खोज हेतु दूत बनने का निवेदन किया और पहचान के लिए कोई चिह्न माँगा।
श्लोक 292 से 302 : मुद्रिका प्राप्त कर हनुमान का लंका प्रवेश
राम ने हनुमान पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें अपनी मुद्रिका और सीता का परिचय दिया। हनुमान लंका पहुँचे, भ्रमर का रूप धारण कर नगर, राजमहल और रावण के परिवार का निरीक्षण करते हुए सभा तक पहुँचे। रावण के वैभव को देखकर उन्होंने विचार किया कि महान् सामर्थ्य होने पर भी अधर्म और परस्त्री-लालसा ने उसे विनाश के मार्ग पर पहुँचा दिया है।
श्लोक 303 से 317 : अणुमान द्वारा सीता का दर्शन
अणुमान ने रावण की सभा में सीता को न देखकर नन्दन वन में उनकी खोज की। वहाँ उसने शिंशपा वृक्ष के नीचे शोकमग्न, पतिव्रत धर्म में अडिग बैठी सीता को पहचान लिया। सीता की दयनीय अवस्था देखकर वह व्यथित हुआ, किन्तु नीति का पालन करते हुए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगा और चन्द्रमा के उदय तक धैर्यपूर्वक वहीं स्थित रहा।
श्लोक 318 से 332 : रावण का प्रलोभन और सीता की अडिग निष्ठा
सात दिन बीतने पर रावण सीता की स्थिति देखने आया। उसने अपनी दूती मञ्जरिका द्वारा वैभव, राज्य और रानी-पद का प्रलोभन दिलाया, परन्तु सीता मौन और अचल रहीं। तब रावण ने स्वयं राम को असहाय बताकर उन्हें अपनी आशा छोड़ने का आग्रह किया, किन्तु सीता का पतिव्रत और धैर्य तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 333 से 353 : रावण का क्रोध और मन्दोदरी का उपदेश
रावण ने सीता को धमकी देकर भी झुकाने का प्रयास किया, परन्तु उसकी सारी बातें निष्फल रहीं। क्रोधित रावण को मन्दोदरी ने समझाया कि सती स्त्री का अपमान विनाश का कारण बनता है और पूर्व उदाहरण देकर उसे मोह त्यागने की सलाह दी। रावण ने यह उपदेश स्वीकार नहीं किया और क्रोधित होकर वहाँ से चला गया। उसके बाद मन्दोदरी ने करुणा से अभिभूत होकर सीता के प्रति मातृस्नेह प्रकट किया और उन्हें अपनी पुत्री के समान मानते हुए सतीत्व की रक्षा करने का ही उपदेश दिया।
श्लोक 354 से 364 : मन्दोदरी की करुणा और अणुमान का आगमन
मन्दोदरी की करुणा और वात्सल्य देखकर सीता का हृदय भी द्रवित हो गया। मन्दोदरी ने शरीर की रक्षा के लिए आहार ग्रहण करने का आग्रह किया और स्वयं भी उपवास की बात कहकर उन्हें समझाया। इसके बाद वह दुःखी होकर लौट गई। अवसर पाकर अणुमान ने वानर रूप धारण किया, रक्षकों को निद्रित किया और सीता के सम्मुख उपस्थित हुआ।
श्लोक 365 से 382 : अणुमान का संदेश और राम की तैयारी
अणुमान ने राम का संदेश, पत्र और मुद्रिका सीता को सौंपकर अपना परिचय दिया। प्रारम्भ में सीता को संदेह हुआ, किन्तु पत्र और मुद्रिका देखकर उनका विश्वास दृढ़ हो गया। अणुमान ने उन्हें आश्वस्त किया कि राम स्वयं आकर उनका उद्धार करेंगे। सीता ने आहार ग्रहण करना स्वीकार किया और अणुमान को शीघ्र लौटने के लिए विदा किया। अणुमान ने लौटकर राम को सीता की कुशल, लङ्का की स्थिति तथा युद्ध की आवश्यक जानकारी दी। राम ने प्रसन्न होकर अणुमान को सेनापति और सुग्रीव को युवराज नियुक्त किया।
श्लोक 383 से 401 : विभीषण के माध्यम से सामोपाय का निर्णय
