अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 331 to 342
श्लोक ( Shlok ) 331 – 337
उज्जयिन्यामथान्येद्युस्तं श्मशानेऽतिमुक्तके । वर्धमानं महासत्त्वं प्रतिमायोगधारिणम् ॥ ३३१ ॥ निरीक्ष्य स्थाणुरेतस्य दौष्ट्याद्धैर्य परीक्षितुम् । उत्कृत्य कृत्तिकास्तीक्ष्णाः प्रविष्टजठराण्यलम् ॥ ३३२ ॥”व्यात्ताननाभिभीष्माणि नृर्त्यान्त विविधैर्लयैः । तर्जयन्ति स्फुरद्ध्वानैः साट्टहासैर्दुरीक्षणैः ॥ ३३३ ॥स्थूलवेतालरूपाणि निशि कृत्वा समन्ततः । पराण्यपि फणीन्द्रेभसिंहवह्वयानिलैः समम् ॥ ३३४ ॥ किरातसैन्यरूपाणि पापैकार्जनपण्डितः । विद्याप्रभावसम्भावितोपसर्गैर्भयावहैः ॥ ३३५ ॥स्वयं स्खलयितुं चेतः समाधेरसमर्थकः । स महतिमहावीराख्यां कृत्वा विविधाः स्तुतीः ॥ ३३६ ॥उमया सममाख्याय नतित्वागादमत्सरः । पापिनोऽपि प्रतुष्यन्ति प्रस्पष्टं दृष्टसाहसाः ॥ ३३७ ॥
अथानन्तर- किसी एक दिन अतिशय धीर वीर वर्धमान भगवान् उज्जयिनीके अतिमुक्तक नामक श्मशानमें प्रतिमा योगसे विराजमान थे। उन्हें देखकर महादेव नामक रुद्रने अपनी दुष्टतासे उनके धैर्यकी परीक्षा करनी चाही। उसने रात्रिके समय ऐसे अनेक बड़े-बड़े वेतालोंका रूप बनाकर उपसर्ग किया कि जो तीक्ष्ण चमड़ा छीलकर एक दूसरेके उदरमें प्रवेश करना चाहते थे, खोले हुए मुंहोंसे अत्यन्त भयंकर दिखते थे, अनेक लयोंसे नाच रहे थे तथा कठोर शब्दों, अट्टहास और विकराल दृष्टि से डरा रहे थे। इनके सिवाय उसने सर्प, हाथी, सिंह, अग्नि और वायुके साथ भीलों की सेना बनाकर उपसर्ग किया। इस प्रकार एक पापका ही अर्जन करनेमें निपुण उस रुद्रने, अपनी विद्याके प्रभावने किये हुए अनेक भयंकर उपसर्गोंसे उन्हें समाधिसे विचलित करनेका प्रयत्नकिया परन्तु वह उसमें समर्थ नहीं हो सका । अन्तमें उसने भगवान के महति और महावीर ऐसे दो नाम रख कर अनेक प्रकारकी स्तुति की, पार्वतीके साथ नृत्य किया और सब मात्सर्यभाव छोड़ कर वह वहाँ से चला गया सो ठीक ही है क्योंकि साहसको स्पष्ट रूपसे देखने वाले पापी जीव भी सन्तुष्ट हो जाते हैं ।। ३३१-३३७ ।।
“Thereafter, on a certain day, the exceptionally profound and valiant Lord Vardhamana stood in the Pratima-yoga posture within the Atimuktaka cemetery of Ujjayini. Beholding Him, a Rudra named Mahadeva, driven by his own malevolence, sought to test the Lord’s unshakeable fortitude.
