मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
श्रत्वा तद्वचनं तौ च तेनावाभ्यां सुते स्वयम् । देये चेद्दीयते दन्ती नोचेत्सोऽपि न दीयते ॥ ११२ ॥
दूतके वचन सुनकर उन दोनोंने उत्तर दिया कि यदि तुम्हारा स्वामी वलीन्द्र हम दोनोंके लिए अपनी पुत्रियाँ देवे तो उसे यह गन्धगज दिया जा सकता है अन्यथा नहीं दिया जा सकता ।। ११२ ॥
“Upon hearing the words of the messenger, both brothers replied: ‘If your master Balindra gives his daughters in marriage to the two of us, then this scent-elephant can be given to him; otherwise, it can never be handed over.'” || 112 ||
श्लोक ( Shlok ) 113 – 116
इति प्रत्याहतुः कर्णकटुकं तदुदीरितम् । समाकर्ण्य बलीन्द्राख्यो बिभ्रत्कालानुकारिताम् ॥ ११३ ॥योद्धुमाभ्यां समं भीमकोपः सन्नद्धवाँस्तदा । खगेन्द्रो दक्षिणश्रेण्यां’ सुरकान्तारपूः पतिः ॥ ११४ ॥ केशवत्या महाश्राता सम्मेदाद्रौ सुसाधिते । सिंहपक्षीन्द्रवाहिन्यौ महाविद्ये यथाविधि ॥ ११५ ॥ दत्वा ताभ्यां कुमाराभ्यां नान्ना केसरिविक्रमः । तदीयकार्यसाहाय्यं बन्धुत्वेनावमन्यत ॥ ११६ ॥
इस प्रकार कानोंको अप्रिय लगनेवाला उनका कहना सुनकर बलीन्द्र अत्यन्त कुपित हुआ । वह यमराजका अनुकरण करता हुआ उन दोनोंके साथ युद्ध करनेके लिए तैयार हो गया। उस समय दक्षिणश्रेणीके सुरकान्तार नगरके स्वामी केसरिविक्रम नामक विद्याधरोंके राजाने जो कि दत्तकी माता केशवतीका बड़ा भाई था सम्मेदशिखर पर विधिपूर्वक सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामकी दो विद्याएँ उक्त दोनों कुमारोंके लिए दे दी और भाईपना मानकर उनके कार्यमें सहायता देना स्वीकृत कर लिया ।। ११३-११६ ॥
“Upon hearing their reply, which was deeply displeasing to his ears, Balindra became utterly infuriated. Mimicking the god of death (Yamaraja) himself, he prepared to wage war against them. At that moment, King Kesarivikrama—the ruler of Surakantara city in the Southern Ridge of the Vidyadhara territory and the elder brother of Datta’s mother, Keshavati—came forward. At the holy Sammed Shikhar, he formally initiated the two princes into two supernatural powers (vidyas) named Simhavahini and Garudavahini. Treating them with brotherly affection, he pledged his full support to their cause.” || 113-116 ||
श्लोक ( Shlok ) 117
तत्र तयोस्तुमुलयुद्धेन बलयोर्बलिनोरभूत् । संग्रामः क्षयकालो वा संहरन् सकलाः प्रजाः ॥ ११७ ॥
तदनन्तर उन दोनोंकी बलवान् सेनाओंका प्रलयकालके समान समस्त प्रजाका संहार करनेवाला भयङ्कर संग्राम हुआ ।॥ ११७ ॥
“Thereafter, a terrifying battle broke out between their two mighty armies—a catastrophic war that, like the cataclysmic end of an era (Pralayakala), wrought absolute destruction upon all living beings.” || 117 ||
श्लोक ( Shlok ) 118
मायामये युद्धे बलीन्द्रतनयं क्रुधा । मुखं शतबलिं मृत्योः सीरपाणिरनीनयत् ॥ ११८ ॥
बलीन्द्रके पुत्र शतबलि और बलभद्रमें खूब ही मायामयी युद्ध हुआ। उसमें बलभद्रने शतबलिको क्रोधवश यम-राजके मुखमें पहुंचा दिया ॥ ११८ ॥
“A highly deceptive, illusion-filled battle (Mayamayi Yuddha) took place between Balindra’s son, Shatabali, and Balabhadra. In that clash, an enraged Balabhadra swiftly delivered Shatabali into the jaws of the god of death (Yamaraja).” || 118 ||
श्लोक ( Shlok ) 119 – 120
बलीन्द्रेणापि तं दृष्ट्वा समुत्पन्नरुषात्मनः । प्रहितं ‘चक्रमु “द्दिश्य केशवं कौशिकोपमम् ॥ ११९ ॥तत्तं प्रदक्षिणीकृत्य दक्षिणं, बाहुमाश्रितम् । तदेवादाय दत्तोऽपि हत्वा तं तच्छिरोऽग्रहीत् ॥ १२० ॥
यह देख, बलीन्द्रको क्रोध उत्पन्न हो गया। उसने इन्द्रके तुल्य नारायणदत्तको लक्ष्य कर अपना चक्र चलाया परन्तु वह चक्र प्रदक्षिणा देकर उसकी दाहिनी भुजा पर आ गया। दत्तनारायणने उसी चक्रको लेकर उसे मार दिया और उसका शिर हाथमें ले लिया ॥ ११९-१२० ॥
“Seeing this, Balindra was consumed by absolute fury. Aiming at the Indra-like Datta-Narayana, he unleashed his cosmic discus (Chakra). However, that discus merely circled Datta-Narayana clockwise in a gesture of reverence and came to rest upon his right arm. Datta-Narayana then seized that very same discus, hurled it back, and slew Balindra, severing his head in his own hand.” || 119-120 ||
श्लोक ( Shlok ) 121
युद्धान्ते तौ तदा वीरो प्रदत्ताभयघोषणौ । त्रिखण्डधरणीचक्रं सचक्र’ चक्रतुः स्वकम् ॥ १२१ ॥
युद्ध समाप्त होते ही उन दोनों वीरोंने अभय घोषणा की और चक्र सहित तीनों खण्डोंके पृथिवी-चक्रको अपने आधीन कर लिया ॥ १२१ ॥
“The moment the war ended, those two heroes issued a proclamation of absolute fearlessness (Abhaya Ghoshana) across the lands, and backed by the divine discus, they brought the entire empire of the three realms of the Earth completely under their submission.” || 121 ||
श्लोक 122 से 125
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मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111
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