मन्त्री अङ्गद ने नीति के अनुसार पहले सामोपाय अपनाने की सलाह दी और अणुमान को पुनः दूत बनाकर भेजने का प्रस्ताव रखा। राम ने अणुमान को निर्देश दिया कि वे पहले विभीषण को समझाएँ और उनके माध्यम से रावण को सीता लौटाने का हितकारी संदेश पहुँचाएँ। साथ ही लङ्का की स्थिति और शत्रु की शक्ति का भी पूर्ण समाचार प्राप्त करने को कहा। अणुमान पुनः लङ्का पहुँचे, विभीषण से मिले और अत्यन्त विनयपूर्वक राम का संदेश तथा अपना निवेदन प्रस्तुत किया कि यदि रावण न माने तो उसका विनाश निश्चित है।
श्लोक 402 से 412 : विभीषण द्वारा दूत-परिचय और राम का सन्देश
विभीषण ने रावण को बताया कि रामचन्द्र की विशाल भूमिगोचरी एवं विद्याधर सेनाएँ उनके साथ आ मिली हैं और वे शीघ्र ही लङ्का पहुँचने वाले हैं। उन्होंने अणुमान् का परिचय राम के दूत के रूप में कराया। अणुमान् ने विनम्रतापूर्वक रावण का अभिवादन कर रामचन्द्र का सन्देश सुनाया कि सीता उनकी धर्मपत्नी हैं, अतः भूलवश लायी गई सीता को सम्मानपूर्वक लौटा देना ही उचित होगा।
श्लोक 413 से 422 : अणुमान् की नीति-युक्त सलाह और रावण का अहंकार
अणुमान् ने रावण को समझाया कि परस्त्री-हरण उसके यश, धर्म और कुल-गौरव पर कलंक है तथा सीता को लौटाकर ही वह अपने सम्मान की रक्षा कर सकता है। रावण ने अहंकारपूर्वक उत्तर दिया कि समस्त रत्नों पर उसका अधिकार है और यदि राम में सामर्थ्य है तो युद्ध करके सीता को ले जाएँ। अणुमान् ने पुनः धर्म, न्याय और अपयश का स्मरण कराते हुए हितकारी सलाह दी, परन्तु रावण अपने अभिमान से विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 423 से 435 : दूत का अपमान और युद्ध की अनिवार्यता
रावण ने जनक द्वारा बिना सूचना सीता का विवाह करने को अपना अपमान मानते हुए उसके हरण को उचित ठहराया। अणुमान् ने स्पष्ट कहा कि यह पराक्रम नहीं, चोरी है और वीरता का प्रमाण युद्ध में ही मिलेगा। रावण तथा उसके योद्धाओं ने क्रोधपूर्वक अणुमान् को ललकारा, किन्तु विभीषण ने दूत की मर्यादा की रक्षा करते हुए उसे सम्मानपूर्वक विदा किया। अणुमान् पुनः सीता से मिलकर उनकी स्थिति देखता हुआ लौटने की तैयारी करता है।
श्लोक 436 से 452 : युद्ध की तैयारी और बाली का प्रस्ताव
अणुमान् ने लौटकर रामचन्द्र को सूचित किया कि रावण किसी भी स्थिति में सीता को नहीं छोड़ेगा, इसलिए अब युद्ध ही उपाय है। वर्षा ऋतु समाप्त होने तक राम ने चित्रकूट में निवास किया। इसी बीच बाली ने दूत भेजकर स्वयं अकेले लङ्का जाकर सीता को वापस लाने का प्रस्ताव रखा। मंत्रियों से विचार-विमर्श के बाद राम ने बाली से सहयोग के स्थान पर उसका श्रेष्ठ हाथी माँगते हुए साथ चलने का संदेश भेजा, जिससे बाली अत्यन्त क्रोधित हो गया।
श्लोक 453 से 462 : बाली का विरोध और युद्ध का आरम्भ
बाली ने राम के प्रस्ताव को अपमान मानकर कटु वचन कहे और रावण के प्रति अपनाई गई नीति की आलोचना की। राम के दूत ने उत्तर दिया कि रावण को उसके अपराधानुसार दण्ड अवश्य मिलेगा तथा बाली को अहंकार त्यागकर सहयोग करना चाहिए। बाली ने युद्ध की चुनौती स्वीकार कर ली। परिणामस्वरूप लक्ष्मण के नेतृत्व में सेना खदिरवन पहुँची और दोनों पक्षों के मध्य भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया।
श्लोक 463 से 472 : बाली-वध और लङ्का-प्रयाण