During the night, he created an ordeal by manifesting numerous colossal, ghastly vampires (vetalas)—monsters that peeled away tough skin and sought to enter one another’s bellies, appeared utterly horrific with their jaws wide gaping, danced in various chaotic rhythms, and struck terror through piercing shrieks, wild demonic laughter (attahasa), and ferocious glares. Beyond this, he unleashed further afflictions by conjuring a tribal army (bhils) accompanied by serpents, elephants, lions, raging fire, and tempestuous winds. Thus, that Rudra, adept only in accumulating sinful karma, exerted all his power to violently disrupt the Lord from His deep meditative absorption (samadhi) through these terrifying illusions wrought by his supernatural spells; yet, he utterly failed to shake Him.
Ultimately, recognizing the Lord’s absolute victory, he bestowed upon Him the two glorious titles of Mahati (The Great) and Mahavira (The Supreme Hero), sang His praises in various hymns, danced alongside Parvati, and departed from that place having cast away all his malice. And this is only fitting, for even sinful beings, when brought face-to-face with such transcendent courage, are filled with reverent admiration. || 331–337 ||”
श्लोक ( Shlok ) 338 – 339
कदाचिच्चेटकाख्यस्य नृपतेश्चन्दनाभिधाम् । सुतां वीक्ष्य वनक्रीडासक्तां कामशरातुरः ॥ ३३८ ॥कृतोपायो गृहीत्वैनां कश्चिद्रच्छन्नभश्वरः । पश्चाद्भीत्वा स्वभार्याया महाटव्यां व्यसर्जयत् ॥ ३३९ ॥
अथानन्तर- किसी एक दिन राजा चेटककी चन्दना नामकी पुत्री वनक्रीड़ामें आसक्त थी, उसे देख कोई विद्याधर कामबाणसे पीडित हुआ और उसे किसी उपायसे लेकर चलता बना । पीछे अपनी स्त्रीसे डरकर उसने उस कन्याको महाटवीमें छोड़ दिया ॥ ३३८-३३९ ।।
“Thereafter, on a certain day, King Chetaka’s daughter, named Chandana, was completely absorbed in sporting within the forest. Beholding her, a certain Vidyadhara (a celestial being with supernatural powers) became deeply afflicted by the arrows of Cupid (lust) and, seizing her by some deceptive artifice, carried her away. Subsequently, struck by the fear of his own wife, he abandoned the young princess in the depths of a dense, vast forest (Mahatavi). || 338–339 ||”
श्लोक ( Shlok ) 340
वनेचरपतिः कश्चित्तत्रालोक्य धनेच्छया । एनां वृषभदत्तस्य ‘वाणिजस्य समर्पयत् ॥ ३४० ॥
वहाँ किसी भीलने देख कर उसको धनकी इच्छासे वृषभदत्त सेठको दी ॥३४०।।
“Finding her stranded there, a certain Bhil (tribal hunter), driven by the desire for wealth, sold her to a wealthy merchant named Vrishabhadatta. || 340 ||”
श्लोक ( Shlok ) 341 – 342
तस्य भार्या सुभद्राख्या तया सम्पर्कमात्मनः । वणिजः शङ्कमानासौ पुराणं अकोद्रवौदनम् ॥ ३४१ ॥आरनालेन सम्मिश्र शरावे निहितं सदा । दिशती शृङ्खलाबन्धभागिनीं तां व्यधाद्रुषा ॥ ३४२ ॥
उस सेठकी स्त्रीका नाम सुभद्रा था उसे शंका हो गई कि कहीं अपने सेठका इसके साथ सम्बन्ध न हो जाय । इस शङ्कासे वहः चन्दनाको खानेके लिए मिट्टीके शकोरा में कांजी से मिला हुआ कोदौंका भात दिया करती थी और क्रोध वश उसे सदा सांकलसे बाँधे रहती थी ॥ ३४१-३४२ ॥
“The merchant’s wife was named Subhadra. She was seized by the persistent suspicion that her husband might establish an intimate relationship with the young maiden. Driven by this jealousy, she routinely fed Chandana nothing but coarse millet rice boiled in sour gruel (kanji), served in a crude earthenware bowl, and out of sheer wrath, kept her constantly bound in iron chains. || 341–342 ||”
श्लोक 343 से 352
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72