मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 14 to 21
श्लोक ( Shlok ) 14 – 20
राजभिर्बहुभिः सार्द्धमवाप्यात्युन्नतं तपः । अङ्गान्येकादशाङ्गानि विधाय विधिना धिया ॥ १४ ॥सम्पाद्य तीर्थकृन्नाम गोत्रं चोपात्तभावनः । तपस्यन्सुचिरं प्रान्ते प्रास्ताशेषपरिग्रहः ॥ १५ ॥सोऽनुत्तरविमानेषु सम्बभूवापराजिते । त्रयस्त्रिशत्समुद्रोपमायुर्हस्तोच्छितिः कृती ॥ १६ ॥मासान् षोडश मासाद्धं चातिवाद्यं मनाक् सकृत् । ‘श्वसित्याहारमादचे मनसा योग्यपुद्गलान् ॥ १७ ॥त्रयत्रिशत्सहस्त्रोक्तवत्सराणां व्यतिक्रमे । भोगोऽस्य निःप्रवीचारो लोकनाल्यन्तरावधेः ॥ १८ ॥तत्क्षेत्रमितभाशक्तिविक्रियस्यामरेशितुः । तस्मिन् षण्मासशेषायुष्यागमिष्यति भूतलम् ॥ १९ ॥अत्रैव भरते वङ्गविषये मिथिलाधिपः । इक्ष्वाकुर्भूपतिः कुम्भनामा काश्यपगोत्रजः ॥ २० ॥
अनेक राजाओंके साथ श्रेष्ठ तप धारण कर लिया, यथाविधि बुद्धिपूर्वक ग्यारह अङ्गोंका अध्य-यन किया, सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन कर तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध किया, चिरकाल तक तपस्या की और अन्तमें समस्त परिग्रहका त्याग कर अनुत्तर विमानोंमेंसे अपराजित नामक विमानमें देव पद प्राप्त किया । वहाँ उस कुशल अहमिन्द्रकी तैंतीस सागरकी स्थिति थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, साढ़े सोलह माह बीत जाने पर वह एक बार थोड़ी-सी श्वास ग्रहण करता था, तैंतीस हजार वर्ष बीत जाने पर एक बार मानसिक आहार ग्रहण करता था, इसका काम-भोग प्रवीचारसे रहित था, -लोकनाडी पर्यन्त उसके अवधिज्ञानका विषय था और उतनी ही दूर तक उसकी दीप्ति, शक्ति, तथा विक्रिया ऋद्धि थी। इस प्रकार भोगोपभोग करते हुए उस अहमिन्द्रकी आयु जब छह माहकी शेष रह गई और वह पृथिवी पर आनेके लिए सन्मुख हुआ तब इसी भरत क्षेत्रके वङ्ग देशमें मिथिला नगरीका स्वामी इक्ष्वाकुवंशी, काश्यपगोत्री, कुम्भ नामका राजा राज्य करता था ।।१४-२०।।
“Along with numerous other kings, he embraced the highest form of ascetical penance. Guided by a discerning intellect, he systematically studied the eleven Aṅgas (the core Jain scriptures) according to the prescribed rites. By deeply contemplating the sixteen causes (Ṣoḍaśa Kāraṇa Bhāvanās), he bound the Tīrthaṅkara Nāma-Karma (the karma that leads to becoming a Tirthankara). After practicing severe austerities for a long time, he ultimately renounced all worldly possessions (Parigraha) and attained the status of a celestial being (Deva) in the Aparājita celestial vehicle—one of the highest unexcelled heavens (Anuttara Vimānas).
There, as a blissful Ahamindra deity, his life span lasted for thirty-three Sāgaras (oceanic epochs), and his body measured one cubit in height. He would draw a breath only once every sixteen and a half months, and once every thirty-three thousand years, he would partake in mental sustenance (Mānasika Āhāra). His existence was entirely free from sexual desires and physical union (Pravīcāra). The domain of his clairvoyant knowledge (Avadhijñāna) extended right up to the cosmic channel (Loka-nāḍī), and his celestial radiance, power, and miracle-working capacities (Vikriyā Ṛddhi) reached just as far.
While enjoying these celestial privileges, when only six months of that Ahamindra’s life span remained and he was poised to descend to the earthly realm, King Kumbha—a scion of the Ikṣvāku dynasty and belonging to the Kāśyapa clan—was ruling over the city of Mithilā in the Vaṅga region of this very Bharata region (Bharata Kṣetra).”14 – 20
श्लोक ( Shlok ) 21
प्रजावती महादेवी तस्य लक्ष्मीरिवापरा । पीयूषाशिकृताचिन्त्यवसुधारादिवैभवा ॥ २१ ॥
उसकी प्रजावती नामकी रानी थी जो दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी। देवोंने उसका रत्न-वृष्टि आदि अचिन्त्य वैभव प्रकट किया था ।॥ २१ ॥
“He had a queen named Prajāvatī, who appeared like a second goddess of fortune and beauty (Lakṣmī). For her, the celestial deities manifested inconceivable splendor, including a shower of precious gems.”21
श्लोक 22 से 32
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