युद्ध के अन्त में लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाण से बाली का वध कर दिया। इसके बाद सुग्रीव को राज्य तथा अणुमान् को उनका यथोचित पद प्राप्त हुआ। रामचन्द्र किष्किन्धा पहुँचे, जहाँ विशाल सेना एकत्रित हुई। लक्ष्मण ने तप और उपासना द्वारा प्रज्ञप्ति विद्या सिद्ध की तथा सुग्रीव सहित अन्य विद्याधरों ने भी अपनी-अपनी विद्याओं की आराधना की। तत्पश्चात् विशाल भूमिगोचरी और विद्याधर सेना लङ्का विजय के लिए प्रस्थान कर गई।
श्लोक 473 से 484 : विभीषण का धर्मोपदेश
कुम्भकर्ण आदि ने भी रावण को सीता लौटाने की सलाह दी, किन्तु वह कामासक्ति के कारण नहीं माना। तब विभीषण ने स्पष्ट कहा कि परस्त्री-हरण वीरता नहीं, अधर्म और कुल-विनाश का कारण है। उन्होंने रावण को उसके व्रत, धर्म, यश, राज्य और लक्ष्मी की रक्षा के लिए सीता लौटाने का आग्रह किया तथा समझाया कि इस पाप से उसका वैभव और भाग्य दोनों नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 485 से 493 : पाप के परिणाम और भविष्यवाणी का स्मरण
विभीषण ने रावण को चेताया कि परस्त्री-हरण महान् पाप है, जो नरक और अपयश का कारण बनेगा। उन्होंने उसे अपने व्रत, शील, निमित्तज्ञों की भविष्यवाणी तथा चक्ररत्न के संकेतों का स्मरण कराया। साथ ही बताया कि राम आठवें बलभद्र और लक्ष्मण नौवें नारायण हैं, इसलिए उनके विरुद्ध जाना विनाश को आमंत्रित करना है। उन्होंने पुनः आग्रह किया कि सीता को सम्मानपूर्वक रामचन्द्र को सौंप देना ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
श्लोक 494 से 501: विभीषण का निष्कासन और राम की शरणागति
विभीषण के हितकारी उपदेश से रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया। उसने आरोप लगाया कि विभीषण दूत के साथ मिलकर उसका अपमान कर रहा है और उसे राज्य से निष्कासित कर दिया। विभीषण ने समझ लिया कि रावण का विनाश निश्चित है और उसके साथ रहना भी अधर्म होगा। उन्होंने इस निष्कासन को अपने लिए शुभ अवसर मानकर लङ्का छोड़ दी और समुद्र पार कर रामचन्द्र की शरण में पहुँच गए।
श्लोक 502 से 515 अणुमान द्वारा लंका पर आक्रमण और वन-विनाश
रामचन्द्र ने विभीषण का सम्मानपूर्वक स्वागत कर उसे अपने साथ मिला लिया। समुद्र तट पर पहुँचने के बाद अणुमान ने लंका जाकर शत्रु का मानभंग करने तथा वन जलाकर रावण को युद्ध के लिए बाहर निकालने की अनुमति माँगी। आज्ञा मिलने पर उसने वानर-सेना और विद्याधरों के साथ लंका पहुँचकर वन का विनाश किया, रक्षकों को परास्त किया तथा अपनी महाज्वाल विद्या से राक्षस-सेना का दहन कर विजयी होकर लौट आया। इस बीच रामचन्द्र ने भी अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार कर लिया।
श्लोक 516 से 531 रावण की विद्यासिद्धि और अहंकार
विभीषण ने बताया कि रावण इस समय आदित्यपाद पर्वत पर उपवास और साधना द्वारा महाविद्याओं की सिद्धि कर रहा है, इसलिए उसकी साधना में विघ्न डालना आवश्यक है। राम की सेना ने लंका का घेरा डाल दिया तथा विद्याधर वीरों को रावण की साधना भंग करने भेजा। इन्द्रजित् ने देवताओं को युद्ध का आदेश दिया, परन्तु उन्होंने रावण का पुण्य क्षीण होने के कारण सहायता करने से असमर्थता व्यक्त कर दी। देवताओं के त्यागने पर भी रावण अपने पुरुषार्थ के अहंकार में डूबा रहा और शत्रुओं को तुच्छ समझकर युद्ध की तैयारी में नगर लौट आया।
श्लोक 532 से 542 रावण की युद्ध-तैयारी
