नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 203 to 211
श्लोक ( Shlok ) 203 – 204
अथान्येद्युर्नटप्रेक्षां वीक्षितुं कौतुकाद्गतः । बलवद्भटसंघट्टह्मपतत्सोढुमक्षमः ॥ २०३ ॥समीक्ष्य तं जनोऽन्योन्यकराग्रास्फालनान्वितम् । हसत्यापन्नलज्जः सन् भृगुपाते कृतोद्यमः ॥ २०४ ॥
तदनन्तर किसी दूसरे दिन वह कौतुकवश नटोंका खेल देखनेके लिए गया। वहाँ बड़े-बड़े बलवान् योद्धाओंकी भीड़ थी जिसे वह सहन नहीं कर सका किन्तु उसके विपरीत गिर पड़ा। उसे गिरा हुआ देख दूसरे लोग परस्पर ताली पीट कर उसकी हँसी करने लगे। इस घटनासे उसे बहुत ही लज्जा हुई और वह किसी पर्वतकी शिखरसे नीचे गिरनेका उद्यम करने लगा ।। २०३-२०४ ॥
“Thereafter, on another day, he went out of curiosity to watch a performance by acrobats (natas). There was a dense crowd of massive, powerful warriors there, which he could not withstand, and instead, he collapsed to the ground. Seeing him fall, other people began clapping their hands and mocking him. He felt deeply humiliated by this incident, and in his despair, he resolved to throw himself down from the peak of a mountain.”203 – 204
श्लोक ( Shlok ) 205
अद्रिमस्तकमारुह्य टङ्कच्छिन्ने स तस्थिवान् । पातोन्मुखो भयात्कुर्वन् प्रवर्तननिवर्तने ॥ २०५ ॥
पर्वतकी शिखर पर चढ़कर वह टाँकीसे कटी हुई एक शिला पर खड़ा हो गया और गिरनेका विचार करने लगा परन्तु भयके कारण गिर नहीं सका, वह बार-बार गिरनेके लिए तैयार होता और बार-बार पीछे हट जाता था ॥२०५।।
“Having climbed to the peak of the mountain, he stood upon a rock that had been cut clean with a chisel and contemplated jumping; however, out of sheer fear, he could not bring himself to fall. Time and again he would steel himself to leap, and time and again he would shrink back.”205
श्लोक ( Shlok ) 206 – 207
शङ्खनिनाभिकाख्याभ्यां संयताभ्यां धरातले । सुस्थिताभ्यामियं छाया पृष्टः कस्येति सादरम् ॥ २०६॥सुगुरुद्रुमपेणाख्यः सत्रिबोधोऽब्रवीदिदम् २ । भवे भावी तृतीयेऽस्माच्छायेयं युवयोः पिता ॥ २०७ ॥
उसी पर्वतके नीचे पृथिवी तल पर द्रुमषेण नामके मुनिराज विराजमान थे वे मति, श्रुत अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे, शङ्ख और निर्नामिक नामके दो मुनि उनके पास ही बैठे हुए थे उन्होंने द्रुमषेण मुनिराजसे आदर के साथ पूछा कि यह छाया किसकी है? उन्होंने उत्तर दिया कि जिसकी यह छाया है वह इससे तीसरे भवमें तुम दोनोंका पिता होगा ।। २०६-२०७ ।।
“Down below on the ground at the base of that very mountain sat an ascetic named Muniraj Drumasena, who possessed the three types of knowledge: sensory (mati), scriptural (shruta), and clairvoyant (avadhi). Two other ascetics, named Shankha and Nirnamika, were seated right beside him. They respectfully asked Muniraj Drumasena, ‘Whose shadow is this?’ He replied, ‘The person to whom this shadow belongs will become the father of you both in his third birth from now.'”206 – 207
श्लोक ( Shlok ) 208 – 209
श्रुत्वा तत्तौ च गत्वैनं नन्दिनं भाविनन्दनौ । कुतस्ते मृतिनिर्बन्धो बन्धो विरम निष्फलात् ॥ २०८ ॥अमुष्मान्मर गाद्भाग्यसौभाग्यादि त्वयेप्सितम् । भविष्यति तपःसिद्धेरित्यग्राहयतां तपः ॥ २०९ ॥
गुरुकी बात सुनकर उसके दोनों होनहार पुत्र नन्दीके पास जाकर पूछने लगे कि’ हे भाई ! तुझे यह मरणका आग्रह क्यों हो रहा है ? यदि तू इस मरणसे भाग्य तथा सौभाग्य आदि चाहता है तो यह सब तुझे तपकी सिद्धिसे प्राप्त हो जावेगा’ इस प्रकार समझा कर उन्होंने उसे तप ग्रहण करा दिया ॥ २०८-२०९ ॥
“Hearing the words of their guru, his two promising future sons approached Nandi and asked, ‘O brother! Why are you so resolutely bent on death? If you desire good fortune and prosperity through this death, you can easily attain all of it through the successful accomplishment of ascetic penance (tapa).’ Having reasoned with him in this manner, they initiated him into the path of asceticism.”208 – 209
श्लोक ( Shlok ) 210 – 211
चिरं सोऽपि तपः कृत्वा महाशुक्रेऽमरोऽजनि । तत्र षोडशवार्थ्यायुरनुभूयाभिवान्छितम् ॥ २१० ॥प्रादुरासीत्ततश्च्युत्वा वसुदेवो वसुन्धराम् । वशीकर्तुमयं यस्माद्भाविनौ बलकेशवौ ॥ २११ ॥
वह नन्दी भी चिरकाल तक तपश्चरण कर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ; वहाँ सोलह सागरकी आयु प्रमाण मनोवांछित सुखका उपभोग करता रहा। तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर पृथिवीको वश करनेके लिए वसुदेव हुआ है। बलभद्र और नारायणकी उत्पत्ति इसीसे होगी ॥ २१०-२११ ॥
“After performing ascetic penances (tapashcharana) for a very long duration, that Nandi was reborn as a celestial being (deva) in the Mahashukra heaven. There, he continuously enjoyed all his heart’s desires for a lifespan lasting sixteen Sagar (Sagaropama). Subsequently, departing from that heaven, he has now been born as Vasudeva to rule over the earth. It is from him that Balabhadra and Narayana will be born.”210 – 211
श्लोक 212 से 221
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