अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 233 to 241
श्लोक ( Shlok ) 233
लुप्तसारां तां परित्यज्य ययौ शमम् । ‘सुव्रतं सुश्रुतं श्रित्वा सद्गुरुं श्रुतसागरम् ॥ २३३॥
अन्तमें उसने सारहीन मालाके समान वह समस्त लक्ष्मी छोड़ दी और उत्तम व्रत तथा उत्तम शास्त्र-ज्ञानसे सुशोभित श्रीश्रुतसागर नामके सद्गुरुके पास जाकर दीक्षा धारण कर ली ॥ २३३ ॥
“In the end, he cast away that entire royal fortune like a withered, worthless garland (Saarahina maala), and approaching the true spiritual master (Sadguru) named Shri Shrutasagar—who was brilliantly adorned with supreme vows and exalted scriptural knowledge—he embraced the holy vows of initiation (Deeksha).”
श्लोक ( Shlok ) 234
वर्धमानव्रतः प्रान्ते महाशुक्रेऽजनिष्ट सः । षोडशाम्भोधिमेयायुराविर्भूतसुखोदयः ॥ २३४ ॥
जिसके व्रत निरन्तर बढ़ रहे हैं ऐसा हरिषेण आयुका अन्त होनेपर महाशुक्र स्वर्गमें देव उत्पन्न हुआ। वहाँ वह सोलह सागरकी आयु प्रमाण उत्तम सुख भोगता रहा ।। २३४ ।।
“Harishena, whose practice of spiritual vows was continuously escalating in purity, was reborn upon the conclusion of his lifespan as a celestial being in the Mahashukra heaven. There, he continuously enjoyed supreme pleasures for a lifespan lasting sixteen Sagaras (ocean-like cosmic time-measured spans).”234
श्लोक ( Shlok ) 235 – 240
अस्तमभ्युद्यतार्को वा प्रान्तकालं समाप्तवान् । धातकीखण्डपूर्वाशा विदेहे पूर्वभागगे ॥ २३५ ॥विषये पुष्कलावत्यां धरेशः पुण्डरीकिणी । पतिः सुमित्रविख्यातिः सुत्रतास्य मनोरमा ॥ २३६ ॥प्रियमित्रस्तयोरासीधनयो नयभूषणः । नान्नैव नमिताशेषविद्विषश्चक्रवर्तिताम् ॥ २३७ ॥सम्प्राप्य भुक्तभोगाङ्गो भङ्गुरान्सर्वसङ्गमान् । क्षेमङ्करजिनाधीशवक्त्राम्भोजविनिर्गतात् ॥ २३८ ॥तत्त्वगर्भगभीरार्थवाक्यान्मत्वा विरक्तवान् । सर्वमित्राख्यसूनौ स्वं राज्यभारं निधाय सः ॥ २३९ ॥भन्यभूपसहस्त्रेण सह संयममाददे । प्रतिष्ठानं यमास्तस्मिन्नवा पंस्तेऽष्टमातृभिः ॥ २४० ॥
जिस प्रकार उदित हुआ सूर्य अस्त हो जाता है उसी प्रकार वह देव भी अन्तकालको प्राप्त हुआ और वहाँ से चलकर धातकीखण्डद्वीपकी पूर्व दिशा सम्बन्धी विदेह क्षेत्र के पूर्वभाग में स्थित पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा सुमित्र और उनकी मनोरमा नामकी रानीके प्रियमित्र नामका पुत्र हुआ। वह पुत्र नीतिरूपी आभूषणोंसे विभूषित था, उसने अपने नामसे ही समस्त शत्रुओंको नम्रीभूत कर दिया था, तथा चक्रवर्तीका पद प्राप्तकर समस्त प्रकारके भोगोंका उपभोग किया था। अन्त में वह क्षेमङ्कर नामक जिनेन्द्र भगवान्के मुखारविन्दसे प्रकट हुए, तत्त्वों से भरे हुए और गम्भीर अर्थको सूचित करने वाले वाक्योंसे सब पदार्थोंके समागमको भङ्गुर मानकर विरक्त हो गया तथा सर्वमित्र नामक अपने पुत्रके लिए राज्यका भार देकर एक हजार राजाओंके साथ दीक्षित हो गया। पाँच समितियों और तीन गुप्तियों रूप आठ प्रवचन-मातृकाओंके साथ-साथ अहिंसा महाव्रत आदि पाँच महाव्रत उन मुनिराजमें पूर्ण प्रतिष्ठाको प्राप्त हुए थे ॥ २३५-२४० ॥
Here is the English translation of the multi-verse passage, capturing its expansive narrative sweep, classical similes, and technical spiritual terminology:
“Just as the risen sun eventually sets, that celestial being also reached the end of his divine life. Departing from that heaven, he was reborn in the Dhatakikhanda island, specifically in the eastern part of the Videha region within the country of Pushkalavati, in the city of Pundarikini; there, he became the son named Priyamitra—who was adorned with the ornaments of righteous policy (Neeti) and had subdued all adversaries by the mere power of his name—born to Queen Manorama and King Sumitra. In time, having attained the supreme sovereign status of a Chakravarti (universal monarch), he enjoyed all manner of worldly pleasures.
In the end, by listening to the speech emanating from the lotus-mouth of the Jinendra (Tirthankara) Lord Kshemankara—speech filled with ultimate realities (Tattvas) and conveying profound spiritual meaning—he realized the absolute transience (Bhangura) of all material associations and became entirely detached. Entrusting the burden of the kingdom to his son named Sarvamitra, he embraced the vows of ascetic initiation (Deeksha) along with one thousand kings. In that great sage, the five great vows (Mahavratas), including absolute non-violence (Ahimsa), attained perfect realization alongside the eight matrixes of the doctrine (Pravachana-matrika), consisting of the five regulations of conduct (Samitis) and the three restraints of mind, speech, and body (Guptis).”235 – 240
श्लोक ( Shlok ) 241
प्रान्ते प्राप्य सहस्त्रारमभूत्सूर्यप्रभोऽमरः । सुखाष्टादशवार्थ्यायुर्वृद्धद्धिर्भुक्तभोगकः ॥ २४१ ॥
आयुका अन्त होनेपर वे सहस्त्रार स्वर्गमें जाकर सूर्यप्रभ नामके देव हुए । वहाँ उनकी आयु अठारह सागर प्रमाण थी, अनेक ऋद्धियाँ बढ़ रही थीं और वे सब प्रकारके भोगोंका उपभोग कर चुके थे ॥ २४१ ॥
“Upon the conclusion of his earthly lifespan, he ascended to the Sahasrara heaven and became a celestial being named Suryaprabha. There, his lifespan lasted for an immense duration of eighteen Sagaras (ocean-like cosmic time-measured spans), his supernatural divine powers (Riddhis) grew continuously, and he thoroughly enjoyed every manner of celestial pleasure.” 241
श्लोक 242 से 252
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232
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