रावण ने रणभेरी बजवाकर अपनी विशाल सेना को विभिन्न दलों में विभाजित किया और अनेक बलशाली भाइयों, पुत्रों तथा विद्याधर वीरों के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया। चक्ररत्न, ध्वजाओं, हाथियों और नगाड़ों से सुसज्जित उसकी सेना अत्यन्त भव्य और भयावह दिखाई दे रही थी। वह अहंकारपूर्वक राम और लक्ष्मण को तुच्छ बताकर उनके विनाश की घोषणा करता हुआ युद्ध के लिए अग्रसर हुआ।
श्लोक 543 से 551 राम-लक्ष्मण का धर्मपूर्वक युद्ध-प्रस्थान
रावण के आगमन का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण क्रोध से उद्दीप्त हुए, किन्तु युद्ध से पूर्व उन्होंने जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार कर धर्म का स्मरण किया। दोनों भाई अपने-अपने हाथियों पर आरूढ़ होकर सुग्रीव, अणुमान तथा अन्य वीरों के साथ युद्धभूमि में पहुँचे। उन्होंने सुव्यवस्थित रूप से सेना का विभाजन किया और उनके नगाड़ों, हाथियों तथा घोड़ों की गर्जना से सम्पूर्ण रणभूमि गूँज उठी।
श्लोक 552 से 560 सेना का अद्भुत वैभव
युद्धभूमि में धनुर्धर, तलवारधारी और अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित वीर उत्साहपूर्वक एकत्र हुए। तीव्र गति से दौड़ते घोड़े अपने सौन्दर्य, कवच और स्वामिभक्ति से सेना की शोभा बढ़ा रहे थे। विविध देशों के उत्कृष्ट घोड़े और सुसज्जित रथ युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार थे तथा सम्पूर्ण सेना विजय के उत्साह से भरकर आगे बढ़ रही थी।
श्लोक 561 से 575 हाथियों और रथों से सुसज्जित विशाल सेना
विशाल हाथियों, वेगवान रथों तथा विविध आयुधों से युक्त सेना का दृश्य अत्यन्त प्रभावशाली था। पर्वतों के समान विशाल हाथी, कुशल महावतों और श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर युद्धभूमि की ओर बढ़ रहे थे। सम्पूर्ण सेना अनुशासन, सामर्थ्य और उत्साह के साथ युद्ध के लिए अग्रसर होकर शत्रु का सामना करने हेतु तैयार हो गई।
श्लोक 576 से 585 युद्धारम्भ और बाणवर्षा
फहराती ध्वजाओं, उड़ती धूल और रणभेरी के बीच दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं। धूल के कारण कुछ समय तक दृश्य अस्पष्ट हो गया, किन्तु उसके शांत होते ही सेनापतियों के आदेश से दोनों पक्षों के वीरों ने घोर बाणवर्षा आरम्भ कर दी। उत्साह और पराक्रम से ओतप्रोत योद्धा अपने-अपने स्वामी के लिए पूर्ण समर्पण के साथ युद्ध करने लगे।
श्लोक 586 से 594 वीरों का कर्तव्य और घमासान संघर्ष
योद्धाओं ने युद्ध को अपने कर्तव्य, यश और श्रेष्ठ गति का साधन मानकर प्राणों की परवाह किए बिना संघर्ष किया। दोनों पक्षों से छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों ने असंख्य वीरों का संहार किया। अनेक विद्याधर और योद्धा परस्पर भीषण युद्ध में लिप्त होकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए अद्भुत शौर्य का परिचय देने लगे।
श्लोक 595 से 604 रणभूमि का भीषण दृश्य और रामसेना की बढ़त
युद्ध अत्यन्त उग्र हो गया। असंख्य हाथी, रथ और वीर बाणों से घायल होकर धराशायी हुए तथा रणभूमि रक्तरंजित हो उठी। मृत शरीरों, विच्छिन्न अंगों और भयावह वातावरण के बीच भी वीर युद्धरत रहे। अन्ततः रामचन्द्र की सेना ने अपने पराक्रम और संगठन के बल पर रावण की सेना को पीछे हटने पर विवश कर दिया और युद्ध में स्पष्ट बढ़त प्राप्त की।
श्लोक 605 से 622: युद्ध की भीषणता, रावण की माया और मायायुद्ध का आरम्भ
युद्धभूमि में असंख्य योद्धा, हाथी, घोड़े और रथ नष्ट होकर बिखरे पड़े थे। अनेक दिनों तक चले युद्ध में जब रावण अपनी सेना को पराजित होता देख निराश हुआ, तब उसने माया से सीता का कटा हुआ मस्तक प्रकट कर राम को शोकाकुल करने का प्रयास किया। विभीषण ने इसे रावण की मायावी चाल बताकर राम का भ्रम दूर किया। इसके बाद रावण आकाश में जाकर मायायुद्ध करने लगा, जिसके प्रत्युत्तर में राम, लक्ष्मण तथा उनके प्रमुख सहयोगी भी अपनी-अपनी विद्याओं के प्रभाव से आकाशमार्ग में विभिन्न राक्षस वीरों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 623 से 631 : लक्ष्मण द्वारा रावण-वध
जब राम रावण पर भारी पड़ने लगे, तब इन्द्रजित् बीच में आया, किन्तु राम ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद लक्ष्मण ने रावण का सामना किया। रावण ने मायावी अस्त्रों से लक्ष्मण को घेर लिया, परन्तु लक्ष्मण अपनी विद्या के प्रभाव से मुक्त हो गए। उसी समय चक्ररत्न उनके अधिकार में आया और उन्होंने उसी से रावण का मस्तक काटकर उसका वध कर दिया। रावण अपने पापकर्मों के कारण नरकगति को प्राप्त हुआ तथा लक्ष्मण ने विजयशंख बजाकर शत्रुओं को अभय प्रदान किया।
श्लोक 632 से 641 : विभीषण का राज्याभिषेक और राम-सीता मिलन
रावण के पतन के बाद उसके मंत्री तथा शेष प्रमुखजन राम और लक्ष्मण की शरण में आ गए। दोनों भाइयों ने विभीषण को लंका का राजा बनाकर समस्त राजवैभव सौंप दिया। विभीषण, सुग्रीव और हनुमान अशोकवाटिका जाकर सीता को विजय का समाचार सुनाते हैं और उन्हें आदरपूर्वक राम के पास ले आते हैं। दीर्घ विरह के बाद राम और सीता का हर्षपूर्ण मिलन होता है तथा वे एक-दूसरे से अपने वियोगकाल के समस्त वृत्तांत सुनाते हैं।
श्लोक 642 से 651 : सीता की स्वीकृति और विजय के उपरान्त दिग्विजय का प्रारम्भ
राम ने विचारपूर्वक यह स्वीकार किया कि दोष केवल रावण का था, सीता पूर्णतः निष्कलंक हैं। इसके बाद दोनों भाई सुन्दरपीठ पर्वत पर पहुँचे, जहाँ देवों और विद्याधरों ने उनका भव्य अभिषेक किया। यक्ष सुनन्द ने लक्ष्मण को सौनन्दक तलवार भेंट की। आगे चलकर गंगाद्वार और समुद्रतट पर लक्ष्मण ने मागध देव तथा वैजयन्त गोपुर के वरतनु देव को वश में कर उनसे बहुमूल्य उपहार प्राप्त किए।
श्लोक 652 से 661 : लक्ष्मण की दिग्विजय और अयोध्या प्रवेश
लक्ष्मण ने पश्चिम दिशा में प्रभास देव को वश में कर अनेक दिव्य रत्न प्राप्त किए। इसके पश्चात् उन्होंने पश्चिम और पूर्व के म्लेच्छ प्रदेशों तथा विजयार्ध पर्वत के निवासियों को अधीन कर अनेक राजाओं, विद्याधरों और देवों को अपनी आज्ञा का पालन करने वाला बनाया। बयालीस वर्षों में उनकी दिग्विजय पूर्ण हुई और वे चक्ररत्न के साथ विजयी होकर राम के अग्रगामी रूप में अयोध्या लौटे।
श्लोक 662 से 672 : साम्राज्याभिषेक और राज्यवैभव
शुभ मुहूर्त में देव, मनुष्य और विद्याधरों ने राम और लक्ष्मण का एक साथ सहस्र आठ सुवर्ण कलशों से अभिषेक कर उन्हें तीन खण्डों का सम्राट बनाया। दोनों भाइयों को विशाल साम्राज्य, असंख्य रानियाँ, नगर, ग्राम, हाथी, घोड़े, रथ, सैनिक तथा देव-सेवकों सहित अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। उनका राज्य वैभव, समृद्धि और शक्ति से परिपूर्ण था।
श्लोक 673 से 681 : महारत्न और धर्मोपदेश की प्राप्ति
राम और लक्ष्मण अपने-अपने दिव्य महारत्नों से विभूषित होकर सुखपूर्वक राज्य करते रहे। एक समय शिवगुप्त जिनेन्द्र मनोहर उद्यान में पधारे। राम और लक्ष्मण ने उनकी विनयपूर्वक पूजा कर धर्म का स्वरूप जानना चाहा। तब जिनेन्द्र ने जीव, कर्म, मोक्ष तथा अनेक तत्त्वों का गूढ़ उपदेश देना आरम्भ किया।
श्लोक 682 से 691 : श्रावकधर्म, लक्ष्मण का निदान और वाराणसी गमन
शिवगुप्त जिनेन्द्र के उपदेश से राम सहित अनेक लोगों ने श्रावक धर्म के व्रत ग्रहण किए। किन्तु भोगासक्ति और निदान शल्य के कारण लक्ष्मण सम्यग्दर्शन ग्रहण नहीं कर सके और उन्होंने नरकायु का बन्ध कर लिया। कुछ समय बाद दोनों भाइयों ने राज्य भरत और शत्रुघ्न को सौंपकर वाराणसी में निवास किया। वहाँ उनके पुत्र उत्पन्न हुए और वे परिवार सहित सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
श्लोक 692 से 701 : लक्ष्मण के अशुभ स्वप्न और मृत्यु
लक्ष्मण ने तीन अशुभ स्वप्न देखे, जिनका अर्थ पुरोहित ने रोग, आयु-क्षय और वैराग्य के रूप में बताया। राम ने धैर्यपूर्वक यह सुनकर प्रजा में अहिंसा की घोषणा कराई, जिनपूजा की तथा व्यापक दान दिया। कुछ समय बाद लक्ष्मण असाध्य रोग से ग्रस्त हुए और माघ कृष्ण अमावस्या के दिन देह त्यागकर चौथे नरक में उत्पन्न हुए।
श्लोक 702 से 711 : राम का वैराग्य और दीक्षा
लक्ष्मण की मृत्यु से राम अत्यन्त शोकाकुल हुए, परन्तु ज्ञान के बल से स्वयं को स्थिर कर उन्होंने उनका अंतिम संस्कार कराया। तत्पश्चात् लक्ष्मण के पुत्र को राज्य सौंप दिया तथा अपने पुत्रों में से अजितञ्जय को उत्तराधिकारी बनाकर स्वयं संसार से विरक्त हो गए। शिवगुप्त केवली से मोक्षमार्ग का उपदेश सुनकर तथा लक्ष्मण की नरकगति का कारण जानकर राम ने सुग्रीव, हनुमान, विभीषण और अनेक राजाओं के साथ संयम एवं मुनि दीक्षा धारण कर ली।
श्लोक 712 से 721 | : राम का केवलज्ञान और मोक्ष
सीता तथा अनेक रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। राम और हनुमान ने कठोर साधना कर श्रुतकेवली पद प्राप्त किया। दीर्घकालीन तप और शुक्लध्यान से राम को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। छह सौ वर्ष तक धर्मोपदेश देने के पश्चात् उन्होंने सम्मेदशिखर पर अंतिम शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर हनुमान आदि के साथ सिद्धपद प्राप्त किया। विभीषण आदि अनेक मुनि उच्च देवगति को तथा सीता आदि आर्यिकाएँ अच्युत स्वर्ग को प्राप्त हुईं।
श्लोक 722 से 732 : उपसंहार, पूर्वभव और शिक्षा
अन्य रानियाँ प्रथम स्वर्ग में उत्पन्न हुईं तथा लक्ष्मण भविष्य में नरक से निकलकर क्रमशः संयम धारण कर मोक्ष प्राप्त करेंगे। ग्रंथ में राम और लक्ष्मण के जीवन का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि समान वैभव के उपभोग के बाद भी भिन्न भावों के कारण राम सिद्धपद को और लक्ष्मण नरकगति को प्राप्त हुए। इसके पश्चात् रावण, लक्ष्मण, सीता और राम के पूर्वभवों का वर्णन किया गया है तथा अंत में यह शिक्षा दी गई है कि निदान (भोगों की आकांक्षा) आध्यात्मिक पतन का कारण है, इसलिए विवेकी पुरुष को उससे सदैव दूर रहना चाहिए। यही इस पर्व का प्रमुख नैतिक संदेश है।
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण भाग – 2
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